राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : लाइसेंस रिन्यू के लिए लाइन में लगे डॉ. महंत
13-May-2026 5:37 PM
राजपथ-जनपथ : लाइसेंस रिन्यू के लिए लाइन में लगे डॉ. महंत

लाइसेंस रिन्यू के लिए लाइन में लगे डॉ. महंत

छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत सोमवार को बिलासपुर प्रवास के दौरान लगरा स्थित क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय पहुंचे, जहां उन्होंने आम नागरिकों की तरह अपनी ड्राइविंग लाइसेंस नवीनीकरण की प्रक्रिया पूरी कराई। बिना किसी विशेष व्यवस्था के उन्होंने निर्धारित नियमों के तहत सभी औपचारिकताएं पूरी कीं और पांच वर्षों के लिए लाइसेंस का नवीनीकरण कराया।

दोपहर करीब दो बजे शुरू हुई प्रक्रिया के दौरान डॉ. महंत ने अपनी बारी आने का इंतजार किया। इसके बाद उन्होंने फोटो खिंचवाने से लेकर डिजिटल हस्ताक्षर तक की सभी जरूरी प्रक्रियाएं सामान्य आवेदक की तरह पूरी कीं। कुछ ही समय में उनका ड्राइविंग लाइसेंस अगले पांच साल के लिए रिन्यू हो गया।

काम पूरा होने के बाद उन्होंने आरटीओ कार्यालय के अधिकारियों और कर्मचारियों का सहयोग के लिए आभार जताया। इस दौरान वहां मौजूद लोगों के बीच भी उनकी सादगी और नियमों के पालन को लेकर चर्चा होती रही। डॉ. महंत ने अपने इस अनुभव को सोशल मीडिया पर भी साझा किया। उन्होंने लिखा कि एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में सभी का कर्तव्य है कि वे नियमों का पालन करें और अपने जरूरी दस्तावेज समय-समय पर अपडेट रखें। उन्होंने आरटीओ कार्यालय की व्यवस्था और कर्मचारियों के सहयोग की भी सराहना की।

कांग्रेस में बदलाव अगस्त से पहले या...

प्रदेश कांग्रेस में बदलाव की सुगबुगाहट तेज है। इसी बीच पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने प्रदेश का दौरा शुरू कर दिया है। वह बिलाईगढ़ गए थे और फिर रायगढ़ पहुंचकर कोयला खदान प्रभावितों से भी मिले। वह पार्टी के छोटे-बड़े नेताओं के घर जाकर मेल-मुलाकात भी कर रहे हैं। सिंहदेव की सक्रियता को लेकर पार्टी के अंदरखाने में काफी चर्चा है। वह पहले ही साफ कर चुके हैं कि उनकी रुचि प्रदेश अध्यक्ष बनने में है।

दीपक बैज का कार्यकाल अगस्त में खत्म हो रहा है। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि कार्यकाल खत्म होने से पहले ही उन्हें बदला जा सकता है। सिंहदेव के दौरों को इससे जोडक़र देखा जा रहा है। चर्चा है कि सिंहदेव यूं ही सक्रिय नहीं हुए हैं। करीब दो माह पहले उनकी राहुल गांधी से डेढ़ घंटे तक अकेले में चर्चा हुई थी। इसके बाद ही वह ज्यादा सक्रिय नजर आने लगे।

हालांकि पूर्व सीएम भूपेश बघेल खेमे ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है। पूर्व सीएम की दखल के बाद महिला कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष पद पर बालोद विधायक संगीता सिन्हा की नियुक्ति हुई। जबकि टीएस सिंहदेव ने पूर्व विधायक छन्नी साहू का नाम आगे बढ़ाया था। प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए पूर्व सीएम की ओर से अभी कोई नया नाम सामने नहीं आया है, लेकिन चर्चा है कि वह पूर्व मंत्री अमरजीत भगत का नाम आगे बढ़ा सकते हैं। फिलहाल नई नियुक्ति तक कांग्रेस में खींचतान जारी रहने के आसार हैं।

घोटाले जब लोक अदालत जाने लगें...

