राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : मछलियाँ तो ठीक हैं, मगरमच्छ?
12-May-2026 5:43 PM
राजपथ-जनपथ : मछलियाँ तो ठीक हैं, मगरमच्छ?

मछलियाँ तो ठीक हैं, मगरमच्छ?

ईडी ने अंबिकापुर जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक की जांच तेज कर दी है। ताजा खबर यह है कि जांच एजेंसी ने बैंक के आधा दर्जन ऐसे खातों का पता लगाया है, जिनमें करोड़ों का लेनदेन हुआ है। इन खातों का ब्यौरा मांगा गया है। यह भी जानकारी सामने आई है कि बैंक से जुड़ी शाखाओं में वर्ष 2013-14 से गड़बड़ी शुरू हो गई थी और करीब 10 साल बाद इसका खुलासा हुआ।

बताते हैं कि बैंक में करोड़ों की गड़बड़ी की जानकारी विभाग के आला अफसरों को पहले से थी, मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई। बाद में पुलिस ने धोखाधड़ी के प्रकरण में बैंक अधिकारियों के खिलाफ केस दर्ज किए, तब जाकर राज्य स्तरीय जांच टीम बनाई गई। यह टीम कई बार अंबिकापुर गई, लेकिन गड़बड़ी को लेकर कोई नई जानकारी नहीं जुटा पाई। अब ईडी ने जांच शुरू की है, तो राज्य स्तरीय जांच टीम से भी पूछताछ हो सकती है।

भारतमाला परियोजना में राज्य की एजेंसी ने पहले छोटी मछलियों पर ही कार्रवाई की थी, लेकिन ईडी ने कई बड़े लोगों को भी घेरे में लिया, जो अब तक जांच से बचे रहे थे। हालांकि बैंक घोटाले में अभी तक ईडी की ओर से कोई नई कार्रवाई नहीं हुई है, लेकिन चर्चा है कि कई प्रभावशाली लोग जांच के दायरे में आ सकते हैं। देखना है आगे क्या होता है।

छत्तीसगढ़ की गलती केरल में दोहराती कांग्रेस

पांच राज्यों के नतीजे आए एक सप्ताह से अधिक हो चुके हैं। बाकी राज्यों में मुख्यमंत्री तय हो चुके, शपथ-ग्रहण भी हो चुका, लेकिन एक राज्य, केरल जहां कांग्रेस को सरकार बनानी है, अभी तक मुख्यमंत्री का नाम फाइनल नहीं हुआ है। वैसे तो वहां के विधायक दल ने कांग्रेस हाईकमान पर फैसला छोड़ दिया है, पर विधायकों के तीन गुट हैं, जो अलग-अलग नामों का समर्थन कर रहे हैं, बल्कि समर्थक शक्ति प्रदर्शन भी कर रहे हैं। अतीत से पता चलता है कि ऐसे मामले में भारतीय जनता पार्टी के उलट कांग्रेस हाईकमान मजबूती से और जल्दी फैसला नहीं ले पाता। सन् 2018 में कांग्रेस की भारी बहुमत से वापसी हुई तो पार्टी नेतृत्व के सामने यही संकट था। अंत में दोनों दावेदारों को ढाई-ढाई साल का टर्म देने की बात हुई। हालांकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने किसी ऐसे समझौते को स्वीकार नहीं किया था और सिंहदेव अपने टर्म के लिए हाईकमान के फैसले की प्रतीक्षा करते रहे। बघेल खेमे को दिल्ली में विधायकों की परेड कर बताना पड़ा कि बहुमत उनके साथ है। कर्नाटक में भी सिद्धारमैया और डी. शिवकुमार के बीच ढाई-ढाई साल का समझौता हुआ, प्रचारित था, पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया कुर्सी छोडऩे को राजी नहीं है और शिवकुमार के समर्थकों में असंतोष देखा जा रहा है। केरल में अजीब स्थिति है। यहां ढाई-ढाई साल की सांत्वना से काम नहीं चलने वाला है क्योंकि यहां तीन दावेदार हैं। पिछली सरकार में विपक्ष के नेता रहे बीडी सतीसन, वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला और एआईसीसी महासचिव केसी वेणुगोपाल। केरल में कांग्रेस की सहयोगी पार्टी आईयूएमएल ने सतीसन के नाम का समर्थन किया है, लेकिन उन्हें वेणुगोपाल के नाम पर आपत्ति है। उसका कहना है कि उन्होंने तो विधानसभा चुनाव ही नहीं लड़ा। इस समय वे सांसद हैं। मगर, दिलचस्प यह है कि केरल में अधिकांश टिकट वेणुगोपाल ने ही फाइनल किए हैं, और 40 से अधिक विधायक उन्हें सीएम बनाना चाहते हैं। कांग्रेस यहां 63 सीटों पर विजयी रही, गठबंधन के साथ उसे 102 सीटें मिली हैं।

