विचार / लेख
ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ भारत की इस्राएल और फलस्तीन के बीच संतुलन बनाए रखने वाली नीति को सवालों के घेरे में डाल रहा है. इसने भारत के सामने लागत, रणनीति और वैश्विक नेतृत्व से जुड़े कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं.
डॉयचे वैले पर मुरली कृष्णन की रिपोर्ट –
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने गुरुवार को अपने "बोर्ड ऑफ पीस" (बीओपी) को दुनिया के सामने पेश किया. इसका उद्देश्य गाजा में इस्राएल-हमास संघर्ष विराम को मजबूत करना और फलस्तीनी क्षेत्र में एक अंतरिम सरकार की निगरानी करना है.
भारत भी उन दर्जनों देशों में शामिल है, जिन्हें इस बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण मिला है. लेकिन भारत यह न्योता स्वीकार करेगा या नहीं, यह अब तक स्पष्ट नहीं है.
चूंकि, पिछले कुछ सालों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने इस्राएल के साथ अपने रिश्ते काफी मजबूत किए हैं. 2020 से 2024 के बीच भारत, इस्राएल से हथियार खरीदने वाला सबसे बड़ा देश रहा, और दोनों देशों के बीच का सालाना व्यापार भी लगभग पांच अरब डॉलर तक पहुंच चुका है.
इसके साथ-साथ भारत ने "फलीस्तीन मुद्दे” पर भी अपना स्टैंड बरकरार रखा है. साल 1975 में भारत, फलीस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (पीएलओ) को "फलीस्तीनी जनता का एकमात्र और वैध प्रतिनिधि” की मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश बना था.
भारत वेस्ट बैंक के रामल्ला शहर में एक प्रतिनिधि कार्यालय संचालित करता है, जो फलीस्तीनी शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र एजेंसी (यूएनआरडब्ल्यूए) को हर साल 50 लाख डॉलर की सहायता देता है. नई दिल्ली, इस्राएल-फलीस्तीन संघर्ष के समाधान के लिए शांति वार्ता तथा दो राष्ट्र समाधान का समर्थन करती रही है.
लेकिन ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस' भारत की इस स्थापित कूटनीतिक नीति को अब मुश्किल में डाल सकता है.
भारत के लिए चुनौतियां
भारत को इस पहल में शामिल होना चाहिए या नहीं, इस पर विदेश नीति विशेषज्ञों और राजनयिकों में काफी मतभेद हैं.
नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पश्चिम एशिया अध्ययन केंद्र के एसोसिएट प्रोफेसर मुदस्सिर कमर ने डीडब्ल्यू से कहा, "भारत को कुछ गंभीर मुद्दों पर विचार करना होगा और कूटनीतिक रूप से बहुत संतुलन बनाकर चलना पड़ेगा.”
उन्होंने आगे कहा, "हालांकि, अप्रत्याशित अमेरिकी राष्ट्रपति से निपटना सबसे बड़ी चुनौती है, लेकिन साथ ही बीओपी की भूमिका और ढांचे को लेकर स्पष्टता का अभाव भी भारत के लिए सोचने का विषय है.”
साथ ही, कमर ने साफ किया कि स्थायी सदस्यता के लिए कथित तौर पर एक अरब डॉलर का योगदान देना भी एक बड़ी बाधा हो सकती है. इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र के ढांचे के तहत फलीस्तीनी राष्ट्र के प्रति भारत की प्रतिबद्धता भी इस फैसले में अहम भूमिका निभा सकती है.
हालांकि, वह इसमें पाकिस्तान की भूमिका को निर्णायक मानने से इनकार करते हैं. उनका कहना है कि कोई भी फैसला लेने से पहले भारत संभवतः इस्राएल और यूएई जैसे क्षेत्रीय साझेदारों से सलाह करेगा.
कुछ विशेषज्ञ भारत की भागीदारी का क्यों कर रहे हैं समर्थन
सेवानिवृत्त राजनयिक और फलीस्तीनी प्राधिकरण में भारत के पहले प्रतिनिधि रहे टीएस तिरुमूर्ति का मानना है कि भारत को इस बोर्ड में शामिल होना चाहिए, क्योंकि इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी मिली हुई है और यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है.
तिरुमूर्ति ने डीडब्ल्यू से कहा, "बीओपी असल में संयुक्त राष्ट्र को चुनौती नहीं दे रहा है.”
उन्होंने कहा, "सीमित प्रतिनिधित्व के कारण यह अधिकतम जी20 की प्रमुखता को चुनौती दे सकता है, जिसकी सदस्यता भी सीमित है. चूंकि, अमेरिका चाहता है कि जी20 आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित रहे, जिस कारण बीओपी उसका भू-राजनीतिक समकक्ष बन सकता है.”
उन्होंने इस आशंका को भी खारिज किया कि कोई गैर-प्रतिनिधि निकाय, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की जगह ले सकता है. उनके अनुसार, यह बोर्ड भले ही कुछ समय के लिए उसकी भूमिका को कमजोर कर दे, लेकिन पूरी तरह से उसकी जगह नहीं ले सकता.
