राजपथ - जनपथ
सोशल मीडिया पर आकांक्षा को समर्थन
सरगुजा की सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर आकांक्षा टोप्पो को मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े और सीतापुर विधायक रामकुमार टोप्पो के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों के प्रयोग के आरोप में बीएनएस की धारा 352 (2) के तहत गिरफ्तार किया गया। इस मामले में शिकायत मंत्री और विधायक के समर्थक किसी कार्यकर्ता द्वारा की गई थी। चूंकि इस धारा में अधिकतम दो वर्ष की सजा का प्रावधान है, इसलिए आकांक्षा को थाने से ही जमानत पर रिहा कर दिया गया। यह धारा आईपीसी की पुरानी धारा 504 का संशोधित रूप है, जो जानबूझकर गाली-गलौज या ऐसे इशारों से जुड़ी है, जिनका उद्देश्य सामने वाले को उकसाकर सार्वजनिक शांति भंग कराना हो।
आकांक्षा की गिरफ्तारी जिस इंस्टाग्राम वीडियो के आधार पर हुई, उसमें उन्होंने मंत्री और विधायक को एक परिवार को बेघर किए जाने के लिए जिम्मेदार ठहराया है। यह परिवार 12 सदस्यों का है, जिनमें चार मूक-बधिर हैं। बताया गया है कि वे लोग पिछले 70 वर्षों से उसी जमीन पर रह रहे हैं, जहां अब आंगनबाड़ी भवन बनाने का प्रस्ताव है। बेदखली की कार्रवाई न रोके जाने से आहत होकर इस परिवार ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर इच्छा मृत्यु की मांग की थी, जिसके आधार पर आकांक्षा ने अपना वीडियो तैयार किया।
यह पहला मौका नहीं है जब आकांक्षा सोशल मीडिया पर चर्चा में आई हों। अंबिकापुर शहर और सरगुजा क्षेत्र की जर्जर सडक़ों पर बनाए गए उनके कई रील्स लाखों बार देखे जा चुके हैं। हालांकि, जिस रील को लेकर यह विवाद खड़ा हुआ, उसमें की गई कुछ टिप्पणियों को पुलिस ने आपत्तिजनक माना है। जैसे मंत्री के लिए ‘वही औरत’, ‘घमंडी’ जैसे शब्दों का प्रयोग और यह टिप्पणी कि- विधायक और मंत्री दोनों का दिमाग क्या घुटने में चला गया है?
वीडियो में आकांक्षा यह भी कहती हैं कि दिल्ली में मंत्री ने अपने ड्राइवर को यह कहकर गाड़ी से उतार दिया था कि उसने शराब पी रखी है। इसे महिला सम्मान का मुद्दा बताया गया। वहीं, जब दिव्यांग महिलाएं और उनका परिवार घर से बेदखल किए जा रहे हैं, तो उन्हें वही महिला सम्मान क्यों नजर नहीं आता? आकांक्षा मंत्री के क्षेत्र बिहारपुर में खोले गए आईटीआई का उदाहरण भी देती हैं, जहां संस्थान तो है लेकिन प्रशिक्षक नहीं। छात्रों की मांगें वर्षों से सुनी नहीं जा रही हैं। इसके अलावा, उन्होंने मंत्री की 2022 की एक प्रचार सामग्री का क्लिप भी साझा किया है, जिसमें शराब बिक्री के खिलाफ तत्कालीन कांग्रेस सरकार के विरुद्ध आंदोलन का उल्लेख है। आकांक्षा के मुताबिक आज इसी मंत्री के ही इलाके में चार नई शराब दुकानें खुल चुकी हैं।
गिरफ्तारी के बाद आकांक्षा की यही रील और अधिक वायरल हो गई। केवल इंस्टाग्राम पर इसे अब तक लगभग 3.5 लाख बार देखा जा चुका है और करीब 25 हजार लाइक्स मिल चुके हैं। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने उनका समर्थन किया है। हाई कोर्ट के कुछ अधिवक्ताओं ने भी उनका मुकदमा लडऩे की पेशकश की है।
इन सबके बीच सबसे अहम पहलू इस वीडियो पर आए कमेंट्स हैं। कुछ लोगों ने जरूर लिखा कि मुद्दों से वे सहमत हैं, लेकिन बोलने का तरीका संयमित होना चाहिए। इसके बावजूद, अधिकांश यूजर्स ने आकांक्षा की खुलकर सराहना की है। उनका हौसला बढ़ाया जा रहा है, सच को सामने लाते रहने की उम्मीद रखी गई है। सवाल यही है कि ऐसा क्यों है? मंत्री और विधायक माननीय जनप्रतिनिधि हैं, लेकिन इस मामले में उन्हें समर्थन क्यों नहीं मिल पा रहा?
