राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : तारीफ और महत्व
10-May-2026 6:56 PM
राजपथ-जनपथ : तारीफ और महत्व

तारीफ और महत्व

पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के बाद छत्तीसगढ़ भाजपा खेमे में भी उत्साह का माहौल है। सीएम विष्णुदेव साय, दोनों डिप्टी सीएम अरुण साव और विजय शर्मा शनिवार को कोलकाता पहुंचे और नए सीएम सुवेन्दु अधिकारी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए।

समारोह की एक तस्वीर सोशल मीडिया में सबसे ज्यादा चर्चा में रही। मंच पर विजय शर्मा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के ठीक पीछे खड़े नजर आए। इसे लेकर प्रदेश कांग्रेस ने तंज कसते हुए पोस्ट किया कि बड़ी-बड़ी डींगे हांकने वाले गृहमंत्री को मंच पर कुर्सी तक नसीब नहीं हुई, पीएसओ की जगह खड़े हैं।

इसके बाद सोशल मीडिया पर टिप्पणियों का दौर शुरू हो गया। भाजपा समर्थकों ने पलटवार करते हुए लिखा कि बड़े नेताओं के भरोसेमंद लोग अक्सर मंच के पीछे रहकर जिम्मेदारी निभाते हैं, तस्वीरों से ज्यादा अहमियत भूमिका की होती है।

इसी बीच विजय शर्मा की ओर से जारी एक वीडियो ने चर्चाओं को नया मोड़ दे दिया। वीडियो में सीएम विष्णुदेव साय, अरुण साव और विजय शर्मा, सुवेन्दु अधिकारी को पुष्पगुच्छ भेंट कर बधाई देते नजर आ रहे हैं। इस दौरान सुवेन्दु अधिकारी, विजय शर्मा की तारीफ करते हुए कहते सुनाई दे रहे हैं कि विजय ने नामांकन रैली में खूब मेहनत की है।

अब भाजपा के लोग कह रहे हैं कि जब मेहनत की खुलकर सराहना हो रही हो, तब मंच पर कौन बैठा और कौन खड़ा रहा, यह बहस ज्यादा मायने नहीं रखती। 

ऑक्सीजन के जंगल पर विकास की कुल्हाड़ी

नवा रायपुर जाने के रास्ते के माना-तूता इलाके में फैला करीब चालीस-पैंतालीस बरस पुराना जंगल इन दिनों बेचैन है। जिन दरख्तों ने बरसों तक इस शहर को सांसें दीं, तपती हवाओं को थामा, मिट्टी को जिंदा रखा और परिंदों को आशियाना दिया, आज उन पर कुल्हाडिय़ां चल रही हैं। वजह है सरकार का महत्वाकांक्षी चित्रोत्पला इंटरनेशनल फिल्म सिटी और ट्राइबल एंड कल्चरल कन्वेंशन सेंटर प्रोजेक्ट। इसके लिए तकरीबन सौ एकड़ वन भूमि को विकास के नाम पर ध्वस्त किया जा रहा है। 

स्थानीय लोगों का दावा है कि अब तक डेढ़ सौ से दो सौ पेड़ काटे जा चुके हैं, जबकि आने वाले दिनों में लगभग पांच हज़ार और पेड़ों को गिराने की तैयारी है। रायपुर और नवा रायपुर के बीच मौजूद यह जंगल केवल हरियाली का टुकड़ा नहीं, बल्कि पूरे शहर का ऑक्सीजन जोन माना जा सकता है। शहर जिस तेजी से सीमेंट और कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो रहा है, उस दौर में यह वन इलाका एक नेमत की तरह बचा हुआ है।

