राजपथ - जनपथ
धत्त, सुशासन में शराब की बात करोगे?
छत्तीसगढ़ सरकार इन दिनों सुशासन तिहार मना रही है। सुशासन जैसे ही चालू हुआ, शराब की दुकानों का माल खत्म हो गया। लोग भटक रहे हैं। बंधु, वित्तीय वर्ष बदल चुका है। अब इस मौके पर अफसरों ने सोचा नहीं कि ये शादी का भी सीजन है। बड़ी संख्या में बाराती भटक रहे हैं, चेहरे उतरे हुए हैं-क्या खाक डांस करेंगे।
सुशासन में शराब न मिले, इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। उन शराब प्रेमी रसूखदारों को छोड़ दें, जिनके पास अनाप-शनाप कमाई हैं, मगर आम जनता की हालत को महसूस करिये। परिवार में कलह का, हिंसा का, सडक़ों पर उत्पात का, सडक़ दुर्घटनाओं का कारण यही शराब बनती है।
इन दिनों अंग्रेजी के जान-पहचान वाले ब्रांड की केवल बोतल मिल रही है, लिटिल गायब है। लोग बार्टर करके खरीद रहे हैं, चार लोग मिलकर पौवा-पौवा बांट रहे हैं। देसी की तो बात ही छोड़ दीजिए, शटर गिरा हुआ है। अकेले रायपुर में रोजाना साढ़े 12 हजार पेटी का नुकसान। पूरे छत्तीसगढ़ की बात करें तो हर रोज 180 हजार पौवा। निर्माताओं और सरकार को मिलाकर रोजाना 50 करोड़ से ज्यादा की क्षत्ति।
सुशासन में कोई घोषित योजना नहीं थी कि शराब की किल्लत पैदा की जाएगी, मगर सुशासन दिख रहा है।
इस हालात को देखते हुए यह तो कह ही सकते हैं कि व्यक्ति परिस्थितिजीवी होता है। शराब नहीं मिलेगी तो कुछ लोग जरूर इधर-उधर देसी-महुआ तलाश करते हुए भटकेंगे, बाकी ज्यादातर लोग घर में पत्नी और बच्चों के साथ दाल रोटी खाएंगे। शराब से बचे पैसे का बढिय़ा सा सप्लीमेंट खाना- चिकन, अंडा, आमलेट, चॉकलेट, आइसक्रीम वगैरह घर लेकर जाएंगे।
अब, असल में शराब की किल्लत क्यों खड़ी हुई, उसे समझ लेते हैं। सुशासन वगैरह से इसका कोई संबंध नहीं है। यह नई आबकारी नीति 2026-27 का हिस्सा है। आबकारी मंत्री लखन लाल देवांगन ने इसे आर्थिक दक्षता और व्यवस्था में सुधार का कदम बताया है। प्लास्टिक बोतल अपनाने की वजह यह बताई गई है कि इससे कांच की बोतलों के टूटने से होने वाले भारी नुकसान से बचा जा सकेगा। परिवहन के दौरान लोड कम पड़ेगा, तो भी खर्च कम होगा- क्योंकि प्लास्टिक बोतल हल्की होंगीं। बाकी राज्यों से तस्करी के जरिये जो दारू आती है, वह कांच की बोतलों में आती है, इससे सच का तुरंत पता चल जाएगा। दावा किया गया है कि इससे मिलावट के मामले भी कम मिलेंगे।
सरकार का तर्क सुनकर लगता है, जैसे किसी योगी ने अचानक संन्यास ले लिया हो। मगर, यह फेयर डिसीजन नहीं है। प्लास्टिक को बढ़ावा देने के सरकार के फैसलों के खिलाफ आरटीआई कार्यकर्ता नितिन सिंघवी ने एक याचिका छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में लगाई है। सिंघवी की याचिका विशेषत: शराब की प्लास्टिक बोतलों को लेकर नहीं है, इस पर सुनवाई 13 मई को होने वाली है। मगर, प्लास्टिक वाली नई आबकारी नीति के खिलाफ ऋषि एंटरप्राइजेज ने सीधे-सीधे एक अलग याचिका दायर कर रखी है। पिछले एक अप्रैल को उसकी सुनवाई हुई थी, जस्टिस नरेश चंद्रवंशी की एकल पीठ ने अंतरिम रोक लगाने की मांग स्वीकार नहीं की, पर सरकार को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था। इसके आगे का डेवलपमेंट अभी मालूम नहीं है। मामला लंबित है।
इधर, डिस्टिलरीज अलग ना-नुकुर कर रहे हैं। जैसे ही सरकार ने प्लास्टिक बोतलों का फरमान निकाला, खाली बोतलों की कीमत उत्पादक कंपनियों ने 40 से 70 प्रतिशत तक बढ़ा दी। आबकारी नीति में प्रावधान किया गया है कि केवल फूड ग्रेड और रियूजेबल प्लास्टिक बोतल हों। बोतलें मजबूत भी हों और हल्की भी हों, ब्रैकेज प्रूफ हों। मैटेलिक कैप की अनुमति नहीं है, कैप भी प्लास्टिक की ही होनी चाहिए। ऋषि कंपनी ने जो हाईकोर्ट में याचिका लगाई है, उसमें उनकी ओर से दावा किया गया है कि इतने कड़े नियम को फॉलो करना तो किसी शराब निर्माता के लिए संभव ही नहीं है। पर्यावरण बचाने के लिए लडऩे रहे लोगों का की ओर से दावा यह भी किया गया है कि सालाना करीब 16 हजार टन प्लास्टिक कचरा छत्तीसगढ़ में बढ़ जाएगा, बोतल सिर्फ डस्टबिन में डालें, इस नियम का पालन शराब पीने वाला कोई आदमी नहीं करने वाला।
तो सुशासन में इस सूखे का आनंद लीजिए।
...कौन बनेगा नया वन प्रमुख?
