राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : राज्य से मंत्री बढ़ेंगे?
07-Jan-2026 6:03 PM
राजपथ-जनपथ : राज्य से मंत्री बढ़ेंगे?

राज्य से मंत्री बढ़ेंगे?

मकर संक्रांति के बाद देश की राजनीति में उथल-पुथल के संकेत हैं। राष्ट्रीय दल भाजपा, और कांग्रेस संगठन में बदलाव की प्रक्रिया चल रही है। इन सबके बीच संसद सत्र के आसपास केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल की अटकलें लगाई जा रही है। ऐसी चर्चा है कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है।

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद यहां से अब तक एक भी कैबिनेट मंत्री नहीं बने हैं। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में छत्तीसगढ़ से रमेश बैस, और दिलीप सिंह जूदेव मंत्री थे। मगर दोनों ही राज्यमंत्री थे। ये अलग बात  है कि राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) थे। इसके बाद दस साल के यूपीए सरकार में पहले पांच साल में छत्तीसगढ़ को प्रतिनिधित्व नहीं मिला। मगर अगले पांच साल में डॉ. चरणदास महंत को केन्द्रीय राज्यमंत्री के रूप में जगह मिली।

यूपीए सरकार के बाद फिर एनडीए की सरकार बनी। पहले कार्यकाल में रेणुका सिंह राज्यमंत्री रही। दूसरे कार्यकाल में विष्णुदेव साय राज्यमंत्री के रूप में केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहे। तीसरे कार्यकाल में वर्तमान में छत्तीसगढ़ से बिलासपुर के सांसद तोखन साहू अकेले राज्यमंत्री हैं। जबकि पड़ोसी राज्य झारखंड में भाजपा के आठ सांसद हैं, यहां से तीन मंत्री हैं। इनमें से  अर्जुन मुंडा, और अन्नपूर्णा देवी कैबिनेट मंत्री, और संजय सेठ राज्यमंत्री हैं। ऐसे में अब छत्तीसगढ़ से प्रतिनिधित्व बढऩे की उम्मीद जताई जा रही है।

पार्टी के कुछ लोगों के मुताबिक केन्द्र सरकार ने नक्सलवाद के खात्मे के लिए दम लगाया है, और अगले दो-तीन महीनों में नक्सलवाद का पूरी तरह खात्मा हो जाएगा। ऐसे में नक्सल प्रभावित बस्तर में विकास की रफ्तार तेज करने के लिए हर संभव कोशिश हो रही है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह कह चुके हैं कि अगले पांच साल में बस्तर देश के विकसित संभागों में होगा। चर्चा तो यह भी है कि बस्तर के सांसद महेश कश्यप को अहम जिम्मेदारी दी जा सकती है। कुछ लोग तो उन्हें केन्द्र में मंत्री पद के दावेदारों के रूप में भी देख रहे हैं। देखना है आगे क्या होता है।

राजनीतिक भाषा पर अफसर का निलंबन

मध्यप्रदेश के इंदौर में दूषित पानी की सप्लाई का मामला देशभर में सुर्खियों में है। इस पूरे प्रकरण में यदि किसी बड़े अफसर पर कार्रवाई हुई हो तो वह देवास के एसडीएम आनंद मालवीय का निलंबन है। नहीं, दूषित पानी की सप्लाई में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। उनकी गलती कहीं और थी जो सिस्टम के लिए अक्षम्य हो गई।

एसडीएम ने इंदौर की घटना को लेकर कांग्रेस को प्रदर्शन की अनुमति दी। यह सामान्य बात है। पर अनुमति देने वाले आदेश में जो शब्द लिखे गए, वही उनके लिए संकट बन गया। आदेश में उल्लेख किया गया कि इंदौर में भाजपा शासित नगर निगम द्वारा सप्लाई किए गए कथित रूप से मल-मूत्रयुक्त पानी से 14 लोगों की मौत हुई और 2800 से अधिक लोग बीमार पड़े। साथ ही, प्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की कथित टिप्पणी घंटा को असंवेदनशील बताते हुए, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के निर्देश पर विरोध प्रदर्शन की घोषणा की गई है।

आदेश में यह भी लिखा गया कि इस अमानवीय व्यवहार के विरोध में भाजपा सांसदों और विधायकों के निवास के सामने घंटा बजाकर प्रदर्शन किया जाएगा। प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए संबंधित अधिकारियों की ड्यूटी लगाई जाती है। यानी, प्रदर्शन की अनुमति ही नहीं दी गई, बल्कि प्रदर्शन के उद्देश्य और राजनीतिक आरोपों को भी आदेश का हिस्सा बना दिया गया।

यह आदेश एसडीएम पर भारी पड़ गया। आदेश जारी होने के कुछ ही घंटों के भीतर उन्हें निलंबित कर दिया गया। उज्जैन संभाग के आयुक्त द्वारा जारी निलंबन आदेश में कहा गया कि एसडीएम ने रीडर द्वारा तैयार किए गए आदेश पर बिना समुचित परीक्षण किए हस्ताक्षर कर दिए।

यहां पता चलता है कि सरकारी दफ्तर किस ढर्रे पर चलते हैं। सामान्य समझ यही कहती है कि रीडर ने कांग्रेस के ज्ञापन की भाषा को लगभग शब्दश: आदेश में उतार दिया होगा। फ्रेश आदेश तैयार करने की जहमत नहीं उठाई। उस आदेश पर अंतिम हस्ताक्षर एसडीएम के थे, जिन्होंने उस आदेश को दस्तखत से पहले पढऩे का कष्ट नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि राजनीतिक शब्दावली और आरोपों से भरे आदेश का ठीकरा एसडीएम के सिर पर फूट गया।

ईडी में अब बाकी की बारी

भारतमाला परियोजना की ईडी पड़ताल कर रही है। पिछले दिनों आधा दर्जन से अधिक ठिकानों पर छापेमारी भी की, लेकिन किसी की गिरफ्तारी नहीं की गई। ईडी की टीम दो प्रमुख जमीन कारोबारियों से पूछताछ कर रही है। चर्चा है कि ईडी उन लोगों को घेर सकती है, जो पहले बच गए थे। ईओडब्ल्यू-एसीबी ने घोटाले पर चुनिंदा लोगों के खिलाफ कार्रवाई की थी, जिनमें से ज्यादातर को जमानत मिल गई है। सिर्फ भू-राजस्व अफसर बचे हैं, जो कि फरार चल रहे हैं। हल्ला है कि जमीन कारोबारियों ने कुछ अफसरों को उपकृत किया था। अफसरों के सहयोग से अधिक मुआवजा पाने में सफल रहे। ये अफसर अब तक बचे रहे हैं, लेकिन अब ईडी उनसे पूछताछ कर सकती है। देखना है आगे क्या होता है।


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