विचार/लेख
भारत में बीते दिनों कई न्यूज प्लेटफॉर्मों और न्यूज कंटेंट क्रिएटरों के सोशल मीडिया अकाउंटों पर पाबंदी लगा दी गई। प्रेस क्लब ने इसे ‘ऑनलाइन सेंसरशिप’ करार देते हुए ‘मनमाना और संविधान का उल्लंघन’ करने वाला बताया है।
डॉयचे वैले पर आदर्श शर्मा का लिखा-
राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने आरोप लगाया है कि भारत सरकार के निर्देश पर कई न्यूज प्लेटफॉर्मों, न्यूज कॉटेंट क्रिएटरों, इन्फ्लूएंसरों और अन्य अकाउंटों पर पाबंदी लगाई गई है। उन्होंने एक वीडियो जारी कर कहा, ‘4पीएम का यूट्यूब चैनल बंद किया गया। फेसबुक ने नेशनल दस्तक, मॉलिटिक्स और राजीव निगम का अकाउंट बंद कर दिया। कश्मीर के ग्रेटर कश्मीर, राइजिंग कश्मीर समेत कई अकाउंटों को मेटा ने बंद किया है। ट्विटर पर एक्टिविस्ट संदीप और डॉक्टर निमो यादव के अकाउंटों को भी बंद किया गया।’
योगेंद्र यादव ने बीजेपी शासित केंद्र सरकार पर ‘पोस्टमैन’ को निशाना बनाने का आरोप लगाया है। यहां पोस्टमैन से उनका आशय उन डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्मों से है, जो जनता तक खबरें पहुंचाते हैं। योगेंद्र यादव ने कहा, ‘सोशल मीडिया अब इस सरकार के खिलाफ हो रहा है और सरकार डर रही है। घबराई हुई, बौखलाई हुई, डरी हुई सरकार क्या करती है, पोस्टमैन को पकडऩे की कोशिश करती है कि तुम्हें (ये काम) नहीं करने देंगे।’
‘डिजिटल प्लेटफॉर्मों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही सरकार’
न्यूज प्लेटफॉर्म ‘मॉलिटिक्स’ ने इस मुद्दे पर 2 अप्रैल को ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया। इसमें शामिल हुए 'आम आदमी पार्टी' के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि अगर सभी यूट्यूब चैनलों पर इस तरह की निगरानी शुरू हो गई, तो कोई भी सही खबर नहीं दिखा पाएगा। उन्होंने आरोप लगाया, ‘सरकार पहले ही टीवी मीडिया को नियंत्रित कर चुकी है और अब डिजिटल प्लेटफॉर्मों को भी नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है।’
संदीप सिंह का एक्स अकाउंट भी भारत में बंद कर दिया गया है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने हाथों में जंजीर बांधकर इसका विरोध कियासंदीप सिंह का एक्स अकाउंट भी भारत में बंद कर दिया गया है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने हाथों में जंजीर बांधकर इसका विरोध किया
इससे पहले संजय सिंह ने भी संसद में यह मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पूंजीपतियों को फायदा पहुंचा रही है और उसके विरोध में उठती आवाजों को निशाना बना रही है।
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने भी इस मुद्दे को संसद में उठाया। उन्होंने भी आरोप लगाया कि सरकार की आलोचना को देश की आलोचना बना दिया गया है, ‘मेरे देश और मेरी सरकार में फर्क है। ये फर्क 75 साल पहले भी था और ये फर्क 75 साल बाद भी रहना चाहिए।’
‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ ने भी इस विषय पर चिंता जाहिर करते हुए कहा, ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर सरकार की आलोचना करने वाले कंटेंट को निशाना बनाते हुए जारी किए गए टेकडाउन आदेशों पर गहरी चिंता व्यक्त करता है, जहां क्रिएटरों को ब्लॉक कर दिया गया है या उनका कंटेंट हटा दिया गया है।’
प्रेस क्लब ने इस कार्रवाई को ‘ऑनलाइन सेंसरशिप’ करार देते हए कहा कि यह ‘मनमानी और संविधान का उल्लंघन’ करने वाली है।
.St. Augustine of Hippo
"Faith is to believe what you do not see; the reward of this faith is to see what you believe."
."St. Augustine (born November 13, 354, Tagaste, Numidia [now Souk Ahras, Algeria]—died August 28, 430, Hippo Regius [now Annaba, Algeria]; feast day August 28) was the bishop of Hippo from 396 to 430, one of the Latin Fathers of the Church, and perhaps the most significant Christian thinker after St. Paul. Augustine’s adaptation of classical thought to Christian teaching created a theological system of great power and lasting influence. His numerous written works, the most important of which are Confessions (c. 400) and The City of God (c. 413–426), shaped the practice of biblical exegesis and helped lay the foundation for much of medieval and modern Christian thought. In Roman Catholicism he is formally recognized as a doctor of the church.
(Read Britannica’s biography of the first Augustinian pontiff, Pope Leo XIV.)
Augustine is remarkable for what he did and extraordinary for what he wrote. If none of his written works had survived, he would still have been a figure to be reckoned with, but his stature would have been more nearly that of some of his contemporaries. However, more than five million words of his writings survive, virtually all displaying the strength and sharpness of his mind (and some limitations of range and learning) and some possessing the rare power to attract and hold the attention of readers in both his day and ours. His distinctive theological style shaped Latin Christianity in a way surpassed only by Scripture itself. His work continues to hold contemporary relevance, in part because of his membership in a religious group that was dominant in the West in his time and remains so today..."
इरावती कर्वे भारत की पहली महिला एंथ्रोपॉलजिस्ट के साथ-साथ साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता भी थीं। जर्मनी में पीएचडी करते हुए उन्होंने अपने नाजी प्रोफेसर की नस्लभेदी थिअरी को गलत साबित किया था।
डॉयचे वैले पर रितिका की रिपोर्ट-
इरावती कर्वे को भारत की पहली महिला एंथ्रोपॉलजिस्ट के तौर पर जाना जाता है। हालांकि, बेहद कम लोगों को यह जानकारी है कि इरावती ने जर्मनी आकर अपनी पीएचडी पूरी की थी। 1920 के दशक में पीएचडी के दौरान ही उन्होंने अपने नाजी प्रोफेसर यूजीन फिशर की नस्लभेदी थिअरी को गलत साबित किया था।
इरावती का जन्म 15 दिसंबर 1905 बर्मा (अब म्यांमार) में हुआ था। उनके पिता गणेश करमरकर ने बर्मा की सबसे प्रमुख नदी ‘इरावडी’ के नाम पर बेटी को इरावती नाम दिया। वह बचपन से ही पढऩे-लिखने में बेहद होशियार थीं।
उस दौर में लगभग हर डिग्री के लिए उन्हें कोई-न-कोई स्कॉलरशिप जरूर मिली थी। साल 1926 में पुणे के फग्र्यूसन कॉलेज से उन्होंने दर्शनशास्त्र में अपनी ग्रैजुएशन पूरी की। इसके बाद मास्टर्स की डिग्री के लिए उन्हें बॉम्बे यूनिवर्सिटी से दक्षिणा फेलोशिप मिली।
आजाद खयाल थीं इरावती कर्वे
इरावती उस जमाने में भी अपने दौर से कहीं आगे की सोच रखती थीं। 1920 के दशक में एक भारतीय लडक़ी का स्कूटर चलाना, स्विमसूट पहनना या फिर अपनी मर्जी से शादी करना नामुमकिन सी बात लगती है। लेकिन इरावती ने ये सब करके दिखाया था।
उन्होंने दिनकर धोंडो कर्वे से शादी की। दिनकर एक प्रगतिशील और समाज सुधारकों के परिवार से आते थे। उन्होंने इरावती के हर फैसले में उनका साथ दिया था। इसलिए जब इरावती ने बर्लिन जाकर डॉक्टरेट करने का फैसला किया तो उनके पिता और ससुर दोनों नाराज हुए, लेकिन पति दिनकर ने साथ दिया। कर्वे ने खुद भी जर्मनी से पढ़ाई की थी, इसलिए उन्हें लगा कि इरावती की पीएचडी के लिए जर्मनी मुफीद जगह होगी।
इरावती कर्वे की नातिन और लेखिका उर्मिला देशपांडे बताती हैं, ‘वे उस जमाने में पीएचडी करने इसलिए आ पाईं क्योंकि उनके पति साथ खड़े थे। यह मुख्य वजह थी। और, ऐसा करने की उनकी अपनी इच्छाशक्ति भी इसके पीछे थी। मैंने अपनी किताब में भी लिखा है कि मैं सात साल की थी, जब उनकी मौत हुई तो एक व्यस्क के तौर पर मैं उन्हें नहीं जानती। लेकिन वो एक बेहद दृढ़ निश्चय वाली आत्मविश्वास से भरपूर इंसान थीं।’
भारत से बर्लिन तक का सफर
साल 1927 में इरावती ने जर्मनी आकर पीएचडी करने का फैसला किया। तब भारत से जर्मनी की कोई सीधी फ्लाइट तो थी नहीं। पानी के जहाज में कई हफ्तों का सफर तय करके वह हैम्बर्ग पोर्ट पहुंचीं और वहां से बर्लिन की ट्रेन पकड़ी।
इरावती को ‘काइजर विलहेल्म इंस्टीट्यूट ऑफ एंथ्रोपॉलजी’ में रिसर्च के लिए दाखिला मिला था। उनके पीएचडी सुपरवाइजर थे, जर्मन वैज्ञानिक प्रोफेसर यूजीन फिशर। यह वही शख्स थे, जिन्होंने यह ‘थिअरी’ सामने रखी थी कि वाइट यूरोपियंस की खोपड़ी एसिमेट्रिकल होती है। उनके दिमाग का दाईं तरफ का हिस्सा ज्यादा बड़ा होता है, जो उनकी श्रेष्ठता का सबूत है।
फिशर ने इरावती को एक टास्क दिया, जिसमें उन्हें यूरोपीय नस्ल की खोपडिय़ों की तुलना दूसरी नस्लों की खोपडिय़ों से करनी थी। और, यह साबित करना था कि यूरोपीय नस्ल ज्यादा तार्किक और समझदार होती है। इसके लिए इरावती को 149 इंसानी खोपडिय़ों पर यह स्टडी करनी थी।
स्टडी में शामिल दूसरी नस्लों की खोपडिय़ां रवांडा, तंजानिया और मेलानेशिया से थीं। तब इनमें से कुछ इलाके जर्मनी की कॉलनी हुआ करते थे। उर्मिला देशपांडे ने अपनी किताब में लिखा है अपनी रिसर्च के दौरान इरावती इन खोपडिय़ों से माफी मांगती थीं।
भारत में बीते दिनों कई न्यूज प्लेटफॉर्मों और न्यूज कंटेंट क्रिएटरों के सोशल मीडिया अकाउंटों पर पाबंदी लगा दी गई. प्रेस क्लब ने इसे "ऑनलाइन सेंसरशिप" करार देते हुए "मनमाना और संविधान का उल्लंघन" करने वाला बताया है.
डॉयचे वैले पर आदर्श शर्मा की रिपोर्ट –
राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने आरोप लगाया है कि भारत सरकार के निर्देश पर कई न्यूज प्लेटफॉर्मों, न्यूज कॉटेंट क्रिएटरों, इन्फ्लूएंसरों और अन्य अकाउंटों पर पाबंदी लगाई गई है. उन्होंने एक वीडियो जारी कर कहा, "4पीएम का यूट्यूब चैनल बंद किया गया. फेसबुक ने नेशनल दस्तक, मॉलिटिक्स और राजीव निगम का अकाउंट बंद कर दिया. कश्मीर के ग्रेटर कश्मीर, राइजिंग कश्मीर समेत कई अकाउंटों को मेटा ने बंद किया है. ट्विटर पर एक्टिविस्ट संदीप और डॉक्टर निमो यादव के अकाउंटों को भी बंद किया गया."
योगेंद्र यादव ने बीजेपी शासित केंद्र सरकार पर "पोस्टमैन" को निशाना बनाने का आरोप लगाया है. यहां पोस्टमैन से उनका आशय उन डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्मों से है, जो जनता तक खबरें पहुंचाते हैं. योगेंद्र यादव ने कहा, "सोशल मीडिया अब इस सरकार के खिलाफ हो रहा है और सरकार डर रही है. घबराई हुई, बौखलाई हुई, डरी हुई सरकार क्या करती है, पोस्टमैन को पकड़ने की कोशिश करती है कि तुम्हें (ये काम) नहीं करने देंगे."
"डिजिटल प्लेटफॉर्मों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही सरकार"
न्यूज प्लेटफॉर्म 'मॉलिटिक्स' ने इस मुद्दे पर 2 अप्रैल को 'प्रेस क्लब ऑफ इंडिया' में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया. इसमें शामिल हुए 'आम आदमी पार्टी' के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि अगर सभी यूट्यूब चैनलों पर इस तरह की निगरानी शुरू हो गई, तो कोई भी सही खबर नहीं दिखा पाएगा. उन्होंने आरोप लगाया, "सरकार पहले ही टीवी मीडिया को नियंत्रित कर चुकी है और अब डिजिटल प्लेटफॉर्मों को भी नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है."
इससे पहले संजय सिंह ने भी संसद में यह मुद्दा उठाया. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पूंजीपतियों को फायदा पहुंचा रही है और उसके विरोध में उठती आवाजों को निशाना बना रही है.
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने भी इस मुद्दे को संसद में उठाया. उन्होंने भी आरोप लगाया कि सरकार की आलोचना को देश की आलोचना बना दिया गया है, "मेरे देश और मेरी सरकार में फर्क है. ये फर्क 75 साल पहले भी था और ये फर्क 75 साल बाद भी रहना चाहिए."
'प्रेस क्लब ऑफ इंडिया' ने भी इस विषय पर चिंता जाहिर करते हुए कहा, "प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर सरकार की आलोचना करने वाले कंटेंट को निशाना बनाते हुए जारी किए गए टेकडाउन आदेशों पर गहरी चिंता व्यक्त करता है, जहां क्रिएटरों को ब्लॉक कर दिया गया है या उनका कंटेंट हटा दिया गया है."
प्रेस क्लब ने इस कार्रवाई को "ऑनलाइन सेंसरशिप" करार देते हए कहा कि यह "मनमानी और संविधान का उल्लंघन" करने वाली है.
"बिना किसी नोटिस के बंद कर दिया गया फेसबुक पेज"
न्यूज प्लेटफॉर्म 'मॉलिटिक्स' के फेसबुक अकाउंट को करीब 4,48,000 लोग फॉलो करते थे. मॉलिटिक्स की डिप्टी एडिटर निवेदिता शांडिल्य के मुताबिक, 28 मार्च को रात 2 बजे के बाद मेटा की ओर से नोटिफिकेशन आया, "सूचना प्रौद्योगिकी कानून 2000 के सेक्शन 79(3)(बी) के तहत, भारत सरकार/कानून प्रवर्तन से मिले नोटिस के आधार पर भारत में आपके कंटेंट तक पहुंच को रोक दिया गया है."
निवेदिता ने डीडब्ल्यू हिंदी को बताया कि इससे पहले मॉलिटिक्स को सरकार या मेटा की ओर से कोई नोटिस नहीं मिला था और अचानक ही उनके अकाउंट को भारत में बैन कर दिया गया. निवेदिता के मुताबिक, पेज को बैन करने के पीछे कोई वजह भी नहीं बताई गई है. उन्होंने बताया कि मॉलिटिक्स की टीम इस कार्रवाई के खिलाफ कानूनों विकल्पों पर विचार कर रही है और दिल्ली हाईकोर्ट जाने की योजना बना रही है.
12 साल पुराना फेसबुक पेज झटके में बंद हुआ
'नेशनल दस्तक' नाम का न्यूज प्लेटफॉर्म चलाने वाले शंभू कुमार सिंह बताते हैं कि उनका फेसबुक पेज करीब 12 साल पुराना था और सरकार के निर्देश पर उसे डाउन कर दिया गया. फेसबुक पर नेशनल दस्तक को करीब 14 लाख लोग फॉलो करते थे.
शंभू कुमार ने डीडब्ल्यू हिंदी से बातचीत में कहा कि नेशनल दस्तक के जरिए हाशिये पर मौजूद समुदायों की आवाज उठाई जाती थी, जिनमें एससी-एसटी, ओबीसी वर्ग, महिलाएं और किसान शामिल हैं.
उन्होंने बताया कि मॉलिटिक्स की तरह, उनका पेज भी अचानक भारत में बंद कर दिया गया और इस कार्रवाई से पहले उन्हें किसी भी तरह का कोई नोटिस नहीं भेजा गया था. उन्होंने कहा कि वे कोई संस्थागत मीडिया हाउस नहीं हैं, उनके लिए कोई कानूनी या आर्थिक सहायता उपलब्ध नहीं है, इसलिए वे फिलहाल कोर्ट जाने के बारे में नहीं सोच रहे हैं बल्कि फेसबुक की शर्तों को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं.
