विचार/लेख
- Eesha
इस हफ़्ते ज्यूलरी ब्रैंड ‘तनिष्क’ का एक विज्ञापन बहुत चर्चा में है। लगभग एक मिनट लंबे इस विज्ञापन में कहानी है एक हिंदू औरत की जिसकी शादी एक मुस्लिम परिवार में हुई है। औरत अपनी मुस्लिम सास के साथ अपने ससुराल में किसी उत्सव की तैयारियां होते देखती है, फिर जब वह बाहर बगीचे में आती है तो पता चलता है कि उसी की गोद-भराई की तैयारियां हो रही हैं। भावुक होकर वह अपनी सास से पूछती है, “मां, यह रस्म तो आपके यहां होती भी नहीं होगी न?” इस पर सास जवाब देती है, “बेटी को खुश रखने का रस्म तो हर घर में होता है न?” विज्ञापन तनिष्क के नए ‘एकत्वम’ कलेक्शन का है।
यह विज्ञापन बेहद खूबसूरत है और बड़ी संजीदगी से एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश भेजता है। हम इस समय एक ऐसे राजनीतिक वातावरण में जी रहे हैं जहां सुनियोजित तरीके से दो समुदायों के बीच घृणा फैलाई जा रही है और हिंसा को बढ़ावा दिया जा रहा है। ऐसे में इस तरह के सामाजिक संदेश बहुत ज़रूरी हैं जो हमें सद्भाव और सहिष्णुता जैसे मूल्यों के बारे में याद दिलाएं, और एक बेहतर समाज का निर्माण करने के लिए हमें प्रोत्साहित करें।
अफ़सोस की बात यह है कि हमारे समाज के एक विशेष तबके को यह बात नहीं पची। मिनटों में ट्विटर पर #BoycottTanishq ट्रेंड होना शुरू हो गया। इन लोगों का कहना यह था कि यह विज्ञापन हिंदू-विरोधी है और हिंदू लड़कियों को ‘लव जिहाद’ या मुस्लिम लड़कों के साथ प्रेम संबंध बनाने के लिए प्रेरित करता है। बात इस हद तक पहुंच गई कि ट्रोल्स ने तनिष्क के ब्रैंड मैनेजर मंसूर ख़ान का नाम और पता तक ढूंढ निकाला और उन्हें और तनिष्क के अन्य कर्मचारियों को धमकियां भी देने लगे। नतीजा यह हुआ कि तनिष्क ने यह विज्ञापन हटा लिया और ट्विटर पर एक बयान दिया जिसमें यह कहा गया कि कंपनी अपने कर्मचारियों और सहयोगियों की निजी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह विज्ञापन वापस ले रहा है। गुजरात में तनिष्क के एक शोरूम ने भी इस विज्ञापन के लिए क्षमा मांगते हुए अपने दरवाज़े पर एक नोटिस लगाया।
‘लव जिहाद’ की आलोचना हम पहले भी कर चुके हैं। यह कुछ भी नहीं बल्कि समाज द्वारा महिलाओं को नियंत्रित करने और सांप्रदायिक नफ़रत बनाए रखने के लिए एक काल्पनिक हौवा है। यह हमें दूसरे समुदाय को नफ़रत की नज़र से देखने के लिए मजबूर करता एक राजनीतिक कौशल मात्र है। इसके पीछे की मानसिकता इस्लामोफोबिक के साथ साथ स्त्री-द्वेषी भी है क्योंकि यह महिलाओं की निजी स्वतंत्रता, उनके साथी चुनने के अधिकार पर हस्तक्षेप करता है।
इस पूरे विवाद से जो एक अच्छी चीज़ निकली है वह यह है कि अंतरधार्मिक विवाहित दंपतियों ने इस विज्ञापन के लिए समर्थन जताते हुए सोशल मीडिया पर अपने प्रेम और विवाह की कहानियां साझा की हैं। उन सबका यही कहना रहा है कि प्रेम धर्म और जाति की सीमाओं से परे है
विरोधियों से यह बात हज़म नहीं होती कि विज्ञापन की नायिका एक ऐसी औरत है जो अपनी मर्ज़ी से अपने धर्म, अपने समुदाय के बाहर वैवाहिक संबंध बनाकर बेहद खुश है। एक ऐसी औरत जो अपने हिसाब से अपनी निजी ज़िंदगी जीती है और खुद को इन स्वघोषित धर्मरक्षकों के रचे झूठे प्रोपगैंडा की शिकार नहीं बनने देती। ऐसी औरतें ही धार्मिक कट्टरवाद के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाती हैं क्योंकि इस कट्टरवाद के नस-नस में भरी है सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक सोच। जब धर्म के ठेकेदार महिलाओं को काबू में नहीं रख पाते, तब उनकी खोखली मर्दानगी को गंभीर चोट पहुंचती है। तब शुरू होता है ट्विटर पर ‘बॉयकॉट’ वाले हैशटैग ट्रेंड करना, धमकियां देना, तोड़फोड़ और अराजकता मचाना, और छिछली भाषा में महिलाओं पर टिप्पणी करना। विषैली मर्दानगी का सबसे घिनौना चेहरा तब देखने को मिलता है जब धर्म ‘संकट में’ आता है।
