राजपथ - जनपथ
आसंदी दूर है!
52 एकड़ में 350 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से बना नया विधानसभा भवन भले ही विशाल हो, लेकिन इससे विधानसभा सचिवालय पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। सचिवालय का कहना है कि भवन को आवश्यकता से अधिक फैलाकर बनाया गया है, जिससे पूरे परिसर में कॉम्पैक्टनेस की कमी है। सदन भी लंबे आकार में निर्मित किया गया है, जिसके कारण विधायक आसंदी से काफी दूर बैठे हैं। दरअसल, सदन का मानक आकार अर्धवृत्ताकार होना चाहिए था, लेकिन उसे लंबा बना दिया गया। शीत सत्र के दौरान सामने आई ऐसी कई कमियों को सचिवालय ने नोट किया है और इनके सुधार के लिए लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) को अवगत करा दिया गया है।
कुछ ऐसे कार्य हैं, जिन्हें बजट सत्र से पहले पूरा किया जा सकता है, लेकिन ईएनसी का कहना है कि उनके पास इसके लिए बजट में एक लाख रुपये भी उपलब्ध नहीं हैं। माना जा रहा है कि अब नए बजट में करोड़ों रुपये का प्रावधान कर मानसून सत्र तक इन खामियों को दूर करने की योजना बनाई जाएगी। प्रमुख खामियों में सदन में अध्यक्ष और सचिव की आसंदी को शेष सदस्यों से काफी दूर रखा जाना शामिल है। इसके अलावा मुख्यमंत्री और मंत्रियों के कक्ष भी आवश्यकता से अधिक बड़े बनाए गए हैं, जबकि उनमें सुविधाओं और इंटीरियर का स्पष्ट अभाव है।
इसी तरह पत्रकार दीर्घा की व्यवस्था में भी कई कमियां सामने आई हैं। उदाहरण के तौर पर, नोटिंग के लिए कुर्सियों में नोटपैड की व्यवस्था नहीं है और ईयरफोन भी उपलब्ध नहीं हैं। दरअसल, भवन के सिविल और मौजूदा इंटीरियर कार्य के दौरान ईएनसी और प्रभारी अभियंताओं ने विधानसभा सचिवालय से कोई राय नहीं ली और निर्माण कार्य चलता रहा। अब सचिवालय चाहता है कि बजट सत्र से पहले इन खामियों को दूर किया जाए, लेकिन बजट की कमी आड़े आ रही है। आगे क्या होता है, यह देखना होगा।
स्मार्ट मीटर: उपभोक्ताओं की चिंता से मुंह चुराता विभाग

छत्तीसगढ़ में स्मार्ट मीटर को लेकर बिजली के घरेलू उपभोक्ताओं में काफी दिनों से असंतोष देखा जा रहा है। एक जागरूक नागरिक, इंजीनियरिंग कॉलेज के रिटायर्ड एसोसिएट प्रोफेसर घनाराम साहू की हालिया फेसबुक पोस्ट से पता चलता है कि इस मुद्दे पर बिजली विभाग के अफसर कुछ न कुछ तो छिपाना चाहते हैं। प्रो. साहू ने बिना अपनी मांग के अपने घर में लगाए गए स्मार्ट मीटर के तकनीकी प्रमाण पत्र की मांग की। छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी ने इसे देने से इनकार कर दिया। इसके बजाय, उन्हें शुल्क जमा कर परीक्षण कराने की सलाह दी गई। यह मामला वे विद्युत उपभोक्ता शिकायत निवारण फोरम में ले गए हैं। पहले 8 जनवरी को सुनवाई होने वाली थी, अब वहां तारीख बढ़ाकर 14 जनवरी कर दी गई है।
राज्य में करीब 61 लाख बिजली उपभोक्ता हैं। इनमें से 25 लाख के घरों में स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं या लगाए जा रहे हैं। हजारों उपभोक्ताओं की शिकायत है कि इन मीटरों के लगने के बाद उनके बिजली बिल अनाप-शनाप बढ़ गए हैं। पुराने मीटरों की तुलना में ये बिल इतने भारी-भरकम आ रहे हैं कि आम आदमी का बजट हिल गया है। तब क्या यह संभव नहीं कि मीटर में कोई तकनीकी गड़बड़ी हो, जो गलत रीडिंग दे रही हो? एक उपभोक्ता को यह जानने का पूरा हक है कि उसके घर जो मशीन लगाई गई है उसकी गणना और स्पीड सही है या नहीं। बिजली विभाग तकनीकी प्रमाण पत्र को क्यों छिपा रहा है? निर्माता द्वारा किए गए टेस्ट की रिपोर्ट देना कोई बड़ी बात नहीं होनी चाहिए। अगर सब कुछ ठीक है, तो पारदर्शिता क्यों नहीं बरती जा रही? बिजली विभाग ने हाल ही में छूट घटा दी, टैरिफ बढ़ा दिया। अब स्मार्ट मीटर पर सवाल किए जाने पर वह दुनिया भर के कायदे-कानून बता रहा है। बजाय, सरल तरीके से जानकारी उपलब्ध कराने के। पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित करें तभी स्मार्ट मीटर जैसी तकनीक वाकई ‘स्मार्ट’ साबित होगी, अभी तो यह मशीन बोझ लग रही है।
चैतन्य की बारी?
