राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : पैर पकड़े, तो हड़बड़ा गए अफसर
11-May-2026 5:56 PM
राजपथ-जनपथ : पैर पकड़े, तो हड़बड़ा गए अफसर

पैर पकड़े, तो हड़बड़ा गए अफसर

गरियाबंद के माडागांव के समाधान शिविर में पीएम आवास के लिए एक कमार दंपत्ति ने जिला पंचायत सीईओ प्रखर चंद्राकर के पैर पकडक़र गुहार लगाई, तो हडक़ंप मच गया। इसकी खबर सोशल मीडिया के जरिए सीएम हाउस तक पहुंची, तो मामले को संज्ञान में लिया गया। कमार जनजाति राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र माने जाते हैं। जब कमार दंपत्ति ने प्रखर चंद्राकर के पैर पकड़े, तो वो हड़बड़ा गए। प्रखर धमतरी जिले के रहने वाले हैं। उन्होंने तुरंत इसकी पड़ताल करवाई। यह पता चला कि परिवार का नाम पूर्व के आवास सर्वे में शामिल नहीं हो पाया था, क्योंकि वे लंबे समय तक उड़ीसा में निवासरत थे।

यह बात सामने आई, कि वर्ष 2011, 2018 और 2024 के सर्वेक्षण के दौरान भी परिवार गांव में मौजूद नहीं था। हाल ही में परिवार के छत्तीसगढ़ लौटने के बाद पीएम जनमन योजना के तहत उनका सर्वे पूरा कर लिया गया है और जल्द ही आवास स्वीकृत करने का भरोसा दिलाया गया।

चूंकि सीएम हाउस ने मामले को संज्ञान में लिया, तो प्रशासन ने समाधान शिविर में परिवार का राशन कार्ड और मनरेगा जॉब कार्ड भी बना दिए। आयुष्मान कार्ड की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अफसरों ने  परिवार को शासन की योजनाओं का लाभ दिलाने का आश्वासन दिया है। परिवार को तुरंत राहत देने की कोशिश की गई।

व्यापारी कल्याण बोर्ड को लेकर हलचल

पांच राज्यों के चुनाव निपटने के बाद अब प्रदेश के निगम-मंडलों के रिक्त पदों पर नियुक्तियों की चर्चा तेज हो गई। इन्हीं में व्यापारी कल्याण बोर्ड के गठन की भी तैयारी है। भाजपा के संकल्प पत्र में व्यापारी वर्ग के  लिए बोर्ड के गठन का वादा किया गया था। अब बोर्ड अध्यक्ष के लिए व्यापारी नेताओं में होड़ मची है।

भाजपा के कई व्यापारी नेता अध्यक्ष पद के लिए प्रयासरत बताए जाते हैं। चैम्बर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष सतीश थौरानी कुछ दिन पहले भाजपा में शामिल हुए हैं। ऐसे में उन्हें भी बोर्ड अध्यक्ष के दावेदार के रूप में देखा जा रहा है। यही नहीं, पार्टी के दो पूर्व विधायक लाभचंद बाफना, और श्रीचंद सुंदरानी की भी दावेदारी है। दोनों को विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिली थी।

यही नहीं, कई और व्यापारी नेताओं के नाम उभरकर सामने आ रहे हैं। इनमें सुभाष अग्रवाल, और सराफा एसोसिएशन के अध्यक्ष कमल सोनी का नाम भी चर्चा में है। इसके अलावा पूर्व अध्यक्ष जितेंद्र बरलोटा का नाम भी लिया जा रहा है। बरलोटा चैम्बर के अलग-अलग पदों पर रहे हैं। इन सबके बीच निगम मंडलों में उपाध्यक्ष, और संचालक मंडल के सदस्यों के पदों पर भी नियुक्तियां हो सकती हैं। ऐसे करीब सौ से अधिक पद रिक्त हैं जिन पर नियुक्तियां होनी है। नामों को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। देखना है सूची कब तक जारी होती है।

स्टेशनों से मिटेंगे अंग्रेजों के निशां मगर...

