राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : वीडियो पर गरमाई राजनीति
29-Apr-2026 5:44 PM
राजपथ-जनपथ : वीडियो पर गरमाई राजनीति

वीडियो पर गरमाई राजनीति

पूर्व सीएम भूपेश बघेल और एक अधिकारी का एआई जनरेटेड वीडियो इन दिनों चर्चा में है। वीडियो सामने आते ही स्वाभाविक रूप से कांग्रेस में नाराजगी देखी गई, और अलग-अलग जिलों में एफआईआर दर्ज कराई गई है। भाजपा के नेताओं ने भी इसे आपत्तिजनक बताया है। कांग्रेस नेता वीडियो की पड़ताल में जुटे हैं और इसके निर्माण में दो लोगों की संलिप्तता का संदेह जता रहे हैं।

मामले की जांच दुर्ग पुलिस की साइबर सेल कर रही है। प्रदेश में ऑडियो-वीडियो की राजनीति पहले भी सुर्खियों में रही है। विधायक खरीद-फरोख्त प्रकरण के ऑडियो की गूंज दिल्ली तक पहुंची थी। बहुचर्चित सेक्स सीडी कांड की जांच सीबीआई कर रही है, जिसमें खुद पूर्व सीएम भूपेश बघेल भी जांच के दायरे में हैं। सीबीआई इस मामले में चालान पेश कर चुकी है और 6 मई को अगली सुनवाई निर्धारित है।

ताजा मामले में पूर्व सीएम का यह वीडियो जाहिर तौर पर एआई जनरेटेड है, जिसे भूपेश बघेल की छवि धूमिल करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। वीडियो किसने बनाया, इसकी जांच जारी है, हालांकि कांग्रेस के कुछ नेताओं ने दो संदिग्धों के नाम पुलिस को सौंपे हैं। साइबर सेल द्वारा जल्द ही ठोस कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है।

दूसरी ओर, कुछ समय पहले भाजपा से जुड़े नेताओं का भी एक वीडियो वायरल हुआ था। इस मामले में रायपुर उत्तर के विधायक पुरंदर मिश्रा के नेतृत्व में सिविल लाइन थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी, और पुलिस ने चार लोगों को गिरफ्तार भी किया था।

एआई तकनीक के बढ़ते उपयोग के साथ फर्जी वीडियो का खतरा लगातार बढ़ रहा है। चुनाव नजदीक आने के साथ इस तरह के एआई जनरेटेड कंटेंट के इस्तेमाल की आशंका भी जताई जा रही है। नवा रायपुर में नवंबर में आयोजित डीजीपी-आईजी सम्मेलन में भी इस खतरे को लेकर चिंता व्यक्त की गई थी। अब आगे इस मामले में क्या कार्रवाई होती है, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।

पाठक को विदाई देने की तैयारी में आप कार्यकर्ता...

सन् 2022 में संदीप पाठक को आम आदमी पार्टी ने जब पंजाब के कोटे से राज्यसभा सदस्य बनाया था, तब वहां के लोगों से कहीं अधिक खुशी छत्तीसगढ़ के पार्टी कार्यकर्ताओं को हुई थी। उनका मुंगेली, बिलासपुर में भव्य स्वागत हुआ था। पाठक ने यहां आने पर कहा था कि उनकी पार्टी कांग्रेस और भाजपा दोनों का विकल्प बनेगी क्योंकि लोग दोनों से नाराज हैं। बहरहाल, उस प्रवास के बाद पाठक छत्तीसगढ़ बहुत कम आए। उन्हें छत्तीसगढ़ का संगठन प्रभारी बना दिया गया, तब भी यहां वे सक्रिय नहीं रहे। अब जब वे आम आदमी पार्टी छोडक़र भाजपा में शामिल हो गए हैं तो यहां के कार्यकर्ताओं का गुस्सा फूट पड़ा है। आम आदमी पार्टी की प्रदेश उपाध्यक्ष व प्रवक्ता प्रियंका शुक्ला ने अपनी पोस्ट में कई ऐसे खुलासे किए हैं, जिससे पता चलता है कि पाठक के तौर-तरीकों को लेकर कार्यकर्ताओं में पहले से ही नाराजगी थी। शुक्ला ने पोस्ट में लिखा है कि आपने हमारे जैसे कार्यकर्ताओं के साथ ही नहीं, छत्तीसगढ़ और पंजाब की जनता से धोखेबाजी की है। उन्होंने याद किया है कि संदीप पाठक की ओर से उन्हें पार्टी से बाहर निकालने की धमकी दी गई थी, क्योंकि इनकी टीम की बात उन्होंने दिल्ली में एक बड़े नेता तक पहुंचा दी थी। शुक्ला ने पूछा  है कि क्या आप भी जाति, धर्म आधारित नफरत की राजनीति करने वाले कपिल मिश्रा जैसे नेता बन जाएंगे? कहा है कि, या तो आप बहुत भोले हैं, या फिर बहुत चालाक... दोनों ही स्थितियों में टिक नहीं पाएंगे। हसदेव, बस्तर और रायगढ़ के लोगों को क्या मुंह दिखाओगे जिनके लिए लडऩे की बात करते रहे। जो तुम लोग दिल्ली से दूल्हा बनकर आते थे छत्तीसगढ़, तुम्हारे नाम पर जिन कार्यकर्ताओं ने नारे लगाए वे सब इंतजार में हैं। आओगे तो इस बार आखिरी विदाई लेकर जाना।

