विचार / लेख
पिछले कुछ सालों में भारत के खेल जगत में महिलाएं तेजी से आगे बढ़ी हैं। सरकार और निजी क्षेत्र के निवेश और सफल महिला खिलाडिय़ों की प्रसिद्धि ने दूसरी लड़कियों को भी खेलों में आगे बढऩे की प्रेरणा दी है।
डॉयचे वैले पर जॉन डुएर्डेन की रिपोर्ट –
साल 2024 के पेरिस ओलंपिक में भारत की 71वीं रैंकिंग थी। जिससे यह संदेश जा रहा था कि भारत क्रिकेट के अलावा बाकी खेलों में अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन करने वाला देश है। लेकिन अब अलग-अलग खेलों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से ये तस्वीर बदलती दिख रही है। साल 2016 में भारत में कुल पंजीकृत महिला फुटबॉल खिलाडिय़ों की संख्या 8,683 थी, जो पिछले साल बढक़र 37,829 तक पहुंच गई। इसके अलावा, राष्ट्रीय जैवलिन प्रतियोगिता में खिलाडिय़ों की संख्या 2019 में 31 से बढक़र 137 हो गई। साथ ही, इसी दौरान शूटिंग में भी महिला प्रतिभागियों की संख्या 1,033 से बढक़र 2,181 हो गई। एशियाई खेलों में जहां 2002 में भारत के कुल पदकों में महिलाओं का योगदान सिर्फ 36 फीसदी था। वहीं, 2023 में यह संख्या बढक़र 43 फीसदी तक पहुंच गई।
2010 के एशियाई खेलों में टेनिस में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी तरुका श्रीवास्तव ने यह बदलाव खुद अपनी आंखों से देखा है। उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, ‘अगर आप पेरिस ओलंपिक और वहां उभरकर सामने आए खिलाडिय़ों को देखेंगे, तो आपको पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा नजर आएंगी।’ वे कहती हैं, ‘मैं अपने राज्य, उत्तर प्रदेश की बात करूं, तो वहां भी ज्यादातर शीर्ष खिलाड़ी महिलाएं ही हैं।’
रोल मॉडल बनती महिला खिलाड़ी
आज के दौर में ऐसे कई खिलाड़ी हैं, जिनसे युवा खिलाड़ी प्रेरणा ले सकते हैं। जैसे 2025 का आईसीसी वर्ल्ड कप जीतकर सुर्खियों में आई भारतीय महिला क्रिकेट टीम, फुटबॉलर मनीषा कल्याण और ओलंपिक पदक विजेता मनु भाकर (शूटिंग), मीराबाई चानू (वेटलिफ्टिंग), पीवी सिंधु (बैडमिंटन) और लवलीना बोरगोहाईं (बॉक्सिंग)। मुंबई की स्पोर्ट्स डॉक्यूमेंट्री मेकर ओनीशा घोष का मानना है कि आज की भारतीय महिला खिलाड़ी उन महिलाओं की वजह से आगे बढ़ पा रही हैं, जिन्होंने पिछले दौर में कई बाधाओं को तोड़ा है। उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, ‘हमारे समाज में लंबे समय तक महिलाओं और खेल को एक साथ नहीं देखा जाता था। यहां हमेशा से पितृसत्तात्मक सोच हावी रही है, लेकिन आदर्श महिला खिलाडिय़ों के सामने आने से अब फर्क पडऩे लगा है।’
ओनीशा घोष कहती हैं कि महिला क्रिकेट वर्ल्ड कप जीतने वाली खिलाडिय़ों ने भी 2012 लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल को अपनी प्रेरणा बताया था। इसके अलावा टेनिस स्टार सानिया मिर्जा भी एक बड़ा नाम रहा है, जिन्होंने करीब दस साल के अपने प्रोफेशनल करियर में छह ग्रैंड स्लैम खिताब जीते। घोष के अनुसार, ‘देखा जाए तो सानिया मिर्जा ने कई रूढिय़ों को तोड़ा, एक महिला, वह भी एक मुस्लिम महिला, जो खेल रही है और स्कर्ट पहनती है। अगर आप किन्हीं खास समुदायों से आते हैं, तो लोगों की एक तय धारणा होती है और सानिया को उस धारणा का बोझ भी उठाना पड़ता था।’
