विचार / लेख
- पंकज स्वामी, जबलपुर
(कुछ अरसा पहले लिखा गया लेख)
हिंदी जगत की अनिवार्य पत्रिका के रूप में मान्य ‘पहल’ का 125 अंक के पश्चात् समापन हो गया। जबलपुर जैसे मध्यम शहर से ‘पहल’ जैसी अंतरराष्ट्रीय पत्रिका का प्रकाशन वर्ष 1973 में शुरू हुआ और इसने विश्व स्तर को प्राप्त किया। ‘पहल’ के जरिए इसके संपादक ज्ञानरंजन ने लगातार जड़ता तोडऩे के काम किए, इसलिए पिछले 42 वर्षों से ‘पहल’ गंभीर लेखन व विचारों से जुड़ी पत्रिकाओं के बीच शीर्ष स्थान पर है और नए संपादकों के लिए मार्गदर्शक की भूमिका भी निभाती जा रही है। ‘पहल’ का घोषित उद्देश्य है-भारतीय उपमहाद्वीप के वैज्ञानिक विकास के लिए प्रगतिशील रचनाओं को स्थान देना। ‘पहल’ के 42 वर्ष के प्रकाशन काल में दो बार इसका प्रकाशन बाधित हुआ है। पहला दौर आपातकाल का दौर था जिसमें हर तरह की स्वतंत्र सोच और अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। किन्तु उस दौर में भी ‘पहल’ का प्रकाशन सिर्फ अनियमित हुआ था, बंद नहीं हुआ था। दूसरा दौर तब का है जब लगभग नौ वर्ष पूर्व अचानक आई इसके बंद होने की खबर से समूचे साहित्य जगत में एक तरह का सन्नाटा पसर गया और पाठकों में मायूसी छा गई थी।
‘पहल’ और उसके संपादक ज्ञानरंजन दोनों ने पहले अंक से अभी तक प्रतिरोध की संस्कृति को अपनाया है। आपातकाल को लगे चवालीस वर्ष पूर्ण हो गए हैं। ‘पहल’ और इसके संपादक ज्ञानरंजन ने आपातकाल का विरोध किया। इसका परिणाम यह हुआ कि दोनों निशाने पर आ गए। ज्ञानरंजन पर तो व्यक्तिगत अटैक भी किया गया। ज्ञानरंजन के पीछे पुलिस के साथ गृह मंत्रालय और सीआईडी जांच करने लगी। लगभग एक वर्ष तक यह लड़ाई ज्ञानरंजन और ‘पहल’ ने लड़ी। उस दौरान देश की दो नामचीन प्रकाशन संस्थानों की पत्रिकाओं ने ‘पहल’ के साथ ज्ञानरंजन के विरूद्ध मुहिम भी चलाई। ‘पहल’ के सौंवे अंक की संपादकीय में ज्ञानरंजन ने इसका उल्लेख किया है। ज्ञानरंजन ने आपातकाल के विरोध में मध्यप्रदेश शासन के सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया। ज्ञानरंजन का कहना है कि आपातकाल ही नहीं बल्कि सभी गलत नीतियों का उन्होंने स्वयं और ‘पहल’ ने प्रतिरोध किया है।
‘पहल’ ने पंजाब के आतंकवाद का विरोध किया। पंजाबी के प्रसिद्ध कवि पाश को सबसे पहले हिंदी में ‘पहल’ ने ही छापा। बसंत दत्तात्रेय गुर्जर की मराठी कविता गांधी माला भेटला होता (गांधी मुझसे मिले) का हिंदी अनुवाद लगभग 15 वर्ष पूर्व सबसे ‘पहल’ ने प्रकाशित करने में तत्परता दिखाई। इस कविता को प्रकाशित करने के कारण भी ‘पहल’ और ज्ञानरंजन को सुप्रीम कोर्ट में मुकदमों का सामना करना पड़ा। वर्तमान में इस कविता को गांधी के विमर्श पर महत्वपूर्ण कविता माना गया है। गौरतलब है कि ‘पहल’ के द्वारा समय-समय पर सांस्कृतिक संकट पर ‘पहल’ पुस्तिका का प्रकाशन किया गया है। आदिवासियों के मुद्दों पर ‘पहल’ ने शासकीय, आर्थिक व राजनीतिक नीतियों का प्रतिरोध किया है। ‘पहल’ में लगातार छपी जितेन्द्र भाटिया की 21 वीं सदी की लड़ाईयां का मूल भाव भी प्रतिरोध का है। ‘पहल’ ने तात्कालिक प्रतिरोध के स्थान पर सतत् व स्थायी प्रतिरोध को हर समय प्राथमिकता दी है।
