विचार / लेख
डॉ. आर.के. पालीवाल
अभी हाल ही में राष्ट्रीय स्तर के एक साहित्यिक सांस्कृतिक कार्यक्रम में राष्ट्रपति भोपाल आई थी। उनके कार्यक्रम में शामिल होने के कारण सुबह 10.30 से शाम 5 बजे तक कुछ रास्ते दिन भर बंद रखने और कुछ अलग अलग समय पर बंद रहने के समाचार प्रकाशित हुए थे। इस मुद्दे पर भोपाल की एक संवेदनशील पत्रकार ने लिखा था कि जब आयोजन स्थल के रास्ते बंद रहेंगे तो इस आयोजन में दर्शक या साहित्यिक चर्चा सुनने का इच्छुक व्यक्ति आयोजन स्थल पर कैसे पहुँचेगा?एक अखबार में लिखा था आयोजन से लोगों को जोडऩे निकली यात्रा, तो जो इससे जुडऩा चाहे देखना चाहे वो तो पहुंच ही नहीं सकता। आयोजन का पास तो सबके पास नहीं होता। ऐसा लगता है कि इस तरह के आयोजन अब चंद पास धारकों के लिए रह गए हैं और आम नागरिकों के लिए ऐसे आयोजन ट्रेफिक डायवर्सन के कारण होने वाली परेशानी ही पैदा करते हैं। राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री का किसी शहर में किसी भी कार्यक्रम में आना शहरवासियों के लिए बड़ी मुसीबत बन जाता है। जनता को परेशानी से निजात दिलाने के लिए यदि यह लोग ऐसे आयोजनों को राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री आवास से वेबिनार के माध्यम से संबोधित कर दिया करें तो जनता पर बड़ा उपकार होगा।
अभी कुछ दिन पहले प्रधान मंत्री के भोपाल आगमन पर भी शहर के कई इलाकों में ट्रैफिक जाम से शहर वासियों का बुरा हाल हुआ था। भोपाल की प्रमुख सडक़ होशंगाबाद रोड पर वैसे ही कार्यालय के समय सुबह दस बजे के आसपास और शाम को छह बजे के आसपास ट्रैफिक जाम की स्थिति रहती है। ऐसे में सडक़ बंद होने से कई कई घंटों के जाम में मरीज और स्कूल जाने वाले बच्चे भी फंस जाते हैं। वह तो इंद्रदेव की कृपा से उस दिन बारिश होने से प्रधानमन्त्री का प्रस्तावित रोड शो नही हो पाया था अन्यथा ट्रैफिक जाम से और बदतर हालात बन जाते।वेबिनार के जमाने में प्रधान मंत्री और राष्ट्रपति को दिल्ली रहकर काम निबटाने चाहिएं या आम साधारण नागरिक की तरह आना चाहिए।
प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए राजसी सुरक्षा तामझामो का कुछ लोग यह कहकर समर्थन कर सकते हैं कि देश के इन विशिष्ट लोगों के लिए इतनी कड़ी सुरक्षा जरूरी है। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था अधिकांशत: ब्रिटिश परंपरा से आई है। उसके साथ हमारे संविधान में सभी विकसित देशों के संविधान से अच्छी परंपराएं लेने की कोशिश की गई है। दुर्भाग्य से आज़ादी के बाद हमने ब्रिटिश लोकतंत्र की अभिव्यक्ति की आज़ादी और जन प्रतिनिधियों की सादगी आदि को आत्मसात नहीं किया। वहां प्रधानमंत्री के लिए सुरक्षा के डरावने तामझाम नहीं होते। ऐसे में हम गरीब देश के लोगों पर विशिष्ट लोगों की भारी सुरक्षा के बंदोबस्त का बोझ किसी भी दृष्टि से तर्क संगत नहीं लगता। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के अवसर पर आयोजित समारोह में महात्मा गांधी ने तत्कालीन वायसराय की इसी तरह की कड़ी सुरक्षा को लेकर बहुत तीखा विरोध किया था। उनका आशय यही था कि वायसराय को अपनी जनता से इतना अधिक नहीं डरना चाहिए कि भारी सुरक्षा बंदोबस्त करना पड़े। गांधी ने कहा था कि वायसराय को खुद की सुरक्षा की इतनी चिंता है लेकिन देश के लोगों की सुरक्षा की चिंता नहीं है।
महात्मा गांधी की 1916 में तत्कालीन वायसराय के लिए कही गई बातें आज और भी ज्यादा प्रासंगिक हो रही हैं। वर्तमान परिदृश्य में आज के वायसराय और मंत्रियों के लिए तो सुरक्षा के इतने जबरदस्त तामझाम हैं और आम जनता की सुरक्षा के लिए कुछ भी नहीं है। मणिपुर में जिस तरह से हिंसक भीड़ ने दो निर्दोष आदिवासी महिलाओं की नग्न परेड कराई है और ट्रेन में यात्रियों की सुरक्षा के नाम पर घूमते आर पी एफ के जवान ने जिस तरह से बोगियों से खोज खोज कर धर्म विशेष के लोगों का नर संहार किया है ऐसे में गांधी के उदगार और ज्यादा प्रासंगिक हो जाते हैं।