इस मामले पर सरकार की ओर से आधिकारिक तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है. डीडब्ल्यू हिंदी ने सोशल मीडिया अकाउंटों पर पाबंदी के मुद्दे पर भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से टिप्पणी का अनुरोध किया था, लेकिन खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला.
-ललित मौर्य
कल्पना कीजिए एक ऐसी दुनिया की, जहां कुछ हजार सबसे अमीर लोगों के पास इतनी छिपी हुई दौलत है, जो दुनिया की आधी आबादी की कुल संपत्ति से भी ज्यादा है। यह सिर्फ असमानता की कहानी नहीं, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था की कहानी है, जहां अमीरों के लिए नियम अलग और आम लोगों के लिए अलग हैं।
आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया के सबसे अमीर 0.1 फीसदी लोगों ने टैक्स से बचने के लिए विदेशों में इतनी संपत्ति छिपा रखी है, जो दुनिया की आधी गरीब आबादी (करीब 410 करोड़ लोगों) की कुल संपत्ति से भी ज्यादा है। यह खुलासा ऑक्सफैम की नई रिपोर्ट में हुआ है, जो पनामा पेपर्स की 10वीं वर्षगांठ से पहले जारी की गई है।
दुनिया में गरीबी की बड़ी वजह ‘छिपा हुआ पैसा’
इसका मतलब कहीं न कहीं दुनिया में गरीबी की सबसे बड़ी वजह पैसे की कमी नहीं, बल्कि छिपा पैसा है। जब करोड़ों लोग बेहतर अस्पताल, स्कूल और रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उसी समय दुनिया के सबसे अमीर लोग अपनी खरबों डॉलर की संपत्ति टैक्स हेवन में छिपा रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, साल 2024 में करीब 3.55 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति टैक्स हेवन देशों और गुप्त खातों में छिपाई गई। यह रकम फ्रांस की पूरी अर्थव्यवस्था से भी ज्यादा है और दुनिया के 44 सबसे कमजोर देशों की कुल जीडीपी के मुकाबले दोगुने से भी अधिक है।
ऑक्सफैम के मुताबिक, टैक्स से छिपाई गई इस कुल संपत्ति का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ सबसे अमीर 0.1 फीसदी लोगों के पास है, यानी करीब 2.84 ट्रिलियन डॉलर की रकम इन लोगों ने दबा रखी है। वहीं, इस समूह के अंदर भी सबसे अमीर सुपर रिच 0.01 फीसदी लोगों के पास ही करीब 1.77 ट्रिलियन डॉलर संपत्ति छिपी हुई है।
ऑक्सफैम इंटरनेशनल के टैक्स विशेषज्ञ क्रिश्चियन हॉलम का कहना है, ‘पनामा पेपर्स ने एक ऐसी छिपी दुनिया का पर्दाफाश किया था, जहां सबसे अमीर लोग अपनी संपत्ति टैक्स और जांच से बचाने के लिए विदेशों में छिपा देते हैं। दस साल बाद भी यह सिलसिला जारी है और सुपर-रिच लोग अब भी भारी मात्रा में संपत्ति टैक्स हेवन यानी विदेशों के गुप्त खातों में छिपा रहे हैं।’
सऊदी में कारोबार छोडक़र भारत लौटे अशरफ अब सोशल मीडिया पर अपने बेटे की प्रगति दुनिया तक पहुंचा रहे हैं। केरल के शाबिन के ऑटिज्म की यात्रा को हर कोने से मिल रहा है प्यार।
डॉयचे वैले पर जीशान तिरमिजी की रिपोर्ट –
केरल के पलक्कड में रहने वाले अशरफ और रसीना को अपने बेटे शाबिन के बारे में तब चिंता होने लगी, जब दो-ढाई साल की उम्र में भी वह कुछ नहीं बोल पा रहा था। लोग अलग-अलग राय देते थे। लेकिन माता-पिता का दिल जो ठहरा, रसीना और अशरफ को महसूस हुआ कि बात कुछ और है।
शाबिन साढ़े चार साल का था, जब डॉक्टर ने बताया कि उसे स्पीच थेरपी की जरूरत है। उस समय रसीना गर्भवती थीं और अस्पताल आना-जाना मुश्किल था। अशरफ भी तब सऊदी अरब में थे, तो एक दिन रसीना ने रोते हुए उन्हें फोन किया और भारत लौटने को कहा।
अशरफ सऊदी अरब में फोटोग्राफी का काम कर रहे थे, लेकिन परिवार के लिए सबकुछ छोडक़र वापस चले आए। भारत में एक वरिष्ठ मनोचिकित्सक ने बताया कि शाबिन को ऑटिज्म है। यह पहली बार था, जब अशरफ ने यह शब्द सुना। बेंगलुरू के एक बड़े अस्पताल में ऑटिज्म से प्रभावित दूसरे बच्चों और उनके माता-पिता को देखकर अशरफ को पहली बार स्थिति की गंभीरता समझ आई।
थेरपी की सीमाएं और संघर्ष की शुरुआत
भारत लौटने के बाद स्पीच थेरपी, ऑक्यूपेशनल थेरपी और कई तरह के मूल्यांकन शुरू हुए। खर्च बढ़ता गया पर सुधार धीमा था। डेढ़ साल तक लगातार कोशिश करने के बावजूद शाबिन के बोलने में खास प्रगति नहीं हुई।
आर्थिक मोर्चे पर भी चुनौती खड़ी हो चुकी थी। अशरफ के मुताबिक, वह सऊदी में जिन्हें अपना कारोबार सौंपकर आए थे उन्होंने धोखे से वह भी खत्म कर दिया था। फिर भी अशरफ ने हिम्मत नहीं हारी और छोटे पैमाने पर रबर की खेती कर परिवार का गुजारा शुरू किया।
स्पेशल स्कूल भेजने पर भी उन्हें संतोष नहीं मिला। स्कूल में थेरपी तो थी, लेकिन ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के लिए प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी थी। न बोलने में प्रगति हुई, न बिना शब्दों के होने वाली अभिव्यक्ति में। अशरफ मानते हैं कि स्पेशल स्कूल, डाउन सिंड्रोम या अन्य स्थितियों वाले बच्चों के लिए ठीक हो सकता है, पर ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के लिए नहीं।
फिर मां ने थामी पढ़ाई की कमान
रसीना ने अपने इलाके के एक वरिष्ठ डॉक्टर से कुछ दिन की ट्रेनिंग ली। वहां उन्हें सिखाया गया कि ऑटिज्म वाले बच्चों को जबरदस्ती नहीं, बल्कि धैर्य और दोहराव से सिखाया जाता है। फिर तो रसीना ने घर को ही स्कूल बना दिया।
वह शाबिन को रोजमर्रा के हर काम में अपने साथ रखती थीं। खाना बनाना, सफाई, कपड़े तह करना, पानी भरना हर काम में शाबिन उनके साथ होता। धीरे-धीरे शाबिन ने भी कई काम सीख लिए। परिवार बताता है कि वह खूब ऐक्टिव हैं और अचानक सडक़ की ओर भी चल देता थे। तब शाबिन के चाचा ने घर के बाहर लकड़ी का एक बैरियर लगाया। कुछ ही दिनों में शाबिन समझ गए कि बैरियर के पार नहीं जाना है।
सोशल मीडिया की ताकत और जागरूकता का नया रास्ता
एक दिन अखबार पढ़ते समय अशरफ ने नोटिस किया कि शाबिन एक घंटे तक शांत बैठा रहा। यह उनके लिए हैरान करने वाली बात थी। उन्होंने तस्वीर खींची और फेसबुक पर डाल दी। लोगों की प्रतिक्रिया अप्रत्याशित थी। सवाल आने लगे कि यह बच्चा कौन है।
यहीं से रोजमर्रा के वीडियो पोस्ट करने की शुरुआत हुई- कपड़े तह करना, खाना, संगीत सुनना, साफ-सफाई में मदद करना। कुछ ही महीनों में दुनियाभर से कई लोग उनके साथ जुड़ गए। अशरफ बताते हैं कि उनकी ऑडियंस में 70 प्रतिशत महिलाएं हैं, जिनकी उम्र 30 से 60 साल के बीच है। खासकर वे महिलाएं, जो स्पेशल बच्चों की परवरिश कर रही हैं।
आज फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर लोग न सिर्फ शाबिन को देखते हैं बल्कि कमेंट और फोन के जरिये प्यार और हौसला भी देते हैं। सोशल मीडिया ने इस परिवार को आवाज दी है। साथ ही, शाबिन की यात्रा ने हजारों परिवारों के बीच नई जागरूकता भी जगाई है।
“जाम में फंसे आम आदमी को महंगाई, अशिक्षा, इलाज के नाम पर लूट, शिक्षा के नाम पर डकैती जैसी सांसारिक चीजें तुच्छ लगने लगेंगी”
सुल्तान का दरबार सजा हुआ था पर गजब की खामोशी थी। सुल्तान मुहम्मद-बिन-तुगलक अपने स्मार्टफोन पर रील पर रील स्क्रोल किए जा रहे थे। थोड़ी देर यूं ही चलता रहा। इससे पहले कि बाकी दरबारी भी रील देखना शुरू करते सुल्तान के चीफ वजीर ख्वाजा जहान उठे और अदब से सलाम करते हुए जेब से एक कागज निकाला और पढ़ने लगे, “सर जी! दरबार चलने का एक मिनट का खर्च लगभग 2.5 लाख रुपए है। इस दर से एक दिन का खर्च लगभग 9 करोड़ रुपए से अधिक आता है। इसमें वजीरों के वेतन-भत्ते, यात्रा, सुरक्षा इत्यादि शामिल हैं। हर मिनट का यह खर्च टैक्सपेयर पर बोझ डालता है। सूत्रों ने आरटीआई लगाकर जानना चाहा है कि सुल्तान आखिर किस चिंता में डूबे हैं?”
मुहम्मद-बिन-तुगलक ने अपनी आवाज में किसी दार्शनिक की खनक लाते हुए कहा, “ख्वाजा जहान, किसी ने सही कहा है कि कभी किसी को मुकम्मल जहान नहीं मिलता। अब मुझे ही देख लो, मेरी मुद्रा नीति फेल हो गई है, विदेश नीति का हाल देख ही रहे हो। सोचा था दौलताबाद शिफ्ट कर जाऊंगा पर वह भी नहीं हुआ। देश में बेरोजगारी, महंगाई आसमान छू रही है। गैस को लेकर मारामारी हो रही है और सामने कई राज्यों में चुनावी युद्ध होने वाले हैं। कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि करूं तो क्या करूं? ऐसे में मैं रील न देखूं तो क्या करूं?”
ख्वाजा जहान बोले, “मैं किसी फिल्मी सड़क की नहीं बल्कि अपने राज्य की सड़कों की बात कर रहा हूं। अब आप क्रोनोलॉजी समझिए। सबसे पहले हमें सड़कों का मुआयना करना होगा। देखा जाए तो एक भी सड़क, सड़क कहलाने लायक बची नहीं है पर जहां भी कोई ढंग की सड़क दिखेगी हम उसको जहां-तहां खोद देंगे। इस पवित्र कार्य में हमारे सरकारी विभाग हमारी मदद के लिए सदैव तत्पर हैं। कभी किसी सड़क को हमारा बिजली-विभाग खोदकर भाग जाएगा तो कभी किसी दूसरी सड़क को जल-विभाग। कहीं गहरे सीवर के नाम पर खोदेंगे तो कहीं पर गैस पाइपलाइन के नाम पर। कभी किसी सड़क को पुल बनाने के नाम पर खोद दिया जाएगा तो कभी किसी को मेट्रो लाइन बिछाने के नाम पर।”
मुहम्मद-बिन-तुगलक ने मासूमियत से पूछा, “भला इससे महंगाई, गैस की कमी, बेरोजगारी जैसी समस्याओं का समाधान कैसे होगा?”
