विचार / लेख
मनीष सिंह
ये विक्टर ह्यूगो का मशहूर कोट है। पिछले 10 सालों में हमने 3 विचारों का वक्त आते, और जाते देखा है।
विचार की जन्म, उसके परिदृश्य के गर्भ से होता है। वो हमेशा अंधकार से रोशनी की ओर ले जाने का दावा करता है। पिछले दस सालों में विचार के तीन चेहरे हमने देखे हैं। मोदी, राहुल, केजरीवाल..
और शुरुआत राहुल की नकार से होती है। राहुल याने वंश परंपरा, ऐसे भ्रष्ट तंत्र का राजकुमार जिसके नाक तले अविश्वसनीय अंकों के भ्रष्टाचार होते हैं। इस नकार से दिल्ली में केजरीवाल पैदा हुए।
मगर इसी नकार ने देश भर में भाजपा की जमीन तैयार की। सपनो का नया राजकुमार आया। सफेद घोड़े पर बैठ वो तलवार चमकाता। भारत के हर जंजाल को काटने का उद्घोष कर रहा था।
उसका वक्त आ चुका था।
मोदी उसका चेहरा थे।
उस विचार को रोकना असम्भव था। सत्तर साल से भारत एक दूसरी विचारधारा को भी गर्भ में पालता आया था। 2014 में आखिरकार उसका प्रसव हुआ। देखते ही देखते दस बरस की उम्र पूरी कर ली।
और बूढ़ा भी हो गया।
नकार दरअसल उम्र घटाती है। कांग्रेस की नकार से शुरू हुई यात्रा, इतिहास की नकार, संस्कृति की नकार, नेहरू, गांधी, सत्य, अहिंसा, शिक्षा, विज्ञान, इंसानियत, सहजबुद्धि और हर उस शै की नकार को छूती रही, जो मूलत: भारत नामक लोकतन्त्र का विचार थी।
अब हालात यह है कि ढ्ढहृष्ठढ्ढ्र को नकारने को आतुर हैं। दरअसल नकार ही इस संघटन की 90 सालों की यात्रा का मूल विचार था।
इसका दौर तो छोटा होना ही था।
केजरीवाल के पास सकारात्मक विचार थे। शुरुआत उस जमीन पर हुई, जो कांग्रेस की बनाई हुई थी। इस जमीन में एकता, शांति, भाईचारा की खाद थी। उस पर विकास, समृद्धि, संतुष्टि की फसल उगानी थी। उन्होंने शुरू किया।
लेकिन चारों ओर नफरत और नकार की सफलता देखकर ठिठक गए। मिश्रित फसलें बोने की कोशिश की। मगर नशा उगाने के लिए जहरीली खाद की जितनी जरूरत होती है, केजरीवाल में उसे डालने की बेशर्मी भी नही। वे छिपछिप कर, मिलावटी खाद डालने लगे।
न अफीम उगा सके, न अनाज
और परिदृश्य का गर्भ बदल चुका है। एक निरंकुश सरकार है, नफरत है, टूट है। धोखेबाजी और ताकत का जोर है। इसकी गर्भ से स्पार्टाकस, ग्वेरा या गांधी निकलते हैं।
और निगाहें घूमकर राहुल पर लौट आयी हैं। जो टिका है, बेदाग है, निडर है। जिसके कदम दक्षिण से उत्तर जोड़ चुके। जो पूरब से पश्चिम जोडऩे को निकल रहा है। जिसकी झोले से गांधी, बुद्ध, मार्क्स, ग्वेरा, झांक रहे हैं। जो नफरत के मॉल में पसरा बिछाकर मोहब्बत बेचने आया है।
इस राहुल की पहचान, किसी का बेटा या किसी का भाई होना नही। ये चेहरा वही है जिसे दुनिया ‘भारत’ कहकर सदियों से पहचानती आयी है।
वो अक्स, जिसे बदशक्ल भारत फिर से आईने में देखना चाहता है। इस चेहरे का, इस विचार का वक्त आ गया है।
और जिस विचार का वक्त आ गया हो, उसे कोई सेना नही रोक नहीं सकती।


