राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : सहकारी बैंक घोटाले में ईडी की एंट्री
06-May-2026 5:49 PM
राजपथ-जनपथ : सहकारी बैंक घोटाले में ईडी की एंट्री

सहकारी बैंक घोटाले में ईडी की एंट्री

अंबिकापुर जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक घोटाला प्रकरण एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। करीब सात साल पुराने इस मामले में विभागीय जांच अब भी धीमी रफ्तार से चल रही है, जबकि पुलिस अपनी कार्रवाई कर चुकी है। इसी बीच ईडी की एंट्री से बैंक में हडक़ंप मच गया है। ईडी ने प्रकरण से जुड़े सभी दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिए हैं और माना जा रहा है कि जांच में ऐसे कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं, जो अब तक पुलिस जांच से बाहर रहे हैं।

घोटाले का खुलासा उस समय हुआ था, जब तत्कालीन कलेक्टर संदीपन विलास भोसकर को बैंक के प्राधिकृत अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया। खातों में हेराफेरी की शिकायत मिलने पर उन्होंने जांच कराई और मामला पुलिस को सौंप दिया। इस मामले में बलरामपुर, सूरजपुर समेत विभिन्न शाखाओं के 12 अधिकारी-कर्मचारियों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जबकि कुछ को सेवा से बर्खास्त भी किया जा चुका है।

घोटाले की वास्तविक राशि अब तक स्पष्ट नहीं हो पाई है। थर्ड पार्टी ऑडिट में 142 करोड़ रुपए की अनियमितता सामने आई थी, जबकि बैंक से जुड़े लोगों का अनुमान है कि यह आंकड़ा करीब 300 करोड़ रुपए तक हो सकता है। कलेक्टर की अनुशंसा पर विभागीय जांच टीम तो गठित की गई, लेकिन जांच की गति अब तक सुस्त ही बनी हुई है। अब ईडी की सक्रियता से मामले में नई परतें खुलने की उम्मीद जताई जा रही है।

बताया जाता है कि घोटाले की शुरुआत पिछली सरकार के शुरुआती दौर में हुई थी। किसानों के नाम पर फर्जी कृषि ऋण लिए गए और बाद में कर्ज माफी योजना का लाभ उठाकर रकम हड़प ली गई। कई किसानों को इसकी जानकारी तक नहीं थी। इसी तरह बैंक कर्मचारियों ने रैकेट बनाकर फसल बीमा की राशि भी हड़प ली। कर्मचारियों के खातों में करोड़ों रुपए ट्रांसफर होने की बात सामने आई है। चर्चा है कि इस पूरे खेल को कुछ प्रभावशाली नेताओं का संरक्षण प्राप्त था। फिलहाल कर्मचारी जेल में हैं, लेकिन ईडी की जांच में उन सभी लोगों के नाम सामने आने की संभावना जताई जा रही है, जिन्हें इस घोटाले से फायदा हुआ।

भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी पर सरगर्मी

पांच राज्यों के चुनाव संपन्न होने के बाद भाजपा में राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन को लेकर हलचल तेज हो गई है। नितिन नबीन की नई टीम में छत्तीसगढ़ से किन नेताओं को जगह मिलेगी, इसको लेकर अटकलों का दौर जारी है।

 चर्चा है कि कार्यकारिणी में उन नेताओं को प्राथमिकता मिल सकती है जिन्होंने पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में चुनाव के दौरान प्रभावी भूमिका निभाई थी। यह भी कहा जा रहा है कि नितिन नवीन स्वयं चुनाव प्रबंधन से सीधे जुड़े रहे हैं, जिससे उन्हें छत्तीसगढ़ के नेताओं के कामकाज की अच्छी जानकारी है।

चर्चा यह भी है कि प्रदेश महामंत्री (संगठन) पवन साय को क्षेत्रीय संगठन मंत्री बनाकर एक-दो राज्यों की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।  राज्य सरकार के मंत्री अरुण साव, विजय शर्मा, ओपी चौधरी और केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू ने भी अपने-अपने प्रभार वाले क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन किया है, जिसके चलते उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी में स्थान मिल सकता है।

निवर्तमान उपाध्यक्ष लता उसेंडी का कद बढऩा लगभग तय माना जा रहा है। इसके अलावा खनिज निगम के अध्यक्ष सौरभ सिंह का नाम भी चर्चा में है। चुनाव के दौरान टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद चर्चा में रहे हैं। अब यह देखना है कि नितिन नवीन की टीम में छत्तीसगढ़ से किन-किन नेताओं को जगह मिलती है।

प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन पीछे नौकरीपेशा

अगले 10 साल में स्नातक और हम उम्र कम पढ़े-लिखे दो युवकों की आय पर नजऱ डालें तो ‘व्यंग्य’ में कहा जा सकता है कि भारत में 80 प्रतिशत कॉलेज और विश्वविद्यालय अगले 10 वर्षों में बंद हो जाएंगे..? यह अतिशयोक्ति भी लगती है..? अब आंकड़ों को देखें-