सन् 2003 के सीजी पीएससी घोटाले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से सुलह की पहल ने वंचित याचिकाकर्ता अभ्यर्थियों के पुराने जख्म फिर कुरेद दिए हैं। यह याद रखना जरूरी है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लगभग दो दशक पहले लोक सेवा आयोग के खिलाफ जो फैसला दिया था, उसके पीछे साफ-साफ भर्ती घोटाला पाया जाना था। अदालत में यह साबित हुआ था कि चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी की गई, अंकों में हेराफेरी हुई, अपात्र अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाया गया और पात्र उम्मीदवारों को या तो चयन से बाहर कर दिया गया या फिर छोटे पदों पर समायोजित कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने स्केलिंग प्रक्रिया को दोबारा निर्धारित करते हुए पूरी चयन सूची नए सिरे से तैयार करने का आदेश दिया था। लेकिन इस फैसले पर अमल हो पाता, उससे पहले ही सुप्रीम कोर्ट से उन अभ्यर्थियों को स्थगन मिल गया, जिनकी स्थिति नई चयन सूची बनने के बाद प्रभावित हो रही थी। कई लोगों को निचले पदों पर जाना पड़ता या चयन सूची से बाहर होना पड़ता। सन् 2007 से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और अब तक अंतिम फैसला नहीं आ सका है।

आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। जिन अभ्यर्थियों की नियुक्तियों पर उस समय सवाल उठे थे, वे सवाल आज भी कायम हैं। कई अधिकारी डिप्टी कलेक्टर से प्रमोट होकर आईएएस बन चुके हैं। कुछ जिलों में कलेक्टर हैं तो कुछ मंत्रालय में महत्वपूर्ण पदों पर हैं। दूसरी ओर वे अभ्यर्थी, जो खुद को वंचित मानते हैं, छोटे पदों पर वर्षों से सेवा कर रहे हैं। उनकी सेवा अवधि अब इतनी हो चुकी है कि वे चाहें तो वीआरएस लेकर पेंशन के हकदार बन सकते हैं।

ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट की ओर से लोक अदालत का सुझाव सामने आया है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह पहल सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं की है, लोक सेवा आयोग ने की है या फिर किसी पक्षकार ने इसका सुझाव दिया है। लेकिन मूल याचिकाकर्ताओं की प्रतिक्रिया सामने आ चुकी है। उनका कहना है किहमें सुलह नहीं, न्याय चाहिए।

दिलचस्प बात यह भी है कि जब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में सुनवाई अंतिम चरण में थी और यह लगभग तय माना जा रहा था कि फैसला सीजी पीएससी के खिलाफ जाएगा, तब भी आयोग की ओर से समझौते की पेशकश की गई थी। जिन याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि वे डिप्टी कलेक्टर पद के वास्तविक हकदार हैं, उन्हें याचिका वापस लेने की शर्त पर वही पद देने का प्रस्ताव रखा गया था। लेकिन उस समय भी याचिकाकर्ताओं ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था। उनका कहना था कि वे केवल अपने लिए नहीं, बल्कि उन सभी अभ्यर्थियों के लिए न्याय चाहते हैं जिन्हें कथित भ्रष्ट चयन प्रक्रिया ने बाहर कर दिया।

वैसे, लोक अदालत में भी न्याय ही होता है। वहां दोनों पक्षों की सहमति से समाधान निकलता है और तभी आदेश पारित होता है जब सभी पक्ष संतुष्ट हों। लेकिन यदि इस मामले में लोक अदालत के जरिए कोई मध्य मार्ग निकाला जाता है, तो उसकी शक्ल क्या होगी?

एक संभावना यह हो सकती है कि याचिकाकर्ताओं को सेवा की बची हुई अवधि के लिए वही अवसर दिया जाए, जो हाईकोर्ट के फैसले से पहले प्रस्तावित था। इसके लिए राज्य शासन और लोक सेवा आयोग दोनों की सहमति जरूरी होगी।

दूसरा सवाल उन अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों को लेकर है, जिन्होंने कथित रूप से गलत आधार पर चयन किया। क्या उनके खिलाफ किसी कार्रवाई की बात भी समझौते का हिस्सा होगी? अब तक वे कानून के शिकंजे से लगभग बाहर ही रहे हैं।