याद कीजिए सन् 2023 में भाजपा ने छत्तीसगढ़ में कई दिग्गजों को मंत्रिमंडल में नहीं लिया। सीएम बनने की कतार में जिन नामों की चर्चा थी, उनको भी निराश होना पड़ा। उसके पहले के लोकसभा चुनाव में सारे सीटिंग सांसदों की टिकट काट दिया था। पर, कांग्रेस के साथ ऐसी स्थिति नहीं है। सरकार होने के दौरान छत्तीसगढ़ कांग्रेस में बड़े नेताओं की लड़ाई ने एक दूसरे को निपटा दिया। ऐसा ही कुछ ढुलमुल रवैया कांग्रेस हाईकमान का मध्यप्रदेश और राजस्थान के मामले में देखा गया। मध्यप्रदेश में कमलनाथ-दिग्विजय सिंह की जोड़ी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को किनारे कर दिया, जबकि वे सीएम के दावेदार थे। उनके समर्थक विधायकों ने मिलकर सरकार ही गिरा दी। सन् 2023 के चुनाव परिणामों के बाद एक झटके में शिवराज सिंह चौहान के टर्म को समाप्त कर दिया, मगर सिंधिया को भी मौका नहीं दिया। राजस्थान में कांग्रेस सरकार बीच में तो नहीं गिरी, पर छत्तीसगढ़ की तरह 2023 के चुनाव में गिर गई। यहां अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच जबरदस्त खींचतान है। कांग्रेस हाईकमान ने कर्नाटक के मामले को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है, अभी अगला विधानसभा चुनाव दूर है। दरअसल, कांग्रेस के पास यह समस्या तब से है, जब से केंद्र में भाजपा की सरकार आई है। प्रदेश के असंतुष्ट नेताओं को वैकल्पिक किसी बड़े ओहदे में बिठा देने का विकल्प नहीं है।

जब रायपुर की बैलगाडिय़ों में भरती थी ‘हवा’

एक ऐसा किस्सा, जिसे आज की पीढ़ी शायद कहानी समझे ( गोकुल सोनी )

आज मैं आपको रायपुर का एक ऐसा किस्सा सुनाना चाहता हूं, जिसे मैंने अपनी आंखों से देखा है। ऐसा किस्सा, जिसे आज की पीढ़ी शायद सुनकर हंस भी दे और हैरान भी हो जाए।

जब महापौर जीप में बैठकर करते थे शहर का दौरा...........

सत्तर के दशक की बात है। उन दिनों तरुण दादा एक बार पहले भी रायपुर के महापौर रह चुके थे। शायद तब महापौर का कार्यकाल केवल एक वर्ष का हुआ करता था। उसी दौर में आर.एन. मूर्ति जी और स्वरूपचंद जैन जी भी महापौर बने थे।  उस समय नगर निगम के पास एक पेट्रोल से चलने वाली सफेद रंग की जीप हुआ करती थी। तरुण दादा उसी जीप में सामने बैठकर पूरे शहर का दौरा किया करते थे।

आज की तरह न बड़ी-बड़ी गाडिय़ों का काफिला होता था और न चमक-दमक। शहर छोटा था, लोग सीधे थे और काम भी धीरे मगर टिकाऊ होता था।

जब सडक़ बनाना किसी तपस्या से कम नहीं था..........

आज तो रातों-रात मशीनें आकर सडक़ बना देती हैं। लेकिन उस समय एक किलोमीटर सडक़ बनने में तीन-चार दिन लग जाते थे।

सडक़ किनारे भ_ी बनाई जाती थी। उसमें लकडिय़ां जलती रहती थीं। ऊपर डामर के खाली ड्रम को काटकर बड़ी कढ़ाई जैसी बनाई जाती थी, जिसमें डामर पिघलाया जाता था।

फिर मजदूर रेत, गिट्टी और डामर का घोल तैयार करते और हाथों से सडक़ बिछाते थे। बाद में स्टीम इंजन वाली भारी-भरकम रोड रोलर उसे दबाकर समतल करती थी।  उस दौर में सडक़ बनाना केवल काम नहीं, मेहनत और धैर्य का इम्तिहान था।

बैलगाडिय़ां बनीं नई समस्या............