एक तरफ सरकार घर घर से ऐतिहासिक पांडुलिपियां, और सनातनी प्रतीक चिन्हों के संग्रह का देशव्यापी अभियान छेड़े हुए है और दूसरी ओर

मुगलों और ब्रिटिश हुकूमत के रखे गए नाम बदलने, उनके बनाए गए भवनों को तोडऩे का सिलसिला जारी रखे हुए है। राजभवन को लोक भवन किया जा चुका है तो अब सिविल लाइन बदलने वाला है। इस श्रृंखला में रेलवे ने भी अपने कदम बढ़ाएं हैं। वह भी मोस्ट अर्जेंटलि।

रेलवे बोर्ड ने देशभर के सभी जोन को सख्त निर्देश दिए हैं कि 14 मई तक ब्रिटिश काल के बीएनआर (बंगाल नागपुर रेलवे)रेलवे के उन तमाम प्रतीकों, प्रथाओं और अवशेषों को हटा दिया जाए, जो गुलामी की याद दिलाते हैं। इसके बाद से रेलवे का हर छोटा- बड़ा कर्मचारी -अधिकारी निशां ढूंढने में जुट गया है। उनका कहना है कि बिलासपुर जोन के रेलवे स्टेशनों में वैसे तो ऐसे निशां नहीं के बराबर हैं। जो है उसे हटाने के लिए तोड़ा जाना होगा। हम बात कर रहे हैं बिलासपुर स्टेशन भवन की। यह स्टेशन बिल्डिंग लगभग 135 से 137 साल पुरानी है, जिसका निर्माण ब्रिटिश काल के दौरान 1889-1890 में हुआ था। कुछ इतना ही  नागपुर स्टेशन भी इतिहास समेटे हुए है। यह स्टेशन भी बिलासपुर जोन में आता है। पूर्व के वर्षों में इन पुरानी इमारत को अभी भी एक धरोहर के रूप में संरक्षित करने की भी योजना रेलवे ने बनाई थी। अब तोडऩे का तो नहीं अंग्रेजों की यादें मिटाने का आदेश आया है। निकट भविष्य में तोड़ा नहीं जाता है तो अमृत भारत स्टेशन योजना में स्वरूप बदला जाएगा। रायपुर स्टेशन में भी प्लेटफार्म नंबर एक के दाहिने सिरे में रेल डाक दफ्तर के पास अंग्रेज़ों का बनाया एक छोटा सा केबिन हुआ करता था।जो रेल मंडल बनने के बाद प्लेटफॉर्म विस्तार में तोड़ दिया गया था। इसके अलावा यहां कोई निशान बाकी नहीं रह गए हैं। अब यह सवाल भी खड़े किए जा रहे हैं कि निशां मिटाने के बाद अफसरों से अंग्रेजियत मिट पाएगी। इससे सहमत, असहमत होकर रेलवे बोर्ड के इस आदेश की जानकारी शेयर करने वाले एक अफसर ने  कहा कि रेलवे अब ब्रिटिश विरासत के बोझ से मुक्त होकर ‘विकसित भारत’  के संकल्प के साथ आगे बढ़ रही है।

सरकारी छात्रावास का ऐसा प्रचार

सरकारी मदद से चलने वाले संस्थानों का इस तरह का प्रचार कम ही देखने को मिलता है। बिलासपुर के आदिवासी विकास विभाग ने अपने छात्रावासों में दाखिले का रंग बिरंगा पर्चा कराया है। विभाग की ओर से कहा गया है कि छात्रावासों में साफ-सुथरा भवन, लगातार बिजली, बिस्तर की पूरी व्यवस्था, पढ़ाई के लिए अलग कमरा, अच्छा खाना, खेलकूद, योग, संगीत और कला जैसी सुविधाएं दी जाएंगी। साथ ही रोजमर्रा की जरूरत का सामान भी मुफ्त मिलेगा।