ऐसी कट्टरवादी सोच रखनेवाले कई लोग यह कह रहे हैं कि फ़िल्मों और विज्ञापनों में सिर्फ़ मुस्लिम मर्दों के साथ हिंदू औरतें क्यों नज़र आती हैं? कभी किसी हिंदू मर्द के साथ कोई मुस्लिम औरत क्यों नहीं दिखती? इसके पीछे भी वही पुरुषवादी सोच काम करती है जो महिलाओं को संपत्ति और संसाधन से ज़्यादा कुछ नहीं समझती। अपने घर की औरत दूसरे समुदाय के मर्द के साथ चली जाए तो इसे अपमान से कम नहीं माना जाता, और इसका हिसाब बराबर उस समुदाय की किसी महिला से संबंध बनाने की इच्छा आए दिन सोशल मीडिया पर प्रकट की जाती है। वैसे तो यह बात सच है कि हर समुदाय के लोगों को सामाजिक नियमों की परवाह किए बिना एक दूसरे से रिश्ते बनाने का अधिकार होना चाहिए, पर जब इसे मर्दानगी साबित करने और अपने समुदाय में वृद्धि लाने की प्रतियोगिता बना दिया जाता है, समस्या तब होती है।
इस पूरे विवाद से जो एक अच्छी चीज़ निकली है वह यह है कि अंतरधार्मिक विवाहित दंपतियों ने इस विज्ञापन के लिए समर्थन जताते हुए सोशल मीडिया पर अपने प्रेम और विवाह की कहानियां साझा की हैं। उन सबका यही कहना रहा है कि प्रेम धर्म और जाति की सीमाओं से परे है और विपरीत संस्कृतियों और समुदायों के लोग एक-साथ मिल-जुलकर रह सकते हैं अगर उनमें प्यार और दोस्ती का भाव बना रहे। और इसका विरोध सिर्फ़ वही लोग करेंगे जो हमारे देश की एकता और अखंडता को तोड़ना चाहते हों।
‘लव जिहाद’ के नामपर डर वही लोग फैला रहे हैं जो हिंसा और द्वेष का माहौल बनाकर अपने राजनैतिक मकसद सिद्ध करना चाहते हों। इस पीढ़ी को, खासकर औरतों को ऐसे प्रोपगैंडा से बचकर रहना चाहिए और अपने प्रेम जीवन में धर्म या जाति को बाधा नहीं बनने देना चाहिए। उम्मीद है हम सिर्फ़ विज्ञापनों में ही नहीं बल्कि असल ज़िंदगी में भी ऐसे संबंध देखें जहां धर्म या जाति कोई मायने नहीं रखते।
(यह लेख पहले फेमिनिज्मइनइंडियाडॉटकॉम पर प्रकाशित हुआ है।)
- Shweta Chauhan
नोबेल प्राइज विजेताओं में साहित्य की दुनिया में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वालों में इस साल एक महिला शामिल है जिनका नाम है लुईस ग्लिक। इनके बारे में नोबेल सम्मान देने वाली स्वीडिश अकादमी ने कहा “ग्लिक की कविताएं ऐसी हैं जिनमें कोई ग़लती हो ही नहीं सकती और उनकी कविताओं की सादगी भरी सुंदरता उनके व्यक्तिगत अस्तित्व को भी सार्वभौमिक बनाती है।” बता दें कि लुइस ग्लिक कविता के लिए नोबेल पाने वाली पहली अमेरिकी महिला भी हैं। एक बेमिसाल कवियित्री लुइस ग्लिक जिन्हें दुख और अकेलेपन के भावों को बड़ी ही सरलता से कविता के रूप में पेश करने की महारत हासिल है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो उनके जीवन के अनुभव ही कुछ ऐसे रहें है जिसके कारण वे साल दर साल परिपक्वता की सीढ़ी चढ़ती चली गई और यह मुकाम हासिल किया।