साथ ही, तिरुमूर्ति का मानना है कि भारत की भागीदारी ग्लोबल साउथ की चिंता को कमजोर नहीं, बल्कि और मजबूती देगी.
उन्होंने कहा, "किसी भी मंच पर भारत की मौजूदगी हमेशा तर्क और व्यावहारिकता का प्रतीक रही है.”
उन्होंने आगे कहा, "अपने हितों को सामने रखने के साथ साथ भारत अक्सर ग्लोबल साउथ की चिंताओं को उठाता रहा है. ऐसे में अगर भारत इस बोर्ड में शामिल होता है, तो मुझे भरोसा है कि उसकी भूमिका इसी अनुसार रहेगी.”
कुछ विशेषज्ञ इसके खिलाफ क्यों दे रहे हैं चेतावनी
नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पश्चिम एशिया अध्ययन केंद्र की अध्यक्ष समीना हमीद इस मुद्दे पर अलग राय रखती हैं. उनका कहना है कि कानूनी अस्पष्टता, अनिश्चित भविष्य और भारी राजनीतिक लागत के कारण भारत के इस बोर्ड में शामिल होने की संभावना कम है.
हमीद के अनुसार, प्रस्तावित प्रशासनिक भूमिका के लिए जरूरी सभी पक्षों की सहमति मौजूद नहीं है.
उनके मुताबिक, इस्राएली प्रधानमंत्री, बेन्यामिन नेतन्याहू ने तो बुधवार को ट्रंप के निमंत्रण को स्वीकार कर बीओपी की सदस्यता ले ली है. लेकिन गाजा में सक्रिय हमास, जो अन्य गुटों और समूहों के साथ हिंसक संघर्ष में उलझा है, उसको ट्रंप की इस पहल से "पूरी तरह बाहर” रखा गया है.
हमीद ने डीडब्ल्यू से कहा, "गाजा से आगे बढ़कर यदि इस बोर्ड का विस्तार कथित तौर पर ‘विवादित क्षेत्रों' तक किया जाता है, तो यह संघर्ष प्रबंधन में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमजोर कर सकता है. यानी यह भविष्य में एक ऐसा रूप ले सकता है, जिससे भारत आमतौर पर दूरी बनाए रखता है.”
उन्होंने कहा, "बोर्ड की संरचना में अध्यक्ष, जो कि फिलहाल अमेरिका है, उसको असमान रूप से अधिक अधिकार दिए गए हैं. जिसका मतलब हुआ कि सदस्यता असंतुलित है और निर्णय लेने के अधिकार भी समान नहीं हैं.”
उनके मुताबिक, "इससे एक वास्तविक बहुपक्षीय मंच के रूप में बोर्ड की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं.”
हमीद ने चेतावनी दी कि इसमें शामिल होने की राजनीतिक कीमत काफी भारी हो सकती है. एक ओर, इस्राएल के साथ रणनीतिक रिश्तों को नुकसान पहुंचने का खतरा है, तो दूसरी ओर, फलीस्तीन के प्रति भारत के सिद्धांतरूपी समर्थन को भी क्षति हो सकती है.
इसलिए उनकी सलाह है कि भारत को वही रास्ता अपनाना चाहिए, जिसमें वह अतीत में सफल रहा है यानी रणनीतिक अस्पष्टता बनाए रखना, ताकि उसकी विदेश नीति की स्वतंत्रता सुरक्षित रह सके.
कुछ शर्तों के साथ बढ़ा जा सकता है आगे
पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त रह चुके अजय बिसारिया ने इस पहल को सशर्त समर्थन दिया है. उनका कहना है कि यदि बोर्ड के जरिए एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था को फिर से आगे बढ़ाने की कोशिश की गई, तो उसका विरोध होगा. यूरोप के विरोध को देखते हुए उन्हें पश्चिम एशिया से बाहर इस बोर्ड के विस्तार और सफल होने की संभावना भी कम ही लगती है.
बिसारिया ने डीडब्ल्यू से कहा, "भारत को इसकी शर्तों और बारीकियों को अच्छी तरह समझते हुए बहुत सावधानी से आगे बढ़ना चाहिए.”
उनका सुझाव है कि यदि बोर्ड का दायरा केवल पश्चिम एशिया तक ही सीमित रहता है, तो भारत इसमें शामिल हो सकता है. ऐसी स्थिति में भारत अपने शांति मिशनों को जारी रखते हुए गाजा के लिए मानवीय सहायता भेजकर अपनी भूमिका निभा सकता है.
उन्होंने कहा, "इतिहास गवाह है कि भारत कभी जल्दबाजी नहीं करता है.”
फिलहाल, भारत अन्य प्रमुख शक्तियों के फैसलों पर नजर बनाए हुए है. वह न तो सबसे पहले शामिल होने की होड़ में है और न ही खुद को बिलकुल ही अलग थलग दिखाने के मूड में है.
(dw.com/hi)


