विचार/लेख
- रजनीश कुमार
बिहार के दो युवा. एक 30 साल के तेजस्वी यादव और दूसरे 38 साल के चिराग पासवान. तेजस्वी यादव क्रिकेटर बनना चाहते थे, लेकिन क्रिकेट की दुनिया में ग़ुमनाम से रहे. चिराग पासवान अभिनेता बनना चाहते थे, लेकिन वे अभिनय की दुनिया में अनजान रह गए.
अब दोनों के पास अपने-अपने पिता की राजनीतिक विरासत है और उसी के सहारे वो नेता बन चुके हैं.
रोहन गावसकर के पास पिता सुनील गावसकर के क्रिकेट की विरासत थी, लेकिन वे चाहकर भी क्रिकेट में स्थापित नहीं हो पाए. लेकिन राजनीति में व्यक्तिगत परफ़ॉर्मेंस का मसला भारतीय लोकतंत्र से ग़ायब है, इसलिए नेता बनना क्रिकेटर बनने की तरह मुश्किल नहीं है.
तेजस्वी बताते हैं कि उनमें क्रिकेट की ललक इस क़दर थी कि उन्होंने नौंवी क्लास के बाद पढ़ाई छोड़ दी.
तेजस्वी का क्रिकेट प्रेम
सबा करीम तब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले चुके थे. साल 2001 था. लालू प्रसाद यादव बिहार क्रिकेट असोसिएशन के अध्यक्ष थे. सबा करीम और राम कुमार क्रिकेट को लेकर लालू यादव से उनके आवास पर मिलने गए थे.
लालू यादव के सामने सबा करीम और राम कुमार ने बिहार की प्रतिभाओं को क्रिकेट में जगह देने के लिए कई तरह के प्रस्ताव रखे थे.
सबा करीम कहते हैं, ''लालू जी ने हमारी बातें ध्यान से सुनीं. वो हमारे प्रस्तावों को लेकर बहुत ही सकारात्मक थे. बातचीत के दौरान ही उन्होंने अपने बेटे तेजस्वी से मिलवाया. तब तेजस्वी की उम्र 10-12 साल रही होगी. लालू जी ने कहा कि देखो, ये मेरा छोटा बेटा है और क्रिकेट को लेकर बहुत उतावला रहता है. थोड़ा इस पर भी ध्यान दो. हमने 2002 में पटना में एक कैंप लगाया. उसमें 100 बच्चों को चुना गया. इन 100 में एक तेजस्वी यादव भी थे. हमें लालू यादव ने कहा था कि इसको थोड़ा देख लो और मदद करो. लालू तेजस्वी के क्रिकेट को लेकर बहुत गंभीर थे.''
सबा करीम कहते हैं कि तेजस्वी के साथ क्रिकेट की विरासत नहीं थी, लेकिन उनकी चाहत थी. हालांकि तेजस्वी चाहत के साथ लंबे समय तक नहीं रह पाए और उन्हें अपनी विरासत की ओर रुख़ करना पड़ा.
सबा कहते हैं कि लालू ने उस वक़्त उनसे तेजस्वी का बैट देखने को भी कहा था और सलाह माँगी थी कि उन्हें किस तरह के बैट से खेलना चाहिए.
लालू प्रसाद यादव से उस मुलाक़ात को याद करते हुए राम कुमार कहते हैं, ''तेजस्वी तब स्कूल का बच्चा था, लेकिन क्रिकेट को लेकर उसका सेंस बहुत अच्छा था. हम दोनों ने तेजस्वी से बात की थी. उससे क्रिकेट को लेकर बात हुई और उसने एक्सप्लेन किया था और लालू जी ने हमें क्रिकेट सिखाने के लिए कहा था.''
'वीरेंदर सहवाग की तरह बैटिंग'
राम कुमार कहते हैं, ''शुरुआत में हमने पटना में क्रिकेट सिखाना शुरू किया. एक अणे मार्ग में ही ट्रेनिंग शुरू कर दी, वहीं नेट लगाया गया. हमने देखा तो लगा कि लड़के में क्षमता है. उसकी समझ बहुत अच्छी थी. बल्लेबाज़ी और गेंदबाज़ी में जो हम तकनीक बताते, उसे वो बहुत जल्दी सीख लेता. उसके अंदर ललक थी. तेजस्वी में लगातार सुधार हो रहा था. फिर हमें लगा उसे ओपन जगह पर खेलना चाहिए, तो हम उसे बाहर आम क्रिकेटरों के साथ मिक्स-अप करने लगे. बाद में लोगों ने भीड़ लगाना शुरू कर दिया. तेजस्वी के बारे में लोगों को पता चल गया था कि वे मुख्यमंत्री के बेटे हैं.''
राम कुमार बताते हैं कि 2003 में तेजस्वी को दिल्ली शिफ़्ट करना पड़ा. वहाँ वे नेशनल स्टेडियम में प्रैक्टिस करने लगे. दिल्ली जाने के बाद उन्हें और भी एक्सपोजर मिला.
राम कुमार कहते हैं कि तेजस्वी वीरेंदर सहवाग की तरह बैटिंग करना चाहते थे.
तेजस्वी यादव के एक और कोच अशोक कुमार कहते हैं, ''तेजस्वी टीम मैन थे. व्यक्तिगत प्रदर्शन को लेकर बहुत उतावले नहीं होते थे. दिल्ली डेयरडेविल्स में उन्हें दो बार मौक़ा मिला. बेहतर खिलाड़ी थे, लेकिन सब कुछ इतनी जल्दी नहीं हो जाता है. जो तेजस्वी के क्रिकेट का मज़ाक उड़ाते हैं, उन्हें क्रिकेट की समझ नहीं है. मैं इसे एक उदाहरण के ज़रिए समझाता हूँ. झारखंड रणजी टीम की राजीव कुमार राजा ने कप्तानी की. राजीव छह इनिंग्स में बिल्कुल नहीं खेल पाए. अगले सीज़न में राजीव कुमार राजा ने बेहतरीन परफ़ॉर्म किया. तेजस्वी ने महज एक रणजी ट्रॉफ़ी मैच और विजय हज़ारे ट्रॉफी के दो मैच खेले और उसमें वो अच्छा नहीं खेल पाए, लेकिन इतने कम मैचों के आधार पर किसी का आकलन करना नाइंसाफ़ी है.''
अशोक कुमार कहते हैं, ''तेजस्वी ने दिल्ली अंडर-19 में भी खेला और उन्होंने एक बार 62 गेंद पर 100 रनों की पारी खेली थी. तेजस्वी एक अनुशासित खिलाड़ी थे. मेरा मानना है कि भले तेजस्वी ने डिग्री वाली पढ़ाई नहीं की, लेकिन उन्होंने क्रिकेट सीखने के क्रम में बहुत कुछ जाना और समझा. इसी दौरान उन्हें एक्सपोजर भी मिला. तेजस्वी ने क्रिकेट में बहुत मेहनत की थी. तेजस्वी में किसी भी चीज़ को अपनाने की क्षमता क़ाबिल-ए-तारीफ़ थी. दिल्ली आने के बाद तेजस्वी डीपीएस आरके पुरम में पढ़ाई कर रहे थे.''
अशोक कुमार 2010 में झारखंड प्रीमियर लीग के कोच बनकर गए. तेजस्वी जमशेदपुर जांबाज़ टीम में शामिल हुए. हालाँकि यहाँ भी वो कुछ ख़ास नहीं कर पाए.
शाम का वक़्त है. विपिन राम पटना के स्टेट गेस्ट हाउस में एक कुर्सी पर बैठ लालू यादव के पुराने वीडियो देख रहे हैं. वीडियो देखते हुए वे हँसते जाते हैं.
तभी बिहार के एक वरिष्ठ पत्रकार के साथ हमलोग वहाँ पहुँचते हैं. वीडियो में लालू की आवाज़ सुनते ही हमारे साथ आए वरिष्ठ पत्रकार ने हँसते हुए कहा- 'का जी, तुमको नौकरी नीतीश कुमार ने दी और वीडियो लालू यादव का देखते हो.'
इतना सुनते ही विपिन राम मोबाइल वीडियो बंद कर देते हैं और कहते हैं, ''सर, लालू जी को देख पुरानी बातें याद आती हैं, बहुत हँसी आती है. ये बात सच है कि नौकरी नीतीश कुमार ने दी, पर हँसाता तो लालू जी का ही भाषण है.''
विपिन राम स्टेट गेस्ट हाउस में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने से पहले से ही रूम सर्विस का काम करते थे.
हालाँकि तब उनकी नौकरी पक्की नहीं थी और सैलरी भी महज़ 1700 रुपए मासिक थी.
नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद विपिन की नौकरी पक्की हो गई और आज की तारीख़ में विपिन हर महीने 26 हज़ार रुपए कमाते हैं.
विपिन से जब अकेले में बात की, तो उन्होंने बताया, ''सर, मैंने लालू जी की बहुत सेवा की है. हाथ-पैर ख़ूब दबाए हैं. जाते ही लालू जी कहते थे- अरे विपिनवा हाथ पैर दबाओ. हालाँकि नौकरी तो नीतीश कुमार ने दी. अगर लालू जी ही दे दिए होते, तो मेरे परिवार की स्थिति बेहतर होती. लंबा समय तो 1700 की सैलरी में बिता दिए.''
विपिन कहते हैं, "वो लालू जी का ज़माना था. उनके घर का दरवाज़ा कभी ग़रीबों के लिए बंद नहीं हुआ. उनके बेटे क्रिकेट खेलते थे तो हम गेंद फेंकते थे.''
विपिन हँसते हुए कहते हैं, "लेकिन वो हमसे केवल बॉलिंग करवाते थे, बैटिंग नहीं देते थे. अब भी घर जाते हैं, तो तेज प्रताप पहचान लेते हैं और हालचाल पूछते हैं, लेकिन तेजस्वी नहीं पहचानते हैं."
विपिन राम को भले लालू यादव ने नौकरी नहीं दी, लेकिन वो पुराने दिन याद कर आज भी भावुक हो जाते हैं. विपिन को शिकायत है कि लालू यादव की तरह उनके बेटे नहीं हैं.
तेजस्वी यादव में कई लोग उनके पिता लालू यादव को खोजने की कोशिश करते हैं. लेकिन जो भी ऐसा करते हैं, उन्हें निराशा हाथ लगती है और फिर कहते हैं कि लालू यादव कोई दूसरा नहीं हो सकता.
लेकिन क्या पिता के व्यक्तित्व में बेटे को देखना किसी के आकलन का सही तरीक़ा है?
इस पर आरजेडी के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं कि पिता से बेटे की तुलना करना बिल्कुल नाइंसाफ़ी है.
वे कहते हैं, ''अगर मेरी तुलना कोई मेरे पिता रामानंद तिवारी से करे, तो मैं तो उनके चरणों की धूल बराबर नहीं हूँ. मेरा बेटा भी मुझसे बिल्कुल अलग है. गांधी से उनके बेटे की तुलना नहीं की जा सकती. ये बात महत्वपूर्ण है कि आप अपनी संतान को कैसी परवरिश देते हैं, उसका असर बच्चों पर पड़ता है. तेजस्वी का व्यक्तित्व अलग है और वे अभी बनने की प्रक्रिया में हैं. हम लालू यादव से उनकी तुलना कैसे कर सकते हैं.''
जहाँ विपिन राम कहते हैं कि लालू के ज़माने में उनके घर का दरवाज़ा कभी बंद नहीं होता था, वहीं उनका कहना है कि 'तेजस्वी से मिलना अब इतना आसान नहीं रहा.'
बिछड़े सभी बारी-बारी
कभी आरजेडी में रहे और अब बीजेपी सांसद रामकृपाल यादव के बेटे अभिमन्यु दिल्ली में दो साल तक तेजस्वी के साथ बिहार निवास में रहे. तब राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री थीं.
अभिमन्यु और तेजस्वी दिल्ली में 2002 से 2004 तक साथ थे. जब लालू यादव रेल मंत्री बन गए, तब तेजस्वी अपने पिता को मिले सरकारी घर में शिफ़्ट हो गए.
अभिमन्यु से हमने पूछा कि तेजस्वी को लेकर उनका क्या अनुभव रहा? तेजस्वी ने स्कूल की पढ़ाई बीच में ही क्यों छोड़ दी? तेजस्वी को एक नेता के तौर पर वो कितना परिपक्व मानते हैं?
तो जवाब में अभिमन्यु ने कहा, ''तेजस्वी मेरे बड़े भाई की तरह रहे. उनके साथ जब तक था, तब तक उन्होंने मेरा उसी रूप में ध्यान रखा. हमने अपने जीवन के बेहतरीन पल साथ गुज़ारे हैं. साथ में फ़िल्में, रेस्तरां, ट्रिप और क्रिकेट. ऐसा कभी नहीं लगा कि आने वाले दिनों में हालात इस क़दर बदलेंगे कि हमारे बीच बात ही बंद हो जाएगी.''
अभिमन्यु कहते हैं, ''उनका पूरा ध्यान क्रिकेट पर था. इसलिए उन्होंने पढ़ाई नहीं की. क्रिकेट को वो सबसे ज़्यादा वक़्त देते थे. एक नेता के रूप में उन्हें अभी बहुत कुछ करना है. लालू जी संघर्ष के दम पर नेता बने थे, लेकिन तेजस्वी को बहुत कुछ किया हुआ मिला है. लालू जी इन्हीं संघर्षों के दम पर जन-नेता बने थे, जबकि तेजस्वी के आसपास जो लोग हैं, वो उनसे ही घिरे हुए हैं. मेरा मानना है कि तेजस्वी की पढ़ाई पूरी हो गई होती, तो वो और अच्छे नेता बनते.''
अभिमन्यु और तेजस्वी के रिश्ते जितने मधुर थे, अब उतने ही ख़राब हो गए हैं.
रामकृपाल यादव लंबे समय तक लालू यादव के सबसे पक्के वफ़ादारों में से एक रहे. साल 2014 में पाटलिपुत्र लोकसभा क्षेत्र से वो आरजेडी का टिकट चाहते थे, लेकिन वहाँ से लालू यादव की बेटी मीसा भारती को टिकट मिला. अभिमन्यु कहते हैं कि यह उनके पिता के लिए किसी झटके से कम नहीं था.
अभिमन्यु ने कहा, ''बात लोकसभा टिकट की नहीं थी. सम्मान की थी. पापा ने यहाँ तक कह दिया था कि अगर यहाँ से राबड़ी जी चुनाव लड़ती हैं, तो उन्हें कोई दिक़्क़त नहीं. पापा आरजेडी के लिए बहुत मेहनत करते थे. बल्कि लालू जी के परिवार की ख़ातिर भी हमेशा समर्पित रहते थे. ऐसे में सांसद बनने की तमन्ना भला क्यों नहीं रहती. हालाँकि पापा के बीजेपी में जाने के पीछे कारण केवल टिकट का मामला नहीं है. पापा का अपमान हुआ था और ये असहनीय था. मैंने पापा से कहा कि जहाँ सम्मान ना मिले, उनके साथ रहने का कोई मतलब नहीं."
अभिमन्यु की 2017 में शादी हुई. लालू यादव को आमंत्रित किया गया, लेकिन वो नहीं आए.
लालू प्रसाद यादव और रामकृपाल यादव की फ़ाइल फ़ोटो
अभिमन्यु कहते हैं, ''मैंने तेजस्वी को आमंत्रित नहीं किया था. इससे पहले वो मेरी बहन की शादी में नहीं आए थे. उसके बाद आमंत्रित करने का कोई मतलब नहीं था.''
क्या तेजस्वी ने रामकृपाल यादव को मनाने की कोशिश नहीं की? अभिमन्यु कहते हैं कि तब तेजस्वी पार्टी में बहुत सक्रिय नहीं थे और सब कुछ लालू जी ही देखते थे. अभिमन्यु लालू परिवार से अपने रिश्तों को याद करते हैं, तो जितना कुछ कहना चाहते हैं वो अनकही सी रह जाती है.
साल 2019 के अप्रैल में हमने रामकृपाल यादव का एक इंटरव्यू किया था. हम उनके बेडरूम में बैठे थे. बिस्तर के ठीक सामने की दीवार पर लालू और राबड़ी की एक तस्वीर टंगी थी.
इसके अलावा कोई और तस्वीर नहीं थी. रामकृपाल यादव से पूछा कि आपने केवल इनकी ही तस्वीर रखी है? ये पूछने पर वो भावुक हो गए और कहा कि उनके लिए दिल में जगह है और हमेशा रहेगी.
तेजस्वी की राजनीति
तेजस्वी यादव 2015 के विधानसभा चुनाव में राघोपुर से विधायक चुने गए. यह उनका पहला चुनाव था.
तब नीतीश कुमार और लालू यादव ने मिलकर चुनाव लड़ा था. चुनाव में इसी गठबंधन को जीत मिली और तेजस्वी पहली बार में ही प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री बन गए.
दो साल भी नहीं हुए कि नीतीश कुमार फिर से बीजेपी के साथ चले गए और तेजस्वी को 16 महीने बाद उप-मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी. उसके बाद वो विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने.
इस छोटे से राजनीतिक करियर में तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे. आईआरसीटीसी लैंड स्कैम केस में उन्हें अगस्त 2018 में बेल मिली थी.
ये मामला पटना में तीन एकड़ ज़मीन को लेकर है. इस ज़मीन पर एक मॉल प्रस्तावित है. लालू यादव पर आरोप है कि उन्होंने 2006 में रेल मंत्री रहते हुए एक निजी कंपनी को होटल चलाने का कॉन्ट्रैक्ट दिया और इसके बदले उन्हें महंगा प्लॉट मिला.
सीबीआई का कहना है कि यह ज़मीन पहले आरजेडी के एक नेता की पत्नी के नाम पर ट्रांसफ़र की गई और बाद में कौड़ी के भाव राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव के नाम पर ज़मीन दे दी गई.
नीतीश कुमार ने पूरे मामले पर तेजस्वी यादव को स्पष्टीकरण देने के लिए कहा था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. जबकि लालू यादव ने बीजेपी पर फँसाने का आरोप लगाया था.
पूरे मामले में तेजस्वी का नाम एक साज़िशकर्ता के तौर पर है. तेजस्वी का कहना था कि ज़मीन तब मिली, जब उनकी उम्र बहुत ही कम थी.
उन्होंने कहा था कि तब तो उनकी मूँछ भी नहीं निकली थी. नीतीश कुमार ने इन्हीं आरोपों का हवाला देकर आरजेडी से गठबंधन तोड़ दिया था.
तेजस्वी कितने आधुनिक?
2018 में तेजस्वी यादव से एक इंटरव्यू को दौरान हमने पूछा था कि क्या वो अंतरजातीय विवाह कर लेंगे? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा था कि शादी माँ-बाप के मन से होता है और वो जो कहेंगे वही होगा.
कुछ दिन पहले ही चिराग पासवान से पूछा कि उनकी ज़िंदगी में धर्म और जाति की कितनी जगह है? इस सवाल के जवाब में चिराग ने कहा कि बिल्कुल नहीं. हालाँकि वो दलित राजनीति पर अपने पिता की तरह अब भी अपना अधिकार जताते हैं.
कई हलकों में मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव से तेजस्वी की तुलना की जाती है. कई लोग मानते हैं कि अखिलेश अपने पिता से भी ज़्यादा समझदार हैं और वो हिम्मती भी हैं.
अखिलेश ने अपने पिता की राजनीति को चुनौती भी दी. अखिलेश यादव की राजनीति अपने पिता की छाया से बाहर हो चुकी है, जबकि तेजस्वी यादव के साथ ऐसा नहीं है.
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता घनश्याम तिवारी कहते हैं, ''अखिलेश यादव हिम्मती हैं. उन्होंने जितना बेबाक फ़ैसला अपने निजी जीवन में लिया, उतना ही राजनीतिक जीवन में भी. इतनी हिम्मत सबके वश की बात नहीं. अखिलेश यादव ने 90 के दशक की पार्टी को 21वीं सदी की पार्टी बनाया. वो जाति और धर्म की राजनीति नहीं करते. अखिलेश को आप इस रूप में भी देख सकते हैं कि उनकी टीम बहुत ही विविध होती है.''
तेजस्वी में लोग लालू को खोजते हैं, लेकिन अखिलेश में मुलायम सिंह यादव को क्यों नहीं खोजते?
इस पर वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरॉन कहती हैं, ''अखिलेश यादव पाँच साल मुख्यमंत्री रह चुके हैं. उन्होंने आते ही समकालीन राजनीति की. डीपी यादव को टिकट नहीं दिया. मेट्रो बनाई. लैपटॉप बाँटे और एक्सप्रेस-वे बनाया. अंग्रेज़ी को लेकर भी अपने पिता से अलग लाइन ली. तेजस्वी तो 16 महीने ही उपमुख्यमंत्री रहे और पार्टी में अब भी लालू प्रसाद यादव का पूरा दख़ल है. मुझे तो तेजस्वी यादव भी ब्राइट दिखते हैं. तेजस्वी यादव को मौक़ा मिलेगा, तो वे ख़ुद को साबित करके दिखाएँगे. अखिलेश यादव को भी मुलायम सिंह की छाया से बाहर निकलने में वक़्त लगा था.''
इस बार तेजस्वी ने बाहुबली अनंत सिंह, रामा सिंह की पत्नी वीणा सिंह और आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद को उम्मीदवार बनाया है.
रघुवंश प्रसाद सिंह जब तक ज़िंदा रहे, तब तक रामा सिंह की एंट्री का विरोध किए, लेकिन अब रामा सिंह और उनकी पत्नी दोनों आरजेडी में हैं.
नेतृत्व तेजस्वी को ही क्यों मिला?
सुनीता एरॉन कहती हैं, ''टिकट बँटवारे को उस वक़्त की चुनावी रणनीति के लिहाज़ से भी देखा जाना चाहिए. डीपी यादव को अखिलेश ने टिकट नहीं दिया तो इससे उनका कोई नुक़सान नहीं हुआ, लेकिन बिहार में लालू यादव का परिवार अपनी खोई राजनीति ज़मीन वापस करने में जुटा है.''
अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी में उनको चुनौती देने वाला अब कोई नहीं है, जबकि तेजस्वी के सामने उनके भाई तेज प्रताप यादव हैं. पिछले साल लोकसभा चुनाव में तेज प्रताप ने अपने लोगों को पार्टी से टिकट नहीं मिलने पर अलग से लालू-राबड़ी मोर्चा बना लिया था.
लालू प्रसाद यादव के नौ बेटे-बेटियाँ हैं. मीसा भारती सबसे बड़ी बेटी हैं और तेज प्रताप सबसे बड़े बेटे. लेकिन आरजेडी का नेतृत्व तेजस्वी को ही क्यों मिला?
इस सवाल के जवाब में आरजेडी नेता प्रेम कुमार मणि कहते हैं कि तेजस्वी लालू यादव की सभी संतानों में सबसे समझदार हैं.
वे कहते हैं, ''लोगों का मानना है कि राहुल गांधी से ज़्यादा समझदार प्रियंका गांधी हैं, लेकिन सोनिया गाँधी ने राहुल के पिछड़ने के डर से प्रियंका को जान-बूझकर पीछे रखा. लेकिन लालू जी के साथ ऐसा नहीं है. मीसा भारती को भी लालू जी ने मौक़ा दिया है. दो बार से वो चुनाव हार रही हैं और अभी राज्यसभा सांसद हैं. तेज प्रताप के तेवर से लोग परिचित ही हैं. ऐसे में तेजस्वी का चुनाव स्वाभाविक था.''(bbc)
राष्ट्रीय महिला आयोग के मुताबिक़, "इस दौरान उन्होंने राज्यपाल से राज्य के कोविड सेंटर्स में महिला मरीज़ों के साथ बलात्कार और छेड़छाड़, वन स्टॉप सेंटर की निष्क्रियता और लव जिहाद के मामलों में बढ़ोतरी पर चर्चा की."
आयोग की एक प्रेस विज्ञप्ति और न्यूज़ एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, रेखा शर्मा ने राज्यपाल से कहा कि महाराष्ट्र में 'लव जिहाद' के मामले बढ़ रहे हैं.
बातचीत में उन्होंने आपसी सहमति से दो अलग धर्मों के लोगों के विवाह और लव जिहाद के बीच अंतर को रेखांकित किया और कहा कि इसपर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है.
यहाँ विवाद इस बात पर उठ खड़ा हुआ कि उन्होंने 'लव जिहाद' टर्म का इस्तेमाल किया.
दरअसल केंद्र की मोदी सरकार फरवरी में ख़ुद संसद में कह चुकी है कि मौजूदा क़ानूनों में 'लव जिहाद' टर्म परिभाषित नहीं है और किसी भी केंद्रीय एजेंसी ने इससे जुड़े केस को रिपोर्ट नहीं किया है.
संसद में लिखित सवाल पूछा गया था कि क्या सरकार को जानकारी है कि केरल हाई कोर्ट ने कहा है कि लव जिहाद किसी चीज़ को कहा ही नहीं जाता है.
इस सवाल के जवाब में 4 फरवरी 2020 को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने कहा था- लव जिहाद शब्द को मौजूदा क़ानूनों के तहत परिभाषित नहीं किया गया है. 'लव जिहाद' का कोई मामला किसी केंद्रीय एजेंसी ने रिपोर्ट नहीं किया है."
इस दौरान सरकार की ओर से ये भी कहा गया कि संविधान ने सभी को किसी भी धर्म को अपनाने और उसका प्रचार करने की आज़ादी दी है.
हालाँकि कई दक्षिण पंथी समूह हिंदू लड़की और मुसलमान लड़के के बीच शादी के लिए 'लव जिहाद' शब्द का इस्तेमाल करते हैं और आरोप लगाते हैं कि हिंदू लड़कियों को बहला-फुसलाकर धर्मांतरण करवाकर शादी कर ली जाती है.
यही वजह है कि इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि महिला आयोग की प्रमुख कैसे इस शब्द का इस्तेमाल कर रही हैं और किन आँकड़ों के आधार पर 'लव जिहाद' के मामले बढ़ने की बात कह रही हैं, जबकि केंद्र सरकार ख़ुद इस बात से इनकार कर चुकी है.
सोशल मीडिया पर घिरीं
राष्ट्रीय महिला आयोग ने रेखा शर्मा और राज्यपाल कोश्यारी की मुलाक़ात की तस्वीरें और जानकारी ट्विटर पर शेयर की थी. जिसके कुछ वक़्त बाद सोशल मीडिया पर रेखा शर्मा सवालों से घिर गईं.
कई सोशल मीडिया यूज़र्स ने कड़ी प्रतिक्रया दी है. एक ट्विटर यूज़र देबिप्रसाद मिश्रा ने आयोग के ट्वीट पर जवाब देते हुए लिखा, "क्या एनसीडब्ल्यू और उसकी प्रमुख ये स्पष्ट करेंगी कि 'लव जिहाद' से उनका क्या मतलब है? क्या आप इसे उसी अर्थ के साथ इस्तेमाल कर रही हैं, जैसे कुछ अतिवादी समूह कर रहे हैं? अगर हाँ, तो क्या आप बिना किसी क़ानूनी आधार के उनकी विचारधारा का समर्थन कर रही हैं?"
पल्लवी नाम की यूज़र ने सवाल उठाया कि क्या भरोसा किया जा सकता है कि राष्ट्रीय महिला आयोग उन मामलों को उठाएगी, जिनमें दूसरे धर्म में शादी करने के लिए महिलाओं पर हमला किया जाता है और उन्हें मार तक दिया जाता है.