इतना ही नहीं, पर्चों में अधिकारियों के नाम और मोबाइल नंबर भी दिए गए हैं, ताकि छात्र-छात्राएं सीधे संपर्क कर प्रवेश ले सकें। अच्छी पहल लगती है। अगर सचमुच छात्रावासों में ऐसी सुविधाएं मिलें, तो बच्चों और उनके परिवारों के लिए यह राहत की बात होगी। कौन पालक नहीं चाहेगा, यहां उनके बच्चों को मौका मिल जाए। फिर, अगर कोई कमी भी रही, तो छात्र सीधे शिकायत भी कर सकेंगे, क्योंकि विभाग ने खुद इन सुविधाओं का वादा किया है।

लेकिन इस पूरे प्रचार का दूसरा मतलब भी निकल जाता है। सवाल है कि क्या सरकारी छात्रावासों में अब पर्याप्त संख्या में छात्र-छात्राएं नहीं आ रहे हैं? क्या सरकारी स्कूलों की तरह आदिवासी छात्रावासों में भी बच्चों की संख्या कम होती जा रही है। कल इनको भी बंद नहीं करना पड़ जाएगा?

याद कीजिए, पिछले दो साल में कई सरकारी स्कूल- जिनमें शहरी स्कूल, आदिवासी क्षेत्रों के कई स्कूल भी थे-यह कहकर बंद कर दिए गए कि वहां बच्चों की संख्या कम हो गई है। यदि सरकारी स्कूल भी इसी तरह लोगों को बुलाते नजर आते, हमारे यहां आइए, अच्छे शिक्षक हैं, बढिय़ा भवन है, खेल का मैदान है, अच्छी पढ़ाई होती है, तो शायद उनको बंद करने की नौबत नहीं आती।

पुराना वीडियो, नया हंगामा

एमसीबी जिले के कांग्रेस नेता और चिरमिरी के पूर्व विधायक डॉ. विनय जायसवाल एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार वजह बना है सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा एक वीडियो। वीडियो में वे सडक़ पर कार की बोनट पर केक काटते नजर आ रहे हैं। आम तौर पर ऐसे वीडियो सामने आते ही पुलिस तुरंत कार्रवाई करती दिखाई देती है, खासकर तब से जब हाईकोर्ट ने सडक़ पर केक काटने और सार्वजनिक जगहों पर हुड़दंग को लेकर सख्त रुख अपनाया है।

लेकिन इस मामले में कहानी थोड़ी अलग है। डॉ. जायसवाल खुद थाने पहुंचे और शिकायत दर्ज कराई। उनका कहना है कि वायरल किया जा रहा वीडियो नया नहीं, बल्कि साल 2021 का है। इसे हाल का बताकर सोशल मीडिया में फैलाया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस तारीख का वीडियो बताया जा रहा है, उस दिन वे शिर्डी में थे, जिसके सबूत हैं उनके पास।

डॉ. जायसवाल का तर्क है कि सडक़ पर केक काटने जैसे मामलों पर सख्ती से कार्रवाई करने के निर्देश हाईकोर्ट ने साल 2025 में दिए। अदालत के निर्देश आने के बाद उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया।

हो सकता है उनका स्पष्टीकरण सही हो। उन्होंने भी खुद मान लिया है कि वीडियो 2021 का है। उस समय वे विधायक थे और संभव है कि समर्थकों के उत्साह में ऐसे कार्यक्रम का हिस्सा बने हों। 

मगर, यह भी याद रखना चाहिए कि सडक़ पर इस तरह आयोजन करना 2025 से पहले भी ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन था। ट्रैफिक बाधित करना, सार्वजनिक जगह पर बिना अनुमति कार्यक्रम करना और शांति भंग करना, इन सबको लेकर कानून तब से मौजूद थे। फर्क सिर्फ इतना है कि बाद में जब पुलिस ने प्रभावशाली लोगों के कई मामलों में कार्रवाई नहीं की, तब हाईकोर्ट को सख्त टिप्पणी कर कानून-व्यवस्था बनाए रखने की नसीहत दी गई।


अन्य पोस्ट