ख्वाजा जहान ने कहा, “इससे यातायात ठप्प हो जाएगा। रियाया इस पहेली में रहेगी कि आखिर क्यों “मंजिलें अपनी जगह हैं, रास्ते अपनी जगह।” जैसे आत्मा एक शरीर से निकलकर दूसरे में जा घुसती है, उसी तरह एक आम नागरिक एक ट्रैफिक जाम से निकल कर दूसरे में जा फंसेगा। जल्द ही वह लगभग आध्यात्मिक हो जाएगा और यह सोचने लगेगा कि कैसे इस ट्रैफिक जाम के चक्र से मुक्ति मिले? यही मोक्ष की अवस्था है। ऐसे में उसके सामने महंगाई, अशिक्षा, इलाज के नाम पर लूट, शिक्षा के नाम पर डकैती जैसी सांसारिक चीजें तुच्छ लगने लगेंगी। चुनावों से ठीक पहले हम सड़कों की मरम्मत कर देंगे। जनता खुश हो जाएगी और हम चुनाव जीत जाएंगे। एक बार चुनावों के हो जाने के बाद हम एक बार फिर से पूरी प्रक्रिया को शुरू कर देंगे।”
सुल्तान को प्लान इतना पसंद आया कि उन्होंने इसे राज्य का राज-प्लान घोषित कर दिया और अगले हजारों वर्षों तक सुखपूर्वक राज करते रहे। (hindi.downtoearth.org.in/)
-मनु जोसेफ
1980 के दशक में भारत ने कुछ समय के लिए एक किशोर लेग-स्पिनर, लक्ष्मण शिवरामकृष्णन, को लगभग विस्मय के साथ देखा। फिर वे धुंधले पड़ गए और बाद में कमेंटेटर के रूप में लौटे। हाल ही में वे फिर चर्चा में आए, जब उन्होंने कमेंट्री छोड़ते हुए कहा कि उन्हें उनकी गहरी त्वचा के कारण लगातार छोटा दिखाया जाता रहा। वे भारतीयों पर आरोप लगा रहे थे, और इसलिए उनकी बातों में एक असहज सच्चाई थी। उन्होंने कहा कि प्रभावशाली लोग उन्हें कैमरे से दूर रखने की कोशिश करते थे, टॉस के लिए बुलाने में हिचकिचाते थे, और उन्हें यह एहसास कराया जाता था कि वे ‘प्रस्तुत करने योग्य’ नहीं हैं।
जब उन्होंने यह सब सार्वजनिक रूप से कहा, तो यह भी बताया कि उनका पूरा जीवन लगभग ऐसा ही रहा, यहां तक कि तब भी जब वे एक उभरते हुए क्रिकेट सितारे थे। उन्हें अक्सर गरीब समझ लिया जाता था और उसी हिसाब से व्यवहार किया जाता था।
अनुभव कहता है कि शायद यह पूरी कहानी नहीं है कि उन्होंने कमेंट्री क्यों छोड़ी, लेकिन उनके साथ हुए व्यवहार पर आश्चर्य नहीं होता। भारतीय लंबे समय से अपने समाज की रंग-चेतना पर घृणा जताते आए हैं। लेकिन फिर प्रश्न उठता है, यह भेदभाव करता कौन है? उत्तर असुविधाजनक है: हम में से अधिकांश, यहां तक कि वे भी जो इस पर आक्रोश जताते हैं।
यह आक्रोश आत्म-सुधार नहीं है, बल्कि उस आत्म-जागरूकता की भरपाई है कि हम इस प्रवृत्ति को जारी रखेंगे, जहां त्वचा का रंग गरीबी से जोड़ा जाता है और जिन्हें ‘नीचा’ समझ लिया जाता है, उनके साथ सम्मान नहीं किया जाता। भारत के औसतपन की एक अनकही सच्चाई, चाहे वह दंत चिकित्सा हो या न्यूज़ एंकरिंग, यह है कि वह बहुत ‘प्रेज़ेंटेबल’ चेहरों से भरा हुआ है।
शिवरामकृष्णन इस मायने में भाग्यशाली थे कि उनकी प्रतिभा खेल में थी, कला में नहीं, जहां नैतिकता की बातें करने वाले लोग ही वर्ग के दरबान बने रहते हैं। खेल, कम-से-कम सिद्धांतत:, सबसे अधिक वस्तुनिष्ठ क्षेत्र है। फिर भी, विशेषाधिकार यहां भी निर्णायक होता है, विशेषकर 80 के दशक में। और अपने समय के हिसाब से शिवरामकृष्णन सही पृष्ठभूमि से आते थे, सही घर, सही क्लब।
यहीं उनकी पीड़ा का सबसे दिलचस्प पहलू उभरता है: एक उच्च जाति का व्यक्ति, जो अपने शुद्धिकरण के क्षण में वही भाषा बोल रहा है, जिसे हम आमतौर पर वंचितों से जोड़ते हैं, न कि विशेषाधिकार प्राप्त लोगों से।
कुछ लोग इसलिए उनकी पीड़ा से बहुत प्रभावित न हों। लेकिन सच यह है कि भारत में गहरे रंग और उच्च जाति का मेल एक विचित्र संकट पैदा करता है। इसका अर्थ है, ऐसा दिखना जैसे आप दबे-कुचले हैं, जबकि आप उस वर्ग से आते हैं जिसने परंपरागत रूप से दबे-कुचलों को दबाया है।
हाशिए पर पड़े लोगों के पास, तमाम अपमानों के बावजूद, एक सांत्वना होती है, वे अपने जैसे लोगों के बीच होते हैं। उनके आसपास हर कोई उसी अनुभव को साझा करता है। और बढ़ती असमानता के इस दौर में, ऊपरी और निचले वर्गों के बीच संपर्क भी घट गया है। लेकिन एक उच्च जाति का व्यक्ति अपने ही वर्ग में कैद रहता है। अगर वह अपने समूह जैसा नहीं दिखता, तो यह विसंगति एक स्थायी यातना बन जाती है।
दरअसल, शिवरामकृष्णन यह कह रहे हैं कि वे एक ऐसे विशेषाधिकार के वाहक हैं, जो ऐसी त्वचा में कैद है जिसे भारतीय किसी और वर्ग से जोड़ते हैं। जब वे 14 वर्ष के थे, चेपॉक स्टेडियम में भारतीय टीम को नेट्स में गेंदबाजी करने गए थे। एक खिलाड़ी ने, जिसका नाम उन्होंने नहीं लिया, उन्हें जूते साफ करने को कहा, यह समझकर कि वे सहायक स्टाफ हैं।
ऐसी घटनाएं भारतीयों के साथ पश्चिम में भी होती हैं। स्वयं मुझे कम-से-कम तीन बार ड्राइवर समझ लिया गया है, केवल इसलिए नहीं कि मैं सडक़ पर खड़ा रहता हूं, बल्कि इसलिए भी कि मैं कैसा दिखता हूं। लेकिन क्या यह त्रासदी है? अधिक से अधिक, यह थोड़ी झुंझलाहट पैदा करता है, खासकर यदि आप किसी को प्रभावित करना चाह रहे हों, पर पीछे मुडक़र देखें तो यह अक्सर हास्यास्पद लगता है।
जब क्कश्वहृ ने मुझे ‘रंग के लेखकों’ के लिए एक पुरस्कार दिया, तो मैंने अपने स्वीकृति भाषण में लिखा, जिसे समारोह में पढ़ा गया, कि उन्हें मेरा रंग पहले जान लेना चाहिए: ‘यह एक अच्छे कैप्पुचीनो का रंग है।’
-मनीष आजाद
नरसिंहमूर्ती की फिल्म ‘ए बिलियन कलर स्टोरी’ का प्रमुख पात्र 11 साल का हरी अजीज अपनी ‘हिन्दू’ मां पार्वती से कहता है कि उसे अपने पिता इमरान अजीज के लिए डर लगता है, क्योंकि उसके पिता ‘मुस्लिम’ हैं। पार्वती अपने बेटे से कहती है कि तुम तो जानते हो कि तुम्हारे पापा धर्म को नहीं मानते। इस पर बेटे का जवाब न सिर्फ मां को बल्कि दर्शकों को भी हैरान कर देता है। वह कहता है- ‘लेकिन ये बात उन्हें नहीं मालूम।’ नंदिता दास की फिल्म ‘मंटो’ में भी ऐसा ही एक दृश्य है। मंटो के दोस्त श्याम के ये कहने पर कि तुम तो शराब पीते हो, नमाज नहीं पढ़ते, तुम कहां के मुसलमान हुए। इस पर मंटो का जवाब हिला कर रख देता है। मंटो कहते हैं- इतना मुसलमान तो हूँ ही कि दंगे में मारा जा सकूं।
हमने ये कैसा भारत बना डाला, जहाँ एक 11 साल का बेटा अपने बाप के दंगे में मारे जाने की संभावना से भयभीत है। फिल्म में बेटे हरी अजीज के इसी भय से यह सवाल पैदा हुआ कि क्या हमने अपनी सारी कविताएं खो दी हैं।
हरी अजीज के ‘मुस्लिम’ पिता और ‘हिन्दू’ मां एक आदर्श वादी दंपति हैं जो एक ऐसी फिल्म बना रहे हैं जिसमे टाइम मशीन से पीछे जाकर प्रेम के माध्यम से भारत-पाकिस्तान विभाजन को रोक दिया गया है। इसमें यह संकेत साफ है कि आज की बहुत सी समस्याओं की जड़ विभाजन में ही हैं।
आज के नफरत भरे माहौल में ऐसी फिल्म बनाने के रास्ते में आने वाली दुश्वारियां और उनके खुद के जीवन मे इस ‘नए असहिष्णु भारत’ के कारण आने वाली मुसीबतों को एक 11 साल के बच्चे की नजर से देखने का प्रयास किया गया है।
फिल्म का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा यानी बच्चे हरी अजीज की हत्या तक फिल्म ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ रहती है। चूंकि यहाँ तक फिल्म बच्चे की नजर से है और बच्चे रंगों में अर्थ नही तलाशते। रंगों से (और कपड़ो से) किसी को नही पहचानते। शायद इसीलिए यहां तक फि़ल्म ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ है। और उसके बाद रंगीन हो जाती है। इसकी दूसरी व्याख्या यह भी हो सकती है कि हरी अजीज की हत्या के कुछ पहले ही हरी अजीज के पिता इमरान अजीज का आदर्शवाद लगातार हो रही घटनाओं से चकनाचूर हो जाता है। वे फिल्म बनाने का प्लान कैंसिल करके ‘नार्मल’ जीवन में जाने की योजना बना लेते हैं।
लेकिन हरी अजीज ने मानो अपनी जान देकर अपने पिता के आदर्शवाद को फिर से जगा दिया। इसी आशा को दर्शाने के लिए अंत मे कलर का इस्तेमाल किया गया।
बहुत पहले एक फ्रेंच उपन्यास पढ़ा था- ‘तेराज रॉक’। उसका दर्शन ही यह था कि यदि हम नफरत के आधार पर बंटवारा करते हैं तो यह वहीं नहीं रुकता। यह परमाणु चेन रिएक्शन की तरह लगातार अन्य विभाजनों को भी जन्म देता है।
-सनियारा खान
द वॉयस ऑफ हिन्द रजब फि़ल्म को हमारे देश में दिखाना मना है। कम से कम अभी तक तो मना ही है। अगर इस खबर से आपको हैरानी हुई है तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। क्योंकि हमारे देश में ना जाने कितने बच्चे बच्चियों को पाशविक तरीके से रेप करने की खबरें करीब करीब प्रति दिन आती रहती हैं। क्या किसी को कोई खास फर्क पड़ता है? नहीं न? तो फिर एक दूसरे मुल्क ईरान की, और वह भी एक मुस्लिम बच्ची की मौत से हम क्यों दुखी हो! चाहे उसकी मौत कितनी ही दिल दहला देनेवाली ही क्यों न हो!
यह फि़ल्म गाजा के बच्चों और नागरिकों की दुर्दशा को लेकर विश्व भर के लोगों के ध्यान आकर्षण करने में कामयाब हुई है। यह कौथर बेन हानिया द्वारा निर्देशित एवं ऑस्कर के लिए नामांकित एक डॉक्यूमेंटरी फि़ल्म है। ट्यूनीशिया और फ्ऱांस दोनों देश इस फि़ल्म के निर्माण में सहयोगी हैं। ये फि़ल्म सन 2024 में गाजा में इसराइली हमले के दौरान मारी गई एक छ साल की फिलिस्तीनी बच्ची हिन्द रजब के बारे में है। मौत से पहले अपनी जिंदगी के आखिरी पलों में वह किस तरह मदद के लिए गुहार लगाती रही उसी को इस फि़ल्म में दिखाया गया है। इस फि़ल्म को वेनिस फिल्म फेस्टिवल में स्टैंडिंग ओवेशन के साथ ही ग्रैंड ज्यूरी पुरस्कार भी मिला और 98वें अकादमी पुरस्कारों (ऑस्कर) में सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फीचर फि़ल्म के लिए नामांकित हुई है। इस फि़ल्म से जुड़े हुए लोगों को यह फिल्म बनाने से ट्रंप या न्येतनहू भी रोक नहीं पाए। ये फिल्म ट्यूनीशिया,ब्रिटेन , फ्रांस, इटली जैसे कई देशों में रिलीज हो चुकी है। और तो और, इजरायल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सभी लड़ाइयों में शामिल होने वाले देश अमेरिका में भी लोग बिना रोक टोक के ये फिल्म देख रहे हैं। इन देशों में शायद ट्रंप या न्येतनहू दोनों का डर नहीं है। शायद वहां अभी भी लोकतंत्र जि़ंदा है। खैर, अब हम हिन्द रजब के बारे में थोड़ा और जानने की कोशिश करते हैं। गाजा के पास तेल अल हया नामक एक जगह पर इजरायली हमले के बाद एक काले रंग की गाड़ी में कई लाशों के बीच फंसी हुई छोटी सी बच्ची जिसका नाम हिन्द रजब था ,लगातार पेलेस्टाइन रेड क्रसेंट सोसायटी (पी आर सी एस) नामक एक पेरा मेडिकल सेवा से अपनी जान बचाने के लिए विनती कर रही थी। करीब करीब तीन घंटे तक संघर्ष करने के बाद आखिर में वह अपने आप को नही बचा पाई।
-उमंग पोद्दार
पिछले कुछ दिनों में इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो आदेश काफी चर्चा में रहे हैं। एक में हाई कोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप कोई अपराध नहीं है। साथ ही पुलिस ने दोनों लोगों को सुरक्षा देने को कहा।
लिव-इन रिलेशनशिप यानी वो संबंध जिसमें दो लोग बिना विवाह किए साथ में रहते हैं। इस मामले में लिव-इन में रह रहे लडक़े की किसी और लडक़ी से शादी हो रखी थी।
दूसरे फैसले में, हाई कोर्ट ने कहा कि बिना तलाक़ लिए लडक़ा-लडक़ी लिव-इन रिलेशनशिप में नहीं रह सकते।
ये कहते हुए कोर्ट ने उन्हें सुरक्षा देने से मना कर दिया। इस मामले में लडक़ा और लडक़ी दोनों की किसी दूसरे शख़्स से शादी हो रखी थी।
इन दोनों फैसलों से ये सवाल खड़ा होता है कि अगर किसी व्यक्ति की शादी हुई हो तो क्या वो किसी और के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह सकता है?
इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो फैसले
20 मार्च को हाई कोर्ट की एक जज की पीठ ने अपना फ़ैसला दिया। जस्टिस विवेक कुमार सिंह के सामने एक लडक़ा-लडक़ी थे जो साथ में रह रहे थे। उन्होंने कोर्ट में ये कहते हुए याचिका डाली थी कि उन्हें जान का खतरा है।
उनकी माँग थी कि कोर्ट लोगों को उनकी जि़ंदगी में दख़ल देने से रोके और साथ ही उन्हें सुरक्षा दे। इस मामले में दोनों लोगों की शादी अलग-अलग लोगों से हो रखी थी।
कोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति की शादी हो रखी है तो उन्हें किसी और के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के लिए अपने पति या पत्नी से तलाक लेना होगा।
कोर्ट ने कहा कि वो सुरक्षा का आदेश तब दे सकते हैं जब उनके किसी क़ानूनी अधिकार को ठेस पहुँच रही हो। बल्कि, इस मामले में उन्होंने कहा कि अगर वो इस कपल को सुरक्षा दें, तो हो सकता है कि वो ‘द्विविवाह (बाइगेमी) के अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं।’
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि अगर दोनों लोगों पर किसी तरह की हिंसा होती है तो वे पुलिस के पास जा सकते हैं, और पुलिस उनकी क़ानूनन मदद करेगी।
दूसरी ओर, 25 मार्च को इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो जजों की पीठ ने ऐसे ही एक मुद्दे पर अलग फ़ैसला दिया। कोर्ट के सामने एक लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे कपल आए थे। उन्होंने कोर्ट से सुरक्षा मांगी थी।
इस मामले में लडक़ी की माँ ने पुलिस में शिकायत दर्ज की थी कि लडक़े ने बहला-फुसला के लडक़ी को अपने साथ रख लिया था। इस मामले में लडक़े की किसी और महिला से शादी हो रखी थी। इस मामले में कोर्ट ने कहा कि नैतिकता और क़ानून दोनों अपनी जगह है। कोर्ट ने कहा कि एक शादीशुदा व्यक्ति भी किसी और के साथ उनकी मजऱ्ी से रह सकता है।
कोर्ट ने कहा कि लडक़ी बालिग़ है और लडक़े के साथ अपनी मजऱ्ी से रह रही है। सुरक्षा के लिए लडक़ा-लडक़ी पुलिस के पास भी गए थे, लेकिन पुलिस ने कोई क़दम नहीं उठाया था। साथ ही, लडक़ी के माँ-बाप और परिवार वाले इस रिश्ते के ख़िलाफ़ थे और दोनों को अपनी जान का ख़तरा था।
कोर्ट ने उनकी याचिका पर नोटिस जारी किया और कहा कि अभी लडक़ी के परिवार वाले दोनों को किसी तरह की चोट नहीं पहुचायेंगे, ना ही उनके घर में घुसेंगे या उनसे संपर्क बनाने की कोशिश करेंगे। ये भी कहा कि पुलिस की जि़म्मेदारी होगी की वो दोनों को सुरक्षा दे।
दोनों मामलों में कोर्ट के सामने लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे लोगों की सुरक्षा का मुद्दा था। एक में कोर्ट ने उन्हें सुरक्षा दी, और दूसरे में सुरक्षा देने से मना कर दिया।
हालांकि, किसी भी फ़ैसले में कोर्ट ने ये नहीं कहा की लिव-इन रिलेशनशिप ग़ैर-क़ानूनी है। केवल सुरक्षा के लिए अलग-अलग फैसले दिए।
-निक एरिकसन
संयुक्त राज्य अमेरिका और इसराइल ने एक महीने पहले ईरान के खिलाफ जो युद्ध छेड़ा था, वह अब अपनी ही अनिश्चितता में काफ़ी हद तक अनुमानित-सा लगने लगा है।
इसमें भी कोई अचरज नहीं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सोशल मीडिया पोस्ट उथल-पुथल को बढ़ा देती हैं और वैश्विक बाज़ारों को हिला देती हैं, भले ही उनका असर थोड़ी देर के लिए ही क्यों न रहे।
लेकिन सिफऱ् ट्रंप की टिप्पणियां ही इस युद्ध की दिशा तय करने में भूमिका नहीं निभा रहीं- इतिहास भी इसमें असर डालता दिखता है।
संघर्ष शुरू होने के बाद के हफ्तों में, विशेषज्ञ हालात को समझने और यह अंदाजा लगाने के लिए कि आगे क्या हो सकता है, लगातार अतीत की घटनाओं का सहारा ले रहे हैं।
कई ऐतिहासिक उदाहरणों में से तीन अहम घटनाएं ख़ास तौर पर सामने आती हैं।
स्वेज संकट
यमन में ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों ने शुक्रवार को इसराइल पर मिसाइलों की बौछार की- जो ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल युद्ध शुरू होने के बाद पहली ऐसी कार्रवाई थी और इसके साथ ही इस संघर्ष में एक नया मोर्चा खुल गया। ईरान समर्थित इस ताक़तवर समूह की एंट्री ने दुनिया की अर्थव्यवस्था में और ज़्यादा रुकावटें पैदा करने की आशंका बढ़ा दी है, क्योंकि यह सशस्त्र समूह लाल सागर में जहाज़ों की आवाजाही पर हमला करने की क्षमता रखता है- ख़ास तौर पर स्वेज़ नहर के आस-पास।
यह समूह उस अहम जलमार्ग को पूरी तरह बंद नहीं कर सकता जिसके जरिये आम तौर पर दुनिया का करीब 30 फीसदी कंटेनर ट्रैफिक और सभी तरह के सामान के कुल वैश्विक व्यापार का लगभग 15 फीसदी हिस्सा गुजऱता है- यह सच है, लेकिन यह नहर तक पहुंच में गंभीर बाधा जरूर पैदा कर सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार इसके साथ अगर ईरान की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्य में मची उथल-पुथल को भी जोड़ दें, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका असर बहुत तबाही भरा हो सकता है।
इन हालातों की पृष्ठभूमि में, आज की मध्य-पूर्व जंग के दूरगामी नतीजों को समझने के लिए विश्लेषक 70 साल पहले हुए स्वेज़ संकट की ओर इशारा करते हैं।
1956 में जब मिस्र के राष्ट्रपति जमाल अब्देल नासेर ने स्वेज़ नहर का राष्ट्रीयकरण किया था, तो उन्होंने दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक पर नियंत्रण हासिल कर लिया था। जवाब में फ्रांस, ब्रिटेन और इसराइल ने उसे वापस छीनने की नाकाम कोशिश की थी।
ट्रंप - और कभी उनके नजदीकी सहयोगी रहे इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के लिए- इतिहास कुछ कड़वी सीख देता है।
बीबीसी के अंतरराष्ट्रीय संपादक जेरेमी बोवेन कहते हैं, ‘सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने यह दिखा दिया था कि एक वैश्विक ताक़त के रूप में ब्रिटेन का दौर लगभग ख़त्म हो चुका था। प्रथम विश्व युद्ध से मध्य पूर्व पर उसका साम्राज्यवादी दबदबा था, और वह घटना उसके अंत की शुरुआत थी।’
तेहरान और हूती जिस तरह की रणनीतियां आज़मा रहे हैं- यानी वैश्विक अर्थव्यवस्था की अहम आर्थिक धमनियों तक पहुंच को सीमित करना- उसमें नासेर की प्रतिक्रिया की झलक साफ दिखाई देती है।
अमेरिकी इतिहासकार अल्फ्रेड डब्ल्यू मैक्कॉय बताते हैं कि जब तक एंग्लो फ्रेंच सेनाएं स्वेज़ नहर के उत्तरी सिरे पर उतरीं, नासेर दर्जनों जहाज़ डुबो चुके थे, जिससे नहर बंद हो गई थी और यूरोप को फ़ारस की खाड़ी के तेल क्षेत्रों से जोडऩे वाली जीवन रेखा जैसा रास्ता लगभग कट गया था।
सोवियत संघ के साथ शीत युद्ध में एक और ख़तरनाक मोर्चा खुल जाने की चिंता के चलते तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति आइजऩहावर ने भी दख़ल दिया और ब्रिटेन और फ्रांस को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
मैक्कॉय लिखते हैं, ‘उस समय तक ब्रिटेन पर संयुक्त राष्ट्र में प्रतिबंध लग चुके थे, उसकी मुद्रा ढहने के कगार पर थी, उसकी साम्राज्यवादी शक्ति का रुतबा हवा हो चुका था और उसका वैश्विक साम्राज्य ख़त्म होने की राह पर था।’
हालांकि, बोवेन कहते हैं कि आज के संघर्ष की उससे पूरी तरह तुलना नहीं की जा सकती, ‘मैं अमेरिका की मौजूदा ताकत की तुलना दूसरे विश्व युद्ध के बाद वाले ब्रिटेन से सीधे तौर पर नहीं कर रहा हूं। लेकिन मैं यह कह रहा हूं कि हर ताक़तवर देश का उत्थान भी होता है और पतन भी। और चीन के उभार का सामना कर रहे अमेरिका के संदर्भ में अगर भविष्य में लोग अमेरिकी गिरावट की बात करने लगें- तो इतिहासकार इस युद्ध को शायद उसी रास्ते का एक पड़ाव मानें; एक ऐसी जंग, जिसमें नतीजों पर ज़्यादा विचार किए बना कूदा गया था।’
संभावित नतीजों को समझने के लिए, पिछले 70 वर्षों में इतिहास ने जो और सबक दिए हैं, उन पर नजऱ डालना उपयोगी होगा।
-सिद्धार्थ ताबिश
सरकारें तुम्हें शादी करने और बच्चे पैदा करने के लिए उकसाती हैं। साहित्यकार तुम्हें प्रेम और परिवार के मायने समझाते हैं। तुम धड़ाधड़ शादी करके बच्चे पैदा करते हो क्योंकि तुम्हें ये समझाया गया है कि बिना बच्चों के जीवन बेकार है। बच्चे बुढ़ापे का सहारा होते हैं। और जो ये तुम्हें समझाते हैं वो बड़े बड़े अस्पताल खोलते हैं और तुम्हारा इंश्योरेंस करते हैं ताकि तुम्हें बेहतर इलाज मिले और अच्छी देखभाल हो.. फिर अगर उन्हें ही तुम्हारी देखभाल करनी थी तो बच्चे क्या तुमने सिर्फ तुम्हें अस्पताल भेजने के लिए पैदा किए थे?