ओनीशा घोष सानिया मिर्जा के बारे में कहती हैं, ‘उन्होंने टेनिस कोर्ट के अंदर और बाहर, दोनों जगह अपनी शर्तों पर जिंदगी जी। वह असल मायने में निडर और दमदार थी। जब मैं बड़ी हो रही थी, तो मैं अक्सर सोचती थी, यह कौन-सी महिला है, जो कोर्ट पर राज कर रही है और पत्रकारों के फालतू सवालों का भी डटकर सामना कर रही है।’
मीडिया और लोगों का नजरिया
सानिया मिर्जा जैसी खिलाडिय़ों ने देश में लोगों की सोच बदलने में अहम भूमिका निभाई है। तरुका श्रीवास्तव कहती हैं, ‘यह बदलाव खास तौर पर ग्रामीण इलाकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। चूंकि, खेल की शुरुआत करने वाली ज्यादातर महिला खिलाड़ी अक्सर गांवों या छोटे कस्बों से आती हैं, बड़े शहरों से नहीं।’ पिछले समय में पूर्वाग्रहों तो तोडऩे वाली महिला खिलाडिय़ों में बहुत सी लड़कियों को हिम्मत दी है। श्रीवास्तव कहती हैं, ‘जब ऐसी महिलाएं दूसरी महिलाओं को पदक जीतते देखती हैं और मीडिया में उनकी कहानियां जानती हैं, तो उनकी सोच में बदलाव आता है। परिवार भी यह समझना शुरू करते हैं कि लड़कियां भी खेल को करियर के तौर पर अपना सकती हैं।’
घोष और श्रीवास्तव दोनों का ही मानना है कि अब खेलों से जुड़े फैसले लेने वाली जगहों जैसे बोर्डरूम और नीति बनाने वाली संस्थानों में महिलाओं की मौजूदगी पहले से कहीं ज्यादा है। इसमें मैरी कॉम जैसी पूर्व खिलाड़ी भी शामिल हैं, जो खेल की जमीनी हकीकत को समझती हैं। साल 2012 ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली मैरी कॉम 2016 से 2022 तक संसद की सदस्य भी रही हैं। इसके अलावा सरकार ने निजी कंपनियों को भी खेलों में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया है और खुद भी सीधे तौर पर इसका समर्थन किया है।
महिला खिलाडिय़ों को समर्थन
भारत सरकार ने अलग-अलग योजनाओं के तहत लगभग 11 हजार से अधिक युवा क्लबों को खेल उपकरण उपलब्ध कराए हैं। इसके अलावा, विभिन्न योजनाओं के तहत 1।8 लाख से अधिक बच्चों और युवाओं की शुरुआती प्रतिभा पहचान की गई है। साल 2021 में खेल मंत्रालय ने एक योजना की शुरुआत की थी जिसका पूरा नाम है ‘अचीविंग स्पोर्ट्स माइलस्टोन बाय इंस्पायरिंग वुमेन थ्रू वुमेन’ यानी सटीक कदम उठाकर महिलाओं को खेलों में उपलब्धियां हासिल करने के लिए प्रेरित करना। इस योजना का उद्देश्य खेलों में महिलाओं को सशक्त बनाना है।
इस योजना के तहत देशभर में महिला खिलाडिय़ों के लिए ज्यादा लीग, अवसर और मंच तैयार किए जा रहे हैं, खासकर उन महिलाओं के लिए जो आर्थिक या सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग से आती हैं। 2025 में इस योजना के तहत 15 अलग-अलग खेलों में 852 लीग प्रतियोगिताएं आयोजित की गई। इसमें लगभग 70,000 महिला खिलाडिय़ों ने हिस्सा लिया, जो कि 2024 की तुलना में 17,000 अधिक था।
बैडमिंटन स्टार सायना नेहवालबैडमिंटन स्टार सायना नेहवाल
