विचार / लेख

लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे शादीशुदा लोगों पर कोर्ट के दो अलग-अलग फैसले कैसे?
01-Apr-2026 9:55 PM
लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे शादीशुदा लोगों पर कोर्ट के दो अलग-अलग फैसले कैसे?

-उमंग पोद्दार

पिछले कुछ दिनों में इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो आदेश काफी चर्चा में रहे हैं। एक में हाई कोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप कोई अपराध नहीं है। साथ ही पुलिस ने दोनों लोगों को सुरक्षा देने को कहा।

लिव-इन रिलेशनशिप यानी वो संबंध जिसमें दो लोग बिना विवाह किए साथ में रहते हैं। इस मामले में लिव-इन में रह रहे लडक़े की किसी और लडक़ी से शादी हो रखी थी।

दूसरे फैसले में, हाई कोर्ट ने कहा कि बिना तलाक़ लिए लडक़ा-लडक़ी लिव-इन रिलेशनशिप में नहीं रह सकते।

ये कहते हुए कोर्ट ने उन्हें सुरक्षा देने से मना कर दिया। इस मामले में लडक़ा और लडक़ी दोनों की किसी दूसरे शख़्स से शादी हो रखी थी।

इन दोनों फैसलों से ये सवाल खड़ा होता है कि अगर किसी व्यक्ति की शादी हुई हो तो क्या वो किसी और के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह सकता है?

इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो फैसले

20 मार्च को हाई कोर्ट की एक जज की पीठ ने अपना फ़ैसला दिया। जस्टिस विवेक कुमार सिंह के सामने एक लडक़ा-लडक़ी थे जो साथ में रह रहे थे। उन्होंने कोर्ट में ये कहते हुए याचिका डाली थी कि उन्हें जान का खतरा है।

उनकी माँग थी कि कोर्ट लोगों को उनकी जि़ंदगी में दख़ल देने से रोके और साथ ही उन्हें सुरक्षा दे। इस मामले में दोनों लोगों की शादी अलग-अलग लोगों से हो रखी थी।

कोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति की शादी हो रखी है तो उन्हें किसी और के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के लिए अपने पति या पत्नी से तलाक लेना होगा।

कोर्ट ने कहा कि वो सुरक्षा का आदेश तब दे सकते हैं जब उनके किसी क़ानूनी अधिकार को ठेस पहुँच रही हो। बल्कि, इस मामले में उन्होंने कहा कि अगर वो इस कपल को सुरक्षा दें, तो हो सकता है कि वो ‘द्विविवाह (बाइगेमी) के अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं।’

हालांकि, कोर्ट ने कहा कि अगर दोनों लोगों पर किसी तरह की हिंसा होती है तो वे पुलिस के पास जा सकते हैं, और पुलिस उनकी क़ानूनन मदद करेगी।

दूसरी ओर, 25 मार्च को इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो जजों की पीठ ने ऐसे ही एक मुद्दे पर अलग फ़ैसला दिया। कोर्ट के सामने एक लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे कपल आए थे। उन्होंने कोर्ट से सुरक्षा मांगी थी।

इस मामले में लडक़ी की माँ ने पुलिस में शिकायत दर्ज की थी कि लडक़े ने बहला-फुसला के लडक़ी को अपने साथ रख लिया था। इस मामले में लडक़े की किसी और महिला से शादी हो रखी थी। इस मामले में कोर्ट ने कहा कि नैतिकता और क़ानून दोनों अपनी जगह है। कोर्ट ने कहा कि एक शादीशुदा व्यक्ति भी किसी और के साथ उनकी मजऱ्ी से रह सकता है।

कोर्ट ने कहा कि लडक़ी बालिग़ है और लडक़े के साथ अपनी मजऱ्ी से रह रही है। सुरक्षा के लिए लडक़ा-लडक़ी पुलिस के पास भी गए थे, लेकिन पुलिस ने कोई क़दम नहीं उठाया था। साथ ही, लडक़ी के माँ-बाप और परिवार वाले इस रिश्ते के ख़िलाफ़ थे और दोनों को अपनी जान का ख़तरा था।

