विचार/लेख
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत के टीवी चैनलों की दुर्दशा पर कुछ दिन पहले मैंने लिखा था कि अमेरिका में 50 साल पहले मैंने पहली बार जब टीवी देखा था तो किसी अमेरिकी महिला ने मुझे कहा था कि ‘यह मूरख-बक्सा’ है। इसे मैं नहीं देखती। अब भारत के कुछ टीवी चैनल ऐसे खटकरम में रंगे हाथों पकड़े गए हैं कि अमेरिकियों का यह ‘मूर्ख-बक्सा’ हमारा ‘धूर्त-बक्सा’ कहलाएगा। मुंबई की पुलिस ने दावा किया है कि उसने ऐसे तीन टीवी चैनलों को पकड़ा है, जिन्होंने अपनी दर्शक संख्या (टीआरपी) बढ़ाकर दिखाने के लिए बड़ी धूर्तता की है। ये चैनल हैं ‘रिपब्लिक टीवी’, ‘फ़ख्त मराठी’ और ‘बॉक्स सिनेमा’।
इन तीनों टीवी चैनलों पर आरोप है कि इन्होंने अपनी दर्शक-संख्या को फर्जी तौर पर बढ़ाया है और इस धोखाधड़ी के जरिए मोटी कमाई की है। किसी चैनल की दर्शक-संख्या जितनी बड़ी हो, उन्हें उतना मोटा विज्ञापन मिलता है। जिस ‘हंसा एजेंसी’ के जरिए इन चैनलों ने यह धूर्तता की है, उसके कर्मचारियों के पास से पुलिस ने 28 लाख रु. नकद बरामद किए हैं। यह रकम उन दर्शकों को मिलनी थी, जो अपने टीवी बक्सों को 24 घंटे चालू रखें, चाहे वे उन्हें देखें या न देखें। ऐसे कई घरों को 400 रु. से 700 रु. प्रति माह के हिसाब से रिश्वत दी जाती रही। कई उन घरों में अंग्रेजी टीवी ‘रिपब्लिक’ चौबीसों घंटों चलता रहा, जिनमें कोई भी अंग्रेजी नहीं जानता। ये रहस्य उन दर्शकों ने स्वयं खोले हैं। मुंबई पुलिस ने ‘फख्त मराठी’ और ‘बॉक्स सिनेमा’ चैनलों के मालिकों को गिरफ्तार कर लिया है। आश्चर्य है कि अभी तक ‘रिपब्लिक टीवी’ के मालिक अर्णब गोस्वामी को गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया है ? अर्णब का कहना है कि ‘रिपब्लिक टीवी’ पर लगे आरोप झूठे हैं। इन चैनलों पर धारा 120, 409 और 420 लगेगी और यदि आरोप सिद्ध हो गए तो उन्हें सात-सात साल की जेल होगी। हो सकता है कि विज्ञापनदाता भी इन चैनलों से अपने पैसे वसूल करने के लिए इन पर मुकदमा चला दें। यह पत्रकारिता पर बड़ा भारी कलंक है।
पत्रकारिता की प्रतिष्ठा पर एक तथ्य से और आंच आई है। वह है, कुछ चैनलों द्वारा मार्च के महिने में तबलीगी जमात के खिलाफ बेलगाम विष-वमन! सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर भारत सरकार की तगड़ी खिंचाई कर दी है। अदालत का कहना है कि कोरोना महामारी को फैलाने के लिए तबलीगी जमात को जिम्मेदार ठहराने में टीवी चैनलों ने सारी हदें पार कर दीं।
भारत सरकार इन चैनलों की हिमायत किसलिए कर रही है ? इन चैनलों ने देश के सारे मुसलमानों को बदनाम करने की कोशिश की है और अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का दुरुपयोग किया है। जमीयते-उलेमाए-हिंद की याचिका के विरुद्ध सूचना मंत्रालय ने अदालत के सामने अपनी सफाई पेश की थी। भारत के कुछ टीवी चैनलों का काम ठीक-ठाक है लेकिन ज्यादातर टीवी चैनल अपनी दर्शक-संख्या बढ़ाने के लिए कुछ भी दिखाने पर उतारु हो जाते हैं। यदि वे आत्म-नियंत्रण नहीं रखेंगे तो संसद को मजबूर होकर इस अभिव्यक्ति की अराजकता के विरुद्ध कठोर कानून बनाना पड़ेगा।
(नया इंडिया की अनुमति से)
अखिलेश प्रसाद
अर्णब गोस्वामी हाथ हिलाकर दूसरे को ललकारते हैं। अरे फलाने अरे चिलाने! कहाँ छुपे हो? सामने आओ। कहाँ मुंह छुपाकर बैठे हो, तुम जहां भी हो हम खोज ले आएंगे। मेरे साथ पूरा भारत तुमको खोज रहा है। क्यों दुम दबाकर छिप गए। पूछता है अर्णब! और हम चुप नहीं बैठेंगे, जबतक आरोपी को बेनकाब नही कर देंगे।
अब उसी के चैनल का सीएफओ महाराष्ट्र पुलिस से छुपता फिर रहा है। महराष्ट्र पुलिस के समन ने उसे छुपने पर मजबूर कर दिया। सुप्रीम कोर्ट में अर्जी डाली है कि उसे महाराष्ट्र पुलिस के सामने पेश न होना पड़े। पुलिस को चिट्ठी लिखकर बता रहा है उसे 16 अक्टूबर तक पेश न होने की छूट दी जाए।
आखिर क्यों, भाई? दूसरे को अंगुली नचा नचा कर पलक झपकते ही अपने स्टूडियो में बुलाने वाले को आखिर सांप क्यों सूंघ गया। क्या हो गया! इसी को कहते हैं हवा टाइट होना। पुलिसिया कार्रवाई अच्छे अच्छे को तोड़ देता है। एक कहावत है। पुलिस से न दोस्ती अच्छी और न ही दुश्मनी भली।
सुप्रीम कोर्ट जाना, रिपब्लिक टीवी का अधिकार है, उसे जाना ही चाहिए। इसमे कोई गलत बात नहीं है। कोर्ट में सभी जाते हैं।
लेकिन, लेकिन!
यही जब दूसरे आरोपी जाते हैं तो अर्णव किस मुंह से गला फाड़ते हैं। उसे ललकारते हैं। आपके स्टूडियो आने की क्या बाध्यता है। कोई इतना मजबूर क्यों होगा कि तुम्हारे सामने पेश होगा। और तुम सिर्फ बकवास करोगे।
यह देश भारत है और यहाँ का कानून लोकतंत्र के माध्यम से चलता है। अर्णव गोस्वामी या कोई भी और पत्रकार जो स्टूडियो में बैठकर चीखता चिल्लाता है, वो एक किसी कंपनी का कर्मचारी है। तो फिर भारत का कानून मानने वाला नागरिक एक कम्पनी के कर्मचारी के सामने क्यों जवाब देने के लिए बाध्य होगा?
देश आजाद है, अब कंपनी राज नही चलेगा। अब चलेगा लोकतंत्र का राज्य। अब कानून का राज देश का संसद तय करेगा। किसी स्टूडियो चैनल का मालिक या कर्मचारी नहीं।
जिस तरह से आज यह चैनल पुलिस से आंख मिचौली खेल रहा है और अपने ऊपर लगे आरोप को बेबुनियाद बता रहा है। सभी आरोपी का शुरुआत में यही वर्जन रहता है। बाकी इंसाफ मिलने में सालों साल लग जाते हैं। हो सकता है कि यहाँ भी पुलिस सत्ता के दबाव में यह सब कर रही हो, लेकिन यही बात तो दूसरे के वक्त में भी आपको सोचना चाहिए। यही चैनल है जो पीड़िता के खिलाफ ही जहर उगलता है। शोषकों के पक्ष में इंटरव्यू करता है। आज जब इनको सामना हुआ तो भभक रहे हैं।
-गिरीश मालवीय
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के कोरोना पॉजिटिव होने से ज्यादा उनके इतने जल्दी ठीक होने से दुनियाभर में लोग हैरान हैं। लगभग हफ्ते भर में ही वह रिकवरी कर गए लोगो के मन मे सवाल है कि नॉर्मल कोरोना मरीज को ठीक होने में कम से कम तीन हफ्ते का समय लग रहा है तो आखिरकार ट्रंप एक ही हफ्ते में कोरोना से कैसे रिकवर हो गए ?
मैं शुर से ही कोरोना में बिग फार्मा के रोल के बारे में आपको आगाह कर रहा हूँ....... ट्रम्प के जल्द ठीक होने का संबंध भी बिग फार्मा के हितरक्षण से ही जुड़ा हुआ है ट्रम्प ने स्वंय एक वीडियो के जरिए यह बताया कि किस दवाई की वजह से वह कोरोना से इतनी जल्द रिकवर हो गए। ट्रंप के मुताबिक, 'कोरोना के इलाज के लिए कई दवाओं के साथ Regeneron की REGN-COV2 एंटीबॉडी ड्रग भी दी गई। उन्होंने बताया कि यह सबसे अहम थी और इससे उन्हें काफी अच्छा महसूस हुआ। राष्ट्रपति ने वीडियो में कहा, 'मैं चाहता हूं कि आपको भी वही दवा मिले जो मुझे मिली और मैं उसे मुफ्त में उपलब्ध कराना चाहता हूं। हम इसे जल्द से जल्द अस्पताल में उपलब्ध कराएंगे।'
बिल गेट्स भी इस तरह की एंटीबॉडी दवाओ को प्रमोट कर रहे हैं कह रहे हैं कि ये दवाएं कोविड -19 से मृत्यु दर को काफी कम कर सकती हैं।
अब यह नयी दवा क्या है यह भी समझ लीजिए....इस दवा में चूहे और कोरोना से रिकवर हुए मरीज की एंटीबॉडी का इस्तेमाल किया गया है। कम्पनी का दावा है, दोनों एंटीबॉडी मिलकर कोरोना को न्यूट्रिलाइज करने में मदद करेंगी। यह एक तरह से आर्टिफिशियल एंटीबॉडी है। जो शरीर की कोशिकाओं में मौजूद कोरोना वायरस से चिपकर कर उसपर आत्मघाती हमला करती है. इससे कोरोनावायरस की वो शक्ति खत्म हो जाती है, जिससे वह स्वस्थ्य कोशिकाओं को संक्रमित कर सके. दोनों एंटीबॉडी कोरोना वायरस से बाहरी हिस्से में लगे कांटेदार प्रोटीन को पिघला कर अंदर के आरएनए को खत्म कर देती हैं.
अभी तक कोरोना का सबसे कारगर इलाज कोवैलेसेंट प्लाज्मा थेरेपी को माना जाता है लेकिन प्लाज्मा थेरेपी को जानबूझकर पीछे किया जा रहा है, ICMR भी प्लाजा थेरेपी के बारे में अपने रिजल्ट घोषित नही कर रहा है, WHO भी प्लाज्मा थेरेपी के फायदों के बारे में पूछे जाने पर टाल जाता है
प्लाज्मा थेरेपी में कोरोना की बीमारी से ठीक हुए इंसान के शरीर से प्लाज्मा यानी एंटीबॉडी लेकर बीमार व्यक्ति को दिया जाता है, ताकि कोविड19 वायरस से बचाने वाली एंटीबॉ़डी उसके शरीर में भी पैदा हो और वह बीमारी को हरा सके.
इस नयी ऐंटीबॉडी दवा का मूल भी यही है बिग फार्मा चाहता है कि कोरोना के इलाज में प्लाज्मा थेरेपी को हतोत्साहित किया जाए लेकिन उसी तकनीक से बनी ऐंटीबॉडी दवा का खूब प्रमोशन किया जाए ताकि बिग फार्मा कंपनियों को जबरदस्त फायदा पुहंचे.....
इस दवा पर भी सवाल उठे है डेलीमेल की एक रिपोर्ट के अनुसार जिन दो मरीजों का ट्रीटमेंट इस REGN-COV2 ड्रग से हुआ है, उनमें साइडइफेक्ट दिखे हैं। लेकिन, अमेरिकी कम्पनी रीजेनेरन ने यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की।
इस नई एंटीबॉडी कॉकटेल थेरेपी के लिए अमेरिका पहले ही जुलाई में ऑपरेशन वार्प स्पीड के तहत इस दवा की निर्माता कंपनी रीजेनेरॉन फार्मा के साथ करार कर चुका है. अमेरिका ने इस दवा कंपनी के साथ 450 मिलियन डॉलर्स यानी करीब 3367 करोड़ रुपए की डील की है. यानी डील भी पहले ही की जा चुकी है
अब असली बात समझिए यानी बिग फार्मा से जुड़े
दरअसल इस दवा को बनाने वाली कम्पनी रीजेनेरॉन का ज्यादातर काम फ्रांसीसी दवा कंपनी सनोफी के साथ साझेदारी में रहा है। ‘न्यूयार्क टाइम्स’ के मुताबिक सनोफी में राष्ट्रपति ट्रम्प से जुड़े शेयरधारक और वरिष्ठ कार्यकारी अधिकारी भी हैं स्वंय ट्रम्प का भी फ्रांस की दवा कंपनी सनोफी में थोड़ा निजी वित्तीय हित है........
साफ है कि जहाँ से ओर जिससे बिग फार्मा कंपनियों को फायदा पुहंचे उसी का मीडिया ओर राजनेता ओर परोपकारी लोग प्रमोशन करते हैं महँगी दवाओं को ही बढ़ावा दिया जाता है.
-राकेश दीवान
लोकतंत्र, संविधान, विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका, मीडिया सरीखे अच्छे-अच्छे शब्दों से पहचानी जाने वाली अच्छी-अच्छी संस्थाओं की एन नाक के नीचे लोकतंत्र की लुटिया डूब रही है। आठ-सवा आठ महीने पहले ज्ञात-अज्ञात कारणों से पाला बदलने और नतीजे में विधायिकी गंवाने वाले राजनेताओं को अब फिर से चुनाव का सामना करना पड रहा है। सन् 1950 की 26 जनवरी को लागू किए गए संविधान के बाद शायद यह पहला ही मौका है जब खुल्लमखुल्ला लालच देकर बहुमत की सरकार डुबोई गई है। कथित खटपाटी लेकर राज्य के बाहर के होटलों, रिसार्टों में डेढ-दो हफ्ते मजा लूटने के बाद जब कांग्रेस छोडकर भाजपा में समाहित हुए विधायक वापस भोपाल लौटे थे तो उनमें से कई के खींसे में मंत्रीपद और कुछ के पास सरकारी निगमों, मंडलों की मुखियागिरी के अलावा कांग्रेस के खिलाफ गालियां थीं।
मजा यह है कि कोविड-19 महामारी तक को अनदेखा करके मार्च में करीब दो दर्जन विधायकों को ‘लोकतंत्र की रक्षा करने’ की खातिर अपने अल्पमत के पाले में मिलाने वाली ‘भारतीय जनता पार्टी’ और बहुमत गंवाकर गद्दी से उतारी जाने वाली ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस,’ दोनों राजनीतिक जमातें कुछ इस अदा और उत्साह से फिर चुनाव-चुनाव खेलने में लग गई हैं, मानो कुछ हुआ ही नहीं हो। जाहिर है, राज्य की गद्दी पर चढती-उतरती भाजपा-कांग्रेस के लिए एकमात्र सत्य चुनाव है जिसे राजनैतिक जमातें बहु-विध व्याख्यायित करती रहती हैं। इनमें एक व्याख्या यह है कि अधिकांश सीटों पर होने वाले चुनावों में पिछली बार के ही प्रतिद्वंद्वी होने और उनकी सिर्फ पार्टियां और झंडे बदलने के बावजूद वे संविधान की नाक के नीचे चुनाव की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जी-जान से जुटे हैं। इनमें से कई ऐसे भी हैं जिन्होंने विधायिकी की खातिर कई-कई बार राजनीतिक पाला बदला है और कईयों ने तीन-तीन बार एक ही पार्टी से चुनाव लडकर जीतने के बाद मंत्रीपद के लालच में अब समूची पार्टी ही बदल ली है।
लेकिन इस लोकतांत्रिक धतकरम में कुछ ऐसा भी हुआ है जिसने संसदीय लोकतंत्र की नींव हिलाकर रख दी है। सरल, सीधी नजरों से देखें तो अव्वल तो हमें यही दिखाई देता है कि कोई भी तुर्रमखां कुछ करोड रुपयों की रकम लुटाकर किसी भी अच्छी –खासी, बहुमत सम्पन्न सरकार को कुलटइयां खिला सकता है। आखिर चार्टर्ड हवाई जहाज, एसी-वॉल्वोे बसों और बेंगलुरु के मंहगे रिसार्ट में ठहरने जैसे ज्ञात और कई कारणों से अब तक अज्ञात खर्चों की दम पर ही तो कमलनाथ की बहुमत की कांग्रेसी सरकार डुबोई गई थी? याद रखिए, यह कमाल केवल भाजपा ही जानती और वापर सकती है, ऐसा नहीं है। ठीक यही करने में कांग्रेसियों और दूसरी पार्टियों ने भी खासी वर्जिश कर रखी है और भाजपा की तर्ज पर वे भी इसे ‘लोकतंत्र की रक्षा’ और ‘दम घुटने के नतीजे’ आदि कहकर कभी भी आजमा सकते हैं। वैसे भी राज्य के मौजूदा चुनावों में आपस में लडती दिखती किसी भी पार्टी ने पाला बदलकर लोकतंत्र की लुटिया डुबोने का अप्रिय प्रसंग शिद्दत से नहीं उछाला है। तो क्या बडी मेहनत-मशक्कत के बाद जमाई जाने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था को यूं ही, चंद रुपयों की खातिर मटिया-मेट करने दिया जा सकता है?
लोकतंत्र के संविधान में माना जाता है कि पैसों की दम पर सत्ता हथियाने के इस खुले-खेल-फर्रुख्खाबादी के बावजूद राजनेताओं को चुनाव की मार्फत अपने बहुमत की तस्दीेक करनी ही पडती है। जाहिर है, दस महीनों के अंतराल में होने वाले गैर-जरूरी चुनावों में आम नागरिकों से वसूली जाने वाली टैक्स की राशि बर्बाद होती है। पैट्रोल, डीजल जैसी जरूरी और शराब जैसी गैर-जरूरी जिन्सों की आसमान छूती कीमतें गैर-जरूरी चुनावों में होने वाले खर्चों की वजह से भी बढती हैं। सवाल है कि क्या कांग्रेस की जगह भाजपा के आने से आम नागरिकों के दैहिक-दैविक-भौतिक तापों में कोई विशेष बदलाव आ सकेगा? क्या कमलनाथ की जगह आई शिवराजसिंह की सरकार राज्य के नागरिकों की न्यूनतम, बुनियादी जरूरतों को पूरा कर पाएगी?
मध्यप्रदेश विधानसभा की अट्ठाइस सीटों के मौजूदा चुनाव में शिवराजसिंह तीन-साढे तीन हजार करोड के विकास कार्यों की घोषणा कर चुके हैं, लेकिन 2014 में लोकसभा चुनावों में इसी तरह के वायदों को ‘चुनावी जुमले’ बताकर खुद उनकी पार्टी के सरगनाओं ने ऐसे वायदों की भद्द पीट दी थी। कमलनाथ ने भी अपने सवा साल के राज में शिवराजसिंह से भिन्न कोई खास तीर मारे हों, ऐसा दिखाई तो नहीं देता।
पिछले साल भर चली मध्यप्रदेश की राजनीति बताती है कि असल में आज हम जिस परिस्थिति में पहुंच गए हैं उसमें लोकतंत्र और उसकी मार्फत लोकहित खतरे में पड गया है। हीब्रू विश्वविद्यालय के दार्शनिक मोशे हालबर्तल कहते हैं कि ‘राजनीति में मूल्यों, तत्थ्यों और ऐसे नेताओं की जरूरत है जो अपने फैसले राजनीतिक बढत की बजाए लोकहित के लिए लें।’ लेकिन क्या चुनावों, खासकर आने वाली तीन नवंबर को होने वाले मध्यप्रदेश विधानसभा की 28 सीटों के चुनाव, किसी भी तरह से लोकहित में होते दिखाई देते हैं? क्या ‘लोकतंत्र की रक्षा,’ ‘जनता की सेवा’ और छोडी गई पार्टी में ‘दम घुटने’ की फर्जी बहाने-बाजी की दम पर शुद्ध निजी आर्थिक लाभ की खातिर सार्वजनिक बेशर्मी से पाला बदलने वाले लोकतंत्र और लोकहित की रत्ती भर भी परवाह करेंगे? और यदि वे ऐसा नहीं करेंगे तो नागरिक या वोटर की तरह हमारी क्या जिम्मेदारी है? संयोग से इन 28 सीटों के वोटरों को इतिहास ने ऐसा मौका दे दिया है कि वे तीन नवंबर को होने वाले चुनाव में अपनी भागीदारी से भारत में लोकतंत्र का भविष्य तय कर सकें। क्या वे इस भारी-भरकम जिम्मेदारी का बोझ उठाना चाहेंगे?
कहा जाता है कि वोटर का मन एन बटन दबाने तक उजागर नहीं होता, लेकिन माहौल का गणित और चुनाव लडते नरपुंगवों की साख कुछ रुझान तो फिर भी बता ही देती है। इस बार भी पहले की तरह सिर्फ चुनाव जीतने की गारंटी देने वालों को ‘टिकट’ दी गई है और इसमें उस बेशर्मी का कोई खयाल नहीं रखा गया है जो कुछ महीनों पहले बिलकुल विपरीत झंडे-डंडे वाली पार्टी, उसके कार्यकर्ता और समाज की नजर के रू-ब-रू आनी चाहिए थी। जाहिर है, राजनैतिक जमातों के लिए यह चुनाव भी, पिछले सालों में हुए अन्य चुनावों की तरह ‘रुटीन’ ही है। तो क्या वे लोग कुछ करिश्मा कर पाएंगे जिन्हें देश के लोकतंत्र और संविधान की परवाह है?