सरकार का कहना है कि चित्रोत्पला इंटरनेशनल फिल्म सिटी छत्तीसगढ़ को मूवी प्रोडक्शन, पर्यटन और सांस्कृतिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र बनाएगी। परियोजना में अत्याधुनिक स्टूडियो, एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन जैसे सेट, पोस्ट-प्रोडक्शन सुविधाएं, होटल, कन्वेंशन सेंटर, मल्टीप्लेक्स और व्यापारिक ढांचे को विकसित किए जाने की योजना है। सरकार का दावा है कि इससे स्थानीय कलाकारों, तकनीशियनों और युवाओं को रोजगार और नए मौके मिलेंगे।

अब यहीं पर जो दूसरी परियोजना लाई जा चुकी है , वह है- ट्राइबल एंड कल्चरल कन्वेंशन सेंटर। उसका भी हिसाब छोटा-मोटा नहीं है। इस परियोजना को फिल्म निर्माण वाली चित्रोत्पला परियोजना से ही जोड़ा गया है। पर्यटन, संस्कृति और इनसे जुड़ी व्यापारिक गतिविधियों का विकास किया जाएगा।

दोनों परियोजनाओं को मिलाकर करीब 95 एकड़ जमीन की जरूरत होगी। छत्तीसगढ़ सरकार को स्पेशल असिस्टेंस टू स्टेट्स फॉर कैपिटल इन्वेस्टमेंट, डेवलपमेंट ऑफ ग्लोबल लेवल ऑइकॉनिक टूरिज्म सेंटर्स योजना के तहत वित्तीय सहायता मिली है। चित्रोत्पला के लिए करीब 96 करोड़ और कन्वेंशन सेंटर के लिए 52 करोड़ की मदद केंद्र ने की है। हमारे आपके टैक्स की इतनी रकम खर्च होने के बावजूद यह पीपीपी, यानि पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप मॉडल में है। पीपीपी वाले लोग इसे तैयार कर रहे हैं और यही लोग उन ग्रामीणों को धमका रहे हैं, जो जंगल काटने के विरोध में उतरे हैं। कह रहे हैं, जंगल को बर्बाद करने की हमको सरकार से मंजूरी मिली हुई है। नवा रायपुर में कितनी ही खाली जमीन पड़ी हुई है, वहां क्यों नहीं एलॉट किया?

छागल से अनजान पीढ़ी

इस पीढ़ी में बहुत कम लोग होंगे जो इस मोटे कपड़े की थैली से परिचित होंगे, इसे ‘छागल’  कहते थे। 4-5 दशक पहले ये उन दिनों की बात है जब न बाजार में बोतल बंद पानी मिलता था ना पानी का व्यापार होता था, और न कोई कैम्पर थे न मिल्टन की बोतलें थीं। गर्मी में पानी पिलाना धर्म और खुद का पानी घर से लेकर निकलना अच्छा कर्म माना जाता था। गर्मी के दिनों मे उपयोग आने वाली ये छागल एक  मोटे कपड़े (कैनवास) का थैला होता था, जिसका सिरा एक और बोतल के मुंह जैसा होता था और वह एक लकड़ी के गुट्टे से बंद होता था।छागल में पानी भरकर लोग, यात्रा पर जब जाते थे, कई लोग ट्रेन, बस,जीप के बाहर खिडक़ी पर उसे टांग देते थे,बाहर की हवा उस कपड़े के थैले के अंदर भरे पानी को ठंडा करती थी। वो प्राकृतिक ठंडक बेमिसाल थी। यह हमारे पूर्वजों की पानी की व्यवस्था थी। सबसे बड़ी बात यह है अगर रास्ते में किसी राहगीर ने छागल देखकर ठंडा पानी पीने के लिए मांग लिया तो कोई उसे मना नहीं करता था क्योंकि भीषण गर्मी में प्यासे को पानी पिलाना ईश्वर की आज्ञा होती है। पानी खरीदा जा सकता है या बेचा जा सकता है-यह कल्पना भी नहीं थी। अब 20 रूपए में एक लीटर पानी खरीदने वाली पीढ़ी  छागल को नहीं जानती। मल्टिनैशनल वाटर कंपनियों ने अपने कारोबार के लिए छागल के पानी को सेहत के लिए नुकसानदायक जो बता रखा है।


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