पल्लवी ने ये भी लिखा, "ये अपमानजनक है, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ अपराधों के लिए राज्य की उदासीनता के साथ अतिवाद और असहिष्णुता बढ़ रही है. क्या वास्तव में किसी धर्म को निशाना बनाने के लिए 'लव जिहाद' शब्द का इस्तेमाल करना संवैधानिक है?"
वहीं एक अन्य यूज़र शाहना यास्मीन ने लिखा, "एनसीडब्ल्यू को कौन-से 'लव जिहाद' के मामले मिले हैं. क्या रेखा शर्मा 5 दिखा सकती हैं?"
अभिनेत्री उर्मिला मतोंडकर ने भी ट्वीट किया है कि इस देश में महिलाएँ कभी भी सुरक्षित कैसे हो सकती हैं, जब ऐसा सिलेक्टिव एजेंडा चलाने वाली महिला ऐसे आयोग का नेतृत्व कर रही हैं?
कथित पूराने ट्वीट ने बढ़ाई और मुश्किलें
रेखा शर्मा की मुश्किलें उस वक़्त और बढ़ गई जब कुछ सोशल मीडिया यूज़र्स ने कुछ विवादित ट्वीट शेयर कर दावा किया कि ये उनके कई साल पहले पुराने ट्वीट्स हैं.
इनमें से कुछ कथित ट्वीट्स नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने से पहले यानी 2012, 2014 के हैं, जिनमें महिलाओं और महिला नेताओं और अन्य नेताओं को लेकर आपत्तिजनक बातें लिखी हुई हैं. इन्हें शेयर करके लोग उनकी भाषा और मानसिकता पर सवाल उठा रहे हैं.
रेखा शर्मा दरअसल अगस्त 2015 में राष्ट्रीय महिला आयोग से जुड़ी थीं. आयोग की वेबसाइट के मुताबिक़, रेखा शर्मा ने 7 अगस्त 2018 को राष्ट्रीय महिला आयोग की चेयरपर्सन का पदभार संभाला था.
राष्ट्रीय महिला आयोग में शामिल होने से पहले वो बीजेपी से सक्रिय रूप से जुड़ी थीं. वो हरियाणा में बीजेपी की ज़िला सचिव और मीडिया प्रभारी थीं.
सोशल मीडिया पर बहस तेज़ होने के बाद #SackRekhaSharma भी ट्विटर पर ट्रेंड करने लगा था और उन्हें राष्ट्रीय महिला आयोग के अध्यक्ष पद से हटाने की मांग की जाने लगी. विपक्षी दल कांग्रेस भी रेखा शर्मा के इस्तीफ़े की मांग की.
कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने ट्वीट किया, "इस बारे में बहुत बहस हो रही है कि निम्न स्तर के विचार रखने वाली एक सेक्सिस्ट महिला राष्ट्रीय महिला आयोग की प्रमुख कैसे हो सकती हैं. लेकिन नरेंद्र मोदी और बीजेपी को देखते हुए ये समझा जा सकता है कि इसकी क्या वजह है. आप जितना ज़हर निकालेंगे, उतना ही इस इको-सिस्टम में फले-फूलेंगे. शर्मनाक."
ये ख़बर लिखे जाने तक रेखा शर्मा ने अपने अपनी ट्विटर अकाउंट को लॉक कर लिया है. उनके अकाउंट पर जाने पर लिखा आ रहा है कि उनके 'ट्वीट प्रोटेक्टेड हैं' यानी उनके ट्ववीट्स सिर्फ़ वही लोग देख सकते हैं, जिन्हें वो इजाज़त देंगी.
बीबीसी ने रेखा शर्मा से संपर्क करने की कोशिश की. लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी.
ख़बरों के मुताबिक़, रेखा शर्मा ने इससे पहले ट्वीट किया था कि किसी ने उनका अकाउंट हैक कर लिया है और उनके अकाउंट से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ ट्वीट कर दिए हैं.
साथ ही उन्होंने लिखा, "जब ये ट्वीट हुए, तब मैं फ़्लाइट में थी. लोग कितने दुष्ट हैं. महाराष्ट्र से आ रही हूँ और समझ सकती हूँ कि ये क्यों हुआ होगा."
महाराष्ट्र सरकार से नाराज़गी
दरअसल राज्यपाल से मुलाक़ात के दौरान राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने महाराष्ट्र में महिला सुरक्षा को लेकर कड़ी नाराज़गी जताई थी. पत्रकारों से बातचीत में रेखा शर्मा ने कहा था कि प्रदेश में नई सरकार बनने के बाद राज्य महिला आयोग का गठन नहीं हुआ है.
उन्होंने कहा कि राज्य महिला आयोग का अध्यक्ष पद ख़ाली होने की वजह से महिलाओं की शिकायतों से संबंधित चार हज़ार मामलों की सुनवाई लटकी हुई है, इसलिए हमने राज्यपाल से कहा है कि जब तक राज्य महिला आयोग का गठन नहीं होगा, तब तक राष्ट्रीय महिला आयोग की एक सदस्य हर महीने सुनवाई के लिए मुंबई आएँगी.
मंगलवार को मुंबई आईं रेखा शर्मा राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी से राजभवन में मुलाक़ात के बाद दिल्ली लौट गईं थी. लेकिन राज्य की महिला व बाल विकास मंत्री यशोमति ठाकुर से नहीं मिली.
इस पर यशोमति ठाकुर ने कड़े लहज़े में कहा कि महिला सुरक्षा के बारे में रेखा शर्मा का केवल राजनीतिक एजेंडा नज़र आ रहा है.
उन्होंने कहा, "मैंने महिला आयोग की अध्यक्ष को मुलाक़ात के लिए मंगलवार की सुबह 11 बजे का समय दिया था और उन्होंने कहा था कि राज्यपाल से मिलने के बाद मैं मिलने आऊँगी, लेकिन मैं इंतज़ार करती रह गई और वो नहीं आईं." (bbc)
डॉयचे वैले पर ऋतिका पाण्डेय की रिपोर्ट-
पेरिस स्थित 'फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स' 21 से 23 अक्टूबर की बैठक के बाद फैसला सुनाएगी कि आतंकवाद के खिलाफ उठाए गए पाकिस्तान के हालिया कदमों को संस्था काफी मानती है या नहीं.
हाफिज सईद आतंकवादी संगठन 'लश्कर ए तैयबा' का संस्थापक और 'जमात उद दावा' का प्रमुख है.
हाफिज सईद आतंकवादी संगठन 'लश्कर ए तैयबा' का संस्थापक और 'जमात उद दावा' का प्रमुख है.
कोरोना महामारी के चलते पहले जून में होने वाली इस बैठक को टाल दिया गया था और इसके कारण पाकिस्तान को दुनिया भर में आतंकवादी और भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन, एफएटीएफ की शर्तों को पूरा करने के लिए चार महीने का अतिरिक्त समय मिल गया. इसी साल फरवरी में हुई बैठक में संस्था ने पाकिस्तान को चेतावनी दी थी कि आतंकवाद को प्रायोजित करने वाली सारी गतिविधियां रोकने के लिए उसे दी गई अंतिम समयसीमा पार हो गई है.
फरवरी में एफएटीएफ ने कहा था कि पाकिस्तान ने उसे दिए गए 27 में से केवल 14 मुद्दों पर ही कुछ काम किया है और एक्शन प्लान में शामिल बाकी कदम नहीं उठाए हैं. उसके बाद, सितंबर में संपन्न हुई एफएटीएफ के क्षेत्रीय सहयोगी एशिया-पैसिफिक ग्रुप (एपीजी) की बैठक में पाया गया कि काले धन से निपटने और आतंकवाद को प्रायोजित ना करने से जुड़े एफएटीएफ के कुल 40 सुझावों में से पाकिस्तान ने केवल दो पर ही पूरी तरह अमल किया है.
क्या होती है ग्रे लिस्ट
दुनिया भर में आतंकवाद और भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन एफएटीएफ ने 2018 में पाकिस्तान को इस तथाकथित "ग्रे लिस्ट" में डाला था. तकनीकी तौर पर इसे "जूरिसडिक्शन अंडर इनक्रीज्ड मॉनीटरिंग” कहा जाता है, जिसमें वे देश रखे जाते हैं जो आतंकी गुटों की वित्तीय मदद रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाते. इस सूची में फिलहाल विश्व के 18 देश शामिल हैं, जिनमें पाकिस्तान पर आतंक के वित्त पोषण का भी आरोप है जबकि पनामा पेपर लीक मामले से जुड़े देश पनामा और मॉरीशस तथा आइसलैंड जैसे देशों के बारे में ज्यादातर मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ी शिकायतें हैं.
ग्रे लिस्ट में होने की वजह से पाकिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से कर्ज लेना और मुश्किल हो जाता है. वैसे तो इस लिस्ट की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है मगर ऐसे देशों को कर्ज देने से पहले अंतरराष्ट्रीय नियामक और वित्तीय संस्थान कहीं ज्यादा सतर्क रहते हैं. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले ही बहुत अच्छी हालत में नहीं है और ऐसे में इन अतिरिक्त मुश्किलों के कारण देश के व्यापार और निवेश पर बुरा असर पड़ सकता है.
मोसुल में अल-नूरी मस्जिद
इराक के मोसुल में स्थित ऐतिहासिक अल-नूरी मस्जिद और उसकी मीनार अल-हदबा को आईएस ने तबाह कर दिया है. इसी मस्जिद से 2014 में अबू बकर अल बगदादी ने इस्लामी खिलाफत की घोषणा की थी. यह मीनार पीसा की प्रसिद्ध मीनार की ही तरह झुकी हुई थी और 840 सालों से वहां खड़ी थी. हालांकि आईएस इसे गिराने का इल्जाम अमेरिका के सिर रख रहा है.
इससे भी बुरा हो सकता है हाल
पेरिस स्थित एफएटीएफ के पास 'ग्रे लिस्ट' से भी बुरी एक 'ब्लैक लिस्ट' होती है, जिसका तकनीकी नाम है "हाई-रिस्क जूरिसडिक्शंस सब्जेक्ट टू अ कॉल फॉर एक्शन.” फिलहाल इसमें केवल दो देश ईरान और उत्तर कोरिया ही रखे गए हैं. आतंकवादी गतिविधियों को वित्तीय समर्थन रोकने के लिए यह संस्था 2001 से विशेष ध्यान देती आई है और यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के वित्तीय प्रावधानों को लागू करवाने में भी मदद करती है.
इसका काम ग्रे लिस्ट में शामिल देशों के साथ साल में कई बार बैठकें करना और स्टेटस रिपोर्ट की समीक्षा कर उन्हें एक्शन प्लान पर अमल करवाने का दबाव बनाना भी है. इस साल कोविड वायरस के कारण फैली महामारी के चलते इसमें कुछ कमी आई है. फिर भी संस्था ने पाकिस्तानी सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की ताकि वह यूएन के प्रतिबंधों को लागू करवाने के लिए कानून बनाए, सरकारी संस्थानों और कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार एजेंसियों के बीच सहयोग को बेहतर बनाने के लिए काम करे और आतंक के लिए वित्तीय मदद जुटाने वाले आतंकवादियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाए.
पाक-साफ साबित होने के लिए पाकिस्तान के कदम
पाकिस्तान ने इस साल लश्कर ए तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद और कुछ दूसरे आतंकवादियों को गिरफ्तार किया और कईयों को सजा भी सुनाई. फरवरी में ही सईद को साढ़े पांच साल की जेल की सजा सुनाई गई थी. देश में आतंकी गुटों की संपत्ति को 'फ्रीज एंड सीज' कर जब्त करने और आतंकवाद को वित्तीय मदद पहुंचाने वालों के लिए जुर्माने और जेल की सजा के प्रावधान वाले भी कम से कम 10 नए कानून बनाए गए.
दूसरी तरफ, इसी साल पाकिस्तान ने करीब 3,800 नामों को आतंकवाद की वॉच लिस्ट से ही हटा दिया, जिसकी पश्चिमी देशों में खासतौर पर काफी आलोचना हुई. काउंटर टेररिज्म पर इसी साल 24 जून को जारी हुई अमेरिकी सरकार की रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे पाकिस्तान ने अपनी सीमाओं में आतंकियों को पाल कर ना केवल भारत को बल्कि अफगानिस्तान को भी निशाने पर रखा. अमेरिकी विदेश मंत्रालय की आतंकवाद पर जारी इस रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान अब भी लश्कर ए तैयबा और जैश ए मुहम्मद जैसे आतंकवादी गुटों को अपनी जमीन पर सुरक्षित ठिकाना देता है, जो भारत जैसे पड़ोसी देशों को निशाना बनाते आए हैं.
एफएटीएफ के कुल 39 सदस्य देशों में से केवल कुछ ही देश पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट से बाहर रखे जाने का समर्थन करते आए हैं. चीन इसका पुरजोर समर्थन करता रहा है तो वहीं पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान ने मलेशिया, सऊदी अरब और तुर्की से अपने लिए समर्थन जुटाने की पूरी कोशिश की है. एफएटीएफ की अध्यक्षता इस समय जर्मनी के पास है और यह पद इससे पहले चीन के पास था. जर्मनी के डॉक्टर मार्कुस प्लेयर ने 1 जुलाई 2020 से अगले दो सालों के लिए अध्यक्ष का पद संभाला है. एफएटीएफ का रुख किस तरफ मुड़ता है यह इसी से साफ होगा कि वह पाकिस्तान को किस सूची में रखने का फैसला करता है.(dw)
चीनी युवाओं में बेहद लोकप्रिय होने के कारण देश में सेक्स खिलौनों का बाजार 15 अरब डॉलर का हो गया है. क्या केवल कोरोना महामारी के कारण अलग थलग पड़े युवाओं की मजबूरी ही है इस बाजार के इतना फैलने की वजह या वाकई बदल गया चीन?
अकेली और घर में बंद रहने को मजबूर 27 साल की एमी (बदला हुआ नाम) खुद को बहुत अकेला महसूस कर रही थी. कोरोना महामारी के काल में चीन की राजधानी बीजिंग में बाहर निकल कर डेटिंग करने की कोई संभावना नहीं बची थी. ऐसी ही बोरियत के एक दौर में कुछ ऑनलाइन चैटरूमों में हिस्सा लिया करती थीं. यहां होने वाली चैट में उनके ही जैसी कुछ दूसरी महिलाओं ने सेक्स टॉयज का जिक्र किया.
सेक्स से दूर रहने की मजबूरी के चलते उनमें से कई महिलाओं ने एमी को भी सेक्स टॉयज इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया. एमी कहती हैं, "पहले मैं थोड़ा डरती थी और इन्हें इस्तेमाल करने में संकोच भी होता था." लेकिन एक बार इन्हें इस्तेमाल करना शुरु करने के बाद एमी को लगा कि उसके सामने "कोई नई दुनिया खुल गई है." और अब वह ऐसे और टॉयज अपने जीवन में शामिल करने का मन बना रही हैं.
एक्सपोर्टर से यूजर बने चीनी
दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाले पूरे चीन में ऐसे सेक्स टॉयज की मांग बढ़ रही है. इसके पहले बेडरूम में इस्तेमाल होने वाली ऐसी डिवाइसों का चीन सबसे बड़ा निर्यातक होता था. कोरोना महामारी के चलते देश के भीतर अनगिनत जोड़े अलग अलग रहने को मजबूर हो गए थे और मनोरंजन के ज्यादातर सार्वजनिक ठिकाने भी लंबे समय तक बंद रहे जहां लोग एक दूसरे से मिलते थे. इसके अलावा एक दूसरी वजह देश की संस्कृति में आए बदलाव भी रहे जिनके चलते युवा पीढ़ी ऐसे खिलौनों के इस्तेमाल के लिए ज्यादा खुली हुई है.
सेक्स और संबंधों पर सलाह देने वाली एक प्रसिद्ध चीनी ब्लॉगर यी हेंग का कहना है कि यौन रूप से सक्रिय बहुत सारी महिलाओं में आजकल सेक्स टॉयज के इस्तेमाल को लेकर बहुत ही खुली सोच है. वह बताती हैं कि ऐसी महिलाएं इसे "बहुत प्राकृतिक और सामान्य" मानती हैं. चीन के ट्विटर जैसे प्लेटफॉर्म वाइबो पर 700,000 फॉलोअरों वाली यी सेक्स और टॉयज के बारे में नियमित रूप से चर्चा करती हैं. उनका मानना है कि चीनी महिलाओं के कारण ही देश में सेक्स टॉयज का बाजार नई ऊंचाइयां छू रहा है.
क्या बदल गई है चीन की पुरानी सोच
आम तौर पर चीन में सेक्स को लेकर काफी दकियानूसी धारणा रही है. देश में पोर्नोग्राफी पर पूरी तरह से प्रतिबंध है. ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों से "अश्लील" कंटेट को हटाने के लिए चीनी प्रशासन हर कुछ दिनों के बाद छापे मारता रहता है. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने साइबरस्पेस को "साफ और सच्चा" बनाने पर जोर दिया है.
इसके अलावा चीनी प्रशासन समाज में शादी और पारिवारिक संबंध के मूल्यों को बढ़ावा देने पर काम कर रहा है क्योंकि देश की जन्म दर कम है. देश में तलाक दर रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई है और 2019 में 31 लाख तलाक दर्ज हुए. इससे भी चीन के पारंपरिक समाज में आते बड़े बदलावों का पता चलता है.
जैसे जैसे युवा लोग बेडरूम में अपनी जरूरतों को लेकर जागरुक हो रहे हैं, सेक्स टॉयज को लेकर उनकी स्वीकार्यता बढ़ती दिख रही है. चीन में इस बाजार का नेतृत्व सबसे ज्यादा महिलाएं और मिलेनियल पीढ़ी के युवा कर रहे हैं. मिलेनियल पीढ़ी में वो लोग शामिल हैं जिनका जन्म 1980 के 2000 के बीच हुआ है. चीन का घरेलू सेक्स टॉय बाजार अब भी कई पश्चिमी देशों और यहां तक की जापान के बाजार से भी छोटा है. चीनी रिसर्च फर्म का अनुमान है कि देश इसका बाजार अभी ही 14.7 अरब डॉलर को पार कर चुका है.
शंघाई स्थित मार्केट रिसर्च फर्म डैक्स कंसल्टिंग में विश्लेषक स्टेफी नोएल बताती हैं कि इस साल जनवरी से जून के बीच में देश के गूगल यानि बाइडू सर्च इंजिन में "सेक्स टॉयज" कीवर्ड खूब इस्तेमाल हुआ. उनका अनुमान है कि कोरोना की पाबंदियों के कारण जो उछाल देखने को मिला है वह उसके बाद जारी नहीं रहने वाला. नोएल बताती हैं कि सेक्स टॉयज के कई नए खरीदार बने लेकिन उनमें से "70 फीसदी" के उससे आगे बढ़ कर कुछ और खरीदने की संभावना बेहद कम है. वहीं विश्व भर में इसकी मांग पूरी करने वाला चीन इस समय कुल वैश्विक निर्यात के करीब 70 फीसदी का उत्पादन करता है. इनकी सबसे ज्यादा मांग "फ्रांस, इटली और अमेरिका" जैसे देशों में है. आरपी/एनआर (एएफपी)
-गुरप्रीत सैनी
साप्ताहिक टीआरपी यानी टेलीविज़न रेटिंग प्वाइंट जारी होते ही तमाम न्यूज़ रूम मैनेजर या एडिटर के बीच चर्चा शुरू हो जाती है कि पहले, दूसरे, तीसरे नंबर पर रहे फ़लाने चैनल को किस तरह के कंटेंट से फ़ायदा हुआ. विश्लेषण किया जाता है कि उनके ख़ुद के आधे या एक घंटे के प्रोग्राम कितनी टीआरपी बटोर पा रहे हैं.
ये देखने के बाद तय किया जाता है कि इस तरह का कंटेंट उन्हें आगे भी अपने यहां चलाना चाहिए या नहीं. जिस तरह का कंटेंट ज़्यादा टीआरपी लेकर आता है उसे बढ़ा दिया जाता है और जिस कंटेंट में दर्शकों की रुचि नहीं होती या कम होती है वो चैनलों से ग़ायब हो जाता है.
कुछ वरिष्ठ टीवी पत्रकारों के मुताबिक़, टीआरपी के आंकड़े ही तय करते हैं कि न्यूज़ चैनलों के दर्शक आने वाले दिनों में क्या देखेंगे.
लेकिन हाल में रेटिंग प्रणाली में छेड़छाड़ के आरोपों के बाद भारत में टेलीविज़न रेटिंग जारी करने वाली संस्था ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) ने 15 अक्टूबर से न्यूज़ चैनलों की रेटिंग पर तीन महीनों के लिए अस्थाई रोक लगा दी है.
इससे टीआरपी सिस्टम में गंभीर ख़ामियों की बात सामने आई है, जिसे बार्क ने ठीक करने की बात कही है.
हालांकि ये रोक सिर्फ़ 12 हफ़्ते के लिए है और एक आधिकारिक बयान में बार्क ने कहा है कि इस दौरान उसकी तकनीकी समिति डेटा को मापने और रिपोर्ट करने के वर्तमान मानकों की समीक्षा करेगी और उसमें सुधार करेगी.
टीवी न्यूज़ चैनल कितने बदलेंगे
इस बीच सवाल ये है कि इस टीआरपी बैन और इस रेटिंग प्रणाली में सुधार की कोशिशों से टीवी न्यूज़ चैनल कितने बदलेंगे?
साफ़ तौर पर टीआरपी न्यूज़ चैनलों को मिलने वाले विज्ञापनों पर असर डालती है. इसलिए इसका सीधा असर न्यूज़ कंटेंट पर देखने को मिलता है और हमेशा ये आरोप लगे हैं कि टीआरपी की लालसा में न्यूज़ चैनल दर्शकों के सामने जो सामग्री परोस रहे हैं, वो पत्रकारिता के स्तर को गिराने का काम कर रही है.
कई टीवी चैनलों में शीर्ष पदों पर रह चुके वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम कहते हैं कि टीआरपी बंद नहीं हुई है बल्कि महज़ 12 हफ़्तों के लिए स्थगित हुई है, इसलिए इससे बहुत बदलाव आने की उम्मीद नहीं की जा सकती.
लेकिन उनका कहना है कि रेटिंग स्थगित होने से कुछ फ़र्क़ पड़ना चाहिए.
वो कहते हैं, "अब थोड़ा फ़र्क़ ये आ सकता है कि अगर कोई चैनल या कोई एडिटर सिर्फ़ मजबूरी में रेटिंग में प्रतिस्पर्धा के लिए कोई ऐसी सामग्री चला रहा है जो वो नहीं चलाना चाहता तो उसके पास ये मौक़ा है कि वो प्रयोग कर सकता है और कुछ हफ़्ते प्रेशर के बिना दर्शकों को कुछ बेहतर दिखा सकता है."
हालांकि वो कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि ये फ़र्क़ सबमें देखने को मिलेगा. उनके मुताबिक़, "जो चैनल पूरी आस्था के साथ एजेंडा चला रहे हैं उनमें बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं आएगा, क्योंकि ये अब उनकी फ़ितरत बन गई है और उनके डीएनए में शामिल हो गया है. 6-7 साल पहले तक यानी 2014 से पहले और अब में ये फ़र्क़ आया है कि पहले सिर्फ़ रेटिंग के लिए सामग्री बनती थी, लेकिन अब एक एजेंडा भी चलता है, इसलिए सिर्फ़ रेटिंग स्थगित होने से वो एजेंडा तो नहीं रोकेंगे."
उनका ये भी मानना है कि 12 हफ़्तों में बेहतर कंटेट देने की सोचने वालों को ये डर भी रहेगा कि इन हफ़्तों के लिए सामग्री बदली तो दर्शक छोड़कर दूसरे चैनल पर न चले जाएं और फिर बाद में उन्हें वापस लाना मुश्किल हो जाए.

रेटिंग सिस्टम की ख़ामियों को दूर करने से बनेगी बात?
टीआरपी, टीवी न्यूज़ और बाज़ार का एक ऐसा आपसी रिश्ता बन गया है, जिसमें सुधार के लिए निर्णायक क़दम उठाए जाने की माँग होती रही है. कई मीडिया विश्लेषकों का कहना है कि असली समाधान यही हो सकता है कि टेलीविज़न रेटिंग प्वाइंट के इस सिस्टम को पूरी तरह से बंद कर दिया जाए.
हालांकि बार्क ने टीआरपी सिस्टम की ख़ामियों को ठीक करने की बात कही है.
बीबीसी हिंदी के साथ साझा किए गए एक बयान में बार्क इंडिया के सीईओ सुनील लुल्ला ने कहा, "बार्क में हम बहुत ही ज़िम्मेदारी के साथ सच्चाई और ईमानदारी से बताते हैं कि भारत क्या देख रहा है. हम सुनिश्चित करते हैं कि दर्शकों के अनुमान (रेटिंग) को उसी तरह से सबके सामने रखें."
साथ ही उन्होंने कहा कि हम ऐसे और विकल्प तलाश रहे हैं, जिससे टीआरपी में गड़बड़ी की इस तरह की ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियों पर पूरी तरह रोक लगाई जा सके.
हालांकि बार्क की तकनीकी समिति (टैक कॉम) मौजूदा सिस्टम की समीक्षा करेगी. इसका मतलब डेटा इकट्ठा करने वाले सिस्टम को ठीक किया जाएगा और बैरोमीटर वाले जिन घरों की पहचान हो जा रही है, उसे रोकने के उपाय किए जाएंगे.
लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि ये सुधार सिर्फ़ तकनीकी पहलू पर होंगे. उनका मानना है कि असल सुधार टीआरपी के मूल चरित्र में होना चाहिए.
वरिष्ठ पत्रकार और सत्य हिंदी डॉट कॉम के सह-संस्थापक क़मर वहीद नक़वी कहते हैं, "सीधी बात है कि तीन महीने के बैन के बाद तो टीआरपी वही आएगी. आप सिर्फ़ उसका सिस्टम ठीक करोगे, जिसकी वजह से डेटा चोरी और गड़बड़ी संभव हो पा रही थी. साथ ही उस गड़बड़ी को दूर करेंगे जिसकी वजह से उन घरों की पहचान करके उन्हें पैसे देकर कहा जा रहा है कि आप हमारा चैनल बड़ी देर तक देखो, ताकि हमारी टीआरपी बढ़ जाए."
वो कहते हैं कि बार्क सिर्फ़ यही रोक सकता है. "हालांकि जब तक ये सामने नहीं आता कि वो कैसे रोकेंगे, तब तक हम बहुत आश्वस्त हो भी नहीं सकते कि ये रुक पाएगा या नहीं."
टीआरपी को पूरी तरह बंद करने से होगा सब ठीक?
वहीं वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश कहते हैं कि असल बदलाव तभी आएगा जब टीआरपी सिस्टम को पूरी तरह से बंद कर दिया जाए और उसकी जगह एक नई व्यवस्था लाई जाए.
उनका कहना है कि मौजूदा टीआरपी सिस्टम फ़ेक, बेबुनियाद, अवैज्ञानिक और पूरी तरह से हेरफेर पर आधारित लगता है.
उनका मानना है कि इसकी जगह एक स्वतंत्र मेकैनिज़्म होना चाहिए. वो कहते हैं कि 'कोई स्वतंत्र शिकायत आयोग हो या स्वतंत्र मीडिया कमीशन बनाया जाना चाहिए.'