अब घरों में तुम्हारे झाड़ू पोछा करने वाली नौकरानी आती है, खाना बनाने वाली भी आती है, तुम्हें देखकर भी समझ नहीं आता है कि तुम्हारे पास बस सिर्फ पैसा होना था और तुमने जो सारा जीवन बच्चों को पालने, पढ़ाने, शादी करने और उन्हें सेटल करने में बर्बाद किया और उनपर पैसा खर्च किया, उस से तुम्हारा बुढ़ापा दस नौकर रख के बिंदास कट सकता था?
मैं ये नहीं कहता कि तुम बच्चे न पैदा करो और शादी न करो मगर इस व्यवस्था को ‘अनिवार्य’ व्यवस्था क्यों समझ कर नशे में जिए जा रहे हो?
बच्चे बुढ़ापे का सहारा होते हैं इस मानसिकता से बाहर तो आओ कम से कम.. क्योंकि इन्हीं बच्चों के लिए एलपीजी और पेट्रोल की लाइन में तुम्हें लगना पड़ता है। तुम्हारा जीवन नर्क बना हुआ है बच्चों को पालने, पोसने, पढ़ाने और शादी करने में। तुम 18 छोड़ो 45 साल के बच्चे को भी अपने पास चिपकाए रखना चाहते हो तो ये परिवार की व्यवस्था तुम्हारे लिए है ही नहीं.. ये उनके लिए होती है जो अपने 18 साल के बच्चे को घर से लात मारकर भगा देते हैं और स्वयं जीते हैं और उसे जीने देते हैं। परिवार की अवधारणा तुम भारतीयों के लिए है ही नहीं क्योंकि तुम्हारी समझ ही इतनी विकसित नहीं हो पा रही है किस उम्र में तुम्हें क्या करना है
शादी की पक्की अवधारणा तुमने ब्रिटिश लोगों से सीखी.. दहेज लेने और देने की अवधारणा तुम्हें ब्रिटिश से सीखी। लडक़ा पैदा करने का चलन तुमने ब्रिटिश से सीखा.. मगर वो ये सब तुमको सिखा के आगे बढ़ गए, उनका समाज विकसित हो गया और तुम अभी भी कोर्ट में माई लॉर्ड माई लॉर्ड करते घूम रहे हो और अपने बच्चों को छुट्टी के एप्लीकेशन में भी ‘आई बेग टू से’ लिखवाते हो। शादी, कुंवारापन, बच्चे, और बच्चे बुढ़ापे का सहारा ये ब्रिटिश टाइम के विक्टोरियन ज़माने की चीज़ें हैं.. महारानी विक्टोरिया के समय शादी के बिना किसी स्त्री को छूना पाप था और शादी करना अनिवार्य था.. भारत में ये सब नहीं था.. तुम अंग्रेजों की हज़ारों साल पुरानी अवधारणा को कॉपी किए पड़े हो और इस से बाहर ही नहीं निकल पा रहे हो
तुम इस्लामिक और ब्रिटिश अवधारणाओं और कानून के बीच फंसी एक अजीब सी विचित्र प्रजाति बन चुके हो.. अंग्रेजों ने आईएएस और पीसीएस बनाने के लिए इतना मुश्किल इम्तेहान जान कर बनाया था ताकि ये नौकरी भारतीयों को न मिले.. कोई एक पास कर जाता था तो इसे ये नौकरी देते थे और बाकी अपने अंग्रेजों को ये बिना किसी इम्तेहान के अधिकारी बनाते थे.. तुम आज भी अपने बच्चों को अंग्रेजों की तजऱ् पर वही मुश्किल एग्जाम पास करवाने के लिए मरे जा रहे हो और तुम्हें अभी भी ये लगता है कि किसी को अधिकारी बनने के लिय दुनिया की सारी किताबें रट कर एग्जाम पास करना चाहिए? कोई अधिकारी इतिहास की किताबें रट कर आया है तो वो एक जिले को चलाने के क़ाबिल हो गया है?
- संजय श्रमण
ये शोभा बाई हैं। बैतूल जिले के एक छोटे से गाँव में, 2022 में इनसे मुलाक़ात हुई थी।
कोविड के बाद लॉकडाउन जब उठा था, तब गाँव में रिवर्स माइग्रेशन और उसका इकोनॉमिक इम्पैक्ट देखने के लिए गांव जाना हुआ था। महामारी में इनके परिवार और रिश्तेदारों में कुछ लोग गुजऱ गए थे । कई लोग शहर छोडक़र जो गाँव लौटे तो फिर वापस शहर जाने की हिम्मत नहीं हुई।
इनका एक बेटा दसवीं तक पढ़ाई करके गुजरात चला गया था। एक बड़े शहर में रेलवे में खाना सर्व करता था। बड़े लोगों से हर बार दस बीस रुपए करके कुछ बख्शीश भी मिल जाती थी। किसी तरह ग्रामीण अनपढ़ पत्नी को अपने साथ ले गया। पत्नी झाड़ू पोंछा करने लगी। दोनों की मेहनत से दाल रोटी चलने लगी।
एक बड़े से नाले के किनारे, की एक झुग्गी झोपड़ी में दो कमरे किराए से लेकर रहने लगे। दो बेटे हुए, दोनों को एक छोटे से इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ा रहे थे। हज़ार पंद्रह सौ रुपए माँ-बाप को भी भेज देते थे।
गांव लौटते थे तो प्लास्टिक के खिलौने और फुटपाथ की दुकानों से घर गृहस्थी का सस्ता सा सामान लेकर रिश्तेदारों में कभी कभार बांट देते थे। शोभा बाई ने बताया कि उनके बेटे को लोग बड़ी इज़्ज़त से देखने लगे थे। सब लोग उससे सलाह लेते थे। बेटा "बाबूजी" बन गया था। बाबूजी के साथ शोभा बाई की भी बड़ी इज्जत हो गई थी।
फिर कोविड आया।
ट्रेन में खाना ही नहीं बल्कि ख़ुद ट्रेन ही बंद हो गई। सबको लौटना पड़ा। बेटा जो एक बार लौटा तो फिर जाने की हिम्मत नहीं हुई। अब ना वो नौकरी रही, ना वो दोस्त रहे जो बुला सकें। बेटा गांव लौटकर एकदम मायूस हो गया। गांव में कोई रोजगार नहीं। फिर से खेती मजदूरी शुरू हुई। महुआ, तेंदूपत्ता, लकड़ी, जड़ीबूटी, सब्जी भाजी। बस फिर से वहीं लौट आए जहाँ से चले थे। लेकिन अब दो बच्चे भी थे जिन्होंने शुरुआती बारह पंद्रह साल शहर का जीवन देखा और अब फिर से गांव में आ पहुँचे।
शोभा बाई कहती हैं कि छोटे बच्चे जब पहली बार गांव आए थे तो उनके बोलने का अंदाज़ अलग था। अब साल भर के भीतर ही वे गांव की गालियाँ और रंग ढंग सीख गए हैं। पहले बच्चे "अंकल जी अंटी जी" करके बात करते थे, अब फिर से "माँ-भेन की" करने लगे हैं। पहले बच्चे पढ़ लिख के डॉक्टर इंजीनियर बनना चाहते थे, अब उनका सपना है कि पास के क़स्बे में साप्ताहिक हाट में जूते-चप्पल की दुकान लगायेंगे।
वे अब लोडिंग रिक्शा खरीदने के लिए लोन ले रहे हैं।
-गोकुल सोनी
महासमुंद जिले के सिरपुर से लगभग पंद्रह किलोमीटर आगे घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच सिंहाधुर्वा पहाड़ी स्थित है। इस पहाड़ी के ऊपर एक ऐतिहासिक गुफा है जिसे ग्रामीण अलग-अलग नामों से जानते हैं। चाँदादाई गोंड गुफा, कटंगा खोल, सिंघनगढ़ पहाड़ी पाड़ादाह।
रविवार को दो मित्रों के साथ मुझे इस गुफा तक जाने का अवसर मिला। यह यात्रा बेहद कठिन, जोखिम भरी लेकिन उतनी ही रोमांचक भी रही। सच कहूं तो यदि आपकी उम्र चालीस के पार है, तो वहां जाने से पहले दो बार सोच लीजिये। यह मेरी व्यक्तिगत सलाह है।
इतिहास और मान्यताओं का संगम
इतिहासकार इस गुफा को नागार्जुन गुफा के रूप में भी बताते हैं। उनका मानना है कि यह एक प्राचीन बौद्ध स्थल है और यहां बौद्ध आचार्य नागार्जुन ने साधना की थी। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि चीनी यात्री व्हेनसांग के यात्रा-वृत्तांतों में भी इसका उल्लेख मिलता है।
सन 2015 में जब इस स्थल की जानकारी दलाई लामा तक पहुंची तो वे भी यहां आने के लिए तैयार हो गये थे। उस समय प्रशासन का पूरा अमला इस व्यवस्था में लग गया था।
वहीं दूसरी ओर गोंडवाना समाज के लोग इस दावे को खारिज करते हुए कहते हैं कि यह स्थान सदियों से उनका देवस्थल रहा है।
लेकिन मैं इन ऐतिहासिक विवादों में नहीं पड़ना चाहता। मैं केवल अपनी उस कठिन और रोमांचक यात्रा का अनुभव साझा करना चाहता हूं।
सिरपुर से जंगल की ओर
हम तीनों मित्र कार से सिरपुर पहुंचे और रात वहीं बिताई। अगली सुबह गुफा तक जाने के लिए निकल पड़े। रास्ते में लोगों ने बताया कि वहां तक कोई चार पहिया वाहन नहीं जा सकता।
फिर भी जिज्ञासा हमें आगे खींचती रही। जैसे ही हम सिरपुर-कसडोल मुख्य मार्ग से बाईं ओर जंगल की तरफ मुड़े, फॉरेस्ट विभाग के बैरियर पर हमें रोक लिया गया। चौकीदार ने साफ कह दिया, यहां बाहरी लोगों का प्रवेश वर्जित है।
हमारे एक मित्र थोड़े होशियार निकले। उन्होंने तुरंत कहा-
“हमें जंगल नहीं जाना है, हम तो बोरिद गांव में ध्रुव जी के यहां लड़की देखने जा रहे हैं।”
हमारी यह बात सुनकर चौकीदार मुस्कुराया और बैरियर खोल दिया। इस तरह हमारी यात्रा का पहला अवरोध पार हुआ।
मोटरसाइकिल से शुरू हुआ असली सफर
गांव पहुंचने पर पता चला कि वहां से आगे कोई रास्ता ही नहीं है। तब हमने गांव के दो युवकों से हमें गुफा तक पहुंचाने का आग्रह किया। उनकी मोटरसाइकिल में पास की किराना दुकान से पेट्रोल डलवाया और हम उनके साथ निकल पड़े।
रास्ते में सात छोटे-छोटे नाले पड़े। गर्मी के कारण उनमें पानी तो नहीं था, लेकिन रेत इतनी थी कि कई बार हमें उतरकर मोटरसाइकिल को पीछे से धक्का लगाना पड़ा।
इस दौरान रास्ते में पेड़ों से गिरे पके तेंदू फल खाने का आनंद भी मिला। ऊपर से महुए का मौसम था, इसलिए पूरे जंगल में फैली महुए की मादक सुगंध मन को प्रफुल्लित कर रही थी।
आठ किलोमीटर की पगडंडी और थकान
काफी संघर्ष के बाद हम उस गांव से लगभग आठ किलोमीटर पगडंडी रास्ता पार करते हुए एक पहाड़ी के नीचे पहुंचे।
यहीं मोटरसाइकिल छोड़कर हमें पैदल चढ़ाई शुरू करनी पड़ी। सामने जो पहाड़ी थी, वह लगभग सीधी चढ़ाई वाली थी। न कोई सीढ़ी, न कोई रास्ता सिर्फ पथरीली ढलान।
हर थोड़ी दूर पर बैठकर सांस लेना पड़ रहा था। लगभग डेढ़ किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ने में हमें पांच-सात बार रुकना पड़ा। दोपहर हो चुकी थी। शरीर जवाब देने लगा था। घुटनों ने मानो काम करना बंद कर दिया था। एक समय तो मैंने तय कर लिया कि अब आगे नहीं जाऊंगा। लेकिन साथ के लड़कों के उत्साह ने हिम्मत बंधाई और मैं फिर चढ़ने लगा।
जंगल का स्वाद : तेंदू और ठंडा पानी
हम दो बोतल पानी साथ ले गये थे, लेकिन वह गर्म हो चुका था। गांव के लड़के समझदार निकले। उन्होंने एक प्लास्टिक कैन को कपड़े में लपेटकर उसे लगातार पानी से भिगोकर रखा था, जिससे उनका पानी ठंडा बना हुआ था। उसी से हम थोड़ी-थोड़ी राहत पा रहे थे।
रास्ते में कई तेंदू के पेड़ दिखे। हमने अपने पुराने तरीके से तेंदू गिराने का जुगाड़ भी किया, एक बड़ा पत्थर लाकर पेड़ के तने पर जोर से पटका। कंपन से ऊपर की डालियों से पके तेंदू नीचे गिरने लगे। जंगल के बीच यह छोटा-सा आनंद भी किसी दावत से कम नहीं था।
आखिरकार गुफा तक पहुंच गये
कई मुश्किलों के बाद हम आखिरकार गुफा तक पहुंच ही गये। अंदर घुप्प अंधेरा था। मोबाइल की रोशनी के सहारे धीरे-धीरे भीतर गए। मन में थोड़ा डर भी था कहीं सांप, बिच्छू या कोई जंगली जानवर न हो।
लेकिन हाल ही में नवरात्रि के दौरान यहां ज्योति कलश स्थापित किया गया था, इसलिए गुफा अपेक्षाकृत साफ थी। मैंने भी वहां कुछ देर ध्यान लगाने की कोशिश की, लेकिन मेरा चंचल मन ध्यान से ज्यादा अच्छी तस्वीरें खींचने में लगा हुआ था।
दलाई लामा और सांप की कहानी
इसी दौरान गांव के कुछ और युवक वहां आ पहुंचे। उन्होंने गुफा से जुड़ी कई रोचक कहानियां सुनाईं। उनका कहना था कि जब दलाई लामा यहां ध्यान लगाने बैठे थे, तभी अचानक ऊपर से एक सांप उनके पास आकर गिर पड़ा। किसी अनहोनी की आशंका से तुरंत उनका ध्यान समाप्त कर उन्हें बाहर ले जाया गया। लड़कों ने यह भी बताया कि कभी-कभी इस गुफा में मादा भालू अपने बच्चों के साथ रहती है। गांव वालों ने उसे कई बार देखा है। इतनी कहानियां सुनकर हमारा साहस थोड़ा डगमगाने लगा।
डर और रोमांच के बीच वापसी
इतनी बातें सुनने के बाद हमने तय किया कि अब ज्यादा देर यहां रुकना ठीक नहीं। इसलिए कुछ तस्वीरें लेकर हम वापस लौटने लगे। इस तरह हमारी यह जोखिम भरी लेकिन यादगार यात्रा पूरी हुई।
