राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : सत्ता की रोटी पलटती रहनी चाहिए...
05-May-2026 6:08 PM
राजपथ-जनपथ : सत्ता की रोटी पलटती रहनी चाहिए...

सत्ता की रोटी पलटती रहनी चाहिए...

पश्चिम बंगाल के हालिया चुनाव और छत्तीसगढ़ के 2023 विधानसभा नतीजों में कई समानताएं नजर आती हैं। तब भाजपा ने अपन व्यापक संसाधनों और कैडर के जरिये कांग्रेस के खिलाफ लगभग उसी तरह का माहौल बनाया था, जैसा पश्चिम बंगाल में ममता बेनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सरकार के खिलाफ। भ्रष्टाचार, एंटी-इनकंबेंसी, कानून-व्यवस्था और महिलाओं, युवाओं व संप्रदायों के बीच असंतोष जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। पश्चिम बंगाल में 15 साल की एंटी-इनकंबेंसी थी, जबकि छत्तीसगढ़ में महज पांच साल में ही माहौल बदलने में भाजपा को सफलता मिल गई। इसकी एक बड़ी वजह यह रही कि पश्चिम बंगाल में भाजपा कभी सत्ता में नहीं रही और वहां अपना कैडर तैयार करने में उसे एक दशक से अधिक समय लगा। इसके विपरीत, छत्तीसगढ़ में सत्ता से बाहर रहने के बावजूद भाजपा संगठनात्मक रूप से मजबूत बनी रही, जो विधानसभा चुनाव के कुछ ही महीनों बाद हुए लोकसभा चुनाव के नतीजों से भी दिखा।

कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ में महतारी वंदन योजना के फॉर्म भरवाने के अभियान ने भाजपा के पक्ष में माहौल पलट दिया। पश्चिम बंगाल में भी भाजपा की ओर से इसी तरह के डायरेक्ट बेनिफिट से जुड़े फॉर्म भरवाने का अभियान चला, लेकिन वह छत्तीसगढ़ की तरह घर-घर तक नहीं पहुंचा। इसके बावजूद भाजपा को बड़ी सफलता मिली, जिसका मतलब है कि टीएमसी की पराजय के कारण और भी थे।

छत्तीसगढ़ में भाजपा ने सीजीपीएससी भर्ती, कोयला, शराब और डीएमएफ घोटाले के साथ महादेव सट्टा ऐप जैसे मुद्दों को इस तरह उछाला कि सरकार के कई सकारात्मक काम पीछे छूट गए। इन कामों में वादे के अनुरूप देश में सबसे ऊंची धान कीमत देना, तेंदूपत्ता सहित अन्य वनोपजों का बेहतर भुगतान, शिक्षाकर्मियों का नियमितीकरण और छत्तीसगढ़ी संस्कृति को बढ़ावा देना शामिल थे। पश्चिम बंगाल में भी अधिकारियों और मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने कल्याणकारी योजनाओं, खासकर महिलाओं से जुड़ी योजनाओं को पीछे धकेल दिया। शिक्षक भर्ती घोटाला, शारदा चिटफंड मामला, परिवारवाद, विशेषकर भतीजे अभिषेक बेनर्जी के बढ़ते प्रभाव ने असर डाला। छत्तीसगढ़ में भी बड़ी नियुक्तियों और सीजीपीएससी चयन प्रक्रियाओं को लेकर उठे सवालों ने इसी तरह की धारणा को जन्म दिया। बड़ी नियुक्तियों और सीजीपीएससी- 2021 के चयन में आप परिवारवाद का वर्चस्व देख सकते हैं।

जैसे छत्तीसगढ़ में कुछ मंत्रियों और विधायकों की छवि घोटालों से प्रभावित हुई, वैसे ही पश्चिम बंगाल में भी हुआ। साख बचाने के लिए ममता बेनर्जी ने 33 प्रतिशत यानी 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए थे। छत्तीसगढ़ में भी भूपेश बघेल और चुनाव के ठीक पहले डिप्टी सीएम बने टीएस सिंहदेव ने मिलकर यहां भी लगभग 33 प्रतिशत ही, यानी 22 विधायकों के टिकट काट दिए।