खेल राज्य मंत्री रक्षा खडसे ने इस योजना को बाधाओं को तोडऩे की पहल बताती हैं। वे कहती हैं, ‘यह सकारात्मक कार्रवाई की दिशा में एक मजबूत कदम है, जो आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों से आने वाली महत्वाकांक्षी महिला खिलाडिय़ों को भी सीधे मुख्यधारा में लाता है।’
तरुका श्रीवास्तव भी मानती हैं कि इस पहल ने खेलों में आने वाली महिलाओं के लिए कई रुकावटों को दूर किया है। उन्होंने कहा, ‘पहले राज्य स्तर की प्रतियोगिताएं अक्सर बहुत दूर होती थी और वहां तक पहुंचना मुश्किल होता था, लेकिन अब खिलाडिय़ों के लिए मुकाबले के लिए ज्यादा टूर्नामेंट मौजूद हैं और कई प्रतियोगिताएं तो घर के पास ही आयोजित हो रही हैं।’
फिल्म उद्योग से मिला व्यापक प्रोत्साहन
मनोरंजन जगत के एक उदाहरण ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है। 2016 में आई फिल्म ‘दंगल’ ने पहलवान बहनों, गीता और बबीता फोगाट की कहानी दिखाई। गीता ने 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता था, जबकि बबीता ने रजत पदक हासिल किया था। उस समय यह बॉलीवुड के इतिहास की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में से एक थी।
ओनीशा घोष ने कहा, ‘दंगल जबरदस्त हिट रही और उसने महिला खेलों को मुख्यधारा में लाने में एक बड़ी भूमिका निभाई, जिससे यह संस्कृति का एक अहम हिस्सा बन गया। बेहतर कहानी को बेहतरीन तरीके से सुनाना बहुत जरूरी है, और भारत में यह काम प्रभावशाली बॉलीवुड ने किया।’ मैरी कॉम की बायोपिक और रश्मि रॉकेट जैसी फिल्मों ने भी खेलों में महिलाओं की भागीदारी को लोकप्रिय बनाने में योगदान दिया।
2036 ओलंपिक की दावेदारी
खेल एजेंट और प्लेयर्स एजेंसी इन्वेंटिव स्पोर्ट्स के संस्थापक बलजीत रिहाल का कहना है कि अब भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस रफ्तार को बनाए रखना है। रिहाल ने डीडब्ल्यू से कहा, ‘आधार तैयार है। अब असल चुनौती है, बड़े पैमाने पर काम करना। अगर भारत चाहता है कि यह सिर्फ एक दौर की उपलब्धि न रहे, बल्कि एक स्थायी विरासत बन सके, तो निवेश को बढ़ाना होगा खासकर खेल सुविधाओं, कोचिंग, लंबे विकास और खिलाडिय़ों की सुरक्षा पर।’
गुजरात का शहर अहमदाबाद, 2030 राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी करने वाला है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उम्मीद है कि गुजराती की पुरानी राजधानी को छह साल बाद यानी 2036 ग्रीष्मकालीन ओलंपिक की मेजबानी का मौका भी मिलेगा। जिससे महिला खिलाडिय़ों को सिर्फ नई खेल सुविधाओं के निर्माण से ही नहीं, बल्कि कई अन्य फायदे भी मिलेंगे। ओनीशा घोष इसे केवल सफर की शुरुआत मानती हैं और कहती हैं, ‘आपको ओलंपिक मूल्यों को बनाए रखते हुए ओलंपिक खेलों की भावना के साथ न्याय करना होता है और अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति आईओसी लैंगिक समानता को लेकर बेहद गंभीर है।’ घोष का कहना है, ‘खेल, दुनिया के सामने सॉफ्ट पावर हो सकता है और भारत के पास ऐसी प्रतिभाओं का भंडार है।’ (dw.com/hi)