‘पहल’ के संपादक ज्ञानरंजन ने 35 वर्ष के लगातार प्रकाशन के पश्चात् 90 वें अंक से इसे बंद करने का निर्णय लिया था। ज्ञानरंजन के ‘पहल’ के बंद करने के निर्णय से पूरे देश के साहित्यिक क्षेत्र में सन्नाटा खिंच गया था और दुख की लहर फैल गई थी। इस समय पूरे देश के विभिन्न क्षेत्रों से साहित्यकारों के साथ पाठकों और विशेष कर युवा लेखकों ने ज्ञानरंजन को निर्णय बदलने का अनुरोध किया था। उस समय सभी की इच्छा थी कि ‘पहल’ बंद न हो और इसे अर्धवार्षिक या वार्षिक रूप से जारी रखा जाए। उसी समय प्रसिद्ध कवि व आलोचक अशोक वाजपेयी ने अपने एक कॉलम में लिखा था-‘ज्ञानरंजन की गणना निश्?चय ही इस दौरान हिंदी के श्रेष्ठ और प्रेरक संपादकों में की जाएगी। सच तो यह है कि नहीं पता कि भारत की किस भाषा में ‘पहल’ जैसी प्रतिबद्ध और प्रभावशाली पत्रिका निकलती है। इसलिए उसका (‘पहल’) समापन न सिर्फ हिंदी परिदृश्य, बल्कि समूचे भारतीय परिदृश्य को विपन्न करेगा।‘’
‘पहल’ के सौंवे अंक के संबंध में अशोक वाजपेयी अपने कॉलम में लिखा कि इतनी लंबी यात्रा ‘पहल’ के लिए नहीं, हिंदी समकालीनता के लिए भी बड़ी सार्थक यात्रा रही है। बिना किसी सार्वजनिक साधनों के और कई तरह की कठिनाईयों का लगातार सामना करते हुए कथाकार व संपादक ज्ञानरंजन ने ने बहुत बड़ी संख्या में नए युवा लेखकों को पहचाना, जगह और अवसर दिए और अनेक किस्म के नए प्रयत्नों को बहुत जतन और जिम्मेदारी से प्रोत्साहित किया। ऐसा कम ही हुआ है कि एक कथाकार अपनी रचनाओं से जितना जाना जाएगा,उतना ही अपने संपादन और पत्रिका के लिए। ज्ञानरंजन इस अर्थ में एक अद्वितीय नाम है। हमारे विचारधाराग्रस्त समय में अधिकांश प्रतिबद्धताएं कमोवेश औपचारिक और अवसरवादी ही रही आई हैं, लेकिन ज्ञानरंजन में यह प्रतिबद्धता अटूट और अक्षुण्ण रही है। साहित्य और विचारधारा के लिए उनके जैसा पैशन अन्यत्र दुर्लभ है।
90 वें अंक के पश्चात् ‘पहल’ को बंद करने के समय आमतौर पर समझा या कहा गया कि इसे आर्थिक दबाव या रचनात्मक संकट के कारण बंद किया गया, लेकिन यह दोनों कारण नहीं थे। उस समय ज्ञानरंजन ने कहा था- ‘पत्रिका का ग्राफ निरंतर बढऩा चाहिए। वह यदि सुंदर होने के पश्चात् भी यदि रूका हुआ है, तो ऐसे समय निर्णायक मोड़ भी जरूरी है।’ उन्होंने उस समय अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा था कि यथास्थिति को तोडऩा आवश्यक हो गया है। नई कल्पना, नया स्वप्न, तकनीक, आर्थिक परिदृश्य, साहित्य, भाषा के समग्र परिवर्तन को देखते हुए इस प्रकार का निर्णय लेना जरूरी हो गया था। उस समय ज्ञानरंजन ने कहा था कि इस अंधेरे समय में न्यू राइटिंग को पहचानना जरूरी हो गया है, लेकिन ऐसा नहीं करना भी बेईमानी होगी। उन्होंने स्पष्ट किया था कि विकास की चुनौती और शीर्ष पर ‘पहल’ को बंद करने का निर्णय एक दुखद सच्चाई है और इस प्रकार का निर्णय लेना भी एक कठिन कार्य है। संभवत: ज्ञानरंजन की बात में आत्मस्वीकारोक्ति थी कि थकान से व्यक्ति क्रांतिकारी नहीं रह पाता है। वे ‘पहल’ को 90 वें अंक के बाद करने के निर्णय पर पांच-छह महीने से विचार कर रहे थे। साहित्य पाठकों को यह याद होगा कि उन्होंने अपने शिखर में ही कहानी लिखना बंद किया और इसी प्रकार ‘पहल’ सम्मान को भी उन्होंने चरमोत्कर्ष पर बंद करने का निर्णय लिया था।
‘पहल’ बंद के पश्चात् देश भर के साहित्यकारों और बड़े प्रकाशन समूहों ने आगे आ कर अपने प्रस्ताव दिए। उनमें से अधिकांश ‘पहल’ के स्तर व श्रेष्ठता को बरकरार रखने में स्वयं को संदेह के घेरे में रख रहे थे और हौंसला नहीं दिखा पाए। तब ज्ञानरंजन के वर्षों साथी और प्रसिद्ध कवि मलय की टिप्पणी थी कि दुश्मन भी होंगे तो वे ‘पहल’ को बंद होने पर पश्चाताप करेंगे और दुख व्यक्त करेंगे। उन्होंने उस समय कहा था कि यह सभी जानते हैं कि ज्ञानरंजन के लिए ‘पहल’ ही सब कुछ है, लेकिन यह हम लोगों की मजबूरी है कि हम उनके निर्णय को बदल नहीं सकते। मलय की उस समय यह टिप्पणी महत्वपूर्ण थी कि यदि ‘पहल’ पुन: प्रकाशित होती है, तो इसे ज्ञानरंजन ही निकालें।
‘पहल’ के बंद हो जाने के पश्चात् हिंदी साहित्य क्षेत्र में रिक्तता महसूस होने लगी। कोई भी हिंदी की साहित्य या वैचारिक पत्रिका ‘पहल’ का पर्याय नहीं बन पाई। दो-तीन वर्षों में खासतौर से युवा पाठक अलग-अलग रूप से ज्ञानरंजन को ‘पहल’ के पुनर्प्रकाशन के लिए अनुरोध करते रहे। जुलाई 2012 में ज्ञानरंजन को भी महसूस हुआ कि हिंदी समाज को ‘पहल’ की पहले से ज्यादा जरूरत है। उन्होंने ‘पहल’ को पुनर्प्रकाशित करने का निर्णय लिया और ‘पहल’की एक ताजादम और सृजनात्मक दुनिया बनाने के प्रयास में जुट गए। ज्ञानरंजन ने इसके साथ कुछ महत्वपूर्ण निर्णय भी लिए, जिसमें उन्होंने बाजार मूल्य से ऊपर ‘पहल’ को कीमती बनाने की प्रतिबद्धता जताई। उन्होंने कहा कि प्रयास होगा कि पाठक के साथ मिल कर अपने समय की नाड़ी, तापमान और मुहावरे की तरफ बढ़ते हुए जरूरी भाषा की खोज कर सकें। ज्ञानरंजन ने पुनर्प्रकाशन के 91 वें अंक की संपादकीय में लिखा कि जीवित परम्पराओं से ले कर अज्ञात भविष्यों तक की पहचान और समर्थन ‘पहल’ की कोशिशों का स्थायी भाव है। हम अपनी छापी गई रचनाओं का समर्थन करते हैं और हमारी संपादकीय नीति की यह एक मुख्य कार्रवाई है।
