राजपथ - जनपथ
जनगणना में आदिवासी पहचान की लड़ाई
जनगणना के आंकड़ों में छत्तीसगढ़ी को भाषा के रूप में दर्ज कराने के लिए मुहिम चल रही है। उसी तरह से आदिवासी संगठन आह्वान कर रहे हैं कि समाज के लोग जनगणना में अपना धर्म आदिवासी दर्ज कराएं।
छत्तीसगढ़ में आदिवासी की कुल आबादी लगभग 30 प्रतिशत है। दक्षिण छत्तीसगढ़ के बस्तर, बीजापुर, सुकमा,कोंडागांव, दंतेवाड़ा जैसे जिलों के गोंड, हल्बा, बैगा, कमार, ओरांव आदि जनजातियों की धार्मिक परंपरा प्रकृति पूजा और पूर्वजों की आराधना पर आधारित है। गोंड समुदाय में गोंडी या कोईतुर परंपरा, जबकि कुछ क्षेत्रों में सरना जैसी पूजा पद्धतियां चलन में हैं।
अब जब जनगणना की प्रक्रिया शुरू हो गई है, बस्तर संभाग के कई आदिवासी संगठनों ने धर्म के कॉलम में आदिवासी भरा जाए, इसका अभियान शुरू किया है। सर्व आदिवासी समाज बस्तर संभाग की ओर से कहा गया है कि धर्म के कॉलम में आदिवासी लिखा जाना केवल भिन्न धार्मिक पहचान के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि जल-जंगल-जमीन के अधिकार, पेसा कानून के अधिकार, सांस्कृतिक अस्तित्व और भविष्य में होने वाले विधानसभा, लोकसभा के परिसीमन से जुड़ा हुआ है।
इतिहास टटोलने पर पता चलता है कि 1871 से 1941 तक ब्रिटिश सरकार ने जनगणना में आदिवासियों को हिंदुओं या किसी भी अन्य धार्मिक समुदाय से अलग गिना था। समुदाय के तौर पर इन्हें एबोरिजिनल्स, एनिमिस्ट्स, ट्राइबल एनिमिस्ट्स, हिल एंड फॉरेस्ट ट्राइब्स या प्रिमिटिव ट्राइब्स कहा गया। उनकी धार्मिक श्रेणी को एनिमिज्म या ट्राइबल रेलिजन के रूप में दर्ज किया गया। अंग्रेजों का मानना था कि आदिवासियों की पूजा पाठ की पद्धति हिंदू मंदिरों की मूर्ति पूजा या वैदिक रीतियों से काफी अलग है। वे प्रकृति पर विश्वास रखते हैं, जिसमें कोई केंद्रीय देवता या पुजारी का वर्ग नहीं होता।
आजादी के बाद जब पहली जनगणना हुई तो भी इस व्यवस्था को कायम रखा गया लेकिन 1961 में एनिमिज्म या अलग आदिवासी श्रेणी हटा दी गई। इसके बाद ज्यादातर आदिवासियों को हिंदू की श्रेणी में डाल दिया गया या फिर उन्हें अन्य के कॉलम में दर्ज किया जाने लगा। सन् 2011 की जनगणना में करीब 8 करोड़ आदिवासियों में से लाखों लोगों को हिंदू या अन्य की श्रेणी में रखा गया। छत्तीसगढ़ में उस दौरान करीब 4 लाख 90 हजार आदिवासी अन्य धर्म या अलग मान्यता वाली श्रेणी में रखा गया।
देश के आजाद होने के बाद कांग्रेस सरकार ने कुछ समाजशास्त्रियों के निष्कर्षों को मानते हुए आदिवासियों को बैकवर्ड्स हिंदू की श्रेणी में शामिल किया। तर्क यह दिया गया कि वे भारतीय भूमि पर रहते हैं। हिंदू देवी-देवताओं को भी मानते हैं और उनकी संस्कृति हिंदू संस्कृति का हिस्सा है। राष्ट्रवादी व हिंदुत्व विचारधारा के लिए भी यह धारणा अनुकूल थी। उसने इस विचार को आगे ही बढ़ाया ताकि हिंदू आबादी में विस्तार दिखे। परिणाम यह निकला कि आदिवासियों की प्रकृति आधारित धार्मिक पहचान को बनाए रखने के लिए एक अलग संघर्ष शुरू हो गया। इस जनगणना में आदिवासी को अलग धर्म के रूप में दर्ज करने की अपील उसी संघर्ष का हिस्सा है।
स्मार्ट सिटी में मई दिवस

(तस्वीर- प्राण चड्ढा)
छत्तीसगढ़ के तीन स्मार्ट सिटीज़ में से एक- बिलासपुर का बृहस्पति बाजार। मई दिवस के दोपहर 12 बजे आग उगलते खुले आसमान के नीचे कुछ मजदूर इंतजार कर रहे हैं। ऐसे छोटे-छोटे कई और टुकड़े में बिखरे हुए। इंतजार कर रहे हैं कोई आए, बुलाए और आज की रोटी का जुगाड़ हो जाए। कुली, रेजा, मिस्त्री सब अपनी मेहनत और हुनर को लेकर बाजार में खड़े हैं, लेकिन इस मेहनत की कीमत तय करने वाला कोई नहीं। मांग और पूर्ति पर आधारित है। कंस्ट्रक्शन और त्यौहार के दिनों में जब मांग बढ़ती है तो ठीक-ठाक मजदूरी मिल जाती है, पर जब दोपहर तक काम नहीं मिलता तो मजदूर बेहद बेचैन हो जाता है। वह आधे दाम पर काम करने के लिए तैयार हो जाता है। हर रोज प्रशासन और पुलिस की नजर में ये आते हैं, क्योंकि संख्या सैकड़ों में होती है, रास्ता जाम हो जाता है- पर शायद ही किसी ने आकर पूछा हो कि तुम लोगों को न्यूनतम मजदूरी मिलती भी है या नहीं? कोई मजदूर संगठन भी इनकी सुध नहीं लेता।
छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस की बैठक में अध्यक्ष दीपक बैज ही मुखिया रहते हैं। लेकिन विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरण दास महंत को अपने जितनी ऊँची, बराबर की कुर्सी देते तो खुद की इज़्ज़त बढ़ती।