शराब घोटाला मामले में छह महीने बाद चैतन्य बघेल की रिहाई से पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के खेमे में खुशी की लहर है। चैतन्य के सक्रिय राजनीति में आने की अटकलें भी तेज़ हो गई हैं। पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव ने कहा है कि चैतन्य, बड़े पिता के पुत्र हैं और राजनीति में आ सकते हैं, लेकिन उन्हें खुद को साबित करना होगा। इन सबके बीच पूर्व मुख्यमंत्री के उत्साही समर्थक आपसी बातचीत में चैतन्य के जल्द चुनाव मैदान में उतरने की संभावना जता रहे हैं।
दरअसल, प्रदेश की राज्यसभा की दो सीटों के लिए अप्रैल में चुनाव होने हैं। ये सीटें कांग्रेस सदस्यों फूलोदेवी नेताम और के.टी.एस. तुलसी का कार्यकाल समाप्त होने के कारण खाली हो रही हैं। विधानसभा सदस्यों की संख्या के आधार पर कांग्रेस को केवल एक ही सीट मिलने की संभावना है। कांग्रेस खेमे में चर्चा है कि पार्टी पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को राज्यसभा प्रत्याशी बना सकती है। भूपेश बघेल वर्तमान में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं और पंजाब प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी भी हैं। पार्टी उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका देने के लिए राज्यसभा भेज सकती है।
यदि भूपेश बघेल राज्यसभा जाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से चैतन्य बघेल के पाटन सीट से विधानसभा चुनाव लडऩे की अटकलें और मजबूत होंगी। भले ही चैतन्य कांग्रेस के किसी औपचारिक पद पर नहीं रहे हों, लेकिन वे पाटन विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। विधानसभा चुनाव के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री अपने क्षेत्र में प्रचार के लिए नहीं जा पाए थे। उनकी अनुपस्थिति में चैतन्य ने ही अपने पिता के चुनाव प्रचार की जि़म्मेदारी संभाली थी। वैसे भी कांग्रेस में परिवारवाद कोई नई बात नहीं है, ऐसे में चैतन्य का चुनावी राजनीति में उतरना चौंकाने वाला नहीं होगा। फिलहाल इस विषय पर चर्चाओं का दौर जारी है और राज्यसभा प्रत्याशियों की घोषणा तक ऐसी अटकलें चलती ही रहेंगी।
गौर करने वाली बात यह है कि भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री रहते राज्यसभा की चार सीटों पर चुनाव हुए थे। इनमें फूलोदेवी नेताम, राजीव शुक्ला, के.टी.एस. तुलसी और रंजीत रंजन कांग्रेस से राज्यसभा पहुंचे। बताया जाता है कि भूपेश बघेल ने अपने करीबी गिरीश देवांगन को राज्यसभा प्रत्याशी बनवाने की कोशिश की थी, लेकिन बात नहीं बन पाई। इसी तरह वे छाया वर्मा को दोबारा राज्यसभा भेजना चाहते थे, लेकिन पार्टी ने उनकी जगह रंजीत रंजन को प्रत्याशी बना दिया। अब एकमात्र सीट पर उनकी राय को कितना महत्व मिलेगा, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।