अपने वोटर अवतार में उतरे ऐसे नागरिकों को हमेशा के जाति, धर्म, हिन्दू–मुस्लिम और शराब-साडी-पैसा के धतकरमों को बरकाकर इस बार यह तय करने के लिए वोट देना होगा कि क्या लोकतंत्र में पैसा देकर पार्टी और बहुमत की सरकार बदली जाना मुनासिब हो सकताा है? लोकतंत्र को मखौल में तब्दील करने वाले ऐसे विधायकों, पार्टियों को क्यों चुना जाना चाहिए? लोकतंत्र की यह मिट्टी-पलीती सिर्फ चुनावरत 28 विधानसभा सीटों के मतदाताओं भर का सरोकार नहीं है। इसमें समूचे मध्यप्रदेश और देश को अपने-अपने काम-धंधे, राजनीतिक-आर्थिक प्रतिबद्धताएं और पारंपरिक लगाव को छोडकर कूदना चाहिए। याद रखिए, कितनी भी बुराइयां हों, लोकतंत्र हमारे जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए एकमात्र कारगर शासन पद्धति है और उसकी बदहाली हम सभी को भुगतना पड सकती है।
-ध्रुव गुप्त
हिन्दी सिनेमा की सबसे ग्लैमरस, सबसे विवादास्पद, सबसे संवेदनशील अभिनेत्रियों में एक रेखा की अभिनय-यात्रा और उसका रहस्यमय आभामंडल समकालीन हिंदी सिनेमा के सबसे चर्चित मिथक रहे हैं। तमिल फिल्मों के एक सुपर स्टार जेमिनी गणेशन और अभिनेत्री पुष्पवल्ली के अविवाहित संबंधों की उपज रेखा का दुर्भाग्य था कि बाप ने उसे अपनी संतान मानने से इंकार किया और मां ने अपना कज़ऱ् उतारने के लिए बचपन में ही उसे सी ग्रेड की फिल्मों में धकेल दिया।
दर्जनों तमिल फिल्मों के बाद1970 में ‘सावन भादों’ से उसका हिंदी फिल्मों में पदार्पण हुआ। यह फिल्म तो चली, लेकिन मामूली और अनगढ़-सी दिखने वाली सांवली और मोटी रेखा का मज़ाक भी कम नहीं उड़ा। अपने कैरियर की शुरुआत में वह अभिनय के लिए नहीं, उस दौर के आधा दर्जन से ज्यादा अभिनेताओं के साथ अपने अफेयर और अभिनेता विनोद मेहरा और व्यवसायी मुकेश अग्रवाल के साथ दो असफल शादियों के लिए जानी जाती थी। वर्ष 1976 की फिल्म ‘दो अनजाने’ के नायक अमिताभ बच्चन से जुडऩे के बाद व्यक्ति और अभिनेत्री के तौर पर भी रेखा का रूपांतरण शुरू हुआ।
देखते-देखते सावन भादो, धरम करम, रामपुर का लक्ष्मण जैसी फिल्मों की भदेस, अनगढ़ रेखा उमराव जान, सिलसिला, आस्था, इजाज़त, आलाप, घर, जुदाई और कलयुग की खूबसूरत, शालीन, संज़ीदा अभिनेत्री में बदल गई। रेखा के व्यक्तित्व और अभिनय में यह बदलाव किसी चमत्कार से कम नहीं था।
अपनी परवर्ती फिल्मों के किरदारों में रेखा ने अभिनय के कई प्रतिमान गढ़े। यह वह दौर था जब उन्हें दृष्टि में रखकर फिल्मों की कहानियां लिखी जाती थी! रेखा को अभिनेत्रियों का अमिताभ बच्चन कहा गया। लंबे अरसे से फिल्मों में वे कम ही दिख रही हैं, लेकिन चरित्र भूमिकाओं में ही सही, आज भी रूपहले परदे पर उनकी उपस्थिति एक जादूई सम्मोहन छोड़ जाती है। पता नहीं इसमें कितनी सच्चाई है और कितनी कल्पना, लेकिन अमिताभ बच्चन-रेखा के रहस्यमय प्रेम का शुमार राज कपूर-नर्गिस, दिलीप कुमार-मधुबाला, देवानंद -सुरैया के बाद हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित प्रेम-कथाओं में होता है। 66 बरस की चिर युवा और चिर एकाकी रेखा को उनके जन्मदिन की शुभकामनाएं, मेरे एक शेर के साथ!
जिस एक बात पे दुनिया बदल गई अपनी
सुना है आपने हमसे कभी कहा भी नहीं !
-दिनेश श्रीनेत
उन दिनों गोरखपुर में बंगाली समाज की मौजूदगी वैसी ही थी, जैसे अहाते में खिले खुशबूदार फूल। हमारी कॉलोनी के छोर पर तीन बंगाली परिवार थे। शाम उमस से भरे धुंधलके में एक घर की रोशनी जलने के साथ शास्त्रीय गायन गूंजने लगता था। घर की लड़कियां शाम होते संगीत के रियाज पर बैठ जाती थीं।
उनके सामने की तरफ जो परिवार रहता था वे हमारे पारिवारिक मित्र थे। परिवार का एक लडक़ा रंगमंच से जुड़ा था, उनकी बहन बहुत अच्छी आर्टिस्ट थी। वहीं तीसरा मकान दो प्लॉट लेकर बना था और वहां रहने वाले लोग रहस्मय लगते थे, क्योंकि वे किसी से मिलते-जुलते नहीं थे। तीनों घरों में एक समानता थी-खूब हरे-भरे पौधे और बागवानी।
छठवीं-सातवीं क्लास में सबसे पहले मेरा एक बंगाली दोस्त बना। उसका नाम था बिप्लव मैत्र। सुंदर, बेहद हंसमुख, किसी से अपशब्द न कहने वाला और ईमानदार लडक़ा। दु:ख कि मेरा उसका साथ बहुत कम समय का रहा।
गोरखपुर के ठेठ पुरबिया और बिहारी समुदायों में बंगाली लोग नमक की तरह रचे-बसे थे। वे न होते तो हम अपने बचपन की कितनी सुंदर चीजें गंवा देते। जब दुर्गा पूजा का वक्त आता तो जाने कहां से बुजुर्ग बंगाली, सुंदर बंगाली स्त्रियां और युवतियां सजे-धजे निकल पड़ते। दशहरे में कालीबाड़ी नहीं गए तो वो साल बेकार गया समझो।
कुछ वर्ष तो बेहद खूबसूरत थे। हम तब तक नवीं क्लास में पहुँच चुके थे। विसर्जन से एक दिन पहले सडक़ों पर जगह-जगह बैरिकेटिंग लग जाती थी। रात की जगमगाती रोशनी में कई-कई किलोमीटर तक लोग पैदल चलते थे। लोग उमड़ते जाते थे। हमने नया-नया अकेले निकलना शुरू किया था। देर शाम घर से निकलने की इजाजत मिल गई थी। हमारे उत्साह का कोई ओर-छोर नहीं रहता था। हर तरफ रोशनी, हर कहीं संगीत, चहुंओर सुंदरता बिखरी, अगरबत्ती और फूलों की खुशबू से सराबोर रास्ते। हम अकबकाए कितने ही चक्कर लगा डालते, घर से मिले जेब-खर्च से गोलगप्पे और गरम-सोंधी खुशबू वाली टिक्की खाते। एक बार मेरी सैंडल टूट गई। घर पर डांट न पड़े तो मेरे दोस्तों ने अपनी जेब से पैसे देकर उसे मोची से सिलवाया।
जिस रेलवे कॉलोनी में मेरा स्कूल था, वहां पर एक पूरी लेन कैलकटा कालोनी कहलाती थी। क्योंकि वहां पर ज्यातार बंगाली परिवार थे। जाहिर तौर पर वह लेन फूलों से सजी और साफ-सुथरी थी।
जब मैं ग्रेजुएशन में पहुँचा तो फिर से एक बंगाली मेरा दोस्त बन गया। हम दोनों ने साथ में पढऩा शुरू किया। उसके पिता शहर के सबसे पुराने स्टूडियो चलाने वालों में से थे। वे आर्टिस्ट भी थे। किसी जमाने में पेंटर हुआ करते थे फिर फोटोग्राफी सीखी। एक वक्त ऐसा था कि मेरा पूरा दिन वहीं बीत जाया करता था। हम गप्पें मारते, पोर्टेट की बारीकियां समझते, संगीत सुनते और पढ़ते भी। उसकी मां हमारे लिए कुछ स्पेशल बनाती रहतीं, केले के फूल की सब्जी से लेकर करेले के पत्तों की चटनी तक। हम दोनों ने अंग्रेजी साहित्य ले रखा था। मेरा दोस्त क्योंकि कारोबार में हाथ भी बंटाता था तो वो अपनी पढ़ाई को लेकर बड़ा चिंतित रहता था। हमने तय किया कि मिलकर अंगरेजी की ट्यूशन पढ़ते हैं।
हमें रेलवे के एक रिटायर्ड ओएस मिले। वे एक बुजुर्ग बंगाली थे। बिल्कुल टिपिकल बंगाली, जैसे हम फिल्मों में देखते हैं। मेरा दोस्त तो बहुत दिनों तक साथ नहीं रहा पर मैंने टुकड़ों-टुकड़ों में अपने तीन साल उनके सान्निध्य में गुजारे। उनसे मुझे बहुत सीखने को मिला। जब उन्होंने पहली बार मुझे कीट्स की पोएम ‘ओड़ टु ए नाइटिंगेल’ पढ़ाई तो मैं हतप्रभ रह गया। वे बिल्कुल कविता में डूब जाते थे। जीके चेस्टरटन और फ्रांसिस बेकन को भी वे बहुत मन से पढ़ाते। उन्होंने परंपरागत अलंकरण वाली अंग्रेजी भाषा की सुंदरता से मेरा परिचय कराया।
वे बहुत मेहनत से पढ़ाते और नोट्स तैयार कराते थे। उनका एक वाक्य जो शायद जीके चेस्टरटन के लिए था, मुझे आज भी याद है, ‘एन अंडरकरेंट आफ पैथॉस रन पैरलल आल इन हिज़ कंपोजिशंस’। मेटाफिजिकल पोएट्स में उन्होंने जो दिलचस्पी जगाई वो आज तक बनी हुई है। उनके भीतर बंगाली होने का दर्प कूट-कूटकर भरा था। वे बताते थे कि गोरखपुर के एक सिनेमाहाल में जब बंगाली फिल्म का एक शो चला करता था तो अगले दिन तक सिनेमाघर इत्र की खुशबू में डूबा रहता था।
जब पोस्ट ग्रेजुएशन में पहुँचा तो कुछ बंगाली लड़कियां सहपाठी बनीं। मेरी एक सीनियर थीं जो बेहद जहीन, कॅरियर के प्रति कांशस थीं और बहुत सुंदर गाती थी। सीनियर्स के फेयरवेल में मैने ‘वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी’ पहली बार स्टेज से गाते उनसे ही सुना था। मैं अपनी मित्र के साथ एक बार उनके घर गया तो यह देखकर हैरान रह गया कि रेलवे के छोटे से चर्टर में उन्होंने पूरे आंगन को सैकड़ों पौधों से भर दिया था, ऐसा लगता था कि हम किसी नर्सरी में आ गए हों।
बंगाली भाषा और संस्कृति से मेरा रिश्ता यहीं नहीं खत्म होता। मेरी मां को बंगाली उपन्यासकार बहुत पसंद थे। उनकी लाइब्रेरी में शरतचंद्र और रवींद्रनाथ टैगोर के लगभग सभी उपन्यास मौजूद थे। उन्होंने बंकिंग समग्र भी खरीद रखा था। लाइब्रेरी से मैं उनके लिए बिमल मित्र और ताराशंकर बंद्योपाध्याय की किताबें लेकर आया करता था। मैंने खुद बचपन में टैगोर और विभुतिभूषण बंद्योपाध्याय की ‘पाथेर पांचाली’ पढ़ी तो मेरे मन पर उनका गहरा असर पड़ा था। सत्यजीत रे और सुकुमार रे की कहानियां भी किशोर वय में बड़ी दिलचस्प लगती थीं।
बड़ा हुआ तो दूरदर्शन ने मृणाल सेन और सत्यजीत रे के सिनेमा से परिचय कराया। टैगोर की सादगी से भरी कविताओं ने मेरी दिलचस्पी कविता पढऩे कहने में जगाई। बचपन में मुझे बांग्ला सीखने का शौक भी लगा था और मैंने बांग्ला लिपि सीख ली थी। अभी भी मैं बांग्ला जोड़-जोडक़र पढ़ लेता हूँ।
जैसा कि मैंने पहले लिखा था कि बंगाली संस्कृति फूलों की तरह अपनी खुशबू बिखेरती चलती है। एक उच्चवर्गीय और मिडिल क्लास बंगाली को अपनी भाषा से जितना प्रेम होता है, भाषा से उतना प्रेम कम भी देखा है मैंने। हर काम को सुरिचिपूर्ण तरीके से करना भी उनसे सीखा जा सकता है। बाद के बरसों में मेरे बंगाली दोस्त नहीं बने, मिले भी तो वैसी बात नहीं दिखी जैसे कि उन दिनों परिवारों में हुआ करती थी। शायद बदलते समय का असर हो या गोरखपुर की कुछ तासीर ही ऐसी थी...
जब इस सारी बातों को याद करता हूँ तो मुझे लगता है कि जीवन में कितना कुछ सुंदर है जिसका कर्ज कहीं न कहीं जाने कितने अनजान लोगों पर होता है, जो बस थोड़े से वक्त के लिए आपकी जिंदगी में आते हैं।
न मैं बंगाली हूँ न इस भाषा में मेरा जन्म हुआ है... पर अनजाने में मेरे अस्तिव के हिस्से में उस खूबसूरत संस्कृति की सुगंध समाहित है।
टैगोर की ही कुछ पंक्तियों से बात समाप्त करता हूँ -
आमार शोनार बांग्ला,
आमि तोमाए भालोबाशी
चिरोदिन तोमार आकाश,
तोमार बताश,
अमार प्राने बजाए बाशी
(फेसबुक से)
अर्जेंटीना ने जिस जीएम गेहूं की फसल को मंजूरी दी है उसे एचबी 4 नाम दिया है| इसे अर्जेंटीना की बायोटेक्नोलॉजी कंपनी बायोसीरस ने तैयार किया है
- Lalit Maurya
अर्जेंटीना जेनेटिक मॉडिफाइड गेहूं को उगाने और उसकी खपत को मंजूरी देने वाला पहला देश बन गया है| यह जानकारी अर्जेंटीना के कृषि मंत्रालय द्वारा जारी विज्ञप्ति में सामने आई है| जिसके अनुसार अर्जेंटीना ने सूखे से निपटने में सक्षम जीएम गेहूं की फसल को मंजूरी दे दी है| गौरतलब है कि दुनिया भर में अर्जेंटीना गेहूं का चौथा सबसे बड़ा निर्यातक देश है|
अर्जेंटीना के राष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी आयोग ने एक बयान जारी कर कहा है कि "दुनिया भर में यह पहला मौका है जब किसी देश ने जेनेटिक मॉडिफाइड गेहूं को उगाने और उसकी खपत को मंजूरी दी है|"
अर्जेंटीना ने जिस जीएम गेहूं की फसल को मंजूरी दी है उसे एचबी 4 नाम दिया है इसे अर्जेंटीना की बायोटेक्नोलॉजी कंपनी बायोसीरस और नेशनल यूनिवर्सिटी ने राष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी आयोग की मदद से विकसित किया गया है| इस फसल (एचबी 4) पर एक दशक तक किए गए परीक्षण से पता चला है कि सूखे की स्थित में यह फसल, अन्य की तुलना में 20 फीसदी ज्यादा उपज देती है| हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार इसका भविष्य क्या होगा उसपर अभी संदेह है क्योंकि जिस तरह से जीएम फसलों को स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरा माना जाता है उसके चलते उपभोक्ता इसे आसानी से नहीं अपनाएंगे| ऐसे में इनको उगाना और बेचना चिंता का एक बड़ा विषय है|
क्या होती हैं जेनेटिक मॉडिफाइड फसलें, स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से कितनी हैं सुरक्षित
जीएम फसलें या आनुवांशिक रूप से संशोधित फसलें वो फसलें होती हैं, जिनके जीन (डीएनए) में बदलाव कर दिया जाता है| जिससे फसलों के उत्पादन और उसमें मौजूद आवश्यक तत्वों की मात्रा में वृद्धि की जा सके| साथ ही वो प्रकृति की विषम परिस्थितयों को भी झेलने में सक्षम हो सकें|
जीएम फसलों पर सबसे बड़ा सवाल उसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को लेकर है| यह खाद्य पदार्थ कितने सुरक्षित हैं, इस पर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया जा सका है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जीएम फसलों में विभिन्न जीवों और पौधों से जीन (डीएनए) लेकर उन्हें खाद्य फसलों में डाला जाता है| ऐसे में सबसे बड़ी चिंता का विषय है कि “विदेशी” डीएनए विषाक्तता, एलर्जी, पोषण और अनायास प्रभावों जैसे जोखिम पैदा कर सकते हैं, जोकि स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। जीएम फसलों के साथ एक समस्या यह भी है कि इसमें इच्छित परिवर्तनों के साथ अनचाहे परिवर्तनों के होने की सम्भावना भी बनी रहती है|
इसी खतरे को देखते हुए भारत समेत दुनिया के अधिकांश देशों ने जीएम फूड के लिए “सावधानीपूर्ण” दृष्टिकोण अपनाने का फैसला किया है। उन्होंने इसके अनुमोदन और लेबलिंग के लिए कड़े नियम निर्धारित किए हैं। यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, ब्राजील और दक्षिण कोरिया ने जीएम फूड को लेबल करना अनिवार्य कर दिया है ताकि उपभोक्ताओं के पास खाने का चुनाव करते समय विकल्प मौजूद हों|(downtoearth)
एनएसओ ने पहली बार टाइम यूज इन इंडिया सर्वे रिपोर्ट जारी की है, जिसमें लोगों की दिनचर्या के बारे में जानकारी जुटाई गई है
- Raju Sajwan
भारतीय सांख्यिकी संगठन (एनएसओ) ने 9 अक्टूबर को टाइम यूज इन इंडिया 2019 सर्वे रिपोर्ट जारी की। इसमें बताया गया है कि भारतीय अपना पूरा दिन किन-किन गतिविधियों में खर्च करता है। एनएसओ ने पहली बार ऐसी कोई रिपोर्ट तैयार की है।
एनएसओ ने 1 जनवरी से 31 दिसंबर 2019 के बीच यह सर्वे किया। इसमें 1,38,799 घरों के 4,47,250 लोगों को शामिल किया गया। इसमें परिवार में छह साल से अधिक उम्र के सभी सदस्यों की दिनचर्चा का विश्लेषण किया गया। इनमें 2,73,195 ग्रामीण और 1,74,055 शहरी शामिल थे। सर्वे के दौरान सुबह 4 बजे से लेकर अगले दिन सुबह 4 बजे तक के कामकाज के बारे में बातचीत की गई।
इस रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय एक दिन में सबसे अधिक 726 मिनट अपनी देखभाल पर खर्च करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि सबसे अधिक यानी 737 मिनट ग्रामीण पुरुष अपनी देखभाल पर खर्च करते हैं। इस रिपोर्ट में स्वयं की देखभाल में सोना, खाना-पीना, सेहत पर ध्यान देना, इलाज कराना, अपनी देखभाल के लिए कहीं आना-जाना आदि शामिल है।
इसके बाद सबसे अधिक समय रोजगार और उससे जुड़ी गतिविधियों पर खर्च किया जाता है। एक दिन में 429 मिनट रोजगार और उससे जुड़ी गतिविधियों पर खर्च किए जाते हैं। इस मामले में गांवों वालों के मुकाबले शहर वालों को ज्यादा समय देना पड़ रहा है। शहर के लोगों को दिन के 485 मिनट इस पर खर्च करने पड़ रहे हैं। सबसे अधिक शहरी पुरुषों को 514 मिनट (लगभग 9 घंटे) रोजगार के लिए खर्च करने पड़ रहे हैं। इनके मुकाबले ग्रामीण पुरुषों को 434 मिनट खर्च करने पड़ रहे हैं। अगर महिलाओं की बात करें तो ग्रामीण महिलाओं को 317 मिनट और शहरी महिलाओं को 375 मिनट रोजगार व उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए बिताने पड़ रहे हैं।
एक और दिलचस्प आंकड़ा बताता है कि ग्रामीण परिवेश की महिलाएं अपने दिन के 301 मिनट अपने परिवार के सदस्यों के लिए खर्च कर देती हैं और इसके बदले उन्हें कोई भुगतान नहीं किया जाता। जबकि इनके मुकाबले शहरी महिलाएं 293 मिनट अपने परिवार के सदस्यों के लिए खर्च करती हैं। इस मामले में ग्रामीण पुरुष 98 मिनट और शहरी पुरुष 94 मिनट ही खर्च करते हैं।
हालांकि लोग समाज के काम करने, सूचनाएं इधर से उधर पहुंचाने, ईमेल, चैट आदि पर भी बड़ा समय खर्च कर रहे हैं। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक लोग दिन में औसतन 143 मिनट सोशलाइजिंग एंड कॉम्युनिकेशन, सामाजिक भागीदारी और धार्मिक कार्यों पर खर्च कर रहे हैं। जबकि संस्कृति, मास मीडिया और खेलों पर 165 मिनट खर्च किए जा रहे हैं।
सीखने यानी शिक्षा आदि पर भी बड़ा समय खर्च किया जा रहा है। औसतन दिन का 424 मिनट पर लर्निंग पर खर्च किए जा रहे हैं। इस मामले में शहरी, गांव वालों से थोड़ा आगे हैं। गांवों में 422 मिनट लर्निंग पर खर्च किए जा रहे हैं तो शहरों में 430 मिनट खर्च किए जा रहे हैं।(downtoearth)
प्रकाश दुबे
हिमाचल प्रदेश को कश्मीर घाटी से हर मौसम में सडक़ मार्ग से जोडऩे के लिए हिमालय क्षेत्र में अटल सुरंग खुली। सुनसान सुरंग पार करते समय प्रधानमंत्री को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में स्थान पा चुके अटल बिहारी वाजपेयी तथा देश के लिए कुर्बानी देने वाले जवान याद आए होंगे। सुरंग बनने मात्र से अपने आपको चीन की चुनौती का मुंहतोड़ जवाब देने लायक मानने का भ्रम न करें। अमेरिका की पहल पर जापान और आस्ट्रेलिया से मिलकर चीन के विरुद्ध मोर्चा तैयार करना इसी रणनीति का अंग है। कूटनीति की कसौटी पर ऐसे अवसर भी आते हैं जब विवश होकर पुराने संकल्प की अनदेखी की जाती है। संसद के शीतकालीन अधिवेशन के दौरान सारे देश में आंतरिक मुद्दों पर हंगामा मचा था। विदेश मंत्री जयशंकर अन्यत्र महत्वपूर्ण काम में व्यस्त थे। यह काम था-तालिबान से बातचीत का। अमेरिका पिछले लंबे अरसे से अफगानिस्तान से अपनी फौजें हटाने की जुगत में है। किसी वक्त रूस की लाल सेना को अफगानिस्तान से खदेडऩे के लिए अमेरिका ने तालिबानी मनोवृत्ति वाले कबीलों को साधन और शस्त्र दिए। उन्हें ताकतवर हमलावर बनाया। रूस को भागना पड़ा। तालिबानियों के मुंह को खून लग चुका था। उन्होंने अमेरिकी सैनिकों पर हमले किए। सैनिकों की मौतों पर देश के अंदर जारी विरोध से अमेरिकी प्रशासन परेशान है। तालिबान से वार्ता में भारत के शामिल होना आश्चर्यजनक रहा। तालिबान और पाकिस्तान की मिलीभगत के कारण वर्ष 1999 में इंडियन एयरलाइन्स के विमान का अपहरण किया गया।
अमृतसर, लाहौर और दुबई की धरती को छूने के बाद अपहरण कर्ताओं ने विमान को कंधार, अफगानिस्तान में उतरने के लिए मजबूर किया। अपहर्ताओं ने 176 यात्रियों में से 27 को दुबई में छोड़ दिया एक को बुरी तरह चाकू से मारा और कई अन्य को घायल कर दिया। भारतीय ही नहीं, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट में बताया गया कि अपहर्ताओं, अल-कायदा और तालिबान के बीच गहरे संबंध हैं। उनकी साजिश का भारत शिकार बना। वाजपेयी सरकार के दो मंत्री जसवंत सिंह और शरद यादव बातचीत के लिए कंधार गए।
अपहरणकर्ताओं की शर्त मानकर तीन आतंकवादी जेल से रिहा किये गए। आतंकवादियों को तालिबान द्वारा एक सुरक्षित मार्ग प्रदान किया गया। देशभक्ति का पाठ पढ़ाने वाला एक निजी चैनल हर जान की कीमत की मांग कर देश भर में हर कीमत पर यात्रियों की रिहाई की मांग करता रहा। क्षुब्ध प्रधानमंत्री वाजपेयी कड़ा जवाब देने के पक्ष में थे। देश भर में हाहाकार मचने का प्रचार हुआ। दबाव में आकर प्रधानमंत्री ने आतंकियों की मांगें मानी। भारत ने उसी पल संकल्प किया कि कभी भी, किसी भी कीमत पर तालिबान से कोई बात नहीं होगी। भारत की ओर से मध्यस्थ जसवंत सिंह ने इस शर्मनाक पल पर इस आशय की घोषणा की थी। जसवंत सिंह के आखिरी सांस लेने से पहले भारत तालिबान के साथ वार्ता करने के लिए हाजिर हुआ। 22 बरस के अंतराल में कूटनय में बदलाव का यह पहला अवसर नहीं है। कुछ दिन पहले भारत और डेनमार्क के प्रधानमंत्रियों ने आपस में बातचीत की। देश और दुनिया को बेहतर बनाने के नेक इरादे से करार किए। साल 1995 में पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में शस्त्रों का जखीरा पकड़ा गया था। डेनमार्क का नागरिक किम डेवी इन्हें विमान से लाया था। किम को भारत के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेडऩे का अपराधी मानते हुए भारत सरकार ने मामला दर्ज किया। किम के प्रत्यर्पण की भारत की मांग को डेनमार्क ने सिरे से खारिज कर दिया। भारत ने डेनमार्क सरकार के साथ सौदे और करार नहीं करने का निर्णय किया। समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं। आपसी मतभेद अपनी जगह रहते हैं। इस तरह के निर्णय किसी खास दल या व्यक्ति के नहीं होते। 1984 पुस्तक के जार्ज आर्वेल जैसे लेखक ने व्यंग्य किया था-हर दौर में सत्तारूढ़ वर्ग अपने समर्थकों के समक्ष विश्व के बारे में फर्जी परिदृश्य लादता है। उनकी फब्ती अपनी जगह। विदेश नीति के साथ कूटनय में इस तरह के बदलाव अकारण तो नहीं होंगे। परिदृश्य बदलने के साथ पैंतरा बदलता है। कंधार पश्चिम के पड़ोसी देश अफगानिस्तान का हिस्सा है। पुरलिया पूरब में पश्चिम बंगाल में। दोनों घटनाएं अलग अलग सालों में दिसम्बर के महीने में घटीं। दोनों के बारे में अब जाकर सितम्बर महीने में कूटनीतिक बदलाव हुआ। सितम्बर महीने में दुनिया से अलविदा कहने वाले जसवंत के कंधार संबंधी निर्णय को अमान्य किया। जसवंत सिंह ने मोहम्मद अली जिन्ना की प्रशंसा की थी। उनके इस गुनाह को माफ नहीं किया गया। जसवंत सिंह के पहले लाल कृष्ण आडवाणी जिन्ना की कब्र पर जाकर प्रणाम करने के अपराध की सजा भुगत चुके हैं। कांग्रस पर निशाना साधने के फेर में आडवाणी कह गए-भारत विभाजन के लिए जिन्ना को दोषी ठहराना अनुचित है। शहादत की मुद्रा में दोनों नेता जार्ज आर्वेल की तरह सोचते रहे-जो समाज सत्य से जितनी दूर भागता है, वह सच बोलने वालों से उतनी अधिक नफरत करने लगता है। वर्तमान नेतृत्व कौटिल्य की सीख पर चला-दूसरों की गलतियों से सीख लेना चाहिए। अपने ऊपर प्रयोग करने पर जिंदगी कम पड़ जाएगी।
हम आप ध्यान देते हैं?
