राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : ईडी के छत्तीसगढ़ में 8 वर्ष
02-May-2026 6:31 PM
राजपथ-जनपथ : ईडी के छत्तीसगढ़ में 8 वर्ष

ईडी के छत्तीसगढ़ में 8 वर्ष

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) अपनी स्थापना की 70वीं वर्षगांठ मना रहा है। इस अवसर पर दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में निदेशक राहुल नवीन ने एजेंसी का विस्तृत लेखा-जोखा प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, ईडी ने 94 फीसदी का उच्च कन्विक्शन रेट हासिल किया है और वित्त वर्ष 2025-26 में 81,422 करोड़ की रिकॉर्ड संपत्ति कुर्क की है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 171 फीसदी अधिक है। अब तक एजेंसी कुल 2.36 लाख करोड़ से अधिक की संपत्ति अटैच कर चुकी है।

छत्तीसगढ़ पर नजर डालें तो रायपुर में ईडी का पूर्ण जोनल कार्यालय जनवरी 2025 में सक्रिय हुआ, जबकि इसकी शुरुआत 2017-18 में उप-जोनल कार्यालय के रूप में हुई थी, जो पहले मुंबई जोनल ऑफिस के अधीन कार्यरत था। पूर्ण कार्यालय बनने के बाद अब यह सीधे दिल्ली मुख्यालय को रिपोर्ट करता है। राज्य में मनी लॉन्ड्रिंग और सरकारी धन के दुरुपयोग के बढ़ते मामलों को देखते हुए इसकी भूमिका लगातार मजबूत की गई है।

इन आठ वर्षों में ईडी ने छत्तीसगढ़ में कई हाई-प्रोफाइल मामलों में कार्रवाई की है। शराब, कोयला, ऑनलाइन सट्टा, डीएमएफ, कस्टम मिलिंग और जमीन से जुड़े घोटालों में एजेंसी ने सैकड़ों करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क और जब्त की है। कार्रवाई का दायरा लगातार बढ़ रहा है और हर नई रेड के साथ आंकड़े भी बढ़ते जा रहे हैं।

अप्रैल 2026 तक के प्रमुख मामलों पर नजर डालें तो, सबसे पहले ईडी ने करीब 32 सौ करोड़ के शराब घोटाले में ईडी ने 100 करोड़ से अधिक की संपत्ति कुर्क की है। इसमें तीन प्रमुख डिस्टिलर्स से जुड़ी लगभग 68 करोड़ की संपत्ति, दो आईएएस और एक राज्य सेवा अधिकारी से संबंधित संपत्तियां शामिल हैं। इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पुत्र चैतन्य बघेल की 61.2 करोड़ की संपत्ति भी अटैच की गई है।

महादेव सट्टा ऐप मामले में ईडी ने 91.82 करोड़ से अधिक की संपत्ति कुर्क की है, जिसमें 75 करोड़ का बैंक बैलेंस शामिल है। वहीं 26 सौ करोड़ से अधिक की संपत्तियां जांच के दायरे में हैं।

कोल लेवी घोटाले में 2.66 करोड़ से अधिक की संपत्ति कुर्क की गई है। हाल ही में भारतमाला मुआवजा घोटाले में 23.35 करोड़ की संपत्ति कुर्क की गई, जिसमें 17 किलो सोना और हीरे के गहने भी जब्त किए गए हैं।

इन मामलों में ईडी ने कई हाई-प्रोफाइल व्यक्तियों पर कार्रवाई करते हुए उन्हें जेल भेजा है। इनमें आईएएस अधिकारी समीर विश्नोई, रानू साहू, अनिल टूटेजा, आईटीएस अधिकारी एपी त्रिपाठी, राज्य सेवा अधिकारी सौम्या चौरसिया, खनिज विभाग के एस एस नाग, पूर्व सीएम भूपेश बघेल के पुत्र चैतन्य बघेल, कारोबारी सूर्यकांत तिवारी, अनवर ढेबर और राइस मिलर रोशन चंद्राकर जैसे नाम शामिल हैं।

