विचार / लेख
-शम्भूनाथ
हमने दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कई भाषणों में पत्रकारों, विश्वविद्यालय के शिक्षाविदों तथा विरोधियों का मजाक उड़ाते देखा है। निश्चय ही उनकी भी हँसी उड़ी है। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन भी विरोधियों को अपने आगे हल्का करके उनकी खिल्ली उड़ाते हैं, जैसा असीमित पावर आने पर होता है।
हमारे देश में धर्म, जाति और जेंडर आधारित मामलों में उपहासों की एक लंबी श्रृंखला है। आखिर इस तरह कोई अपने अच्छे लक्ष्य तक कैसे पहुंच सकता है। गौर करने की चीज है कि ज्ञानपीठ से सम्मानित एक विभूति ने हाल में ‘वाइफ’ के चार अंग्रेजी अक्षरों के आधार पर पत्नी को ‘वंडरफुल इंस्ट्रूमेंट फॉर इंज्वायमेंट’ कहा! आजकल किसी व्यक्ति या समुदाय के प्रति सम्मान की चिंता किए बगैर ऐसी ही संकीर्ण टिप्पणियों पर हँसने की मानसिकता छाई हुई है। लोग गालियों पर हँसते हैं और मजा लेते हैं। इस समय न्यूनतम भद्रता से भी तलाक है।
हँसी जब किसी व्यक्ति की गरिमा पर आघात करे, उसके महत्व की उपेक्षा करके उसकी छोटी कमजोरियों को बड़ा बनाकर उपस्थित करे और हँसी जब शत्रुता का हथियार बना ली जाए तो ऐसी हँसी एक हिंसा है। यह महान से महान व्यक्तित्वों को भी नहीं छोड़ती।
कई बार वर्चस्वशाली जातियों, नस्लों और जातीयताओं का समर्थ आदमी अपने से कमजोर वर्गों पर और उनके विश्वासों पर हँसता है ताकि अपना वंशानुगत प्रभुत्व जता सके। ऐसे लोग बढ़े हैं जो असहमति का मखौल उड़ाते हैं और किसी साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत का और खानपान का भी। हम अक्सर शिक्षकों, स्त्रियों, लेखकों और निम्न समझी जाने वाली जातियों और अल्पसंख्यकों को हिंसक हँसी का शिकार होते देखते हैं। कुछ की आदत होती है, वे ‘दूसरों’पर हँसकर उन्हें ‘ह्यूमिलिएट’करते हैं।
21वीं सदी में भी लोग इसपर हँसते हैं- ‘क्या लडक़ी भी क्रिकेट खेलेगी?’ शहरों में गांव के लोगों पर हँसा जाता है। कई व्यक्ति बिहारियों के हिंदी उच्चारण पर हँसते हैं। अंग्रेजी के देशज टोन की खिल्ली उड़ाई जाती है। गांधी का भी मखौल बनाने वाले लोग अब हैं। एक योजना से उनका नाम ही बिलकुल हटा दिया गया, इतनी परेशानी!
स्त्रियों की स्वतंत्रता और समानता की मांग पर हँसने वाले लोगों की आज बहुतायत है। अति-बुद्धिवादी बुद्धिजीवी हिंदुओं की आस्था तथा उनके पर्व-त्योहारों पर हँसते हैं। उत्तर-पूर्वी भारत के लोगों को दिल्ली जैसे महानगर में ‘चीनी’कहकर हँसा जाता है। इधर राजनीतिक विरोधियों को नकारा साबित करने के लिए उन पर तरह-तरह से हँसा जाता है। कहना न होगा कि आज की हँसी खुशी पैदा करने की जगह अपने एलीट वर्ग, पुरुष सत्ता, अपनी ऊंची जाति, अपने धर्म और अपनी भाषा के श्रेष्ठता-प्रदर्शन का औजार बन गई है। सोशल मीडिया पर तो ‘ट्रोल आर्मी’है।
हमारे समाज में ऐसी हँसी छाई हुई है जो दूसरे के मतों, विचारों और अभिव्यक्तियों को बिलकुल शांत कर देना चाहती है। हँसी के वेश में होने के कारण ऐसे आक्रमण सामाजिक स्वीकृति पाते हैं, पर उनका लक्ष्य दमन है। हँसी वस्तुत: साझे का मामला है जबकि इन दिनों उसका उपयोग आघात पहुंचाने के लिए अधिक हो रहा है। वह तनाव से राहत देने के लिए होती है, पर अब उसका लक्ष्य तनाव पैदा करना है। वह प्रफुल्लता के लिए नहीं, बल्कि हिंसक तरीकों से अपनी सत्ता जताने के लिए है।


