विचार / लेख

तुम देख भी पाते हो या नहीं?
31-Mar-2026 10:26 PM
तुम देख भी पाते हो या नहीं?

-सिद्धार्थ ताबिश

सरकारें तुम्हें शादी करने और बच्चे पैदा करने के लिए उकसाती हैं। साहित्यकार तुम्हें प्रेम और परिवार के मायने समझाते हैं। तुम धड़ाधड़ शादी करके बच्चे पैदा करते हो क्योंकि तुम्हें ये समझाया गया है कि बिना बच्चों के जीवन बेकार है। बच्चे बुढ़ापे का सहारा होते हैं। और जो ये तुम्हें समझाते हैं वो बड़े बड़े अस्पताल खोलते हैं और तुम्हारा इंश्योरेंस करते हैं ताकि तुम्हें बेहतर इलाज मिले और अच्छी देखभाल हो.. फिर अगर उन्हें ही तुम्हारी देखभाल करनी थी तो बच्चे क्या तुमने सिर्फ तुम्हें अस्पताल भेजने के लिए पैदा किए थे?

अब घरों में तुम्हारे झाड़ू पोछा करने वाली नौकरानी आती है, खाना बनाने वाली भी आती है, तुम्हें देखकर भी समझ नहीं आता है कि तुम्हारे पास बस सिर्फ पैसा होना था और तुमने जो सारा जीवन बच्चों को पालने, पढ़ाने, शादी करने और उन्हें सेटल करने में बर्बाद किया और उनपर पैसा खर्च किया, उस से तुम्हारा बुढ़ापा दस नौकर रख के बिंदास कट सकता था?

मैं ये नहीं कहता कि तुम बच्चे न पैदा करो और शादी न करो मगर इस व्यवस्था को ‘अनिवार्य’ व्यवस्था क्यों समझ कर नशे में जिए जा रहे हो?

बच्चे बुढ़ापे का सहारा होते हैं इस मानसिकता से बाहर तो आओ कम से कम.. क्योंकि इन्हीं बच्चों के लिए एलपीजी और पेट्रोल की लाइन में तुम्हें लगना पड़ता है। तुम्हारा जीवन नर्क बना हुआ है बच्चों को पालने, पोसने, पढ़ाने और शादी करने में। तुम 18 छोड़ो 45 साल के बच्चे को भी अपने पास चिपकाए रखना चाहते हो तो ये परिवार की व्यवस्था तुम्हारे लिए है ही नहीं.. ये उनके लिए होती है जो अपने 18 साल के बच्चे को घर से लात मारकर भगा देते हैं और स्वयं जीते हैं और उसे जीने देते हैं। परिवार की अवधारणा तुम भारतीयों के लिए है ही नहीं क्योंकि तुम्हारी समझ ही इतनी विकसित नहीं हो पा रही है किस उम्र में तुम्हें क्या करना है

शादी की पक्की अवधारणा तुमने ब्रिटिश लोगों से सीखी.. दहेज लेने और देने की अवधारणा तुम्हें ब्रिटिश से सीखी। लडक़ा पैदा करने का चलन तुमने ब्रिटिश से सीखा.. मगर वो ये सब तुमको सिखा के आगे बढ़ गए, उनका समाज विकसित हो गया और तुम अभी भी कोर्ट में माई लॉर्ड माई लॉर्ड करते घूम रहे हो और अपने बच्चों को छुट्टी के एप्लीकेशन में भी ‘आई बेग टू से’ लिखवाते हो। शादी, कुंवारापन, बच्चे, और बच्चे बुढ़ापे का सहारा ये ब्रिटिश टाइम के विक्टोरियन ज़माने की चीज़ें हैं.. महारानी विक्टोरिया के समय शादी के बिना किसी स्त्री को छूना पाप था और शादी करना अनिवार्य था.. भारत में ये सब नहीं था.. तुम अंग्रेजों की हज़ारों साल पुरानी अवधारणा को कॉपी किए पड़े हो और इस से बाहर ही नहीं निकल पा रहे हो

तुम इस्लामिक और ब्रिटिश अवधारणाओं और कानून के बीच फंसी एक अजीब सी विचित्र प्रजाति बन चुके हो.. अंग्रेजों ने आईएएस और पीसीएस बनाने के लिए इतना मुश्किल इम्तेहान जान कर बनाया था ताकि ये नौकरी भारतीयों को न मिले.. कोई एक पास कर जाता था तो इसे ये नौकरी देते थे और बाकी अपने अंग्रेजों को ये बिना किसी इम्तेहान के अधिकारी बनाते थे.. तुम आज भी अपने बच्चों को अंग्रेजों की तजऱ् पर वही मुश्किल एग्जाम पास करवाने के लिए मरे जा रहे हो और तुम्हें अभी भी ये लगता है कि किसी को अधिकारी बनने के लिय दुनिया की सारी किताबें रट कर एग्जाम पास करना चाहिए? कोई अधिकारी इतिहास की किताबें रट कर आया है तो वो एक जिले को चलाने के क़ाबिल हो गया है?

तुम कब तक इन बेतुकी अवधारणाओं के गुलाम बने रहोगे? कब तक अपना सारा जीवन ईएमआई भरने में ग़ुज़ारोगे सिर्फ इसलिए क्योंकि तुम्हारी मां चाहती थी कि तुम शादी करके बच्चे पैदा करो क्योंकि विक्टोरिया महारानी के समय शादी एक दैवीय कार्य था? तुम्हें क्यों दो बच्चे पैदा करके उन्हें स्कूल में पढ़ाना है और खुद जोमैटो का डिलीवरी बॉय बनकर उनके स्कूल का खर्चा उठाना है? क्यों तुम्हें अपने इस जीवन जीने की अवधारणा को इतना जटिल बना लिया है कि जीवन तुम्हारे लिए इस पृथ्वी पर जीना ही अपने आप में एक ‘सजा’ और ‘प्रताडऩा’ के अलावा कुछ नहीं बचा है?

तुम मुंह बाए दस किलो राशन लेने के लिए लाइन में लगने यहां आए हो? और उसी में तुम बच्चे पैदा करके उन्हें भी लाइन में लगाते हो.. और अब जबकि तुम ऐसे हालात में आराम से अपने अकेले के लिए एक गोबर के उपले पर एक दिन का खाना बना सकते थे, आज सरकार के कैरोसीन और एलजीपी दे देने पर बड़े खुश हो जाते हो और इसी खुशी में दो बच्चे और पैदा करने का प्लान बना लेते हो.. क्यों? जहाज के जहाज तुम्हारे लिए ईंधन भर के ला रहे हैं और तुम इसमें अपनी जीत मानते हो कि तुम्हारे दो जहाज ईरान ने निकलने दिए?

तुम्हें इतने ईंधन की आवश्यकता क्यों पड़ी? किसने तुम्हें इन आदतों को पालने पर मजबूर किया और कब तुम इन आदतों में फंस के रह गए, तुम देख भी पाते हो या नहीं?


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