विचार / लेख
-दिनेश श्रीनेत्र
बहुत सारे मोटिवेशनल स्पीकर कहते हैं, बड़ा सोचो, कामयाब बनो, सफलता हासिल करने के लिए रात-दिन मेहनत करो, पर दिलचस्प बात है कि जिसे हम बड़ी सोच या सफलता कहते हैं, असल में वह हमारे जीवन पर एक खास जीवन-दृष्टि का आरोपण होता है।
सफलता का सीधा अर्थ होता है कि आप बहुत सीमित संसाधनों पर दूसरों को पीछे छोडक़र कब्जा कर लें। इसका यह अर्थ कभी नहीं होता है कि आप किसी जरूरतमंद को उन संसाधनों तक पहुँचने का रास्ता तैयार करें। इसका यह अर्थ नहीं होता कि आप संसाधनों को अंतिम जरूरतमंद तक पहुँचाने के बारे में सोचें।
बड़ी सोच हमेशा कैपटिलिस्ट इकॉनमी से जुड़ी होती है, जहां उसके अर्थ बड़ी पूंजी या सोसाइटी में कोई प्रभावशाली जगह हासिल करने से जुड़े होते हैं। कुल मिलाकर हम बचपन से लेकर अंतिम समय तक दूसरों से आगे निकलने और उनको नियंत्रित करने की मानसिकता लिए सारा जीवन बिता देते हैं। ऐसी दुनिया में यह सोचना कि युद्ध नहीं होंगे, लोग आपस में मिलजुलकर रहेंगे, प्रेम और खुशियां बाटेंगे- बेहद हास्यास्पद है।
मनुष्य जबसे प्रगति के रथ पर सवार हुआ है उसने जहाँ-तहाँ बबूल के पेड़ ही बोए हैं। इसलिए ‘सफल होना’ या ‘बड़ा सोचना’ दरअसल शुगर-कोटेड जहरीले विचार हैं, जिनका निहितार्थ है ‘छीन लेना’, ‘कब्जा करना’, ‘गुलाम बनाना’, ‘धक्का देकर आगे निकलना’, ‘हड़प लेना’। तारीख़ के साथ हम सभ्य नहीं हुए हैं, हमारे सिर्फ औजार बदले हैं। हमारे हाथों में बस पत्थर की जगह भाले, उनकी जगह बंदूकें और उनकी जगह प्रबंधन और कूटनीति ने ले ली है। हमें आज भी जमीनों पर कब्जा करना है, हम अब लोगों को ताकत का सहारा लेकर गुलाम नहीं बनाते, हम ऐसी परिस्थियां पैदा कर देते हैं कि लोग गुलाम बन जाएं।
बीते 100 सालों की आधुनिक सभ्यता में भयानक नरसंहार हुए हैं, प्रत्यक्ष भी परोक्ष भी। इस सभ्यता ने बहुतों को मारा है और बहुतों को मरने पर मजबूर किया है। अब हमारे भीतर उसका कोई अपराधबोध भी नहीं है। टीएस एलियट ने ‘द वेस्टलैंड’ के अंतिम खंड में बृहदारण्यक उपनिषद लिए गए सूत्र ‘दत्त, दयध्वम्, दम्यत:’ को आधुनिक सभ्यता के आध्यात्मिक विखंडन के विरुद्ध एक संक्षिप्त नैतिक प्रतिपाठ की तरह प्रस्तुत किया था, जो कामना, अलगाव और अराजकता से निर्जीव सभ्यता के लिए था। ब्रिटिश आलोचक एफआर लीविस ने कहा था यह आधुनिक यूरोपीय संस्कृति की आत्मिक दरिद्रता के विरुद्ध अनुशासनात्मक हस्तक्षेप था, जो व्यक्तिगत आत्मसंयम से शुरू होकर सामूहिक मानवीय करुणा और त्याग तक फैलता है।
मगर ‘द वेस्टलैंड’ को प्रकाशित हुए भी 100 साल से ज्यादा हो गए। हमने पूरब की संस्कृति में भी यही जाना है कि सरवाइवल के लिए दूसरों का हक छीनना जरूरी है, हम यही अपने बच्चों को सिखाते हैं। हम परिवार के भीतर भी खामोशी से नियंत्रण करना चाहते हैं, एक-दूसरे पर, उसके श्रम पर, उसकी भावनाओं पर, उसकी आजादी पर, उसकी सोच पर। कभी गौर करें; हम भारतीय परिवारों के भीतर हो रहे संवादों पर, चाहे वह पिता-पुत्र के बीच, मां-बेटी के बीच, बड़े और छोटे भाई या पति-पत्नी के बीच।
अपवाद बहुत होंगे मगर बहुतायत में आप पाएंगे कि हर कोई दूसरे को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा होता है, यही बीज आगे चलकर पुष्पित पल्लवित होता है; हमारे सार्वजनिक जीवन में, कॉरपोरेट में, पॉलीटिक्स में। अब यह जहर सोशल मीडिया और टीबी डिबेट्स के जरिए ‘न्यू नॉर्मल’ हो चुका है। जहां कोई एक सत्य नहीं है बल्कि अपने झूठ को चीख-चीख कर बोलना ही सफलता है।
हम अपनी संस्कृति कहीं दूर फेंक आए और एक नई सुविधाजनक संस्कृति का निर्माण किया है, जो हमारी मक्कारी से मेल खाए। यह एक ऐसी अंधी दौड़ है जिसमें शामिल मनुष्य को पता नहीं है कि वह किधर भाग रहा है, वह खुद से आगे भागने वालों के अंजाम को कभी नहीं समझ पाता, कि वे किसी स्वर्ग (?) में जा रहे या खाई में गिर रहे हैं, उसकी नियति है सिर्फ अपने से आगे वालों को फॉलो करना... अंतत: जब वह अंजाम की तरफ पहुँचता है तो भयानक सत्य का सामना करने के लिए बिल्कुल अकेला होता है।