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐसा फैसला दे दिया है, जिसके कारण सभी प्रदर्शनकारियों और धरनाधारियों को अब जऱा सम्हलकर रहना होगा। शाहीन बाग में कई हफ्तों तक पड़ौसी देशों के शरणार्थियों के बारे में बने कानून के विरुद्ध धरना चलता रहा। यदि कोरोना की महामारी नहीं आ धमकती तो भारत में सैकड़ों शाहीन बाग उग आते। देश भर के विरोधियों को बड़ी मुश्किल से एक मौका हाथ लगा था, मोदी सरकार की टांग खिंचाई का। वह कानून भी बड़ा बेढब था। वह पड़ौसी देशों के मुसलमान शरणार्थियों के अलावा सभी का स्वागत करता है। उसका विरोध बिल्कुल तर्कसंगत था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी कहा है कि शरणार्थियों में मजहब और जाति का भेद क्यों करना ? सर्वोच्च न्यायालय ने भी किसी प्रदर्शन, धरने और जुलूस का विरोध नहीं किया है। उसने भी संविधान में दी गई अभिव्यक्ति की आजादी का पूरा समर्थन किया है लेकिन उसने ऐसे धरनों, प्रदर्शनों और जुलूसों को गलत बताया है, जिनकी वजह से आम आदमियों का जीना मुहाल हो जाए। उनकी राय है कि शाहीन बाग के धरने के कारण दिल्ली की एक व्यस्त सडक़ बिल्कुल ठप्प हो गई थी।
तीन-चार महिने तक लोगों को काफी चक्कर लगाकर अपने गंतव्य स्थान पर पहुंचना पड़ता था। अदालत ने यह भी कहा कि शाहीन बाग के धरने का कोई सुनिश्चित नेता नहीं था और इन्टरनेट की तकनीक के कारण तरह-तरह के लोग वहां जमा हो रहे थे। जिन महिलाओं ने यह धरना शुरु किया था, वे तो एक तंबू में सीमित हो गई थीं लेकिन सडक़ों पर जगह-जगह लोगों ने अपने-अपने अड्डे जमा लिये थे। सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले की भी आलोचना की है, जिसके अंतर्गत इस मामले को उसने पहले ही दिन अधर में लटकाकर छोड़ दिया। उसकी मान्यता है कि सरकार को इस तरह के धरनों को खत्म करने के लिए तुरंत सक्रिय होना चाहिए। ऐसे धरने लंबे समय तक नहीं चलने दिए जाने चाहिए। लेकिन शाहीन बाग की धरनाधारी महिलाओं का कहना है कि पुलिस ने उन्हें जंतर-मंतर नहीं जाने दिया और उन्होंने शाहीन बाग में 500 मीटर से ज्यादा जगह नहीं घेरी हुई थी। वहां रास्ता तो रुका हुआ था, पुलिस की घेराबंदी के कारण ! हमारा इरादा रास्ता रोककर लोगों को मुश्किल में डालने का बिल्कुल नहीं था। उन्होंने अदालत के फैसले का सम्मान करने की बात भी कही है लेकिन बेहतर होता कि अदालत ऐसे प्रदर्शनों पर रोक लगाने के साथ-साथ उन धार्मिक जुलूसों, कथाओं और नाच-गाना कार्यक्रमों के बारे में भी कुछ कहती, जो हफ्तों चलते रहते हैं और सार्वजनिक रास्तों, चौराहों और बाजारों को ठप्प कर देते हैं। (नया इंडिया की अनुमति से)
यह आंकड़ा वर्ल्ड बैंक द्वारा अप्रैल में लगाए गए अनुमान का लगभग दोगुना है
- Kiran Pandey, Lalit Maurya
विश्व बैंक द्वारा हर दो वर्ष में जारी की जाने वाली पावर्टी एंड शेयर्ड प्रोस्पेरिटी रिपोर्ट के अनुसार 2020 में दुनिया के 8.8 से 11.5 करोड़ अतिरिक्त लोग गरीबी के चरम स्तर पर पहुंच जाएंगे। जबकि 2021 तक यह आंकड़ा बढ़कर 15 करोड़ पर पहुंच जाएगा। 7 अक्टूबर को जारी इस रिपोर्ट के अनुसार 20 वर्षों में यह पहला मौका है जब गरीबी की दर नीचे जाने की जगह बढ़ जाएगी।
जहां कयास लगाए जा रहे थे कि 2020 में वैश्विक रूप से चरम गरीबी में होने वाली वृद्धि दर घटकर 7.9 फीसदी रह जाएगी, लेकिन इस नए अनुमान से पता चला है कि कोविड-19 महामारी के चलते यह दर 1.3 फीसदी की वृद्धि के साथ 9.2 फीसद हो जाएगी।
जहां छह महीने पहले अप्रैल 2020 में वर्ल्ड बैंक का अनुमान था कि चरम रूप से गरीबी की मार झेल रहे लोगों का यह आंकड़ा 4 से 6 करोड़ के बीच होगा। लेकिन इस नई रिपोर्ट से पता चला है कि इसके उससे दोगुने से ज्यादा से ज्यादा रहने का अनुमान है।
रिपोर्ट के अनुसार अनुमान है कि इसमें से अधिकांश लोग उन गरीब देशों के होंगे जो पहले से ही भीषण गरीबी की मार झेल रहे हैं। जबकि मध्यम-आय वाले देशों की भी एक अच्छी खासी आबादी गरीबी रेखा से नीचे खिसक जाएगी। अनुमान है कि इसके करीब 82 फीसदी लोग मध्यम आय वाले देशों के होंगे।
वर्ल्ड बैंक के अनुसार शहरों में बढ़ती आबादी के कारण बड़ी संख्या में लोग चरम गरीबी को झेलने पर मजबूर हो जाएंगे। जबकि दूसरी ओर अधिकांश गांवों में रहने वाले लोग अभी भी अत्यधिक गरीब हैं। 2015 से 2017 के बीच करीब 5.2 करोड़ लोग गरीबी से उबर गए थे, तो ऐसा लगा था कि विश्व से जल्द ही गरीबी की यह समस्या दूर हो जाएगी। इस अवधि में गरीबी दर में आने वाली कमी प्रति वर्ष घटकर आधा फीसद से भी कम हो गया थी। जबकि इससे पहले 1990 से 2015 के दौरान वैश्विक गरीबी में 1 फीसदी प्रति वर्ष की दर से कमी आ रही थी।
139 रुपए प्रति दिन पर अपना जीवन बसर कर रहा है दुनिया का हर दसवां इंसान
गौरतलब है कि पिछले 25 सालों (1990-2015) में चरम गरीबी की दर में 26 फीसदी की गिरावट आई है। इसके बावजूद यदि वैश्विक रूप से गरीबी में जीवन बसर करने वालों को आय के आधार पर बांटे तो दुनिया की 10 फीसदी आबादी 139.15 रुपए (1.90 डॉलर) प्रति दिन से कम पर अपना जीवन गुजार रही है। वहीं एक चौथाई लोग 234.36 रुपए (3.20 डॉलर) और 40 फीसदी से ज्यादा आबादी करीब 330 करोड़ लोग 402.81 रुपए (5.50 डॉलर) प्रति दिन से कम पर अपना जीवन बसर करने को मजबूर हैं।
वर्ल्ड बैंक का अनुमान है कि कोरोना महामारी के चलते दुनिया भर में लोगों की औसत आय में गिरावट आई है। जिसकी सबसे ज्यादा मार गरीब तबके पर पड़ी है। रिपोर्ट के अनुसार देश की सबसे ज्यादा गरीब 40 फीसदी आबादी पर महामारी के कारण आई मंदी का असर पड़ा है।
रिपोर्ट के अनुसार जिस तरह से वैश्विक औसत आय में गिरावट आ रही है। उसका असर वैश्विक समृद्धि पर पड़ेगा। जिसमें होने वाला विकास 2019 से 2021 के बीच या तो स्थिर हो जायेगा या फिर उसमें भी कमी आ जाएगी। आंकड़ों के अनुसार 2012-2017 के बीच सभी का विकास हुआ था, जिससे अत्यधिक गरीबी में जीवन बसर कर रही 40 फीसदी आबादी की आय में भी वृद्धि दर्ज की गई थी। उस अवधि में सबके साझा विकास और उन्नति की बात करें तो इस अवधि में उसकी दर 2.3 फीसदी थी।
ऐसे में विश्व बैंक ने चेताया है कि यदि इस संकट से निपटने के लिए उचित नीतियां नहीं बनाई गई तो उसके चलते आय में आ रही असमानता में और वृद्धि हो सकती है। जिससे दुनिया भर में अमीर-गरीब के बीच की खाई और गहरी हो सकती है।(downtoearth)
प्रेमचंद का कहना था कि ‘जवाहरलाल नेहरू की नीति वही है जिससे भारत के गरीब से गरीब आदमी को दैहिक और मानसिक भोजन और समान अवसर मिले’
- शुभनीत कौशिक
अप्रैल 1936 में लखनऊ में हुए प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए प्रेमचंद ने साहित्य को ‘जीवन की आलोचना’ कहा था. उन्होंने कहा कि ‘साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है – उसका दरजा इतना न गिराइए. वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है.’
कहना न होगा कि प्रेमचंद का समूचा रचनाकर्म ही अपने समय की राजनीतिक-सामाजिक हलचलों की बानगी देता है. ‘सोज़-ए-वतन’ की कहानियों से लेकर, ‘गोदान’ सरीखे उपन्यास और ‘महाजनी सभ्यता’ जैसे लेख इसके साक्षी हैं. प्रेमचंद और उनकी पत्नी शिवरानी देवी तीस के दशक में राष्ट्रीय आंदोलन में भी सक्रिय हो चुके थे. जवाहरलाल नेहरू की मां स्वरूप रानी के व्यक्तित्व और उनके त्याग से प्रेमचंद और शिवरानी देवी दोनों ही गहरे प्रभावित थे. सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान स्वरूप रानी नेहरू से प्रभावित होकर शिवरानी देवी ‘महिला आश्रम’ की सदस्य बनीं. नवंबर 1930 में शिवरानी देवी की गिरफ़्तारी हुई और तीन महीने बाद वे रिहा हुईं.
वर्ष 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दूसरे चरण के दौरान जवाहरलाल नेहरू की मां स्वरूप रानी पर एक प्रदर्शन के दौरान लाठी बरसाई गई, जिससे उनके सर पर गहरी चोट आई. प्रेमचंद की जीवनी लिखने वाले मदन गोपाल लिखते हैं कि इस घटना से व्यथित होकर प्रेमचंद ने कानपुर से छपने वाले उर्दू पत्र ‘ज़माना’ के सम्पादक दयानारायण निगम को एक ख़त में लिखा था कि ‘सरकार की दमनकारी नीतियां अब असहनीय हो चुकी हैं. जवाहरलाल नेहरू की माता जी के साथ कितना क्रूर और अपमानजनक व्यवहार किया गया! मैं शर्मिंदा हूं कि इतना सब कुछ होने के बाद मैं अब भी जेल से बाहर हूं.’
राष्ट्रीय आंदोलन और प्रेमचंद का आर्थिक नज़रिया
वर्ष 1933 में जवाहरलाल नेहरू ने आर्थिक सवालों पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए इलाहाबाद से छपने वाले अंग्रेज़ी दैनिक ‘लीडर’ में एक लेखमाला शुरू की. इस लेखमाला में नेहरू ने आर्थिक प्रश्नों पर कांग्रेस की नीति को स्पष्टता के साथ पाठकों के सामने रखा. 16 अक्तूबर 1933 को ‘जागरण’ में प्रकाशित संपादकीय में प्रेमचंद ने लिखा कि ‘जवाहरलाल नेहरू की नीति वही है जिससे भारत के गरीब से गरीब आदमी को दैहिक और मानसिक भोजन और समान अवसर मिले. आप पूंजीपतियों के फ़ायदे के लिए चाहे देश के हों चाहे विदेश के, गरीबों और मज़दूरों का पीसा जाना नहीं देख सकते और यही आपकी नीति है.’
प्रेमचंद ने ज़ोर देकर कहा कि यही सच्ची आर्थिक नीति है. उनका कहना था कि ‘इसके सिवा अगर कोई अर्थनीति है, तो वह धनवानों की, स्वार्थियों की, मोटी तोंद वालों की नीति है. जो नीति धन वालों को गरीबों के ख़ून पर मोटा करती है, उसका जितनी जल्दी अंत हो जाए उतना ही अच्छा.’ प्रेमचंद का मानना था कि कांग्रेस पूंजीपतियों की नीति का समर्थन करके राष्ट्रीय संस्था नहीं बन सकती.
नवंबर 1933 में जवाहरलाल नेहरू अपनी पत्नी कमला नेहरू के साथ बनारस आए. यहां उन्होंने कई सभाओं को संबोधित किया. वे सारनाथ स्थित मूलगंधकुटी विहार भी गए थे. तभी बनारस में साहित्यकारों के एक समूह ‘रत्नाकर रसिक मंडल’ ने जवाहरलाल नेहरू को मानपत्र दिया. इसके उत्तर में नेहरू ने साहित्यकारों से हिंदी की उन्नति करने और उसे समृद्ध बनाने पर ज़ोर दिया था. बनारस में दिए अपने इन व्याख्यानों में नेहरू ने विश्व इतिहास, राजनीति, विभिन्न देशों की शासन-पद्धतियों की चर्चा की. साथ ही, उन्होंने संसार में व्याप्त असमानता और विषमता के कुचक्र पर बात करते हुए समाजवादी नीतियों की वकालत की.
‘जागरण’ में 20 नवंबर 1933 को प्रकाशित संपादकीय में नेहरू द्वारा बनारस में दिए व्याख्यानों की चर्चा करते हुए प्रेमचंद ने लिखा कि ‘श्री जवाहरलाल नेहरू ने अपने व्याख्यानों में वैज्ञानिक साम्यवाद (साइंटिफिक सोशलिज़्म) शब्द का प्रयोग किया. आपका अभिप्राय यह था कि वर्तमान समाज में मनुष्य-मनुष्य में जो भीषण असमानता है, वह दूर हो. यह ठीक नहीं है कि एक मनुष्य के पास अथाह धन भरा पड़ा हो और दूसरा मनुष्य भूखा मरता हो. समाज का इस प्रकार संगठन होना चाहिए, जिससे कोई मनुष्य भूखा न रहने पावे, सबको पर्याप्त अन्न और वस्त्र मिले और सबको उन्नति करने का समान अवसर हो.’
इसी दौरान बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में दिए अपने व्याख्यान में जवाहरलाल नेहरू ने हिन्दू महासभा को आड़े हाथों लिया और हिन्दू महासभा की हिन्दू राज स्थापित करने, सरकार, राजाओं, महाराजाओं और जमींदारों से सहयोग करने, स्वतंत्रता की भावनाओं के विरुद्ध काम करने की नीति की कड़ी निंदा की. इसका ज़िक्र भी प्रेमचंद ने ‘जागरण’ के अपने संपादकीय में किया था.
उल्लेखनीय है कि अपनी असमय मृत्यु से कुछ समय पूर्व ही प्रेमचंद ने सितंबर 1936 में ‘महाजनी सभ्यता’ जैसा चर्चित लेख लिखकर पूंजवादी नीतियों और महाजनी सभ्यता की जमकर ख़बर ली थी. इसी लेख में प्रेमचंद ने लिखा था कि ‘महाजनी सभ्यता में तो सारे कामों की गरज महज़ पैसा होता है. किसी देश पर राज्य किया जाता है, तो इसलिए कि महाजनों, पूंजीपतियों को ज़्यादा-से-ज़्यादा नफ़ा हो. इस दृष्टि से मानो आज दुनिया में महाजनों का ही राज्य है. मनुष्य समाज दो भागों में बंट गया है. बड़ा हिस्सा तो मरने और खपने वालों का है, और बहुत ही छोटा हिस्सा उन लोगों का, जो अपनी शक्ति और प्रभाव से बड़े समुदाय को अपने बस में किए हुए हैं.’
स्त्री-शिक्षा का प्रश्न
वर्ष 1934 में जवाहरलाल नेहरू ने प्रयाग महिला विद्यापीठ में दीक्षांत भाषण दिया जिसमें उन्होंने स्त्रियों के आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से सक्षम बनने की वकालत की थी. प्रेमचंद ने 29 जनवरी 1934 को ‘जागरण’ में लिखे एक संपादकीय में नेहरू के स्त्री-शिक्षा संबंधी विचारों का समर्थन किया. नेहरू को उद्धृत करते हुए प्रेमचंद ने लिखा कि ‘जवाहरलाल नेहरू का ख़्याल है कि महिलाओं को केवल वैवाहिक जीवन के लिए क्यों तैयार किया जाए. उन्हें जब तक आर्थिक स्वतंत्रता न प्राप्त होगी उस वक़्त तक पति-पत्नी में साम्यवाद न उत्पन्न होगा.’
प्रेमचंद ने इस संपादकीय में उन लोगों की कड़ी आलोचना की, जो महिलाओं को केवल माता और गृहिणी बनाने वाली शिक्षा देने के हिमायती थे. ऐसी सोच रखने वाले पुरुषों पर टिप्पणी करते हुए प्रेमचंद ने लिखा कि ‘पुरुषों में प्रधानता की जो भावना उत्पन्न हो गई यह केवल उनकी मूर्खता के कारण है. वह समझते हैं वे बाहर से धन कमाकर लाते हैं, इसलिए उनका महत्त्व अधिक है. उन्हें यह भूल जाता है कि स्त्री घर में जो काम करती है, वह उनकी कमाई से कई गुना ज़्यादा महत्त्व की चीज है. जहां पुरुष बिलकुल गधे नहीं हैं वहां पराधीनता की गंध तक नहीं है.’
जनवरी 1934 में बिहार में भयानक भूकंप आया, जिससे जान-माल को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचा. भूकंप के बाद शुरू हुए राहत कार्य में जवाहरलाल नेहरू ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. लेकिन दुर्भाग्य से फरवरी 1934 में ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ़्तारी का फरमान जारी कर दिया और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. नेहरू की असमय गिरफ़्तारी पर टिप्पणी करते हुए प्रेमचंद ने 19 फरवरी 1934 को ‘जागरण’ में लिखा था :
इस अवसर पर जब कि पं. जवाहरलाल जी बिहार के उद्धार-कार्य में अपना लहू-पसीना एक कर रहे थे, सरकार ने उन्हें गिरफ़्तार करके उदारता का परिचय नहीं दिया. हम इसके लिए तैयार तो थे ही, सरकार ने कोई असाधारण बात नहीं की, लेकिन यह समझते थे कि यह सरकार भी उस काम की कुछ कद्र करेगी, जो पंडित जी इस समय कर रहे थे, लेकिन मालूम हुआ कि सरकार किसी तरह का सहयोग हमसे नहीं करना चाहती –
सैयाद की मर्जी है कि अब गुल की हवस में
नाले न करे मुर्ग गिरफ़्तार कफ़स में.
साहित्य और साहित्यकारों की भूमिका
वर्ष 1935 में अल्मोड़ा जेल में रहते हुए जवाहरलाल नेहरू ने ‘प्रताप’ में एक लेख लिखकर भारत भर के साहित्यकारों का एक प्रतिनिधि संगठन बनाने की हिमायत की थी. उल्लेखनीय है कि ठीक उसी समय ‘हंस’ द्वारा भी भारतीय साहित्य के संगठन व समन्वय के उद्देश्य की पूर्ति के लिए ‘भारतीय साहित्य-संघ’ स्थापित करने की ज़रूरत पर विचार किया जा रहा था. नेहरू और ‘हंस’ की इस मुहिम में सादृश्यता पर टिप्पणी करते हुए प्रेमचंद ने ‘हंस’ में नवंबर 1935 में प्रकाशित संपादकीय में लिखा कि ‘नेहरू और हमारे आयोजनों में अद्भुत सादृश्य है. इससे यह सिद्ध होता है कि राष्ट्र की विचारधारा सांस्कृतिक एकता की ओर कितने वेग और कितनी एकरसता के साथ दौड़ रही है. नेहरू जी राष्ट्र के प्राण हैं और उनका हृदय राष्ट्र का हृदय है, जिसमें राष्ट्र की सम्पूर्ण आकांक्षाएं और भावनाएं प्रतिबिंबित होती हैं. साहित्यिक और सांस्कृतिक एकता राष्ट्र के विकास का मुख्य अंग है और यह भविष्य का शुभ लक्षण है कि वह भावना राष्ट्र के मन में प्रबल हो उठी है.’