नोबेल पुरस्कार से पहले भी ग्लिक को कई पुरस्कारों से नवाजा गया है जिनमें साल 1993 में पुलित्जर पुरस्कार उनकी रचना ‘द वाइल्ड आइरिश’ के लिए नेशनल ह्यूमैनिटीज मेडल और अन्य पुरस्कारों में नेशनल बुक अवार्ड, नेशनल बुक क्रिटिक्स सर्कल अवार्ड और बोलिंगेन अवार्ड शामिल है। इतना ही नहीं वे साल 2003 से साल 2004 के बीच वह अमेरिका की ‘पोएट लारिएट’ भी रहीं हैं।
दुनियाभर में अपनी सादगी भरी कविताओं के लिए जानी जाने वाली ग्लिक का जन्म 22 अप्रैल 1943 को न्यूयॉर्क में हुआ था। वे डेनियल ग्लिक और वीटराइस ग्लिक की तीन बेटियों में सबसे बड़ी बेटी हैं। उनकी मां रूसी यहूदी हैं, जबकि उनके पिता का संबंधघ हंगरी से था। ग्लिक के पिता एक लेखक बनना चाहते थे, लेकिन किसी कारणवश उन्हें खुद का काम शुरू करना पड़ा। उनकी मां वेलस्ली कॉलेज से ग्रेजुएट थी। लुइस ग्लिक ने अपने माता-पिता से यूनानी पौराणिक कहानियां सुनकर अपना बचपन गुज़ारा। ग्लिक ने बहुत छोटी सी उम्र में कविताएं लिखनी शुरू कर दी थी। समय के साथ उनकी लेखनी में निखार आता गया फिर यही निखार उनकी तरक्की का कारण बना।
लुइस ने अपने बचपन और किशोरावस्था के बाद भी कई तरह के बड़े संकटों का उन्होंने सामना किया जिसने उन्हें भीतर से झकझोर कर रख दिया। बड़ी बहन की मौत, पिता की मौत और फिर पति से तलाक जैसी घटनाओं ने उनकी कलम में दुख और अकेलेपन की स्याही भरी फिर यही स्याही उन्हें बुलंदियों पर ले गई।
किशोरावस्था में लुइस ग्लिक को ‘एनोरेक्सिया नर्वोसा’ नामक एक बीमारी ने घेर लिया जो कई सालों तक उनके जीवन में एक बाधा बनी रही इस बीमारी ने उनकी पढ़ाई और सामान्य व्यवहार में कई अड़चनें पैदा की। उन्होंने एक मौके पर अपने हालत को कुछ इस तरह बयां किया, ‘उस वक़्त मैं समझ रही थी कि किसी मोड़ पर मैं मरने वाली हूं, मैं बहुत अच्छे से यह जानती थी कि मैं मरना नहीं चाहती हूं।’ जीने की इसी चाह ने ग्लिक को आगे बढ़ने का एक हौसला दिया शायद यही वजह रही कि उनकी कवितायेँ दुःख और अकेलेपन को बखूबी बयां करती हैं जिसमें लोग कहीं न कहीं अपने जीवन की परेशानियों को जोड़कर उसे पढ़ना पसंद करते है। बrमारी से लड़ते हुए जब किसी भी तरह उनकी पढ़ाई संभव न हो पाई तो उन्होंने सारा लॉरेंस कॉलेज में काव्य लेखन की क्लास लेना शुरू कर दिया। इसी समय ग्लिक की मुलाक़ात लिओनी एडम्स और स्टेनली कुनित्ज से हुई। इस बारे में वह कहती हैं कि उन्हें एक कवियित्री के रूप में आकार लेने में इन दोनों ने काफी मदद की।
लुइस ने अपने बचपन और किशोरावस्था के बाद भी कई तरह के बड़े संकटों का उन्होंने सामना किया जिसने उन्हें भीतर से झकझोर कर रख दिया। बड़ी बहन की मौत, पिता की मौत और फिर पति से तलाक जैसी घटनाओं ने उनकी कलम में दुख और अकेलेपन की स्याही भरी फिर यही स्याही उन्हें बुलंदियों पर ले गई। लुईस की कविताएं अधिकतर बाल्यावस्था, पारिवारिक जीवन, माता-पिता और भाई-बहनों के साथ गहरे संबंधों पर आधारित रहीं हैं। उन्हें एक आत्मकथात्मक कवयित्री के रूप में जाना जाता है। अवसाद, भावनाओं और प्रकृति के विभिन्न पहलुओं से जुड़ी लुईस की वो कल्पनाएं जीवन की सच्चाई पर केंद्रित रहती है जो पढ़ने वाले को दुख और अकेलेपन के सफर पर ले जाती हैं जिस सफर में रिश्तों के कई पड़ाव भी हैं और जिंदगी से जुड़े उतार-चढ़ाव भी।
