राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : एक दशक से बंद डीजीपी-कॉन्फ्रेंस
05-Jan-2026 6:22 PM
राजपथ-जनपथ : एक दशक से बंद डीजीपी-कॉन्फ्रेंस

एक दशक से बंद डीजीपी-कॉन्फ्रेंस

पूरे प्रदेश में इन दिनों सभी 33 जिलों के एसपी और एसएसपी प्रेस कॉन्फ्रेंस में जुटे हुए हैं। हर कोई अपने जिले की कानून-व्यवस्था, बीते साल में हुए अपराधों और उनके आरोपियों की गिरफ्तारी के आँकड़े गिना रहा है। साथ ही, अपने से पहले वाले साथी अफ़सर के कार्यकाल की उपलब्धियों से तुलना भी कर रहा है।

इन सबके बीच पत्रकार एक और सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस का इंतज़ार करते रहे, जो पिछले 10-12 साल से नहीं हो रही है—प्रदेश पुलिस प्रमुख, यानी डीजीपी की प्रेस कॉन्फ्रेंस।

डीजी की सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस की यह परंपरा अविभाज्य मध्यप्रदेश में रही और बाद में छत्तीसगढ़ में भी जारी रही। छत्तीसगढ़ में अब तक हुए डीजीपी ने शुरुआती दस वर्षों तक इस परंपरा को निभाया। पिछली अंतिम कॉन्फ्रेंस विश्वरंजन ने ली थी, लेकिन उसके बाद इस सिलसिले पर ब्रेक लग गया। ए.एन. उपाध्याय के कार्यकाल से यह परंपरा बंद कर दी गई।

स्वयं उपाध्याय और उनके बाद के हर डीजीपी 3-4 वर्षों तक पद पर रहे, लेकिन किसी भी साल यह कॉन्फ्रेंस नहीं ली गई। मीडिया-फ्रेंडली डीजीपी कहे जाने वाले डी.एम. अवस्थी ने एक बार जरूर कॉन्फ्रेंस की, लेकिन दूसरी बार तक वे पद पर नहीं रहे। मिनट भर की बाइट देने से भी गुरेज़ करने वाले उनके उत्तराधिकारी अशोक जुनेजा ने तो अपना दफ़्तर ही मीडिया के लिए बंद कर दिया था—ऐसे में वार्षिक कॉन्फ्रेंस की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

नए डीजीपी अरुण देव गौतम ने भी इस बार बंद पड़ी परंपरा को दोबारा शुरू करने में कोई रुचि नहीं दिखाई।

रायपुर हवाई अड्डे का निजीकरण !

एयरपोर्ट एथॉरिटी ऑफ इंडिया के अधीन संचालित रायपुर के स्वामी विवेकानंद हवाई अड्डे को केंद्र सरकार की तीसरे चरण की निजीकरण योजना में शामिल कर लिया गया है। रायपुर एयरपोर्ट को औरंगाबाद के साथ जोडक़र पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल में निजी हाथों में सौंपने की तैयारी है। मार्च 2026 तक इसकी टेंडर प्रक्रिया शुरू हो सकती है। 

रायपुर से बड़ी संख्या में लोग इलाज, नौकरी, पढ़ाई और कारोबार के लिए देश के अलग-अलग शहरों की यात्रा करते हैं। अन्य राज्यों और विदेशों से पहुंचने वाले पर्यटकों का आना-जाना इसी हवाईअड्डे से होता है। यह प्रदेश का एकमात्र व्यस्त विमानतल है, जहां से देश के विभिन्न बड़े शहरों से कनेक्टिविटी है और विदेश की यात्रा भी यहीं से शुरू होती है। 

यात्रियों का अनुभव बताता है कि पीपीपी मॉडल पर चल रहे बड़े हवाई अड्डों पर यात्रियों से तरह-तरह के शुल्क वसूले जाते हैं। दिल्ली और मुंबई जैसे एयरपोर्ट पर यूजर डेवलपमेंट फीस और अन्य चार्जेस में भारी बढ़ोतरी की गई है। मुंबई में घरेलू यात्रियों से वसूला जाने वाला शुल्क पहले 175 रुपये था जो अब कई मौकों पर 38 सौ रुपये तक पहुंच जाता है। अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए 13 हजार रुपये तक शुल्क देना पड़ जाता है। अंतरराष्ट्रीय यात्रियों पर लैंडिंग चार्ज, डिस एम्बार्केशन फीस जैसे नए शुल्क जोड़े गए हैं, जो पहले नहीं थे। शुल्क बढऩे के बावजूद ज्यादातर हवाई अड्डों पर सुविधाओं में सुधार नहीं दिखता। पार्किंग, सुरक्षा जांच और यात्री सुविधा जैसे सवाल जस के तस हैं। निजी कंपनियां अक्सर कम आय का अनुमान दिखाकर बाद में शुल्क बढ़ाने का रास्ता अपनाती हैं। खबरों के मुताबिक इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन ने भी भारत में बढ़ते एयरपोर्ट चार्ज पर चिंता जताई है, क्योंकि इससे एयरलाइंस की लागत बढ़ती है और अंतत: टिकट और महंगी हो जाती हैं।

अगर यही मॉडल रायपुर में लागू हुआ, तो इसका सीधा असर यहां के यात्रियों पर पड़ेगा। रायपुर जैसे कई मध्यम श्रेणी के शहरों में हवाई सेवाओं का लाभ ग्रामीण, मध्यम वर्ग और छोटे कारोबारी यात्री उठाते आए हैं। पीपीपी मॉडल से उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। पर्यटन और व्यापार महंगे सफर के कारण प्रभावित हो सकते हैं। वैसे तो सरकार का लक्ष्य है-उड़े देश का आम नागरिक, मगर ये नया मॉडल आम यात्रियों को कहीं हवाई यात्रा से दूर करने पर तुला है।