इसके साथ ही, ‘प्रताप’ में छपे उस लेख में नेहरू ने भारतीय भाषाओं और साहित्य की वर्तमान स्थिति के बारे में लिखते हुए भारत की विभिन्न प्रांतीय भाषाओं के बीच संवाद बढ़ाने पर ज़ोर दिया था. भारतीय साहित्यकारों का आह्वान करते हुए नेहरू ने लिखा कि वे विश्व भर के साहित्यकारों से संवाद स्थापित करें और अंतरराष्ट्रीय साहित्य संघों में भी हिस्सा लें जिससे कि भारतीय साहित्य को अपेक्षित विश्व-दृष्टि मिल सके. इस बात का समर्थन करते हुए प्रेमचंद ने यह भी लिखा कि अंतरराष्ट्रीय संघों में शामिल होने के लिए राष्ट्रभाषा की ज़रूरत होगी.
प्रेमचंद का कहना था कि ‘अगर हम संसार-साहित्य में वह स्थान प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें अपनी राष्ट्रभाषा बनानी होगी और उसी के आधार पर संसार साहित्य-समाज में भाग लेना पड़ेगा.’ इसी संदर्भ में, प्रेमचंद ने उन भारतीय नेताओं को भी आड़े हाथों लिया जो भारतीय भाषाओं की उपेक्षा कर रहे थे. प्रेमचंद ने लिखा कि ‘हमारे शिक्षित वर्ग की यह हालत हो गई है कि उनमें से अधिकांश अपनी मातृ-भाषा में एक लाइन भी शुद्ध नहीं लिख सकते. दुःख तो यह है कि जो हमारे नेता कहलाते हैं, उनमें से अधिकांश अपनी मातृ-भाषा से अनभिज्ञ हैं और जिस समाज के नेता जनता से इतनी दूर हट गए हों कि उनमें भाषा का संबंध भी न हो, उस समाज की दशा जो हो रही है, वह हम अपनी आंखों देख रहे हैं.’
नेहरू ने ‘प्रताप’ में छपे उसी लेख में अंग्रेज़ी के अलावा दूसरी यूरोपीय भाषाओं को सीखने का भी आग्रह किया था. नेहरू ने लिखा था कि ‘अंग्रेज़ी काफी नहीं है और सिर्फ अंग्रेज़ी जानने की वजह से हम अक्सर धोखा खा चुके हैं. हम सारी दुनिया को अंग्रेज़ी ऐनकों से देखने लगे हैं और यह नहीं महसूस करते कि वह एकतरफ़ी है. अंग्रेज़ी हुकूमत से राजनीतिक मुक़ाबला करते हुए भी हम विचारों से उनके गुलाम हो गए… अगर हम फ्रेंच या जर्मन या रूसी किताबें या अख़बार पढ़ें, तो मालूम होता है कि दुनिया में कोई और चीज भी है, और अंग्रेज़ी का उसमें इतना बड़ा हिस्सा नहीं है, जितना हम समझते थे.’
हिंदी साहित्य की वस्तु-स्थिति
कलकत्ता से छपने वाली हिंदी की प्रसिद्ध पत्रिका ‘विशाल भारत’ में जवाहरलाल नेहरू ने जुलाई 1935 में एक लेख लिखा. इसका शीर्षक था ‘हमारा साहित्य’. इस लेख में नेहरू ने अपने हिंदी साहित्य संबंधी ज्ञान की अल्पज्ञता को स्वीकार करते हुए यह जानना-समझना चाहा था कि ‘हिंदी-साहित्य में आजकल क्या-क्या विचारधाराएं चल रही हैं, क्या-क्या सवाल उसके सामने हैं, उसकी निगाह किधर है?’ नेहरू ने इसी संदर्भ में हिंदी में राजनीति, विश्व-इतिहास, अर्थशास्त्र, विज्ञान, समाज-विज्ञान की पुस्तकों के अभाव की चर्चा भी की. नेहरू ने लिखा कि ‘जिन विषयों में मुझे दिलचस्पी है, उनमें मुझे अभी तक हिंदी में बहुत कम पुस्तकें मिली हैं. मैं आजकल की दुनिया को समझना चाहता हूं. जो ऊपरी वाक़यात होते हैं और जिनका हाल हम कुछ समाचार-पत्रों में पढ़ते हैं, मैं उनके पीछे देखना चाहता हूं, ताकि मैं समझूं कि वे क्यों हुए; क्या-क्या अंदरूनी ताक़तें दुनिया के लोगों को इधर-उधर धकेल रही हैं; क्या-क्या भावनाएं उनके दिलों में हैं, कौन-कौन से बड़े-बड़े सवाल संसार भर को और हमारे देश को परेशान कर रहे हैं?’
जनवरी 1936 के ‘हंस’ में प्रकाशित एक संपादकीय में प्रेमचंद ने नेहरू के ‘विशाल भारत’ वाले लेख की चर्चा की थी. प्रेमचंद ने लिखा था कि ‘हमें तो यही आश्चर्य है कि पंडित जी ने कैसे यह विश्वास कर लिया कि हिंदी में साहित्य ने इतनी उन्नति कर ली है. जब पढ़े-लिखे लोग हिंदी लिखना अपनी शान के खिलाफ़ समझते हैं, जब हमारे नेता हिंदी-साहित्य से प्रायः बेख़बर-से हैं, जब हम लोग थोड़ी-सी अंग्रेज़ी लिखने की सामर्थ्य होते ही हिंदी को तुच्छ और ग्रामीणों की भाषा समझने लगते हैं, तब यह कैसे आशा की जा सकती है कि हिंदी में ऊंचे दर्जे के साहित्य का निर्माण हो.’
एक ओर भारत की पराधीनता तो दूसरी ओर शिक्षित वर्ग द्वारा हिंदी समेत दूसरी भारतीय भाषाओं की उपेक्षा भारतीय भाषाओं की राह में कैसे अवरोध खड़े कर रहे थे. इस सच्चाई से भी प्रेमचंद भलीभांति वाकिफ़ थे. इसीलिए उन्होंने लिखा कि ‘एक तो पराधीनता यों ही हमारी प्रतिभा और विकास में चारों ओर से बाधक हो रही है, दूसरे हमारा शिक्षित समुदाय हिंदी-साहित्य से कोई सरोकार नहीं रखना चाहता, तो साहित्य में प्रगति और स्फूर्ति कहां से आए?’
प्रेमचंद का विश्वास था कि उत्कृष्ट साहित्य की रचना तभी संभव होगी जब शिक्षित समुदाय उस सृजन-प्रक्रिया में हिस्सा लेगा, उसके गुण-दोष पर चर्चा की जाएगी. उन्होंने लिखा कि ‘ऊंचा साहित्य तभी आएगा, जब प्रतिभा सम्पन्न लोग तपस्या की भावना लेकर साहित्य-क्षेत्र में आएंगे, जब किसी अच्छी पुस्तक की रचना राष्ट्र के लिए गौरव की बात समझी जाएगी, जब उसकी चाय की मेजों पर चर्चा होगी, जब विद्वान लोग साहित्य में रस लेंगे.’(satyagrah)
लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान की पहली शादी 1960 में राजकुमारी देवी से तो दूसरी रीना से 1983 में हुई थी.
चिराग पासवान केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की दूसरी पत्नी रीना के बेटे हैं. पासवान की पहली पत्नी से दो बेटियां हैं जबकि दूसरी पत्नी रीना से एक बेटा और एक बेटी है. पासवान ने पंजाब की रहने वाली रीना से साल 1983 में शादी की थी.
लोकजनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष रामविलास पासवान ने 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान पहली बार खुलासा किया था कि उन्होंने 1981 में पहली पत्नी से तलाक लिया था. पासवान ने यह खुलासा तब किया तब जदयू ने उनकी वैवाहिक स्थिति को लेकर नामांकन को चुनौती दी थी. हाजीपुर के तत्कालीन सांसद और जदयू उम्मीदवार राम सुंदर दास के एजेंट कन्हैया प्रसाद ने पासवान के मामले को उठाते हुए कहा था कि उन्होंने अपने हलफनामे में पहली पत्नी का राजकुमारी देवी के नाम का जिक्र नहीं किया था.

रामविलास पासवान की पहली पत्नी राजकुमारी देवी
हालांकि पासवान के वकील जिला निर्वाचन अधिकारी विनोद सिंह गुंजियाल के समक्ष राजकुमार से 1981 में हुए तलाक से संबंधित दस्तावेज पेश किए थे. पासवान ने राजकुमारी देवी से 1960 में शादी की थी. जब 1997 में पासवान पहली बार सांसद बने तब भी राजकुमारी उनकी पत्नी थी. वो पासवान जी से बहुत प्यार करती हैं हालाँकि, उन्हें इस बात का दुःख है कि पहली पत्नी के रूप मे उन्हें पासवान जी से जो प्यार और अपनत्व मिलना चाहिए था वो न मिल पाया.
पासवान की दो बेटियां हैं,ऊषा और आशा. दोनों बेटियां पहली पत्नी से है और दोनों की शादी हो चुकी है. नामांकन पत्र में पासवान ने तीन बेटियों और एक बेटे की जानकारी दी थी लेकिन यह नहीं बताया था कि सभी बच्चे दो बीवियों से है.
पहली पत्नी से तलाक के बाद उन्होंने 1983 में पूर्व एयर होस्टेस रीना शर्मा से शादी की. वे पंजाबी मूल की हैं. 1983 में रामविलास पासवान ने रीना शर्मा से शादी की जो कि उस समय एयर होस्टेस थीं और पंजाबी हिंदू फैमली में जन्मीं थी. वो मूलत: अमृतसर की रहने वाली हैं. दोनों को फ्लाइट में आते-जाते एक-दूसरे से प्यार हो गया था. पहली शादी के 23 साल बाद दोनों ने 1983 में शादी कर ली थी. हालांकि रामविलास पासवान ने इस बड़े सच को दुनिया से कई दिनों तक छिपाया.
इस शादी से उनका एक बेटा चिराग पासवान और एक बेटी निशा है. चिराग बॉलीवुड में हीरो बनना चाहते थे उनकी साल 2011 में एक फिल्म ‘मिले हम ना मिले तुम’ आयी थी जो बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से फ्लॉप रही. इसके बाद चिराग राजनीति में एक्टिव हो गये और साल 2014 में वो जमुई से सांसद चुने गये.
अब तक शानदार राजनीतिक सफ़र रहा है
पासवान का जन्म 5 जुलाई 1946 को खगड़िया जिले के शहरबन्नी गांव में एक दलित परिवार में हुआ था. पासवान ने कोशी कॉलेज, पिलखी से एमए और पटना यूनिवर्सिटी से एलएलबी किया है. वे बिहार के महादलित समाज से आते हैं और लालू यादव, नीतीश कुमार की तरह जेपी मोवमेंट से नहीं निकले हैं, बल्कि उन्होंने चुनावी सफलता इससे पहले 1969 में ही हासिल कर ली थी. नरेंद्र मोदी कैबिनेट में केन्द्रीय मंत्री के तौर पर पासवान देश के ऐसे नेता हैं, जो पिछले 26 सालों के दौरान करीब हर प्रधानमंत्री के साथ काम कर चुके हैं.
वे कुल आठ बार लोकसभा, अब तक एक बार राज्यसभा और विधानसभा में जा चुके हैं. हालाँकि इस बार इन्होने घोषणा की है कि 2019 में लोक सभा चुनाव नहीं लड़ेंगे और राज्यसभा के रास्ते सदन में जायेंगे. इससे पहले वे 2010 से 2014 तक राज्य सभा के सदस्य रह चुके हैं. वे आठ बार लोक सभा का चुनाव जीत चुके हैं. उनके नाम से ही सबसे ज्यादा वोट से लोक सभा चुनाव में जीत हासिल करने का रिकॉर्ड था, बाद में ये रिकॉर्ड नर्शिम्हा राव ने तोड़ दिया. वे जनता पार्टी, लोकदल, जनता दल में भी रह चुके हैं. अपनी शानदार राजनीतिक समझ के चलते उन्होंने बार बार सत्ता पक्ष में रहने में सफलता पायी है. उनके इस गुण पर लालू यादव ने उन्हें देश का सबसे बड़ा मौसम वैज्ञानिक बताया. उन्होंने 2000 में लोक जनशक्ति पार्टी का गठन किया. उनकी पार्टी उनके परिवार के लोगों को प्रमोट करने का प्लेटफार्म बन कर रह गया है, पर लोजपा (LJP) प्रमुख को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. उनकी जाति के लोग उनके साथ मजबूती के साथ खड़े हैं. बिहार में आज भी पासवान जाति में उनकी कद का कोई नेता नहीं हो सका है. (marginalised)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया और भारत- इन चारों देशों के चौगुटे की बैठक, जो तोक्यो में हुई, वह अजीब-सी रही। इन चारों देशों के विदेश मंत्री एक-दूसरे से साक्षात मिले और चारों ने प्रशांत-क्षेत्र की शांति और सुरक्षा के बारे में विचारों का आदान-प्रदान किया। यह चौगुटा अमेरिका की पहल पर बनाया गया है। जैसे अमेरिका ने सोवियत संघ के विरुद्ध नाटो और सेन्टो के सैन्य-गुट खड़े किए थे, वैसे ही वह अब चाहता है कि चीन के विरुद्ध चक्र-व्यूह खड़ा किया जाए। यह डोनाल्ड ट्रंप के दिमाग की उपज है। राष्ट्रपति बराक ओबामा हेनरी कीसिंजर के सपने को आगे बढ़ाना चाहते थे और एशिया में चीन को विशेष महत्व देना चाहते थे। ट्रंप का रवैया भी शुरु-शुरु में यही था लेकिन व्यापार के मामले में चीन का कड़ा रुख ट्रंप की मुसीबत बन गया। ट्रंप ने पहले तो चीन के प्रति नरम-गरम रवैया अपनाया लेकिन कोरोना महामारी के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराकर उन्होंने उसके विरुद्ध खुला वाग्युद्ध छेड़ दिया। अब वे चाहते हैं कि चीन को सबक सिखाया जाए। इसीलिए उनके विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने तोक्यो-बैठक में चीन के खिलाफ जमकर आरोप लगाए।
उन्होंने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का नाम लेकर कहा कि उसके शोषण, भ्रष्टाचार और दादागीरी का डटकर विरोध किया जाना चाहिए। उन्होंने हांगकांग और ताइवान के खिलाफ किए जा रहे चीनी अत्याचारों का भी जिक्र किया। उन्होंने ‘भारत-प्रशांत क्षेत्र’ को चीनी दबाव से मुक्त करने का नारा भी लगाया। भारत को खुश करने के लिए उन्होंने लद्दाख में हुई मुठभेड़ का भी जिक्र किया। उन्होंने कोरोना महामारी का भी सारा दोष चीन के मत्थे मढ़ दिया। लेकिन शेष तीनों देशों के विदेश मंत्रियों के जो भाषण हुए, उनमें किसी ने भी चीन का नाम तक नहीं लिया। उनमें से कोई चीन से पंगा लेने को तैयार नहीं था। उनके भाषणों का सार यही था कि ‘हिंद-प्रशांत क्षेत्र’ में ‘कानून का राज’ चलना चाहिए और सामुद्रिक मार्ग सबके लिए खुले होने चाहिए। जब चारों विदेश मंत्री जापान के नए प्रधानमंत्री योशिहिद सुगा से मिलने गए तो उन्होंने भी यही कहा।
दूसरे शब्दों में चौगुटे के शेष अन्य तीन सदस्य अमेरिकी फिसलपट्टी पर फिसलने को तैयार नहीं थे। इसीलिए कोरोना-काल में हुई साक्षात बैठक ने कोई संयुक्त वक्तव्य जारी नहीं किया। हां, चीनी सरकार ने अमेरिकी रवैए की भर्त्सना करते हुए कहा कि किसी अन्य राष्ट्र की टांग खींचने के बजाय इस तरह के संगठनों को परस्पर सहयोग बढ़ाने पर जोर देना चाहिए। (नया इंडिया की अनुमति से)
समीरात्मज मिश्र
उत्तरप्रदेश के हाथरस में दलित युवती के साथ हुए कथित बलात्कार और फिर हत्या के मामले में पीडि़त युवती के परिजन जहां न्यायिक जांच की मांग पर अड़े हैं वहीं पुलिस अब इस घटना को ‘इतना तूल’ देने के पीछे अंतरराष्ट्रीय साजि़श की बात कह रही है।
उत्तरप्रदेश पुलिस का आरोप है कि राज्य में जातीय और सांप्रदायिक दंगे कराने और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बदनाम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय साजिश रची गई थी।
हाथरस के चंदपा थाने में इस संबंध में तीन दिन पहले एक नई एफ़आईआर दर्ज की गई जिसमें कुछ अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ राजद्रोह जैसी धाराएं लगाई गई हैं।
बुधवार को इस मामले में चार लोगों को मथुरा से गिरफ्तार भी किया गया जिनमें मलयालम भाषा के एक पत्रकार भी शामिल हैं। इस मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कहा था, ‘हमारे विरोधी अंतरराष्ट्रीय फंडिंग के जरिए जातीय और सांप्रदायिक दंगों की नींव रखकर हमारे खिलाफ साजिश कर रहे हैं।’
100 करोड़ रुपये की फंडिंग के आरोप
हाथरस मामले में कथित अंतरराष्ट्रीय साजिश के संबंध में उत्तर प्रदेश पुलिस ने राज्य भर में कम से कम 19 एफआईआर दर्ज की हैं और मुख्य एफआईआर में करीब 400 लोगों के खिलाफ राजद्रोह, षडय़ंत्र, राज्य में शांति भंग करने का प्रयास और धार्मिक नफरत को बढ़ावा देने जैसे आरोप लगाए गए हैं।
प्रवर्तन निदेशालय के हवाले से मीडिया में ये खबरें भी चल रही हैं कि हाथरस की इस घटना को जातीय और सांप्रदायिक दंगों में बदलने के लिए मॉरीशस के जरिए करीब 100 करोड़ रुपये की फंडिंग भी हुई है।
हालांकि इसके न तो पुख्ता सबूत मिले हैं और न ही आधिकारिक रूप से इसकी पुष्टि हुई है। पुलिस जिस संगठन पर शक जाहिर कर रही है उसका नाम पीएफआई यानी पॉपुलर फ्ऱंट ऑफ इंडिया है और गिरफ्तार किए गए लोगों के भी इस संगठन से संपर्क बताए जा रहे हैं।
शक के घेरे में रही है पीएफआई
राज्य सरकार ने इससे पहले नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ इस साल दिसंबर में हुए प्रदर्शनों और इस दौरान हुई हिंसा के लिए भी पीएफआई को ही जिम्मेदार ठहराया था।
उस दौरान 100 से भी ज़्यादा पीएफ़आई सदस्यों को गिरफ्तार किया गया था और मुख्यमंत्री ने इस संगठन पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। यूपी में इससे पहले भी कुछ घटनाएं ऐसी हो चुकी हैं जिनके तूल पकडऩे के बाद उनके ‘अंतरराष्ट्रीय तार’ जोडऩे की कोशिश की गई।
स्थानीय घटनाओं में अंतरराष्ट्रीय साजि़श की बात से हैरानी जरूर होती है लेकिन यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सूचना सलाहकार शलभमणि त्रिपाठी कहते हैं कि इस साजिश में कुछ राजनीतिक दल और उनके नेता भी शामिल हैं।
शलभमणि त्रिपाठी के मुताबिक, ‘राज्य सरकार ने दंगाई मानसिकता के लोगों के खिलाफ जो कार्रवाइयां की हैं, उससे ऐसे संगठनों में बौखलाहट है। उपद्रवियों के पोस्टर सरेआम चौराहों पर लगाए गए, उनकी संपत्तियां कुर्क करके सार्वजनिक नुकसान की वसूली भी की गई।’
‘ऐसे में पीएफ़आई जैसे संगठनों ने योगी सरकार को बदनाम करने और प्रदेश में जातीय और सांप्रदायिक दंगे कराने की साजिश रची। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि कुछ राजनीतिक दल भी अराजकता की इस साजिश में पीएफ़आई जैसे संगठनों के साथ खड़े दिख रहे हैं।’
नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ राज्य में कई जगह विरोध प्रदर्शन हुए थे और उस दौरान लखनऊ, कानपुर, आज़मगढ़, फिरोजाबाद, मेरठ जैसे कई शहरों में हिंसा भडक़ गई थी।
इस हिंसा में कई लोगों की मौत हुई थी और सरकार की कार्रवाई पर सवाल भी उठे थे। सरकार ने प्रदर्शनों के आयोजन और उस दौरान हिंसा होने की घटना को भी अंतरराष्ट्रीय साजिश बताया था।
वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस इन घटनाओं को अंतरराष्ट्रीय साजिश की बजाय ‘प्रशासनिक नाकामी को ढकने की कोशिश’ मानते हैं।
सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं, ‘हाथरस में जो कुछ भी हुआ है वह प्रशासनिक नाकामी और संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। सुप्रीम कोर्ट में भी इस नाकामी को ढकने के जो तर्क दिए गए हैं वो बेसिर-पैर के हैं। चूंकि प्रशासनिक नाकामी आखिरकार सरकार की ही नाकामी की तरह है, इसलिए उसे ढकने के लिए अब अंतरराष्ट्रीय साजिश की ढाल तैयार की जा रही है।’
यूपी के डीजीपी रह चुके रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी डॉक्टर वीएन राय हाथरस जैसी घटनाओं के पीछे अंतरराष्ट्रीय साजिश जैसी बात को सिरे से नकारते हैं।
बीबीसी से बातचीत में डॉक्टर वीएन राय कहते हैं, ‘इसमें कोई तथ्य नहीं हैं। सिर्फ गुमराह करने की कोशिश है। आप देखिएगा, दो-चार हफ़्ते के बाद ये सारी साजिशें कहीं नहीं दिखेंगी। सब भूल जाएंगे। अंतरराष्ट्रीय साजि़श के जो प्रमाण दिए जा रहे हैं वो शुरुआती दौर में ही इतने खोखले हैं कि कोर्ट पहुंचने से पहले ही धराशायी हो जाएंगे।’
लेकिन सवाल उठता है कि ऐसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय साजिश की बात कहने के पीछे क्या सच में लोगों को गुमराह करना या फिर ‘समय काटना’ है या फिर इसके पीछे कुछ राजनीतिक नफे-नुकसान का गणित भी काम करता है।
इस सवाल के जवाब में सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं, ‘निश्चित तौर पर लोगों का ध्यान तो बँटेगा ही। लोग अब एक नए एंगल की थ्योरी पर सोचना शुरू कर देंगे और उन्हें लगेगा कि हां, सच में ऐसा हो रहा है। दूसरे, अंतरराष्ट्रीय साजिश में सीधे तौर पर इस्लामिक देशों का जिक्र किया जा रहा है तो ऐसी बातों में बीजेपी अपना फायदा ही देखती हैं।’
‘विरोधी को तो वो अपने पक्ष में ला नहीं सकते हैं लेकिन जिन समर्थकों का विश्वास सरकार की कार्यशैली से उठने लगा है, ऐसी साजिशों का जिक्र करके और कुछ के खिलाफ कार्रवाई करके, उनका विश्वास एक बार फिर जीतने की कोशिश तो हो ही सकती है।’
खुफिया एजेंसियों को खबर क्यों नहीं?