सबसे जटिल प्रश्न उन अधिकारियों को लेकर है, जो वर्षों से कथित गलत चयन के आधार पर सेवा लाभ लेते रहे हैं। क्या उन्हें पद से हटाया जाएगा? क्या पदावनत किया जाएगा? व्यवहारिक रूप से यह बेहद कठिन और जोखिम भरा कदम होगा। संभव है कि लोक अदालत में वे पक्षकार ही न हों, और यदि कोई प्रतिकूल निर्णय हुआ तो वे फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

ऐसे में समझौते का स्वरूप शायद कुछ ऐसा हो सकता है, अतीत को पीछे छोडक़र भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश करो। जिन अभ्यर्थियों को पीडि़त माना जा रहा है, उनकी सेवा के अभी भी कुछ वर्ष शेष हैं। उन्हें उपयुक्त पदों पर ले लिया जाए। लेकिन क्या उन्हें एरियर सहित पिछला वेतन, वरिष्ठता और पेंशन गणना का लाभ भी मिलेगा? स्पष्ट उत्तर फिलहाल किसी के पास नहीं है।

एक बड़ा सवाल और भी खड़ा होता है, क्या सरकारी भर्तियों में हुए घोटालों का समाधान लोक अदालत के जरिए किया जा सकता है? यदि सीजी पीएससी-2003 मामले में लोक अदालत कोई रास्ता निकालने में सफल होती है, तो फिर क्या सीजी पीएससी-2021 में हुए घोटाले के लिए भी ऐसे ही समाधान का रास्ता निकल जाएगा?

 

भाजपा कोरग्रुप में बदलाव

करीब एक दशक बाद प्रदेश भाजपा के कोरग्रुप का पुनर्गठन हुआ है। भाजपा में कोरग्रुप को सबसे ताकतवर माना जाता है, क्योंकि सरकार और संगठन के बड़े फैसलों से पहले इसी मंच पर रणनीति तय होती है। इसकी बैठकों और चर्चाओं को आमतौर पर गोपनीय रखा जाता है, लेकिन इस बार हुए बदलावों को लेकर राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चा है।

दरअसल, लंबे समय से कोरग्रुप के पुनर्गठन की जरूरत महसूस की जा रही थी। वजह यह थी कि समय के साथ सदस्यों की संख्या लगातार बढ़ती चली गई थी। नेता प्रतिपक्ष बने नारायण चंदेल भी पदेन सदस्य हो गए। पूर्व प्रदेश अध्यक्षों और पूर्व पदाधिकारियों को भी हटाया नहीं गया। कोषाध्यक्ष पद छोडऩेे के बाद भी गौरीशंकर अग्रवाल सदस्य बने रहे। नतीजा यह हुआ कि कोरग्रुप की संख्या डेढ़ दर्जन तक पहुंच गई, जबकि सामान्य तौर पर इसमें 6-7 सदस्य ही रखे जाते हैं।

अब राष्ट्रीय नेतृत्व की मंजूरी के बाद नए सिरे से कोरग्रुप का गठन किया गया है। इसमें मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, दोनों डिप्टी सीएम अरुण साव और विजय शर्मा के साथ वित्त मंत्री ओपी चौधरी को शामिल किया गया है। संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश साफ दिखाई देती है।

नए चेहरों में डॉ. कृष्णमूर्ति बांधी, अमर अग्रवाल और शिवरतन शर्मा को जगह मिली है। महिला प्रतिनिधित्व के तौर पर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष लता उसेंडी को शामिल किया गया है। विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह संवैधानिक पद पर होने के कारण कोरग्रुप में नहीं रखे गए। प्रदेश अध्यक्ष किरण देव और दोनों महामंत्री अजय जमवाल तथा पवन साय पदेन सदस्य हैं।

खास बात यह है कि सरोज पांडे, रामविचार नेताम और विक्रम उसेंडी जैसे नेताओं भी कोरग्रुप में नहीं है। जबकि तीनों पूर्व में राष्ट्रीय पदाधिकारी होने के नाते कोरग्रुप में थे।  हालांकि पार्टी के भीतर यह चर्चा है कि इनमें से कुछ नेताओं को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जिम्मेदारी मिल सकती है। कुल मिलाकर भाजपा ने नए कोरग्रुप के जरिए सत्ता, संगठन और सामाजिक समीकरणों के बीच संतुलन साधने का प्रयास किया है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।


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