चूंकि सडक़ें इतनी मेहनत से बनती थीं, इसलिए उनकी देखरेख भी बहुत जरूरी मानी जाती थी।  उसी समय शहर में बड़ी संख्या में बैलगाडिय़ां चलती थीं। खासकर गुढियारी के थोक बाजार से सामान दुकानों तक पहुंचाने के लिए हमाल और व्यापारी बैलगाडिय़ों का इस्तेमाल करते थे।

उन बैलगाडिय़ों के पहियों पर मोटे लोहे का पट्टा चढ़ा होता था, जिसे छत्तीसगढ़ी में च्च्बाटज्ज्  कहते हैं। यही लोहे की बाट नई डामर वाली सडक़ों को जल्दी खराब कर देती थी।  अधिकारियों के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई।

बैलगाड़ी बंद करें या लोगों की रोजी बचायें ?.............

कुछ अधिकारियों ने सुझाव दिया कि शहर में बैलगाडिय़ों के चलने पर रोक लगा दी जाए।  लेकिन परेशानी यह थी कि सैकड़ों लोगों की रोजी-रोटी उन्हीं बैलगाडिय़ों पर टिकी थी। उन्हें बंद करना आसान नहीं था।

फिर किसी ने एक अनोखा सुझाव दिया — क्यों न बैलगाड़ी के पुराने लकड़ी और लोहे वाले पहियों की जगह ट्रक के टायर लगा दिए जाएं ?  बस, यहीं से रायपुर में एक नया प्रयोग शुरू हुआ।

नगर निगम के सामने लग गई भीड़..........

नगर निगम से आदेश निकला कि जिसके पास भी बैलगाड़ी है, वह अपना पंजीयन कराए। फिर क्या था,  नगर निगम कार्यालय के सामने बैलगाड़ी वालों की भीड़ लग गई। सब अपने-अपने गाड़ों का रजिस्ट्रेशन कराने पहुंचे।

धीरे-धीरे पुरानी लोहे की बाट वाले पहिए हटाए गए और उनकी जगह ट्रक के टायर वाले पहिए लगाए जाने लगे।  उस समय रायपुर की सडक़ों पर बैलगाड़ी और ट्रक के टायर का यह अनोखा मेल लोगों के लिए कौतूहल का विषय बन गया था।

जब बैलगाड़ी में भी भरती थी हवा..........

अब जरा इस दृश्य की कल्पना कीजिए,  एक तरफ बैलगाड़ी खड़ी है, सामने बैल बंधे हैं और दूसरी तरफ पंचर दुकान वाला मशीन से उसके टायर में हवा भर रहा है।  आज यह सुनने में सामान्य लगेगा, लेकिन उस समय यह दृश्य इतना अनोखा था कि लोग रुक-रुककर देखते थे।

जब मैं नया-नया फोटो जर्नलिस्ट बना था, तब मैंने पहली बार ऐसा दृश्य देखा। देखा तो पहले भी था तब एक फोटोजर्नलिसट का नजरिया नहीं था।  मुझे वह इतना अलग लगा कि मैंने तुरंत उसकी तस्वीर खींच ली।  बाद में वह फोटो नवभारत अखबार के अंतिम पृष्ठ पर प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी।

धीरे-धीरे खत्म हो गया वह दौर............

फिर समय बदला। शहर में तीन पहिया ऑटो आये, मेटाडोर आये और धीरे-धीरे ट्रक के टायर वाली बैलगाडिय़ां सडक़ों से गायब होने लगीं।  बताते हैं कि कुछ साल पहले तक कन्हैया साहू नाम के एक गाड़ीवान ऐसी बैलगाड़ी चलाते दिखाई दे जाते थे। लेकिन उनके निधन के बाद रायपुर से यह दृश्य भी हमेशा के लिए खत्म हो गया।

अब केवल यादों में बची

हैं वे बैलगाडिय़ां..........

आज की पीढ़ी शायद यकीन भी न करे कि कभी रायपुर में ऐसी बैलगाडिय़ां चलती थीं जिनमें ट्रक के टायर लगे होते थे और पंचर दुकानों पर उनमें हवा भरी जाती थी। लेकिन यही तो पुराने रायपुर की खूबसूरती थी।  यह शहर हर मोड़ पर कोई न कोई ऐसा किस्सा छुपाकर बैठा है, जिसे सुनते ही पुराना दौर आंखों के सामने चलती तस्वीर की तरह जीवंत हो उठता है।


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