हालाँकि यदि अंतरराष्ट्रीय साजिश की बात मान भी ली जाए, तो अहम सवाल यह भी उठता है कि इतनी बड़ी साजिश हो रही थी तो पुलिस या खुफिया एजेंसियों को पता क्यों नहीं चला? और उन्हें पहले ही रोकने की कोशिश क्यों नहीं हुई।
सीएए के खिलाफ प्रदर्शन को भी अंतरराष्ट्रीय साजि़श से जोड़ा गया लेकिन न तो कोई पुख़्ता सबूत मिले और न ही किसी के ख़िलाफ़ अब तक कोई चार्ज शीट फ़ाइल की जा सकी है।
शलभ मणि त्रिपाठी कहते हैं, ‘सीएए प्रदर्शन के दौरान भी पूरे देश में अराजकता पैदा करने की कोशिश की गई, लेकिन सरकार की मुस्तैदी और खुफिया तंत्र की सक्रियता के चलते पूरे प्रदेश में एक भी बेकसूर व्यक्ति को इस उपद्रव से नुकसान नहीं पहुंचा।’
शलभ मणि त्रिपाठी का दावा है कि सीएए प्रदर्शन के दौरान एक भी बेकसूर व्यक्ति को नुक़सान नहीं हुआ लेकिन प्रदर्शन के दौरान कई लोगों की मौत पुलिस की गोली से हुईं और उससे जुड़े कई मुकदमे अभी अदालत में लंबित हैं।
जहां तक हाथरस की घटना का सवाल है, राज्य सरकार ने चार दिन पहले ही उसकी जांच सीबीआई को सौंपने की सिफारिश की थी लेकिन उसकी स्वीकृति अब तक नहीं मिली है।
दूसरी ओर, जांच का दायरा अब गैंगरेप और हत्या के अलावा अंतरराष्ट्रीय साजिश के साथ-साथ युवती की मौत की अन्य वजहों की ओर भी मुड़ता दिख रहा है। (bbc.com/hindi/india)
गुजरे दिनों मानव गतिविधियों पर लगी पाबंदी से जीव-जंतुओं की हलचल बढऩे की खबरें मिली हैं। शहरों में छाई अचानक शांति में लोगों ने गौर किया कि गोरैया पक्षी कितनी तेज आवाज निकालते हैं। जबकि साइंस पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में पाया गया कि वास्तव में उनके गीतों की आवाज़ मंद पड़ी थी। गोरैयों ने बैंडविड्थ बढ़ाकर अपने गीतों में नीचे सुरों को शामिल किया था, जो शोधकर्ताओं के मुताबिक मादाओं को ज़्यादा लुभाते हैं।
दरअसल टेनेसी विश्वविद्यालय की जंतु संप्रेषण विज्ञानी एलिज़ाबेथ डेरीबेरी काफी समय से सफेद मुकुट वाली नर गोरैया (ज़ोनोट्रीकिया ल्यूकोफ्रिस) के गीतों का अध्ययन करती रही हैं। उन्होंने सैन फ्रांसिस्को के आसपास के शोर भरे शहरी वातावरण में रहने वाली गोरैया और शांत ग्रामीण वातावरण में रहने वाली गोरैया के गीतों की तुलना की थी। (मादा गोरैया शायद ही कभी गाती हों)। उन्होंने पाया था कि ग्रामीण इलाकों की गोरैया की तुलना में शहरी गोरैया ऊंची आवाज़ में और उच्च आवृत्ति पर गाती हैं। शायद इसलिए कि यातायात और मानव जनित शोर के बीच साथियों तक उनकी आवाज़ पहुंच सके।
तालाबंदी के दौरान शहरों के शोर में आई कमी के कारण गोरैया के गीतों पर पड़े प्रभावों को जानने के लिए डेरीबेरी और उनके साथियों ने उन्हीं स्थानों पर गोरैया के गीतों का अध्ययन किया। तुलना के लिए पहले की रिकॉर्डिंग थी ही। चूंकि डेरीबेरी सैन फ्रांसिस्को में नहीं थीं इसलिए उनकी साथी जेनिफर फिलिप ने उन्हीं स्थानों पर गोरैयों की आवाज़ और शोर रिकार्ड करके डेरीबेरी को भेजा। ध्वनि के विश्लेषण में देखा गया कि ग्रामीण इलाकों के शोर के स्तर में खास कमी नहीं आई थी लेकिन शहरी इलाके के शोर में कमी आई थी, और वह लगभग ग्रामीण इलाकों जैसे हो गए थे। यानी इस दौरान शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों का शोर का स्तर लगभग समान हो गया था।
यह भी देखा गया कि जब शहरों का शोर कम हुआ तो शहरी गोरैया की आवाज भी मद्धम पड़ गई। उनकी आवाज़ में लगभग 4 डेसिबल की कमी देखी गई। उनके गीतों की आवाज़ मंद हो जाने के बावजूद उनके गीत स्पष्ट और अधिक दूरी तक सुनाई दे रहे थे, क्योंकि उनकी आवाज़ में आई कमी शहर के शोर में आई कमी से कम थी। स्पष्ट है कि तालाबंदी के दौरान पक्षी जोर से नहीं गाने लगे थे।
आवाज कम होने के अलावा, गोरैया के गीतों की बैंडविड्थ भी बढ़ गई थी। खासकर उन्होंने निचले सुर वाले गीत गाए, जो पहले शोर भरे माहौल में गुम हो जाते थे। पूर्व के अध्ययनों में यह देखा गया है कि मादा गोरैया को वे नर अधिक आकर्षित करते हैं जो जिनके गीतों की बैंडविड्थ अधिक होती है।
हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस वसंत में परिवर्तित गीतों के कारण शहरी गोरैया की प्रजनन सफलता प्रभावित हुई है या नहीं। लेकिन यह अध्ययन बताता कि प्राकृतिक तंत्र मानव हस्तक्षेप में कमी आने पर तुरंत प्रतिक्रिया देना शुरू कर देता है।
भले ही शोरगुल फिर बढऩे लगा है लेकिन उम्मीद है कि इन नतीजों को देखकर लोग शोर कम करने की सोचें। संभवत: वे अधिक घर से काम करने के बारे में सोचें, या ध्वनि रहित इलेक्ट्रिक वाहन लेने पर विचार करें।
(स्रोत फीचर्स)
बढ़ती हुई एमएसपी और 81 करोड़ लोगों को मुफ्त पांच किलो अनाज प्रति महीने देने की योजना ने बजट के विपरीत एफसीआई पर कर्ज का बोझ और बढ़ा दिया है।
- संदीप दास
पिछले कुछ वर्षों से देश में एक राजकोषीय संकट मंडरा रहा है। इसकी प्रमुख वजह है बढ़ती हुई खाद्य सब्सिडी, जो कि भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के लिए देय है। दरअसल एक के बाद एक केंद्रीय बजटों में खाद्य सब्सिडी खर्चों के लिए किए जा रहे "उप-प्रावधान" ने एफसीआई को अपने कामकाज के लिए कर्ज लेने पर मजबूर किया है। एफसीआई एक केंद्रीय एजेंसी है जो अनाज वितरण के लिए मुख्य रूप से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के तहत राज्यों को चावल और गेहूं की खरीद, भंडारण और परिवहन का प्रबंधन करती है एनएफएसए के तहत प्रति माह लगभग 81 करोड़ लोगों को प्रति माह पांच किलोग्राम खाद्यान्न की काफी व्यापक सब्सिडी दी जाती है। इसमें लगभग 2.5 करोड़ अंत्योदय अन्न योजना घर शामिल हैं, जो गरीबों में सबसे गरीब हैं और रियायती मूल्य पर प्रति माह 35 किलोग्राम प्रति परिवार के हकदार हैं।
केंद्र सरकार ने बैंकों के जरिए स्वीकृत कर्ज को बढ़ाने के लिए विभिन्न स्रोतों जैसे राष्ट्रीय लघु बचत कोष (एनएसएफएफ),अल्पावधि ऋण, बांड और नकद ऋण सीमा (सीसीआई) का प्रावधान किया है। ताकि संघ के बजट में उप-प्रावधान के कारण एफसीआई अपने वास्तविक खाद्य सब्सिडी खर्चों को पूरा कर पाए।
उप प्रावधान में खाद्य सुरक्षा खर्चे
बीते वित्त वर्ष 2019-20 में एफसीआई को खाद्य सब्सिडी के लिए 1.84 करोड़ रुपये का आवंटन बजट में किया गया था जो कि बाद में घटाकर 75000 करोड़ रुपये कर दिया गया। यह दोबारा अनुमानित बजट प्रावधान के तहत था, जिसमें अतिरिक्त तौर पर एनएसएसफ के तहत 1.1 लाख करोड़ रुपये का कर्ज भी था। इससे पहले 1.51 लाख करोड़ रुपये एफसीआई और 33,000 करोड़ रुपये राज्यों में विकेंद्रीकृत खरीद प्रणाली के लिए था। वहीं, रोचक यह है कि एफसीआई ने 2016-17 के तहत 46,400 करोड़ रुपये का हाल ही मे भुगतान भी किया था।
बजट में खाद्य सब्सिडी आवंटन के संबंध में किए जाने वाले प्रावधानों की रिक्तता को भरने के लिए लगातार राष्ट्रीय लघु बचत कोष (एनएसएसएफ) से कर्ज लिया जा रहा है। इसी बीच एफसीआई पर कर्ज के भुगतान का पहाड़ बड़ा होता जा रहा है। अनुमान के मुताबिक एफसीआई पर वित्त वर्ष 2020 के अंत तक 2.49 लाख करोड़ रुपये का बकाया था। वहीं, सभी स्रोतों को मिलाने पर यह 3.33 लाख करोड़ रुपये का है। इनमें एनएसएसएफ से 2.54 लाख करोड, शॉर्ट टर्म लोन से 35 हजार करोड़ और कैश क्रेडिट लिमिट के जरिए 9000 करोड़ रुपये शामिल हैं।
खाद्य सब्सिडी, बकाया कर्ज, एफसीआई के जरिए लिया गया लोन

स्रोत : केंद्रीय बजट दस्तावेज, खाद्य मंत्रालय, *मार्च 31, 2020 तक, नोट : 80-85 फीसदी खाद्य सब्सिडी आवंटन एफसीआई के रास्ते है और शेष विकेंद्रीकृत खरीद प्रणाली में राज्यों को आवंटन किया जाता है, ** रिवाइज्ड इस्टीमेट, ***बजट अनुमान. सारिणी : संदीप दास
आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक वर्तमान वित्त वर्ष 2020-2021 के पहले दो तिमाही के अंत तक एनएसएसएफ के तहत ऋण बढ़कर 2.93 करोड़ रुपये पहुंच गया है। जबकि खाद्य सब्सिडी आवंटन 115,319 करोड़ रुपये है (77,982 करोड़ एफसीआई के लिए और 37,337 करोड़ रुपए राज्यों की विकेंद्रीकृत खरीद प्रणाली के लिए), और वास्तविक खर्च में तीव्र उछाल हुआ है। क्योंकि केंद्र सरकार एनएफएसए के तहत प्रधान मंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत 81 करोड़ लोगों को प्रति माह पांच किलो मुफ्त अनाज दे रही है।
यह व्यवस्था कोविड-19 संक्रमण प्रसार को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के मद्देनजर अप्रैल, 2020 को शुरु की गई। केंद्रीय खाद्य मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि पीएमजीकेएवाई के कारण मौजूदा वित्त वर्ष में अनुमानित सब्सिडी खर्च 2.33 लाख करोड़ रुपये का हो सकता है जबकि अनुमानित बजट 1.15 लाख करोड़ रुपये है।
खाद्य सब्सिडी खर्चे बढ़ने की वजहें
धान और गेहूं पर सालाना बढ़ती हुई एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य और एफसीआई के जरिए अनाज भंडारण की अधिकता व मुक्त तरीके से खरीद के कारण खाद्य सब्सिडी के खर्चे में बढ़ोत्तरी हुई है। वहीं एक अन्य कारण केंद्र की अनिच्छा भी है। बेहद कम दर में अनाज सब्सिडी एनएफएसए, 2013 के तहत दी जा रही है। आर्थिक सर्वेक्षण 2019-2020 के तहत केंद्र के जरिए 3 रुपये में चावल, 2 रुपये में गेहूं, और एक रुपये में मोटा अनाज दिया जा रहा है। यह दरें एनएफएसए, 2013 की हैं जो अब तक नहीं बदली गई हैं। वहीं दूसरी तरफ 2020-2021 में धान और गेहूं के लिए एफसीआई की आर्थिक लागत (किसानों को एमएसपी, भंडारण,परिवहन और अन्य लागत) क्रमशः 37.26 रुपए और 26.83 रुपये पड़ती है। यह एक बड़ा कारण है कि आर्थिक लागत और केंद्रीय जारी दरें (सीआईपी) व खाद्य सब्सिडी बीते कुछ वर्षों में बढ़ती गई है।
आर्थिक सर्वे इस बात पर भी गौर करता है कि “जबकि जनसंख्या के कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा करने की आवश्यकता है, एनएफएसए के तहत सीआईपी को बढ़ाने के आर्थिक तर्क को भी कम नहीं किया जा सकता है। खाद्य सुरक्षा कार्यों की स्थिरता के लिए खाद्य सब्सिडी बिल पर भी ध्यान देने की जरूरत है।”
अतिरिक्त अनाज भंडार बढ़ा रहे खाद्य सब्सिडी का खर्चा
एफसीआई के पास रखे गए अनाज के स्टॉक दरअसल बफर स्टॉक के मानक से अधिक बने हुए हैं, जो कि खाद्य सब्सिडी के बढ़ते खर्च में ईंधन का काम करते हैं। 1 अक्टूबर, 2020 को एफसीआई के पास 3.07 करोड़ टन (30.7 मिलियन टन) के बफर स्टॉक मानदंडों के विरुद्ध 6.75 करोड़ टन (67.5 करोड़ टन) का अनाज (चावल और गेहूं) स्टॉक था।
अनाज स्टॉक एफसीआई (मिलियन टन में आंकड़े) एक अक्तूबर तक

30.77 मिलियन टन बफर स्टॉक के नियम में 10.25 मिलियन टन चावल, 20.5 मिलियन टन गेहूं शामिल है। इस स्टॉक में ऑपरेशनल स्टॉक और रणनीति के तहत किया गया भंडारण भी है। अनाज भंडारण में मिल से भंडार किए गए चावल स्टॉक को शामिल नहीं किया गया है। सारिणी : संदीप दास
बढ़ते अनाज स्टॉक के पीछे प्रमुख कारक पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में ओपन-एंडेड एमएसपी ऑपरेशंस हैं, जिसके परिणामस्वरूप एफसीआई ने एमएसपी ऑपरेशंस के जरिए किसानों से अधिक अनाज खरीदा है। राज्यों द्वारा ले लो। पिछले दशक में एनएफएसए के तहत राज्यों द्वारा खाद्यान्नों का उठान (ऑफ-टेक) 51-59 मीट्रिक टन था, जबकि इसी अवधि के दौरान अनाज की खरीद लगभग 60 मीट्रिक टन थी। पिछले दो वर्षों के दौरान 2018-19 और 2019-20 के दौरान खरीद 80 मीट्रिक टन को पार कर गई है।
राज्यों के जरिए खाद्यान्न का उठान (ऑफटेक*) (एनएफएसए , अन्य कल्याणकारी योजनाएं, मिड डे मील, आईसीडीएस )

स्रोत : डिपार्टमेंट ऑफ फूड एंड पब्लिक डिस्ट्रब्यूशन, *ओएमएसएस बिक्री बाहर, सारिणी : संदीप दास
भारत के नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने राजकोषीय जवाबदेही और बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003 के 2016-2017 में अनुपालन को लेकर 2019 में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2016-2017 से पांच वर्षों में सब्सिडी एरियर्स यानी खाद्य सब्सिडी में देनदारी में 350 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। इसलिए जरूरत है कि वित्तपोषण कई तरीकों से किया जाना चाहिए। साथ ही उच्च ब्याज कैश क्रेडिट सुविधा वास्तविक सब्सिडी को बढ़ाने वाली है।
वहीं, केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने जुलाई, 2018 मनें कहा था कि ऑफ-बजट देनदारियां (ऐसा वित्त जिसका उल्लेख बजट में नहीं होता है) केंद्रीय बजट के दायरे से बाहर नहीं है। ऑफ बजट का मूल और ब्याज के पुर्नभुगतान का प्रावधान बजट के जरिए किया गया था।
मंत्रालय ने बजट दस्तावेजों में एनएसएसएफ द्वारा नाबार्ड के आंतरिक और अतिरिक्त बजटीय संसाधनों और एफसीआई को ऋण देने का खुलासे पर गौर किया था। 2019 की सीएजी रिपोर्ट के अनुसार, वित्त मंत्रालय ने स्वीकार किया कि एफसीआई के खातों को अंतिम रूप देने के बाद बजट में एक साल के लिए 95 प्रतिशत खाद्य सब्सिडी का प्रावधान करने और बाद के वर्षों में शेष पांच प्रतिशत को समाप्त करने की प्रथा है। बजटीय बाधाओं के कारण, किसी विशेष वर्ष में खाद्य सब्सिडी की पूरी राशि प्रदान करना संभव नहीं हो सकता है। ऑफ-बजट वित्तीय व्यवस्था एफसीआई की कार्यशील पूंजी की आवश्यकता को पूरा करने के लिए है, जिसे बैंकिंग स्रोतों से स्वतंत्र रूप से पूरा किया जा रहा था।
केंद्र सरकार ने 2014 में एफसीआई के पुनर्गठन पर पूर्व खाद्य मंत्री शांता कुमार की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय समिति (एचएलसी) की नियुक्ति की थी। जनवरी 2015 में सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में समिति ने सिफारिश की थी कि एफसीआई को उन राज्यों की मदद करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए, जहां किसान एमएसपी से काफी नीचे कीमतों पर संकट से ग्रस्त हैं, और छोटी जोत वाले हैं। इनमें पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार पश्चिम बंगाल, असम आदि शामिल हैं।
एफसीआई आर्थिक लागत, केंद्रीय जारी दर और सब्सिडी (रुपए प्रति क्विंटल )

स्रोत : डिपार्टमेंट ऑफ फूड एंड पब्लिक एंड डिस्ट्रिब्यूशन
उच्चस्तरीय समिति ने अपनी सिफारिश में कहा था कि धान उगाने के लिए किसानों को हतोत्साहित करने के लिए, विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा में दालों और तिलहन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही केंद्र सरकार को उनके लिए बेहतर मूल्य समर्थन अभियान प्रदान करना चाहिए और व्यापार नीति के साथ उनकी एमएसपी नीति को लागू करना चाहिए ताकि उनकी जमीनी लागत उनके एमएसपी से कम न हो। क्योंकि एफसीआई और उसके सहायक ओपन-एंडेड एमएसपी परिचालनों के कारण पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में किसानों द्वारा लाए गए सभी चावल और गेहूं खरीदते हैं।
इसलिए, इन राज्यों के किसानों को वैकल्पिक फसलों जैसे तिलहन और दालों को उगाने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता है ताकि एफसीआई की खरीद के संचालन में गिरावट न आ सके। हालांकि, एफसीआई के सामने आने वाले संकट से निपटने में बहुत प्रगति नहीं हुई है। केंद्र सरकार को एफसीआई द्वारा किए जाने वाले खाद्य सब्सिडी खर्चों के प्रावधान को सुनिश्चित करने की दिशा में कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है। राजकोषीय संकट का मात्र स्थगन कोई अधिक व्यवहार्य विकल्प नहीं है। सरकार के हाथ से समय बहुत तेजी से निकल रहा है। (downtoearth)
लेखक कृषि और खाद्य सुरक्षा में दिल्ली स्थित शोधकर्ता और नीति विश्लेषक हैं।
रेफ्रिजरेटर, बॉयलर और यहां तक कि बल्ब अपने आसपास के वातावरण में निरंतर ऊष्मा बिखेरते हैं। सैद्धांतिक रूप से इस व्यर्थ ऊष्मा को बिजली में परिवर्तित किया जा सकता है। गाडिय़ों के इंजिन और अन्य उच्च-ताप वाले स्रोतों के साथ तो ऐसा किया जाता है लेकिन इस तकनीक का उपयोग घरेलू उपकरणों के लिए थोड़ा मुश्किल होता है क्योंकि ये काफी कम ऊष्मा छोड़ते हैं।
लेकिन हाल ही में शोधकर्ताओं ने एक ऐसा उपकरण तैयार किया है जो तरल पदार्थों का उपयोग करके निम्न-स्तर की ऊष्मा को बिजली में परिवर्तित कर सकता है। गौरतलब है कि वैज्ञानिक काफी समय से ऐसे पदार्थों के बारे में जानते हैं जो ऊष्मा को बिजली में परिवर्तित कर सकते हैं। यह कार्य विशेष अर्धचालकों द्वारा किया जाता है जिन्हें ताप-विद्युत पदार्थ कहते हैं। जब इनसे बनी चिप्स का एक सिरा गर्म और दूसरा ठंडा होता है तब इलेक्ट्रान गर्म से ठंडे सिरे की ओर बहने लगते हैं। कई चिप्स को एक साथ जोडऩे पर एक स्थिर विद्युत प्रवाह उत्पन्न होता है।
लेकिन जो पदार्थ अभी ज्ञात हैं वे महंगे हैं और तापमान में सैकड़ों डिग्री सेल्सियस के अंतर पर काम करते हैं। ऐसे में यह तकनीक रेफ्रिजरेटर जैसे निम्न-स्तर के ताप स्रोतों के लिए बेकार है। इस समस्या को दूर करने के लिए हुआज़हौंग युनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी के भौतिक विज्ञानी जून ज़ाऊ और उनके सहयोगियों ने थर्मोसेल्स की ओर रुख किया। इन उपकरणों में गर्म से ठंडे की ओर विद्युत आवेश को प्रवाहित करने के लिए ठोस की बजाय तरल पदार्थों का उपयोग किया जाता है। इनमें इलेक्ट्रॉन्स का नहीं बल्कि आयनों का स्थानांतरण होता है।
थर्मोसेल्स कम तापमान अंतर को बिजली में परिवर्तित करने में सक्षम होते हैं लेकिन विद्युत धारा बहुत कम होती है। कारण यह है कि इलेक्ट्रॉन्स की तुलना में आयन सुस्त होते हैं। इसके अलावा इलेक्ट्रॉन के विपरीत आयन अपने साथ ऊष्मा का भी प्रवाह करते हैं जिससे दोनों सिरों के बीच तापमान का अंतर कम हो जाता है।
जाऊ की टीम ने एक छोटी थर्मोसेल से शुरुआत की जिसके निचले व ऊपरी सिरों पर इलेक्ट्रोड थे। निचले और ऊपरी इलेक्ट्रोड के बीच 50 डिग्री सेल्सियस का अंतर बनाए रखा गया। उन्होंने इस चैम्बर में फैरीसाइनाइड नामक आयनिक पदार्थ भर दिया।
गर्म इलेक्ट्रोड के नज़दीक हों तो फैरीसाइनाइड आयन एक इलेक्ट्रान छोड़ते हैं और चार ऋणावेश युक्त स्नद्ग (ष्टहृ) 6-4 से तीन ऋणावेश युक्त स्नद्ग (ष्टहृ)6-3 में बदल जाते हैं। मुक्त इलेक्ट्रॉन्स एक बाहरी सर्किट के माध्यम से गर्म से ठंडे इलेक्ट्रोड की ओर बहते हुए सर्किट में लगे छोटे उपकरणों को उर्जा प्रदान करते हैं। ये इलेक्ट्रान जब ठंडे इलेक्ट्रोड तक पहुंचते हैं तब ये स्नद्ग(ष्टहृ)6-3 के साथ जुड़ जाते हैं। इससे पुन: स्नद्ग(ष्टहृ)6-4 आयन उत्पन्न होते हैं जो फिर से गर्म इलेक्ट्रोड की ओर चले जाते हैं और यह चक्र निरंतर चलता रहता है।