कुछ ऐसी ही सिफ़ारिश 2013 में एक संसदीय समिति की ओर से पेश रिपोर्ट में भी की गई थी. उस समय कांग्रेस की सरकार थी और रिपोर्ट तैयार करने वालों में अलग-अलग दलों के प्रतिनिधि शामिल थे. रिपोर्ट पेश करने वाली समिति के चैयरमैन मौजूदा बीजेपी नेता राव इंद्रजीत सिंह थे. इस रिपोर्ट में एक मीडिया काउंसिल की वकालत की गई थी.
उर्मिलेश कहते हैं, "इस मामले में किसी वरिष्ठ पत्रकार, पार्टी या सरकार की बात पर ना भी जाया जाए लेकिन संसद की बात मानी जानी चाहिए जो सुप्रीम बॉडी है और जिसमें सभी दलों का प्रतिनिधित्व है. इसलिए संसद की रिपोर्ट को लागू कर मीडिया काउंसिल बनाया जाना चाहिए."
वो कहते हैं, "मीडिया काउंसिल में सरकारी नियंत्रण ना हो. उसमें सूचना और प्रसारण मंत्रालय का भी प्रतिनिधि रखिए. दो बड़े पत्रकारों को लीजिए. जो पार्टी बंदी वाले ना हों बल्कि स्वतंत्र तरह के लोग हों. इसके अलावा न्यायपालिका से शीर्ष लोगों को लीजिए. उन्हीं को आप चेयरमैन बना दीजिए. इसके अलावा बड़े बुद्धिजीवियों को लीजिए, जो गणमान्य हों यानी बीजेपी या कांग्रेस से उनका जुड़ाव ना हो. इस तरह का एक स्वतंत्र मीडिया काउंसिल बने. ये काउंसिल तय करे कि न्यूज़ चैनलों पर क्या चलेगा और न्यूज़ चैनल पर ख़बरों और विज्ञापन का अनुपात कितना होगा."
टीआरपी बंद करने से निकलेगा समाधान?
न्यूज़ चैनलों पर पत्रकारिता को ताक पर रखने के जो आरोप लगते हैं उसकी बड़ी वजह टीआरपी को माना जा रहा है, जिसका सीधा संबंध विज्ञापन यानी चैनलों की कमाई से होता है.
तो ऐसे में सवाल ये भी उठता है कि अगर ये रेटिंग सिस्टम विश्वसनीय नहीं है तो विज्ञापनदाता और मार्केटिंग समुदाय क्यों इसमें सुधार की या इसे बंद करने की माँग नहीं करते?
टीवी चैनलों पर लंबे वक़्त से नज़र रखने वाले और मार्केट को समझने वाले एक्सचेंज फ़ॉर मीडिया के संस्थापक और बिज़नेस वर्ल्ड के एडिटर इन चीफ़ अनुराग बत्रा कहते हैं कि हर चीज़ के लिए टीआरपी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है.
उनके मुताबिक़ ये समझना ज़रूरी है कि विज्ञापनदाता इस इको-सिस्टम का अहम हिस्सा हैं, क्योंकि न्यूज़ चैनल फ्री टू एयर हैं जिसके लिए दर्शक पैसा नहीं देते.
उनका कहना है कि विज्ञापनदाता रेटिंग ज़रूर देखते हैं लेकिन गुणवत्ता पर भी ध्यान देने लगे हैं. वो कहते हैं कि वो चैनल की विश्वस्नीयता और बैलेंस भी देखते हैं और इनोवेशन भी देखते हैं.
वो कहते हैं, "टीआरपी सिस्टम को पूरी तरह बंद कर देना कोई रास्ता नहीं है, क्योंकि हर चीज़ के मापदंड की ज़रूरत होती है. इसके बजाए रेटिंग को पुख़्ता बनाने की ज़रूरत है. साथ ही सैंपल साइज़ को पुख़्ता बनाने की ज़रूरत है. इसके लिए तकनीक की मदद लेनी होगी."
अनुराग बत्रा मानते हैं कि इस वक़्त समुद्र मंथन हो रहा है और उम्मीद जताते हैं कि आने वाले हफ़्तों में रेटिंग सिस्टम बेहतर हो जाएगा.
देखने वाली बात होगी कि 12 हफ़्तों बाद रेटिंग सिस्टम में क्या तकनीकी बदलाव आता है और क्या कभी टीआरपी की इस जंग का कोई स्थाई समाधान निकल पाएगा? या विज्ञापनदाता आगे आकर इस मसले के हल में अपनी भूमिका निभाएंगे? (bbc)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
आज पांडुरंग शास्त्री आठवलेजी का 100 वां जन्मदिन है। मैं उनकी तुलना किससे करुं? पिछले 100 वर्षों में ऐसे कई महापुरुष हुए हैं, जिनके नाम विश्व इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हुए हैं लेकिन अकेले आठवलेजी ने वह चमत्कारी काम कर दिखाया है, जो बस उन्होंने ही किया है, किसी और ने नहीं। महाराष्ट्र और गुजरात में खास तौर से और भारत तथा अन्य लगभग 30 देशों में उनके 50 लाख से भी ज्यादा अनुयायी रहे हैं। अब से लगभग 25 साल पहले मेरे वरिष्ठ सहपाठी डॉ. रमन श्रीवास्तव और गांधीवादी सज्जन श्री राजीव वोरा ने आठवलेजी के ‘स्वाध्याय आंदोलन’ को देखने-परखने का आग्रह मुझसे किया। उनके आग्रह पर मैंने आठ दिन महाराष्ट्र के जंगलों, समुद्र-तटों और पहाडिय़ों में बिताए। वहां आदिवासियों, दलितों, ग्रामीणों, मुसलमानों, अशिक्षित गरीबों और मछुआरों से रोज भेंट होती थी और रोज रात को दादा (आठवलेजी) के भक्तों के बीच मेरा भाषण होता था।
मैं यह देखकर दंग रहा जाता था कि गांवों के ये सब लोग शाकाहारी बन गए थे। मछुआरों ने भी मछली खाना छोड़ दिया था। कई डाकुओं ने डाकाजनी, हत्या और चोरी-चकारी छोडक़र ‘स्वाध्याय’ के भक्तिमार्ग को अपना लिया था। अपने भाषणों में जो प्रतिक्रिया मेरी होती थी, उसे मुंबई के श्री महेश शाह दादा को रोज रात को फोन पर बता दिया करते थे। यह मुझे तब पता चला, जब मैं एक बड़े समारोह में पहली बार दादा से मुंबई में मिला। दादा ने मुझसे कहा कि ‘स्वाध्याय’ के बारे में आपकी प्रतिक्रिया वही है, जो कभी डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की थी।उसके बाद दादा जब तक जीवित रहे (2003), वे मुझे हर समारोह में विशेष अतिथि के तौर पर बुलाते थे। उनके साथ मैंने मुंबई, राजकोट, पुणे आदि में कई सभाओं को संबोधित किया। उनके वार्षिक उत्सवों में 20 से 25 लाख भक्तों की उपस्थिति साधारण बात थी। इतने लोग तो मैंने किसी प्रधानमंत्री की सभा में भी नहीं देखे और न ही सुने। उनकी सभा के लिए साल भर पहले से या तो समुद्र में हजारों नावों की व्यवस्था की जाती थी या फिर जंगलों को साफ-सूफ किया जाता था। मंच पर प्राय: वे और मैं ही बैठते थे।
मैंने उनकी सभाओं में कई सांसदों, मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों और उप-प्रधानमंत्री को भी नीचे बैठे हुए देखा है। वे परम विद्वान और अदभुत वक्ता थे। उन्होंने कई ग्रंथों की रचना की है। वे अत्यंत प्रेमल और भावुक व्यक्ति थे। उनका मूल-मंत्र बस एक ही था कि मेरे हृदय में भी वही भगवान बैठा है जो तेरे हृदय में है। इसीलिए तू हिंसा मत कर, चोरी मत कर, झूठ मत बोल, धोखा मत दे। 2003 में जब मधुमेह के कारण उनका एक पांव डॉक्टरों को आधा काटना पड़ा तो उन्होंने मुझे फोन किया। उस दिन मैं दुबई में था। दूसरे दिन जब मैं उनसे मुंबई में मिला तो उन्होंने कहा कि इस स्वाध्याय आंदोलन को मैं आपके जिम्मे करता हूं। इसे आप चलाएं। इसके 50 लाख भक्त हैं। इसकी 400 करोड़ रु. की संपत्तियां हैं और यह कई देशों में फैला हुआ है। दादा का यह उत्तराधिकार लेने से मेरे मना करने पर यह उन्होंने अपनी भतीजी जयश्री तलवलकर को सौंप दिया। आज ‘दादा’ जैसे महापुरुषों की देश को सख्त जरुरत है। उन्हें मेरा हार्दिक और विनम्र प्रणाम !
(नया इंडिया की अनुमति से)
-श्वेता चौहान
इतिहास ऐसी महिलाओं के हौसले से भरा हुआ है जिन्होंने असाधारण काम कर अपना नाम इतिहास के सुनहरे अक्षरों में अंकित करवाया। आज का हमारा लेख ऐसी ही एक महिला के बारे में है जिन्हें हाल फिलहाल में एक ऐतिहासिक सम्मान से नवाज़ा गया है। नूर इनायत खान अभी कुछ दिनों पहले तब चर्चा में आई, जब उन्हें ब्रिटेन में एक ऐतिहासिक सम्मान दिया गया। आपको बता दें कि नूर इनायत लंदन में ब्लू प्लाक स्मारक से सम्मानित होने वाली भारतीय मूल की पहली महिला हैं।
पेशे से जासूस नूर इनायत का जन्म साल 1914 में मॉस्को में भारतीय मूल के पिता हज़रत इनायत खान और अमेरिकी मां ओरा रे बेकर के घर हुआ था। नूर इनायत खान के माता-पिता की शादी अमेरिका के रामकृष्ण आश्रम में हुई थी जिसके बाद उनकी मां ने शारदा अमीना खान का नाम अपनाया था। वह 18वीं शताब्दी में मैसूर के राजा रहे टीपू सुल्तान की वंशज थी क्योंकि नूर के पिता हज़रत इनायत खान मैसूर के राजा टीपू सुलतान के परपोते थे। खान परिवार पहले रूस, फिर ब्रिटेन और फ्रांस आ गए। नूर पेरिस के एक उपनगरीय इलाके में ‘फज़ल मंज़िल’ नामक एक प्रेम घर में पली बढ़ी। जहां आज भी फ़्रांसिसी उन्हें सम्मान देने के लिए एक सैन्य बैंड बैस्टिल डे पर उस घर के बाहर बजाते हैं।

तस्वीर साभार: Mens XP
आखिरी वक्त में भी जब जर्मन सैनिकों ने नूर पर वार करने के लिए अपने हथियार उठाए तो नूर का आखिरी शब्द था ‘आजादी’।
नूर एक प्रतिभाशाली लड़की थी, उन्होंने पेरिस कंज़र्वेटरी एंड चाइल्ड साइकोलॉजी में संगीत का अध्ययन किया। वह काफी अच्छी फ्रेंच भी बोल लेती थीं। जिस वक्त दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ, नूर सिर्फ 25 साल की थीं और इसी 25 साल की उम्र में उन्होंने ‘TWENTY JATAKA TALES’ नामक किताब लिखी जो बुद्ध के पूर्व जीवन से जुड़ी है। नूर अपने भाई बहनों में सबसे बड़ी थी। 1927 में अपनी भारत यात्रा के दौरान उन्होंने अपने पिता हज़रत इनायत खान को खो दिया जिसके बाद घर में सबसे बड़े होने की नाते उन्हें जिम्मेदारी संभालना अच्छे से आ गया। उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि नूर का किसी यहूदी मूल के पियानोवादक से संबंध था और बाद में किसी ब्रिटिश अधिकार के साथ उनके संबंधों की चर्चा की गई।

तस्वीर साभार: The Better India
नूर ने 25 साल की उम्र में वायरलेस ऑपरेटर के रूप में प्रशिक्षण के लिए ब्रिटेन की रॉयल एयर फोर्स की ही एक शाखा वुमेंस ऑक्सीलियरी एयर फोर्स को ज्वाइन कर लिया। यहाँ उन्हें एक कोडनेम ‘मेडलिन’ दिया गया और विंस्टन चर्चिल के स्पेशल ऑपरेशन एक्जीक्यूटिव द्वारा पेरिस भेजी जानी वाली वह पहली रेडियो ऑपरेटर बनीं जिन्हें नाजी द्वारा कब्ज़ा किये गए फ्रांस में भेजा गया था। फ्रांस जाकर उन्होंने बड़ी ही तेजतर्रार महिला के तौर पर काम किया वह पकड़े गए वायुसेना कर्मियों को ब्रिटेन भागने में मदद किया करती थीं। लंदन तक सारी खुफिया जानकारियां पहुंचाती थीं।
इस दौरान उन्हें फ्रांस में जासूसी करने में उन्हें कई खतरों का सामना करना पड़ा लेकिन नूर ने हार नहीं मानी। यहां तक कि जब एसओई सदस्यों को नाजी पुलिस धड़ाधड़ गिरफ्तार कर रही थी, तब भी वह लंदन संदेश भेजती रही क्योंकि नूर अपनी समझदारी और कौशल से हर बार बच निकली। पैरिस के एजेंट्स और लंदन के बीच वह अकेली कड़ी थी जो सभी जानकारी पहुंचाया करती थी।
आखिरकार 13 अक्टूबर, 1943 को फ्रांस की एक महिला के धोखा देने के चलते उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें कई यातनाएं भी दी गईं लेकिन उन्होंने अपने सीक्रेट मिशन से जुड़ी कोई जानकारी नाजियों को साझा नहीं की। उन्होंने भागने की कोशिश की लेकिन पकड़े जाने पर उन्हें ‘बेहद खतरनाक’ बताकर एक काल-कोठरी में डाल दिया गया और अंततः साल 1944 में उन्हें दखाऊ कंसन्ट्रेशन कैंप में भेज दिया गया। 13 सितंबर की सुबह उन्हें सिर के पीछे गोली मार दी गई। आखिरी वक्त में भी जब जर्मन सैनिकों ने नूर पर वार करने के लिए अपने हथियार उठाए तो नूर का आखिरी शब्द था ‘आजादी’।

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नूर की मां अमीना बेगम की 101 कविताओं का संग्रह तैयार था, लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उस संग्रह की कुछ कविताएं खो गई थीं जो कि बाद में सिर्फ 54 ही बच सकीं। शायद उन्हीं में से एक कविता ‘नूर’ भी थी। ब्रिटेन में वह 1946 तक गुमनाम रहीं लेकिन 1946 में पूर्व गेस्टपो ऑफिसर क्रिस्चियन ऑट से पूछताछ के बाद उनकी कहानी दुनिया के सामने आ ही गई। नूर की कहानी पत्रकार शरबानी बसु ने 2008 में किताब स्पाई प्रिंसेस के तौर पर छापी। शरबानी बसु ने ही ब्रिटिश करंसी पर नूर का चेहरा छापे जाने का अभियान चलवाया था। उनके इस समर्पण के लिए 1949 में उन्हें ब्रिटेन के दूसरे सबसे बड़े सम्मान जॉर्ज क्रॉस से सम्मानित किया गया।
(यह लेख पहले फेमिनिज्मइनइंडियाडॉटकॉम पर प्रकाशित हुआ है।)
- Sonali Khatri
“अब अगर ऐसा दोबारा हुआ तो टांगे तोड़ दूंगा तुम्हारी”, “हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी इस तरीके से अपने बड़ों से बात करने की, आगे से ऐसा हुआ, तो एक थप्पड़ पड़ेगा”। आए दिन हम अपने घरों में ऐसी बातें सुनते रहते हैं। सामान्य सी लगने वाली ये बातें बच्चों के मन पर गहरा असर छोड़ देती हैं। जहां एक ओर वे मानने लगते हैं कि हिंसा सामान्य बात है। वहीं, दूसरी ओर घर का ऐसा हिंसात्मक माहौल उन्हें अपनों से दूर कर देता है। अक्सर ऐसे घरवालों से वे नफरत तक करने लगते है। हाल ही में आई UNICEF की एक स्टडी के मुताबिक भारतीय घरों में 0 से 6 साल के बच्चों को लगभग 30 अलग-अलग तरीकों से शोषित किया जाता है। बच्चों के ख़िलाफ़ घरों में होने वाली हिंसा को हम मुख्य तौर पर तीन भागों में बांट सकते हैं।
शारीरिक शोषण : इसमें शामिल है बच्चे पर हाथ उठाना, छड़ी-बेल्ट-रॉड-स्केल से आदि से मारना, इत्यादि।
मौखिक शोषण : इसमें शामिल है बच्चे को दोष देना, उसकी आलोचना करना, उस पर चीखना-चिल्लाना, उनसे अभद्र भाषा में बात करना।
भावनात्मक शोषण : इसमें शामिल है बच्चे का आना-जाना बंद कर देना, उसे घर से बाहर न निकलने देना, उसे खाना न देना, उसके साथ भेदभाव करना, उसे डराकर रखना आदि।
ऐसे व्यवहार को यह कहकर उचित ठहराया जाता है कि ऐसा बच्चों को अनुशासित करने के लिए जरूरी है। इस रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि कोरोना महामारी के इस दौर में छोटे बच्चे हिंसा, दुर्व्यवहार और उपेक्षा ज्यादा अनुभव करते है क्योंकि परिवारों के लिए कोरोना के इस संघर्ष से गुजरना बेहद ही मुश्किल हो रहा है।
बच्चों पर हिंसा न सिर्फ उनके बचपन की मासूमीयत को छीन लेता है, बल्कि एक हिंसक वयस्क की नींव भी रखता है। हिंसा किसी भी लोकतांत्रिक समाज या देश की प्रगति में एक बहुत बड़ी रुकावट है।
जो बच्चे बचपन में हिंसा को इतनी करीब से देख लेते हैं, उसका नकारात्मक प्रभाव उस बच्चे के शारीरिक विकास, आत्मसम्मान, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। कभी कभी तो यह तक पाया गया है कि घरों में होने वाली हिंसा की वजह से कुछ बच्चे समय से पहले बड़े हो जाते है और कुछ बच्चे अपनी उम्र से कम ही रह जाते है। 2006 की UNGA रिपोर्ट के मुताबिक़, जो बच्चे बचपन में अधिक हिंसा झेलते हैं, उनमें आगे जाकर नशीले पदार्थो के सेवन और यौन व्यवहार की भी जल्दी शुरू होने की संभावनाएं काफी ज्यादा होती हैं। साथ ही यह भी पाया गया है कि ऐसे बच्चों को आजीवन सामाजिक और भावनात्मक रूप से हानि होती है। ऐसे बच्चों में अवसाद, निराशा और चिंता के लक्षण भी दूसरे बच्चों की तुलना में अधिक पाए गए है। सार में कहे तो, “हिंसक घरों का बच्चों के दिमाग पर वही प्रभाव पड़ता है जो युद्ध का सैनिक पर”।
कुछ मामलों में तो ये भी पाया गया है कि ऐसे बच्चे आगे जाकर असामाजिक / आपराधिक गतिविधियों में अधिक शामिल होते हैं। यूनिसेफ अंतरराष्ट्रीय बाल विकास केंद्र की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, “यह निस्संदेह बात है कि जो बच्चे बचपन में हिंसा का प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं, उनमे आगे जाकर हिंसक व्यवहार की संभावनाएं काफी हद तक बढ़ जाती हैं।” घर पर होने वाली हिंसा से कुछ बच्चे सब से अलग-थलग रहने लग जाते है। अपने ही घरवालों से भी वे दूरियां बनाने लगते हैं। कभी मौजूदा दोस्त छूट जाते हैं और कभी नए दोस्त नहीं बन पाते। ऐसे बच्चे बहुत ही अकेले पड़ जाते हैं और अपनी ही नजरों में उनका आत्मसम्मान बहुत ही गिर जाता है। ऐसे बच्चों में नशीली दवाओं और शराब की लत, किशोर गर्भावस्था, घर से भागना, आत्महत्या, किशोर अपराध करने का खतरा भी ज्यादा होता है। वहीं, कुछ बच्चे खुद ही को नुकसान तक पहुंचाने लगते हैं।
साफ़ तौर पर, बच्चों पर हिंसा न सिर्फ उनके बचपन की मासूमीयत को छीन लेता है, बल्कि एक हिंसक वयस्क की नींव भी रखता है। हिंसा किसी भी लोकतांत्रिक समाज या देश की प्रगति में एक बहुत बड़ी रुकावट है। न सिर्फ इसकी कीमत कुछ लोगों को चोट या नुकसान देकर चुकानी पड़ती है, बल्कि पूरे समाज को अपनी शांति से समझौता करना पड़ता है। इसीलिए हमें जरूरत है हमारे समाज की सबसे छोटी और महत्वपूर्ण ईकाई, ‘परिवार’ की इस हिंसा में भूमिका समझने की। जब तक हम ये नहीं समझेंगे, तब तक बदलाव की उम्मीद रखना भी गलत होगा।
हमें इस प्रकार के ज्यादा से ज्यादा कार्यक्रम करने होंगे जिनके माधयम से परिवारजनों और अभिभावकों को बाल शोषण एवं बाल हिंसा के बारे में, इसके कई रूपों के बारे में, बच्चों पर इसके प्रभावों के बारे में बताया जाए, जागरूक किया जाए। इस पूरी प्रक्रिया में ये अहम है कि अभिभावकों को साफ़ तौर पर ये बताया जाए कि उनका कौन-सा ऐसा व्यवहार है जिसे उन्हें बदलने की ज़रूरत है। जब तक हम घरों में इस प्रकार की समस्यात्मक बातों, बर्तावों को साफ़ तौर पर पहचान नहीं पाएंगे, तब तक बदलाव बेहद मुश्किल ही रहेगा। इसीलिए बाल शोषण को रोकने के लिए जागरूकता फैलाने वालों को विशेष मेहनत करनी होगी, तभी हम मन-मुताबिक़ परिणाम देख पाएंगे।
(यह लेख पहले फेमिनिज्मइनइंडियाडॉटकॉम पर प्रकाशित हुआ है।)
18 वैज्ञानिकों ने एक समूह ने 1950 से लेकर अब तक हुई ऊर्जा खपत का विश्लेषण किया है
-दयानिधि
एक नए अध्ययन में कहा गया है कि ऊर्जा का बढ़ता उपयोग, आर्थिक उत्पादकता और बढ़ती वैश्विक आबादी की गति ने पृथ्वी को एक नए भूवैज्ञानिक युग की ओर धकेल दिया है, जिसे एंथ्रोपोसीन के रूप में जाना जाता है। शोध में पाया गया कि वर्ष 1950 के आसपास पृथ्वी की सतह की परतों में भौतिक, रासायनिक और जैविक परिवर्तन शुरू हुए थे।
सीयू बोल्डर की प्रोफेसर एमेरिटा और इंस्टीट्यूट ऑफ अल्पाइन आर्कटिक रिसर्च (इन्स्टार) के पूर्व निदेशक जया सिवित्स्की की अगुवाई में किया गया अध्ययन नेचर कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट में प्रकाशित हुआ है। पिछले 11,700 वर्षों से पर्यावरण में बदलाव करने वालों को होलोसीन युग के रूप में जाना जाता है। 1950 के बाद से इसमें नाटकीय तरीके से मानव जनित बदलाव हुए। ऐसे व्यापक परिवर्तन से महासागरों, नदियों, झीलों, तटीय इलाकों, वनस्पति, मिट्टी, रसायन और जलवायु में परिवर्तन हुए हैं।
सिवित्स्की ने कहा कि यह पहली बार है कि जब वैज्ञानिकों ने इतने व्यापक पैमाने पर लोगों द्वारा किए गए बदलाव का दस्तावेजीकरण किया है।
11,700 वर्ष पहले की गई ऊर्जा खपत को हम लोग पिछले 70 वर्षों में ही पार कर कर चुके हैं। इसमें बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधन का उपयोग किया गया है। ऊर्जा खपत में इस भारी वृद्धि ने तब मानव आबादी, औद्योगिक गतिविधि, प्रदूषण, पर्यावरणीय गिरावट और जलवायु परिवर्तन में नाटकीय वृद्धि की है।
यह अध्ययन एंथ्रोपोसीन वर्किंग ग्रुप (एडब्ल्यूजी) द्वारा किए गए काम का परिणाम है। यह वैज्ञानिकों का एक ऐसा समूह है जो पृथ्वी पर भारी मानव प्रभाव की विशेषता वाले आधिकारिक भूवैज्ञानिक समय के भीतर एंथ्रोपोसीन को एक नया युग बनाने के लिए मामले का विश्लेषण करता है।
एन्थ्रोपोसीन शब्द भूगर्भीय रूप से परिभाषित लंबे समय को निर्दिष्ट करने के लिए उपयोग किया जाता है। वर्तमान में मानव पृथ्वी प्रणालियों पर हावी हो रहा है।
भूवैज्ञानिक समय, एक युग एक आयु से अधिक है, लेकिन एक अवधि से कम है, जिसे लाखों वर्षों में मापा जाता है। होलोसीन युग के भीतर, कई युग हैं- लेकिन एंथ्रोपोसीन को पृथ्वी के ग्रह के इतिहास के भीतर एक अलग युग के रूप में प्रस्तावित किया गया है।
एंथ्रोपोसीन के स्पष्ट निशान
18 अध्ययनकर्ताओं ने मौजूदा शोध को संकलित किया, जो 1950 से अब तक ऊर्जा की खपत और अन्य मानवीय गतिविधियों के कारण ग्रह पर पड़ने वाले 16 प्रमुख प्रभावों को उजागर कर रहे हैं।
1952 से 1980 के बीच मनुष्यों ने वैश्विक परमाणु हथियार परीक्षण को लेकर जमीन के ऊपर 500 से अधिक थर्मोन्यूक्लियर विस्फोट किए, जिसने पूरे ग्रह की सतह पर या उससे अधिक परमाणु ऊर्जा वाले रेडियोन्यूक्लाइड्स-परमाणुओं को धरती पर छोड़ा।
लगभग 1950 के बाद से मनुष्यों ने कृषि के लिए औद्योगिक उत्पादन के माध्यम से ग्रह पर निश्चित नाइट्रोजन की मात्रा को दोगुना कर दिया है। उद्योगों से भारी पैमाने पर क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) वातावरण में रिलीज हुई जिसने ओजोन परत को काफी नुकसान पहुंचाया। जीवाश्म ईंधन से ग्रह पर ग्रीनहाउस गैसों का स्तर बढ़ा। जिसके कारण जलवायु परिवर्तन हुआ और इसने पृथ्वी पर प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले हजारों सिंथेटिक खनिज जैसे यौगिकों का निर्माण किया और दुनिया भर में लगभग 20 फीसदी नदियों का तलछट (सेडीमेंट ) बांधों, जलाशयों के कारण अब समुद्र तक नहीं पहुंच रहा है।
अध्ययन के अनुसार मानव ने 20वीं शताब्दी के मध्य से हर साल इतने टन प्लास्टिक का उत्पादन किया है कि आज हर जगह माइक्रोप्लास्टिक्स बढ़ता जा रहा है।
सिवित्स्की ने कहा हम लोगों ने सामूहिक रूप से खुद को इस मुसीबत में डाल लिया है, हमें इन पर्यावरण प्रवृत्तियों को बदलने के लिए एक साथ काम करने और खुद को इससे बाहर निकालने की जरूरत है। (downtoearth.org.in)
- विग्नेश ए.
इसकी आधिकारिक वेबसाइट का कहना है, "हम कणों की मूलभूत संरचना की जांच करते हैं जो हमारे चारों ओर मौजूद सब कुछ बनाते हैं. हम दुनिया के सबसे बड़े और सबसे जटिल वैज्ञानिक उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं."