प्लंबर 1,200रु. - 2,000रु. प्रति दिन।

रु.30,000 - रु.50,000 प्रति माह

इलेक्ट्रीशियन

1,500रु. - 2,500रु. प्रति दिन

35,000रु. - रु.60,000रु. प्रति माह।

टाइल वर्कर / मिस्त्री

1,200रु. - 2,000रु. प्रति दिन

30,000रु. - 50,000रु. प्रति माह।

जोमैटो / स्विगी राइडर

25,000रु. - 35,000रु. प्रति माह।

अमेजन / फ्लिपकार्ट डिलीवरी पार्टनर

28,000रु. - 40,000रु. प्रति माह।

छोटा दुकानदार

नेट आय 30,000रु.-70,000रु. प्रति माह।

ये आय कौशल, गति और मांग के साथ बढ़ती हैं।

कोई दीक्षांत समारोह आवश्यक नहीं।

अब डिग्री धारकों की स्थिति देखें-

बी.कॉम फ्रेशर

12,000रु. - 18,000रु.

बीए फ्रेशर

10,000रु. - 15,000रु.

बीएससी फ्रेशर

12,000 - 18,000रु.

एमएससी फ्रेशर

15,000रु. - 22,000रु.

एमबीए फ्रेशर (टियर 2 / 3 कॉलेज)

18,000रु.-30,000रु.

नॉन टेक इंजीनियर

12,000रु. - 20,000रु.

टेक इंजीनियर

20,000रु.-35,000रु.

(शीर्ष 5 प्रतिशत को छोडक़र)

ये वेतन तब तक स्थिर रहते हैं जब तक कौशल नहीं जोड़े जाते।

कुशल कामगार तुरंत कमाते हैं। डिग्री धारक  ‘अवसरों’  का इंतजार करते हैं।

कौशल मासिक रूप से बढ़ता है।

डिग्रियां वार्षिक रूप से घटती हैं।

एक प्लंबर अपस्किल करता है तो आय बढ़ती है। एक डिलीवरी पार्टनर मार्गों का अनुकूलन करता है आय बढ़ती है।

एक दुकानदार मांग को समझता है ,आय बढ़ती है।

एक डिग्री धारक, इंतजार करें...आवेदन करें...

इंटर्न करें...पुन: कौशल सीखे..दोहराएं...

आशावादी रहें। क्योंकि यह शिक्षा प्रणाली छात्रों के लिए नहीं बनी है। यह लाभ के लिए बनी है।

डिग्रियां अभी भी बांटी जा रही हैं।

जैसे कि उनका कोई मतलब हो। मध्यवर्गीय माता-पिता के पास कोई विकल्प नहीं है।छात्रों के पास कोई बचाव नहीं है। डिग्रियां अनुमोदनों से जुड़ी हैं।अनुमोदन नौकरियों से जुड़े हैं। तो चक्र चलता रहता है।जिस

एनईपी 2020 को  आधुनिक शिक्षा प्रणाली बता कर लागू किया गया है वह 4 साल में ही पुराना लगने लगा है। दुनिया बहुत आगे बढ़ चुकी है। आज, दुनिया चाहती है...

सिस्टम थिंकर...

डेटा तर्क।जब कौशल हर दो साल में समाप्त हो जाते हैं, तो एक स्थिर डिग्री क्या बनाएगी ? कुछ भी नहीं।आज स्कूल में प्रवेश करने वाला बच्चा, लगभग 2040 - 2045 में स्नातक होगा।

तब दुनिया कैसी दिखेगी..?हर जगह ऑटोमेशन।हर तीन साल में करियर का पुनर्लेखन। डोमेन पार करने वाली नौकरियां।

हर दो साल में कौशल की समाप्ति।मानव मशीनों के साथ काम कर रहे हैं। सिस्टम में सोच रहे हैं। अस्पष्ट समस्याओं को हल कर रहे हैं। लगातार सीख रहे हैं।

अब हमारे कक्षाओं को देखें-पुराने...

स्थिर पाठ्यक्रम...अनचाही प्रायोगिक व्यवस्थाएं।

सभी के लिए एक ही डिग्री। हमारी शिक्षा प्रणाली 21वीं सदी कें मानवों को तैयार नहीं कर सकती। तो मूल कारण कहाँ है?

ब्यूरोक्रेट्स। हमारे बाबू सिस्टम चलाते हैं।वे नीति सलाह देते हैं। वे क्रियान्वयन डिजाइन करते हैं।और वे एक ही द्वार से आते हैं।

यूपीएससी।

यूपीएससी 1940 के दशक के लिए डिजाइन किया गया था। बाबू अपनी पदोन्नति को आपके बच्चे के भविष्य से ज्यादा महत्व देते हैं।

वैसे भी अब देश में शासकीय प्राथमिक शाला/ उच्चतर माध्यमिक शाला/ शासकीय कॉलेज/ बंद होने की स्थिति में है क्योंकि राज्य और केंद्र स्तर की सरकार ऐसी शिक्षा प्रणाली चल रही है जिसे सिर्फ प्राइवेट स्कूल, प्राइवेट कॉलेज फल फूल रहे हैं।

(हाल में रिटायर हुए एक प्राचार्य का आकलन)


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