नोबेल साहित्य समिति के अध्यक्ष एंडर्स ओल्सन ने इस मौके पर कहा कि ग्लिक के 12 कविता संग्रहों में शब्दों का चयन और स्पष्टता सभी को अपनी ओर खींचती हैं। नोबेल एकेडमी ने कहा कि न्यूयॉर्क में जन्मी ग्लिक ने 1968 में अपनी पहली रचना ‘फर्स्टबॉर्न’ लिखी और वह जल्द ही अमेरिकी समकालीन साहित्य के प्रसिद्ध कवियों में गिनी जाने लगी। इसके बाद उनकी लिखी रचनाओं ‘डिसेंडिंग फिगर’ और ‘द ट्राइंफ ऑफ एकिलेस’ , ‘द हाउस आफ मार्शलैंड’ और ‘एवर्नो’ को भी काफी लोकप्रियता मिली। पिता की मृत्यु के बाद उनके संग्रह ‘अरारात’ को अमेरिका की सबसे दुखभरी रचनाओं में से एक माना जाता है। फिलहाल 77 वर्षीय ग्लिक येल यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।
(यह लेख पहले फेमिनिज्मइनइंडियाडॉटकॉम पर प्रकाशित हुआ है।)
डॉयचे वैले पर राहुल मिश्र का लेख
पूर्वी एशिया के साथ भारत के संबंधों में म्यांमार की भूमिका पुल की है। इलाके में चीन के इरादों को देखते हुए भारत के लिए म्यांमार जैसे पड़ोसियों के साथ रिश्तों को मजबूत करना जरूरी है।
म्यांमार न सिर्फ भारत का एक महत्वपूर्ण पड़ोसी देश है बल्कि सुरक्षा और कूटनीति की दृष्टि से भी यह भारतीय विदेश नीति में महत्वपूर्ण स्थान रखता रहा है। भारत को, खास तौर से इसके पूर्वोत्तर के प्रदेशों को, म्यांमार दक्षिणपूर्व एशिया से जोड़ता है और इस लिहाज से आर्थिक और जनसंपर्क के दृष्टिकोण से भी यह बहुत महत्वपूर्ण है।
इस बात की पुष्टि एक बार फिर तब हुई जब इसी हफ्ते भारतीय विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला और थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवने एक साथ म्यांमार के दौरे पर पहुंचे। भारतीय विदेशनीति और राजनय में ऐसा अवसर भूले भटके ही आता है जब सेना और विदेश सेवा के शीर्ष अधिकारी साथ साथ दिखे हों।
हाल के वर्षों में अमेरिका और जापान सहित कई प्रमुख देशों के साथ 2+2 सचिव और मंत्रिस्तरीय संवाद शुरू होने की वजह से ऐसे अवसर आए हैं लेकिन ऐसा कुछ खास देशों के साथ ही और पूर्व-सहमति के आधार पर संस्थागत तरीके से हुआ है।
यह भारत के इतिहास में पहली बार हुआ है कि देश के विदेश मंत्रालय और थलसेना के शीर्षाधिकारी एक साथ विदेश यात्रा पर गए हैं। इसलिए यह तो साफ है कि इन दोनों अधिकारियों का कोरोना महामारी के बीच हुआ म्यांमार दौरा यूं ही नहीं हुआ है, और यह भी कि म्यांमार का भारत के सामरिक और कूटनीतिक विचार-व्यवहार में बड़ा स्थान है, खास तौर पर जब भारत की एक्ट ईस्ट और नेबरहुड फस्र्ट नीतियों की बात हो।
भरोसेमंद और मदद के लिए तत्पर म्यांमार
यहां यह समझना भी जरूरी है कि कोरोना महामारी के दौर में, इस यात्रा से पहले विदेश सचिव श्रृंगला सिर्फ बांग्लादेश की यात्रा पर गए थे और उस वक्त भी यात्रा के पीछे खास कूटनीतिक मकसद थे। दो दिन की अपनी म्यांमार यात्रा के दौरान श्रृंगला-नरवने आंग सान सू ची, सीनियर जनरल मिन आंग-लाइ और कई मंत्रियों और अधिकारियों से मिले। भारत म्यांमार के बीच सैन्य और सामरिक सहयोग संभावनाओं से भरा है। उम्मीद की जाती है कि नरवने की यात्रा ने इनमें से कुछ पर प्रकाश डाला होगा।
सुरक्षा, आतंकवाद और अलगाववाद से लडऩे में भारत के लिए म्यांमार बहुत महत्वपूर्ण है। भारत की सीमा से सटे इलाकों में 2015 की ‘हाट पर्सूट’ की कार्यवाही हो या अलगाववादियों का प्रत्यर्पण, म्यांमार ने एक भरोसेमंद और मदद के लिए तत्पर पड़ोसी की भूमिका अदा की है। इसकी एक और झलक मई 2020 में तब देखने को मिली जब म्यांमार के अधिकारियों ने 22 उत्तरपूर्वी अलगाववादियों को भारत को प्रत्यर्पित कर दिया। पूर्वोत्तर के कुछ अलगाववादी गुटों के चीन से संबंधों और भारत-चीन सीमा विवाद के बीच भी नरवने का जाना महत्वपूर्ण हो जाता है।