'गॉड पार्टिकल' कहे जाने वाले हिग्स बोसोन की मौजूदगी को भी महज एक परिकल्पना माना जाता था, जब तक कि साल 2012 में लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर नाम के एक पार्टिकल एस्केलेटर का इस्तेमाल करके इसके होने की पुष्टि नहीं कर दी गई.
मानव सभ्यता के इतिहास में इस तरह का महत्व रखने वाली संस्था के परिसर में हिंदू देवता शिव के नटराज स्वरूप की प्रतिमा लगी है.
इस प्रतिमा को 18 जून 2004 में सीईआरएन के परिसर में स्थापित किया गया था. यह महज एक संयोग हो सकता है कि सोशल मीडिया की दिग्गज कंपनी फ़ेसबुक और तत्कालीन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऑरकुट की स्थापना भी उसी साल हुई थी.
इंटरनेट के आने से सोशल मीडिया धरती पर करोड़ों लोगों तक पहुंच गया है और इसी तरह फ़ेक न्यूज़ भी. नटराज की इस मूर्ति को लेकर भी काफ़ी फ़ेक न्यूज़ फैली.
आइए देखते हैं कि सीईआरएन के परिसर में स्थिति नटराज की मूर्ति को लेकर क्या-क्या झूठी ख़बरें फैलीं और इसके वहां लगाए जाने के पीछे असल वजह क्या थी?
कुछ सोशल मीडिया यूज़र्स का कहना है कि नटराज की मूर्ति परमाणु की संरचना का वर्णन करती है और इसलिए जो वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं उन्होंने सीईआरएन परिसर में इसे रखने का फ़ैसला किया है.
एक और फ़ेक न्यूज़ में कहा गया है कि इस प्रतिमा में नटराज 'आनंद तांडवम' मुद्रा में डांस कर रहे हैं जिसे विदेशी वैज्ञानिक 'कॉस्मिक डांस' कहते हैं. यह मुद्रा परमाणु के अंदर उप-परमाणुओं की गति के समान है.
फ़ेक न्यूज़ में यह दावा भी किया गया, "नटराज पूरे ब्रह्मांड का प्रतीक हैं, यह घोषित करने के लिए सीईआरएन के वैज्ञानिकों ने इस प्रतिमा को वहां स्थापित करने का फ़ैसला किया."
हिंदू देवी-देवतीओं की मूर्ति को लेकर तथ्यों और वैज्ञानिक रूप से ग़लत ऐसी तमाम कहानियां सोशल मीडिया और इंटरनेट पर मौजूद हैं.
सीईआरएन परिसर में इसकी स्थापना के असल कारण को जानने से पहले हम इससे जुड़े कुछ दिलचस्प तथ्य जान लेते हैं.
इसे नास्तिक मूर्तिकार ने बनाया
इस मूर्ति को बनाने वाले कलाकार नास्तिक हैं और वो तमिलनाडु से हैं. 'सिर्पी' (शिल्पकार) के नाम से चर्चित राजन तमिल सोशल मीडिया सर्कल में पेरियार के सिद्धांतों के सक्रिय समर्थकों में से एक हैं.
तमिलनाडु में अंधविश्वास, जाति व्यवस्था, धार्मिक विश्वास और ज्योतिष आदि की आलोचना करने वाले उनके वीडियो अक्सर दक्षिणपंथी समर्थकों और कार्यकर्ताओं के निशाने पर आ जाते हैं.
बीबीसी तमिल से बातचीत में राजन ने कहा कि उन्हें भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से साल 1998 में सेंट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज़ इंपोरियम ने इसका ऑर्डर दिया था.
कभी तमिलनाडु के कुंभकोणम में रहने वाले राजन बीते कुछ सालों से अब इस कारोबार में नहीं हैं.
वो कहते हैं, "साल 1980 के दशक से मैं लगातार दिल्ली और उत्तरी राज्यों में जाता था और सेंट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज़ इंपोरियम के साथ प्रोफेशनल कारणों से संपर्क में था. उन्होंने मुझे यह मूर्ति बनाने का ऑर्डर दिया था."
मूर्तिकार और मूर्तिकला के पेशे में दलित कामगारों को शामिल करने वाले राजन कहते हैं, "मेरे सिद्धांत और मेरे पेशे का आपस में कोई टकराव नहीं है."
फिर क्या वजह है इस मूर्ति को लगाने की
सीईआरएन की 39 और 40 नंबर बिल्डिंग के बीच में स्थायी रूप से लगाई गई यह शिव प्रतिमा रिसर्च संस्थान को भारत सरकार ने भेंट की थी.
सीईआरएन की वेबसाइट पर सोशल मीडिया के एक सवाल के जवाब में इसका ज़िक्र किया गया, "शिव की यह मूर्ति सीईआरएन के साथ अपने जुड़ाव का जश्न मनाने के लिए भारत की ओर से एक तोहफ़ा था. वो संबंध जो 1960 के दशक में शुरू हुआ और आज भी मज़बूत बना हुआ है."
हालांकि भारत यूरोपीय देश नहीं है लेकिन करीब छह दशकों से वो सीईआरएन का सदस्य है. भारत सरकार ने यह मूर्ति सीईआरएन को कूटनीतिक कारणों से तोहफ़े में दी थी न कि वैज्ञानिक कारणों से.
सीईआरएन के मुताबिक, "हिंदू धर्म में भगवान शिव नटराज नृत्य करते हैं जो शक्ति या जीवन शक्ति का प्रतीक है. इस देवता को भारत सरकार ने एक रूपक की वजह से चुना था जो नटराज के लौकिक नृत्य और उप-परमाणविक कणों के 'कॉस्मिक डांस' के आधुनिक अध्ययन के बीच पनपा था."
यह सिर्फ़ पौराणिक कथाओं और विज्ञान के बीच भारत सरकार द्वारा तैयार किया गया एक रूपक है, जिसे कई सालों से बिना किसी तथ्य या तार्किक समर्थन के वैज्ञानिक कारण के तौर पर पेश किया जा रहा है.(bbc)
शायद ही कोई ऐसा इंसान हो, जिसने हरसिंगार के फूलों की मनमोहक आभा को महसूस न किया हो
-स्वास्ति पचौरी
बीते दिन पारिजात का पेड़ बहुत चर्चा में रहा। इस पेड़ को हरिसंगार के नाम से भी जाना जाता है। 2017 में एक ट्रेनिंग के दौरान, किन्ही सज्जन से मुलाकात हुई थी, जिनका नाम पारिजात था। वे बचपन से ही अमेरिका में रहे थे। लोगों के पूछने पर उन्होंने बहुत ही मधुर वाणी में अपने नाम का मतलब हिंदी में समझाया था और मैंने तभी जाना था कि हरसिंगार को ही पारिजात कहा जाता है! आजकल इस पेड़ पर फिर फूलों की बहार आयी है। ट्विटर और फेसबुक पर हर कोई हरसिंगार के लुभावने चित्र लगा रहा है। इस पेड़ के फूलों को 'शेओली' और 'प्राजक्ता' के नाम से भी जाना जाता है। शायद ही कोई ऐसा इंसान हो, जिसने इन फूलों की मनमोहक आभा को महसूस न किया हो।
मेरे घर के सामने एक हरसिंगार का खूबसूरत पेड़ था। बचपन से ही एक अनूठा रिश्ता सा रहा है, मेरा हरसिंगार के साथ। अक्टूबर-नवंबर की ठंड में हरसिंगार के मोती जैसी फूलों से सजी हुई घर के सामने की वह सड़क। सुबह-सुबह, सीमेंट-कंक्रीट की हलकी काली सड़कों को हरसिंगार अपने फूलों से भर दिया करता। जैसे मानो, तारों से भरे काले आकाश का एक टुकड़ा कोई नीचे ले आया हो। हरसिंगार के फूल तो लगते भी तारे जैसे हैं। वैसे भी श्वेत रंग के फूलों की बात ही कुछ और होती है। पॉपुलर कल्चर में अनगिनत कहानियां, कविताएं एवं संगीत इन फूलों को समर्पित हैं। फिर चाहे चंपा हो, या चमेली, मोगरा, रजनीगंधा। या फिर अपना हरसिंगार!
घर के नीचे सुजाता आंटी रहा करती थीं। हरसिंगार का यह पेड़ बिलकुल उनके घर के सामने था। सुबह-सुबह मैं एक प्लेट लेकर झट से नीचे जाती और इन फूलों को बीन लाती। गजरा बनाने के लिए। भैया चीखते, स्कूल के लिए लेट हो जाओगी। लेकिन मुझे इसकी कहां परवाह होती थी। वैसे भी गलती चाहे किसी की भी हो, छोटे होने के नाते सारी डांट-डपट तो बड़े भाई- बहनों को ही पड़ा करती है। मेरे सामने तो बस एक ही लक्ष्य होता। जल्दी से सारे हरसिंगार बटोर लाऊं। कितनी ही बार पापा को आवाज दिया करती कि आकर जरा इस पेड़ की शाखाओं को झकझोर जाओ, ताकि सारे फूल एक ही बार में नीचे गिर जाएं, लेकिन वे ऐसा नहीं करते, क्योंकि ऐसा करने से क्या पता उस पेड़ को कोई तकलीफ होती हो?
एक बार सुजाता आंटी ने मुझे बांस की छोटी टोकरी दी और कहा इसमें फूल रख लो तो और भी सुन्दर लगेंगे। फूल बीनने के बाद मैं सुई-धागे से गजरा बना लेती और हर रोज़ किसी न किसी टीचर को वह गजरा गिफ्ट में दे दिया करती। हरसिंगार के फूल अत्यंत ही सौम्य होते हैं। इसलिए गजरा बहुत ध्यान से बनाना होता। गजरा बनाना मुझे लक्ष्मी दीदी, जो हमारे यहां मदद करने आया करती थीं, उन्होंने सिखाया था। वह बालों में मोगरा के फूलों का गजरा लगाती थीं, और मेरे लिए भी कई बार ले आती थीं।
फूल बीनने का यह सिलसिला कुछ सालों चला। फिर फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स में जिंदगी उलझती चली गई। इंजीनियरिंग करनी है, कि आर्ट्स पढ़नी है? रेसनिक हॉलीडे कितनी सुलझा ली? ठंड के मौसम में रात में रेडियो सुनते-सुनते इंटीग्रेशन और केमिस्ट्री के न्यूमेरिकल्स सुलझाते हुए, मुझे याद भी नहीं रहा था वो हरसिंगार, जिसको एक समय में मैं कितना हक से अपना माना करती थी।
मैं धीरे-धीरे उस पेड़ को भूल गयी थी।
एक बार मुंबई से वापिस आयी तो चाय पीते हुए उस कोने पर नजर एकाएक ही पड़ी थी। वहां कुछ मिस्त्री कंक्रीट का काम कर रहे थे।सुजाता आंटी भी घर छोड़ कर जा चुकी थीं। मेरी नजर धीरे-धीरे जब उधर से गुजरी तो मैंने पाया था कि मेरा वो हरसिंगार तो अब वहां था ही नहीं। थोड़ी बेचैनी हुई थी। दिल न जाने क्यों भर सा आया था। शाम को मां जब ऑफिस से वापिस आयीं तो मैंने पूछा कि वह पेड़ कहां गया? मां कुछ लिखते हुए बोली थीं कि उसको किन्ही कारणों की वजह से वहां से लोगों ने 'हटा' दिया। यानी शायद काट दिया। मां ने 'काट' शब्द का इस्तेमाल इसीलिए नहीं किया था, क्योंकि वो तो शायद हमारे परिवार का ही एक हिस्सा बन चुका था।
मन व्यथित हो उठा। थोड़ा इसलिए कि पता नहीं, उस पेड़ को वहां से क्यों हटाया गया? या पता नहीं, उसको कितनी पीड़ा हुई होगी? पापा तो उसकी शाख तक छेड़ने को राजी नहीं होते थे, लेकिन ज़्यादा व्याकुल अपनी शर्मिंदगी के कारण हो उठी थी। इसलिए कि उस पेड़ के साथ-साथ मेरे बचपन का एक बहुत अहम अंश भी मुझसे अलग हो गया था, मेरे खुद के कारण, क्योंकि मैंने एक स्वार्थी इंसान होने की भूमिका बखूबी निभाई थी। इतने सालों में मुझे क्या मतलब रहा था उससे? कभी उस पेड़ के बारे में सोचा तक नहीं, उसे याद तक नहीं किया। जिसके साथ इतने अनगिनत मौन संवाद और निःशब्द कड़ियों के बीच मैंने अपना बचपन संवारा था। मुझे क्या मतलब किसी पेड़ से! मैं तो उड़ान भरते-भरते चली गयी थी न यहां से! ऐसे किस-किस को याद रखती फिरुं?
स्वार्थ खोजना कोई मुश्किल नहीं। स्वयं के प्रतिबिम्बों में यदि झांक के टटोला जाए, तो आसानी से मिल जाया करते हैं स्वार्थ। फिर मूक वृक्ष, पेड़, पौधे, पक्षी हमसे कभी कुछ कहते ही कहां हैं? लेकिन हमें अपना साथ अवश्य ही दे जाते हैं। सिर्फ अपने होने भर से, बिना कुछ कहे, हमें आश्वासित कर जाते हैं। चाहे हमारी सुबह की चाय को अपनी हरीतिमा से और सुहाना ही बनाना क्यों न हो, या कंक्रीट की सड़कों के बीचों-बीच हमें "कोएक्सिस्टेंस" का मतलब ही समझाना क्यों न हो? या फिर चंद मिनटों के लिए हमें " अर्बन फार्मिंग" या "अर्बन फॉरेस्ट्री" से रूबरू ही कराना क्यों न हो!
आजकल इन 'मास्क' के पीछे होने वाले मौन अनुभवों के बीच ऐसे तमाम हरसिंगारों की याद आया करती है। उस पेड़ ने मुझे सिर्फ गजरा बनाना नहीं सिखाया था, मुफ्त ही अपनी बाहों की छाया तले सींचा भी था। मेरी तमाम अनुभूतियों के समक्ष सबसे ज़्यादा गहरी यादें तो उन्हीं मौन संवादों की थीं जो आंखों से हुआ करते थे। जब हम किसी की पीड़ा को बिना कुछ कहे-सुने ही अपनी आँखों से समझ लेते हैं। इस सन्दर्भ में तो हरसिंगार ने ही मुझे बिना कुछ कहे-सुने समझा था। मैं उसको देख बड़ी हुई थी, तो क्या उसने भी कभी मुझे महसूस किया होगा? क्या उसने जाने से पहले मुझे याद किया होगा? या क्या उसकी आवाज़ ही मेरे कानों तक नहीं पहुंची थी? या अगर पहुंची भी हो, तो क्या जानबूझ के मैंने उन आवाजों को अनसुना कर दिया था? मुझे नहीं समझ आता। आखिर आजतक उसने मुझसे मांगा ही क्या था?
प्रकृति की नीरव शान्ति को आँखों, आवाजों एवं स्पर्श से ही महसूस किया जा सकता है। ख़ास तौर पर कोरोना में लॉकडाउन में ऐसे इकतरफा, निःशब्द संवाद बालकनी से या खिड़कियों से कितनी ही बार महसूस करने को मिले। वैसे भी आजकल की टीवी पर बहस और चीखने- चिल्लाने के शोर ने इस शान्ति को और नीरस बना दिया है। कोरोना से पहले भी तो सड़क पर चलते किसी व्यक्ति से आँखें मिल जाया करती थीं, सफर करते वक़्त किसी की बात को सुनकर अमूमन मुस्कुरा दिया करते थे, और फिर आँखों से ही उस शख्श को देख उस संवाद से विदा ले लिया करते थे!
शायद इसीलिए हरसिंगार जैसे पेड़ हमें इन्हीं अनकही, मानवीय संवेदनाओं को सिखाने के लिए हमसे रूबरू हुआ करते हैं। जिन्हें हम भूल जाते हैं,या अनदेखा कर देते हैं। या तभी याद करते हैं, जब स्वार्थ हमें स्वार्थ से मिलाता है कभी, और मजबूर कर देता है जीवन की लय को उस अनंत मौन की गहराईयों के बीच महसूस करने के लिए।
शायद इसलिए उन हरसिंगरों को आज हरदम ढूंढ़ा करती हूं, लेकिन ढूंढ़ते नहीं मिलते वो हरसिंगार! (downtoearth.org.in)
- वात्सल्य राय
क्रिकेट वही है. आईपीएल का टूर्नामेंट वही है. टीम के ज़्यादातर खिलाड़ी भी वही हैं और सबसे बढ़कर कप्तान भी वही हैं, महेंद्र सिंह धोनी. लेकिन, चेन्नई की टीम वहां नहीं है, जहां बीते 12 साल से दिखती थी.
नौ बार फ़ाइनल खेल चुकी और तीन बार ट्रॉफी पर अपना नाम लिखा चुकी चेन्नई सुपर किंग्स आईपीएल की उन टीमों में शुमार रही है, जो अमूमन टॉप पोजीशन के आसपास रहती हैं.
लेकिन, आईपीएल-13 में सोमवार को चेन्नई सबसे नीचे यानी आठवें नंबर पर पहुंच गई.
धोनी भी वहां नहीं दिखते, जहां वो थे. उनके हाथ से कैच फिसल रहे हैं. रन लेते वक़्त दौड़ते समय वो हांफते दिखते हैं और वो रन आउट भी हो रहे हैं. उनका बल्ला पहले की तरह गेंद से संपर्क नहीं कर पा रहा है. उनके हाथ से 'बेस्ट फिनिशर' का टैग फिसला जा रहा है. अब वो पिच पर नाबाद खड़े रह जाते हैं और टीम को हार का मुंह देखना पड़ता है.
और, टीम की साख? साख भले ही 'रसातल' तक न पहुंची हो, लेकिन रुतबे पर चोट गहरी हुई है और आलोचक बर्छियां और भाले लेकर तैयार खड़े हैं.
जब भी चेन्नई सुपर किंग्स साख के पैमाने पर कोई पायदान फिसलती है, वो चोट मार देते हैं. कम से कम पूर्व क्रिकेटर और आईपीएल में कमेंट्री कर रहे आकाश चोपड़ा ने तो ट्विटर पर ऐसा ही इशारा किया है.
चेन्नई के जहाज में छेद?
टीम जहां और जिस हाल में है, उससे चेन्नई के कप्तान धोनी अनजान हों, ऐसा भी नहीं है. ट्रोल्स की फ़ौज या आलोचक जो बात कह रहे हैं, उसे एक 'सच' के रूप में धोनी ख़ुद भी बयान कर चुके हैं.
बीती 10 अक्तूबर को रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर के हाथों चेन्नई को हार को मिली तो धोनी ने कहा, "(चेन्नई सुपर किंग्स के) जहाज में कई छेद हो चुके हैं."
अब से दस दिन पहले ये बयान उस शख्स ने दिया, जिन्हें सिर्फ़ चेन्नई सुपर किंग्स और आईपीएल ही नहीं बल्कि 21वीं सदी के क्रिकेट इतिहास के सबसे कामयाब और करिश्माई कप्तानों में गिना जाता है.
जिन्होंने क्रिकेट के हर फॉर्मेट में, ज़्यादातर टूर्नामेंट्स और आईपीएल में भी लगभग हारी हुई बाजियां जीतने का कमाल किया है. ऐसे ही कमाल और करिश्मों के दम पर उन्हें 'मैजिकल' जैसे उपनाम मिले और फैन्स ने 'जो जीता वो धोनी' जैसे जुमले गढ़ लिए.
शिखर से फिसले?
लेकिन, लगता यही है कि सुनहरे दिनों की विदाई की आहट धोनी ने भी सुन ली थी. 15 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास का एलान शायद इसी का नतीजा था.
फिर भी आईपीएल शुरू हुआ तो ब्रांड धोनी का करिश्मा रत्ती भर हिला नहीं था. तब भी जब उनके ही साथ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहने वाले चेन्नई सुपर किंग्स के स्टार बल्लेबाज़ सुरेश रैना और अनुभवी स्पिनर हरभजन सिंह ने आईपीएल-13 से अलग होने का एलान किया.
आखिर, धोनी ने साल 2018 में टीम को आईपीएल चैंपियन बनाया था और बीते सीजन में भी उनकी टीम रनर्स अप थी. ट्रॉफी और उनकी टीम के बीच सिर्फ़ एक रन का फ़ासला रह गया था. फैन्स भी चाहते थे, क्रिकेट से 'संपूर्ण विदाई' के पहले मैदान पर 'माही मैजिक' का दीदार हो जाए.
जीत शुरुआत से, फिर हार ही हार
साल 2020 में धोनी की टीम ने आईपीएल-13 में अपने अभियान की शुरुआत डिफेंडिंग चैंपियन मुंबई इंडियन्स को हराकर की. दूसरे मैच में राजस्थान रॉयल्स से चेन्नई की टीम हारी लेकिन 200 रन बनाकर.
लेकिन, इसी मैच से चेन्नई ख़ासकर कप्तान पर सवाल उठने लगे. बैटिंग ऑर्डर में धोनी के नीचे खेलने पर सवाल उठे. हर हार के साथ सवाल तीखे होते गए. टॉप ऑर्डर ख़ासकर शेन वॉटसन की नाकामी को लेकर भी सवाल हुए. मिडिल ऑर्डर के बेजान होने और केदार जाधव को 'ढोते जाने' को लेकर कप्तान को कठघरे में खड़ा किया गया.
वॉटसन ने दो मैचों में बल्ले का दम दिखाया. किंग्स इलेवन पंजाब के ख़िलाफ़ उनकी पारी ने चेन्नई को जीत दिला दी. कोलकाता नाइट राइडर्स के ख़िलाफ़ उनकी हाफ सेंचुरी के बाद भी टीम 10 रन से हार गई.
कुछ फिट नहीं-कुछ हिट नहीं
फ़ाफ डू प्लेसी चेन्नई के सबसे कामयाब बल्लेबाज़ हैं. 375 रनों के साथ वो सीज़न के तीसरे सबसे कामयाब बल्लेबाज़ हैं, लेकिन उनके बल्ले में वॉटसन, धोनी या रैना वाला वो ज़ोर नहीं है जो चेन्नई की कश्ती को जीत के किनारे तक ले जा सके.
फिटनेस फैक्टर ने भी कप्तान के गेम प्लान पर असर डाला है और चेन्नई को चोट दी है. मुंबई के ख़िलाफ़ पहले मैच में जीत की पटकथा लिखने वाले अंबाती रायुडू उसी मैच में अनफिट हो गए और अगले दो मैचों में नहीं खेल पाए. दोनों मैचों में चेन्नई को हार मिली.
ड्वेन ब्रावो दिल्ली के ख़िलाफ़ मैच के दौरान अनफिट हो गए और आखिरी ओवर में गेंदबाज़ी के लिए मौजूद नहीं रहे और इसे चेन्नई की हार की बड़ी वजह माना गया. दिल्ली को आखिरी ओवर में जीत के लिए 17 रन बनाने थे जो रवींद्र जडेजा की गेंद पर अक्षर पटेल ने आसानी से बना लिए.
साथ नहीं किस्मत?
धोनी ने सीमित विकल्पों को अदल-बदल कर टीम की किस्मत पलटने की कोशिश भी की लेकिन ऐसे ज़्यादातर प्रयोग नाकाम साबित हो रहे हैं.
मसलन सैम करन ओपनिंग में नहीं चल पा रहे हैं. जहां राशिद ख़ान, युजवेंद्र चहल, अक्षर पटेल, श्रेयस गोपाल और राहुल तेवतिया जैसे स्पिनर कामयाब हो रहे हैं, वहीं पीयूष चावला जैसे स्पिनर बेअसर साबित हो रहे हैं.
डू प्लेसी के अलावा चेन्नई का कोई बल्लेबाज़ आईपीएल-10 के सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले दस बल्लेबाज़ों में नहीं है. इसी तरह सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले 10 गेंदबाज़ों मे चेन्नई का कोई बॉलर नहीं है.
धोनी के दांव चलते या करीबी मैचों के नतीजे चेन्नई के ख़िलाफ़ न जाते तो इस सीजन में भी धोनी के धमाल की चर्चा हो रही होती.
सवाल ही सवाल
लेकिन अब टीम की 'सामूहिक नाकामी' को लेकर सबसे ज़्यादा सवाल धोनी से पूछे जा रहे हैं. आलोचकों की राय में रैना और हरभजन के विकल्प नहीं तलाशकर, वॉटसन और ब्रावो जैसे उम्रदराज़ खिलाड़ियों पर ज़्यादा भरोसा दिखाकर, पिछले सीजन के कामयाब गेंदबाज़ इमरान ताहिर और युवा खिलाड़ियों को मौके न देकर कप्तान के तौर पर धोनी ने ग़लतियां कीं और टीम को खामियाजा उठाना पड़ा.
धोनी ने मुताबिक युवाओं को मौके न देने से जुड़ी आलोचना, "जायज है. इस साल हम ऐसा नहीं कर पाए. शायद हमें अपने कुछ युवा खिलाड़ियों में वो चमक नहीं दिखी. हो सकता है, आने वाले मैचों में हम उन्हें मौका दें और वो बिना दबाव के खेल सकें."
धोनी भविष्य की बात कर रहे हैं. वो भी तब जब आईपीएल-13 में चेन्नई की टीम 10 मैच खेल चुकी है और अब ज़्यादा मौके बचे नहीं हैं. लेकिन, सोमवार को ही राजस्थान के ख़िलाफ़ मैच में धोनी ने संजू सैमसन का कैच एक हाथ से थामकर दिखाया कि वो अब भी मुश्किल मौकों को पकड़ना जानते हैं.
नंबर 7 का जादू
शायद इसीलिए 'सात नंबर के सिकंदर' कहे जाने वाले धोनी की टीम को सात विकेट से हराने में नाबाद 70 रन का योगदान देने वाले विकेटकीपर बल्लेबाज़ जोस बटलर, मैच के बाद मैन ऑफ़ द मैच की ट्रॉफी के बजाए धोनी की सात नंबर की जर्सी दिखाते नज़र आए.
वजह है, इस जर्सी से जुड़ा जादू. जिसे फैन्स भी देखना चाहते हैं और धोनी भी ढूंढना चाहते हैं.(bbc)
बोतल से दूध पीने वाले शिशु हर दिन लाखों से अधिक माइक्रोप्लास्टिक्स निगल सकते हैं. एक नए शोध में हमारे खाद्य उत्पादों में प्लास्टिक की बहुतायत को उजागर किया गया है.
इस बात के बढ़ते सबूत हैं कि इंसान बड़ी संख्या में प्लास्टिक के छोटे कणों का अनजाने में उपभोग करता है, लेकिन बहुत कम लोगों को इसके स्वास्थ्य पर होने वाले असर के बारे में पता है. ये छोटे कण तब बनते हैं जब प्लास्टिक के बड़े टुकड़े टूट जाते हैं. आयरलैंड में शोधकर्ताओं ने शिशुओं के 10 तरह की बोतलों या पॉलीप्रोपाइलीन से बने एक्सेसरीज के टूटने की दर पर शोध किया. यह खाद्य कंटेनरों के लिए सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला प्लास्टिक है.
शोधकर्ताओं ने दूध को बनाने और बोतल को स्टेरलाइज करने के बताए विश्व स्वास्थ्य संगठन के आधिकारिक दिशा-निर्देशों का पालन किया.