सच कहूं तो यह सफर थकान से ज्यादा अनुभवों से भरा था। जंगल की खुशबू, पहाड़ की चुनौती, तेंदू का स्वाद और गुफा का रहस्य, सब कुछ आज भी मन में ताजा है।
(लेखक छत्तीसगढ़ के एक सबसे वरिष्ठ न्यूज़ फोटोग्राफर हैं।)
-दिनेश श्रीनेत्र
बहुत सारे मोटिवेशनल स्पीकर कहते हैं, बड़ा सोचो, कामयाब बनो, सफलता हासिल करने के लिए रात-दिन मेहनत करो, पर दिलचस्प बात है कि जिसे हम बड़ी सोच या सफलता कहते हैं, असल में वह हमारे जीवन पर एक खास जीवन-दृष्टि का आरोपण होता है।
सफलता का सीधा अर्थ होता है कि आप बहुत सीमित संसाधनों पर दूसरों को पीछे छोडक़र कब्जा कर लें। इसका यह अर्थ कभी नहीं होता है कि आप किसी जरूरतमंद को उन संसाधनों तक पहुँचने का रास्ता तैयार करें। इसका यह अर्थ नहीं होता कि आप संसाधनों को अंतिम जरूरतमंद तक पहुँचाने के बारे में सोचें।
बड़ी सोच हमेशा कैपटिलिस्ट इकॉनमी से जुड़ी होती है, जहां उसके अर्थ बड़ी पूंजी या सोसाइटी में कोई प्रभावशाली जगह हासिल करने से जुड़े होते हैं। कुल मिलाकर हम बचपन से लेकर अंतिम समय तक दूसरों से आगे निकलने और उनको नियंत्रित करने की मानसिकता लिए सारा जीवन बिता देते हैं। ऐसी दुनिया में यह सोचना कि युद्ध नहीं होंगे, लोग आपस में मिलजुलकर रहेंगे, प्रेम और खुशियां बाटेंगे- बेहद हास्यास्पद है।
मनुष्य जबसे प्रगति के रथ पर सवार हुआ है उसने जहाँ-तहाँ बबूल के पेड़ ही बोए हैं। इसलिए ‘सफल होना’ या ‘बड़ा सोचना’ दरअसल शुगर-कोटेड जहरीले विचार हैं, जिनका निहितार्थ है ‘छीन लेना’, ‘कब्जा करना’, ‘गुलाम बनाना’, ‘धक्का देकर आगे निकलना’, ‘हड़प लेना’। तारीख़ के साथ हम सभ्य नहीं हुए हैं, हमारे सिर्फ औजार बदले हैं। हमारे हाथों में बस पत्थर की जगह भाले, उनकी जगह बंदूकें और उनकी जगह प्रबंधन और कूटनीति ने ले ली है। हमें आज भी जमीनों पर कब्जा करना है, हम अब लोगों को ताकत का सहारा लेकर गुलाम नहीं बनाते, हम ऐसी परिस्थियां पैदा कर देते हैं कि लोग गुलाम बन जाएं।
बीते 100 सालों की आधुनिक सभ्यता में भयानक नरसंहार हुए हैं, प्रत्यक्ष भी परोक्ष भी। इस सभ्यता ने बहुतों को मारा है और बहुतों को मरने पर मजबूर किया है। अब हमारे भीतर उसका कोई अपराधबोध भी नहीं है। टीएस एलियट ने ‘द वेस्टलैंड’ के अंतिम खंड में बृहदारण्यक उपनिषद लिए गए सूत्र ‘दत्त, दयध्वम्, दम्यत:’ को आधुनिक सभ्यता के आध्यात्मिक विखंडन के विरुद्ध एक संक्षिप्त नैतिक प्रतिपाठ की तरह प्रस्तुत किया था, जो कामना, अलगाव और अराजकता से निर्जीव सभ्यता के लिए था। ब्रिटिश आलोचक एफआर लीविस ने कहा था यह आधुनिक यूरोपीय संस्कृति की आत्मिक दरिद्रता के विरुद्ध अनुशासनात्मक हस्तक्षेप था, जो व्यक्तिगत आत्मसंयम से शुरू होकर सामूहिक मानवीय करुणा और त्याग तक फैलता है।
‘शांति’के मुखौटे में आत्मसमर्पण की मांग
डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के साथ ही पश्चिम एशिया की कूटनीति में ‘शांति’ शब्द का इस्तेमाल एक बार फिर तेजी से बढ़ा है। लेकिन वाशिंगटन के गलियारों से जो ‘शांति योजना’ छनकर आ रही है, वह असल में शांति का प्रस्ताव नहीं बल्कि ऐसी मांगों की एक फेहरिस्त है जो ईरान से बिना शर्त आत्मसमर्पण के बराबर है। यह कोई बराबरी का समझौता नहीं है, बल्कि एक संप्रभु राष्ट्र को पूरी तरह घुटनों पर लाने की एक सोची-समझी रणनीति है।
इस योजना के तहत तेहरान से सिर्फ उसके परमाणु संवर्धन कार्यक्रम को ही खत्म करने की मांग नहीं की गई है, बल्कि यह उससे उसके रक्षा तंत्र की रीढ़—बैलिस्टिक मिसाइलें और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों के नेटवर्क-को भी पूरी तरह ध्वस्त करने को कहता है। एक ऐसे देश के लिए जिसकी वायुसेना दशकों पुरानी हो चुकी है और जो आधुनिक युद्ध के मोर्चे पर टिकने की स्थिति में नहीं है, उसके लिए बैलिस्टिक मिसाइलें ही पारंपरिक प्रतिरोध की आखिरी और सबसे मजबूत ढाल हैं।
रक्षात्मक ढाल और ‘अस्तित्व का संकट’
ईरान की सैन्य स्थिति का बारीकी से अध्ययन करें तो पता चलता है कि वह तकनीकी रूप से अपने पड़ोसियों और अमेरिकी सहयोगियों से बहुत पीछे है। 1970 के दशक के विमानों के सहारे कोई देश अपनी सीमाओं की रक्षा नहीं कर सकता। ऐसे में ईरान ने पिछले दो दशकों में अपनी पूरी ऊर्जा और संसाधन मिसाइल तकनीक को विकसित करने में लगाए हैं।
जब वाशिंगटन का सबसे करीबी सहयोगी, तेल अवीव (इजऱाइल), सीधे ईरान के सर्वोच्च नेता को निशाना बनाता है, तो यह तेहरान के लिए सिर्फ एक हमला नहीं बल्कि उसके अस्तित्व को मिटाने की सीधी धमकी होती है। ऐसी स्थिति में, किसी भी देश से यह उम्मीद करना कि वह अपनी मिसाइलों के जखीरे को नष्ट कर देगा, कूटनीतिक मूर्खता है। अपनी मिसाइलों को छोडऩे का मतलब है-खुद को पूरी तरह निहत्था करके दुश्मन के रहम-ओ-करम पर छोड़ देना। ट्रंप की यह मांग असल में ईरान को एक ‘सुरक्षित जेल’ में तब्दील करने जैसी है, जहाँ उसके पास विरोध करने की कोई ताकत शेष न रहे।
ईरान की ‘फॉरवर्ड डिफेंस’ रणनीति
ट्रंप की प्रस्तावित शांति योजना की दूसरी सबसे बड़ी और विवादित मांग ईरान के क्षेत्रीय नेटवर्क, जिसे ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ कहा जाता है, को पूरी तरह भंग करने की है। रूज़बेह पारसी के अनुसार, ईरान के लिए ये केवल आतंकवादी या मिलिशिया गुट नहीं हैं, बल्कि उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा का अनिवार्य हिस्सा हैं। ईरान की सैन्य रणनीति हमेशा से ‘फॉरवर्ड डिफेंस’ की रही है-यानी अपनी सीमाओं से दूर दुश्मन को उलझाए रखना।
हमास, हिजबुल्लाह और हूतियों के साथ ईरान का गठबंधन उसे एक ऐसी ‘अदृश्य शक्ति’ देता है, जिसका मुकाबला पारंपरिक सेनाएं आसानी से नहीं कर सकतीं। ट्रंप चाहते हैं कि ईरान इन ताकतों से अपना नाता तोड़ ले, लेकिन तेहरान के लिए इसका मतलब होगा अपनी ‘रणनीतिक गहराई’ को खो देना। पारसी तर्क देते हैं कि किसी भी संप्रभु देश से यह उम्मीद करना कि वह अपने दशकों पुराने सुरक्षा नेटवर्क को बिना किसी ठोस सुरक्षा गारंटी के त्याग देगा, हकीकत से परे है। यह मांग ईरान को मध्य-पूर्व के नक्शे पर पूरी तरह अलग-थलग करने की एक साजिश है, जिसे तेहरान अपनी ‘आत्महत्या’ की तरह देखता है।
-सुशांत आचार्य
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा आबकारी नीति 2026-27 को 01.अप्रैल 2026 से लागू किया जाना है। नए आबकारी नीति के तहत प्लास्टिक बोतलों में शराब की बिक्री होनी शुरू हो जाएगी। यह निर्णय केवल एक नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय विमर्श का विषय भी है। छत्तीसगढ़ सरकार का निर्णय एक तरफ राज्य के राजस्व को मजबूत करने की कोशिश है, तो वहीं दूसरी तरफ जनस्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की आजीविका जैसे प्रश्न भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। जिनको अनदेखा नहीं किया जा सकता।
सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि इस विषय पर चर्चा का उद्देश्य किसी भी रूप में शराब सेवन का समर्थन या उसे बढ़ावा देना नहीं है। मेरा मानना है कि शराब का सेवन स्वास्थ्य और समाज, दोनों के लिए हानिकारक है। यहां प्रस्तुत विचार केवल एक नीतिगत निर्णय के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण भर हैं।
सरकार का अपना तर्क है। कांच की बोतलों की तुलना में प्लास्टिक सस्ता, हल्का और परिवहन के लिए अधिक सुविधाजनक है। इससे न केवल पैकेजिंग लागत घटेगी, बल्कि दूर-दराज के इलाकों तक शराब की आपूर्ति भी आसान होगी। कांच की बोतलों के टूटने से होने वाले नुकसान में कमी आएगी और सभी तरह से बिक्री बढऩे की संभावना बनेगी। इन सभी का सीधा असर राज्य के राजस्व पर पड़ेगा, क्युकी शराब पहले से ही कई राज्यों के लिए आय का प्रमुख स्रोत है। इस दृष्टि से यह निर्णय व्यावहारिक और आर्थिक रूप से आकर्षक लग सकती है।
हालांकि, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि देश के कुछ अन्य राज्यों ने स्वास्थ्य और पर्यावरण की चिंता को देखते हुए प्लास्टिक बोतलों में शराब बिक्री पर प्रतिबंध लगाया है। जैसे महाराष्ट्र में प्लास्टिक बोतलों में शराब बिक्री पर रोक लगाई गई थी, वहीँ मध्य प्रदेश में भी न्यायालय के निर्देशों के बाद इस पर सख्ती बरती गई। इन निर्णयों के पीछे प्रमुख कारण यही थे कि प्लास्टिक में शराब रखने से संभावित स्वास्थ्य जोखिम बढ़ते हैं और पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। चूँकि आबकारी नीति राज्य तय करते हैं इसलिए राज्यों के बीच आबकारी नीति में एकरूपता का अभाव है और नीतिगत दृष्टिकोण अलग अलग हैं।
लेकिन किसी भी नीति का मूल्यांकन केवल उसके तात्कालिक आर्थिक लाभों के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके दीर्घकालिक प्रभावों को समझना भी उतना ही जरूरी है। प्लास्टिक बोतलों में शराब रखने से रासायनिक तत्वों के घुलने, जिसे ‘लीचिंग’ कहा जाता है, का खतरा बना रहता है। विशेष रूप से अधिक तापमान में यह प्रक्रिया तेज हो जाती है। वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे रसायन शरीर के हार्मोनल संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं और लंबे समय में गंभीर बीमारियों, यहां तक कि कैंसर, का कारण बन सकते हैं। पानी के बोतलों को लेकर वैज्ञानिकों ने रिसर्च में यह पाया भी है। इसलिए कह सकते हैं की अल्पकालिक राजस्व लाभ दीर्घकालिक स्वास्थ्य संकट में बदल सकता है।
-अरविंद दास
इस बार ‘बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म’ के लिए ऑस्कर पुरस्कार जोआकिम ट्रायर निर्देशित ‘सेंटिमेंटल वैल्यू’ को मिला. यह पहली नॉर्वेजियन फिल्म है जिसे यह सम्मान मिला है. भारत की तरफ से नीरज घेवान की फिल्म ‘होमबाउंड’ की भी दावेदारी थी, पर अंतिम नामांकन में फिल्म जगह नहीं बना पाई.
बहरहाल, ट्रायर की फिल्म स्थानीय होते हुए अपनी अपील में वैश्विक है. असल में, पिता-पुत्री के संबंधों के इर्द-गिर्द घूमती यह फिल्म घर, परिवार, रिश्ते, अहं और अकेलेपन को टटोलती है. नोरा (रेनेट रेंसवे) और अग्नेस (इंगा लिलिआस) दो बहनें है जिनके अपने पिता गुस्ताव (स्टेलन स्कार्सगार्ड) के साथ संबंध मधुर नहीं रहे. अपनी पत्नी से तलाक के बाद गुस्ताव, जो कि एक सफल फिल्मकार हैं, नार्वे छोड़ कर स्वीडन में रहने लगे, पर पत्नी की मौत के बाद उनका साक्षात्कार अपनी बेटियों से होता है. नोरा एक सफल थिएटर कलाकार है. जहाँ अग्नेस का अपना परिवार है वहीं नोरा अंतर्मन के द्वंदों से लड़ती अकेली रहती है. गुस्ताव लंबे समय के अंतराल के बाद एक पटकथा पर काम कर रहे हैं जो आत्मकथात्मक है और नोरा को ध्यान में रख कर ही उन्होंने लिखा है. वे चाहते हैं कि नोरा इस फिल्म में काम करे पर नोरा यह कहते हुए इंकार कर देती है ‘हमारे बीच संवाद ही कहां हैं’!