हालांकि एजेंसी की कार्रवाई के बीच कुछ सवाल भी उठते रहे हैं। भारतमाला मुआवजा घोटाले में पूर्व मंत्री के भाई भूपेंद्र चंद्राकर को जांच के घेरे में लिया गया है, लेकिन पिछले तीन वर्षों से कांग्रेस कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल, सौरभ चंद्राकर और रवि उप्पल के खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी होने के बावजूद गिरफ्तारी न हो पाना एजेंसी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।

कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ में ईडी के आठ वर्षों का सफर कार्रवाई और उपलब्धियों के साथ-साथ चुनौतियों और सवालों से भी भरा रहा है।

ब्याज के बदले बकरी

सरगुजा जिले में महिलाओं की आय बढ़ाने के लिए एक अलग तरह की पहल की गई है। गांवों में छेरी बैंक खोले गए हैं, जहां उन्हें बकरियां खरीदने के लिए कर्ज दिया जा रहा है। इस कर्ज के किस्तों का भुगतान उन्हें रुपयों में नहीं करना है, बल्कि मेमनों से करना है। बकरियां बच्चे पैदा करेंगी और उनमें से ही एक को या कुछ को, वे चुकाकर कर्ज से मुक्त हो जाएंगी। बकरियों के लिए कर्ज देने का पुराना कार्यक्रम सरकारी है, बिहान योजना के अंतर्गत। पर कर्ज की रकम चुकाने के लिए नगद की जगह शावक या मेमना देने का प्रयोग नया है।  

जगह-जगह याद किए जा रहे गोविंद सारंग

छत्तीसगढ़ भाजपा के वर्तमान स्वरूप को गढऩे वाले पुराने संगठनकर्ता स्व. गोविंद सारंग को उनकी जयंती पर प्रदेशभर में याद किया जा रहा है। प्रदेश अध्यक्ष किरण देव सिंह ने बस्तर में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी अपने-अपने तरीके से उन्हें नमन किया।

एक वरिष्ठ नेता ने सोशल मीडिया पर स्व. सारंग के योगदान को याद करते हुए बताया कि अविभाजित मध्यप्रदेश में संगठनात्मक दृष्टि से पार्टी को तीन हिस्सों में बांटा गया था, इनमें मध्य भारत, महाकौशल और छत्तीसगढ़ थे। मध्य भारत में कृष्ण मुरारी मोघे, महाकौशल में मेघराज जैन और छत्तीसगढ़ में संगठन की जिम्मेदारी गोविंद सारंग को सौंपी गई थी।

उस दौर में छत्तीसगढ़ में भाजपा संगठन कांग्रेस की तुलना में काफी कमजोर था। भोपाल से रायपुर आने के बाद गोविंद सारंग ने जमीनी स्तर पर संगठन खड़ा करने का बीड़ा उठाया। वे स्कूटर से रायपुर के वार्डों का दौरा करते, तो राज्य परिवहन की बसों से बस्तर और सरगुजा तक पहुंचकर कार्यकर्ताओं से संवाद करते थे।

बाद में विजयाराजे सिंधिया द्वारा भेजी गई एक जीप (एमपीजी 9673) से उन्होंने पूरे क्षेत्र का दौरा कर संगठन को विस्तार दिया। इसके बाद उन्हें एक फिएट कार भी मिली, जिससे उन्होंने छत्तीसगढ़ में भाजपा को मजबूती से खड़ा करने की रणनीति को और धार दी।
उनकी मेहनत का ही परिणाम है कि आज छत्तीसगढ़ में भाजपा एक मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित हो चुकी है और प्रदेश में पार्टी की चौथी सरकार है। 2003 से 2018 तक बनी भाजपा सरकारों में शामिल अधिकांश विधायक और सांसद कहीं न कहीं स्व. सारंग की संगठनात्मक तैयारी की देन माने जाते हैं।

उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वाले कई वरिष्ठ कार्यकर्ता आज मार्गदर्शक मंडल में हैं। इससे परे 2014 के बाद पार्टी में एक नई पीढ़ी उभरी, जिसने नेतृत्व को प्रभावित करते हुए संगठन में अपनी जगह बनाई।

स्व. गोविंद सारंग का योगदान सिर्फ संगठन निर्माण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने छत्तीसगढ़ में भाजपा की वैचारिक और राजनीतिक नींव को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभाई

कर्मचारियों को तटस्थ रहना जरूरी नहीं?