21 दिनों की परीक्षण अवधि में टीम ने पाया कि बोतलों ने 13 लाख से लेकर 1.62 करोड़ प्लास्टिक के माइक्रोपार्टिकल्स प्रति लीटर के बीच छोड़े. इसके बाद शोधकर्ताओं ने इस डाटा का इस्तेमाल स्तनपान की राष्ट्रीय औसत दरों के आधार पर बोतल से शिशुओं को दूध पिलाने के दौरान संभावित माइक्रोप्लास्टिक्स के वैश्विक जोखिम मॉडल तैयार करने के लिए किया.
उन्होंने अनुमान लगाया कि बोतल से दूध पीने वाले शिशु औसत हर रोज 10.60 लाख माइक्रो पार्टिकल अपने जीवन के पहले 12 महीनों के दौरान निगल लेते हैं. यह शोध नेचर फूड जर्नल में छपा है और शोधकर्ताओं का कहना है कि स्टेरलाइजेशन और पानी के उच्च तापमान माइक्रोप्लास्टिक के टूटने का मुख्य कारण है.
शोध के लेखकों ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया कि शोध का लक्ष्य बोतल से निकले वाले माइक्रोप्लास्टिक के संभावित स्वास्थ्य जोखिमों के बारे में "माता पिता को चिंता में डालना नहीं" है.
टीम के सदस्यों का कहना है, "हमने बहुत जोर देकर बताया है कि शिशुओं के माइक्रोप्लास्टिक के कण निगल लेने के संभावित जोखिमों के बारे में हमें नहीं पता है. यह ऐसा विषय है जिस पर और अधिक गहराई से शोध की जरूरत है और हम इस पर लगातार आगे बढ़ रहे हैं."
लेखकों ने उल्लेख किया कि विकसित देशों में शिशु सबसे अधिक माइक्रोप्लास्टिक के कण निगल रहे हैं. बीस लाख से अधिक कण उत्तरी अमेरिका में और उसके बाद यूरोप में सबसे अधिक 26 लाख कण प्रति दिन. शोध में इन अमीर देशों में शिशुओं के कण निगलने का कारण स्तनपान की दर में कमी बताया गया.
एए/सीके (एएफपी)
- सलमान रावी
पूर्वोत्तर राज्य मिज़ोरम का अपने दो पड़ोसी राज्यों से तनाव के कारण केंद्र सरकार को हस्तक्षेप करने की नौबत आ पड़ी.
अब दावा किया जा रहा है कि हालात क़ाबू में हैं.
मिज़ोरम के दो पड़ोसी राज्य हैं असम और त्रिपुरा, जिनके साथ उसका विवाद है.
केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला ने सोमवार को असम और मिज़ोरम के मुख्य सचिवों के साथ वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिये बातचीत की.
दोनों ही मामलों में राज्यों की सीमा को लेकर ही विवाद है जो अभी तक निर्धारित नहीं है और जिसे लेकर समय-समय पर तनाव बढ़ जाता है.

असम के साथ विवाद
असम और मिज़ोरम की सरकारों का कहना है कि वो बातचीत से संतुष्ट हैं और हालात को सामान्य बनाने की दिशा में दोनों ही राज्य पूरी कोशिश कर रहे हैं.
असम और मिज़ोरम के बीच बस एक छोटी सी बात ने बड़े तनाव का रूप ले लिया था जिसके बाद शनिवार की देर शाम हिंसक वारदातों की ख़बर आने लगी.
दक्षिण असम के पुलिस उप-महानिरीक्षक दिलीप कुमार डे के अनुसार असम के लैलापुर में मिज़ोरम के सरकारी अधिकारियों ने कोविड-19 की जाँच के लिए एक शिविर बनाया ताकि राज्य में प्रवेश करने से पहले ट्रक चालकों और अन्य कर्मचारियों के साथ-साथ राज्य में प्रवेश करने वाले आम लोगों की कोरोना जाँच हो सके.
असम सरकार को इसपर आपत्ति थी कि अपने राज्य की बजाय दूसरे राज्य में कोई सरकार ऐसा कैसे कर सकती है?
लैलापुर के ज़िलाधिकारी एच लाथिंगा के अनुसार जब असम के प्रशासनिक अधिकारियों ने इसका विरोध किया तो "कुछ मिज़ो युवक" वहां पहुँचे और उन्होंने ट्रकों में तोड़ फोड़ के साथ-साथ कुछ मकानों और दुकानों को नुक़सान भी पहुँचाया. उनके अनुसार इस घटना में सात लोगों के घायल होने की बात कही जा रही है.
घटना को तूल पकड़ना ही था
मिज़ोरम सरकार द्वारा जारी किये गए बयान में कहा गया है कि असम की पुलिस ने मुख्य राजमार्ग के 'तीन पॉइंट' पर नाकेबंदी कर दी और आवश्यक वस्तुएं लेकर आने वाले वाहनों को रोक दिया.
मिज़ोरम सरकार ने अपने बयान में उन तीन स्थानों को चिन्हित किया जहां असम की सरकार ने वाहनों का आवागमन रोका था. ये स्थान हैं थिन्घलुन, साईहाईपुई और वायरेंगटे.
इसपर मिज़ोरम की सरकार के मंत्रिमंडल की आपात बैठक बुलाई गई जिसके बाद मुख्यमंत्री ज़ोरामथांगा ने असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल से फ़ोन पर बात भी की. बाद में उन्होंने अपनी बातचीत को कारगर बताया और सोनोवाल की तरफ़ से की गई पहल की तारीफ़ भी की. सोनोवाल ने भी ट्वीट कर ऐसा ही किया.
असम में एक मुस्लिम दंपति मंदिरों और रास्तों को संवार रहा है
असम के वन और पर्यावरण मंत्री परिमल सुकला ने हिंसा वाले इलाक़े का दौरा किया और वहां मौजूद पत्रकारों से बातचीत में कहा कि हालात पूरी तरह से सामान्य हो गए हैं.

त्रिपुरा के साथ विवाद
मिज़ोरम का जो विवाद त्रिपुरा के साथ हुआ उसकी जड़ में भी सीमा का विवाद ही है.
त्रिपुरा के अतिरिक्त गृह सचिव अनिन्दिया भट्टाचार्य के अनुसार मामित ज़िले में मिज़ोरम के कुछ जनजातीय युवक एक मंदिर बनाने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन ज़िला प्रशासन ने इसकी अनुमति नहीं दी.
घटना को लेकर बढ़ रहे तनाव को देखते हुए मिज़ोरम की सरकार ने इलाक़े में धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा लगा दी. लेकिन सीमा का सही तरीक़े से रेखांकन नहीं होने की वजह से मिज़ोरम ने त्रिपुरा के मामित ज़िले में भी इसे लागू करने का अध्यादेश निकाल दिया.
इसपर दोनों राज्यों के बीच ठन गई और बाद में वरिष्ठ अधिकारियों के हस्तक्षेप से ये मामला फ़िलहाल शांत हो गया है, ऐसा सरकारें दावा कर रही हैं.
असम के साथ मिज़ोरम की सीमा लगभग 165 किलोमीटर की है. लेकिन इसको सही तरीक़े से चिन्हित नहीं किया गया है जिसको लेकर समय-समय पर बड़े विवाद पैदा हो जाते हैं. सरकारी सूत्र कहते हैं कि सीमा को चिन्हित करने का प्रयास वर्ष 1995 से ही चल रहा है जो अब तक लंबित है.
असम का लैलापुर ज़िला भी इसमें से एक है जिसके बड़े इलाक़े पर मिज़ोरम दावा करता रहा है. स्थानीय लोगों के लिए ये परेशानी का ज़रिया बन गया है क्योंकि बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो सीमा निर्धारण नहीं होने की वजह से कई सरकारी सुविधाओं से वंचित हैं.
असम सरकार के एक अधिकारी ने नाम नहीं लिखने की शर्त पर कहा, "भारत में भी कई लद्दाख हैं, जहां सीमाओं का विवाद सदियों से चला रहा है. और, पता नहीं कब तक चलता रहेगा."(bbc)
अपने बच्चों को भी किसान बनते देखना चाहते हैं 34 फीसदी किसान, जबकि 51 फीसदी ने माना उनके लिए फायदेमंद है खेती
- Lalit Maurya
किसान और किसान संगठनों का एक वर्ग नए कृषि कानूनों का पुरजोर विरोध कर रहा है। इन नए अधिनियमों पर किसानों की राय जानने के लिए गांव कनेक्शन ने एक सर्वेक्षण किया था, जिसके नतीजे 'द एग्रीकल्चर फार्मर्स पर्सेप्शन ऑफ द न्यू एग्री लॉज' नामक रिपोर्ट के रूप में आज प्रकाशित किए हैं| इन कानूनों में अन्य बातों के साथ-साथ किसानों को खुले बाजार में अपनी फसल बेचने की आजादी देने का वादा किया गया है| आइये जानते हैं इस सर्वेक्षण में क्या कुछ निकलकर सामने आया है|
सर्वे के अनुसार हर दूसरा किसान इन तीनों कानूनों का विरोध करता है, जबकि 35 फीसदी किसानों ने इन कानूनों का समर्थन किया है| हालांकि जिन 52 फीसदी किसानों ने इन कानूनों का विरोध किया है उसमें से 36 फीसदी को इन कानूनों के बारे में जानकारी ही नहीं है| इसी तरह इस कानून का समर्थन करने वाले 35 फीसदी किसानों में से 18 फीसदी को इनके बारे में कोई जानकारी नहीं है| ऐसे में उनकी राय कितनी मायने रखती है यह सोचने का विषय है| यह सर्वेक्षण 3 से 9 अक्टूबर के बीच देश के 16 राज्यों के 53 जिलों में किया गया था।
57 फीसदी किसानों को डर है कि इन नए कानूनों के चलते वे अपनी उपज को कम कीमत पर खुले बाजार में बेचने को मजबूर हो जाएंगे| जबकि 33 फीसदी किसानों को डर है कि कहीं सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था को ख़त्म तो नहीं कर देगी| वहीं 59 फीसदी किसानों की मांग है एमएसपी पर एक अनिवार्य कानून बनाया जाना चाहिए| एक और जहां छोटे और सीमान्त किसान (जिनके पास पाँच एकड़ से कम भूमि है) इन कानूनों का समर्थन करते हैं, वहीं दूसरी ओर बड़े किसान इन कानूनों के विरोध में हैं|
28 फीसदी ने माना किसान विरोधी है मोदी सरकार
इस सर्वे में एक दिलचस्प बात यह सामने आई की जहां आधे से अधिक (52 फीसदी) किसान इन कानूनों के विरोध में हैं लेकिन उनमें से 36 फीसदी को यह नहीं पता की यह कानून क्या हैं| मोदी सरकार के विषय में 44 फीसदी किसानों की राय थी कि वो किसानों के हितेषी हैं जबकि 28 फीसदी का कहना था कि यह सरकार 'किसान विरोधी' है। एक अन्य सवाल के जवाब में जहां अधिकांश (35 फीसदी) किसानों ने माना कि मोदी सरकार को किसानों की चिंता है, जबकि लगभग 20 फीसदी ने कहा कि सरकार ने व्यापारिक घरानों और निजी कंपनियों का समर्थन किया है।
क्या हैं वो तीनों विवादित कानून
गौरतलब है कि संसद के पिछले मानसून सत्र में तीन नए कृषि बिल पारित किए थे, जिसे बाद में 27 सितंबर को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद के हस्ताक्षर के बाद कानून का दर्जा दे दिया गया था| इसमें पहला कानून किसान उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020 है| इस कानून के तहत किसान अपनी उपज को कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) द्वारा निर्धारित बाजार यार्ड के बाहर भी बेच सकते हैं| यह नियम किसानों को उनकी उपज को बेचने की आजादी देता है|
दूसरा कानून किसान (सशक्तीकरण और संरक्षण) अनुबंध मूल्य एश्योरेंस एंड फार्म सर्विसेज एक्ट, 2020 किसानों को पहले से ही तय मूल्य पर भविष्य की उपज को बेचने के लिए कृषि व्यवसायी फर्मों, प्रोसेसर, थोक विक्रेताओं, निर्यातकों और बड़े खुदरा विक्रेताओं के साथ अनुबंध करने का अधिकार देता है। जबकि तीसरे कानून, आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020 का उद्देश्य अनाज, दलहन, तिलहन, प्याज, और आलू जैसी वस्तुओं को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटाना और स्टॉक होल्डिंग सीमा को लागू करना है।
सर्वेक्षण से पता चला है कि करीब 67 फीसदी किसानों को नए कृषि कानूनों के बारे में जानकारी है। जबकि दो-तिहाई को देश में चल रहे किसानों के विरोध के बारे में पता है। इस तरह के विरोध के विषय में उत्तर-पश्चिम क्षेत्र के किसान कहीं अधिक जागरूक हैं| जहां इस बारे में 91 फीसदी किसानों को जानकारी है| जिसमें पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं। वहीं पूर्वी क्षेत्र (पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़) में इस बारे में बहुत कम जागरूकता है| वहां 46 फीसदी से कम किसान इस बारे में जानकारी रखते हैं।
इन कानूनों का समर्थन करने वाले 47 फीसदी किसानों का मानना है कि इन कानूनों की वजह से उन्हें देश में कहीं भी अपनी उपज बेचने की आजादी मिल जाएगी| जबकि इसके विपरीत इसका विरोध करने वाले 57 फीसदी किसानों का मानना है कि इन कानूनों की वजह से उन्हें खुले बाजार में कम कीमत पर अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर किया जाएगा|
39 फीसदी किसानों का मत है कि नए कृषि कानूनों के चलते देश में मंडी / एपीएमसी प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी| वहीं 46 फीसदी किसानों का मानना है कि इन कानूनों के चलते किसानों का शोषण करने वाली बड़ी और निजी कंपनियों को बढ़ावा मिलेगा। जबकि 39 फीसदी का कहना है कि इन कानूनों के चलते भविष्य में न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली पूरी तरह ख़त्म हो जाएगी|
लगभग 63 फीसदी किसानों का कहना है कि वो अपनी फसल को एमएसपी पर बेचने में कामयाब रहे थे| यह आंकड़ा दक्षिण क्षेत्र (केरल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश) में 78 फीसदी था| वहीं उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र (पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश) में 75 फीसदी रहा| 36 फीसदी किसानों के लिए सरकारी मंडियां और एपीएमसी उपज बेचने का सबसे पसंदीदा माध्यम है। उत्तरपश्चिम क्षेत्र में करीब 78 फीसदी किसान इनके माध्यम से अपनी उपज बेचना पसंद करते हैं|
जहां 36 फीसदी किसानों का मानना है कि नए कृषि कानूनों से उनकी स्थिति में सुधार आएगा, वहीं 29 फीसदी किसानों ने बताया कि उन्हें विश्वास है कि यह कानून 2022 तक उनकी आय को दोगुना करने में मदद करेंगे। (downtoearth)
प्रकाश दुबे
महाराष्ट्र नाम है। काम भी राष्ट्र से बड़ा होता है। विश्व मराठी सम्मेलन अगले वर्ष 28 से 31 जनवरी तक अमेरिका में होगा। सम्मेलन में भारत के मराठी संगठनों के साथ 27 देशों के महाराष्ट्र मंडल आयोजक हैं। अमेरिका के साठ राज्यों के संगठनों का सहयोग है। महाध्यक्ष, महासंरक्षक और महा स्वागताध्यक्ष के साथ पर्याप्त संख्या में विभिन्न देशों के अध्यक्ष, संरक्षक और स्वागताध्यक्ष हैं।
परमाणु वैज्ञानिक डा अनिल काकोडक़र महासम्मेलनाध्यक्ष हैं। साथ में नौ महानुभावों का अध्यक्ष मंडल है। सुमित्रा महाजन से गत वर्ष लोकसभाध्यक्ष का पद और लोकसभा की उम्मीदवारी छिन चुकी है। राज्यपाल की पात्रता पर किसी ने गौर नहीं किया। महासम्मेलन की महास्वागताध्यक्ष का जिम्मा संभालने की पूरी फुर्सत है। 25 स्वागताध्यक्ष की टीम साथ है। भोपाल में विश्व हिंदी सम्मेलन हुआ था। तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को कुछ नहीं करना पड़ा। सरकार के सहयोगी संगठन और स्वयंसेवकों ने मिलकर आप ही पूरी व्यवस्था संभाली थी। मराठी सम्मेलनों में सरकार की भूमिका कम है। वर्तमान और भूतपूर्व बत्तीदार भी गिने चुने हैं। महासम्मेलन के पीछे महा-मेधा को पहचानें। किसी को अमेरिका जाने की जरूरत नहीं है। सब कुछ आन लाइन है। है न, आम के आम और गुठली के दाम।
रंगे पत्रकार
भारत (आप चाहें तो आर्यावर्त कहें) के पत्रकारों और उनके संगठनों की गिनती की हिमाकत करना नासमझी है। अधिकृत तौर पत्रकार संगठन किसी राजनीतिक दल से संबद्ध नहीं होते।कर्ताधर्ताओं की बंदर कूदनी से रंग की पहचान हो जाती हैं। कोई लाल है, कोई नारंगी। मौसम के अनुसार रंग बदलने वालों की कमी नहीं है। पहली बार श्रमजीवी पत्रकारों के एक संगठन ने खुल्लमखुल्ला राजनीतिक दल के मजदूर संगठन से संबद्धता का दावा करते हुए उपराष्ट्रपति को पत्र लिखा है। आपका अनुमान गलत है। यह विक्रम उस आजीवन अध्यक्ष के नाम नहीं है, जो अपने आप को भाई का चंद बरदाई तथा नायडू का हमभाषी बताकर गर्वित होता है।
राज्यसभा टीवी से तीन दर्जन पत्रकारों को हाल में नौकरी से अलग कर दिया गया है। वर्किंग जनर्लिस्ट शब्द वाले संगठन ने राज्यसभा के पदैन सभापति वेंकैया नायडू को पत्र लिखा। नारंगी पहचान बतलाते हुए संगठन ने निकाले गए पत्रकारों पर दया की मांग की। कई सुझाव दे डाले। राज्यसभा टीवी और लोकसभा टीवी को मिलाकर एक करने या दोनों की जगह नया संसद टीवी बनाने की कोशिश है या महामारी मी मार? उपराष्ट्रपति जानते होंगे।
सडक़ चलते वोट
घुमावदार मार्ग पर संकेतक पढ़ा था-हम सडक़ बनाते हैं ताकि आप जल्दी पहुंचें। असावधानी और हड़बड़ी करने पर गंतव्य फिसल सकता है। केन्द्रीय सडक़ परिवहन सहित कुछ मंत्रालयों की कमान नितीन गडकरी संभालते हैं। गडकरी ने असम में ब्रह्मपुत्र और बिहार में गंगा पर पुल के काम तेजी से कराए। हिमाचल प्रदेश और लद्दाख के बीच सीमा पर महत्वपूर्ण सडक़ आवागमन शुरु कराने सुरंग का काम पूरा किया। उद्घाटन, शिलान्यास आदि का गुरुतर दायित्व प्रधानमंत्री ने संभाला।
इन सब कामों में तेजी लाने वाले नितीन गडकरी को इन दिनों शिलान्यास या उद्घाटन में हाजिर रहने का कष्ट नहीं करना पड़ा। बिहार में कुछ विधानसभा क्षेत्रों में सडक़ और पुल के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं। यही हाल मध्यप्रदेश के दो दर्जन क्षेत्रों में उपचुनाव का है। बिहार विधानसभा चुनाव, मप्र, उत्तरप्रदेश आदि के उपचुनाव के लिए प्रमुख प्रचारकों की सूची में सडक़ बनवाने वाले का नाम शामिल नहीं है। कोरोना से बचाव को इसका कारण मान सकते हैं। यह भी सोच सकते हैं कि गडकरी की जरूरत चुनाव घोषणा के पहले तक ही थी।
शक्तिरूपेण संस्थिता
राजनीति समेत समाज के हर वर्ग में बदलाव की रफ्तार सुस्त होती है। राजेन्द्र माथुर जैसे समतावादी संपादक की पहल के फलस्वरूप देश के संपादकों की जानी-मानी और एकमात्र संस्था एडिटर्स गिल्ड में करीब तीन दशक पहले मृणाल पांडे महासचिव बनीं। नेताओं को मुफ्त सलाह देना विद्वान संपादक अपना विशेषाधिकार मानते हैं। कभी-कभार स्वयं भी पालन करने का इरादा करते हैं। सो, कोशिश हुई कि इस बार एडिटर्स गिल्ड के सारे पद महिलाएं संभालें। बात नहीं बनी। आम राय की परंपरा टूटी। पहली बार मतदान की नौबत आई।
सच्चे झूठे वादों, जोड़ तोड़ और अरबों रुपए खर्च करने के बावजूद लोकसभा चुनाव का आंकड़ा 40 प्रतिशत के पार ले जाने में राजनीतिकों की नाक में दम आता है। कोरोना की कृपा से संपादकों का किसी जगह जमा होकर प्रत्यक्ष मतदान करना संभव नहीं था। गहमागहमी के बावजूद ठीकठाक मतदान में संशय था। 70 प्रतिशत के आसपास मतदान हुआ। नवरात्र के दिन मतगणना हुई। संपादकों के वोट से या देवी संपादकेषु शक्तिरूपेण संस्थिता कथन प्रमाणित हुआ। लगभग 75 प्रतिशत संपादकों ने समता तथा के विचार को समर्थन दिया। सीमा मुस्तफा पहली महिला अध्यक्ष निर्वाचित हुईं।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
इकबाल अहमद
पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अखबारों में इस हफ़्ते इमरान खान के खिलाफ विपक्षी महागठबंधन की पहली रैली, और कोरोना से जुड़ी खबरें सुर्खियों में थीं।
पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार के खिलाफ विपक्ष ने एक साथ मिलकर मोर्चा खोल दिया है।
20 सितंबर को पाकिस्तान की सभी विपक्षी पार्टियों ने इस्लामाबाद में मिलकर पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) का गठन किया था और इमरान खान की सरकार के खिलाफ पूरे पाकिस्तान में विरोध-प्रदर्शन करने की घोषणा की थी।
प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने विपक्षी पार्टियों की एकजुटता पर हमला करते हुए उन्हें ‘डाकुओं की एकता’ करार दिया था।
लेकिन विपक्षी पार्टियों ने शुक्रवार को (16 अक्टूबर) को पंजाब प्रांत के गुजरानवाला में एक शानदार रैली कर अपने सरकार विरोधी अभियान की शुरुआत की।
इस मौके पर पूर्व प्रधानमंत्री और मुस्लिम लीग (नून) के नेता नवाज शरीफ ने भी वीडियो लिंक के जरिए रैली को संबोधित किया।
नवाज शरीफ भ्रष्टाचार के मामले में दोषी करार दिए जा चुके हैं लेकिन इन दिनों अपनी खराब सेहत का इलाज कराने के लिए लंदन में हैं।
इमरान खान और सेना प्रमुख
पर निशाना
एक्सप्रेस अखबार ने लिखा है, ‘विपक्षी महागठबंधन का सरकार विरोधी पहला पावर शो।’ नवाज शरीफ पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तानी सेना पर जमकर हमले कर रहे हैं। इस्लामाबाद के भाषण में भी उन्होंने कहा था, ‘मेरी लड़ाई इमरान खान से नहीं है, बल्कि उनको सत्ता में बिठाने वालों (सेना की तरफ इशारा करते हुए) से है।’
शुक्रवार को गुजरानवाला में भी उन्होंने सेना पर निशाना लगाना जारी रखा।
नवाज शरीफ ने पाकिस्तान के स्थानीय समयानुसार रात के साढ़े ग्यारह बजे अपने भाषण की शुरुआत की लेकिन उस वक़्त भी गुजरानवाला का जिन्ना स्टेडियम लोगों से भरा हुआ था।
अखबार के अनुसार नवाज शरीफ ने मौजूदा सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा पर बाज़ाब्ता नाम लेकर निशाना साधा।
उनका कहना था, ‘हमारी अच्छी भली चलती सरकार को आपने रुखसत करवाया। मुल्क और कौम को अपनी इच्छाओं की भेंट चढ़ाया, सांसदों की खरीद-फरोख्त आपने दोबारा शुरू करवाई, जजों से जोर जबरदस्ती से आपने फैसले लिखवाए।’
जनरल बाजवा पर निशाना साधते हुए नवाज़ शरीफ़ ने कहा, ‘आप ने चुनाव में जनता के जनादेश को रद्द करके, अपनी मर्जी के निकम्मे गिरोह को देश पर थोप दिया।’
नवाज शरीफ ने मौजूदा सेना प्रमुख पर तो हमला किया ही, पूरी पाकिस्तानी सेना की संस्था और उसके इतिहास पर भी नवाज शरीफ जमकर बरसे।
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में सिविल सरकारों को अपना कार्यकाल पूरा नहीं करने दिया जाता और जनता के ज़रिए चुने गए नेताओं को ‘गद्दार’ कहा जाता है।
इस पर नवाज शरीफ ने कहा, ‘ढाका में जनरल नियाज़ी ने दुनिया की तारीख में पहली मरतबा खुले आम अपमानजनक तरीके से हथियार डाले, लेकिन गद्दार कौन है? राजनेता। गद्दार कौन है? नवाज शरीफ। गद्दार कौन है? बेनज़ीर भुट्टो। पाकिस्तान में देशभक्त वो लोग कहलाते हैं जिन्होंने संविधान के खिलाफ काम किया और देश तोड़ा।’
इमरान खान ने नवाज शरीफ के पहले दिए गए बयान पर कहा था कि नवाज शरीफ के सेना के खिलाफ बयान पर भारत में खुशियां मनाई जा रहीं हैं।
विपक्षी गठबंधन के एक प्रमुख नेता मौलाना फजलुर्रहमान ने इमरान खान के इस बयान का जवाब गुजरानवाला में दिया।
रैली को संबोधित करते हुए मौलाना ने कहा, ‘भारत ने उस वक्त खुशियां मनाई थीं, जब पाकिस्तान के चुनाव में धांधली हुई थी, जब एक नकली प्रधानमंत्री को देश पर थोपा गया था। आप पाकिस्तान के एजेंडे पर सत्ता में नहीं आए हैं, आप इसराइल या अमरीका के एजेंडे पर सत्ता में आए हैं।’
इमरान खान ने भी किया पलटवार
सेना के बारे में मौलाना फजलुर्रहमान ने कहा, ‘सेना से हमारी कोई लड़ाई नहीं है। लेकिन अगर आप देश की सरहदों की सुरक्षा की जि़म्मेदारी से हटकर राजनीति में हस्तक्षेप करते हैं, संविधान के खिलाफ काम करते हैं, धांधलियां करवाते हैं तो फिर आपके खिलाफ आवाज उठाना हमारा नहीं तो फिर किसका काम है।’
पीडीएम का दूसरा जलसा पाकिस्तान के सबसे बड़े शहर कराची में रविवार (18 अक्टूबर) को होगा।
अखबार जंग ने लिखा है, ‘पीडीएम का दूसरा पावर शो आज कराची में होगा।’
इसके लिए सारी तैयारियाँ कर ली गईं हैं। नवाज शरीफ इस रैली को भी वीडियो लिंक के जरिए संबोधित कर सकते हैं लेकिन पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) के आसिफ अली जरदारी बीमार होने की वजह से रैली में शामिल नहीं होंगे। हालांकि उनकी पार्टी ही इस रैली की मेज़बानी कर रही है।
इमरान खान ने भी नवाज शरीफ़ पर पलटवार किया है।
उन्होंने कहा, ‘नवाज शरीफ एक गीदड़ की तरह दुम दबाकर भाग गया और वहां बैठकर सेना प्रुमख और आईएसआई (पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी) के खिलाफ बातें कर रहे हैं। नवाज शरीफ ने सिर्फ जनरल कमर जावेद बाजवा पर नहीं, पूरी पाकिस्तानी फौज पर हमला किया है।’
इमरान खान ने कहा कि नवाज शरीफ के इस भाषण के बाद आप एक नए इमरान खान को देखेंगे।
अख़बार नवा-ए-वक़्त के अनुसार इमरान ख़ान ने कहा कि ‘कभी-कभी सोचता हूं, विपक्षी नेताओं को माफ कर दूं, मेरी जि़ंदगी आसान हो जाएगी। लेकिन ये पाकिस्तान के लिए तबाही का रास्ता है। जिंदगी में कभी-कभी मुश्किल फैसले करने पड़ते हैं और वही फैसले आपको ऊपर ले जाते हैं।’ (बीबीसी)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
फ्रांस में मजहब के नाम पर कितनी दर्दनाक खूंरेजी हुई है। एक स्कूल के फ्रांसीसी अध्यापक सेमुअल पेटी की हत्या इसलिए कर दी गई कि उसने अपनी कक्षा में पैगंबर मुहम्मद के कार्टूनों की चर्चा चलाई थी। मुहम्मद के कार्टून छापने पर डेनमार्क के एक प्रसिद्ध अखबार के खिलाफ 2006 में सारे इस्लामी जगत में और यूरोपीय मुसलमानों के बीच इतने भडक़ाऊ आंदोलन चले थे कि उनमें लगभग 250 लोग मारे गए थे। 2015 में इन्हीं व्यंग्य-चित्रों को लेकर फ्रांसीसी पत्रिका ‘चार्ली हेब्दो’ के 12 पत्रकारों की हत्या कर दी गई थी। यह पत्रिका इस घटना के पहले सिर्फ 60 हजार छपती थी लेकिन अब यह 80 लाख छपती है। इस व्यंग्य-पत्रिका में ईसाई, यहूदी और इस्लाम आदि मजहबों के बारे में तरह-तरह के व्यंग्य छपते रहते हैं।
सेमुअल पेटी की हत्या छुरा मारकर की गई। हत्यारे अब्दुल्ला अज़ारोव की उम्र 18 साल है और वह चेचन्या का मुसलमान है। रुस का चेचन्या इलाका मुस्लिम-बहुल है। वहां अलगाववाद और आतंकवाद का आंदोलन कुछ वर्ष पहले इतना प्रबल हो गया था कि रूसी सरकार को अंधाधुंध बम-वर्षा करनी पड़ी थी। अब फ्रांसीसी पुलिस को अब्दुल्लाह की भी हत्या करनी पड़ी, क्योंकि वह आत्मसमर्पण नहीं कर रहा था। अब्दुल्लाह के परिवार समेत नौ लोगों को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है, क्योंकि या तो उन्होंने उसे भडक़ाया था या वे उसके इस अपराध का समर्थन कर रहे थे। इस घटना के कारण अब यूरोप में मुसलमानों का जीना और भी दूभर हो जाएगा।
यूरोप के लेाग मजहब के मामले में अपने ढंग से जीना चाहते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी का उपयोग करते हुए वे इस्लाम, कुरान और मुहम्मद की भी उसी तरह कड़ी आलोचना करते हैं, जैसी कि वे कुंआरी माता मरियम, मूसा और ईसा की करते हैं। वे पोप और चर्च के खिलाफ क्या-क्या नहीं बोलते और लिखते हैं। मैं अपने छात्र-काल में अमेरिकी विद्वान कर्नल रॉबर्ट इंगरसोल की किताबें पढ़ता था तो आश्चर्यचकित हो जाता था। वे एक पादरी के बेटे थे। उन्होंने ईसाइयत के परखच्चे उड़ा दिए थे। इसी प्रकार महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपने विलक्षण ग्रंथ ‘सत्यार्थप्रकाश’ के 14 अध्यायों में से 12 अध्यायों में भारतीय धर्मों और संप्रदायों की ऐसी बखिया उधेड़ी है कि वैसा पांडित्यपूर्ण साहस पिछले दो हजार साल में किसी भारतीय विद्वान ने नहीं किया लेकिन उसकी कीमत उन्होंने चुकाई। उन्हें जहर देकर मारा गया। उनके अनुयायी पं. लेखराम, स्वामी श्रद्धानंद, महाशय राजपाल आदि की हत्या की गई। महर्षि दयानंद ने बाइबिल और कुरान की भी कड़ी आलोचना की है लेकिन उनका उद्देश्य ईसा मसीह या पैगंबर मुहम्मद की निंदा करना नहीं था बल्कि सत्य और असत्य का विवेक करना था।
मैं थोड़ा इससे भी आगे जाता हूं। मैं मूर्ति-पूजा का विरोधी हूं लेकिन विभिन्न समारोहों में मुझे तरह-तरह की मूर्तियों और फोटुओं पर माला चढ़ानी पड़ती है। मैं चढ़ा देता हूं, इसलिए कि जिन आयोजकों ने वे मूर्तियां वहां सजाई हैं, मुझे उनका अपमान नहीं करना है। क्या यह बात हमारे यूरोपीय नेता और पत्रकार खुद पर लागू नहीं कर सकते लेकिन उनसे भी ज्यादा दुनिया के मुसलमानों को सोचना होगा। उन्हें खुद से पूछना चाहिए कि इस्लाम क्या इतना छुई-मुई पौधा है कि किसी का फोटो छाप देने, आलोचना या व्यंग्य या निंदा कर देने से वह मुरझा जाएगा ? अरब जगत की जहालत (अज्ञान) दूर करने में इस्लाम की जो क्रांतिकारी भूमिका रही है, उसको देश-काल के अनुरुप ढालकर और अपना और दूसरा का भी भला करना मुसलमानों का लक्ष्य होना चाहिए। (नया इंडिया की अनुमति से)
- चिंकी सिन्हा
वो ज़्यादा नहीं बोलती. बोले भी तो कैसे? जब भी कोई पत्रकार, उनकी अविश्वसनीय कहानी के बारे में पता करने के लिए पहुँचता है, उनके पिता आसपास ही मौजूद रहते हैं.