हंस के संपादक राजेन्द्र यादव ने ‘पहल’ के पुनर्प्रकाशन के संबंध में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा-‘पहल’ अपने समय की सबसे महत्वपूर्ण पत्रिका थी। इसमें जो छपता था, उसमें बहुत गहराई होती थी। ‘पहल’ पुन: शुरू हो रही है, यह खुशी की बात है, हम सब को इसका स्वागत करना चाहिए कि इस तरह की एक पत्रिका हमारे बीच बनी रहे, जो एक मानक पत्रिका है। जैसी एक बौद्धिक पत्रिका होनी चाहिए लेखकों के बीच, उस तरह की पत्रिका। ‘पहल’ की किसी अन्य पत्रिका से तुलना नहीं की जा सकती है। वर्तमान सामाजिक-सांस्कृतिक हालात में ‘पहल’ जैसी सैद्धांतिक पत्रिका की बहुत जरूरत है। ‘पहल’ वैचारिक द्वंद के लिए जरूरी है और यह परिस्थितियों के विश्लेषण में मदद और एक अंतर्दृष्टि के निर्माण में सहायता करती है।‘’
‘पहल’ का समापन करते हुए ज्ञानरंजन ने लिखा कि हर चीज की एक आयु होती है, जबकि हम अपनी सांसों से अधिक जी चुके हैं। एक पंक्ति हमारी जरूर थी उस पर जोश, जज्बे और आवेग के साथ चलते रहे। हमारी शैली यही थी जिसमें ताज़ा और आजाद ख्याल बने रहे। एक ज़रूरी सुचारु व्यवस्था न होने के कारण हम अब थक भी रहे हैं। हमने कभी ‘पहल’’ को एक संस्था या सत्ता की व्यवस्था नहीं दी। चीजें आती रहीं, हम निपटते रहे, अपने को भ्रष्ट होने से बचाते रहे।
हिंदी साहित्य के आठवें दशक के जितने भी महत्वपूर्ण लेखक हैं, वे ‘पहल’ के गलियारे से ही आए हैं। इनमें राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, वीरेन्द्र डंगवाल, लीलाधर जगूड़ी, ज्ञानेन्द्रपति, आलोक धन्वा जैसे साहित्यकार महत्वपूर्ण हैं। रचनाओं के अलावा आलोचना के क्षेत्र में भी अनेक नए नाम पहले ‘पहल’ ‘पहल’ से ही उभरे। ज्ञानरंजन ने अपने मनपसंद और विचारधारा पसंद लेखों व कृतियों पर अनेक युवा आलोचकों को गंभीरता, विशद अध्ययन और जिम्मेदारी से लिखने के लिए प्रेरित किया। चार दशक से अधिक के सफर में ‘पहल’ में हिंदी, भारतीय भाषाओं और विश्व साहित्य के लगभग 70 हजार से अधिक पृष्ठ प्रकाशित हुए हैं। जर्मन, रूसी, चीनी, अंग्रेजी, फ्रेंच, और स्पेनिश भाषाओं का श्रेष्ठतम साहित्य ‘पहल’ में ही उपलब्ध है। ‘पहल’ के फासिज्म विरोधी अंक, माक्र्सवादी सौंदर्य शास्त्र, वाल्टर बेंजामिन, समकालीन कवितांक, पाकिस्तान में उर्दू कलम, कहानी अंक, चीन का समकालीन साहित्य, बांग्लादेश के व अफ्ऱीकी साहित्य पर केन्द्रित अंक इतिहास अंक, पंजाबी, मराठी, उर्दू, कश्मीरी साहित्य के प्रतिनिधि विशेषांक साहित्य प्रेमियों को आज तक याद हैं और लोग इन्हें आज भी खोजते हैं। शीर्ष आलोचक रामविलास शर्मा से ले कर आज की बिल्कुल युवा पीढ़ी का कोई भी ऐसा महत्वपूर्ण लेखक या कवि नहीं है, जो ‘पहल’ में नहीं छपा। इसका प्रसार देश-देशांतर तक है।
पूरे देश में ‘पहल’ से एक बड़ा परिवार बन गया है। जर्मनी के तियुबिनजेन विश्वविद्यालय ने ‘पहल’ को डिजीटाइज किया है। ‘पहल’ डिजीटाइज होने वाली हिंदी की पहली साहित्यिक पत्रिका है।


