विचार / लेख

मणिपुर से मेवात तक नफरत ही नफरत
02-Aug-2023 5:11 PM
मणिपुर से मेवात तक नफरत ही नफरत

 डॉ. आर.के. पालीवाल

नफरत से उपजी हिंसा के रथ पर सवार होकर कोई देश विश्व गुरु तो दूर अपनी बडी आबादी को अच्छे और संस्कारी नागारिक नही बना सकता। हिंसा का सीमित बल समाज में मौजूद चंद दुष्टों के अस्थाई नियंत्रण के लिए कारगर साबित हो सकता है लेकिन स्थाई शांति के लिए अहिंसक समाज का निर्माण ही एकमात्र विकल्प है जिसकी परिकल्पना बुद्ध, महावीर और गांधी ने की है। भारत जैसे सामाजिक, भौगोलिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता वाले देश में शांतिपूर्ण सह अस्तित्व का महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है क्योंकि जिस देश की बहुसंख्यक आबादी गरीब है वहां नफरत से उपजी हिंसा पहले से ही कम संसाधनों को और कम कर रोज कुंआ खोदकर जीवन चलाने वालों के लिए मुसीबतों के नए पहाड़ खड़े कर देती है।

जब कानून बनाने वाले और संविधान की रक्षा की सौगंध खाने वाले दिन रात हिंदू मुस्लिम, मैतेई कुकी,अगड़े पिछड़े और अशरफ पसमांदा करने लगते हैं तब धीरे धीरे समाज के अंदर एक दूसरे समुदाय के लिए वैमनस्य बढ़ता जाता है।अंदर ही अंदर जो नफरत काफ़ी दिनों तक सुलगती रहती है वह जरा सी हवा पाते ही मणिपुर और मेवात बन जाती है। नफरत का ज्वालामुखी फटने के दुष्परिणाम हमारा समाज 1947 के भीषण दंगों में भुगत चुका है। अब उस पीढ़ी के लोग बहुत कम बचे हैं लेकिन साहित्य और फिल्मों में उस दौर की भयानक कहानियां भविष्य में सीख के लिए मौजूद हैं। पिछ्ले कुछ वर्षों से हमारे देश में वैचारिक मतभेद फिर से नफरत की सीमा पार करने लगे हैं, उसी के फल स्वरूप पिछ्ले तीन महीने से मणिपुर में हालात बद से बदतर होते गए हैं और अब मेवात में नफऱत फैलाने वाले तत्वों ने तांडव मचाया हुआ है।

मणिपुर मामले में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी महत्त्वपूर्ण है। सरकार की तरफ से पेश अटॉर्नी जनरल मणिपुर मामले की सुनवाई के लिए समय मांग रहे थे। इसका मतलब साफ था कि सरकार के पास न्यायालय के तीखे प्रश्नों का जवाब उपलब्ध नहीं है जबकि  सरकार के पास पल पल का हिसाब उपलब्ध रहना चाहिए था और सर्वोच्च न्यायालय को पूरी स्थिति से अवगत कराया जाना चाहिए था।जब सरकार के उच्च पदाधिकारी साल भर चुनावी मोड़ में रहते हों तब उनका मणिपुर जैसे सुदूर राज्यों पर ध्यान केंद्रित रहना असंभव है। मणिपुर तो फिर भी केंद्र सरकार के मुख्यालय से काफ़ी दूर है लेकिन दिल्ली के पास मेवात हरियाणा का संवेदनशील इलाका है। वह न केवल हरियाणा की प्रगति के केन्द्र गुडग़ांव से सटा हुआ है देश की राजधानी दिल्ली से भी दूर नहीं है जहां विश्व के सभी देशों की एंबेसी और देश दुनिया के मीडिया हाउस मौजूद हैं। मणिपुर के चार मई के वीडियो को वायरल होने में भले ही दो महीने लगे थे मेवात की हिंसा के वीडियो को वायरल होने में दो घण्टे भी नहीं लगे। मेवात की हिंसा पहले से ही मणिपुर की हिंसा से खराब हुई हमारी छवि को और खराब करेगी। मणिपुर और हरियाणा दोनों में डबल इंजन सरकार है। इससे सरकार का यह दावा भी खुद खारिज हो जाता है कि डबल इंजन सरकार राज्यों के लिए ज्यादा हितकारी हैं।

मेवात दंगे में उस मोनू मानेसर का नाम आ रहा है जो राजस्थान के दो लोगों को जलाकर मारने के जघन्य अपराध में वांछित है। हरियाणा पुलिस इस कथित गौ रक्षक के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर पाई और यह बंदा मेवात में धार्मिक यात्रा निकालने में सोसल मीडिया पर आव्हान कर रहा है। कर्नाटक चुनाव में भारतीय जनता पार्टी घोषित कर रही थी कि भाजपा नही जीती तो प्रदेश में तनाव होगा। क्या भारतीय जनता पार्टी आगामी चुनावों में अब भी यह कह सकती है कि उनकी सरकार बनने पर दंगे नहीं होंगे!

दंगे नहीं होने देना और दंगे होने पर उन्हें त्वरित कार्रवाई कर रोकना प्रदेश सरकार की सबसे महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इस दृष्टि से मणिपुर सरकार बुरी तरह फेल रही है और हरियाणा सरकार की हालत भी खराब है।


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