अरबों डॉलर की पेट्रोलियम रिफायनरी
एनएससीएन के साथ शांति समझौते में हो रही देरी, अन्य नागा अलगाववादी धड़ों और उल्फा की गतिविधियों के मद्देनजर भी यह यात्रा महत्वपूर्ण है। हाल ही में एनएससीएन ने भारत सरकार से कहा है कि बातचीत की जगह थाईलैंड के अलावा किसी और तीसरे देश में हो।
चीन के म्यांमार में बढ़ते निवेश को लेकर भी भारत की चिंताएं बढ़ी हैं। खास तौर पर ऊर्जा के क्षेत्र में चीन ने काफी निवेश किया है। भारत भी ऊर्जा क्षेत्र में म्यांमार के साथ सहयोग का फायदा उठाना चाहता है और शायद यही वजह है कि कभी म्यांमार की राजधानी और अभी भी व्यापार और वाणिज्य का केंद्र माने जाने वाले यांगून के नजदीक भारत 6 अरब डॉलर की एक पेट्रोलियम रिफायनरी प्रोजेक्ट लगाना चाहता है। इस संदर्भ में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने अपनी मंशा म्यांमार सरकार के समक्ष रखी है।
यदि इस प्रस्ताव पर सहमति बनती है तो इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन भारत की तरफ से इसमें हिस्सेदार होगा। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के अलावा जीएआईएल और ओएनजीसी भी म्यांमार के ऊर्जा सेक्टर में सक्रिय हैं।
मिजोरम पर भी बढ़ा ध्यान
भारत और म्यांमार में अभी भी अधिसंख्य जनसंख्या कृषि पर निर्भर और गरीब तबके से है। लिहाजा कृषि सहयोग दोनों देशों के बीच अहम स्थान रखता है। इस सहयोग में चाहे वह म्यांमार से डेढ़ लाख टन बीन्स और दलहन आयात करने की सहमति हो या मिजोरम और चिन प्रांत (म्यांमार) की सीमा के पास बयान्यू/सरसीचौक में बॉर्डर हाट बनाने के लिए 20 लाख डॉलर का अनुदान, भारत ने पारस्परिक सहयोग को बढ़ावा देने की कोशिश की है। म्यांमार भारत को सबसे ज्यादा बीन्स और दलहन निर्यात करने वाले देशों में है।
म्यांमार के साथ कनेक्टिविटी बढ़ाने में मणिपुर को हमेशा से खास दर्जा मिला है। मोदी की एक्ट ईस्ट नीति में मिजोरम पर भी ध्यान बढ़ा है। मणिपुर के मोरेह की तरह मिजोरम में जोखावथार लैंड कस्टम स्टेशन की स्थापना और अब बॉर्डर हाट इसी का परिचायक है। बरसों के इंतजार के बाद सितवे पोर्ट के मार्च 2021 तक तैयार हो जाने की संभावना है। अगर ऐसा होता है तो यह एक बड़ा कदम होगा। सितवे पोर्ट भारत के म्यांमार और दक्षिण पूर्व एशिया के अन्य देशों से भारत के आर्थिक व्यापारिक सहयोग को बढ़ाने में मददगार होगा। हालांकि सितवे रखाइन प्रदेश में है जहां रोहिंग्या अल्पसंख्यकों की काफी संख्या है।
म्यांमार में नवंबर में चुनाव
इसके अलावा भारत ने म्यांमार को रेमडेसिविर के 3000 वाइल भी उपलब्ध कराने का वादा किया है। कोविड महामारी की शुरुआत में म्यांमार में बहुत कम संक्रमित लोग पाए गए और लगा कि शायद म्यांमार इस महामारी की चपेट में पूरी तरह नहीं आएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और हाल के दिनों में म्यांमार में भी संक्रमण के मामले तेजी से बढ़े हैं। म्यांमार में 8 नवंबर को चुनाव भी होने हैं। वैसे तो औपचारिक स्तर पर कोई विशेष बात नहीं हुई लेकिन भारत में इस बात की दिलचस्पी कम नहीं है कि चुनावों के परिणाम क्या होंगे।