फिल्म नोरा के अंतर्मन पर पिता की अनुपस्थिति और भावात्मक विलगाव के प्रभावों को संवेदनशीलता से उकेरती है. जहां अग्नेस अपेन पिता के प्रति सहृदय है, वहीं नोरा निर्मम. यहां संवाद से ज्यादा संवादहीनता है. गुस्ताव नशे में फोन पर नोरा से कहते हैं: ‘मैं संवेदनशील हूँ, जो कि तुम भी हो और इन अर्थों में हम समान हैं.’ गुस्ताव उसी पुश्तैनी घर में फिल्म को शूट करना चाहते हैं, जिसे वो छोड़ चुके हैं. घर का बिंब फिल्म में बार-बार, विभिन्न दृश्यों में अगल तरीके से आता है.
एक भावनात्मक लगाव किरदारों का इस घर से है. सारा ड्रामा घर के इर्द-गिर्द ही घटता है. जहाँ निर्देशक काव्यात्मक दृश्यों को रचता है, वही अभिनय से कलाकार सफेद और स्याह के बीच के स्पेस को जीवन के रंग से भरता है. और जहाँ कहीं खाली स्पेस बचा रहता है, उसके लिए निर्देशक ने बैंकग्राउंड संगीत का कुशलता से इस्तेमाल किया है.
मशहूर फ्रेंच फिल्म निर्दशक रॉबर्ट ब्रेसां ने एक जगह नोट किया है: ‘बिंब और ध्वनियाँ उन लोगों की तरह होती हैं जो यात्रा में एक-दूसरे से परिचित होते हैं और बाद में अलग नहीं हो पाते.’ इस फिल्म की यात्रा में दो बहनों के बहिनापे, एक संवेदनशील पिता और पुत्री की ‘कलात्मक स्वतंत्रता’, अहं, बचपने में मनोमस्तिष्क पर पड़े प्रभावों को बिना वाचाल हुए कैमरा सहजता से बिंबों (फ्लेशबैक) और ध्वनियों के सहारे सामने लाता है. आखिर में, नोरा अपने पिता की फिल्म में काम करती है और दोनों की आपसी दूरियाँ सिमट आती है.
ट्रायर की फिल्म ‘द वर्स्ट पर्सन न द वर्ल्ड’ में रेनेट रेंसवे की अदाकारी को सबने सराहा था. एक बार फिर से इस फिल्म में अपनी प्रतिभा से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने लोगों ध्यान खींचा है. साथ ही स्टेलन स्कार्सगार्ड का अभिनय उत्कृष्ट है. (प्रोफेसर, डीवायपीआईयू, पुणे)
-पॉरिया महरूयान
ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बगऱ गालिबाफ अब एक बहुत ही अहम भूमिका निभा रहे हैं। ख़बरों के मुताबिक, उन्हें ईरान युद्ध में अमेरिका के साथ बातचीत का काम सौंपा गया है।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने एक पाकिस्तानी सूत्र के हवाले से बताया कि विदेश मंत्री अब्बास अरागची के साथ-साथ गालिबाफ का नाम भी इसराइल की ‘हिट लिस्ट’ से हटा दिया गया था।
इस सूत्र ने बताया, ‘इसराइलियों के पास उनके ठिकाने की जानकारी थी और वे उन्हें मारना चाहते थे। हमने अमेरिका से कहा कि अगर इन्हें भी मार दिया गया, तो फिर बातचीत करने के लिए कोई बचेगा ही नहीं। इसलिए, अमेरिका ने इसराइल से पीछे हटने को कहा।’
ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले देशों में पाकिस्तान भी है।
अमेरिकी मीडिया आउटलेट ‘पॉलिटिको’ के अनुसार, 64 साल गालिबाफ ने भले ही दुश्मनों को चेतावनी दी हो कि वे ‘अपनी ज़मीन की रक्षा करने के हमारे इरादे’ को परखने की कोशिश न करें।
उन्होंने एक्स पर ‘लगातार हमले’ करने की धमकी भी दी है, फिर भी कुछ अमेरिकी अधिकारी उन्हें एक ऐसे सहयोगी के तौर पर देखते हैं जिनके साथ मिलकर काम किया जा सकता है।
गालिबाफ ने ईरान में राष्ट्रपति पद के लिए कई प्रयास किए हैं। मौजूदा जंग में अमेरिका और इसराइल के हमलों में ईरान के कई वरिष्ठ नेता मारे जा चुके हैं।
ऐसे में एलीट इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के साथ उनके कऱीबी संबंध, सरकार की विभिन्न विभागों में उनका अनुभव और कट्टरपंथी लेकिन एक 'व्यावहारिक' व्यक्ति के तौर पर उनकी छवि उन्हें सत्ता के एक नए स्तर तक पहुंचा सकती है।
ग़ालीबाफ़ का इस्लामी क्रांति से संबंध
ईरानी सरकारी ब्रॉडकास्टर आईआरआईबी के स्वामित्व वाले अरबी भाषा के टीवी चैनल 'अल-आलम' के मुताबिक गालिबाफ का जन्म ईरान के उत्तर-पूर्वी शहर तोरगबेह में एक धार्मिक, मजदूर-वर्ग के परिवार में हुआ था। उनका गृह नगर मशहद के कऱीब है, जहाँ से इस्लामी क्रांति की कुछ प्रमुख हस्तियों का नाता रहा है।
16 साल की उम्र में, उन्होंने मशहद की प्रमुख मस्जिदों में क्रांतिकारी धर्मगुरुओं, जिनमें उस समय के भविष्य के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई भी शामिल थे, से शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी।
साल 1979 की इस्लामी क्रांति के तुरंत बाद, गालिबाफ ने इराक के साथ युद्ध में हिस्सा लिया और 20 साल की उम्र में आईआरजीसी में शामिल हो गए। दो साल बाद, वे इसकी एक जंगी डिवीजन के कमांडर बन गए। वह साल 1988 में इराक युद्ध समाप्त होने तक इस पद बने रहे।
अल-आलम के अनुसार, गालिबाफ ने उसी साल शादी की जिस साल वे आईआरजीसी के कमांडर बने थे। उनकी शादी की रस्में सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह रोहिल्ला ख़ुमैनी ने पूरी करवाई थीं। गालिबाफ की तीन संतान भी हैं।
इराक युद्ध के बाद भी गालिबाफ का ओहदा बढ़ता रहा और साल 1997 में वे आईआरजीसी के वायु सेना के कमांडर बन गए।
छात्रों के दमन में भूमिका
जुलाई 1999 में ईरान छात्रों के विरोध प्रदर्शनों से हिल गया था। इन प्रदर्शनों की शुरुआत एक सुधारवादी अख़बार के बंद होने से हुई थी।
इस आंदोलन को बड़ी बेरहमी से दबा दिया गया, जिसमें कई लोगों की जान चली गई। माना जाता है कि इस दमनकारी कार्रवाई में गालिबाफ ख़ुद भी शामिल थे।
एक लीक हुई ऑडियो फाइल में उन्हें यह कहते हुए सुना गया, ‘मेरी एक तस्वीर है जिसमें मैं एक हज़ार सीसी की मोटरसाइकिल पर सवार हूँ और मेरे हाथ में एक लाठी है। जहाँ भी सडक़ों पर उतरने और लाठियों का इस्तेमाल करने की ज़रूरत होती है, हम उन लोगों में से हैं जो ऐसा करते हैं। हमें इस बात पर गर्व भी है।’
विरोध प्रदर्शनों के बाद आईआरजीसी के 24 कमांडरों ने उस समय के राष्ट्रपति और एक सुधारवादी नेता मोहम्मद ख़ातमी को एक बेहद सख़्त भाषा में पत्र लिखा।
इस पत्र में आईआरजीसी ने दखल देने की धमकी दी थी। गालिबाफ ने बताया कि वे उन दो कमांडरों में से एक थे जिन्होंने इस पत्र का मसौदा तैयार किया था और उस पर अन्य लोगों के हस्ताक्षर लिए थे।
कई लोग इस पत्र को राजनीतिक मामलों में आईआरजीसी के बढ़ते दबदबे की एक स्पष्ट घोषणा के तौर पर देखते हैं और तब से यह दबदबा लगातार बढ़ता ही गया है।
पुलिस प्रमुख से तेहरान के मेयर तक
छात्रों के विरोध प्रदर्शनों के एक साल बाद, ग़ालिबाफ़ को 39 साल की उम्र में पुलिस प्रमुख नियुक्त किया गया।
अपने पाँच साल के कार्यकाल के दौरान, उन्होंने एक राष्ट्रीय आपातकालीन पुलिस हॉटलाइन शुरू की और पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया को आसान बनाया।
उन्होंने पुलिस बल को विदेशी गाडिय़ों से लैस करने को अपनी सबसे गौरवपूर्ण उपलब्धियों में से एक माना, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इस पर काफी पैसे खर्च किए गए।
साल 2005 में गालिबाफ ने पुलिस प्रमुख के पद से इस्तीफा दे दिया और राष्ट्रपति चुनाव लड़ा। चुनाव हारने के बाद उन्हें तेहरान का मेयर चुन लिया। वह 12 साल तक इस पद पर रहे और राजधानी के मेयर के तौर पर सबसे लंबे कार्यकाल का रिकॉर्ड अभी भी उन्हीं के नाम है।
ट्रैफिक की समस्या से जूझ रही राजधानी में मेट्रो व्यवस्था का विस्तार करने और सदर एक्सप्रेसवे जैसे बुनियादी ढाँचे को बेहतर बनाने का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है।
साल 2016 के ‘एस्ट्रोनॉमिकल प्रॉपर्टीज’ घोटाले के बाद ग़ालिबाफ़ की साख़ को धक्का लगा। इस मामले में सिटी काउंसिल पर अधिकारियों और सुरक्षाकर्मियों को सैकड़ों प्रॉपर्टीज भारी छूट पर बेचने का आरोप लगा था। यह छूट बाज़ार कीमत से 50 फीसदी तक ज़्यादा थी।
गालिबाफ के पद छोडऩे से कुछ महीने पहले ईरान की सबसे शुरुआती ऊंची इमारतों में से एक,17-मंजि़ला प्लास्को बिल्डिंग आग लगने के बाद ढह गई।
इस हादसे में कम से कम 20 दमकलकर्मियों की मौत हो गई। इस हादसे ने गालिबाफ के नेतृत्व में शहर के प्रशासन में मौजूद सिस्टम की लापरवाही को उजागर किया।
फिर भी इन दोनों में से किसी भी घोटाले के कारण ग़ालिबाफ़ को न तो पद से हटाया गया और न ही उन पर महाभियोग चलाया गया। वे दोनों ही मामलों से बच निकले।
साल 2020 में उन्होंने ईरान में संसदीय चुनाव में एक सीट जीती और स्पीकर बन गए।
राष्ट्रपति पद के असफल प्रयास
और स्पीकर पद
गालिबाफ की नजर हमेशा से ही राष्ट्रपति पद पर रही है, लेकिन साल 2005, 2013, 2017 और 2024 में उनके चारों प्रयास नाकाम रहे।
अपने पहले प्रयास में आईआरजीसी के इस अनुभवी सैनिक ने अपनी सैन्य पृष्ठभूमि पर ज़ोर दिया, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी रणनीति बदलते हुए राजनीतिक भूगोल में पीएचडी धारक और एक प्रशिक्षित पायलट के तौर पर अपनी योग्यताओं को प्रचारित किया।
उन्होंने खुद को एक ‘जिहादी मैनेजर’ के रूप में भी पेश किया है, और अपनी सैन्य क्षमता के साथ ही अपने समर्पण का बखान किया।
भले ही गालिबाफ को लंबे समय से सुधारवादियों का विरोधी माना जाता रहा है, लेकिन हाल के सालों में ऐसे संकेत मिले हैं जिनसे पता चलता है कि रूढि़वादी खेमे के कुछ हिस्सों से उनके मतभेद पैदा हो गए हैं। साल 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में, कट्टर रूढि़वादियों के एक बड़े समूह ने उनकी उम्मीदवारी का विरोध किया और उन्हें चुनाव की दौड़ से हटने के लिए मनाने की कोशिश की।
साल 2022 में ग़ालिबाफ़ एक बार फिर भ्रष्टाचार के एक कथित घोटाले में फंस गए। तुर्की की यात्रा से लौटने के बाद एयरपोर्ट पर उनके परिवार की कुछ तस्वीरें सामने आईं, जिनमें वे एक स्ट्रोलर समेत बच्चों का बहुत सारा सामान ले जाते हुए दिख रहे थे। इन तस्वीरों से लोगों में भारी गुस्सा फैल गया।
उनके आलोचकों ने उन पर ‘पाखंड, दोहरेपन और दिखावटी धार्मिकता’ का आरोप लगाया, लेकिन उन्होंने अपने समर्थकों से कहा कि यह मामला राजनीति से प्रेरित है और उन्हें ईरानी राजनीति से हटाने की एक साजिश है।
गालिबाफ पर इस मामले का कोई असर नहीं पड़ा और साल 2024 में वे फिर से स्पीकर चुन लिए गए।
अब जब ईरान एक अहम मोड़ पर खड़ा है, तो उनकी राजनीतिक किस्मत और भी चमक सकती है।
इसकी वजह है युद्ध को जारी रखने की देखरेख करने और सेना के वरिष्ठ कमांडरों और सत्ता की तीनों शाखाओं के प्रमुखों के बीच तालमेल बिठाने की उनकी क़ाबिलियत। (बीबीसी) संपादन: ग्रेस त्सोई
सुप्रीम कोर्ट ने सेना में शार्ट सर्विस कमीशन वाली महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इसे लैंगिक असमानता दूर करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी का लिखा-
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि सेना में शार्ट सर्विस कमीशन के तहत भर्ती होने वाले महिलाओं को स्थायी कमीशन मिलेगा। अदालत ने सेना में महिलाओं के खिलाफ व्यवस्थागत भेदभाव को स्वीकार करते हुए उनके हक में फैसला सुनाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिले विशेषाधिकारों का इस्तेमाल किया।
सेना में एसएससी के भर्ती होने वाली महिलाएं अब तक स्थायी कमीशन से वंचित थीं। इसकी वजह से रिटायर होने के बाद उनको पेंशन और भत्ते भी नहीं मिलते थे। अब इन महिला अधिकारियों की सेवा 20 साल के समान मानते हुए उनको समुचित पेंशन और दूसरी सुविधाएं मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
सेना में महिलाओं के साथ कथित भेदभाव की शिकायतें तो बहुत पहले से उठ रही थी। इस मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबी लड़ाई के बावजूद इसे पूरी तरह दूर नहीं किया जा सका था। बीते साल कुछ महिला अधिकारियों ने केंद्र की स्थायी कमीशन से जुड़ी वर्ष 2019 की नीतियों और आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के फैसलों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उनमें ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का हिस्सा रही अधिकारी भी शामिल थीं। याचिका में आरोप लगाया गया था कि शीर्ष अदालत के साफ दिशा-निर्देशों के बावजूद केंद्र और सेना के अधिकारी स्थायी कमीशन देने के मामले में महिलाओं के साथ भेदभाव कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले सेना की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट तैयार करने में महिला और पुरुष अधिकारियों में भेदभाव करने का आरोप लगाते हुए इस प्रक्रिया को त्रुटिपूर्ण बताया है। उसका कहना है कि महिलाओं को भी पुरुषों के समान अधिकार मिलने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति एन। कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस मामले की सुनवाई के बाद मंगलवार को अपने फैसले में कहा कि योग्यता की कमी नहीं बल्कि भेदभाव की नीति के कारण ही महिलाओं को सेना में स्थायी कमीशन नहीं मिल सका है। अब शार्ट सर्विस के बाद सेना से हटाई गई महिला अधिकारियों की सेवा भी 20 साल के समान मान कर उनको पेंशन और दूसरी सुविधाएं मिलेंगी।
आदिवासी समुदायों और अमेजन वर्षावन को लंबे समय से रहस्यमय रूप में पेश किया गया है। जर्मनी के बॉन शहर में लगी एक नई प्रदर्शनी इन पुरानी धारणाओं को चुनौती देती है।
डॉयचे वैले पर ब्रेंडा हास की रिपोर्ट –