आने वालों से ज़्यादातर उनके पिता ही बात करते हैं. वो ख़ुद ज़्यादा कुछ नहीं बोलतीं और कई बार तो वो बातचीत के बीच में ही अचानक उठ कर चल देती हैं.
लेकिन, आज वो दुबली-पतली लड़की एक सेलिब्रिटी है. लोग उन्हें 'साइकिल गर्ल' कहते हैं.
बतियाते हुए कभी-कभार वो मुस्कुरा देती हैं. और फिर वो वही जुमला दोहरा देती हैं, जो उन्होंने मिलने आने वाले लगभग सभी लोगों को बोला होगा. लड़की का नाम है ज्योति पासवान है.
15 बरस की ये लड़की तब सुर्ख़ियों में आई थी, जब वो लगभग 1200 किलोमीटर साइकिल चला कर, गुरुग्राम से बिहार के अपने पुश्तैनी गाँव पहुँची थी. ज्योति का गाँव बिहार के दरंभगा ज़िले में है.
ये बात इस साल के मई महीने की है, जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा हुआ था. अपने गाँव से शहर जाकर काम कर रहे मज़दूरों पर संकट छाया हुआ था. लॉकडाउन के दौरान शहरों में फँसे बड़ी संख्या में मज़दूर पैदल चल कर, साइकिल से या फिर गाड़ियों से लिफ़्ट लेकर अपने गाँव पहुँच रहे थे.
मार्च महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए अचानक पूरे देश में लॉकडाउन लगाने की घोषणा की थी.
इसी दौरान ज्योति पासवान अपने बीमार पिता मोहन पासवान को साइकिल पर बैठा कर गाँव ले आईं थीं. उसके बाद से ही, ज्योति के घर पर उनसे मिलने आने वालों का तांता लग गया था.
बिहार के दरभंगा ज़िले के सिंघवारा ब्लॉक में पड़ता है सिरहुल्ली गाँव. मोहन पासवान अब इस गाँव के बहुत ख़ास आदमी हैं. इसकी वजह उनकी बेटी ज्योति पासवान हैं.
लौटने के सिवा कोई चारा नहीं था
मोहन पासवान के घर पर लोगों का तांता लग गया था. न जाने कौन-कौन से लोग उनके घर आए थे. वो ज्योति से मिलना चाहते थे. उसे तोहफ़े देते थे. तमाम तरह के प्रस्ताव आ रहे थे. कोई अपने प्रोडक्ट बेचने के लिए ज्योति को ब्रांड एम्बैसडर बनाना चाहता था, तो कोई कुछ और प्रस्ताव लेकर आया था.
दरअसल अपने बीमार पिता को साइकिल पर बैठा कर गुरुग्राम से अपने गाँव पहुँचने की ज्योति पासवान की कहानी एक त्रासदी है. भले ही इसे साहसिक क़दम बता कर आज इसका जश्न मनाया जा रहा हो. हालांकि, ये अपने आप में साहसिक क़दम भी है.
लेकिन असली साहस तो वो था कि उन्होंने ऐसा करने का फ़ैसला किया. अगर रास्ते में क़िस्मत ने साथ दिया तो बहुत बेहतर और अगर नियति पूरे सफ़र के दौरान रूठी रही, तो वो भी उनके फ़ैसले का ही हिस्सा था. लेकिन, असली बहादुरी इसी बात में थी कि ज्योति पासवान ने उस मुश्किल वक़्त में साइकिल से गाँव तक का सफ़र तय करने का फ़ैसला किया.
लेकिन ज्योति को गाँव क्यों वापिस आना पड़ा?
हाई टेक शहर गुरुग्राम में एक झोपड़ी में बसर करने वाली ज्योति के सामने अचानक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी.
अचानक तालाबंदी हो जाने से इतने बड़े शहर में उनके पास गुज़ारा करने का कोई ज़रिया ही नहीं था. सब कुछ अचानक बंद हो गया. काम का कोई ठिकाना नहीं बचा. ज्योति के पिता बीमार थे और अब बाप-बेटी के पास एक ही चारा बचा था. किसी न किसी तरह अपने गाँव पहुँचा जाए.
लॉकडाउन के चलते न तो ट्रेनें चल रही थी और न ही बसें. तो, बहुत से आप्रवासी मज़दूरों ने तय किया कि वो पैदल या साइकिल से यूपी, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के अपने गाँवों तक जाएँगे. ये वो सूबे हैं, जहाँ से काम की तलाश में बड़े पैमाने पर लोग शहरों की ओर जाते हैं.
केंद्रीय श्रम और रोज़गार मंत्रालय के आँकड़े कहते हैं कि लॉकडाउन के दौरान 32 लाख से ज़्यादा आप्रवासी कामगार शहरों से उत्तर प्रदेश लौटे थे. वहीं, बिहार वापस आने वाले मज़दूरों की संख्या 15 लाख के आसपास थी.
'ये बिहार है बाबू. जात ही यहाँ की हक़ीक़त है.'
अगर आप ज्योति के गाँव सिरहुल्ली पहुँचें, तो सड़क से ही उनका घर दिख जाता है. ये गाँव के बाक़ी मकानों से काफ़ी ऊँचा है. तीन मंज़िल का ये मकान, ज्योति और उनके पिता के गाँव लौटने के बाद तीन महीने में बन कर तैयार हुआ था.
अभी भी इस पर रंग-रोगन नहीं हुआ है. लेकिन, घर में एक टॉयलेट बना है. बिहार के इस ग्रामीण क्षेत्र में घर में शौचालय होना बड़ी बात है. घर का बरामदा सामने की सँकरी गली में निकला हुआ है. बरामदे में प्लास्टिक की कुर्सियाँ पड़ी हैं, जिन्हें हाल ही में ख़रीदा गया है.
सिरहुल्ली का भी वही हाल है, जो आपको बिहार के किसी और गाँव में देखने को मिलेगा. ये गाँव भी जात-बिरादरी के हिसाब से टोलों-मोहल्लों में बँटा हुआ है. ऐसे में किसी दलित लड़की को अचानक मिली शोहरत और दौलत को पचा पाना गाँव के बहुत से लोगों के लिए मुश्किल है.
जुलाई महीने में 14 बरस की एक लड़की से बलात्कार के बाद उसकी हत्या की ख़बर ने सुर्ख़ियां बटोरी थीं. वो भी दरभंगा ज़िले की ही रहने वाली थी. इस दलित लड़की को एक बाग़ से आम चुराने की सज़ा दी गई थी. ये ख़बर वायरल हो गई थी.
पेशे से ड्राइवर, प्रेम प्रकाश कहते हैं, "मुझे लगता है कि असल में ये दलितों को दी गई एक वार्निंग थी. ये बताने की कोशिश की गई कि अपनी औक़ात से ज़्यादा मत उछलो. ये बिहार है बाबू. जात ही यहाँ की हक़ीक़त है."
अब एक सेलेब्रिटी हैं, ज्योति
लेकिन ज्योति अपनी उपलब्धि को लेकर बिंदास है, उन्हें कोई संकोच नहीं है. वो जींस और शर्ट पहनती हैं. स्थानीय मीडिया की ख़बरों की मानें, तो ज्योति ने अपनी बुआ की शादी का ख़र्च भी उठाया है. किसी भी आम दिन आप सिरहुल्ली पहुँचें, तो आप उन्हें गाँव की सड़क पर बेतकल्लुफ़ी से साइकिल चलाते देख सकते हैं.
लोग उन्हें जानते हैं. उनके बारे में सबने सुन रखा है. अब ज्योति की ज़िंदगी बिल्कुल अलग है.
साइकिल गर्ल ज्योति का शोहरत का सफ़र
पासवान परिवार ने अब अपना पक्का मकान बना लिया है, जिसमें चार कमरे हैं. पहले पूरा परिवार एक कच्ची झोपड़ी में रहा करता था. वो झोपड़ी अब भी घर के पिछवाड़े दिखती है. उधर, ज्योति के दादा के भाई अपने परिवार के साथ वैसी ही झोपड़ी में रहते है.
उस झोपड़ी के बगल में थोड़ी-सी जगह है. जहाँ आठ साइकिलें खड़ी की गई हैं. उसमें एक लाल रंग की साइकिल भी है, जो दीवार के सहारे खड़ी की गई है. ये साइकिल ज्योति की बड़ी बहन पिंकी की है. पिंकी को वो साइकिल, बिहार के मुख्यमंत्री की बालिका साइकिल योजना के तहत मिली थी.
इस योजना की शुरुआत, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने साल 2006 में की थी. उनका मक़सद था कि नौवीं कक्षा में लड़कियों के दाखिले की तादाद बढ़ाई जाए. अब वो साइकिल एक प्रतिमा की तरह घर के पिछवाड़े स्थापित है.
गुरुग्राम से गाँव पहुँचने के बाद ज्योति अब एक सेलेब्रिटी बन गई हैं.
पत्रकार, फ़िल्म निर्माता, राजनेता, एनजीओ और भारत की साइकिलिंग फ़ेडरेशन के सदस्यों ने ज्योति के घर आकर, उन्हें चेक, साइकिलें, कपड़े और यहाँ तक कि फल और तमाम तरह के प्रस्ताव दिए थे.
ज्योति को अमरीका में एक दत्तक पिता भी मिल गए, जिन्होंने उन्हें गोद लेने की चाहत जताई. क्योंकि, उनकी अपनी कोई बेटी नहीं है. वो अक्सर ज्योति को अमरीका आने के लिए कहते हैं. लेकिन ज्योति अपने गाँव में ही ख़ुश हैं.
ज्योति की बड़ी बहन पिंकी को स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी थी. दो बरस पहले उनकी शादी हो गई थी. ज्योति का दावा है कि ख़ुद उन्हें आठवीं कक्षा के बाद पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी थी. क्योंकि, परिवार उसकी फ़ीस भर पाने की हालत में नहीं था.
ज्योति बताती हैं कि उन्होंने 13 बरस की उम्र में साइकिल चलाना सीख लिया था. वो अक्सर अपनी बहन की लाल रंग वाली साइकिल गाँव में चलाया करती थीं. यानी ज्योति की साइकिल का सफर इस तरह शुरू हुआ था.
सितंबर में जब हमारी ज्योति से मुलाक़ात हुई थी, तब वो अपना नाम नौवीं कक्षा में लिखवाने के लिए नीले रंग की साइकिल चलाते हुए पास के पिंडारुच गाँव गई थीं.
ये नीले रंग वाली साइकिल, ज्योति को गिफ़्ट में मिली है. वो कहती हैं, "दरभंगा के डीएम एसएम त्याराजन ने मेरा नाम दोबारा स्कूल में लिखवाया है. मैं पढ़ना चाहती हूँ."
'साइकिल गढ़' बना सिरहुल्ली गांव
जब आप दरभंगा हाइवे से गुज़रते हैं, तो आपको कोई भी सिरहुल्ली गाँव का रास्ता बता देगा. अब वो पहले जैसा छोटा-सा ग़ुमनाम गाँव नहीं रहा. अब लोग उसे 'साइकिल गढ़' के नाम से जानते हैं.
आपको किसी से बस ये पूछना होगा कि क्या सामने वाले को उस गाँव का रास्ता मालूम है, जहाँ की लड़की गुरुग्राम से साइकिल चलाकर अपने गाँव पहुँची थी.
अब सिरहुल्ली वैसा मामूली गाँव नहीं, जहाँ के ज़्यादातर बाशिंदे काम की तलाश में दूसरे ठिकानों की ओर कूच कर जाते हैं और अपने पीछे बस परिवार के बुज़ुर्गों को छोड़ जाते हैं.
लेकिन, गाँव में 'ख़ास' लोगों की आमद के बावजूद, अब तक यहाँ आप्रवासी कामगारों के लिए कोई सरकारी मदद नहीं पहुँची है. 30 बरस के गणेश राम, सड़क किनारे बने मंदिर के बरामदे में बैठे युवाओं की तरफ इशारा करते हैं. गणेश राम यानी लॉकडाउन से पहले ही मुंबई से अपने गाँव लौटे थे.
गणेश राम मुंबई की एक फ़ैक्टरी में काम करते थे, जहाँ उन्हें हर महीने 14 हज़ार रुपये पगार मिलती थी.
गणेश कहते हैं, "यहाँ बहुत टेंशन है. पर करें तो क्या करें? यहाँ करने को कुछ है ही नहीं. हम खाने का जुगाड़ करने के लिए साहूकार से क़र्ज़ ले रहे हैं. हम जहाँ नौकरी करते थे, वो अब हमारा फ़ोन ही नहीं उठा रहा है. हमें समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें? यहाँ हमारी मदद के लिए कोई नहीं आया."
मंदिर परिसर में बैठे लोग अपनी उम्मीदें और डर बयां करते हैं. वो सब के सब सारा दिन यहीं बैठे रहते हैं. इस उम्मीद में कि कभी तो दिन फिरेंगे. जितेंद्र कुमार प्रसाद की उम्र 26 साल है. वो गुरुग्राम में एक एक्सपोर्ट हाउस में काम करते थे.
जितेंद्र ने 16 बरस की उमर में ही गाँव छोड़ दिया था. वो कहते हैं, "इस गाँव में हर आदमी कमाने के लिए बाहर जाता है. गाँव में बस बुज़ुर्ग लोग बच जाते हैं. यहाँ कुछ है ही नहीं. जब वहाँ हमारा पैसा ख़त्म हो गया, तो जैसे-तैसे हम लोग गाँव लौटे. यहाँ हम बस दिन गिन रहे हैं. गाँव में तो किसी को हमारी बात सुनने की भी फ़ुरसत नहीं."
जितेंद्र कुमार के मन में उम्मीद अभी ज़िंदा है, लेकिन खीझ और ग़ुस्सा भी है. वो कहते हैं- "हमको समझ में आ गया है, गाँव में हमसे किसी को कोई मतलब नहीं."
ज्योती कुमारी की ज़िंदगी कैसे और कितनी बदली?
मोहन पासवान के ताज़ा-ताज़ा अमीर बनने से इन लोगों के ज़ेहन में सवाल उठ रहे हैं. सरकार आख़िर ग़रीबों के लिए क्या कर रही है?
जितेंद्र कहते हैं, "हम भी तो शहर से गाँव लौटे. हम भी तो इतनी दूरी तक पैदल चल के अपने घर आए. लेकिन, लोग बस उस लड़की के बारे में पूछने आते हैं. किसी ने हमसे नहीं पूछा कि हमें किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं."
जितेंद्र, उसी रोज़ गाँव पहुंचे थे, जिस दिन ज्योति घर पहुँची थी. बल्कि, ख़ुद जितेंद्र ने ही मदद के लिए एक स्थानीय पत्रकार को फ़ोन किया था.
ज्योति के पिता मोहन पासवान के मुताबिक़, "गाँव में दलितों की आबादी एक हज़ार के आस-पास होगी. मौजूदा जाति व्यवस्था में दलित निचले पायदान पर आते हैं. ख़ास तौर से बिहार में दलितों की स्थिति काफ़ी ख़राब है."
वहीं मोहन कहते हैं कि अब उनके पास चार पैसा आ गया है, तो पूरा गाँव उनसे जलने लगा है.
मीडिया में कैसे फैली ज़्योति की ख़बर?
साइकिल से लंबा सफर तय कर 15 बरस की ज्योति के गाँव पहुंचने की ख़बर को सबसे पहले स्थानीय पत्रकार अलिंद्र ठाकुर ने एक हिंदी अख़बार के लिए कवर किया था. जल्द ही उनकी ख़बर पूरे देश में ही नहीं, बल्कि विदेश तक फैल गई.
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ने ट्विटर पर लिखा कि ये सहनशक्ति और प्यार की ख़ूबसूरत उपलब्धि है.
ज्योति, 16 मई को सिरहुल्ली के सार्वजनिक पुस्तकालय पहुँची थीं. वहाँ, बाहर से गाँव लौटे मज़दूरों ने पनाह ले रखी थी. वो सभी, सुबह-सुबह ट्रक से सिरहुल्ली के पास मब्बी बेलौना गाँव पहुँचे थे.
वहाँ से उन्होंने अलिंद्र ठाकुर को फ़ोन किया था. उन्होंने अलिंद्र से गुज़ारिश की कि वो बाहर से आए लोगों के लिए कोई क़रीबी क्वारंटीन सेंटर खोजने में मदद करें.
अगली सुबह, अलिंद्र ठाकुर एक सरकारी स्कूल पहुँचे, जिसे रातों-रात तब अस्थायी क्वारंटीन सेंटर में तब्दील कर दिया गया था. जब उन्होंने गाँव पहुँचे मज़दूरों के बारे में सिंघवारा ब्लॉक के अधिकारियों को ख़बर दी थी, उससे पहले वाली रात ही ज्योति और मोहन पासवान भी गाँव पहुँचे थे.
ठाकुर ने ज्योति और उसके पिता से मुलाक़ात की और उस लड़की के लंबे सफ़र पर एक स्टोरी लिखी. ये ख़बर एक बड़ी न्यूज़ एजेंसी ने भी उठा ली. फिर ज्योति की कहानी मुख्यधारा के मीडिया में तेज़ी से फैल गई.
संकट के उस दौर में ये एक फ़ील-गुड स्टोरी थी. लेकिन, ज़्यादातर लोगों ने ज्योति की कहानी बताने के चक्कर में मज़दूरों को लेकर सरकार के उपेक्षा भाव की अनदेखी कर दी थी.
गाँव पहुंचते ही ज्योति को उसके घर में ही क्वारंटीन कर दिया गया. लेकिन, वो रोज़ स्थानीय नेताओं और दूसरे लोगों से मिलती थी, जो दूर दराज़ से उनसे मिलने आया करते थे. सुपर 30 नाम के कोचिंग सेंटर के संस्थापक आनंद कुमार ने ज्योति को IIT-JEE में दाखिले के इम्तिहान के लिए मुफ़्त में कोचिंग देने का प्रस्ताव रखा.
आनंद कुमार ने ही उन्हें 'साइकिल गर्ल' ज्योति कुमारी कह कर बुलाना शुरू किया. अब ज्योति, भारत के साइकिलिंग फ़ेडरेशन के लिए तैयारी कर रही है. फ़ेडरेशन ने दिल्ली के इंदिरा गांधी इनडोर स्टेडियम में ज्योति का फ़्री ट्रायल करने का प्रस्ताव दिया है.
ज्योति की माँ फूलो देवी पहले गाँव में मज़दूरी करती थी और दिहाड़ी मज़दूर के तौर पर रोज़ 180 रुपये कमाती थी. लेकिन, जब से ज्योति की कहानी सुनकर उनके घर कुछ लोग ज्योति का सम्मान करने के लिए पहुँचे, तब से वो खेतों की ओर नहीं गई हैं.
फूलो कहती हैं, "हमारी ज़िंदगी अब बदल गई है." ज्योति के परिवार ने एक माइक्रो फाइनेंस संस्था से एक लाख रुपए का लोन ले रखा था. इसके अलावा उन्होंने मोहन पासवान के इलाज के लिए गाँव के साहूकारों से भी उधार पैसे लिए हुए थे.
मोहन पासवान अब भी लंगड़ाकर चलते हैं. लेकिन उन्हें उम्मीद है कि सरकार उन्हें नौकरी देगी, जिससे वो परिवार चला सकेंगे.
सबसे पहले इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस के कुछ अधिकारी ज्योति के घर आए थे. उन्होंने परिवार को पाँच हज़ार रुपये का चेक सौंपा था.
फूलो देवी, गाँव में बच्चों के लिए बने आंगनबाड़ी केंद्र में काम करती हैं. भारत सरकार ने इस योजना की शुरुआत 1975 समेकित बाल विकास सेवा कार्यक्रम के तहत की थी. इसका मक़सद बच्चों में कुपोषण की समस्या का समाधान निकालना था. अपनी ज़िंदगी में अचानक आए इस बदलाव से ख़ुद फूलो देवी भी हैरान रह गई थीं.
अपनी आमदनी बढ़ाने और बीमार पति के इलाज के लिए वो अक्सर गाँव के खेतों में और आसपास होने वाले निर्माण कार्य में मज़दूरी करती थीं.
बिहार के एक स्थानीय नेता पप्पू यादव ने ज्योति को गाँव पहुँचने के एक हफ़्ते के भीतर 20 हज़ार रुपए का चेक भेंट किया था. इसके बाद बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने उन्हें 50 हज़ार का चेक दिया. फिर, लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान ने भी ज्योति को 51 हज़ार रुपये दिए.
राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने ज्योति की पढ़ाई और शादी का पूरा ख़र्च उठाने का वादा किया. वहीं, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ज्योति को एक लाख रुपये देने का एलान किया. ज्योति के मां-बाप पहले ही भीम आर्मी के सदस्य बन चुके हैं.
भीम आर्मी आंबेडकर की विचारधारा वाला एक दलित अधिकार संगठन है. भीम आर्मी ने एलान किया है कि वो बिहार में 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी.
दो फ़िल्म निर्माताओं, विनोद कापड़ी और शाइन कृष्णा ने ज्योति को फ़िल्मों में काम करने का प्रस्ताव दिया. उनकी फ़िल्म आप्रवासी मज़दूरों के बारे में है. बाप-बेटी ने दोनों ही फ़िल्मों में काम करने के प्रस्ताव पर दस्तख़त कर दिए हैं. जिससे गफ़लत पैदा हो गई है और इस पर क़ानूनी लड़ाई भी शुरू हो गई है.