म्यांमार भारत की नेबरहुड फस्र्ट और एक्ट ईस्ट दोनों ही का हिस्सा है। यह दुर्भाग्य ही है कि इन तमाम बातों और आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक समानताओं के बावजूद म्यांमार अभी भी भारत के लिए उतना महत्वपूर्ण स्थान नहीं रखता जितना उसे रखना चाहिए। म्यांमार और उसके जैसे पड़ोसी देशों पर ध्यान देना और उनसे पारस्परिक सहयोग के रास्ते निकालना भारत की मजबूरी नहीं, जिम्मेदारी है। जब तक देश के नीति निर्धारक इस बात पर ध्यान नहीं देंगे भारत अपने पड़ोसियों का विश्वासपात्र सहयोगी नहीं बन पाएगा। (dw.com)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कश्मीर की छह प्रमुख पार्टियों ने कल यह तय किया कि जम्मू कश्मीर और लद्दाख की जो हैसियत 5 अगस्त 2019 के पहले थी, उसकी वापसी के लिए वे मिलकर संघर्ष करेंगे। इस संघर्ष का निर्णय 4 अगस्त 2020 को हुआ था, जिसे गुपकार घोषणा कहा जाता है। इस संघर्ष के लिए उन्होंने नया गठबंधन बनाया है, जिसे ‘पीपल्स एलायंस’ या जनमोर्चा नाम दिया गया है। जम्मू-कश्मीर की कांग्रेस पार्टी के नेता किसी निजी कारण से इस जनमोर्चा की बैठक में हाजिर नहीं हो सके। वैसे कांग्रेस ने भी गुपकार-घोषणा का समर्थन किया था।
यहां मुख्य प्रश्न यही है कि अब कश्मीर में क्या होगा? क्या वहां कोई बड़ा जन-आंदोलन खड़ा हो जाएगा या हिंसा की आग भडक़ उठेगी? हिंसा पर तो हमारी फौज काबू कर लेगी। तो क्या भारत सरकार धारा 370 और 35 को वापिस ले आएगी? मुझे लगता है कि यदि मोदी सरकार ऐसा करेगी तो उसका जनाधार खिसक जाएगा। वह खोखली हो जाएगी। हां, वह यह तो कर सकती है कि आंदोलनकारी नेताओं की साख बनाए रखने के लिए जम्मू-कश्मीर को फिर से राज्य का दर्जा दे दे, जैसा कि गृहमंत्री अमित शाह ने भी संसद में संकेत दिया था। नेताओं को क्या चाहिए ? सत्ता और सिर्फ सत्ता ! उसके लिए वे कुछ भी कर सकते हैं। फारुक अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस और महबूबा मुफ्ती की पीडीपी ने किस-किस से हाथ नहीं मिलाया ? कांग्रेस से और भाजपा से भी। उन्होंने एक-दूसरे के विरुद्ध आग उगलने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। अब दोनों की गल-मिलव्वल पर क्या कश्मीरी लोग हंसेगे नहीं ? यदि राज्य का दर्जा फिर से घोषित हो गया तो इन नेताओं की सारी हवा निकल जाएगी। यों भी धारा 370 के प्रावधानों में पिछली कांग्रेसी सरकारों ने इतने अधिक व्यावहारिक संशोधन कर दिए थे कि कश्मीर की स्वायत्ता सिर्फ नाम की रह गई थी।
इन नेताओं को सत्ता का और खुली लूट-पाट का मौका क्या मिलेगा, ये कश्मीर की मूल समस्या को दरी के नीचे सरका देंगे। 73 साल से चला आ रहा तनाव बना रहेगा और कश्मीर समस्या के दम पर पाकिस्तान की फौज असहाय पाकिस्तानियों की छाती पर सवारी करती रहेगी। इस समय जरुरी है कि मोदी और इमरान मिलकर कश्मीर पर बात करें और इस बात में हमारे और पाकिस्तानी कश्मीरियों को भी शामिल करें। अटलजी और डॉ. मनमोहनसिंह ने जनरल मुशर्रफ के साथ जो प्रक्रिया शुरु की थी, उसे आगे बढ़ाया जाए। डर यही है कि हमारी सरकार के पास दूरदृष्टिपूर्ण नेता नहीं हैं। वह नौकरशाहों पर उसी तरह निर्भर है, जैसे पाकिस्तानी नेता उनके फौजी जनरलों पर निर्भर हैं। (नया इंडिया की अनुमति से)
आज भारत की संसद में हंगामा है. देश को चलाने वाले नेता एक दूसरे पर लांछन लगा रहे हैं. वे भूल रहे हैं कि लोकतंत्र को चलाना उनका दायित्व है. पहले संसद का, फिर लोकतंत्र का मखौल उड़ाकर, प्रतिष्ठा गिराकर उनका भी लाभ नहीं होगा.