इन गतिमान आयनों द्वारा वाहित गर्मी को कम करने के लिए ज़ाऊ की टीम ने फैरीसाइनाइड में एक धनावेशित कार्बन यौगिक गुआनिडिनियम जोड़ दिया। ठंडे इलेक्ट्रोड पर गुआनिडिनियम ठंडे 6-4 आयनों को क्रिस्टल्स में परिवर्तित कर देता है। क्योंकि तरल पदार्थों की तुलना में ठोस पदार्थों की ऊष्मा चालकता कम होती है, वे गर्म से ठंडे इलेक्ट्रोड की ओर जाने वाली गर्मी को सोख लेते हैं। गुरुत्वाकर्षण के कारण ये क्रिस्टल्स गर्म इलेक्ट्रोड की ओर चले जाते हैं जहां गर्मी के कारण ये वापिस तरल बन जाते हैं।
साइंस में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार थर्मोसेल के पिछले संस्करणों की तुलना में इलेक्ट्रोड के उतने ही क्षेत्रफल के लिए यह थर्मोसेल पांच गुना अधिक बिजली उत्पन्न करती है। यह एक सामान्य व्यावसायिक उपकरण से दो गुना अधिक दक्षता प्रदान करता है। टीम के अनुसार एक 20 थर्मोसेल वाले पुस्तक के आकार के मॉड्यूल से एक एलईडी लाइट और एक पंखे को ऊर्जा प्रदान की जा सकती है। साथ ही एक मोबाइल फोन भी चार्ज किया जा सकता है। टीम के लिए अगला कदम इस उपकरण को और सस्ता बनाना और ऐसी सामग्री का उपयोग करना है जो अधिक से अधिक ऊष्मा को अवशोषित कर सके। इसकी सहायता से हम अपने आसपास के वातावरण में उपलब्ध गर्मी से छोटे गैजेट्स को उर्जा देने में सक्षम हो सकेंगे।(स्रोत फीचर्स)
वैसे तो यहां जिन मिथकों की चर्चा की गई है, वे मूलत: संयुक्त राज्य अमेरिका के सोशल मीडिया पर किए गए शोध और अन्य जानकारियों पर आधारित हैं। लेकिन थोड़े अलग रूप में ये भारत के सोशल मीडिया में भी नजर आ जाते हैं।
कोरोनावायरस महामारी के साथ-साथ विश्व एक और महामारी से लड़ रहा है जिसे 'इंफोडेमिक' का नाम दिया गया है। इस 'सूचनामारी' के चलते लोग रोग की गंभीरता को कम आंकते हैं और सुरक्षा के उपायों को अनदेखा करते हैं। यहां इस महामारी से सम्बंधित कुछ मिथकों पर चर्चा की गई है।
मिथक 1: नया कोरोनावायरस चीन की प्रयोगशाला में तैयार किया गया है
चूंकि इस वायरस का सबसे पहला संक्रमण चीन में हुआ था, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बिना किसी सबूत के यह दावा कर दिया कि इसे चीन की प्रयोगशाला में तैयार किया गया है। हालांकि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने इन सभी दावों को खारिज करते हुए कहा है कि न तो यह मानव निर्मित है और न ही आनुवंशिक फेरबदल से बना है। साइंटिफिक अमेरिकन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार चीनी वायरोलॉजिस्ट शी ज़ेंगली और उनकी टीम द्वारा इस वायरस के डीएनए अनुक्रम की तुलना गुफावासी चमगादड़ों में पाए जाने वाले कोरोनावायरसों से करने पर कोई समानता नजऱ नहीं आई। इस वायरस के प्रयोगशाला में तैयार न किए जाने पर ज़ेंगली ने एक विस्तृत आलेख साइंस पत्रिका में प्रकाशित भी किया है। गौरतलब है कि ट्रम्प ने ज़ेंगली की प्रयोगशाला पर वायरस विकसित करने का इल्ज़ाम लगाया था। इस मुद्दे पर स्वतंत्र जांच की मांग को देखते हुए चीन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के शोधकर्ताओं को भी आमंत्रित किया है। लेकिन सबूत के आधार पर यही कहा जा सकता है कि सार्स-कोव-2 को प्रयोगशाला में तैयार नहीं किया गया है।
मिथक 2: उच्च वर्ग के लोगों ने ताकत और मुनाफे के लिए वायरस को जानबूझकर फैलाया है
जूड़ी मिकोविट्स नामक एक महिला ने सोशल मीडिया पर 26 मिनट की षडय़ंत्र-सिद्धांत आधारित फिल्म 'प्लानडेमिकÓ और अपने ही द्वारा लिखित एक किताब में नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इन्फेक्शियस डिसीज के निर्देशक एंथोनी फौसी और माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स पर इल्जाम लगाया है कि उन्होंने इस बीमारी से फायदा उठाने के लिए अपनी ताकत का उपयोग किया है। यह वीडियो कई सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स पर 80 लाख से अधिक लोगों ने देखा।
साइंस और एक अन्य वेबसाइट politifact ने जांच करने के बाद इस दावे को झूठा पाया। हालांकि इस वीडियो को अब सोशल मीडिया से हटा लिया गया है लेकिन इससे स्पष्ट है कि गलत सूचनाएं बहुत तेज़ी से फैलती हैं।
मिथक 3: कोविड-19 सामान्य फ्लू के समान ही है
महामारी के शुरुआती दिनों से ही राष्ट्रपति ट्रम्प ने बार-बार दावा किया कि कोविड-19 मौसमी फ्लू से अधिक खतरनाक नहीं है। लेकिन 9 सितंबर को वाशिंगटन पोस्ट ने ट्रम्प के फरवरी और मार्च में लिए गए साक्षात्कार की एक रिकॉर्डिंग जारी की जिससे पता चलता है कि वे (ट्रम्प) जानते थे कि कोविड-19 सामान्य फ्लू से अधिक घातक है लेकिन इसकी गंभीरता को कम करके दिखाना चाहते थे।
हालांकि कोविड-19 की मृत्यु दर का सटीक आकलन तो मुश्किल है लेकिन महामारी विज्ञानियों का विचार है कि यह फ्लू की तुलना में कहीं अधिक है। फ्लू के मामले में टीकाकरण या पूर्व संक्रमण के कारण कई लोगों में कुछ प्रतिरोधक क्षमता तो है, जबकि अधिकांश विश्व ने अभी तक कोविड-19 का सामना ही नहीं किया है। ऐसे में कोरोनावायरस सामान्य फ्लू के समान तो नहीं है।
मिथक 4: मास्क पहनने की जरूरत नहीं है
हालांकि सीडीसी और डब्ल्यूएचओ द्वारा मास्क के उपयोग पर प्रारंभिक दिशानिर्देश थोड़े भ्रामक थे लेकिन अब सभी मानते हैं कि मास्क का उपयोग करने से कोरोनावायरस को फैलने से रोका जा सकता है। काफी समय से पता रहा है कि मास्क का उपयोग किसी संक्रमण को फैलने से रोकने में काफी प्रभावी है। अब तो यह भी स्पष्ट है कि कपड़े से बने मास्क भी कारगर हैं। फिर भी कई साक्ष्यों के बावजूद कुछ लोगों ने मास्क को नागरिक स्वतंत्रता का उल्लंघन बताते हुए पहनने से इन्कार कर दिया।
मिथक 5: हायड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन एक प्रभावी उपचार है
फ्रांस में किए गए एक छोटे अध्ययन के आधार पर सुझाव दिया गया कि मलेरिया की दवा हायड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का उपयोग इस बीमारी के इलाज में प्रभावी हो सकता है। इसकी व्यापक आलोचना और इसके प्रभावी न होने के साक्ष्य के बावजूद ट्रम्प और अन्य लोगों ने इसे जारी रखा। फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने भी शुरुआत में अनुमति देने के बाद ह्रदय संबंधी समस्याओं के जोखिम के कारण इसे नामंज़ूर कर दिया। कई अध्ययनों से पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद भी ट्रम्प ने इस दवा का प्रचार जारी रखा।
मिथक 6 : 'ब्लैक लाइव्ज़ मैटर' प्रदर्शन के कारण संक्रमण में वृद्धि हुई है
अमेरिका में पुलिस द्वारा जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के बाद मई-जून में अश्वेत अमरीकियों के विरुद्ध हिंसा के खिलाफ बड़े स्तर पर लोगों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया। कई लोगों ने दावा किया कि इन प्रदर्शनों में भीड़ जमा होने से कोरोनावायरस के मामलों में वृद्धि हुई। लेकिन नेशनल ब्यूरो ऑफ इकॉनोमिक रिसर्च द्वारा अमेरिका के 315 बड़े शहरों में हुए विरोध प्रदर्शनों के एक विश्लेषण से ऐसे कोई प्रमाण नहीं मिले हैं जिससे यह कहा जा सके कि इन प्रदर्शनों के कारण कोविड-19 मामलों में वृद्धि हुई है या अधिक मौतें हुई हैं। वास्तव में प्रदर्शन करने वाले लोगों में संचरण का जोखिम बहुत कम था और अधिकांश प्रदर्शनकारियों ने मास्क का उपयोग किया था।
मिथक 7: अधिक परीक्षण के कारण कोरोनावायरस मामलों में वृद्धि हुई है
राष्ट्रपति ट्रम्प ने यह दावा किया कि अमेरिका में कोरोनावायरस के बढ़ते मामलों का कारण परीक्षण में हो रही वृद्धि है। यदि यह सही है तो परीक्षणों में पॉजि़टिव परिणामों के प्रतिशत में कमी आनी चाहिए थी। लेकिन कई विश्लेषणों ने इसके विपरीत परिणाम दर्शाए हैं। यानी वृद्धि वास्तव में हुई है।
मिथक 8: संक्रमण फैलेगा तो झुंड प्रतिरक्षा प्राप्त की जा सकती है
महामारी की शुरुआत में यूके और स्वीडन ने झुंड प्रतिरक्षा के तरीके को अपनाया। इस तकनीक में वायरस को फैलने दिया जाता है जब तक आबादी में झुंड प्रतिरक्षा विकसित नहीं हो जाती है। लेकिन इस दृष्टिकोण में एक बुनियादी दोष है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि झुंड प्रतिरक्षा हासिल करने के लिए 60 से 70 प्रतिशत लोगों का संक्रमित होना आवश्यक है। कोविड-19 की उच्च मृत्यु दर को देखते हुए झुंड प्रतिरक्षा प्राप्त करते-करते करोड़ों लोग मारे जाते। इसी कारण इस महामारी में यूके की मृत्यु दर सबसे अधिक है। यूके और स्वीडन में लोगों की जान और अर्थव्यवस्था का भी काफी नुकसान हुआ। देर से ही सही, यू.के. सरकार ने इस गलती में सुधार किया और लॉकडाउन लागू किया।
मिथक 9 : कोई भी टीका असुरक्षित होगा और कोविड-19 से अधिक घातक होगा
एक ओर वैज्ञानिक निरंतर टीका विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं ये चिंताजनक रिपोर्ट्स भी सामने आ रही हैं कि शायद कई लोग इसे लेने से इन्कार कर देंगे। संभावित टीके को साजि़श के रूप में देखा जा रहा है। प्लानडेमिक फिल्म में तो यह भी दावा किया गया है कि कोविड-19 का टीका लाखों लोगों की जान ले लेगा। साथ ही यह दावा भी किया गया है कि पहले भी टीकों ने लाखों लोगों को मौत के घाट उतारा है। लेकिन तथ्य यह है कि टीकों ने करोड़ों जानें बचाई हैं। यदि उपरोक्त दावा सही है, तो अलग-अलग चरणों में परीक्षण के दौरान लोगों की मौत हो जानी चाहिए थी। टीका-विरोधी समूहों द्वारा प्रस्तुत एक अन्य साजि़श-सिद्धांत में तो कहा गया है कि बिल गेट्स एक गुप्त योजना बना रहे हैं जिसके तहत टीकों के माध्यम से लोगों में माइक्रोचिप लगा दी जाएगी। इससे इतना तो स्पष्ट है कि टीके के निरापद होने की बात पर अत्यधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है, अन्यथा ऐसी बातों को तूल मिलेगा। (स्रोत फीचर्स)
यदि पिछले तीस वर्षों (1981-2010) में सितम्बर के औसत तापमान से तुलना करें तो इस वर्ष तापमान करीब 0.63 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है
- Lalit Maurya
कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार गत माह इतिहास का सबसे गर्म सितम्बर था। जारी आंकड़ों के अनुसार इस माह में तापमान सितम्बर 2019 की तुलना में 0.05 डिग्री सेल्सियस अधिक रिकॉर्ड किया गया था। जबकि यदि पिछले तीस वर्षों (1981-2010) में सितम्बर के औसत तापमान से तुलना करें तो इस वर्ष तापमान करीब 0.63 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है।
यूरोप सहित दुनिया के कई देशों में सितम्बर का तापमान औसत से ज्यादा रिकॉर्ड किया गया था। जो स्पष्ट तौर पर जलवायु में आ रहे बदलावों की ओर इशारा करता है। वहीं यदि सितम्बर 2016 से तुलना करें तो इस वर्ष तापमान उससे 0.8 डिग्री सेल्सियस अधिक था। गौरतलब है कि 2016 को इतिहास का सबसे गर्म वर्ष माना जाता है।
इस वर्ष केवल सितम्बर ऐसा महीना नहीं है जब तापमान वैश्विक औसत से अधिक रिकॉर्ड किया गया है। इससे पहले जनवरी और मई 2020 में भी तापमान अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था। यूरोप में भी सितम्बर का तापमान अपनी उच्तम स्तर पर पहुंच गया है। जहां तापमान सितम्बर 2018 की तुलना में 0.2 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है। जबकि रूस में भी पिछले 130 वर्षों में सबसे गर्म सितम्बर रिकॉर्ड किया गया है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन द्वारा किये विश्लेषण के अनुसार 2019 को मानव इतिहास के दूसरा सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज किया गया था। आंकड़ों के अनुसार 2019 के वार्षिक वैश्विक तापमान में औसत (1850 से 1900 के औसत तापमान) से 1.1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है। जबकि 2016 का नाम अभी भी रिकॉर्ड में सबसे गर्म साल के रूप में दर्ज है। आंकड़ें दिखाते हैं कि 2010 से 2019 के बीच पिछले पांच साल रिकॉर्ड के सबसे गर्म वर्ष रहे हैं।
आर्कटिक समुद्री बर्फ में भी दर्ज की गई 40 फीसदी की कमी
इसके साथ ही साइबेरियाई आर्कटिक में तापमान औसत से बहुत ज्यादा रिकॉर्ड किया गया। वहीं दूसरी और सैटेलाइट रिकॉर्ड शुरू होने के बाद से यह दूसरा मौका है जब आर्कटिक में समुद्री बर्फ अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। यदि 1981 से 2020 के औसत की तुलना करें तो सितम्बर 2020 में आर्कटिक समुद्री बर्फ 40 फीसदी कम रिकॉर्ड की गई है, जबकि अंटार्कटिक में समुद्री बर्फ की सीमा औसत से थोड़ा ज्यादा थी।
यह आंकड़े एक बार फिर इस और इशारा कर रहे हैं कि भविष्य में हमें और विकट मौसम का सामना करना पड़ेगा। जब दुनिया भर में हो रही ग्लोबल वार्मिंग हर चीज पर अपना असर डालना शुरू कर देगी। वैसे भी दुनिया भर में कहीं बाढ़ कहीं सूखा और कहीं तूफान के रूप में यह असर दिखने भी लगा है। जिसने इंसानों से लेकर जीव-जंतुओं और पेड़ पौधों पर भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है।
बढ़ते तापमान के चलते बाढ़, सूखा, तूफान जैसी चरम घटनाओं का होना आम होता जा रहा है, साथ ही इनकी तीव्रता में भी वृद्धि हो रही है। उदाहरण के लिए, भारत में वर्ष 2017 की सर्दियों में जब औसत तापमान 1901-1930 बेसलाइन से 2.95 डिग्री सेल्सियस अधिक था, उसी समय (2016-17) दक्षिणी भारत में सदी का सबसे भयंकर सूखा पड़ा था, जिसने 33 करोड़ से भी अधिक लोगों को प्रभावित किया था । अभी भी वक्त है यदि हम नहीं चेते और हमने इसके लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाये तो भविष्य में हमें इसके गंभीर परिणाम झेलने होंगे।(downtoearth)
-अभय शर्मा
संसद में 23 सितंबर को श्रम कानून से जुड़े तीन अहम कोड बिल पास हो गए. सरकार ने बीते साल श्रम सुधार की बात कहते हुए 44 केंद्रीय श्रम कानूनों को मिलाकर चार कोड बिल तैयार किये थे. इनमें से तीन कोड बिल - औद्योगिक संबंध कोड बिल, सामाजिक सुरक्षा कोड बिल और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यदशा कोड बिल - पिछले महीने के अंत में पास हुए. चौथे कोड बिल - मजदूरी कोड विधेयक - को मोदी सरकार बीते साल ही पारित करा चुकी है. श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने राज्यसभा में बिलों को पेश करते हुए इसे ऐतिहासिक करार दिया और कहा कि ‘श्रमिक कल्याण में यह मील का पत्थर साबित होगा. देश की आजादी के 73 साल बाद जटिल श्रम कानून सरल, ज्यादा प्रभावी और पारदर्शी कानून में बदल जाएंगे.’ संतोष गंगवार के मुताबिक लेबर कोड श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करेगा और यह उद्योगों को आसानी से चलाने में मदद करेगा.
हालांकि, सरकार के दावे से अलग श्रमिक संगठन श्रम कानूनों में हुए बदलाव को मजदूरों और कर्मचारियों के हक में नहीं बताते हैं. ये संगठन विशेष रूप से औद्योगिक संबंध कोड बिल से नाराज हैं और पूरे देश में इसका विरोध कर रहे हैं. देश की सबसे बड़ी दस ट्रेड यूनियन मोदी सरकार से श्रम कानूनों में किये गए बदलावों को वापस लेने की मांग कर रही हैं.
कोड बिल पर नाराजगी क्यों?
मजदूर यूनियनों से जुड़े नेताओं की मानें तो औद्योगिक संबंध कोड विधेयक के जरिए सरकार ने मजदूरों और यूनियनों के हाथ बांध दिए हैं. इस विधेयक के जरिये जो पहला बड़ा बदलाव किया गया है वह कर्मचारियों की नियुक्ति एवं छंटनी से जुड़ा है. विधेयक में कहा गया है कि जिन कंपनियों में कर्मचारियों की संख्या 300 से कम है, वे सरकार से मंजूरी लिए बिना ही अपने कर्मचारियों की छंटनी कर सकेंगी और इनकी जगह पर नए कर्मचारियों को रख सकेंगी. अब तक ये प्रावधान सिर्फ उन्हीं कंपनियों के लिए था, जिनमें 100 से कम कर्मचारी हों. किसी भी समय कर्मचारियों की छंटनी और यूनिट के शटडाउन की इजाज़त उन कंपनियों को भी दी जाएगी, जिनके कर्मचारियों की संख्या पिछले 12 महीने में हर रोज़ औसतन 300 से कम रही हो. कोड बिल में यह भी साफ़ तौर पर लिखा है कि सरकार अधिसूचना जारी कर इस न्यूनतम संख्या को बढ़ा भी सकती है.
मजदूर संगठन कानून में किए गए इस बदलाव का भारी विरोध कर रहे हैं. इनका कहना है कि कंपनियां इसका फायदा उठाकर बिना सरकारी मंजूरी के ज्यादा मजदूरों को तत्काल निकाल सकेंगी. देश के सबसे बड़े मजदूर संगठन - भारतीय ट्रेड यूनियन केंद्र (सीटू) के महासचिव तपन सेन का कहना है, ‘इन बदलावों के चलते 74 फीसदी से अधिक औद्योगिक श्रमिक और 70 फीसदी औद्योगिक प्रतिष्ठान ‘हायर एंड फायर’ व्यवस्था में ढकेल दिए जाएंगे, जहां उन्हें अपने मालिकों के रहम पर जीना पड़ेगा.’
औद्योगिक संबंध कोड विधेयक में यह भी जोड़ा गया है कि 300 से कम श्रमिकों वाले औद्योगिक प्रतिष्ठानों को स्थायी आदेश (स्टैंडिंग ऑर्डर) तैयार करने की आवश्यकता नहीं है, जबकि पहले यह छूट 100 से कम श्रमिकों वाले प्रतिष्ठानों को मिली थी. स्टैंडिंग ऑर्डर एक खास तरह का सामूहिक अनुबंध होता है, जो किसी कंपनी में सेवा शर्तों और नियमों का मानकीकरण करता है. इसमें किसी कर्मचारी की प्रोबेशन अवधि, उसे स्थायी करने और उसे नौकरी से निकालने की शर्तों से जुड़े प्रावधान शामिल होते हैं. किसी कर्मचारी के दुर्व्यवहार का निर्धारण, अनुशासनात्मक कार्रवाइयों और सजा देने के तरीकों एवं शर्तों से जुड़े नियम भी स्टैंडिंग ऑर्डर के दायरे में ही आते हैं.
श्रम मामलों के जानकार बताते हैं कि श्रम कानूनों में ‘स्टैंडिंग ऑर्डर’ को इसलिए शामिल किया गया था ताकि कंपनियां एकतरफा, मनमाने और कर्मचारियों के खिलाफ भेदभाव भरे फैसले न ले पाएं. साथ ही औद्योगिक विवाद की स्थिति उत्पन्न न हो और कंपनी मालिक और कर्मियों के बीच (औद्योगिक) संबंध सौहार्दपूर्ण बने रहें. इन लोगों के मुताबिक अब 300 से कम कर्मियों वाली कपनियां ‘स्टैंडिंग ऑर्डर’ की बाध्यता न होने के चलते श्रमिकों के लिये मनमानी सेवा शर्तें रखने में सक्षम हो जाएंगी. एक्सएलआरआई जमशेदपुर में प्रोफेसर और जाने-माने श्रमिक अर्थशास्त्री केआर श्याम सुंदर कहते हैं, ‘स्टैंडिंग ऑर्डर के लिए न्यूनतम श्रमिक की सीमा 100 से बढ़ाकर 300 करने का मतलब साफ़ है कि सरकार मजदूरों को नौकरी पर रखने एवं नौकरी से निकालने के लिए कंपनी मालिकों को खुली छूट दे रही है... अब 300 मजदूरों से कम संख्या वाली कंपनियां कथित दुराचार और आर्थिक कारणों का हवाला देकर आसानी से छंटनी कर सकेंगी.’