बाहर जाने के नुकसान
आईपीएस के एक अफसर को अपने प्रमोशन के लिए लड़ाई लडऩी पड़ रही है। कैडर लिस्ट के हिसाब से तो अफसर को डीआईजी के पद पर प्रमोट होना चाहिए था, लेकिन वो अभी एसपी हैं। अफसर पहले दो जिलों के एसपी रह चुके हैं। वर्तमान में एसपी के रूप में तीसरा जिला संभाल रहे हैं।
प्रमोशन लिस्ट में अफसर अपने बैच के बाकी अफसरों से पीछे चल रहे हैं। उन्होंने कैट में याचिका भी दायर की थी। कैट से उनके पक्ष में फैसला भी आ गया, लेकिन प्रमोशन पर पीएचक्यू में कोई फैसला नहीं हो पाया है। दरअसल, अफसर, राज्य पुलिस सेवा से आए हैं। वो छत्तीसगढ़ नहीं आना चाहते थे।
वो मध्यप्रदेश में ही पदस्थ रहे, लेकिन आईपीएस अवार्ड का समय आया, तो वो अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर छत्तीसगढ़ आ गए। इससे छत्तीसगढ़ कैडर के उनके बैच के बाकी अफसर खफा हो गए, और इसकी शिकायत गृह विभाग में की गई। साथियों को नाराज करना अफसर को भारी पड़ रहा है। उनके बैचमेट तो प्रमोट हो चुके हैं, लेकिन वो अटके पड़े हैं। नए साल में अफसर को प्रमोशन मिल पाता है या नहीं, यह देखना है।
संपन्न लोगों को प्राथमिकता!
प्रदेश भाजपा के मोर्चा-प्रकोष्ठों में पखवाड़े भर पहले संयोजक-सहसंयोजकों की नियुक्ति हुई, और नए पदाधिकारियों ने काम शुरू भी कर दिया है। जिला स्तर पर अध्यक्षों की खोज चल रही है। प्रदेश संयोजक, जिलों में ऐसे नेताओं को चाहते हैं, जो आर्थिक रूप से सक्षम भी हो। ताकि छोटे-मोटे कार्यक्रमों पर खर्चों के लिए प्रदेश दफ्तर की तरफ न देखना पड़े।
बताते हैं कि उत्साही संयोजकों ने जिलों में अटलजी की जयंती को जोर शोर से मनाने के लिए निर्देश जारी किए थे। ताकि मोर्चा-प्रकोष्ठों की अपनी अलग पहचान नजर आए। कुछ जिलों में तो कार्यक्रम बेहतर ढंग से हुआ। मगर एक-दो जगहों में कार्यक्रमों में दिक्कत आ गई। जिले के नेताओं ने आर्थिक तंगी का हवाला दे दिया। अब संयोजक ऐसे नेताओं को जिले की कमान सौंपना चाहते हैं, जो जरूरत पडऩे पर कार्यक्रमों का खर्चा खुद भी वहन कर सके।