वन विभाग के शीर्ष पद हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स के लिए प्रस्तावित डीपीसी अपरिहार्य कारणों से टल गई है। मौजूदा हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स वी. श्रीनिवास राव 31 मई को रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में उनके उत्तराधिकारी के चयन को लेकर विभाग में चर्चाओं का बाजार गर्म है। यह पद मुख्य सचिव और डीजीपी के समकक्ष वेतनमान वाला होता है और परंपरा रही है कि सबसे वरिष्ठ पीसीसीएफ को ही यह जिम्मेदारी मिलती रही है।
हालांकि पिछली सरकार में यह परंपरा तब टूटी थी, जब वी. श्रीनिवास राव को पांच वरिष्ठ पीसीसीएफ को सुपरसीड कर इस पद पर पदोन्नत किया गया था। अब डीपीसी टलने के बाद यह चर्चा भी तेज हो गई है कि क्या उन्हें एक्सटेंशन मिल सकता है? मौजूदा सरकार में मुख्य सचिव अमिताभ जैन और डीजीपी अशोक जुनेजा को पहले ही सेवा विस्तार मिल चुका है। हालांकि देश में अब तक किसी भी राज्य में हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स को एक्सटेंशन मिलने का उदाहरण नहीं है।
मंगलवार को वन विभाग की एसीएस ऋचा शर्मा का तबादला कर उन्हें पंचायत विभाग भेज दिया गया। उनकी जगह एसीएस मनोज पिंगुआ को वन विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई है। माना जा रहा है कि इसी प्रशासनिक बदलाव के कारण डीपीसी टली है।
दूसरी तरफ लघुवनोपज संघ के एमडी अनिल साहू वरिष्ठता सूची में सबसे ऊपर हैं, लेकिन वे जुलाई में रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में पीसीसीएफ (वाइल्ड लाइफ) अरुण पाण्डेय और पीसीसीएफ कौशलेन्द्र कुमार के नाम पर भी गंभीरता से विचार हो रहा है। विभागीय गलियारों में अरुण पाण्डेय को सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है, क्योंकि पीसीसीएफ (वाइल्ड लाइफ) का पद विभाग में दूसरे नंबर का अहम पद माना जाता है। अब सबकी नजर नई डीपीसी तारीख पर टिकी है।
...क्या ऐसा संभव है?
अब प्रशासनिक अधिकारियों को सांसदों और विधायकों के सामने हाथ जोडक़र सम्मान करना पड़ेगा। यह बात किसी राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) की ओर से राज्यों को भेजे गए निर्देशों में कही गई है। छत्तीसगढ़ समेत सभी राज्यों को भेजे गए इस आदेश के पालन की जिम्मेदारी मुख्य सचिवों को दी गई है।
दिलचस्प यह है कि छत्तीसगढ़ का सामान्य प्रशासन विभाग भी लगभग हर साल वित्तीय वर्ष की शुरुआत में इसी तरह का परिपत्र जारी करता रहा है, लेकिन इस बार अब तक ऐसा नहीं हुआ था। लिहाजा दिल्ली से ही आदेश आ गया।
निर्देशों में साफ कहा गया है कि सांसद-विधायक कार्यालय या बैठक में आएं तो अधिकारी उठकर उनका अभिवादन करें, हाथ जोड़े और पानी तक पूछें। इतना ही नहीं, जनप्रतिनिधियों के फोन कॉल उठाना और जवाब देना भी अनिवार्य बताया गया है। यदि बैठक में होने के कारण कॉल रिसीव नहीं हो पाए तो बाद में कॉल बैक करना होगा। उनके पत्रों और प्रकरणों का गुणवत्तापूर्ण निराकरण कर जानकारी भी देनी होगी।
डीओपीटी ने यह भी माना है कि तमाम निर्देशों के बावजूद जनप्रतिनिधियों की शिकायतें लगातार मिलती रही हैं कि अधिकारी फोन नहीं उठाते, पत्रों का जवाब नहीं देते और प्रोटोकॉल का पालन नहीं करते। इसलिए अब इसे आचरण नियमावली से जोड़ दिया गया है। यानी उल्लंघन पर कार्रवाई भी संभव है।
हालांकि अफसरशाही इसे हर साल जारी होने वाला ‘रूटीन रिमाइंडर’ मान रही है। मगर हाल के दिनों में कुछ घटनाओं ने इस आदेश को और चर्चा में ला दिया है। खाद्य मंत्री ने एक अधिकारी, विधायक रोहित साहू ने एक पटवारी को जूते से मारने की घटना और प्रतापपुर विधायक शकुंतला पोर्ते द्वारा मंच से राजस्व अधिकारियों को ‘गुरूर छोडऩे’की चेतावनी अभी भी चर्चा में है। अब देखना यह है कि यह आदेश सिर्फ फाइलों तक सीमित रहता है या वास्तव में अफसरों के व्यवहार में भी बदलाव दिखता है।