कोर्ट ने उनकी याचिका पर नोटिस जारी किया और कहा कि अभी लडक़ी के परिवार वाले दोनों को किसी तरह की चोट नहीं पहुचायेंगे, ना ही उनके घर में घुसेंगे या उनसे संपर्क बनाने की कोशिश करेंगे। ये भी कहा कि पुलिस की जि़म्मेदारी होगी की वो दोनों को सुरक्षा दे।

दोनों मामलों में कोर्ट के सामने लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे लोगों की सुरक्षा का मुद्दा था। एक में कोर्ट ने उन्हें सुरक्षा दी, और दूसरे में सुरक्षा देने से मना कर दिया।

हालांकि, किसी भी फ़ैसले में कोर्ट ने ये नहीं कहा की लिव-इन रिलेशनशिप ग़ैर-क़ानूनी है। केवल सुरक्षा के लिए अलग-अलग फैसले दिए।

 

क्या कहता है कानून?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ही इस मुद्दे पर अलग-अलग तरह के फ़ैसले दिए हैं। पिछले साल दिसंबर में जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने ही लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे 12 कपल को सुरक्षा देने का आदेश दिया था।

कोर्ट ने कहा था की कुछ लोग लिव-इन को अनैतिक मानते हैं, वहीं कुछ लोगों के लिए ये एक वैध विकल्प है। कोर्ट ने कहा था कि उन्हें लिव-इन की नैतिकता को नहीं देखना है, बल्कि ये देखना होगा कि क्या दो लोगों ने कोई गैरकानूनी काम किया है। किसी व्यक्ति की सुरक्षा और उनकी आजादी भारत के संविधान में दिया गया एक मौलिक अधिकार है।

कोर्ट ने पूछा कि, ‘क्या हम चुप बैठ सकते हैं।।।जब दो युवा व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा माँग रहे हैं और उनकी गलती केवल ये है कि उन्होंने कुछ ऐसा किया है जो समाज में स्वीकार्य नहीं है।’ कोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप गैर कानूनी नहीं है।

कोर्ट ने इस फ़ैसले में कई सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी सहारा लिया जिसमें कहा गया है कि अगर लडक़ा और लडक़ी बालिग़ हैं, और अपनी मजऱ्ी से एक दूसरे के साथ रह रहे हैं, तो उनके इस फैसले में कोई दखल नहीं दे सकता।

हालांकि, इसी जज ने पिछले साल नवंबर में एक फ़ैसले में सुरक्षा देने से मना किया था जब एक लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही लडक़ी की किसी और मर्द से शादी हो रखी थी। इस मामले में भी उन्होंने कहा कि सुरक्षा देने से शायद अदालत द्विविवाह के अपराध को बढ़ावा देगा।

इलाहाबाद हाई कोर्ट की दो जजों की पीठ के एक फ़ैसले में भी उन कपल को सुरक्षा देने से मना किया जिसमें एक व्यक्ति की पहले शादी हो रखी थी।

लेकिन कुछ फ़ैसले ऐसे भी हैं जो इससे विपरीत बात करते हैं। कर्नाटक हाई कोर्ट के सामने जब ऐसा ही एक केस आया जिसमें एक व्यक्ति की शादी होने के बावजूद वो किसी और के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में थे।

इसमें कोर्ट ने कहा कि द्विविवाह के अपराध की बात तब ही उठेगी जब एक शादीशुदा व्यक्ति किसी और से शादी करे। इसलिए कोर्ट ने कहा कि द्विविवाह की शिकायत करने वाले व्यक्ति को ये साबित करना होगा कि दूसरी शादी हो चुकी है।