लोकतंत्र में जनता सार्वभौम है और नेता जनता के प्रतिनिधि हैं, जिन्हें मतदाता एक खास अवधि के लिए चुनता है और अपना सार्वभौम अधिकार सौंप देता है. इन नेताओं पर ही लोकतंत्र को चलाने की जिम्मेदारी होती है. अगर ये नेता लोकतंत्र की रक्षा न कर सकें तो उन्हें सार्वभौम अधिकार लेने का कोई हक नहीं. लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाना उनका मकसद नहीं होना चाहिए. संसद में जाने वाली देश की प्रमुख पार्टियां हैं, जो बदल बदल कर सरकार चलाती हैं. उन्हें संसद में और संसद के बाहर अपने आचरण पर विचार करना चाहिए. देश में ही नहीं विदेशों में भी उनकी प्रतिष्ठा दांव पर लगी है.
कृषि बिल पर राज्यसभा में जो कुछ हुआ वह किसी सच्चे लोकतंत्र को शोभा नहीं देता. संसद बहस के लिए है, नए कानूनों पर देश के विभिन्न हिस्सों के प्रतिनिधियों के तौर पर अपने मतदाताओं की आवाज पहुंचाने के लिए ताकि नया कानून पुख्ता हो और सबके हित में हो. भारत का चुनाव कानून यूं भी बहुमत मतदाताओं को नजरअंदाज करता है. निर्वाचन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा वोट पाने वाले की जीत का मतलब अक्सर ये होता है कि न जीतने वाले उम्मीदवारों को पड़े वोट बेकार हो जाते हैं. सरकार बनाने का जिम्मा संसद या विधानसभा में बहुमत पाने वाली पार्टी का होता है. यहां भी चलती सिर्फ सरकारी पार्टी की है. संसद या विधानसभाओं में भी अगर विपक्ष की सुनी नहीं गई तो देश के ज्यादातर कानून लोगों के लाभ के लिए नहीं होंगे.

धरने पर बैठे निलंबित सांसद
आजादी के बाद के दशकों के कानूनों या सरकारी फैसलों को लें तो जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी की सरकार उनमें से ज्यादातर को बदल रही है, वह इस बात का सबूत है कि देश का नया बहुमत उन कानूनों के साथ जुड़ाव महसूस नहीं करता. इसलिए लोकतंत्र में विपक्ष को साथ लेना जरूरी है. नागरिक और पेशेवर संगठनों के माध्यम से चुनाव में हारे उम्मीदवारों के समर्थकों को साथ लेना जरूरी है. यह काम एक दूसरे को दुश्मन समझ कर नहीं हो सकता.
राज्यसभा में बैठे नेता एक दूसरे को जानते हैं, एक दूसरे के दोस्त हैं. पार्टी बदलकर इधर अधर आते जाते रहते हैं. किसी न किसी राज्य में उनकी पार्टियां सरकार में हैं या थीं. उन्हें संसद का इस्तेमाल अखाड़े के तौर पर नहीं करना चाहिए बल्कि सार्वभौमिक सत्ता के केंद्र के तौर पर. उप सभापति के साथ जो बर्ताव हुआ अच्छा नहीं हुआ. लेकिन विपक्ष के आठ सांसदों को जिस तरह निलंबित कर दिया गया है वह भी ठीक नहीं है. एक लोकतांत्रिक व्यवहार एक दूसरे को सजा देने में नहीं हो सकता. लोकतंत्र के रक्षकों को व्यवहार में भी लोकतांत्रिक मिजाज दिखाना चाहिए.
