राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : साव के खिलाफ भूपेश की टिप्पणी
02-Jan-2026 5:56 PM
राजपथ-जनपथ : साव के खिलाफ भूपेश की टिप्पणी

साव के खिलाफ भूपेश की टिप्पणी

पिछले दिनों बिलासपुर प्रवास के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने डिप्टी सीएम को लेकर एक टिप्पणी की थी। उन्होंने एक प्रचलित कहानी का जिक्र करते हुए कहा कि एक बार जंगल में वन प्राणियों ने बंदर को अपना राजा चुन लिया। राजा चुने जाने के बाद एक बकरी फरियाद लेकर आई कि शेर उसे खाने के लिए पीछा कर रहा है। बंदर ने पेड़ों पर खूब उछलकूद मचाई, डालियों को तोड़ डाला। फिर कहा- देखो मैंने कुछ तो किया न शब्दश: नहीं, भाव कुछ ऐसा ही था। उस जंगल के राजा की तुलना बघेल ने डिप्टी सीएम साव से कर दी।

अब छत्तीसगढ़ प्रदेश साहू संघ ने इसे मुद्दा बनाया है। इसके अध्यक्ष डॉ. नीरेंद्र साहू ने संगठन के सभी जिला अध्यक्षों को पत्र लिखा है। इसमें कहा गया है कि समाज के गौरव साव जी पर बघेल द्वारा की गई आपत्तिजनक, अत्यंत अमर्यादित टिप्पणी के विरुद्ध अपने जिले के पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपें। 10 दिन के भीतर अपने बयान के लिए भूपेश बघेल सार्वजनिक क्षमा याचना करें। यदि ऐसा नहीं किया गया तो साहू समाज संगठित और चरणबद्ध आंदोलन करेगा।

यह पत्र सोशल मीडिया पर वायरल है। बहुत सी प्रतिक्रियाएं हैं, जिनमें से कुछ अलग हटकर भी हैं- जिन्हें लाइक्स भी ठीक-ठाक संख्या में किए गए हैं। जैसे एक ने कहा है कि राजनीतिक टिप्पणी का जवाब दमदार मंत्री खुद ही दे सकते हैं। इसे सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाना चाहिए। लवकुश साहू नाम की आईडी से लिखा गया है कि बेहतर होगा, प्रदेश साहू संघ का भाजपा में विधिवत विलय कर दिया जाए। गिरवर लाल साहू ने लिखा है कि डिप्टी सीएम बनने के बाद साव जी ने साहू समाज के लिए क्या किया? पहले बताएं, फिर समाज खुद सहयोग करेगा। खुद को बचाने के लिए समाज का सहारा ले रहे हैं। वाल्मीकि साहू ने लिखा है कि इस तरह का निर्देश देकर साहू समाज को एक राजनीतिक दल का गुलाम बनाने की कोशिश की जा रही है, अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए। घनश्याम साहू का कहना है कि साहू संघ के पूर्व अध्यक्ष भूपेश बघेल सरकार की मदद से अध्यक्ष बने थे। उनके आगे-पीछे टहल रहे थे। वर्तमान अध्यक्ष जी सत्ताधारी पार्टी का आशीर्वाद पाने का प्रयास कर रहे हैं। आगे यही परंपरा स्थापित होने वाली है।

शाह, राहुल के बीच नबीन

हमने पिछले सप्ताह इसी कालम में बताया था कि भाजपा के प्रदेश प्रभारी नितिन नबीन से छत्तीसगढ़ के नेता कार्यकर्ताओं की मेल मुलाकात अब आसान नहीं होगी। क्योंकि सुरक्षा, प्रोटोकॉल, राष्ट्रीय स्तर की बैठकें और देश के दौरों के साथ सभी राज्यों के नेता कार्यकर्ताओं की भीड़। इसके साथ अब एक और कड़ी जुड़ रही है। वह यह कि नितिन नवीन को लुटियंस दिल्ली में एक सरकारी आवास अलॉट किया गया है। - सुनहरी बाग रोड पर बंगला नंबर 9। यह जगह इसलिए खास है क्योंकि यह गृह मंत्री के बंगले के बगल में है। और राहुल गांधी भी उनके पड़ोसी न सही, उसी लोकेलिटी में बंगला नंबर-5, सुनहरी बाग में रहते हैं।

नबीन को पार्टी के अध्यक्ष के रूप में शाह की छत्रछाया मिल गई है। वैसे उनके चयन नियुक्ति में भी अमित शाह की ही भूमिका रही है। अब नितिन का पड़ोसी बनना शाह से निकटता को दिखाता है।

राजनीतिक गलियारों में इस अलॉटमेंट को बीजेपी की केंद्रीय लीडरशिप में नवीन के बढ़ते कद के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है, जो बिहार की राजनीति से पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में एक ज़्यादा अहम राष्ट्रीय भूमिका की ओर उनके बदलाव को दिखाता है। बहरहाल छत्तीसगढ़ के नेताओं को मुलाकात के लिए लंबे क्यू में लगना पड़ेगा। वैसे नबीन ने बिहार के मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है तो जल्द ही छत्तीसगढ़ संगठन का प्रभार भी छोड़ देंगे ऐसी उम्मीद है।