पंजाब और हरियणा हाई कोर्ट ने भी ऐसा ही एक फैसला दिया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि एक शादीशुदा व्यक्ति किसी और के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में है, और उन्हें ख़तरा महसूस हो रहा है तो उन्हें सुरक्षा मिलनी चाहिए।

लिव-इन में सुरक्षा

आम तौर पर कई अंतर-जातीय और अंतर-धार्मिक कपल ऐसी सुरक्षा कोर्ट से माँगते हैं। ऐसा समलैंगिक और ट्रांसजेंडर कपल के रिश्तों में भी होता है क्योंकि कई बार उन्हें समाज या अपने घरवालों से ख़तरा होता है।

कोर्ट कई बार उन्हें सुरक्षा दे देती है लेकिन कुछ मामलों में ये कहती है कि जब हिंसा हो तो वो पुलिस के पास जाएं। हालांकि, दोनों आदेशों में फक़ऱ् होता है। अगर कोर्ट सुरक्षा देने का आदेश देते हैं तो पुलिस उस कपल की शिकायत पर ज़्यादा ध्यान देगी, वरना उन पर कोर्ट के आदेश की अवमानना की कार्रवाई हो सकती है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के ऐसे मुद्दों पर कई फ़ैसले चर्चा में रहे हैं। 2023 में भी इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो जजों की पीठ ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ लिव-इन रिलेशनशिप को बढ़ावा देती हुई नजऱ नहीं आ सकतीं। साथ ही उन्होंने सुरक्षा देने से मना कर दिया था और कहा था कि अगर उनके साथ हिंसा होती है, तो वो पुलिस में जाकर एक शिकायत दर्ज करवा सकते हैं।

तारा नरूला दिल्ली की एक वकील हैं और फैमिली लॉ से जुड़े मामलों की पैरवी करती हैं। वो कहती हैं, ‘अगर कोई लिव-इन कपल फ़ैमिली लॉ के तहत अपने अधिकार मांग रहा है और कोई लिव-इन कपल संविधान के तहत सुरक्षा माँग रहा है, इन दोनों में फर्क़ है। हर व्यक्ति को, चाहे वो किसी भी स्थिति में हो, अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा और स्वतंत्रता का अधिकार है।’

उनका मानना था कि कोर्ट ये कभी नहीं कह सकता कि जब तक किसी कपल की क़ानूनन शादी नहीं हुई, तब तक उन्हें सुरक्षा नहीं मिलेगी। उन्होंने कहा, ‘कई बार जब किसी कपल की शादी नहीं हुई होती है तो कोर्ट अपनी धारणाओं के आधार पर आदेश देता है।’

उन्होंने कहा, ‘लिव-इन रिलेशनशिप ग़ैर क़ानूनी नहीं है। अगर कोई शादीशुदा व्यक्ति लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है, तो उनके पति या पत्नी तलाक़ की माँग कर सकते हैं। बस ये बात आती है कि आपके पास ऐसे संबंधों में कैसे अधिकार होंगे। जैसे, अगर आपका साथी आपको छोड़ कर चला जाए, तो क्या आपके पास भरण पोषण, यानी मेंटेनेंस का अधिकार होगा या नहीं। कई क़ानून, जैसे घरेलू हिंसा के क़ानून में उन संबंधों की बात की है जहाँ भले ही लोगों की शादी नहीं हुई, पर वे साथ रह रहे हैं।’

भारतीय दंड संहिता में एडल्टरी को अपराध बताया गया था। यानी वैसे मामले जहाँ किसी आदमी ने एक शादीशुदा महिला से बिना उसके पति की अनुमति के संबंध बनाया हो। हालांकि, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान को असंवैधानिक बताया था।

उत्तराखंड और गुजरात में समान नागरिक संहिता के तहत लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण करना अनिवार्य किया गया था। उत्तराखंड के क़ानून की संवैधानिकता को चुनौती देने वाले मामले फि़लहाल राज्य के हाई कोर्ट में लंबित हैं। (bbc.com/hindi)


अन्य पोस्ट