राजपथ - जनपथ
हसदेव अरण्य जैसा ग्रेट निकोबार
ग्रेड निकोबार परियोजना केंद्र सरकार की एक महत्वाकांक्षी बुनियादी ढांचा परियोजना है, जिसका उद्देश्य बंगाल की खाड़ी के रणनीतिक महत्व वाले इस द्वीप का समग्र विकास करना घोषित किया गया है। करीब 80 हजार करोड़ रुपये की यह परियोजना 900 वर्ग किलोमीटर में फैले ग्रेट निकोबार इलाके के 160 वर्ग किलोमीटर में लागू होने वाली है। इसके तहत इसमें एक बड़ा बंदरगाह, ग्रीनफील्ड अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक अत्याधुनिक टाउनशिप और पॉवर प्लांट स्थापित किए जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ साल पहले जब अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के लिए ऑप्टिकल फाइबर लाइन के जरिये हाई स्पीड इंटरनेट सेवा शुरू की थी, तब इसकी घोषणा की थी। अभी दो दिन पहले विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रस्तावित परियोजना स्थल का दौरा किया। उन्होंने इसे विकास के नाम पर विनाश और प्रकृति के खिलाफ अपराध बताया। ठीक वैसा ही जैसा हसदेव अरण्य में कोयला खनन की अनुमति दिए जाने को लेकर चिंताएं हैं। जो बातें राहुल गांधी ने ग्रेट निकोबार परियोजना के लिए कही हैं, करीब-करीब हसदेव पर भी वह लागू होती हैं। उन्होंने दावा किया कि परियोजना लागू होने से प्राचीन वर्षावन नष्ट हो जाएंगे और लाखों पेड़ों को काटा जाएगा। यह परियोजना शोम्पेन और निकोबारी जैसे आदिवासी समुदायों की विरासत और अस्तित्व के लिए खतरा बन रहा है।
यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि परियोजना के लिए वन अधिकार अधिनियम का उल्लंघन किया जा रहा है, जैसा कि हसदेव के मामले में है। ग्रेट निकोबार जनजातीय परिषद ने नवंबर 2022 में परियोजना के लिए एनओसी दी थी लेकिन बाद में यह सहमति यह कहकर वापस ले ली गई कि उन्हें पूरी जानकारी नहीं दी गई, अंधेरे में रखा गया। यह बात हसदेव में ग्राम सभाओं से ली जाने वाली मंजूरी के तरीके की तरह लगती है। परिषद के कुछ नेताओं ने आरोप लगाया है कि प्रशासन उन पर अपनी पैतृक भूमि सरेंडर करने के लिए दबाव डाल रहा है। उनका कहना है कि एफआरए के तहत निपटारा किए बिना उनकी भूमि का डायवर्सन किया जा रहा है। यह बात भी हसदेव के लिए किए गए अधिग्रहण से बहुत मिलती-जुलती है।
जनजातियों के अस्तित्व के संकट का सवाल शायद ग्रेट निकोबार में शायद हसदेव से भी ज्यादा गंभीर है। सर्वाइवल इंटरनेशनल नाम के एक अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ने इस परियोजना को नरसंहार तक कह दिया है क्योंकि यह शोम्पेन जनजाति के लिए विनाशकारी है। शोम्पेन को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) में रखा गया है। कई मानव वैज्ञानिकों का कहना है कि बाहरी दुनिया के संपर्क में आने से उन्हें कई बीमारियों का सामना करना पड़ेगा और उनकी विशिष्ट संस्कृति समाप्त हो सकती है। सुनामी के बाद विस्थापित कई निकोबारी परिवार अपने पैतृक भूमि पर वापस लौटना चाहते हैं लेकिन उन्हें जाने से रोका जा रहा है।
हसदेव और ग्रेट निकोबार में जो समानताएं हैं, उनमें बड़े पैमाने पर वनों की कटाई, दोनों ही क्षेत्रों के आदिवासी समुदायों का पुरखों की भूमि से विस्थापन, उनकी आजीविका, संस्कृति, सभ्यता और अस्तित्व पर संकट है। हसदेव को ‘छत्तीसगढ़ का फेफड़ा’ कहा जाता है, वैसे ही निकोबार के वर्षावन कार्बन सोखने और जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण हैं। हसदेव में लंबे समय से चल रहे जन आंदोलन की तरह ही अब निकोबार में भी स्थानीय समुदायों और पर्यावरणविदों का विरोध तेज हो रहा है, जिसे राजनीतिक समर्थन भी मिल रहा है।
बड़ों की बारी आएगी?
भारतमाला परियोजना मुआवजा घोटाला प्रकरण में ईडी की कार्रवाई तेज होती नजर आ रही है। एजेंसी ने उन स्थानों पर भी दबिश दी है, जो ईओडब्ल्यू-एसीबी की जांच के दायरे में नहीं आए थे।
कार्रवाई के दौरान पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर के करीबी रिश्तेदार भूपेंद्र चंद्राकर को भी जांच के घेरे में लिया गया है। वहीं दुर्ग के भाजपा नेता चतुर्भुज राठी से जुड़े प्रतिष्ठानों पर भी छापेमारी की गई।
हालांकि अब तक किसी बड़ी बरामदगी की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन संकेत हैं कि आने वाले दिनों में कुछ बड़े नाम सामने आ सकते हैं। चर्चा यह भी है कि धमतरी जिले के एक कारोबारी को लगभग 100 करोड़ रुपये के आसपास मुआवजा मिला था, जिसके लिए कथित तौर पर किसानों के नाम पर जमीन खरीदी गई थी।
बताते हैं कि कुछ अन्य बड़े कारोबारी अभी भी जांच के दायरे से बाहर हैं, लेकिन उनकी भूमिका पर भी नजर रखी जा रही है। ईडी ने जिन लोगों के यहां छापेमारी की है, उनके मोबाइल फोन जब्त कर लिए हैं। माना जा रहा है कि डिजिटल साक्ष्यों से इस पूरे मामले में अहम खुलासे हो सकते हैं। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है ।
फैशन करते पिट न जाएं...
फैशन का मतलब अलग होना, अटपटा होना, कई किस्म का हो सकता है। दुनिया की एक बड़ी फैशन कंपनी ने इंसानी भू्रण के कान के बाले बनाकर दुनिया भर में हंगामा खड़ा कर दिया था। अब एक दूसरी फैशन कंपनी ने मक्खी जैसे कान के पिन बनाए हैं। मच्छर, तिलचट्टे, अधिक दूर नहीं हैं, उनकी भी बारी चेहरे पर सजने की आने ही वाली है। एक खतरा यह हो सकता है कि इन्हें कानों पर सजे देखकर कोई इन्हें मारने के नाम पर थप्पड़ न लगा दे!