यूरोपीय इतिहास में दक्षिण अमेरिकी अमेजन को अक्सर एक विशाल और अछूते क्षेत्र के रूप में देखा गया है। समय के साथ-साथ अमेजन के प्रति कई धारणाएं बनती गईं। वर्षावन को ‘अछूता’ जंगल माना जाने लगा, वहां के आदिवासियों को पुराने युग से जोड़ा गया और इस पूरे इलाके को समय में रुका हुआ दिखाया गया। परिणामस्वरूप इस जटिल और विविधता से भरपूर क्षेत्र को मात्र एक ‘एक्जॉटिक बैकड्रॉप' के रूप में देखा जाने लगा।
‘अमेजन’ का यह एकल चित्रण और एकरूप जंगल मानने की यह धारणा असल में ‘अमेजोनिया’ के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विविधता से बिल्कुल मेल नहीं खाता। इसी विषय पर बॉन में आयोजित यह प्रदर्शनी केंद्रित है।
नजरिए में बदलाव
मानवविज्ञानी लेआंड्रो वेरिसन और ब्राजीलियाई कलाकार तथा कार्यकर्ता डेनिलसन बानिवा ने इस प्रदर्शनी का संयुक्त रूप से आयोजन किया है। ‘अमेजोनिया। इंडीजीनस वर्ल्ड्स’ नामक इस प्रदर्शनी का मकसद है दुनिया के इस हिस्से पर एक सूक्ष्म और समझदार नजरिया प्रस्तुत करना।
यह प्रदर्शनी अमेजोनिया को ऐसे सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत करती है, जो जटिल सामाजिक संरचनाओं, आदान-प्रदान के घने जाल और मानव तथा गैर-मानव संसारों के रिश्तों से गठित है।
वेरिसन ने डीडब्ल्यू को बताया, ‘आदिवासियों को हमेशा ऐसे दिखाया जाता है जैसे वे इतिहास से अलग हो - न वे बदलते हैं, न विकसित होते हैं। लेकिन संस्कृति जीवित है, इसका मतलब यह है कि वह लगातार विकसित और परिवर्तित होती रहती है।’ इसलिए सामान्य संग्रहालयों की समय-रेखा का पालन करने की जगह, क्यूरेटरों ने प्रदर्शनी को आदिवासी समुदाय के दृष्टिकोण के अनुसार व्यवस्थित किया है।
‘अमेजोनिया’ एक बहुत ही बड़ा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक क्षेत्र है, जो ब्राजील, बोलिविया, पेरू, इक्वाडोर, कोलंबिया, वेनेजुएला, गयाना, सूरीनाम और फ्रेंच गयाना में फैला हुआ है। यह क्षेत्र अमेजन नदी के आस-पास स्थित है और इसे कई लैटिन अमेरिकी शैक्षणिक और आदिवासी संदर्भों में इस्तेमाल किया जाता है।
यह विश्व के उन क्षेत्रों में से एक है जहां भाषाओं की सबसे अधिक विविधता पाई जाती है।
विद्वानों का अनुमान है कि यूरोप में 16वीं शताब्दी में शुरू हुए विदेशी आक्रमणों से पहले इस क्षेत्र में 1,000 से भी ज्यादा भाषाएं मौजूद थीं। आज भी यहां 300 से ज्यादा आदिवासी भाषाएं बोली जाती है, जिनमें संकेत भाषाएं, सीटी से संवाद करने वाली और ढोल के माध्यम से संवाद करने वाली भाषाएं भी शामिल हैं। वेरिसन के अनुसार, यह यूरोपीय संघ की 24 आधिकारिक भाषाओं की तुलना में काफी बड़ा अंतर है। अगर आप महाद्वीप पर बोली जाने वाली 60 से अधिक क्षेत्रीय या अल्पसंख्यक भाषाओं को भी शामिल कर लें, तब भी यह काफी प्रभावशाली है।
यह विषय, जैसे सृष्टि की कहानियां, समुदाय के बीच संबंध और आदिवासियों का भविष्य के प्रति दृष्टिकोण हमें यह समझाने में मदद करते हैं कि अमेजोनिया में संस्कृति जीवित है, न कि स्थिर या अलग-थलग।
बदलता हुआ रुख
कुछ कलाकृतियां इस बात की ओर ध्यान दिलाती हैं कि यूरोपीय लेखों में आदिवासी समुदाय को किस तरह देखा या अनदेखा किया जा रहा है। ऐसा ही एक प्रभावशाली काम है ‘कार्टा ओ वेल्हो मुंडो’ (पुरानी दुनिया को पत्र, 2018–2019), जो दिवंगत मकुशी कलाकार और कार्यकर्ता जैडर एसबेल ने बनाया था। यह रचना उन्होंने तब की, जब उन्हें एक पुरानी किताबों की दुकान से 1972 की ‘गैलेरिया डेल्टा डा पिंटूरा यूनवर्सल ‘ नाम की एनसाइक्लोपीडिया मिली, जो पश्चिमी कला को ‘सार्वभौमिक’ बताती थी।
लगभग 400 पन्नों वाली इस यूरोपीय कला-पुस्तक के हर हिस्से पर उन्होंने सीधे ही चित्र बना दिए, रंग भरे और लिखावट भी की। उन्होंने इसमें आदिवासी मान्यताओं, पर्यावरण को लेकर चेतावनियां और ‘पुरानी दुनिया’ के लिए सीधी टिप्पणियां भी जोड़ीं। यह एक ऐसा कदम है जो उपनिवेशवाद की सोच को चुनौती देता है और दिखाता है कि इस किताब में दिखाया गया ‘सार्वभौमिक’ कला इतिहास असल में औपनिवेशिक नजरिए से बनाया गया था।
डेनिलसन बनिवा की इस कलाकृति ‘काकादोरेस दे फिक्सोएस कोलोनियाइस’ (2021) में पुरानी फोटो का उपयोग किया गया है। इनका उपयोग पहले आदिवासी समुदाय को अलग और अजीब दिखाने के लिए किया जाता था। अपनी तस्वीरों में वह पॉप कल्चर के किरदार भी जोड़ते हैं, जैसे 'बैक टू द फ्यूचर' वाली कार, किंग कांग और गॉडजिला। इन सब चीजों को वह तस्वीरों में जोडक़र अजीब से दृश्य बनाते हैं और यह दिखाते हैं कि इस तरह के फोटो और ज्ञान ने आदिवासियों के प्रति कैसे गलत धारणा स्थापित की है।
लेआंड्रो वेरिसन को अक्सर इस बात का सामना करना पड़ता है कि कलाकृतियां किस तरह हमेशा आम धारणा को दर्शाती है। उनका कहना है, ‘लोगों की सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि आदिवासी लोग सिर्फ अतीत में रहते हैं और बदलाव नहीं चाहते हैं। वह यह भी कहते हैं कि आज उनके पास मोबाईल फोन या सोशल नेटवर्क होने का मतलब यह नहीं है कि उन्होंने ‘अपनी संस्कृति खो दी है, बल्कि इसका मतलब यह है कि वह अपने तरीके से खुद को ढाल रहे हैं।’
उनका यह भी कहना है कि ‘अगर हम पश्चिमी लोग अपने आप को बदलने का अधिकार रखते हैं, तो आदिवासी समुदाय को यह अधिकार क्यों नहीं?’
आखिर किसने किसको खोजा?
एक प्रश्न यह भी उठता है कि ‘खोज’ का अर्थ क्या है और वास्तव में किसने किसकी खोज की।
शोध के मुताबिक, अमेजन में पहले लाखों लोग रह रहे थे। वह वन उद्यानों का विकास करते थे और कोयला एवं जैविक पदार्थ मिलाकर ‘टेरा प्रेटा’ नामक मिट्टी बनाते थे। यह एक उपजाऊ और कार्बन-समृद्ध मिट्टी होती है।
पुराने अध्ययनों से पता चलता है कि कई प्रसिद्ध पेड़ों की प्रजातियां जैसे ब्राजील नट, कोको और अकाई हजारों साल पहले से आदिवासी उगाते थे। आश्चर्य की बात यह है कि इस समुदाय ने यूरोपियों के आने से पहले इन पेड़ों को उगाना शुरू कर दिया था।
ऐसी खोज इस गलत धारणा पर सवाल उठाती है कि वन पूरी तरह से अछूते थे और यह बताती है कि वहां मानव की मौजूदगी और संरक्षण का इतिहास लंबे समय से चला आ रहा है।
-टिम मानसेल
जर्मनी इस समय कुशल कामगारों की कमी से लगातार जूझ रहा है। एक तरफ बुजुर्ग कर्मचारी रिटायर हो रहे हैं, और दूसरी तरफ उनकी जगह लेने के लिए पर्याप्त युवा उम्मीदवार नहीं मिल रहे। इस समस्या से निपटने के लिए यह भारत से आने वाले कामगारों को अब पहले से ज़्यादा मौक़ा दे रहा है।
हैंडिर्क फॉन उंगर्न स्टर्नबर्ग के लिए इसकी शुरुआत फरवरी 2021 में उनके इनबॉक्स में आए एक ईमेल से हुई। यह ईमेल भारत से आया था।
संदेश का सार कूछ यूँ था-‘हमारे पास बहुत से युवा और मेहनती लोग हैं, जो व्यावसायिक प्रशिक्षण लेना चाहते हैं, और हम जानना चाहते हैं कि क्या आपकी इसमें दिलचस्पी है।’
उस समय स्टर्नबर्ग दक्षिण पश्चिम जर्मनी में फ्ऱाइबर्ग चैंबर ऑफ स्किल्ड क्रॉफ्ट्स में काम कर रहे थे। यह एक व्यापारिक संगठन है, जो राजमिस्त्रियों और कारपेंटर्स से लेकर कसाइयों और बेकर्स तक, कुशल कामगारों और उन्हें काम देने वाली कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है।
स्टर्नबर्ग कहते हैं, ‘हमारे पास बहुत से ऐसे नियोक्ता थे, जो बेहद परेशान थे, क्योंकि उन्हें काम करने के लिए कोई मिल नहीं रहा था। इसलिए हमने इसे आज़माने का फैसला किया।’
उनकी पहली कॉल स्थानीय कसाई संघ के प्रमुख को गई। पूरे जर्मनी में कसाइयों की हालत खास तौर पर खऱाब थी। यह ऐसा क्षेत्र था, जो तेजी से गिरावट में जा रहा था।
2002 में जहाँ 19,000 छोटे परिवार इसे चला रहे थे, वहीं 2021 तक उनकी संख्या घटकर 11,000 से भी कम रह गई थी। नियोक्ताओं के लिए युवा लोगों को अप्रेंटिसशिप के लिए तैयार करना लगभग नामुमकिन हो गया था।
कसाई संघ के प्रमुख योआखिम लेडरर कहते हैं, ‘कसाई का काम बहुत मेहनत वाला होता है। और पिछले करीब 25 सालों से युवा दूसरे रास्ते पकड़ रहे हैं।’
‘मैं दुनिया देखना चाहती थी’
भारत में, उस शुरुआती ईमेल को भेजने वाली रोजगार एजेंसी ‘मैजिक बिलियन’ ने 13 युवाओं को भर्ती करने में सफलता पाई। ये सभी 2022 की शरद ऋतु में जर्मनी पहुंचे और स्विट्जऱलैंड की सीमा से लगे छोटे कस्बों में कसाई की अप्रेंटिसशिप शुरू की। वे अपने समय का एक हिस्सा कॉलेज में भी बिताते थे।
उनमें एक 21 साल की एक लडक़ी भी थी, जिसने अपना नाम न छापने की गुजारिश की। अपने साथ आए ज़्यादातर लोगों की तरह, उसने भी पहली बार भारत से बाहर कदम रखा था।
वह आज भी अपने उस समय के उत्साह को याद करती हैं, ‘मैं दुनिया देखना चाहती थी। मैं अपना जीवन स्तर बहुत ऊंचा करना चाहती थी। मैं अच्छी सामाजिक सुरक्षा चाहती थी।’
वह जर्मनी के सुदूर दक्षिण पश्चिम में बसे वाइल आम राइन शहर में काम करने आई थीं, जो स्विट्जरलैंड और फ्रांस दोनों की सीमाओं से सटा हुआ है।
तीन साल बाद हालात काफी बदल चुके हैं। फ़ॉन उंगर्न स्टर्नबर्ग अब उस चैंबर में काम नहीं करते।
अब उन्होंने ‘मैजिक बिलियन’ की अदिति बनर्जी के साथ मिलकर अपनी खुद की रोजगार एजेंसी ‘इंडिया वक्र्स’ शुरू कर ली है, ताकि और ज़्यादा युवा भारतीय कामगारों को जर्मनी लाया जा सके। शुरुआत के 13 लोगों से बढक़र अब जर्मनी की कसाई दुकानों में 200 युवा भारतीय काम कर रहे हैं।
जर्मनी ने बढ़ाया इंटर्नशिप कोटा
जर्मनी इस समय जनसांख्यिकीय संकट से गुजऱ रहा है। 2024 की एक स्टडी के मुताबिक़, अर्थव्यवस्था को हर साल 2,88,000 विदेशी कामगारों को आकर्षित करने की ज़रूरत है। बर्टेल्समान फ़ाउंडेशन थिंक टैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, वरना 2040 तक कामकाजी आबादी में 10त्न की गिरावट आ सकती है।
बेबी बूमर पीढ़ी के आखिरी लोग रिटायरमेंट की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन उनकी जगह लेने के लिए पर्याप्त युवा जर्मन मौजूद नहीं हैं और इसकी वजह है कम जन्म दर। लेकिन भारत में बहुत सारे युवा मौजूद हैं।
बनर्जी कहती हैं, ‘भारत ऐसा देश है, जहां 25 साल से कम उम्र के 60 करोड़ लोग हैं। हर साल सिर्फ 1.2 करोड़ लोग ही वर्कफोर्स में आते हैं। यानी यहां श्रम शक्ति की बहुत ज़्यादा उपलब्धता है।’
इंडिया वक्र्स इस साल 775 युवा भारतीयों को अप्रेंटिसशिप शुरू करने के लिए जर्मनी लाने की तैयारी कर रहा है। वे जिन पेशों में काम करेंगे, उनकी रेंज काफी बड़ी है। इनमें सडक़ बनाने वाले मज़दूर, मैकेनिक, पत्थर तराशने वाले और बेकर्स शामिल हैं।
2022 में भारत और जर्मनी के बीच माइग्रेशन और मोबिलिटी पार्टनरशिप एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर होने के बाद से कुशल भारतीय कामगारों के लिए जर्मनी में काम करना आसान हो गया है। फिर 2024 के आखिर में जर्मनी ने यह एलान किया कि वह भारतीय नागरिकों के लिए कुशल कामगार वीज़ा का कोटा 20,000 सालाना से बढ़ाकर 90,000 कर देगा।
जर्मनी के आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक़, 2024 में देश में 1,36,670 भारतीय कामगार थे, जबकि 2015 में यह संख्या सिर्फ 23,320 थी।
-प्रेरणा
इतिहास में कभी-कभी कुछ ऐसा घटता है कि दुनिया को कठपुतली बनाकर नचाने वालों का भांडा फूट जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ था 2004 में, जब जॉन पर्किन्स नाम के एक सज्जन ने ‘कंफेशन्स ऑफ एन इकोनोमिक हिटमैन’ (एक आर्थिक हत्यारे की स्वीकारोक्ति) किताब प्रकाशित की थी। इस पर बड़ा हंगामा हुआ था, लेकिन कोई उसे झुठला नहीं सका, क्योंकि पर्किन्स ने किताब की शुरूआत में ही बता दिया था कि वे खुद भी एक ‘इकोनोमिक हिटमैन’ रहे थे।
क्या मतलब है ‘इकोनोमिक हिटमैन’ का? पर्किन्स बताता है कि दुनिया के सभी अमीर देश ‘इकोनोमिक हिटमैन’ पालते हैं जिनका काम ही है कि वे विकासशील देशों के नेताओं से नजदीकी रिश्ता बनाते हैं और फिर विकास या संपन्नता या गरीबी हटाओ जैसे लुभावने मंजर दिखाकर, उन्हें बड़े विदेशी ऋण लेने के लिए तैयार करते हैं। वे बताते हैं कि आपको ऋण के लिए कहीं जाने की ज़रूरत नहीं, वह हम लाकर देंगे !
पर्किन्स लिखता है कि यह मछली फंसाने जैसा है। एक बार मछली फंसी तो अमेरिका-यूरोप की सरकारों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चांदी हो जाती है। विकास के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी है, सो ऐसी परियोजनाओं के लाभ का लुभावना सब्जबाग ऐसा खड़ा किया जाता है कि विकासशील देशों की सरकारें बड़े-बड़े ऋण ले लेती हैं। ऋण का पैसा उनके हाथ आता भी नहीं है, क्योंकि उन्हीं अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के एजेंट विकास परियोजनाओं का ठेका भी ले लेते हैं। जिसका पैसा था, उसी की जेब में वापस पहुंच जाता है, जबकि ऋण लेने वाले देश पर कर्ज लद जाता है।
एक बार देश कर्ज में फंसा तो शुरू होता है महाशक्तियों का खेल! कर्ज माफी या कर्ज की शर्तों में ढील के नाम पर उस देश पर जबर्दस्त राजनीतिक, आर्थिक या सैन्य दबाव डाला जाता है, ताकि वह अपनी राष्ट्रीय नीतियों में उनके अनुकूल बदलाव करे तथा अपने प्राकृतिक संसाधनों को निजी कंपनियों के लिए खोल दे। कर्जदार देश घुटने टेक देता है और ‘इकोनोमिक हिटमैन’ अपना कमीशन लेकर आगे चल देता है-नया देश, नया शिकार खोजने !
