विचार / लेख
क्या लोकतंत्र अहंकार को भी पुरस्कार के योग्य बना देगा?
डोनाल्ड ट्रंप कोई “विवादास्पद नेता” नहीं है, वह एक कमीना सत्ता-प्रयोग है, जो लोकतंत्र की देह पर बैठकर उसे अंदर से खोखला करता रहा है। वह घटिया इसलिए है कि उसे सच से कोई सरोकार नहीं; बदचलन इसलिए कि सत्ता को निजी व्यापार, निजी बदले और निजी अहंकार के लिए इस्तेमाल करता है; और बदजुबान इसलिए कि भाषा को वह संवाद का औज़ार नहीं, हिंसा का हथियार मानता है। ट्रंप राजनीति की बीमारी नहीं है, वह राजनीति पर हमला है। वह व्यक्ति नहीं, एक प्रवृत्ति है, जिसमें झूठ को रणनीति, अश्लीलता को ईमानदारी, और क्रूरता को “मजबूती” कहा जाता है। ऐसा आदमी जब नोबेल शांति पुरस्कार की माँग करता है, तो वह सिर्फ़ खुद को नहीं, बल्कि उस पुरस्कार की नैतिक स्मृति को भी घसीटता है। यह वही ट्रंप है जिसने नस्लवाद को मज़ाक बनाया, हिंसा को उकसाया, और चुनाव हारने के बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कुचलने की कोशिश की। उसका अहंकार इतना विकृत है कि वह खुद को इतिहास से बड़ा समझता है, और उसकी बेशर्मी इतनी गहरी कि वह शांति की भाषा बोलते हुए युद्ध की गंध फैलाता है।
यह सवाल अब हास्यास्पद नहीं, बल्कि खतरनाक है कि क्या ट्रंप मानसिक रूप से अक्षम है। सवाल यह है कि क्या अमेरिका के संवैधानिक औज़ार किसी ऐसे व्यक्ति के सामने बेबस हैं, जो खुलेआम झूठ बोलता है, संस्थाओं का मज़ाक उड़ाता है और खुद को क़ानून से ऊपर समझता है? अमेरिकी संविधान का 25वाँ संशोधन मानसिक या शारीरिक अक्षमता की बात करता है, लेकिन समस्या यह है कि ट्रंप की अक्षमता मेडिकल नहीं, नैतिक है। वह जानबूझकर झूठ बोलता है, जानबूझकर आग लगाता है, जानबूझकर समाज को बाँटता है। यह महज मानसिक विचलन नहीं है, यह सुनियोजित घटियापन है। महाभियोग के आधार उस पर कई बार बने, और चले भी, लेकिन अमेरिकी राजनीति की कायरता ने उसे सज़ा नहीं लेने दी। ट्रंप इस बात का सबूत है कि लोकतंत्र में सिर्फ़ क़ानून काफ़ी नहीं होते, जब नैतिक रीढ़ ही टूट चुकी हो। वह हर बार बच निकलता है क्योंकि वह सिस्टम की कमज़ोरियों को जानता है और उन्हीं पर पेशाब करता है। यह किसी राष्ट्रपति का आचरण नहीं, यह एक माफ़िया सरगना का व्यवहार है, जिसे मंच, माइक और परमाणु कोड दे दिए गए हों।
अब नोबेल शांति पुरस्कार की बात। इतिहास में कई विवादास्पद नाम इस सूची में आए हैं, लेकिन ट्रंप का मामला अलग है, वह सिर्फ़ अयोग्य नहीं, अपमानजनक है। क्या दुनिया में कोई और राष्ट्रप्रमुख रहा है जिसने शांति पुरस्कार के लिए इतनी निर्लज्जता से खुद की मार्केटिंग की हो? ट्रंप का “शांति” से रिश्ता वही है जो आग का पेट्रोल से। वह युद्ध रोकने की नहीं, सौदेबाज़ी की बात करता है; इंसानी जान की नहीं, कैमरे के फ्रेम की चिंता करता है। नोबेल शांति पुरस्कार उन लोगों को मिला है जिन्होंने सत्ता के ख़िलाफ़ खड़े होकर शांति की क़ीमत चुकाई, और यहाँ एक ऐसा आदमी है जो सत्ता में रहकर भी खुद को पीड़ित बताता है। ट्रंप का नोबेल सपना दरअसल उसके भीतर की उसी घटिया भूख का विस्तार है, जो तालियों, ट्रॉफियों और तारीख़ों से कभी भरती नहीं। यह इतिहास में पहली बार है कि कोई इतना बेशर्म होकर कहे, “मैं नोबेल शांति पुरस्कार का हक़दार हूँ”, जब उसकी हर साँस नफ़रत, हर भाषण ज़हर, और हर नीति विनाश से भरी हो।
असल सवाल ट्रंप का नहीं है। असल सवाल हमारा है, कि क्या हम इस कमीनेपन को सामान्य मान लेंगे? क्या लोकतंत्र सिर्फ़ वोटों की गिनती रह जाएगा, या उसमें चरित्र की भी कोई शर्त होगी? ट्रंप सभ्यता की परीक्षा इसलिए है क्योंकि वह यह जाँचता है कि क्या दुनिया ताक़तवर बदचलन को भी सम्मान दे देगी, सिर्फ़ इसलिए कि उसके पास ताक़त है। अगर ट्रंप को नोबेल की चाह भी वैध लगने लगे, तो समझ लीजिए कि हमने सिर्फ़ पुरस्कार नहीं, अपनी नैतिक भाषा भी खो दी है। लोकतंत्र का मतलब यह नहीं कि हर बदजुबान को मंच मिले, हर झूठे को “विकल्प”, और हर हिंसक अहंकार को “लोकप्रिय नेता” कहा जाए। ट्रंप एक चेतावनी है कि अगर सभ्यता चुप रही, तो घटियापन शासन करेगा। और तब सवाल यह नहीं रहेगा कि ट्रंप को पुरस्कार मिलेगा या नहीं; सवाल यह होगा कि क्या हम इंसान कहलाने लायक बचे भी हैं या नहीं।
(संपादक सुनील कुमार की सोच से, उनके उठाए नैतिक मुद्दों पर, उनकी सुझाई भाषा में chatgpt ने यह लेख लिखा है।)


