विचार / लेख
- विजय मानिकपुरी
जीवन में सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। मेहनत ही वह रास्ता है, जो इंसान को आत्मसम्मान, संतोष और सच्ची रोटी तक पहुँचाता है। आज के समय में, जब त्वरित सफलता और आसान कमाई की चाह बढ़ती जा रही है, तब भी हमारे समाज में ऐसे कर्मयोगी मौजूद हैं, जिनका जीवन नई पीढ़ी के लिए जीवंत प्रेरणा है।
बैकुंठपुर के ग्राम छिंदडाँड़ में रहने वाली 70 वर्षीय श्रीमती किस्मत बाई इसका उदाहरण हैं। उम्र के इस पड़ाव में भी वे सिर पर 8 से 10 किलो वजन की सब्जी की टोकरी लेकर रोज घर-घर पहुँचती हैं। बरसात हो या कडक़ती ठंड या फिर झुलसाने वाली लू, कुछ भी उनके हौसले को डिगा नहीं पाता। सुबह-सुबह मेरे घर के दरवाज़े पर पहुँचकर उनकी आवाज गूंजती है ‘सब्जी ले हू का दाऊ!’ शनिवार की सुबह उनसे मुलाकात हुई। चेहरे पर मुस्कान थी और शब्दों में अपनापन ‘ले न बेटा, मेथी भाजी, पालक भाजी, भथुवा, धनिया!’ घर में सब्जी होने के बावजूद उनसे खरीदे बिना मन नहीं माना। आसपास के लोग जानते हैं कि कई बार सब्जी खरीदने का उद्देश्य केवल जरूरत नहीं, बल्कि उनकी मेहनत और मुस्कान को सम्मान देना होता है।
जब 70 वर्षीय किस्मत बाई से पूछा गया कि कोई परेशानी तो नहीं, तो वे सहजता से बोलीं ‘नई हे बेटा’ संसार बने हे, हमू बने हन ‘काम करबो तभे तो भात खाबो!’
इसी तरह आमगांव निवासी लगभग 60 वर्षीय एक अम्मा बीते दो वर्षों से नियमित रूप से मेरे घर दूध देने पहुँचती हैं। कोरिया जिले की 5-6 डिग्री तक गिरने वाली ठंड में भी वे बिना स्वेटर या शॉल के सुबह 6 बजे घर से सिर और हाथ पर 16 से 20 किलो वजनी दूध की डब्बे के साथ निकल पड़ती हैं। हिसाब-किताब पूरी तरह ग्राहकों के भरोसे छोड़ देती हैं। वे बताती हैं कि मायके से लेकर ससुराल तक दुग्ध व्यवसाय ही जीवन का आधार रहा। महज 8-10 वर्ष की उम्र में उन्होंने गाय-भैंस का दूध दुहना सीख लिया था। पहले रोज़ 8-10 किलोमीटर तक दूध बेचने जाती थीं, आज भी 4-5 किलोमीटर का सफर तय करती हैं। वे कहती है ‘सुख-दुख लगे रहिथे’ जांगर के बल पर काम तो करबो साहब!’
इसी कड़ी में करीब 55 वर्षीय इरशाद खान हैं, जो साइकिल में धुनकी लटकाकर गली-गली घूमते हुए गद्दा बनाने का काम करते हैं। मूलत: बिहार से आए इरशाद बताते हैं कि यह उनका खानदानी पेशा है और इसी से घर का चूल्हा जलता है। चेहरे पर कोई शिकन नहीं, बल्कि संतोष भरी मुस्कान के साथ कहते हैं ‘मेहनत करेंगे तो रोटी मिलेगी, बिना मेहनत की रोटी खाना हराम है।’
वास्तव में आज की पीढ़ी, खासकर युवाओं के लिए ऐसे कर्मयोगी जीवंत प्रेरणा हैं। जब समाज का एक बड़ा वर्ग शॉर्टकट के सहारे मंजि़ल पाने की कोशिश में लगा है। ट्रेन में, मंदिर-मस्जिद के आसपास, दफ्तरों और घरों तक में कम उम्र के लोग भी हाथ फैलाने के आदी हो चुके हैं। ऐसे समय में ये बुजुर्ग अपने श्रम, ईमानदारी और आत्मसम्मान से यह सिखाते हैं कि मेहनत ही जीवन की सबसे सच्ची पूँजी है।