पर्किन्स की किताब पढते हुए मुझे 1991 का आर्थिक संकट याद आया। तब भारत का ‘विदेशी मुद्रा भंडार’ लगभग खत्म हो चुका था। बताया गया था कि मात्र 2-3 हफ्तों की जरूरत लायक डॉलर देश के पास बचे हैं। सरकार को ‘अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष’ (आईएमएफ) और ‘विश्वबैंक’ से आपातकालीन ऋण लेना पड़ा। ऋण तो मिला, लेकिन उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण उस ऋण के साथ आया।
आपको ‘विकीलीक्स’ याद है? एक अंतरराष्ट्रीय वेबसाइट जो गुप्त सरकारी व कॉर्पोरेट दस्तावेजों की जासूसी कर, उन्हें सार्वजनिक करती है? इसकी स्थापना 2006 में जूलियन असांजे नामक युवा ने की थी। वह कहता था कि सरकारों, शक्तिशाली वित्तीय संस्थाओं आदि के गुप्त दस्तावेजों का खुलासा करना जरूरी है, ताकि लोग जान सकें कि उनके साथ कितना खतरनाक खेल हो रहा है। इससे सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता बढ़ेगी और ‘दादा’ देश जवाबदेही से काम करेंगे। इससे नाराज़ होकर सरकारों ने असांजे को जेल में डाला, देश-निकाला भी दे दिया। आज वह दर-दर की ठोकरें खा रहा है, पोशीदा जीवन जी रहा है।
‘विकीलीक्स’ के खुलासों से 2008 के भारत-अमेरिका परमाणु समझौते और उससे जुड़े सांसदों को कथित रिश्वत दिए जाने के आरोप सामने आए। आज की देखें तो अमेरिका के साथ टैरिफ विवाद के बीच भारत सरकार ‘एटॉमिक एनर्जी एक्ट, 1962’ और ‘सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट, 2010’ में बदलाव ला रही है। बात सीधी है : टैरिफ में छूट चाहते हो तो परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी और विदेशी निवेश के लिए खोलना होगा।
सालों पहले जिस एपस्टीन की मौत हो चुकी है उसके सेक्स-कांड की परतें जिस तरह खुल रही हैं, उससे लगता है मानो वह कब्र से बोल रहा हो। दरअसल, एपस्टीन सिफऱ् एक अमीर कारोबारी नहीं था; वह सत्ता के गलियारों में सक्रिय एक बेहद असरदार दलाल था। पैसे और प्रतिष्ठा की आड़ में उसने दुनिया के बड़े-बड़े राजनेताओं, धनकुबेरों, वैज्ञानिकों, विचारकों, शिक्षाविदों और स्वयंभू समाजसेवियों का एक घना और प्रभावशाली नेटवर्क खड़ा कर लिया था। इसी नेटवर्क के भीतर वह लोगों की कमजोरियों और वासनाओं को हथियार बनाता था। नतीजे में यह जाल इतना शक्तिशाली बन गया कि उसके जरिए वह दुनिया के किसी भी कोने से अपने मनमुताबिक काम निकलवा सकता था।
ऐसे में मैं गांधी की बात करूं? तब आजादी निकट थी। एक पत्रकार ने पूछा : क्या आजाद भारत अपने विकास के लिए ब्रिटेन का मॉडल अपनाएगा? ‘छोटे-से ब्रिटेन को अपनी दादागिरी बनाए रखने के लिए पूरी दुनिया पर राज करना पड़ा था,’ गांधीजी ने तक्षण जवाब दिया, ‘अगर विशाल भारत वही रास्ता अपनाएगा तो उसके लिए तो दुनिया भी कम पड़ जाएगी !’ क्या कह रहे थे गांधीजी? यही कि यह विकास विनाश का दूसरा नाम है।
कल के इंग्लैंड की बात छोडिए, आज के अमेरिका को ही देखिए ! सबसे अमीर देश बने रहने के लिए वह एक पागल हाथी की तरह घूम रहा है। ट्रंप की घोषणा है कि अमेरिका दुनिया भर से टैक्स वसूलेगा और अपना सामान बिना टैक्स हर जगह बेचेगा। तेल की लूट करने और अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए वह कहीं नेताओं का अपहरण कर रहा है, कहीं उनका क़त्ल करवा रहा है, कहीं युद्ध भडक़ा रहा है, कहीं बगावत उकसा रहा है। दुनिया के कई देश उसके सामने झुक रहे हैं जिनमें भारत भी शामिल है। आज अमेरिका तय कर रहा है कि हम किससे तेल खरीदें, किससे कूटनीतिक संबंध रखें, किससे युद्ध करें, कब समझौता कर लें।
इसे जंगल का कानून कहते हैं। सभ्य समाज की रीत क्या है? गांधीजी कहते हैं : स्वदेशी ! ‘मेक इन इंडिया’ नहीं, ‘मेड इन इंडिया !’ जब भी हम कुछ खरीदें, यह सोचें कि हमारा पैसा किसकी जेब में जा रहा है? अपने गांव में किसी की, पड़ौसी गांव में किसी की या फिर अपने ही देश में किसी की? अगर हां, तो यह स्वदेशी है ! दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है
इसलिए उत्पादन और तकनीक दोनों ऐसे हों कि प्राकृतिक संतुलन बिगड़े नहीं व मानवीय श्रम लुटे नहीं। यह होगा तब कोई पूछेगा कि दुनिया कौन चला रहा है तो हम गर्व से कह सकेंगे : अपनी दुनिया हम स्वयं चला रहे हैं। आजादी का यही मतलब है। (सप्रेस)
सुश्री प्रेरणा सामाजिक कार्यकर्ता और गांधीवादी-अर्थशास्त्र की अध्येता हैं।
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आज की दुनिया में जिस असीमत उपभोग पर टिकी जीवन-दृष्टि का सम्राज्य कायम है, उसमें हिंसक युद्ध, जहरीला भेदभाव और गहरी गैर-बराबरी मामूली पडाव भर हैं। खाड़ी देशों, खासकर ईरान के खिलाफ अमरीकी-इजरायली हवस के चलते फांदे गए भीषण युद्ध, गंदी, अमानवीय, हिंसक करतूतों से लदी-फंदी एप्सटीन फाइलों और कुछ दिन पहले तक जिन्दा, भरे-पूरे देशों के एक-एक कर ध्वस्त होने की वजह देखें तो हमारी हिंसक, गैर-बराबर और शोषणाधारित जीवन-पद्धति है। इससे कैसे पार पाया जाए? बता रही हैं, प्रेरणा।-संपादक
भारत सरकार ने माना है कि देश में मनोचिकित्सकों की उपलब्धता राज्यों के बीच काफी असमान है. मध्य प्रदेश में प्रति एक लाख आबादी के लिए सिर्फ 0.05 मनोचिकित्सक हैं, जबकि केरल में यह संख्या 1.2 है.
डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना का लिखा-
"मुझे पिछले साल जुलाई में अमृतसर में स्थित एक निजी बैंक में नौकरी करने का अवसर मिला. मैं वहां अकेला रहता था. कुछ महीनों बाद ही मुझे गहरा अकेलापन महसूस होने लगा. काम और पढ़ाई में मेरा मन नहीं लग रहा था और बिना किसी कारण के थकान रहने लगी. शुरूआत में मैंने ध्यान नहीं दिया. एक दिन मुझे अपने आसपास आवाजें सुनाई देने लगीं. शरीर में झटके भी महसूस हुए. उसी वक्त मैंने तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेने का फैसला किया." यह कहानी दिल्ली के रहने वाले आयुष की है.
आयुष की तरह भारत में कई लोग मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं. इसे लेकर समाज में मौजूद स्टिग्मा, जागरूकता और मनोचिकित्सकों की कमी के चलते उन्हें समय से इलाज नहीं मिल पाता. आयुष आगे बताते हैं, "मेरा मानसिक स्वास्थ्य इतना बिगड़ गया था कि मेरे घर में पड़ा कचरा सड़ने लगता, तब भी मैं उसे फेंकने के लिए बिस्तर से नहीं उठ पाता था. मैं अक्सर बहुत रोया करता. ऐसा तीन महीने तक चलता रहा. लक्षण काफी पहले ही महसूस होने लगते हैं. लेकिन सपोर्ट सिस्टम न होने की वजह से मैं उन्हें नजरअंदाज करता रहा."
आयुष स्थानीय निजी अस्पताल पहुंचे. वहां उन्हें हर हफ्ते काउंसलिंग सेशन दिया गया और दवाओं की मदद से उनके मानसिक स्वास्थ्य में सुधार आने लगा. लगभग डेढ़ महीने के बाद वह फिर से काम पर लौटकर सामान्य जीवन जी रहे हैं. लेकिन इस इलाज में उनका खर्चा भी बहुत हुआ. हर सेशन के उन्हें एक हजार रुपये देने पड़ते थे. हर महीने दवाइयों का बिल भी 2,000 से 3,000 रुपये था.
भारत में मौत को गले लगाते छात्र
आयुष ने बताया कि सरकारी अस्पताल केवल हेल्पलाइन नंबर देकर लौटा देते हैं. वहां पर्याप्त डॉक्टर भी नहीं हैं, जो मरीज पर पूरा ध्यान दे सकें. राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार भारत में आज हर 10 में से एक व्यक्ति मानसिक समस्या से लड़ रहा है. लगभग 90 प्रतिशत लोगों को सही इलाज नहीं मिलता.
हाल ही में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने लोकसभा में बताया कि पिछले पांच सालों में जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (डीएमएचपी) के लिए आवंटित बजट का केवल 47.5 प्रतिशत हिस्सा ही इस्तेमाल हुआ है. साल 2020-21 से 2024-25 के बीच केंद्र सरकार द्वारा 691.24 करोड़ रुपये मंजूर किए गए. जबकि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इसमें से सिर्फ करीब 328.27 करोड़ रुपये ही खर्च किए.
फंड बढ़ा लेकिन काम नहीं
जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम या डीएमएचपी भारत सरकार के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत संचालित एक महत्वपूर्ण योजना है. इसका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को जिला और स्थानीय स्तर तक पहुंचाना है. इसके जरिए हर किसी को डिप्रेशन, एंग्जायटी और तनाव जैसी समस्याओं के लिए इलाज, काउंसलिंग और दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं. राज्य स्वास्थ्य मंत्री द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, डीएमएचपी के लिए हर साल बजट बढ़ाया गया है. लेकिन खर्च उसी अनुपात में नहीं बढ़ पाया.
वित्त वर्ष 2020-21 में 84.13 करोड़ रुपये मंजूर किए गए, जिनमें से केवल 33.92 करोड़ रुपये ही खर्च हुए. 2021-22 में आवंटन बढ़कर 122.90 करोड़ रुपये हो गया, जबकि खर्च 59.78 करोड़ रुपये रहा. 2022-23 में 159.59 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए, जिनमें से 66.55 करोड़ रुपये खर्च हुए. उसके अगले ही साल 2023-24 में 168.95 करोड़ में से 85.65 करोड़ रुपये खर्च हुए. हालांकि 2024-25 में फंड कम कर दिया गया और 157.62 करोड़ रुपये आवंटित किए गए. इसमें से 82.39 करोड़ रुपये ही उपयोग में लाए गए.
स्नेही एक गैर सरकारी सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य संगठन है, जो साल 1994 से काउंसलिंग, सपोर्ट और रेफरल सेवाएं प्रदान करता आ रहा है. इसके निदेशक अब्दुल माबूद बताते हैं कि सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों में फंड का उपयोग कई स्तरों पर जांच और संतुलन के तहत होता है, जिससे पूरी प्रक्रिया काफी जटिल हो जाती है. डीएमएचपी के अंतर्गत, पैसा केंद्र और राज्य दोनों मिलकर देते हैं. अधिकांश राज्य सरकारों के पास या तो इच्छाशक्ति की कमी होती है या फिर अपने हिस्से का बजट देने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते और डीएमएचपी पर खर्च प्रभावित होता है.
इस कार्यक्रम के लिए फंड आवंटन एक तय प्रक्रिया के जरिए होता है. सबसे पहले केंद्र सरकार के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत राज्यों को कुल बजट मंजूर करती है. इसके बाद हर राज्य अपनी जरूरत के हिसाब से प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन प्लान (पीआईपी) बनाकर केंद्र को भेजता है. केंद्र सरकार इस प्रस्ताव की समीक्षा करती है और मंजूरी मिलने के बाद फंड जारी किया जाता है.
अब्दुल माबूद ने बताया, "केंद्र सरकार द्वारा दिया गया फंड तभी पूरी तरह इस्तेमाल किया जा सकता है जब राज्य सरकार अपनी तय हिस्सेदारी (शेयर) देती है. ऐसा न होने पर केंद्र से मिला पैसा पूरी तरह खर्च नहीं हो पाता और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार में बाधा आती है."
वह आगे कहते हैं, 'भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं ज्यादातर शहरों तक सीमित हैं. इसलिए सपोर्ट सिस्टम भी मुख्य रूप से शहरी इलाकों में ही उपलब्ध है. इसके अलावा इलाज का खर्च भी काफी ज्यादा है. काउंसलर एक सत्र के लिए दो हजार या उससे अधिक फीस लेते हैं. जिसे लगभग 90 प्रतिशत लोग वहन नहीं कर पाते और इलाज बीच में ही रुक जाता है."
प्रगति के बावजूद रास्ता अभी भी चुनौतीपूर्ण
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (निमहांस) बेंगलुरु के पूर्व निदेशक बीएन गंगाधर से डीडब्ल्यू ने इस मुद्दे पर बात की. वह 1978 से सरकारी कार्यक्रमों में हुई प्रगति को देख रहे हैं. पिछले साल 6.8 लाख से अधिक मरीजों ने निमहांस आकर इलाज कराया. यह एक साल में सबसे अधिक संख्या है. वहीं 2022 में लॉन्च के बाद से भारत सरकार के फ्री हेल्पलाइन नंबर 'टेली-मानस' पर अब तक 34 लाख से अधिक कॉल्स दर्ज किए गए हैं. यानी जागरूकता बढ़ी है और लोग सामाजिक हिचक को पीछे छोड़कर अब मदद लेने के लिए आगे आ रहे हैं. यह सरकार के प्रयासों को दिखाता है.
डॉ गंगाधर बताते हैं, "आज करीब 700 से ज्यादा जिलों में डीएमएचपी चल रहा है. यह एक बड़ा बदलाव है. कोविड महामारी के बाद से सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य मिशन पर ज्यादा जोर दिया है और डिजिटल माध्यमों के जरिए सेवाएं पहुंचाने की दिशा में भी काम हो रहा है. अब अगला फोकस ट्रीटमेंट गैप को कम करने पर होना चाहिए. मरीजों और इलाज पाने वालों की संख्या के बीच अभी भी अंतर है."
मनोचिकित्सकों की कमी एक गंभीर चिंता
भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित मानव संसाधन अभी भी आवश्यकता की तुलना में सीमित हैं. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग आठ हजार से दस हजार मनोचिकित्सक ही कार्यरत हैं. यानी एक लाख मरीजों के लिए 0.75 मनोचिकित्सक ही उपलब्ध है. जबकि वैश्विक औसत लगभग 1.3 है.
इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज (इहबास) में प्रोफेसर एवं मनोचिकित्सक डॉ ओम प्रकाश डीडब्ल्यू से बातचीत में कहते हैं, "मुख्य समस्या डीएमएचपी में प्रशिक्षित मनोचिकित्सक, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, साइकियाट्रिक सोशल वर्कर, नर्स और अन्य सहायक कर्मचारियों की कमी है. भारत में कुल मिलाकर लगभग दस हजार मनोचिकित्सक ही हैं. सरकार को अधिक संख्या में मनोचिकित्सकों को प्रशिक्षित करने और उनकी नियुक्ति पर ध्यान देना चाहिए."
डॉ ओम प्रकाश का मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के साथ विशेषज्ञों के प्रशिक्षण पर भी निरंतर ध्यान देना होगा. स्नातकोत्तर स्तर (पीजी) पर प्रशिक्षण क्षमता बढ़ाने से भविष्य में अधिक विशेषज्ञ उपलब्ध हो सकेंगे. लोकसभा में प्रतापराव जाधव ने बताया कि उनका मंत्रालय 19 सरकारी मेडिकल कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े 47 पीजी विभागों को मजबूत करने में मदद कर रहा है.