2017-18 के वार्षिक औद्योगिक सर्वे के लिहाज से अगर देखें तो 300 से कम श्रमिकों वाली फैक्ट्रियों को स्टैंडिंग ऑर्डर की शर्त से छूट मिलने के बाद इनमें काम करने वाले देश के तकरीबन 44 फीसदी कामगारों को स्टैंडिग ऑर्डर का फायदा नहीं मिल सकेगा.
औद्योगिक संबंध कोड विधेयक को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि इसमें किये गए प्रावधानों से अनुबंध यानी कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को रखने का चलन बढ़ेगा. प्रोफेसर श्याम सुंदर कहते हैं, ‘अब अनुबंध पर कर्मचारियों को रखे जाने के चलन में बेतहाशा इजाफा होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि अब 50 से कम कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्ट पर रखने वाली कंपनियों और ठेकेदारों को ‘कॉन्ट्रैक्ट लेबर रेगुलेशन’ से लगभग मुक्त कर दिया गया है. इससे निर्माण या मैन्यूफैक्चरिंग की कोर गतिविधियों में भी अनुबंध पर कामगारों को रखने की लगभग छूट मिल गई है. बिल के अनुच्छेद 57 (a) (b) और (c) को पढ़ने से यही लगता है.’ प्रोफेसर श्याम सुंदर की माने तो नया कानून कोर गतिविधियों से इतर अपने ज्यादातर कर्मियों को रखने और हटाने की खुली आजादी देता है. साथ ही अब कंपनियां बिना किसी नियम के कॉन्ट्रैक्ट की न्यूनतम और अधिकतम अवधि भी तय कर सकती हैं. सरकार ने नए कानून में उस प्रावधान को भी अब हटा दिया है, जिसके तहत किसी भी मौजूदा कर्मचारी को कॉन्ट्रैक्ट वर्कर में तब्दील करने पर रोक थी.
कुछ अन्य जानकार तो यह तक कहते हैं कि सरकार ने श्रम कानूनों को लचीला बनाने और कंपनियों को फायदा पहुंचाने के मकसद से कानून बनाने के बुनियादी सिद्धांतों को भी ताक पर रख दिया. इनके मुताबिक सरकार को पिछले आंकड़े देखकर ही इसका पता चल जाता कि उसके इस बदलाव से आगे स्थिति कितनी खराब हो सकती है. वार्षिक औद्योगिक सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि 1993-94 में संगठित क्षेत्र की फैक्टरियों के कुल कामगारों में कॉन्ट्रैक्ट पर रखे जाने वाले कामगारों की हिस्सेदारी 13 फीसदी थी. यह आंकड़ा 2016-17 में बढ़ कर 36 फीसदी तक पहुंच गया. यह तब हुआ, जब कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्ट पर रखने की खुली छूट नहीं थी.
औद्योगिक संबंध कोड विधेयक के जरिये सरकार ने ट्रेड और मजदूर यूनियनों को तगड़ा झटका दिया है. इस कानून के जरिये यूनियनों से जुड़े कई नियमों में बड़ा बदलाव किया गया है. ये बदलाव छोटी और बड़ी सभी तरह की कंपनियों पर लागू होंगे. नए कानून में उन मानदंडों को कड़ा कर दिया गया है जिनके आधार पर कोई यूनियन फैक्ट्री के मैनेजमेंट से बातचीत या ‘बारगेन’ करने में सक्षम होती है. विश्लेषकों के मुताबिक किसी फैक्ट्री में पहले की तरह ही यूनियन के गठन के लिए दस फीसदी या फिर 100 कर्मचारियों (जो भी संख्या कम हो) के समर्थन की जरूरत होगी. लेकिन किसी यूनियन को अगर कम्पनी के मैनेजमेंट से किसी मुद्दे पर बातचीत करनी है तो उसे 51 प्रतिशत श्रमिकों के समर्थन की आवश्यकता होगी. यदि कुछ फैक्ट्रियों में किसी भी यूनियन को 51 फीसदी समर्थन नहीं मिलता है तो मैनेजमेंट से बातचीत करने के लिए सभी यूनियनों को मिलाकर एक परिषद का गठन करवाया जाएगा. हालांकि, इस गठन की प्रक्रिया क्या होगी, यह नहीं बताया गया है.
इस मामले पर सीटू महासचिव एआर सिंधु का कहना है कि अभी तक कम्पनी के मैनेजमेंट से एक से ज्यादा यूनियन बातचीत कर सकती थीं. लेकिन नए नियम के बाद केवल एक यूनियन को ही बातचीत करने का हक़ मिलेगा. वे कहते हैं, ‘ऐसा इसलिए क्योंकि नए कानून के तहत किसी फैक्ट्री की एक यूनियन को 51 फीसदी श्रमिकों का समर्थन मिल जाने के बाद कोई दूसरी यूनियन मैनेजमेंट से बात करने में सक्षम ही नहीं हो पाएगी क्योंकि फिर फैक्ट्री में महज 49 फीसदी श्रमिक ही बचेंगे.’ वे आगे कहते हैं कि इसका एक मतलब यह भी है कि अगर किसी फैक्ट्री के 49 फीसदी श्रमिक किसी समस्या को लेकर अलग दृष्टिकोण रखते हैं तो उनकी बात मैनेजमेंट तक पहुंच ही नहीं सकेगी.
मोदी सरकार द्वारा लाये गए इस नए कानून ने हड़ताल करने से जुड़ी शर्तें भी कड़ी कर दी हैं. इसमें कहा गया है कि औद्योगिक प्रतिष्ठान में कार्यरत कोई भी व्यक्ति 60 दिनों के नोटिस के बिना कानूनी तौर पर हड़ताल पर नहीं जा सकता है. इसके अलावा अगर कोई मामला या विवाद राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण अथवा किसी अन्य न्यायाधिकरण के समक्ष भेजा गया है तो कानूनी कार्यवाही के दौरान और इस कार्यवाही के खत्म होने के बाद 60 दिनों की अवधि तक किसी भी हड़ताल का आयोजन नही किया जा सकता है. हालांकि, यहां पर सरकार ने यह भी जोड़ा है कि औद्योगिक न्यायाधिकरणों में मजदूरों से जुड़े मामलों का निपटारा एक साल के अंदर किया जाएगा. इससे जुड़ा एक पहलू यह भी है कि अगर मजदूर हड़ताल करना चाहे और अगर कंपनी प्रबंधन उस मामले को किसी तरह से न्यायाधिकरण में ले जाए तो फिर अधिकतम डेढ़ साल तक उस मामले में मजदूर कोई हड़ताल नहीं कर सकेंगे.
जानकारों का कहना है कि नए कानून में जिस तरह की शर्तें रखी गयी हैं, उनके तहत हड़ताल का आयोजन करना लगभग असंभव हो गया है. सीटू के महासचिव तपन सेन कहते हैं, ‘नए कानून के चलते ट्रेड यूनियन बनाना तो बहुत कठिन होगा ही, साथ ही हड़ताल करने से जुड़े मजदूरों के अधिकार पर भी एक अप्रत्यक्ष प्रतिबंध लग जाएगा. यहां तक कि उन्हें अपनी शिकायतें एवं मांग के लिए आवाज उठाने में दिक्कत आएगी. क्योंकि अब मजदूरों की हड़ताल करने की क्षमता और उनकी मैनेजमेंट से सामूहिक बातचीत करने की ताकत भी काफी कम हो जायेगी.’
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने भी इन श्रम कानूनों की आलोचना की है और मोदी सरकार से इसमें परिवर्तन करने की मांग की है. बीएमएस के अध्यक्ष साजी नारायण ने मीडिया से बातचीत में कहा, ‘हम इन कानूनों का विरोध करते हैं. सरकार ने हमसे सलाह जरूर ली थी, लेकिन कई महत्वपूर्ण प्रावधानों को इनमें शामिल नहीं किया गया है. इसके चलते जंगल राज जैसी व्यवस्था बन जाएगी और विवाद उत्पन्न होने की स्थिति में बलपूर्वक समाधान निकालने की कोशिश होगी.’ साजी आगे कहते हैं, ‘हड़ताल को प्रतिबंधित करने वाले वर्तमान प्रावधानों से औद्योगिक क्षेत्र एक संघर्ष क्षेत्र बन जाएगा, जिसका मतलब औद्योगिक शांति को नष्ट करना है. हड़ताल से पहले नोटिस लेने का मतलब स्पष्ट रूप से हड़ताल पर रोक लगाना है. इसे हटाया जाना चाहिए.’
नए कानून में कर्मचारियों के लिए सहूलियतें भी
सरकार ने नए श्रम कानून में कामगारों को कुछ सहूलियतें भी दी हैं. इनमें महिला कामगारों को पुरुष कामगारों के समान ही वेतन प्रदान करना होगा. पूरे भारत में एक समान मजदूरी लागू होगी. ईएसआई और ईपीएफओ का सामाजिक सुरक्षा कवच सभी मजदूरों को दिया जाएगा. स्थायी कर्मचारियों की तरह ही अस्थायी कर्मचारियों को भी एक ही तरह की सेवा शर्तें, ग्रेच्युटी, छुट्टी उपलब्ध कराई जाएंगी. प्रवासी कामगारों को कंपनियां अपने घर जाने हेतु वर्ष में एक बार भत्ता प्रदान करेगी. वित्तीय घाटे, कर्ज या फिर लाइसेंस पीरियड खत्म हो जाने से कोई कंपनी बंद हो जाती है तो कर्मचारियों को नोटिस या फिर मुआवजा दिया जाएगा. इसके अलावा किसी हादसे में श्रमिक की शारीरिक क्षति की भरपाई और मालिक पर लगाए जुर्माने का आधा हिस्सा श्रमिक को मिलेगा. सरकार ने कहा है कि इस नए कानून के तहत संगठित एवं असंगठित क्षेत्र के सभी श्रमिकों को पेंशन योजना का लाभ भी मिलेगा.
नए श्रम कानून में कहा गया है कि कंपनियों को नियुक्ति के वक्त सभी कर्मचारियों को नियुक्ति पत्र देना होगा. उन्हें प्रत्येक वर्ष मेडिकल चेकअप की सुविधा देनी होगी. महिलाओं के लिए काम का समय सुबह 6 बजे से लेकर शाम 7 बजे के बीच ही रहेगा. शाम 7 बजे के बाद अगर उनसे काम कराया जा रहा है, तो उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी कंपनी की होगी. कोई भी कर्मचारी एक हफ्ते में छह दिन से ज्यादा काम नहीं कर सकता. ओवरटाइम कराने पर उस दिन का दोगुना पैसा दिया जाएगा. नए कानून में ग्रैच्युटी की पांच साल की सीमा को समाप्त कर दिया गया है. ग्रैच्युटी को अलग-अलग स्थितियों में तीन साल या एक साल किए जाने की बात कही गई है.
इन बड़े बदलावों के पीछे सरकार का क्या तर्क है?
केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने श्रम कानून में बदलाव को एक बेहतर कदम बताया है. उन्होंने संसद में श्रम सुधार विधेयकों पर हुई बहस का जवाब देते हुए कहा, ‘श्रम सुधारों का मकसद बदले हुए कारोबारी माहौल के अनुकूल पारदर्शी प्रणाली तैयार करना है. 16 राज्यों ने पहले ही अधिकतम 300 कर्मचारियों वाली कंपनियों को सरकार की अनुमति के बिना फर्म को बंद करने और छंटनी करने की इजाजत दे दी है.’ गंगवार ने कहा कि रोजगार सृजन के लिए यह उचित नहीं है कि इस सीमा को 100 कर्मचारियों तक बनाए रखा जाए, क्योंकि इससे कंपनियां अधिक कर्मचारियों की भर्ती से कतराने लगती हैं. और वे जान-बूझकर अपने कर्मचारियों की संख्या को कम बनाए रखती हैं. उन्होंने सदन को यह भी बताया कि इस सीमा को बढ़ाने से रोजगार बढ़ेगा और कंपनियों को नौकरी देने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकेगा.
केंद्रीय श्रम मंत्रालय से जुड़े कुछ अधिकारी बताते हैं कि सरकार ने श्रम कानून में यह बड़ा बदलाव विश्व बैंक की ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ रैंकिंग (कारोबार सुगमता रैंकिंग) में दसवें पायदान पर पहुंचने के मकसद से किया है. अभी इस सूची में भारत 63वें पायदान पर है. सरकार का मानना है कि उसने श्रम कानून में जिस तरह के बदलाव किये हैं, उससे भारत दसवें स्थान पर पहुंच सकता है. इन अधिकारियों के मुताबिक कारोबार सुगमता रैंकिंग में स्थिति अच्छी होने से बाहरी कंपनियां भारत में निवेश के लिए आकर्षित होंगी. पीटीआई से बातचीत में एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ‘श्रम कानूनों में सुधार की प्रक्रिया पूरी हो गयी है यह उत्प्रेरक का काम करेगी... इससे विदेशी निवेश भारत की ओर आकर्षित होगा जिससे देश में रोजगार बढ़ेगा.’ इनके मुताबिक अभी तक भारत में श्रम कानूनों के दुष्चक्र के चलते व्यवसायी बनना काफी कष्टकारी होता था. लोगों को व्यवसाय शुरू करने से बेहतर काम नौकरी करना लगता था. इस अधिकारी के मुताबिक नए श्रम कानून गेम चेंजर साबित होंगे और इनसे कंपनियों, कर्मचारियों और सरकार तीनों को फायदा होगा. अब व्यवसाय में वृद्धि होगी, अधिक नौकरियां पैदा होंगी और श्रम कानूनों का समय पर और सही तरह से अनुपालन भी हो सकेगा. (satyagrah)
कनुप्रिया
एक गुण जो मैं तेजी से खत्म होते देखती हूँ लोगों में, वो है जब आप वास्तव में इसका मतलब है की बातें कह रहे हैं।
लोग बेहद लापरवाह होते हैं अपने कहे-लिखे शब्दों के प्रति, जबकि दुनिया का व्यवहार शब्दों पर ही टिका है। शब्दों को खोलकर उसके भीतर उसके मायने हैं या नहीं इसे जानने का कोई तरीका नहीं है। व्यवहार के लेन-देन का, हर भरोसे का कोई बहीखाता नहीं होता, वो जुबान पर, शब्दों पर ही चलता है और जैसे-जैसे शब्दों पर भरोसा खत्म होता जाता है, एक बिना भरोसे की दुनिया बनती है, यह भी एक किस्म की अराजक स्थिति है जिसमें नुकसान अक्सर कमजोर भुगतते हैं।
आम लोगों में तो अपने कहे के प्रति लापरवाही की प्रवृति देखने में मिलती ही रहती है और उससे कोई भी निर्णय लेने में बहुत दिक्कत होती है। घर की कामवाली भी अगर शाम को आउंगी लापरवाही से कह दे तो शाम तक काम बढ़ जाता है। असल मजबूरियों की बात नहीं यहाँ।
आजकल मीडिया भी जो कभी अपने कहे के लिए जिम्मेदार महसूस करता था, वहाँ भी यह प्रवृत्ति खत्म है। सुशांत सिंह राजपूत पर क्या नहीं कहा गया, तमाम बेसिर-पैर की बातें, और जब एम्स के डॉक्टर्स ने आत्महत्या की पुष्टि कर दी तो कहीं कोई शर्म, कोई गलती का बोध, अपने कहे की जवाबदेही नहीं, उसी गैरजिम्मेदारी से आगे भी बोलना, कहना चालू है।
सोचिये कि आपके आसपास के हर व्यक्ति डॉक्टर, बैंक वाले, दफ्तर वाले, या उन जिन सबसे आपका रोज साबका पड़ता है, यदि अपने कहे के लिए इतने ही गैरजिम्मेदार हों तो आप कितने अनिश्चय की स्थिति में रहेंगे।
कल गौर से राहुल गाँधी को सुन रही थी, क्या वो ऐसे वादे कर रहे हैं जो पूरे नहीं कर सकते? आखिर वो इस कॉरपोरेट सिस्टम के परे नहीं, उन्हें भी पता है कि सत्ता में आने के बाद क्या-क्या सीमाएँ हैं, विपक्ष में रहकर बोलना आसान है, मगर मैंने पाया कि वो अपने कहे के लिए अब तक तो ठीक-ठाक सावधान हैं, थोड़ा बहुत भी जिम्मेदारी जवाबदेही का बोध हो तो विश्वनीयता बढ़ती है। बाकी का पता तो सत्ता में आने पर ही लगेगा।
वहीं मोदीजी के लिए उनके शब्दों के कोई मायने नहीं, वो लापरवाही से अपने शब्द बाजार में फेंकते हैं, और इस तरह से फेंकते हैं जैसे उन पर यकीन करते हों, इससे सामने भी यकीन का भ्रम बनता है, मगर उसके बाद उनके लिए मायने खत्म हो जाते हैं, फिर वो अपने शब्दों के लिए न जवाबदेह हंै, न जिम्मेदार हैं। आप उन्हें उनका कोई भी पुराना वीडियो वापस नहीं दिखा सकते, पिछले महीने तक का नहीं। इससे देश में कितने अनिश्चय का माहौल है, वो साफ है। आप यकीन से कह नहीं सकते कि यह व्यक्ति बोलेगा क्या और करेगा क्या। ऐसे व्यक्ति पर भरोसे के लिए अंधभक्ति जरूरी है, वरना भरोसे का दर्द गहरा होगा।
कहना यही है कि कौन कितना अच्छा कह रहे हैं उससे भी ज्यादा जरूरी है यह जानना कि वे जो कह रहे हैं वास्तव में उसके लिए मायने रखते हैं या नहीं। अपने कहे-लिखे के प्रति जिम्मेदारी का बोध भी एक कसौटी है और यह हर तरफ खत्म हो जा रहा है, राजनीति में तो खैर एकदम ही।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
बिहार के चुनाव के बाद किसकी सरकार बनेगी, कहा नहीं जा सकता। यदि दो प्रमुख गठबंधन सही-सलामत रहते तो उनमें से किसी एक की सरकार बन सकती थी। एक तो नीतीशकुमार का और दूसरा लालूप्रसाद का। लेकिन बिहार में अब चार गठबंधन बन गए हैं।
नीतीशकुमार के गठबंधन में जदयू और भाजपा हैं और लालू के गठबंधन में उनका राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां हैं। लालू के बेटे तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लड़े जा रहे इस चुनाव में उनका दावा है कि वे सरकार बनाएंगे, क्योंकि चार बार के मुख्यमंत्री नीतीश से अब बिहार की जनता ऊब चुकी है, उन्होंने वादे तो बड़े-बड़े किए लेकिन उन पर अमल नहीं किया, कोरोना की तालाबंदी के दौरान नीतीश का रवैया बहुत ही लापरवाही का रहा और लालू परिवार को दी जा रही सजा का भी जनता पर उल्टा असर हो रहा है। केंद्र की भाजपा सरकार की कई नीतियों, जैसे नोटबंदी, तालाबंदी, जीएसटी, कृषि-कानून, हाथरस कांड आदि ने आम जनता को इतना त्रस्त किया है कि उसका असर भी बिहार के चुनाव में दिखेगा।
राजद का सबसे बड़ा तर्क यह है कि नीतीश का कुछ भरोसा नहीं। वे कब किससे हाथ मिला लें। उन्होंने 2013 में भाजपा से रिश्ता तोड़ा, राजद से हाथ मिलाकर 2015 का चुनाव लड़ा और फिर वे भाजपा की गोद में जा बैठे। राजद के इन तर्कों के विरुद्ध सबसे तगड़ी लोहे की दीवार अगर कोई है तो वह नरेंद्र मोदी की छवि है। भाजपा को भरोसा है कि वह अपनी सीटें मोदी के नाम पर जीतेंगे। बिहार की जनता भाजपा को इतनी सीटें जिताएगी कि भाजपा ही सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी। जाहिर है कि फिर मुख्यमंत्री भी उसका ही बनेगा लेकिन वह अभी इस तरह का कोई दावा नहीं कर रही है। चुनाव-परिणाम आने के बाद ये गठबंधन क्या-क्या रुप ले सकते हैं, यह भी अभी नहीं कहा जा सकता।
कौन पार्टी किससे अलग होकर अन्य किससे मिल जाएगी, कुछ पता नहीं। अभी रामविलास पासवान की लोजपा नीतीश का विरोध कर रही है लेकिन भाजपा का समर्थन कर रही है। उसने अपने आपको छुट्टा रखा हुआ है। चुनाव के बाद जिसका पलड़ा भारी हुआ, वह उसी में बैठ जाएगी। बिहार में या भारत में कहीं भी कांग्रेस और भाजपा आपस में गठजोड़ नहीं बना सकते। बाकी कोई भी पार्टी मौके के मुताबिक अपना भविष्य तय करेगी, क्योंकि इन पार्टियों के लिए सत्ता ही ब्रह्म है, गठबंधन तो मिथ्या हैं।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-राजेश गनोदवाले
लंबे समय से कला और संस्कृति पर लिखने वाले छत्तीसगढ़ के अखबारनवीस राजेश गनोदवाले ने मुहर्रम के शेर नाच पर यह जीवंत फीचर लिखा है जो उन्हीं की खींची तस्वीरों के साथ हम यहां पेश कर रहे हैं।
-संपादक
मोहर्रम के महत्व को अपने ढंग से बढ़ाने वाले ‘दो पाया शेर!’
नहीं आए इस बार वे! ‘लॉकडाउन’ की भेंट आखिर यह हुनर भी चढ़ गया! जो देह इसे धारण करती थी, अवसर आने पर व्याकुल खड़ी नजर आई! उनके मन में बैठा हुआ ‘वह शेर’ खुद को बाहर न निकलता देख किस कदर मायूस हुआ होगा-वही जानें। मोहर्रम आया और चला गया! एक वायरस की चपेट में कितना कुछ सिमट गया देश में? बड़े पर्व-उत्सव तो फिर भी दर्ज होते दिखे। ऋतु-पर्वों से जुड़ी या अपनी स्थानीयता में लोकप्रिय कलाएं तो वायरस की आँधी में जैसे साफ हो गईं! खासकर वो रूपाकार, जो ना तो किसी पंचांग में दर्ज रहते हैं और ना अकादमिक पट्टी में सराहे या समझे जाते हैं! समय के प्रवाह में जन-मान्यताओं से प्रकट इन सुदर्शन विधाओं को लेकर कभी इतने विस्तार से सोचा नहीं था? कोविड काल ने वह काम भी करवा दिया!
आदतन मोहर्रम या मुहर्रम कह लें 6 दोनों शब्द चलन में 8 का इंतजार रहता था मुझे। लेकिन वो नौबत नहीं आई! असल में अंदेशा तो था ही कि कैसे होगा शेरों का नृत्य इस दफा? वे लोग जो इस परम्परा को अपने से जुड़ा मानते हैं, क्या शेर बनेंगे? और क्या उन्हें सडक़ों पर उतरने की अनुमति होगी? सोचने पर मुस्कान तैर गई! ख्याल रोचक था! यानी बनने वाला व्यक्ति अनुमति माँगने जाता तो क्या कहता, कि-
‘मैं शेर बनूँगा साहब ,
मुझे नाचने की अनुमति दी जाए?’
