विचार / लेख

शहर छोड़कर जाने वाले क्या करेंगे?
31-Mar-2026 10:12 PM
शहर छोड़कर जाने वाले क्या करेंगे?

- संजय श्रमण

ये शोभा बाई हैं। बैतूल जिले के एक छोटे से गाँव में, 2022 में इनसे मुलाक़ात हुई थी।

कोविड के बाद लॉकडाउन जब उठा था, तब गाँव में रिवर्स माइग्रेशन और उसका इकोनॉमिक इम्पैक्ट देखने के लिए गांव जाना हुआ था। महामारी में इनके परिवार और रिश्तेदारों में कुछ लोग गुजऱ गए थे । कई लोग शहर छोडक़र जो गाँव लौटे तो फिर वापस शहर जाने की हिम्मत नहीं हुई।

इनका एक बेटा दसवीं तक पढ़ाई करके गुजरात चला गया था। एक बड़े शहर में रेलवे में खाना सर्व करता था। बड़े लोगों से हर बार दस बीस रुपए करके कुछ बख्शीश भी मिल जाती थी। किसी तरह ग्रामीण अनपढ़ पत्नी को अपने साथ ले गया। पत्नी झाड़ू पोंछा करने लगी। दोनों की मेहनत से दाल रोटी चलने लगी।

एक बड़े से नाले के किनारे, की एक झुग्गी झोपड़ी में दो कमरे किराए से लेकर रहने लगे। दो बेटे हुए, दोनों को एक छोटे से इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ा रहे थे। हज़ार पंद्रह सौ रुपए माँ-बाप को भी भेज देते थे।

गांव लौटते थे तो प्लास्टिक के खिलौने और फुटपाथ की दुकानों से घर गृहस्थी का सस्ता सा सामान लेकर रिश्तेदारों में कभी कभार बांट देते थे। शोभा बाई ने बताया कि उनके बेटे को लोग बड़ी इज़्ज़त से देखने लगे थे। सब लोग उससे सलाह लेते थे। बेटा "बाबूजी" बन गया था। बाबूजी के साथ शोभा बाई की भी बड़ी इज्जत हो गई थी।

फिर कोविड आया।

ट्रेन में खाना ही नहीं बल्कि ख़ुद ट्रेन ही बंद हो गई। सबको लौटना पड़ा। बेटा जो एक बार लौटा तो फिर जाने की हिम्मत नहीं हुई। अब ना वो नौकरी रही, ना वो दोस्त रहे जो बुला सकें। बेटा गांव लौटकर एकदम मायूस हो गया। गांव में कोई रोजगार नहीं। फिर से खेती मजदूरी शुरू हुई। महुआ, तेंदूपत्ता, लकड़ी, जड़ीबूटी, सब्जी भाजी। बस फिर से वहीं लौट आए जहाँ से चले थे। लेकिन अब दो बच्चे भी थे जिन्होंने शुरुआती बारह पंद्रह साल शहर का जीवन देखा और अब फिर से गांव में आ पहुँचे।

शोभा बाई कहती हैं कि छोटे बच्चे जब पहली बार गांव आए थे तो उनके बोलने का अंदाज़ अलग था। अब साल भर के भीतर ही वे गांव की गालियाँ और रंग ढंग सीख गए हैं। पहले बच्चे "अंकल जी अंटी जी" करके बात करते थे, अब फिर से "माँ-भेन की" करने लगे हैं। पहले बच्चे पढ़ लिख के डॉक्टर इंजीनियर बनना चाहते थे, अब उनका सपना है कि पास के क़स्बे में साप्ताहिक हाट में जूते-चप्पल की दुकान लगायेंगे।

वे अब लोडिंग रिक्शा खरीदने के लिए लोन ले रहे हैं।

 

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ये भारत के शहर हैं। ये सिफऱ् गऱीबों का ख़ून चूसते हैं। निश्चित ही गरीबों को वहाँ बहुत कुछ मिलता भी है। लेकिन जब शहर पर संकट आता है तो पहली मार किस पर पड़ती है? शहर को बनाने और चलाने वाले लोगों को सबसे पहले दूध में से मक्खी की तरह बाहर निकाला जाता है।

ऐसी हजारों लाखों कहानियाँ हैं। उचित समय पर सब बाहर आएंगी। आजकल तो इस सबकी बात करना भी गुनाह है।

भारत में शहरीकरण जिस तरह हुआ है वो एक भयानक दुर्घटना है। सबसे पहले तो कोलोनियल मास्टर्स ने, अंग्रेज़ों ने हमारे स्वाभाविक शहरीकरण को अपनी ताकत और हवस से तोड़ा मरोड़ा। फिर आगे का काम हमेशा की तरह वर्ण और जाति पर खड़े असभ्य समाज के ठेकेदारों से संभाल लिया। जैसे गाँवों में ऊँच नीच का विभाजन होता है वैसा ही शहरों में फ़ैल गया है।

अंबेडकर ने बहुत गहरी बात कही है, ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद जब आपस में हाथ मिला लेते हैं तो बहुत जहरीली और दुर्निवार शक्ति का जन्म होता है। भारत के शहर उसी ज़हर में डूबे हैं। आपको साफ़ हवा, पानी, सडक़ें, पब्लिक प्लेस ये सब कुछ नहीं मिलेगा। आगे भी इनका मिलना और कठिन होता जाएगा।

इस सबके बीच अब जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की बात अगर आप भूल गए तो आप सब कुछ खत्म कर देंगे। अब गांवों में जाकर देखिए, जो कुएं मई-जून के अंत तक पानी देते थे, अब वे मार्च में सूखने लगे हैं। ऊपर से शहरों में बढ़ती असुरक्षा से गांवों में रिवर्स माइग्रेशन बढ़ा है। अब ग्रामीण संसाधनों पर बोझ कई गुना बढ़ गया है। ऊपर से डीजल पंप और एग्रीटेक के ऑटोमेशन के कारण खेतों में कारीगरों की माँग बहुत कम हो गई है।

अब शहर छोडक़र जाने वाले क्या करेंगे? पाँच किलो अनाज कब तक चलेगा? सिफऱ् अनाज से ही जिंदगी नहीं चलती।

ये और इसके जैसे कई मुद्दे हैं जिन पर बहुत गंभीर हस्तक्षेप की जरूरत है। लेकिन इस समाज की प्रतिनिधि बहसों को देखिए। लगता है कि पुराण-कथाकारों और कथावाचकों ने इस देश के मस्तिष्क पर पूरी तरह कब्जा कर लिया है। उन्हें इसके बड़े लाभ हो रहे हैं। सदा से वे इसके लाभार्थी रहे हैं।

लेकिन अंतिम रूप से देश का बहुसंख्यक वर्ग अब पहले से बड़े नर्क में जाने वाला है।


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