गुम हो चुकी पैडल रिक्शा

छत्तीसगढ़ के एक प्रमुख प्रेस फोटोग्राफर गोकुल सोनी अपने दशकों के काम के बाद अब फ़ेसबुक पर भी लगातार लिखते हैं। उन्होंने अभी लिखा है-रायपुर की सडक़ों से लगभग गुम हो चुकी पैडल रिक्शा की दुनिया कभी शहर की धडक़न हुआ करती थी।

आज जैसे ई-रिक्शों से शहर की सडक़ें भरी दिखती हैं, वैसा ही 80-90 के दशक में पैडल रिक्शों का दौर था। उस समय रायपुर की पहचान में रिक्शों की आवाजाही भी शामिल थी। शहर के चौक-चौराहे, बाजार, स्टेशन, अस्पताल हर जगह रिक्शों की कतारें नजर आती थीं।

पड़ोसी राज्यों से बड़ी संख्या में लोग रोज़ी-रोटी की तलाश में रायपुर आते थे। काम नहीं मिलने पर कई लोग किराये पर रिक्शा लेकर चलाने लगते। शहर में जगह-जगह रिक्शा स्टैंड बने थे। कई रिक्शा चालकों का अपना घर भी नहीं होता था। दिन भर मेहनत, और रात को उसी रिक्शे पर नींद। संघर्ष का वह दृश्य आज भी स्मृतियों में जिंदा है।

तब शहर में रिक्शा किराये पर देने वालों के कई गैरेज हुआ करते थे। चौक-चौराहों पर उनकी मरम्मत की छोटी-छोटी दुकानें भी होती थीं। दिलचस्प बात यह कि इन रिक्शों में न घंटी होती थी, न हॉर्न। हैंडल पर बंधे बड़े घुंघरू या घांघरे ही उनकी पहचान थे। भीड़ में रास्ता बनाने के लिए रिक्शा चालक उन्हें बजाते हुए निकलते। वह ध्वनि भी शहर की धडक़न जैसी लगती थी।

रिक्शे का किराया तय नहीं होता था। यात्री और चालक के बीच मोल-भाव आम बात थी। नगर निगम इन रिक्शों को पहचान के लिए नंबर देता था। चूंकि यह पैडल से चलते थे, इन्हें चलाने के लिए किसी लाइसेंस की जरूरत नहीं पड़ती थी।

फिर एक ऐतिहासिक मोड़ आया। मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने बड़ा फैसला लेते हुए रिक्शा चालकों को ही उनके रिक्शों का मालिकाना हक दे दिया। जो चालक जिस रिक्शे को चला रहा था, वही उसका मालिक बन गया। इस निर्णय ने हजारों मेहनतकश लोगों को सम्मान और स्वामित्व दिया, हालांकि रिक्शा गैरेज मालिकों को इससे आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा।

कुछ रिक्शा चालकों की छवि अपराध से जुड़ी खबरों के कारण संदिग्ध भी बनती थी, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे ईमानदार और स्वाभिमानी रिक्शा चालक भी थे, जिनकी मिसाल दी जाती थी। कई बार कोई सवारी अपना सामान रिक्शे में भूल जाता, तो रिक्शा चालक उसे संभालकर थाने में जमा कराने पहुंच जाता था। दूसरे दिन उनकी इस ईमानदारी की खबर अखबारों में बॉक्स आइटम के रूप में प्रमुखता से छपती थी। यह उस दौर के रिक्शा चालकों की मानवीय संवेदनशीलता और भरोसेमंद चरित्र का भी परिचायक था।

फिर समय बदला। ऑटो रिक्शा आए, फिर ई-रिक्शा। और धीरे-धीरे पैडल रिक्शा इतिहास बनने लगे। अब रायपुर की सडक़ों पर कभी-कभार कोई अकेला रिक्शा दिख जाता है, जैसे बीते दौर की कोई चलती-फिरती स्मृति।

रायपुर के इतिहास में पैडल रिक्शा सिर्फ एक सवारी नहीं थे, वे मेहनत, संघर्ष और शहर की जीवंत संस्कृति के प्रतीक थे।

क्या आपको भी पुराने रायपुर के रिक्शों की कोई याद है ?


अन्य पोस्ट