-अच्छा हुआ कि लॉकडाउन के बनते-खुलते हालातों के बीच ऐसी नौबत नहीं आई। वरना ‘कोई शेर निरीह होकर अनुमति के लिए कहीं क्यों गिड़गिड़ाता खड़ा रहे!’ खैर, उत्तर तय थे! वही हुआ, यानी कुछ नहीं हुआ! बिना ‘उनकी दहाड़’ के यह मोहर्रम बीत गया! प्राय: खास इलाकों में अपने कद्रदानों के प्रेम की बदौलत प्रतिवर्ष रौनक भरने वाले इन ‘मौसमी शेरों’ की विनम्र-दहाड़, जिसमें बच्चा मण्डली को रिझाने का भाव अधिक शामिल था-इस बार सुनी नहीं गई! जिन चिन्हित मुहल्लों या गलियों में उनका कोलाहल आठेक दिन माहौल बनाए रहता था ऐसे इलाके भी इन मित्र-शेरों की बाट देखते रह गए!
हर वर्ष, शास्त्री बाजार के बाहरी मुहाने पर, लाखे नगर सफाई कर्मचारियों की कॉलोनी के पास 6 पीपल पेड़ के नीचे 8 और सारथी चौक के करीब 6 सामुदायिक भवन 8 ये वे इलाके थे जहाँ आप किसी आदमी को शेर-रूप धारण करते देख सकते थे। मेरे लिए ये ठिकाने अनजान नहीं थे। कब से देख रहा हूँ कहना मुश्किल है । काफ़ी सालों से। इस वर्ष इनकी याद, ‘वे दिख जाते थे।’ इसीलिए नहीं आई! वरन उन्हें खासतौर पर याद किया। कच्ची उम्र में देखे वे दृश्य आँखों में सुरक्षित रह गए। इन्हीं कारणों से शेर नृत्य से एक आंतरिक अनुराग-भाव भी बनता चला गया। संभवत: इन्हीं बहुतेरे कारणों से आज इस पर इतना विचार कर लिखने लगा।
नयापारा-फूलचौक का रहवासी होने का एक लाभ ऐसा भी मिला कि ‘सवारी’ या ‘पत्थर फोड़ की सवारी’ के दौरान इससे जुड़े कुछ आयोजन सहज ही देखने मिल जाया करते थे । उनकी आधी-अधूरी छवियाँ भीतर ठहरी रहती थीं। मोहर्रम की तकरीरें भी कानों में नियमित आया करतीं। उन्हीं दिनों बेहद रंजक ‘शेर नृत्य’ भी पहले पहल देखने मिला! गलियां-दर-गलियां शेरों के पीछे हल्ला-गुल्ला मचाते दौड़ लगाने का रोमांच! शेर रूप में रंगी देह दर्शन का अनुभव अबोध उम्र से था। क्यों और ये क्या हैं? की उधेड़बुन में उलझने की बजाय इसकी सांस्कृतिकी आकर्षक बन जाती थी। इन्हीं कारणों से वहीँ कहीं, जब तब लंगर के दौरान बाँटा जाने वाला ‘खिचड़ा’ भी बतौर प्रसाद बचपने में खाया। थिरकते शेरों की मनोहारी स्मृतियाँ भीतर इस ढंग से सुरक्षित होती चली गईं। बढ़ती जाती उम्र के बाद भी इसने मन से रिश्ता नहीं तोड़ा! वही गर्मजोशी इनके लिए अभी भी कायम है। पिछले वर्ष तक, राह में अनायस दिख जाने पर इन थिरकते शेरों के पीछे कुछ दूर चलने का आनंद लिया है!
ये शेर जितना आकर्षित करते थे उतना ही आनंद तीन-चार बैंड वादकों की मण्डली भी देती थी, जिनकी चाल को कैसे भूला जाए? शेरों के पीछे-पीछे लगभग दौड़-दौडक़र बजाते वादक! इनका भी भरपूर सुख लिया तो लय और धुन समझने के कारण। ‘शेर धुन’ के रूप में बैंड वादक एक खास तरह का संगीत बजाया करते हैं। बारात में थिरकते नौजवां भी कभी-कभार इसे बजवा कर नाचते देखे गए हैं! क्या यह किसी वादक की ईजाद की गई रचना है? इस खास धुन को बजाए जाने का कोई विधान परम्परा में बना हुआ है? या अनायास यह ट्यून इसका हिस्सा बन स्वीकार कर ली गई। सांगीतिक जिज्ञासाएँ तो हैं। पड़ताल करनी होगी इनकी कभी! वैसे तेज गति की इस धुन के बजते ही आँखों के सम्मुख सीधे ‘शेर नृत्य’ का स्मरण हो आता है।

मोहर्रम के दरमियाँ जहां ‘सवारी’ बैठाई जाती हैं वहाँ से सवारी निकलने के दौरान भी बैंड वादक प्राय: यही ट्यून बजाते हैं। यानी इस धुन का नाता सवारी से पहले है या शेर नृत्य से? यह भी एक जटिल पहेली है!
नागपुर 6 महाराष्ट्र 8 के बाद छत्तीसगढ़ के रायपुर में देखा जाने वाला यह लोक रूप और कहीं तो होगा? बेशक कुछ अलग ढंग से ही सही। वैसे कुछ समय पहले रायपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में देखी गई एक फिल्म याद आ गई जिसमें अभिनेता पवन मल्होत्रा अपनी देह पर शेर रँगवा कर निकलता हैं! कमाल का सिनेमा था, नाम लेकिन याद नहीं आ रहा! वैसे इधर, इसे गढऩे वाली 6 पेंटर 8 नई बिरादरी के सिमटने का नतीजा बहुत साफ है कि शेर बनने का क्रम गड़बड़ा जाएगा। असल में देह के ऊपरी हिस्से पर जिस खाल का इस्तमाल इसमें नर्तक किया करते हैं वो भी इन्हीं पेंटर्स के पास होती है! अब ये लोग इससे हाथ खींचने लगे हैं!
थोड़ा गौर करें तो पता लगेगा हमारे आसपास आंचलिक महत्व की ऐसी एकाधिक रिवायतें हैं जो साझा-समाज के सूत्र को बढ़ाती है। शेर नृत्य विधा को भी उसी परम्परा की कड़ी मानिए! यो तों मुस्लिम समाज के साथ इसे आगे बढ़ते देखा जाता है, अलावा इसके बड़ी संख्या गैर-मुस्लिम युवाओं की भी है। ये वे युवा हैं जो बचपन से इसे देखते आ रहे हैं या जिनके परिजनों ने इसे समाज विशेष का मानने से बाहर निकल कर देखा और अपनाया। इसके पीछे एक बड़ी कहानी भी बताई जाती है। जबकि अधिकांश इसे मन्नत से जोडक़र बनना बताते हैं! लेकिन मानव देह की शेर में रूपांतरित होने की भावना मोहर्रम के प्रति कुल मिलाकर श्रद्धा भाव का प्रकटीकरण ही है।
इस वर्ष, जैसा कि ऊपर कहा है
उन्हें सायास याद किया और-फ्लैश बैक शुरू-
कोई 3 साल पहले लाखे नगर सफाई कामगारों की चाल के करीब आनंदित मन से इस हुनर को साधने वालों के बीच खड़ा था। अनवरत दो-तीन दिनों तक मेरी चहलकदमी देख कर एक व्यक्ति सामने आया-
-‘भैया सारथी भवन में जाओ,
वहाँ बहुत सारे शेर बन रहे हैं!’

पँक्ति रोचक थी और आगे बढ़ाने वाली भी। चाहता भी यही था। हिन्द स्पोर्टिंग मैदान के पहले तिराहे पर बाएँ हाथ में स्थित सामुदायिक भवन का नाम है-सारथी भवन। सारथी चौक से उस भवन के नामकरण का क्या संबंध है? हो तो भी वह मेरा विषय नहीं था। मुझे तो निर्मित होते शेर देखने थे, और बहुतायत में देखने थे। थोक में होते इस ‘निर्माण का साक्षी’ होना था! मैं सारथी भवन के भीतर था। अंदाजा बाहर से ही लगाना था कि भीतर रोमांच कैसा होगा? पचास फीट का चौरस हॉल। नजारा कभी न दिखाई देने वाले दृश्य जैसा। मानों शेर निर्माण की फैक्ट्री हो! मशीन की सहायता से धड़ाधड़ शेर रँगे जा रहे थे! एक आदमी नजऱ आया जो पेंटर नहीं था। वो एयर प्रेशर वाली मशीन से इच्छुक लोगों की देह पर बेस रँग चढ़ा रहा था। यानी सफेद और पीला। कोटिंग ख़त्म होते ही वह आदेशित ढंग से कहता कि-‘जाओ घूम आओ।’ जो लोग बेस रँग सूखाकर आ जाते उनके हाथ और पैरों में धारियाँ बनाने से पहले चेहरे का बारीक काम पूरा करने की बारी आती। यहीं से भूमिका मुख्य व्यक्ति, यानी पेंटर की शुरू हो जाती थीं। चेहरे की कारीगरी, समय लेने वाला काम। पता लगा रोजाना की तुलना में आज भीड़ इसलिए है कारण आज मोहर्रम का आखिरी दिन है। शेर निर्मिति सुचारू हो इसे देखकर पेंटर ने अपने सहायकों की सँख्या बढ़ा रखी है। चेहरा रंगने के अलावा धारियां आदि बनाने का काम सहायकों के जिम्मे।
रात भर जागे हुए थके चेहरे, ‘रजनीगंधा’ की खुलती पुडिय़ा, कोने पीक से भरे हुए, पसीने की गंध और मशीन से उड़ती रँगों की गुबार! रँगीन चेहरों की रह-रहकर होती आवाजाही-और सिगरेट के कश! अगर हॉल के अंदर अजीब-सा सिनेमाई दृश्य-सौंदर्य फैला हुआ था तो बाहर परिसर में उभरते नजारे भी उतने ही रोचक। शेर बन रहे, बनाए जा चुके और बनने की प्रतीक्षा में सिर्फ चड्डी पहनकर मटरगश्ती करते युवा! निर्मित हो चुका शेर सूखने के इंतजार में और निर्माणाधीन शेर स्वयं का काम ख़त्म हो जाने की प्रतीक्षा में। जो पिछले दिन बन चुके वे अपनी बिखरती हुई रंगीन छवि के साथ इधर-उधर थोड़े अभ्यस्त अंदाज में अकारण बिरादरी के मध्य घूमते दिखाई दे रहे थे! आधे निकले, आधे चिपके हुए रँगों के साथ शेर बन रहे साथियों की हौसला अफजाई में भी इनमें से कुछ व्यस्त। उधर, कुछ बैंड आने के साथ गंतव्य की ओर ऑफिशियली रवाना होने से पहले अपनी थिरकन साधते हुए! यानी शेर, शेर और सिर्फ शेर। जैसे उनकी कॉलोनी हो!
या कोई-शेर ग्रह !
सारथी भवन के उस माहौल में न तो पेंटर इतनी फुर्सत में दिखे कि बातचीत हो पाती। यदि होती भी तो रंगों का गुबार बदले में मुझे अस्थमा उपहार स्वरूप दे देता, सो बाहर निकल जाने में ही भलाई थी। इधर, शास्त्री बाजार के मुहाने पर ही दाईं ओर एक छोटा पंडाल तान कर प्रतिवर्ष देह को शेर में बदलने वाले सलीम कुरैशी उर्फ कल्लू पेंटर ने थोड़ी बातें की। जैसे कि बिलासपुर और राजनांदगांव शहर भी छत्तीसगढ़ में ऐसे हैं जहाँ शेर रँगने का चलन कायम है। फिलहाल उनके नाम का जलवा है। यानी वे शेर बनने वालों के पसंदीदा पेंटर हैं। पूछने पर कि अलावा उनके भी जो रंग रहे कौन होंगे? कल्लू भाई के मुताबिक-
-‘काम चलाऊ जियादा है!’

अलबत्ता कल्लू भाई इस बात पर एकमत दिखे कि पुरानी पीढ़ी में जुल्फी पेंटर, नजीर पेंटर, और लतीफ़ जब्बार पेंटर सिद्घहस्त माने जाते थे। कल्लू भाई भी कभी शेर बन थिरकते थे। अब वे इससे दूर हैं! हुनर सीख लिया था देख-देखकर। फिर पेट भी चलाना है। करें क्या? इसीलिए पेंटिंग का दामन थाम लिया! सीजन में उनके हाथों रँग, ब्रश आ जाता है! शेर बनने वालों के मध्य वे कल्लू उस्ताद हैं। पूरा काम खत्म हो जाने के बाद नर्तक की जांघ के पीछे हिस्से में-‘कल्लू पेंटर’ लिखते हुए जैसे वे उसे सर्टिफिकेट दे दिया करते हैं। और तब उनके चेहरे में आश्वस्ति उभर जाती है।
इस कला रूप की आर्थिकी भी आसान नहीं। खर्चे ही खर्चे! कमाई करने तो जाहिर है कोई बनता नहीं! अब वे रँगने का हजार रुपये लेते हैं। कभी पाँच-सात सौ में बात बनती रही। नर्तकों को इसमें खाल और मुखौटों के पैसे अलग से नहीं देने पड़ते। सब का किराया उसी में समाहित! हां, बैंड का खर्चा शेर बनने वाला अलग से वहन करता है-जो प्रतिदिन के हिसाब से तय होता है!
कड़े खां से कमलसब्जी तक-
कुछ रिटायर्ड शेरों से इस परंपरा के खुलासे की खातिर बातचीत हुई। तो पता लगा उस दौर में जिन देहों की थिरकन देखने वालों की यादों में दर्ज हो जाती थीं या कि जिनका नाम लोकप्रिय सूची में था उनमें कड़े खां ऊपर हैं। बाद की पीढ़ी में सत्तार पहलवान और इस्माइल भाई समेत अब्दुल सत्तार खाकी एवं सुंदर की चर्चा की जाती है। लल्ला पहलवान, फिरोज खान और कमल सब्जी वाला भी पुराने जानकारों की स्मृतियों का हिस्सा हैं!
खेक्सी शेर-
शेर और खेक्सी का कोई संबंध कहाँ? यानी शाकाहार और माँसाहार! लेकिन इस नृत्य के दौरान आपको मिल सकता है! दरअसल अपनी कदकाठी से अजीबो-गरीब रूप सज्जा में एक पात्र इन शेरों के साथ चलता है! उसका काम होता है बच्चों में रंजक वातावरण तयार करना। इसकी उपस्थिति का खुलासा जानकारों के हिसाब से बच्चों की भीड़ नियंत्रित करने भी की जाती है।
शालेय दिनों में देखा गया खेक्सी पात्र आज भी याद है-लंबी कद काठी वाला एक व्यक्ति था, जिसकी देह ध्यान खींचती थी! लंबाई के अनुपात में उसकी देह में मांस काफी कम था! चेहरा भी आनुपातिक ढंग से छोटा! उसे जिस नर्तक के साथ पहली दफा हमारे बाड़े में देखा वह नर्तक सुंदर पहलवान था। सुंदर नामक ये सज्जन हमारे घर के ठीक सामने रहा करते थे। एक कमरे का घर! उनके घर में और कौन-कौन था याद नहीं, लेकिन उनका डील डौल अपनी मांसलता के कारण याद रह गया! वे शेर भी बनते हैं इसका पता पहली दफा तभी लगा जब वे अपनी इस बदली हुई अवस्था के साथ गली में दाखिल हुए-और कोलाहल मचना ही था! ‘खेक्सी महाराज’ भी विचित्र भंगिमाओं को साधते संग-संग! खुली देह, थुलथुल चाल और स्वयं में शेर-सा वैभव धारण करने वाला सुंदर का वह मनोहारी ढंग। खेक्सी का अंदाज चपल था, तो सुंदर भाई धीर गंभीर! यानी अतिरिक्त मेहनत किए अपना असर छोड़ जाने वालों में से। यह जोड़ी फूलचौक, रहमानिया चौक, तवायफ लाइन और नयापारा-जोरापारा इन इलाकों में लोकप्रिय थी। खेक्सी की छवि मन में ऐसी बैठी कि जब कभी वो गली से गुजरता दिख जाता उसे पहचानने में कभी दिक्कत नहीं आई कि यही तो है जो खेक्सी बना करता था!

आजकल ‘संकली शेर’ नजर नहीं आते! सुंदर प्राय: इसी लिए जाने जाते थे। इस ढंग के शेरों में गले में मोटी सांकल हुआ करती जिसे दो तरफ से दो व्यक्ति हाथों में लकड़ी का रामलीला स्टाइल चमकदार फरसा लिए नियंत्रित करते थे! सांकलधारी शेर थोड़ा अभिजात्य किस्म का माना जाता था याकि जिसका रसूख हो! जब साँकल थामे दोनों सहयोगी काबू करने का प्रयास करता तो वे सिमट भी जाते! इस दृश्य की बदौलत वातावरण में बनता सिकुड़ता रूपक बच्चों की भीड़ को सम्मोहित करता था।
शेर नृत्य कोई आधिकारिक नृत्य तो है नहीं, ना ही उसका नियम, विधान। पैर या हस्तक इस रूपाकार में या इस लय-गति-छंद में ही बढऩे, घटने चाहिए जरूरी कहाँ? जो कोई भी शेर रूप धारण करता है उसके पास इस हुनर का एक देखा गया ढाँचा होता है-और यही इसका अपना अघोषित अंदाज कि ऐसा ऐसा हो। अलबत्ता बैंड की गति-लय जरूर इसको एक दायरा देती है। यही इसका न्यूनतम ढंग है जिसे प्रत्येक शेर बनने वाला अपनी शैली में ढाल कर डिलीवर करता है! देखने वाले भी उनके हाथ-पैरों की कलात्मक गुणवत्ता की बजाय उछलती हुई सी रँगत में रमने लगते हैं। एक आदमी कैसे बदली हुई रँग भूषा के सहारे परिवेश गढ़ रहा है!

धीरे-धीरे इसकी खूबसूरती भी धुँधली पड़ जाएगी जिस तरह दूसरे और शहराती लोकरंग। दृश्यों के पीछे भागने वाला मीडिया भी, मेरी अपनी जानकारी में कभी इन पर कुछ विस्तार से काम किया हो देखने में नहीं आया। प्रिंट मीडिया के उलट इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए तो यह बढिय़ा दृष्यात्मक फीचर है! कल्पना करिए स्टूडियो में सजा धजा शेर बैठा हुआ है, और उसका यह रंगीन अनुभव कोई एंकर दर्शकों के सम्मुख ला रहा है! लेकिन ऐसा होगा? लगता नहीं! इसके सिमटने की बहुतेरी वजहों में इस वर्ष एक कड़ी भले कोरोना ने जोड़ दी, लेकिन जो संकेत बातचीत में उभरकर आते हैं वो साबित करते हैं कि इसके प्रति अब स्वीकार की भावना खत्म होने लगी है। स्वीकार का यही अभाव अब अस्वीकार का जनक बनता जा रहा है।
-बादल सरोज
भौतिक विज्ञान-फिजिक्स-में 2020 के नोबल सम्मान की खबर तीन वजहों से खुशखबर है।
प्तएक इसे पाने वालों में 55 वर्ष की सुश्री एंड्रिया हेज शामिल हैं जिन्होंने जर्मनी के रेनहार्ड गेन्जेल के साथ मिलकर यह पता लगाया है कि आकाशगंगा के ठीक बीचोंबीच एक विराट वजनी अनोखा ब्लैकहोल है जो सारे ग्रहों-उपग्रहों-सितारों की गति और स्थिति दोनों को नियंत्रित करता है।
नोबल शुरू होने (1901) के बाद से एंड्रिया चौथी महिला भौतिक विज्ञानी हैं जिन्हें यह सम्मान मिला। इससे पहले मैरी क्यूरी थी जिन्हें 1903 में, मारिया गोयप्पर्ट-मेयर 1963 में और डोना स्ट्रिकलैंड 2018 में यह सम्मान हासिल कर चुकी हैं।
प्रसंगवश मैरी क्यूरी इसलिए भी असाधारण थी क्योंकि 1911 में उन्होंने केमिस्ट्री-रसायन विज्ञान-में भी नोबल प्राप्त किया था। उन्होंने एक स्त्री होने के नाते खुद अपने जीवन में जितनी मुश्किलें उठाई थीं वह अलग कथा है ; शायद कोई फिल्म भी बनी है उस पर। क्या पता एंड्रिया की भी कोई कहानी हो-जिसके पन्नों को समेटकर वे यहां तक पहुँची हों।
दो इस बार के फिजिक्स नोबल की दूसरी ख़ास बात इसका ब्लैक होल केंद्रित होना है।
ब्रह्माण्ड और इस प्रकार जीवन के अस्तित्व की पहेली को हल करने की दिशा में ब्लैक होल एक विस्मयकारी वैज्ञानिक खोज थी। यूं इसकी भविष्यवाणी अल्बर्ट आईन्स्टीन ने अपनी जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी के साथ 1916 में ही कर दी थी-मगर पहले ब्लैकहोल को 1971 में ही खोजा जा सका।
इसकी सबसे सुव्यवस्थित व्याख्या स्टीफन हॉकिंग ने की थी और कहा था कि ये सिद्धांत हमें इस सवाल का जवाब देने के लिए काफी हैं कि ब्रह्मांड का निर्माण कैसे हुआ, ये कहां जा रहा है और क्या इसका अंत होगा और अगर होगा तो कैसे होगा? अपने काव्यात्मक व्यंग में उन्होंने कहा था कि अगर हमें इन सवालों का जवाब मिल गया तो हम ईश्वर के दिमाग़ को समझ पाएंगे। (थ्यौरी ऑफ़ एवरीथिंग)
क्या है ब्लैकहोल और बिगबैंग; सितारों, ग्रहों की एक उम्र होती है। उसके बाद वे सिकुड़ते हुए एक ऐसे पिण्ड में बदल जाते हैं जहाँ बस गुरुत्वाकर्षण और अन्धकार है। जहां वक्त ठहर जाता है-जहां समय और स्थान का कोई मतलब नहीं होता। गुरुत्वाकर्षण इतना शक्तिशाली होता है कि यह आसपास की हर चीज सोख लेता है-यहां तक कि प्रकाश भी इससे बाहर नहीं आ पाता।
और उसके बाद कुछ-फकत कुछ-अरब-खरब वर्षों के बाद यह ब्लैकहोल फूटता है और फैलने लगता है, नए-नए ग्रह और सितारे बनाते हुए आखिर में फिर एक बार ब्लैक होल में बदल जाने के लिए।
जैसे, हम जिस ब्रह्माण्ड में रहते हैं वह कोई 13 अरब 80 करोड़ साल पहले ऐसे ही किसी विस्फोट से बनना शुरू हुआ है और अभी फैलता ही जा रहा है।
तीन, 2020 के नोबल की तीसरी बात है आईंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत की एक बार और पुष्टि। इस पर बाद में कभी।
अभी बस इतना कि 1848 में कार्ल माक्र्स-फ्रेडरिक एंगेल्स के लिखे बीजक ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’ के बाद प्रकृति और समाज विज्ञान की सारी-जी हाँ सारी-खोजों और अनुसंधानों ने माक्र्सवाद की पुष्टि की है। उसे सही ठहराया है।