भाजपा के कुछ प्रमुख राजनीतिक हथियार ऐसे हैं, जो भावनात्मक स्तर पर मतदाताओं को प्रभावित करते हैं। आदिवासी क्षेत्रों, खासकर बस्तर में, धर्म परिवर्तन को लेकर माहौल गरमाया गया और हिंसक घटनाएं भी हुईं। हालात ऐसे बने कि कई जगह अंतिम संस्कार के लिए जमीन तक को लेकर विवाद खड़ा हुआ, और अब यह स्थायी समस्या बन चुकी है। बेमेतरा-साजा को लेकर सीबीआई रिपोर्ट अभी कुछ माह पहले आई है। केंद्र की ही एजेंसी ने इसे आपसी विवाद बताया, न कि सांप्रदायिक, पर भाजपा ने इस मुद्दे पर कई सीटों पर धाक जमा ली। कवर्धा में रोहिंग्या मुसलमानों की मौजूदगी को लेकर भी राजनीतिक विमर्श होता रहा। सरकार बनते ही रोहिंग्या गायब हो गए। पर, इन मुद्दों पर कांग्रेस की चुप्पी और निष्क्रियता ने भाजपा को बढ़त दिलाई और कई सीटों पर नतीजे पलट गए।

पश्चिम बंगाल में भी घुसपैठियों का मुद्दा इसी तरह का है। तृणमूल बचाव में रही और भाजपा हमलावर। यह धारणा बनाई गई कि 30 प्रतिशत अल्पसंख्यक वोट एकतरफा हैं, जबकि इन वोटों के बंटवारे के लिए हुमायूं कबीर और औवेसुद्दीन कुरैशी के उम्मीदवार भी मैदान में थे।

छत्तीसगढ़ कांग्रेस में अंतर्कलह उसी तरह दिखी, जैसी तृणमूल कांग्रेस में नजर आई। एक व्यक्ति केंद्रित नेतृत्व की छवि दोनों जगह उभरी। कांग्रेस शासन के दौरान किन विधायकों के काम प्राथमिकता से होते थे, कौन मंत्री सार्वजनिक रूप से अपनी ही सरकार की आलोचना करता रहा, और किन नेताओं को किनारे लगाने की कोशिश हुई, छत्तीसगढ़ में सबने देखा। पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी जैसे नेता भाजपा के प्रमुख चेहरे बन गए, जबकि मुकुल रॉय जैसे नेताओं की वापसी के बावजूद प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा। तापस रॉय और कुणाल घोष जैसे नेताओं की नाराजगी भी टिकट वितरण में सामने आई। कारण यह बताया गया कि अभिषेक बेनर्जी युवा कैडर पर अधिक भरोसा कर रहे थे और पुराने नेताओं को पीछे कर दिया गया।

छत्तीसगढ़ में भी सत्ता संभालने के बाद बघेल ने वरिष्ठों को किनारे लगाकर अपना अलग कैडर तैयार किया, जो चुनावी मैदान में खुद तो निपटे, पार्टी को भी निपटा गए। कई टिकट व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के आधार पर बदले गए और जहां बदलाव नहीं हुआ, वहां हार का माहौल बनने दिया गया। सिंहदेव खेमे की अपनी संतुष्टि सरगुजा तक सीमित थी। भाजपा ने इस असंतोष का लाभ उठाया। जिस नेता की सिंहदेव ने टिकट काटने को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया, वह आज सांसद है।  यह आंतरिक खींचतान कार्यकर्ताओं को रास नहीं आई, जैसा पश्चिम बंगाल में भी देखा गया। दोनों ही जगह संगठन की भूमिका कमजोर रही और निर्णय लेने की ताकत उन्हीं के हाथ में केंद्रित रही, जिनके पास सत्ता थी।

जनता की भूमिका सबसे निर्णायक होती है। पश्चिम बंगाल की जनता को विकल्प चाहिए था, जबकि कमजोर संगठन वाले वाम मोर्चा और कांग्रेस उस विकल्प के रूप में उभर नहीं सके। भाजपा ने लंबे समय तक जमीनी स्तर पर तैयारी कर अपनी पकड़ मजबूत की और उसका परिणाम सामने आया। समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया ने कहा था कि सत्ता को समय-समय पर बदलते रहना चाहिए, अन्यथा वह जड़ हो जाती है। लंबे समय तक सत्ता में रहने से परिवारवाद, निहित स्वार्थ और भ्रष्टाचार बढऩे का खतरा रहता है। इसलिए सत्ता का परिवर्तन लोकतंत्र को जीवंत, जवाबदेह बनाए रखने के लिए जरूरी है।