शाइन कृष्णा गोवा में रहने वाले फ़िल्मकार हैं. उन्होंने दरभंगा आकर ज्योति के परिवार से मुलाक़ात की थी और उन्होंने परिवार को फ़िल्म साइन करने के लिए कुछ पैसे भी दिए थे. वहीं, विनोद कापड़ी का कहना है कि परिवार को इस बात का फ़ैसला करना होगा कि वो किसकी फ़िल्म में काम करना चाहते हैं.
विनोद कापड़ी ने एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाने के लिए ख़ुद भी आप्रवासी मज़दूरों के साथ यात्रा की थी. वो कहते हैं, "ज्योति, साहस की प्रतीक हैं. ये पूरा क़िस्सा इतना लंबा सफ़र साइकिल से करने के फ़ैसले का है. मैं ये समझना चाहता था कि ज्योति ने ये फ़ैसला किस वजह से लिया."
लेकिन, ज्योति पर वो एक फ़ीचर फ़िल्म बनाना चाहते हैं. ज्योति के पिता मोहन पासवान कहते हैं कि फ़िल्म निर्माता ने उन्हें, एडवांस के तौर पर 51 हज़ार रुपये दिए थे, जिसे उन्होंने घर बनवाने में ख़र्च कर दिया. वहीं ज्योति कहती हैं, "मैं पढ़ना चाहती हूँ और अपनी ज़िंदगी में कुछ करना चाहती हूं."
दावे और उनपर उठते सवाल
मोहन पासवान के साथ इस साल जनवरी महीने में हादसा हो गया था. वो गुरुग्राम में अपने ई-रिक्शा से कहीं जा रहे थे. उन्हें देखने के लिए ही ज्योति भी अपनी माँ और जीजा के साथ गुरुग्राम पहुँची थी. ये 30 जनवरी की बात है.
10 दिन बाद उनकी माँ गाँव लौट आई थी. उन्होंने ज्योति को देखभाल के लिए पिता के पास छोड़ दिया था. क्योंकि, मोहन की हालत सफ़र के लायक़ नहीं थी.
मोहन पासवान ई-रिक्शा चलाते थे और रोज़ क़रीब 400-500 रुपए कमा लेते थे. लेकिन, एक्सीडेंट के बाद परिवार के पास कमाई का कोई और ज़रिया नहीं बचा था. अकेले फूलो देवी की कमाई से आठ लोगों के परिवार का ख़र्च चलाना पहले ही मुश्किल था. ऊपर से उस महीने तनख़्वाह आई भी नहीं.
25 मार्च को अचानक पूरे देश में लॉकडाउन लगा दिया गया. ज्योति कहती है कि ये उनके लिए दिल तोड़ने वाला था. उनके पास न दवा के पैसे थे, न खाने-पीने के. वो खाने के लिए उस लाइन में खड़ी हो जाती थी, जहाँ पर लोग खाना बाँटने आते थे. कई बार तो उसका नंबर आने से पहले ही खाना ख़त्म हो जाता था और उन्हें ख़ाली हाथ लौटना पड़ता था. ख़ाली पेट वक़्त गुज़ारना पड़ता था.
तभी, मई महीने में किराने की एक दुकान में ज्योति की मुलाक़ात कुछ आप्रवासी कामगारों से हुई. वो सभी साइकिल से गाँव लौटने की योजना बना रहे थे. तब ज्योति ने एक हज़ार रुपए की गुलाबी रंग की एक साइकिल ख़रीदी. उन्होंने दुकानदार को 500 रुपए दिए. दुकानदार के 500 रुपए उस पर अब भी उधार हैं.
फिर, उन्होंने अपनी माँ को फ़ोन करके बताया कि वो दोनों घर आ रहे हैं. माँ बहुत परेशान हो गई. उन्होंने ज्योति से पूछा भी कि वो ठीक-ठाक गाँव तो पहुँच जाएगी? लेकिन, ज्योति कहती हैं कि उन्हें पता था कि वो क्या करने जा रही हैं.
ख़बरों के मुताबिक़, बाप-बेटी 10 मई की रात 10 बजे गुरुग्राम से रवाना हुए थे.
सफर के पहले दो दिन तो ज्योति के लिए बेहद मुश्किल भरे थे. लगातार साइकिल चलाने से उनके शरीर में बहुत तकलीफ़ होती थी. जब वो आगरा से होकर गुज़रे, तो उन्होंने बड़ी दूर से ही ताजमहल का चमकता हुआ गुम्बद देखा था. उन्हें आज भी याद है कि ताजमहल को देख कर वो दोनों मुस्कुराए थे.
ज्योति कहती हैं, "ये सफ़र बहुत मुश्किल था. न हम ठीक से खा पाते थे और न ही सो पाते थे. लेकिन अब मैं बहुत ख़ुश हूँ."
वो रास्ते में सड़क किनारे सो जाया करते थे और अपना खाना दूसरों से बाँट कर खाते थे.
मोहन पासवान बताते हैं कि उनके साथ मुसलमानों का एक परिवार था. जिसमें छह लोग थे. वो बिहार के ही अररिया ज़िले के रहने वाले थे.
हालाँकि कई स्थानीय लोग ज्योति और उनके पिता के दावे पर सवाल भी उठाते हैं. कई लोग ये भी दावा करते हैं कि ज्योति और उनके पिता ने रास्ते में कई बार लिफ़्ट ली.
ज्योति की कहानी सबसे पहले छापने वाले अलिंद्र ठाकुर कहते हैं कि भले ही रास्ते में उन्होंने लिफ़्ट ली हो. लेकिन पिता को बिठाकर इतनी दूर साइकिल चलाना कोई मामूली बात नहीं है.
उस सुबह, ज्योति के पिता ने हमें उनसे स्कूल में नहीं मिलने दिया. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि हमें ज्योति के स्कूल से घर लौटने का इंतज़ार करना होगा.
'सब पैसे का खेल है, पैसा ही जात है'
उससे एक रात पहले, ज्योति का परिवार अपने नए मकान की पहली मंज़िल पर इकट्ठा हुआ था. अब निचली जाति का होने के बावजूद गाँव में उनका बहिष्कार नहीं होता. बल्कि, फूलो देवी तो ये कहती हैं कि अब तो बाबू साहब लोग हमारे घर चाय पीने आना चाहते हैं. ये सब तो पैसे का खेल है. फूलो देवी कहती हैं कि "पैसा ही जात है."
फूलो देवी को आज भी वो दिन याद है, जब दोनों गाँव पहुँचे थे. बेटी तो सूख कर काँटा हो गई थी. उनके हाथ और पैर में घाव थे. वो थकी-थकी रहती थी. उस समय बहुत से लोग ज्योति से मिलने आते रहते थे. लेकिन, अब कोई नहीं आता. मीडिया ने अब दूसरी कहानियाँ तलाश ली हैं. शोहरत की वो चकाचौंध ग़ायब है.
अब सुर्ख़ियाँ बटोरने वाले वो पल इतिहास बन चुके हैं. पिता और बेटी को एक मशहूर टीवी शो सारेगामा में भी बुलाया गया था. मोहन पासवान को अब सरकारी नौकरी चाहिए. मोहन को पता है कि बैंक में जमा पैसे समय से पहले भी ख़त्म हो सकते हैं.
'गांव का कोई फ़ायदा नहीं हुआ'
अब ज्योति के पास ख़ुद अपने नाम से बैंक में फ़िक्स्ड डिपॉजिट हैं. अब वो दरभंगा में पढ़ाई करना करना चाहती हैं. ज्योति अब एक स्थानीय कोचिंग सेंटर में भी पढ़ने जाया करती हैं. ज्योति की बहन मानसी और उनके दो छोटे भाइयों को पढ़ाने के लिए एक अध्यापक घर भी आते हैं. तीनों भाई-बहन पास के ही एक स्कूल में पढ़ते हैं.
अब पिता को इस बात की फ़िक्र ज़्यादा है कि घर का प्लास्टर और रंगाई-पुताई कैसे हो.
अब लोग ज्योति को उसके साहस के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से नामांकित करने की बातें भी कर रहे हैं. ज्योति को वो दिन याद आते हैं, जब लोग उनसे मिलने के लिए क़तार लगाए रहते थे.
जब मैंने चलते हुए उनकी ओर देख कर हाथ हिलाया, तो वो एक कोने में खड़ी थी.
मकान के दूसरे छोर पर 30 बरस के गणेश राम खड़े थे. वो मुंबई में काम करते थे और लॉकडाउन से पहले ही मुंबई से गाँव लौटे थे. वो तब से गाँव में ही अटके हैं.
गणेश राम कहते हैं, "अगर लॉकडाउन से किसी को फ़ायदा हुआ है, तो वो ज्योति का परिवार है. ज्योति ने हमारे गाँव को मशहूर बना दिया. लेकिन इससे ज़्यादा हमारी ज़िंदगी में कुछ नहीं बदला."(bbc)
- पवन वर्मा
आज़ादी के समय भारत के अलग-अलग हिस्सों और समुदायों के बीच तकरीबन 30 तरह के कैलेंडर/पंचांग प्रचलित थे. इतने कैलेंडर होने की वजह से अमूमन तीज-त्यौहार की तिथियां अलग-अलग हो जाने से अक्सर उन्हें मनाए जाने की तारीख को लेकर भ्रम की स्थिति बनी रहती थी. इसका असर प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर भी पड़ता था. तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू इतने सारे कैलेंडरों को सांस्कृति समृद्धि की निशानी तो स्वीकार करते थे लेकिन वे यह भी मानते थे कि इतनी तरह के कैलेंडर देश के एकीकरण में बाधक हैं. देश के लिए एकीकृत कैलेंडर की ज़रूरत महसूस करते हुए 1952 में उन्होंने विज्ञान और प्रौद्योगिकी अनुसंधान परिषद के अंतर्गत एक कैलेंडर सुधार समिति का गठन किया था.
देश के प्रसिद्ध खगोल विज्ञानी मेघनाद साहा इसके अध्यक्ष थे. एकीकृत कैलेंडर के निर्माण में इस समिति के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि यहां प्रचलित कुछ कैलेंडरों का आधार नितांत धार्मिक था. इसलिए समिति को डर हुआ कि एक राष्ट्रीय कैलेंडर की बात लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा सकती थी. नेहरू जी के इस बात का एहसास था, इसलिए उन्होंने शुरूआत में ही डॉ साहा को एक पत्र लिखकर स्पष्ट कर दिया कि जिस ग्रिगोरियन कैलेंडर का इस्तेमाल दुनिया के तमाम देशों में सरकारी स्तर पर होता है, उसमें भी कई वैज्ञानिक खामियां हैं. इसलिए हमारे राष्ट्रीय कैलेंडर के निर्माण में यह ध्यान रखा जाएगा कि यह पूरी तरह से विज्ञानसम्मत हो. नेहरू जी की इस बात के प्रचार-प्रसार से इस मसले पर विवाद की गुंजाइश खत्म हो गई.
कैलेंडर सुधार समिति ने 1955 में अपनी रिपोर्ट दी और राष्ट्रीय कैलेंडर के निर्माण के लिए कुछ सिफारिशें कीं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश थी कि कैलेंडर का आधार शक संवत (78 ईसवी से शुरू) होगा और इसका पहला दिन ग्रेगोरियन कैलेंडर के हिसाब से 22 मार्च (21 मार्च को सूर्य विषुवत रेखा पर ठीक सीधा चमकता है) से शुरू होगा. चैत्र इस कैलेंडर का पहला और फाल्गुन आखिरी महीना होगा. इन सिफारिशों के आधार पर बना कैलेंडर 22 मार्च, 1957 को सरकारी स्तर पर ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ स्वीकार कर लिया गया.
आमतौर पर सरकारी गजट, आकाशवाणी, सरकार द्वारा आम जनता के लिए जारी संदेशों/प्रपत्रों में इस कैलेंडर की तिथि का उल्लेख किया जाता है, लेकिन यह कैलेंडर वैज्ञानिक नजरिए से अधिक शुद्ध होने के बाद भी प्रचार-प्रसार के अभाव में कभी आम जनता के बीच प्रचलित नहीं हो पाया.(satyagrah)
- Swati Singh
रीमा (बदला हुआ नाम) और आदित्य (बदला हुआ नाम) ने लव मैरिज की थी। यूपी की रीमा और बिहार के आदित्य की मुलाक़ात कॉलेज के टाइम पर हुई थी। उनके रिश्ते के बारे में घर वालों को मालूम था। आदित्य तथाकथित ऊँची जाति से था और रीमा पिछड़ी जाति से। इसलिए मान-प्रतिष्ठा के नामपर शादी में आदित्य के घरवाले शामिल नहीं हुए। पर दोनों परिवारों में संबंध अच्छे थे। रीमा से ससुराल के लोगों की बात होती और अक्सर ननदोई का भी फ़ोन आता, लेकिन मज़ाक़ के नामपर उनकी यौनिक टिप्पणियाँ रीमा को हमेशा परेशान करती और वो हमेशा चुप हो जाती। रीमा की चुप्पी से ननदोई का मन बढ़ता और मज़ाक़ निचले स्तर पर जाने लगा। आख़िरकार रीमा ने आदित्य को इसके बारे में बताया जिसके बाद से आदित्य के घरवालों ने रीमा से बात करना बंद कर दिया, ये कहते हुए कि ‘पिछड़ी जात से है। ज़्यादा नाज़ुक बन रही है। आख़िर सरहज और ननदोई तो मज़ाक़ के रिश्ते होते है।’
आजकल हमलोग आए दिन समाज में बलात्कार और यौन उत्पीड़न की बढ़ती घटनायें देख रहे है। क्या गाँव और क्या शहर, महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा मानो अपनी संस्कृति का हिस्सा बनता जा रहा है। हर बार हाथरस और निर्भया रेप जैसी घटनाओं के बाद हम सरकार को घेरते है और क़ानून-व्यवस्था व प्रशासन पर ऊंगली उठाते है, लेकिन इसमें अपनी भागीदारी कभी नहीं देखते या देखना ही नहीं चाहते है। कई रिपोर्ट में सामने आया है कि यौन हिंसा से जुड़े अधिकतर मामलों में किसी जान-पहचान और कई बार परिवारवालों का हाथ होता है। ऐसे में ‘परिवार’ जो समाज की पहली इकाई है उसकी संरचना, व्यवस्था और वैचारिकी ही समाज की दिशा और दशा तय करती है, क्योंकि यौन हिंसा करने वाले पुरुष किसी प्रशासन या सरकारी योजना से नहीं बल्कि हमारे अपने परिवार-समाज में तैयार किए जाते है और ये तैयारी होती है हमारे आसपास के माहौल में। वो माहौल जिसकी हवा में पितृसत्ता बहती है, जो हमेशा महिला-पुरुष में भेद करना और पुरुष को सत्ताधारी बताने का काम करती है।
रीमा कोई अकेली नहीं जिसे रिश्ते के नामपर यौनिक हिंसा का सामना करना पड़ा। हमारे समाज में ‘जीजा-साली’ और ‘देवर-भाभी’ जैसे तमाम ऐसे रिश्ते है जिनको ‘मज़ाक़ का रिश्ता’ कहा जाता है। यानी वो रिश्ते जहां पुरुषों की तरफ़ से किया जाने वाले किसी भी तरह के बात-व्यवहार को बुरा मानना या उनका इनकार करना रिश्तों की तौहीन समझा जाता है। जब भी हम समाज में बलात्कार की संस्कृति की बात करते है तो ज़रूरी है कि हम ऐसे रिश्तों के नामपर होने वाली यौन हिंसाओं को उजागर कर उनका विश्लेषण करें। क्योंकि ये रिश्ते ही तो है जो पुरुष की यौन कुंठाओं वाले भद्दे-फूहड़ मज़ाक़-व्यवहार को सामान्य और महिला की सहमति उसकी ‘ना’ को बग़ावत के रूप में परिभाषित कर, उन्हें ‘बुरी औरत’ के पाले में खड़े कर देते है।
ऐसे रिश्तों का सबसे वीभत्स रूप अक्सर शादी के बाद देखने को मिलता है, जब महिला शादी होकर अपने ससुराल जाती है और उसके ऊपर हर पल ख़ुद को आदर्श बहु साबित करने का दबाव बनाया जाता है तो ऐसे में ‘मज़ाक़ वाले रिश्ते’ के नामपर यौन कुंठित पुरुष अपनी कुंठा को मिटाने के लिए सबसे ज़्यादा हाथ धोते है। उन्हें ये मालूम होता है कि महिला ‘इज़्ज़त’ और ‘रिश्ते’ के नामपर ‘ना’ नहीं कह सकती, किसी से शिकायत नहीं कर सकती और अगर कह भी दिया तो दोष उसी पर दिया जाएगा, ये कहते हुए कि उसने किसी कुंठित इंसान का नहीं बल्कि परिवार के दमाद, बेटे या भतीजे का अपमान किया है। हो सकता है ये आपको सामान्य लगे, तो बता दें इसकी दो वजहें हो सकती है – एक तो ये कि आप विशेषाधिकारी है, जिन्हें कभी भी ऐसे किसी रिश्तेदार का सामना नहीं करना पड़ा। और दूसरा – आप इन ‘मज़ाक़’ के इतने अभ्यस्त हो है कि इसमें कोई बुराई नहीं लगती आपको, बल्कि ये आपको संस्कृति लगती है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी परिवार में ऐसे रिश्तेदार का व्यवहार परिवार में यौन हिंसा से पीड़ित महिला को ही नहीं बल्कि बच्चों के भी ऊपर बुरा असर डालता है, क्योंकि जाने-अनजाने उनके मन में भी उस रिश्ते के नामपर छवि बन रही होती है, जिसका मूल होता है – नकारात्मक मर्दानगी। यानी कि पुरुष जो भी चाहे और जैसे भी चाहे महिला के साथ व्यवहार करे ये उसका अधिकार है और महिला उसको ‘ना’ नहीं कह सकती है। अगर वो ऐसा करती है तो वो अच्छी औरत नहीं होगी।
ज़रूरी है ऐसे हर ‘मज़ाक़ के रिश्ते और उसके व्यवहार’ का विरोध किया जाए, जो महिलाओं के विरुद्ध यौनिक हिंसा को सामान्य बनाते है।
जिस रिश्ते में सम्मान नहीं वो स्वीकार नहीं
अगर आप वाक़ई में महिला के ख़िलाफ़ बढ़ती यौन हिंसा से परेशान है और इसे रोकना चाहते है तो इसकी शुरुआत अपने घर-परिवार और रिश्तों से कीजिए। क्योंकि हो सकता है छोटे देवर के नामपर एक पुरुष ने अपनी भाभी के साथ जो भी यौनिक टिप्पणियाँ और व्यवहार किया हो उसका ज़वाब भाभी ने अपनी चुप्पी से दिया, जिसे पुरुष ने उनकी सहमति मान ली और महिलाओं के प्रति ऐसा व्यवहार उसके लिए सामान्य होता गया, जो बलात्कार की संस्कृति का हिस्सा है। इसी संस्कृति का नतीजा इसलिए ज़रूरी है ऐसे हर ‘मज़ाक़ के रिश्ते और उसके व्यवहार’ का विरोध किया जाए, जो महिलाओं के विरुद्ध यौनिक हिंसा को सामान्य बनाते है। इसी संस्कृति का नतीजा है कि पुरुषों के लिए यौन उत्पीड़न करना सामान्य होता जाता है और जैसे ही उन्हें कोई महिला ‘ना’ कहती है तो वो बलात्कार और एसिड अटैक जैसे घटनाओं जैसे अपराधों को भी अंजाम देते है। इसके साथ ही, महिला की सहमति उसके ‘हाँ’ या ‘ना’ कहने के अधिकार को समझे और स्वीकारें।
क्योंकि जब हम महिलाओं के विरुद्ध होने वाली यौनिक हिंसाओं का विश्लेषण करते है तो अक्सर यही पाते है कि ये हिंसा ‘बदले’ की भावना से की जाती है और ‘बदला’ इस बात का उसने मुझे ‘ना’ कैसे कह दिया। ये विचार ही हर यौन हिंसा का मूल है, जिसे हमलोगों ने अपने पितृसत्तात्मक भारतीय समाज के पुरुषों को बनाते समय उनकी संरचना में शामिल किया है। इसलिए पुरुषों को महिला की ‘सहमति’ न तो सुनाई देती है और न समझ में आती है। इसलिए ज़रूरी है कि ‘सहमति’ के विचार को समझकर उसे अपने व्यवहार में लागू किया जाए और अपने घर-परिवार में भी इसे लागू किया जाए। इसके साथ ही, जब कभी भी कोई महिला (बहु, बेटी या बहन) के रूप में किसी भी रिश्ते से होने वाली यौन हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाए तो उसका साथ दीजिए, क्योंकि आपका साथ ही उन्हें बल देता है, ‘ग़लत के ख़िलाफ़’ खड़े होने का। सच कहने का और हिंसा न सहने का।
(यह लेख पहले फेमिनिज्मइनइंडियाडॉटकॉम पर प्रकाशित हुआ है।)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत अब शादियों के मामले में क्रांतिकारी कदम उठाने वाला है। अभी तक भारतीय कानून के मुताबिक वर की आयु 21 वर्ष और वधू की आयु 18 वर्ष है। इससे कम आयु के विवाह अवैध माने जाते हैं। यह कानून मुसलमानों पर लागू नहीं होता है। वे शरिया के मुताबिक विवाह की आयु तय करते हैं। देश में विवाहों के आंकड़े अगर सही तौर पर इक_े किए जा सकें तो हमें पता चलेगा कि देश में ज्यादातर विवाह कम आयु में ही हो जाते हैं। उनमें ज्यादातर ग्रामीण, पिछड़े गरीब और अशिक्षित परिवारों के युवा लोग ही होते हैं। भारतीय शास्त्रों में 25 वर्ष की आयु तक ब्रह्मचारी रहने का विधान है लेकिन इस परंपरा के भंग होने के कई कारण रहे हैं। उनमें एक कारण तो यह भी रहा है कि अपनी कुंवारी बेटियों को विदेशी हमलावरों के बलात्कार से बचाने के लिए उनके शैशव-काल में ही उनका विवाह घोषित कर दिया जाता था। गरीबी से बचने के लिए बेटियों को शादी के नाम पर बेच देने का अपकर्म भी शुरू हो गया है लेकिन अब सरकार की मंशा है कि शादी के लिए कन्या की उम्र को 18 साल से बढ़ाकर 21 साल कर दिया जाए। वधू की आयु वर के बराबर कर दी जाए।
यह अच्छा होगा लेकिन भारत सरकार से उम्मीद है कि वह इससे भी बेहतर करेगी। थोड़ा आगे बढ़ेगी। भारत में वर और वधू की न्यूनतम आयु 25-25 साल क्यों नहीं कर दी जाती ? दुनिया के वे देश काफी पिछड़े हैं, जिनमें कम आयु के लोग शादी करते हैं। जो देश संपन्न है, शक्तिशाली हैं और जिनमें आम आदमियों का जीवन-स्तर बेहतर है, उनमें वर-वधू की आयु प्राय: 30 वर्ष के आस-पास होती है। वहां भी छोटी उम्र में कुछ विवाह हो जाते हैं और विवाहरहित यौन-संबंध तो होते ही हैं, फिर भी देर से शादी करने के कई फायदे राष्ट्रीय और व्यक्तिगत स्तर पर भी दिखाई पड़ते हैं। एक तो स्त्रियां रोजगार में ज्यादा स्थान पाती हैं। दूसरा, गृहस्थ आत्म-निर्भर बन जाता है।
तीसरा, प्रजनन में मृत्यु-दर घट जाती है। चौथा, जनसंख्या नियंत्रण स्वत: हो जाता है। पांचवां, वर-वधू दीर्घजीवी हो जाते हैं। इसीलिए मैं शादी की न्यूनतम आयु 25 वर्ष रखने पर जोर देता हूं। वर-वधू की आयु समान रखना स्त्री-पुरुष समानता का भी प्रमाण है। इस संबंध में जो भी कानून बने, वह सब नागरिकों पर समान रूप से और सख्ती से लागू होना चाहिए। जो सरकार कानून बनाकर तीन तलाक की कुप्रथा को समाप्त कर सकती है, वह वर-वधू की आयु को 25 वर्ष क्यों नहीं कर सकती ? सरकार करे या न करे, जनता को इस राह पर चलने से किसने रोका है ?
(नया इंडिया की अनुमति से)
-कनक तिवारी
कल स्मिता पाटिल की पुण्यतिथि थी। कल लिख नहीं पाया। आप पढ़ लेंगे तो अच्छा लगेगा।
सत्तर के दशक से मैंने दुर्ग सिविल न्यायालय में वकालत करनी शुरू की थी। बमुश्किल दो तीन बरस हुए होंगे हबीब तनवीर से आत्मीय परिचय होने के कारण उनकी खबर आई कि, वे कुछ लोगों के साथ मेरे दफ्तर आ रहे हैं। नाम नहीं बताए। स्टेशन रोड में एक किराए के मकान में प्रथम तल पर मेरा ऑफिस था। हबीब साहब तीन लोगों के साथ आए थे। श्याम बेनेगल को मैं जानता था। उन्होंने आते ही तपाक से मुझसे हाथ मिलाया। ऐसे मिले मानो वर्षों से जानते हैं। मुझे मालूम था कि दुर्ग के निकट स्थित ग्राम चंदखुरी के स्थानीय चर्म कारीगरों द्वारा बनाई गई पूरी छत्तीसगढ़ी नस्ल की सैंडिलें जिन्हें भदई या भदही कहते हैं, पहनने में उन्हें बहुत सुख मिलता था। उस दिन भी पहने हुए थे। वे दरअसल एक फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में आए थे। जहां तक याद है शायद चरणदास चोर की। मुझसे कुछ स्पॉट या बाह्य स्थल दुर्ग के निकट जानने चाहे जहां उनके बताए कथानक के अनुरूप दृश्य की शूटिंग की जा सके। जो कुछ मेरी समझ थी, वे सब जगहें मैंने उन्हें विस्तार से बता दीं।
सामने बालकनी में जाकर श्याम बेनेगल ने नीचे देखा। सडक़ की दूसरी ओर पटरी (प्लैटफार्म) पर एक धोबी कपड़ों पर इस्तरी कर रहा था। वह दृश्य उन्हें बहुत अच्छा लगा और उनका कैमरा तुरंत खिल उठा। दुर्ग की सबसे मशहूर कचौरियां मिलने वाली जलाराम की दूूकान ठीक सामने थी। उन सबको कचैरियां और मशहूर पेड़े खिलाए गए। मेरी पत्नी भी साथ थीं। उन्हें फिल्मों में मुझसे ज्यादा रुचि हैै। एक खूबसूरत महिला साथ आई थी। जैसे कुछ भूलते हुए याद करते हबीब तनवीर ने परिचय कराया ये सबा जै़दी हैं। तब मुझे उनकी रचनात्मकता, कला के प्रति उनकी लगन और समझ तथा तब तक की उनकी भूमिका के बारे में कुछ मालूम होने का सवाल ही नहीं था। यह तो बाद में पता चला कि वे मशहूर शायर हाली की वंशज हैं और उन्होंने काफी सार्थक रचनात्मक काम किया है। उनसे बातें करना खुशगवार मौसम बुनने जैसा था। उनमें भी हमारी जिज्ञासाओं को शांत करने की ललक थी।
एक और युवती आई थी। सांवले नाकनक्श, तीखी बोलती हुई आंखें, नीले रंग की जींस और मटमैले जामुनी रंग की टी शर्ट पहने हुए। नजरें तीखी थीं लेकिन चेहरे पर कोई मेकअप नहीं किया था। चलताऊ ढंग से हबीब साहब ने परिचय कराया ये स्मिता पाटिल हैं। उन्हें लगा हमने नाम तो सुन रखा होगा। लेकिन तब तक स्मिता पाटिल से प्रभावित होने का अंकुर मुझमें फूटा नहीं था। उनकी लगभग अनदेखी करते सबा जैदी से बतियाने में ज्यादा सौंदर्यात्मक सार्थक कला क्षण महसूस होता रहा था। ठीक वैसा जैसे मसालेदार कचैरियां और स्वादिष्ट पेेड़े खाने में मिलता हैं। वे सीढिय़ां उतर गए, चले गए।
बाद के वर्षों में स्मिता पाटिल के अभिनय के समुद्र में ज्वार आया। तब कोफ्त हुई और अब तक हो रही है कि वह मनहूस दिन हमें क्यों नहीं समझा पाया कि स्मिता पाटिल से बहुत देर तक गुफ्तगू करनी चाहिए थी। बल्कि उनका पता भी ले लेना चाहिए था। स्मिता बीच बीच में अपनी ओर से पहल करने कुछ कहतीं भी तो हम उनकी तरफ मुनासिब ध्यान नहीं देकर बेअदबी भी दिखा रहे थे। हमें ऐसा भी लगता यह महिला हमारे और सबा ज़ैदी के वार्तालाप के बीच हस्तक्षेप है। हमारी वह बेरुखी आज हमारे चेहरे पर विद्रूप की फसल उगा रही है। हमने ऐसा क्यों किया? वह हमें नहीं करना चाहिए था। एक संभावना की भ्रूण हत्या हमने ही कर दी। भ्रूण हत्या तो स्मिता के कलात्मक जीवन की भी हो गई जो परवान चढ़ते-चढ़ते कुदरत के कहर से नीचे मौत के मुंह में ढहा दिया गया।
स्मिता की आंखें आज सवाल पूछ रही हैं। वे कितनी बोलती हुई थीं। वे आवाज़ में उस दिन भी हमें देख रही थीं। आज भी देख रही हैं। हीरे को पत्थर समझा!