किफायत की मिसाल

देशभर में प्रदेशों की राजधानी में जो राजभवन थे उनका नाम बदलकर अब लोक भवन रख दिया गया है ताकि थोड़ी  सादगी दिखे। राजभवन से एक राज की भावना झलकती थी जिसको लोक कर दिया गया है। अभी नए साल की शुभकामनाओं का जो कार्ड छत्तीसगढ़ के लोक भवन से, राज्यपाल की तरफ से आया है, उसमें पहले से छपे हुए कार्ड और पहले से छपे हुए लिफाफों के ऊपर ही लोक भवन के स्टीकर लगा दिए गए हैं। सरकारी खर्च पर होने वाले कामकाज में कई बार पहले से छपी स्टेशनरी को खारिज करके नई स्टेशनरी छपवा ली जाती है। ऐसे में यह सादगी अच्छी है कि पहले से छपे हुए लिफाफों को, कार्ड को, बर्बाद न करके उन पर स्टिकर चिपका दिया जाए, क्योंकि पैसा तो जनता की जेब का ही लगता है। दूसरे बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोगों के जब नाम-पते, फोन नंबर, या विभागों के नाम बदलते हैं, तो उनको भी राज्यपाल की इस मिसाल को याद रखना चाहिए।

संगठन में बदलाव का दौर

चर्चा है कि मकर संक्रांति के बाद कांग्रेस संगठन में बड़ा बदलाव होगा। बदलाव पश्चिम बंगाल, केरल, और तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर हो रहा है। तीनों राज्यों के चुनाव में प्रत्याशी चयन के लिए  स्क्रीनिंग कमेटी का गठन किया जाएगा। संकेत है कि छत्तीसगढ़ के कुछ नेताओं को विधानसभा चुनाव में अहम जिम्मेदारी मिल सकती है।

बिहार चुनाव में पूर्व सीएम भूपेश बघेल को प्रचार की जिम्मेदारी दी गई थी। भिलाई विधायक देवेन्द्र यादव भी पिछले छह महीने से बिहार में डटे थे। इससे परे पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव बिहार में पार्टी टिकट बंटवारे से जुड़े विवाद के निपटारे के लिए गठित कमेटी के सदस्य थे। बावजूद इसके पार्टी को बिहार चुनाव में बुरी हार का सामना करना पड़ा। मगर पार्टी प्रदेश के कुछ प्रमुख नेताओं को तीनों चुनाव वाले राज्यों में भेजने की तैयारी कर रही है। छत्तीसगढ़ में कोई चुनाव नहीं है। इसलिए यहां के नेताओं को वहां प्रचार में जाने में कोई दिक्कत भी नहीं है। दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ संगठन में भी काफी बदलाव होना है। जिलाध्यक्षों की नियुक्ति तो हो गई है। प्रदेश महामंत्री, और संयुक्त महामंत्री के पद खाली हैं। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज पद पर बने रहेंगे या नहीं, इस पर भी फैसला होना बाकी है। कुल मिलाकर अगले एक-डेढ़ महीने में प्रदेश संगठन में बदलाव देखने को मिल सकता है।

वन भैंसा- जनभागीदारी ही काम आ रही

छत्तीसगढ़ का राजकीय पशु वन भैंसा कभी मध्य भारत के विशाल जंगलों में आजाद विचरण करता था। आज वह विलुप्ति के कगार पर है। इधर एक अलग हटकर खबर आई है कि उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के 17 गांवों के निवासियों ने इस लुप्तप्राय प्रजाति को बचाने के लिए एकजुट होकर प्रयास शुरू किए हैं। वे जंगल की आग रोकने, अवैध कटाई पर अंकुश लगाने और कब्जा की गई भूमि को खाली करने का संकल्प तो ले ही रहे हैं , इसके जरिये वन भैंसों के लिए अनुकूल माहौल बने- यह कोशिश कर रहे हैं।

वन विभाग के प्रयासों की बात करें तो लाखों रुपये खर्च कर असम से वन भैंसे लाकर प्रजनन बढ़ाने की कोशिश की गई, लेकिन यह विफल साबित हुई। 2020 में मनास नेशनल पार्क से लाए गए भैंसे अभी भी युवा हैं और प्रजनन में समय लगेगा, जबकि पहले के प्रयासों में क्लोनिंग जैसी तकनीकों पर भी संदेह जताया गया। सरकारी योजनाओं की अपनी सीमाएं हैं। वे कई बार जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर देती हैं। ट्रांसलोकेशन जैसी महंगी योजना बाहरी हस्तक्षेप पर निर्भर हैं। यह वनों में रहने वालों के  साथ संघर्ष की नौबत भी ला देती है।

इन 17 गावों की कोशिश यह बात रही है कि वन्यजीवों का यदि हम सचमुच संरक्षण और संवर्धन करना चाहते हैं, तो वन के ग्रामीणों को ही केंद्र में रखना होगा। वे जंगल की नब्ज जानते हैं। उसकी मिट्टी, पानी और मौसम से वाकिफ होते हैं। उनकी भागीदारी के बिना कोई योजना लंबे समय के लिए सफल नहीं हो सकती। उदंती क्षेत्र के 17 ग्राम सभाओं को सक्रिय करने के लिए कुछ स्थानीय नेता अर्जुन सिंह नायक, साहेबिन श्यामलाल आदि सामने आए हैं। उन्होंने ग्राम सभाओं को लुप्त हो रहे वनभैंसों को बचाने के लिए आगे आने के लिए प्रेरित किया है। 

वन विभाग के पास बजट होता है और अफसर उसे खर्च करने का रास्ता ढूंढते हैं। बाहर से वनभैंसों को लाकर वंशवृद्धि की कोशिश इसी का उदाहरण है। बजाय बाहरी स्रोतों पर निर्भर रहने के, विभाग को चाहिए कि वह स्थानीय ग्रामीणों और सभाओं के साथ साझेदारी को मजबूत करें। ग्रामीणों की आजीविका को वन्यजीव संरक्षण से भी जोड़ा जा सकता है, जो एक टिकाऊ प्रयोग होगा।


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