बंगाल सीएस का आदेश, छत्तीसगढ़ और आंध्र

पश्चिम बंगाल में भाजपा की दो तिहाई जीत के बाद कोलकाता के रायटर्स बिल्डिंग में नई सरकार और उसकी शासन व्यवस्था की कवायद तेज हो गई है। बंगाल के मुख्य सचिव ने सभी विभागों के  सचिव और कल ही एक आदेश जारी कर दिया है। इसमें  उन्होंने फाइलों और दस्तावेजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त निर्देश जारी किए हैं। बिना अनुमति कोई फाइल रायटर्स बिल्डिंग से बाहर ले जाने या उसकी कॉपी करने पर रोक लगाई गई है और उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। बता दें कि चुनाव अभियान के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा था कि दीदी का खेला होने के बाद उनकी सरकार में हुए घोटालों की जांच कर कार्रवाई की जाएगी। इस आदेश ने पहले छत्तीसगढ़ और फिर आंध्र प्रदेश में पूर्व के वर्षों में हुए ऐसे की घटनाओं की यादें ताजा कर दी। 2018 में छत्तीसगढ़ में सरकार बदलते ही तत्कालीन गृहमंत्री के बंगले में कई गोपनीय नस्तियों को आग के हवाले किया गया था। इसके बाद यही उपक्रम 2023 में भी कांग्रेस के एक मंत्री के बंगले में भी हुआ। इतना ही नहीं एक मंत्री पर तो सरकारी आवास के महंगे सामान खोल कर ले जाने का भी खुलासा हो चुका था। आंध्र में भी जगन सरकार के मंत्री ने भी बकायदा मंत्रालय परिसर में ही कागजात जलवाए थे। इसे देखते हुए आने वाले हर चुनाव बाद राज्यों में बहुमत के रुझान आते ही आउट गोइंग सरकार के लिए मुख्य सचिवों को  ऐसे अंतिम आदेश निकालने की नई परंपरा बन सकती है।

कांग्रेस-भाजपा में माहौल अलग-अलग

पश्चिम बंगाल और असम में जीत के बाद भाजपा खेमे में उत्साह चरम पर है। प्रदेशभर के पार्टी कार्यालयों में जश्न का माहौल रहा, और बंगाल की पहचान बन चुकी झालमुड़ी के साथ जीत का स्वाद लिया गया। दूसरी ओर, कांग्रेस खेमे में निराशा है। छत्तीसगढ़ के नेताओं ने दोनों राज्यों में जमकर मेहनत की थी, लेकिन परिणामों ने अब राजनीतिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप को तेज कर दिया है।

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को असम चुनाव का पर्यवेक्षक बनाया गया था। उनके साथ विकास उपाध्याय और विनोद वर्मा भी क्रमश: प्रभारी सचिव और पर्यवेक्षक थे। असम में कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन के बाद भाजपा ने इसे मुद्दा बना लिया है और सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए कहा जा रहा है कि जहां-जहां बघेल को जिम्मेदारी मिली, वहां कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा।

सिर्फ बघेल ही नहीं, पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस. सिंहदेव भी पार्टी की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर सके। उन्हें तमिलनाडु और पुडुचेरी में टिकट वितरण की जिम्मेदारी दी गई थी, जहां कांग्रेस का खराब रहा। हालांकि सचिन पायलट के लिए यह दौर सकारात्मक रहा।केरल में प्रभारी के तौर पर उनकी भूमिका पार्टी की जीत के साथ जुड़ी, जिससे संगठन में उनका कद बढऩा तय माना जा रहा है।

दूसरी ओर, भाजपा खेमे में छत्तीसगढ़ के नेताओं की भूमिका को लेकर संतोष का माहौल है। संगठन महामंत्री पवन साय को बंगाल में 56 सीटों की जिम्मेदारी मिली थी, और पार्टी ने वहां शानदार प्रदर्शन किया। इसी तरह असम में डिप्टी सीएम अरुण साव, केंद्रीय मंत्री तोखन साहू और वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने बूथ स्तर तक काम संभाला, जिसका असर नतीजों में दिखा। इन सफलताओं का असर रायपुर तक साफ नजर आया। पार्टी दफ्तरों से लेकर मंत्रियों के बंगलों तक जश्न का दौर चला। दिलचस्प यह रहा कि झालमुड़ी की मांग इतनी बढ़ गई कि बेचने वालों की कमी पड़ गई।

आग बुझाने वाले कहां हैं?

जशपुर जिले के जंगल में आग लगी, वहां से गुजरते हुए कुछ पर्यटकों ने अपनी कोशिश की और आग बुझाने का प्रयास किया। लेकिन यह नाकाफी साबित हुआ। आग फैलने से रोका नहीं जा सका। छत्तीसगढ़ के जंगलों में इन दिनों हर रोज सैकड़ों की संख्या में आग लगने की छोटी-बड़ी घटनाएं हो रही हैं, लेकिन बीट गार्ड और आग बुझाने वाली वन विभाग की टीम नजर नहीं आती।   


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