छत्तीसगढ़ सरकार ने 21 अप्रैल को एक साधारण सा परिपत्र जारी किया और उसे फिर अगले ही दिन वापस भी ले लिया। उस आदेश में सामान्य प्रशासन विभाग ने कहा था कि कोई भी कर्मचारी, कर्मचारियों के आचरण नियमावली 1965 के अनुसार किसी राजनीतिक दल या संगठन से नहीं जुड़ सकता। उनके कार्यक्रमों में न तो वह भाग लेगा और न ही कोई पद संभालेगा। कर्मचारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने कर्तव्यों का पूरी निष्पक्षता के साथ निर्वहन करें, ईमानदारी और अखंडता के साथ करें। कर्मचारी तटस्थ रहकर ही जनसेवा कर सकता है, यही लोकतंत्र की आधारशिला है.., इत्यादि बातें लिखी गई थीं। यानि, जिस आदेश में ऊंचे आदर्शों की बात की गई थी, उसमें कोई खामी नजर आई और सरकार को वह परिपत्र वापस लेना पड़ गया।

संविधान की भावना है कि नौकरशाह हों या बाबू, वे किसी पार्टी के नहीं होते। वे जनता के होते हैं। इसीलिये राजनीति दलों या संगठनों में उनकी सदस्यता 1965 में बने नियमों के तहत निषिद्ध है। जीएडी के आदेश में उसी बात की याद दिलाई गई थी लेकिन अगले ही दिन उस पत्र को वापस लिया जाना कुछ सवाल खड़े करते हैं। क्या इस पत्र को भाजपा के कुछ तबकों में आरएसएस के खिलाफ मान लिया गया? सन् 2024 में केंद्र सरकार ने सरकारी कर्मचारियों आरएसएस की गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति दी थी। इसका पालन छत्तीसगढ़ में भी हो रहा है। परिपत्र में, जिसे वापस लिया गया, राजनीतिक दलों के अलावा संगठनों का भी उल्लेख किया गया था। इससे यह संकेत मिल रहा था कि इसके बाद तो आरएसएस के कार्यक्रमों में कर्मचारियों के जाने पर प्रतिबंध लग जाएगा। आरएसएस इस समय छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण के मुद्दे पर बहुत मुखर है। दूसरी बात यह है कि निचले स्तर पर कर्मचारी अक्सर जातिगत, धार्मिक, अर्ध धार्मिक मंचों और संगठनों से जुड़े रहते हैं। उनका अपने संगठन पर काफी प्रभाव होता है। यदि वह अफसर हो तो उनका अपने संगठन पर काफी प्रभाव भी होता है। इनका एक बड़ा वोट बैंक भी होता है, जिनकी राजनीतिक दलों को जरूरत बनी रहती है। यदि उन्हें सामाजिक धार्मिक संगठनों के कार्यक्रमों में भाग लेने से रोक दिया गया तो राजनीतिक दलों का नुकसान ही होना है।

आम लोगों के नजरिये से देखें तो अनेक संगठन ऐसे हैं, जिनकी स्थापना ही कर्मचारी, अधिकारी नेता करते हैं, या फिर उनमें वे संरक्षक की भूमिका में होते हैं। वे इतने सक्रिय होते हैं कि बस अपने दफ्तर की ड्यूटी नहीं करते, बाकी सब करते हैं, जो कुल मिलाकर प्रशासन की कार्यक्षमता पर असर डालती है। पहला परिपत्र कर्मचारियों को जवाबदेह बनाने वाला था, वापस लिए जाने वाला दूसरा परिपत्र सरकार के भीतर के अंतर्विरोध को सामने लाता है। 


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