7वां वेतनमान अब अस्तित्वविहीन

7वां वेतन आयोग और उसकी लागू सिफारिशें 31 दिसंबर की आधी रात से अस्तित्व विहीन हो गई हैं। हालांकि यह वेतनमान अभी 16 महीने तक लागू रहेगा। क्योंकि 8 वें (रंजना देसाई) आयोग की सिफारिश 2027 से लागू होंगी। एक दशक पहले जनवरी 2016 में लागू हुए 7 वें वेतन आयोग ने करीब 1.2 करोड़ केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स की सैलरी, भत्तों और पेंशन को पिछले एक दशक तक तय किया। इसमें कुछ रद्दोबदल कर छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों ने भी अपनाया। क्योंकि राज्यों में पृथक आयोग के गठन की व्यवस्था खत्म हो गई है। इस तरह से अब सबकी नजरें नए बने 8वें वेतन आयोग पर टिकी हैं। अच्छी बात यह है कि कई बार बढ़ा हुआ वेतन और पेंशन पिछली तारीख से एरियर के साथ दी जाती है।

कर्मचारियों के मुताबिक 7वें वेतन आयोग की सबसे बड़ी खासियत रही बेसिक सैलरी में भारी बढ़ोतरी। उदाहरण के तौर पर, लेवल-1 कर्मचारियों की बेसिक सैलरी 7,000 से बढक़र 18,000 हो गई, यानी करीब 157 प्रतिशत की बढ़ोतरी। वहीं, टॉप लेवल (लेवल-18) के अधिकारियों की बेसिक सैलरी 90,000 से बढक़र 2.5 लाख प्रति माह तक पहुंच गई। शुरुआत में डीए शून्य कर दिया गया था, लेकिन 10 साल में यह बढक़र अब 58 प्रतिशत हो चुका है, जो 7वें वेतन आयोग के तहत आखिरी डीए है।

7वें वेतन आयोग का सबसे ज्यादा चर्चित शब्द रहा 2.57 फिटमेंट फैक्टर। इसी फॉर्मूले से पुरानी सैलरी को नई पे मैट्रिक्स में बदला गया। यानी पुरानी बेसिक सैलरी को 2.57 से गुणा करके नई बेसिक तय हुई। इसी वजह से ज्यादातर कर्मचारियों और पेंशनर्स को बड़ी सैलरी बढ़ोतरी देखने को मिली, खासकर शुरुआती और जूनियर लेवल पर। जब डीए 50 प्रतिशत के पार गया, तो सरकार ने जनवरी 2024 से ग्रेच्युटी की टैक्स-फ्री सीमा 20 लाख से बढ़ाकर 25 लाख कर दी।

नियम के अनुसार, डीए  के 50 प्रतिशत पार करने पर कई भत्तों में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जाती है, जिसका फायदा कर्मचारियों को मिला। 7वें वेतन आयोग के दौरान सरकार ने एनपीएस में अपना योगदान 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 14 प्रतिशत (पे + डीए) कर दिया। इसके अलावा कर्मचारियों को बेहतर फंड विकल्प, लाइफ साइकिल फंड और टैक्स छूट जैसे फायदे भी मिले, जिससे एनपीएस पहले से ज्यादा आकर्षक बन गया। इस तरह से अब आगे 8वें वेतन आयोग से ऐसी ही उम्मीदें हैं।

बस्तर की धरती पर हरित गुफा

कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान की गहराइयों में छिपी ग्रीन केव जल्द ही पर्यटन मानचित्र में शामिल होने जा रहा है। अद्भुत प्राकृतिक धरोहरों से संपन्न बस्तर के  कुटुमसर गुफा परिसर के कंपार्टमेंट नंबर 85 में यह गुफा मौजूद है। चूना पत्थर और शैल संरचनाओं से बनी यह गुफा कांगेर घाटी की दुर्लभ और विशिष्ट गुफाओं में गिनी जा रही है। गुफा की दीवारों, छत और लटकती चूने की संरचनाओं पर दिखाई देने वाली हरे रंग की परतें इसको अलग पहचान दे रही हैं।

ग्रीन केव तक पहुंचने का रास्ता रोमांचक है, जो बड़े-बड़े पत्थरों और प्राकृतिक बाधाओं से होकर गुजरता है। गुफा के भीतर एक विशाल कक्ष नजर आता है, जहां चमकदार और भव्य स्टैलेक्टाइट्स तथा बहते पानी से बनी पत्थर की परतें गुफा को भव्यता प्रदान करती हैं।

दरअसल, ग्रीन केव के भीतर दिखाई देने वाला हरा रंग पेंट या कृत्रिम कारण से नहीं, बल्कि सूक्ष्मजीवी गतिविधि है। गुफा के भीतर लगातार नमी, सीमित प्रकाश और चूना पत्थर की सतह पर रिसते पानी के कारण शैवाल, सायनोबैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीव विकसित हो जाते हैं। ये चूने की संरचनाओं पर हरी परत बना लेते हैं, जिससे पूरी गुफा हरे रंग में रंगी प्रतीत होती है।  यह प्रक्रिया हजारों वर्षों में धीरे-धीरे विकसित होती है। वन विभाग कुटुमसर गुफा के इस हिस्से को बहुत जल्दी आम पर्यटकों के लिए खोलने की तैयारी में है।


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