.- मनीष कुमार
बिहार पिछले कई सालों से गठबंधन की राजनीति का बेहतर प्रयोग स्थल साबित हुआ है. यहां क्षेत्रीय दल बड़े तो राष्ट्रीय दल छोटे भाई की भूमिका में रहे हैं. इस साल हो रहे चुनावों से पहले गठबंधनों में हलचल दिख रही है.
बिहार में 28 अक्टूबर, तीन व सात नवंबर को तीन चरणों में होने वाले विधानसभा चुनाव में एक बार फिर कई पार्टियों के गठबंधन एक-दूसरे के सामने हैं. कुछ ने पुराने साथियों को छोड़ दूसरे का दामन थामा है तो कुछ नए गठबंधन भी अस्तित्व में आए हैं. ऐसा तकरीबन पिछले चुनावों में भी होता रहा है लेकिन इस बार गठबंधन के घटक दल भी एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोंकते नजर आएंगे. दरअसल, इस बार चुनाव के बाद के परिदृश्य पर सियासत की नजर है जिसने चुनाव को कुछ ज्यादा ही दिलचस्प बना दिया है.

राज्य में एक तरफ महागठबंधन में राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस व वामपंथी पार्टियां हैं तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), जनता दल यूनाइटेड (जदयू) व लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) हैं. सत्तारूढ़ एनडीए में जदयू बड़े भाई की भूमिका में है तो महागठबंधन में राजद बड़े भाई की भूमिका निभा रहा है. चुनाव की घोषणा होने के पहले तक महागठबंधन के साथ पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा), पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) व मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआइपी) थी. किंतु विधानसभा चुनाव के लिए कोर्डिनेशन कमिटी नहीं बनाए जाने के नाम पर हम और रालोसपा महागठबंधन से अलग हो गई. एक भी सीट नहीं दिए जाने के कारण वीआइपी ने भी साथ छोड़ दिया. उपेंद्र कुशवाहा ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ गठबंधन बना लिया तो मांझी अपने पुराने साथी एनडीए के साथ जा मिले वहीं मुकेश सहनी अपना ठिकाना तलाशने में जुटे हैं.

यह टूट-फूट तो सामान्य थी जो हर बार चुनाव के मौके पर देखने को मिलती है. सबसे अप्रत्याशित तो एनडीए में हुआ. जैसे ही मांझी आए, उन्होंने कहा कि हमारा गठबंधन जदयू से है. उसी तरह लोजपा ने कहा, हम जदयू नहीं भाजपा के साथ हैं. यानी गठबंधन के अंदर गठबंधन. सीटों के बंटवारे पर तो स्थिति ऐसी बिगड़ी कि लोजपा ने एनडीए के साथ रहते हुए जदयू के खिलाफ लड़ने का एलान कर दिया.
मणिपुर फार्मूले पर लड़ेगी लोजपा
लोजपा बिहार में भाजपा के साथ तो रहेगी लेकिन गठबंधन में उसके घटक दल जदयू के खिलाफ प्रत्याशी खड़े करेगी. मणिपुर फार्मूला यानि कि जैसे दिल्ली विधानसभा का चुनाव भाजपा-लोजपा ने मिलकर लड़ा, लेकिन झारखंड व मणिपुर में उनमें गठबंधन नहीं था. हालांकि चुनाव परिणाम के बाद भाजपा ने लोजपा के साथ मिलकर मणिपुर में सरकार बनाई. इसी फार्मूले के तहत भाजपा के साथ मिलकर लोजपा चुनाव बाद बिहार में सरकार बनाएगी. संसदीय बोर्ड की बैठक के बाद लोजपा प्रमुख चिराग पासवान ने यह कहकर एनडीए से नाता तोड़ा कि लोजपा बिहार फर्स्ट-बिहारी फर्स्ट के नारे के तहत अपने विजन डाक्यूमेंट के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी. उसका गठबंधन भाजपा से है न कि जदयू या हम से. वैचारिक मतभेद के कारण जदयू के साथ चल पाना संभव नहीं है. चुनाव के बाद भाजपा के साथ मिलकर लोजपा सरकार बनाएगी.

बिहार राजनीति के जानकार बताते हैं कि जिस तरह पिछले कुछ दिनों से चिराग सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा होते हुए नीतीश सरकार पर कोरोना के खिलाफ लड़ाई या फिर लॉक डाउन के दौरान मजूदरों की वापसी जैसे मुद्दे पर हमलावर थे, उससे यह आभास हो रहा था कि वे गठबंधन धर्म का निर्वहन अब शायद ही कर पाएंगे. नीतीश को तो वे घेरते रहे किंतु भाजपा पर कभी कुछ नहीं बोला. चिराग ने एनडीए से नाता तोड़ने के दो दिन पहले पीएम मोदी की तस्वीर के साथ एक ट्वीट किया था जिसमें उन्होंने कहा था कि नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व पर मुझे गर्व है. नरेंद्र मोदी से प्रेरणा लेकर ही लोजपा ने बिहार के चार लाख लोगों के सुझाव पर बिहार फर्स्ट-बिहारी फर्स्ट विजन डॉक्यूमेंट 2020 तैयार किया है.
लोजपा के बहाने जदयू को सबक सिखाने की कोशिश
एनडीए के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "भाजपा के शह के बिना चिराग इस कदर एक सोची-समझी रणनीति के तहत हमलावर नहीं हो सकते. कहीं न कहीं भाजपा बड़े भाई की भूमिका में आने के लिए जदयू को सबक सिखाना चाहती है." ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो रहा है. इससे पहले 2005 के चुनाव में कांग्रेस ने तटस्थ रहकर लोजपा के बहाने राजद को सबक सिखाया था ठीक उसी तरह इस बार भाजपा कर रही है. तभी तो जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक चौधरी कहते हैं, "लोकसभा चुनाव के दौरान प्रचार के लिए मुख्यमंत्री को ले गए तब मतभेद नहीं था तो क्या एससी-एसटी समुदाय के व्यक्ति की हत्या पर परिवार के सदस्य को नौकरी दिए जाने पर मतभेद है या फिर दलितों के उत्थान का बजट चालीस गुणा बढ़ाने पर मतभेद है."
जदयू का कहना है, "भाजपा ने मुख्यमंत्री के कार्यों को समझते हुए उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ने की घोषणा की है. उन्हें भाजपा पर पूरा भरोसा है. दरअसल बिहार में दलितों की आबादी 17 प्रतिशत के करीब है और इनमें दुसाध जाति का करीब पांच फीसद वोट है. यही पांच फीसद वोट लोजपा का अपना वोट बैंक है, जो लगभग हर चुनाव में लोजपा के साथ रहा है. पत्रकार एस पांडेय कहते हैं, "लोजपा के अलग होने से जदयू को पांच प्रतिशत वोट का नुकसान उठाना पड़ सकता है. जबकि भाजपा को अपनी सीट पर जदयू व लोजपा, दोनों का ही सहयोग मिलेगा. यह स्थिति भाजपा के लिए तो फायदेमंद हो सकती है किंतु नुकसान तो अंतत: एनडीए को ही पहुंचाएगी." इधर, लोजपा प्रमुख चिराग पासवान ने प्रदेश की जनता के नाम एक पत्र जारी कर खुलेआम नीतीश कुमार को वोट नहीं देने की अपील की है. कहा है, "जदयू के खिलाफ लड़ने का फैसला बिहार पर राज करने नहीं, बल्कि नाज करने के लिए लिया गया है. वे पीएम मोदी के सपनों को साकार करने के लिए बिहार में अकेले चुनाव लड़ रहे हैं. यदि आपने जदयू को वोट दिया तो आपके बच्चे पलायन को मजबूर होंगे."
सभी पार्टियों को घात-प्रतिघात का अंदेशा
महागठबंधन की अगुवाई कर रहे राजद के कर्ता-धर्ता तेजस्वी यादव ने चुनाव के बाद के परिदृश्य का गंभीरता से आकलन किया. तभी तो छोटे दलों की बजाय उन्होंने अपने पुराने साथियों पर भरोसा किया. परिणाम यह हुआ कि रालोसपा व वीआइपी जैसी छोटी पार्टी उनका साथ छोड़ गई. वीआइपी प्रमुख मुकेश सहनी का तो कहना है कि तेजस्वी यादव ने उनके साथ धोखा किया जबकि सबकुछ तय हो चुका था. राजनीतिक विश्लेषक प्रो. वाईके सिंह कहते हैं, "चुनाव बाद विधायकों को तोड़फोड़ से बचाने की रणनीति ने ही वीआइपी व रालोसपा को बाहर का रास्ता दिखाया. एक तो ये दोनों पार्टी बमुश्किल दो अंक का आंकड़ा पातीं और अगर पा भी जातीं तो एनडीए के लिए इन्हें तोड़ना ज्यादा कठिन नहीं होता. इनके विधायक हमेशा सॉफ्ट टारगेट ही बने रहते."
बिहार में कांग्रेस को बचाने की कोशिश
शायद यही वजह रही कि राजद ने बड़ा दिल दिखाते हुए अपने पास 144 सीटें रखीं तो कांग्रेस को 70 और वामपंथी दलों को 29 सीटें (माले-19, सीपीआई-6, सीपीएम-4) दे दीं. सीट बंटवारे के बाद तेजस्वी ने कहा भी कि हम ठेठ बिहारी हैं, जो वादा करते हैं उसे निभाते हैं. जबकि कांग्रेस की स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष अविनाश पांडेय का कहना था, "कुछ मुद्दों पर हममें मतांतर हो सकता है, परंतु बिहार को बचाने के मुद्दे पर हम पूरी तरह से एकजुट हैं." राजद ने प्रथम चरण के 32 सीटों पर प्रत्याशी तय कर लिए हैं और सिंबल देना भी शुरू कर दिया है. दिलचस्प यह कि राजद के घोर विरोधी रहे बाहुबली विधायक अनंत सिंह को पार्टी ने मोकामा से अपना उम्मीदवार घोषित किया है. वामदलों ने भी अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं.
जवाहर लाल नेहरू (जेएनयू) विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व महासचिव संदीप सौरभ को माले ने पटना के पालीगंज विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया है. कांग्रेस ने भी प्रत्याशी तय कर लिए हैं किंतु घोषणा नहीं की गई है. जदयू द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को एनडीए में शामिल कराए जाने व लोजपा के निकल जाने के बाद भाजपा वीआइपी प्रमुख मुकेश सहनी पर डोरे डाल रही है. सूत्रों के अनुसार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से उनकी मुलाकात हो चुकी है और शायद बात बन भी गई है. वैसे अभी कोई औपचारिक बयान नहीं आया है.
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मुकेश रालोसपा और पप्पू यादव द्वारा बनाए गए गठबंधन प्रगतिशील डेमोक्रेटिक एलायंस (पीडीए) के भी संपर्क में बताए जाते हैं. जानकार बताते हैं कि महागठबंधन में सीट शेयरिंग मामले का आसानी से सुलझ जाने से एक नया समीकरण बनने से पहले ही समाप्त हो गया. अगर कांग्रेस को मनोनुकूल सीट नहीं मिलती तो वह वीआइपी जैसी छोटी पार्टी को लेकर जदयू के साथ जा सकती थी. कांग्रेस को पता था कि चिराग के कारण जदयू असहज चल रही है. यही वजह है कि लोजपा ने जदयू के खिलाफ लड़ने की घोषणा भी देर से की. इधर, जदयू ने भी प्रथम चरण की अपनी 32 सीटों के लिए प्रत्याशियों की घोषणा करते हुए उन्हे सिंबल देना शुरू कर दिया. पार्टी ने जर्नादन मांझी, सुबोध राय व ददन पहलवान को छोड़ सभी सिटिंग एमएलए को टिकट दे दिया है.

तेजस्वी-तेजप्रताप पर हत्या का मुकदमा
चुनावी रंजिश में आरोप-प्रत्यारोप आम है, किंतु ऐसा संभवत: पहली बार हुआ है जब किसी राजनेता के खिलाफ चुनाव में टिकट के लिए पैसे नहीं दिए जाने पर हत्या का आरोप लगाया गया हो. ऐसा मामला पूर्णिया में सामने आया है जहां खंजाची हाट थाने में राजद के एससी-एसटी प्रकोष्ठ के पूर्व प्रदेश सचिव शक्ति मलिक की हत्या के आरोप में लालू प्रसाद के दोनों बेटों तेजस्वी यादव व तेजप्रताप यादव समेत छह के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है. शक्ति की पत्नी खुशबू ने पुलिस को बताया कि शक्ति रानीगंज (सुरक्षित) सीट से राजद टिकट के दावेदार थे. राजद नेता तेजस्वी यादव और एससी-एसटी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष अनिल कुमार उर्फ साधु यादव ने टिकट देने के लिए 50 लाख रुपये मांगे थे. शक्ति ने करीब दस दिन पहले एक वीडियो वायरल कर आरोप लगाया कि राजद में टिकट के लिए पैसे मांगे जाते हैं. उसने राजद नेताओं द्वारा अपनी हत्या की आशंका भी जताई थी.
इस संबंध में पूर्णिया के एसपी विशाल शर्मा ने कहा है कि जरूरत पड़ने पर इस मामले से जुड़े हर व्यक्ति से पूछताछ की जाएगी. वहीं इस हत्याकांड को लेकर प्रदेश की राजनीति गर्म हो गई है. भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा व संजय मयूख ने कहा है कि तेजस्वी-तेजप्रताप इस मामले पर चुप क्यों हैं. राजद को इसका जवाब देना होगा. दलित नेता की पत्नी ने दोनों पर साफ तौर से उगाही के आरोप लगाए हैं. वहीं राजद ने इसे तेजस्वी से डरे हुए लोगों की साजिश करार दिया है. इसे सत्ता पक्ष की साजिश बताते हुए सांसद मनोज झा ने कहा है कि जिस नंबर से पैसा मांगने का आरोप है वह चार साल से बंद है. तेजस्वी के सीएम उम्मीदवार घोषित होने से विपक्ष बौखला गया है.
दो दिन पहले तक एकतरफा दिख रहा चुनावी परिदृश्य काफी हद तक बदल गया है. ऐसी कई सीटें जहां पिछले चुनावों में सीधा मुकाबला था, वहां त्रिकोणात्मक संघर्ष की स्थिति बन जाएगी. यह तो 10 नवंबर को पता चलेगा कि कितनी सीटों पर लोजपा वोटकटवा की भूमिका में रही या फिर कांग्रेस ने एनडीए की राह आसान की. किंतु इतना तय है कि सोशल इंजीनियरिंग के सिद्धहस्त खिलाड़ी नीतीश कुमार ने जिस तरह से राजद, वामदल या फिर लोजपा के वोट बैंक में लगातार सेंधमारी कर अपना जनाधार तेजी से बढ़ाया, वे इतनी आसानी से बाजी अपने हाथ से जाने नहीं देंगे.(dw)
- मनीष कुमार
बिहार विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है वैसे-वैसे सभी राजनीतिक दलों को बगावत से जूझना पड़ रहा है. कभी उनके अपने रहे ये बागी चुनौती का सबब बनते जा रहे हैं.
बिहार में तीन चरणों में विधानसभा चुनाव के चुनाव हो रहे हैं. सभी पार्टियों में टिकट वितरण का कार्य पूरा हो चुका है. प्रत्याशियों के नाम सामने आते ही लगभग सभी बड़ी पार्टियों में टिकट के दावेदार रहे बगावत का झंडा उठा ले रहे हैं. भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) हो या राजद की अगुवाई वाला महागठबंधन, सभी दलों के लिए बागी परेशानी का कारण बन गए हैं. कांग्रेस भी इस समस्या से दो-चार हो रही है.
विकल्पों की भरमार
दरअसल, इस बार के चुनाव में एक तरह से विकल्पों की भरमार है. इस बार राज्य में चार गठबंधन प्रमुख भूमिका में हैं. एनडीए व महागठबंधन के अलावा पूर्व सांसद राजेश रंजन यादव व पप्पू यादव की अगुवाई वाला प्रगतिशील डेमोक्रेटिक एलायंस (पीडीए) व पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा वाला ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट भी चुनाव मैदान में है. इनके अलावा एनडीए से दोस्ताना लड़ाई की मुद्रा में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) भी वहां ताल ठोक रही है जहां जदयू के उम्मीदवार हैं. ऐसे तो कोई पार्टी किसी दल के बागी को टिकट देने से गुरेज नहीं कर रही, यदि उस व्यक्ति की जीत की संभावना किसी भी समीकरण के अनुरुप थोड़ी सी भी शेष रह गई हो. संभावनाओं के इस खेल में जिसे जहां टिकट की संभावना दिख रही, वह वहां चला जा रहा है. लोजपा बागियों के लिए पनाहगार बन गई है. बागियों के लिए भी यह पहली पसंद है जिसकी वजह इस पार्टी के पास इसका अपना पांच प्रतिशत पुख्ता वोट बैंक का होना है.
भाजपा से आए नौ तथा जदयू से आए दो लोगों को लोजपा ने अपना उम्मीदवार बनाया है. लोजपा में आए बागियों में सबसे प्रमुख नाम भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष रहे राजेंद्र सिंह व पूर्व विधायक रामेश्वर चौरसिया का है. सब्र की परीक्षा में आखिरकार ऐसे प्रमुख सिपहसलारों की राजनीतिक आस्था भी जवाब दे गई. इनके अलावा राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) नीत गठबंधन ने जदयू के दो बागी नेताओं को तो राजद ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) व रालोसपा के एक-एक बागी नेताओं को अपना प्रत्याशी घोषित किया है. जदयू के वरिष्ठ नेता व पूर्व मंत्री श्रीभगवान सिंह कुशवाहा व चंद्रशेखर पासवान को लोजपा ने टिकट दिया है तो रालोसपा ने जदयू के रणविजय सिंह तथा भाजपा के अजय प्रताप सिंह को उम्मीदवार बनाया है. इसी तरह राजद के अति पिछड़ा प्रकोष्ठ के पूर्व महासचिव सुरेश निषाद को लोजपा ने टिकट दिया है.
गठबंधनों ने बदला परिदृश्य
दरअसल इस बार गठबंधनों के बदले परिदृश्य के कारण ही यह स्थिति उत्पन्न हुई है. हर हाल में जीत के समीकरणों को ध्यान में रखते हुए सभी पार्टियां अपने-अपने प्रत्याशी तय कर रही है. 2015 में भाजपा 157 सीटों पर लड़ी थी लेकिन इस बार महज 110 पर ही लड़ेगी. इस परिस्थिति में तो 47 नेताओं को टिकट से स्वाभाविक तौर पर वंचित होना ही था. जदयू के साथ भी कमोबेश यही स्थिति है. राजद ने भी अपने कोटे की 144 सीटों में 18 विधायकों को टिकट से वंचित कर दिया है. आंकड़ों में देखा जाए तो 2015 की तुलना में इस बार राजद में 29 नए चेहरे दिखेंगे. इसी चक्कर में सभी बड़े राजनीतिक दलों ने अच्छी-खासी संख्या में वर्तमान विधायकों का टिकट काट दिया है. किसी भी दल का दामन थामने के अलावा अच्छी-खासी संख्या उन उम्मीदवारों की भी है जो बतौर निर्दलीय मैदान में हैं. इनमें विधायक रहे सुनील पांडेय (तरारी,भोजपुर), गुलजार देवी (फुलपरास, मधुबनी), ददन पहलवान (डुमरांव, बक्सर), अनिल शर्मा (बिक्रम, पटना),श्रीकांत निराला (मनेर, पटना) तथा हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष रहे धीरेंद्र कुमार मुन्ना व बछवाड़ा (बेगूसराय) के दिवंगत विधायक रामदेव राय के पुत्र शिव प्रकाश प्रमुख हैं जो बिना किसी दल के अपने बूते चुनाव मैदान में हैं.
इनके अलावा भी कई पार्टियों के संगठन के लोग भी बगावत कर मैदान में कूद चुके हैं. कहा जा रहा है कि केवल कोसी क्षेत्र (सीमांचल के साथ) में ही भाजपा के करीब दो दर्जन नेता उन सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं जो समझौते के तहत जदयू के खाते में चली गई हैं. ऐसा नहीं है कि पार्टियों ने इनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की है. इन्हें निलंबित या निष्कासित कर दिया गया है किंतु कार्रवाई का डर भी महत्वाकांक्षा पर भारी नहीं पड़ रहा. कई जगहों पर पार्टियों ने मान-मनौव्वल के बाद बागी हुए अपनों को मनाने में कामयाबी भी पाई है. कुछ जगहों पर पार्टियों ने भी विरोध के बाद उम्मीदवार बदला है. हालांकि अंतिम चरण के मतदान के लिए नामांकन अवधि पूर्ण होने तक बगियों की संख्या में इजाफा ही होने के आसार हैं. फिलहाल पहले चरण की करीब चालीस से अधिक सीटों पर बागी उम्मीदवारों की उपस्थिति से जर्बदस्त चुनावी मुकाबला होने की संभावना है.
बदस्तूर जारी रहा पाला बदल का खेल
प्रदेश की सभी पार्टियां दल-बदल के खेल का शिकार हुईं. दरअसल ध्येय तो किसी भी कीमत पर टिकट पाने का होता है, इसलिए इसमें किसी भी तरह का संशय उन्हें पाला बदलने के लिए प्रेरित करता है. तब दलीय प्रतिबद्धता या राजनीतिक आस्था महज दिखावे की वस्तु रह जाती है. इस खेल में कई लोगों को तो मुकाम मिल जाता है जबकि कई दल बदलने के बाद भी उद्देश्य में कामयाब नहीं हो पाते और जिन्हें क्षेत्र में किए काम से अपनी जीत का पूरा भरोसा होता है वे बिना किसी दल के ही रणभूमि में उतर जाते हैं. चूंकि पार्टियों का लक्ष्य भी येन-केन-प्रकारेण चुनाव में विजय श्री हासिल करना होता है, इसलिए उन्हें भी दल-बदल के खेल से गुरेज नहीं होता. स्थिति तो यहां तक आ जाती है कि पिता किसी दल में होता है और पुत्र किसी और पार्टी में. खगड़िया के लोजपा सांसद चौधरी महबूब अली कैसर के पुत्र मो. युसूफ सलाउद्दीन ने राजद का दामन थाम लिया है. कांग्रेस को छोड़कर बाहुबली नेता आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद अपने पुत्र चेतन आनंद के साथ राजद में शामिल हो गईं. मां-बेटे, दोनों को राजद ने अपना प्रत्याशी भी बना दिया. देखा जाए तो 2015 में चुनाव जीत चुके एक दर्जन से अधिक विधायकों ने अपना घर बदल लिया. अब जो किसी न किसी वजह से पार्टी बदलकर चुनाव लड़ेंगे वे तो बागी की ही संज्ञा पाएंगे.
पटना के बिक्रम विधानसभा क्षेत्र से एक बार लोजपा से तथा दो बार भाजपा से विधायक रहे अनिल शर्मा कहते हैं, "जब विधायक रहा तब तो काम किया ही इसलिए तीन टर्म चुना गया किंतु 2015 में जब पराजित होने के बाद भी पूरे पांच साल तक भाजपा के प्रतिनिधि के रूप में क्षेत्र की जनता के हर सुख-दुख में भागीदार बना, तन-मन-धन से लगा रहा. इसके बावजूद पार्टी ने मेरा टिकट काटकर पैराशूट उम्मीदवार को प्रत्याशी घोषित कर दिया. इससे जनता बौखला गई और उन्हीं की मांग पर मैं निर्दलीय चुनाव मैदान में आया." वहीं मधुबनी जिले के फुलपरास से जदयू विधायक रही गुलजार देवी कहतीं हैं, "पार्टी ने अंतिम समय तक आश्वासन के बाद टिकट नहीं दिया जबकि मैंने क्षेत्र पार्टी का मान बढ़ाया और जनता का विश्वास जीता है. इसलिए अब जनता की मांग पर ही निर्दलीय लड़ रही हूं."
हर हाल में जीतने की रणनीति
पत्रकार रवि रंजन कहते हैं, "दरअसल राजनीतिक दलों द्वारा टिकट वितरण में अपने आधार मतों के नेताओं को प्राथमिकता देने तथा दूसरी पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाने की प्रवृति दल-बदल को बढ़ावा देती है." यह काफी हद तक सही है. सिद्धातों की पार्टी होने का दावा करने वाले जदयू ने भी शायद इसी वजह से टिकट बांटने में अपने लव-कुश (कुर्मी-कोईरी) के साथ राजद के माई (मुस्लिम-यादव) समीकरण को भी ध्यान में रखा. इसी को ध्यान में रखकर मंत्रियों तक के चुनाव क्षेत्र में भी बदलाव किया गया.
रणक्षेत्र में हर हाल में विजय प्राप्त करना ही किसी सेनापति का उद्देश्य होता है किंतु बागियों की मौजूदगी भीतरघात की संभावना को भी बढ़ा देती है. वैसे भी छोटे-छोटे गठजोड़ों ने भी चुनाव में पार्टियों की मुश्किलें और मतदाताओं के लिए फैसले की जटिलता बढ़ा ही दी है. चुनाव के नंबर गेम में कौन आगे होगा और कौन पीछे यह तो समय बताएगा किंतु बिहार के इस महासंग्राम में उन प्रत्याशियों के लिए जीत की राह उतनी भी आसान नहीं रह जाएगी जहां बागी उन्हें ललकार रहे हैं.(dw)