क्या एक परिपक्व परिवार में पिता हमेशा बेटे-बेटियों की पिटाई करता रहेगा, क्योंकि वे छोटे है. या फिर क्या ताकतवर हमेशा कमजोर को दबाता रहेगा. इन्हीं कमियों से निबटने के लिए लोकतंत्र की स्थापना हुई थी. और भारत में तो बिहार के वैशाली में लोकतंत्र की लंबी परंपरा रही है. सरकार भी देश की रक्षा के लिए बनी संस्थाओं से ताकत लेती है. उसे इस ताकत का इस्तेमाल विपक्ष या विरोधी आवाजों को दबाने के लिए नहीं बल्कि उनकी आवाज को शामिल करने के लिए करना चाहिए. लोकतंत्र की यही पहचान है. अगर संसदों के पास अपने सदस्यों को सजा देने के अधिकार है तो वे आज के जमाने से मेल नहीं खाते. संसद में विरोध करने वाले सदस्य अपराधी नहीं, उन्हें सजा देकर उन्हें अपराधी का दर्जा भी नहीं दिया जाना चाहिए.
आज की संसद किसी अंग्रेजी सरकार की संसद नहीं वह सार्वभौम भारत के नागरिकों द्वारा चुनी और सरकार बनाने और उस पर कंट्रोल करने वाली संसद है. उसे नई परंपराएं गढ़ने का हक है. जन प्रतिनिधि सभाओं के सदस्यों को भी मर्यादा को समझना होगा या साथ मिल बैठकर नई मर्यादाएं तय करनी चाहिए. हरिवंश एक प्रतिष्ठित पत्रकार रहे हैं, वे अगर ब्रिटिश परंपराओं को तोड़ पाते हैं, या तोड़ने में मदद दे पाते हैं, तो राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की तरह उन्हें भी लंबे समय तक याद किया जाएगा. (dw.com)
कश्मीर में जिसे नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) और पीडीपी का अभूतपूर्व गठबंधन बताया जा रहा है वो असल में यहां की छह मुख्य पार्टियों की ओर से अगस्त 2019 में शुरू की गई साझा मुहिम है का ही विस्तार है.
फर्क यह आया है कि 2019 में जब इस अभियान की घोषणा हुई थी तब इसका लक्ष्य पूर्ववर्ती जम्मू और कश्मीर राज्य के विशेष दर्जे और अनुच्छेद 35 ए और अनुच्छेद 370 को बचाना और राज्य के विभाजन को रोकना था, जो कि अब हो चुका है. गुपकार घोषणा के अगले दिन ही केंद्र सरकार ने जम्मू और कश्मीर का राज्य का दर्जा ही खत्म कर इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया. इन पार्टियों ने 2019 की गुपकार घोषणा को बरकरार रखा है और इस गठबंधन को नाम दिया है "पीपल्स अलायंस फॉर गुपकार डेक्लेरेशन." एनसी और पीडीपी के अलावा इसमें सीपीआई(एम), पीपल्स कांफ्रेंस (पीसी), जेकेपीएम और एएनसी शामिल हैं.
अभियान की घोषणा करते हुए जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने कहा, "हमारी लड़ाई एक संवैधानिक लड़ाई है. हम चाहते हैं कि भारत सरकार जम्मू और कश्मीर के लोगों को उनके वो अधिकार वापस लौटा दे जो उनके पास पांच अगस्त 2019 से पहले थे." अब्दुल्ला ने यह भी कहा, "जम्मू, कश्मीर और लद्दाख से जो छीन लिया गया था हम उसे फिर से लौटाए जाने के लिए संघर्ष करेंगे." 2019 की 'गुपकार घोषणा' वाली बैठक की तरह यह बैठक भी अब्दुल्ला के श्रीनगर के गुपकार इलाके में उनके घर पर हुई.
इस एक साल में जम्मू और कश्मीर में जो बदलाव आए हैं वो प्रशासनिक तौर पर पूरी तरह से लागू हो चुके हैं. ऐसे में यह स्पष्ट नजर नहीं आता कि ये पार्टियां पुरानी व्यवस्था की बहाली का लक्ष्य कैसे हासिल करने की उम्मीद रखती हैं. इनके अभियान में भी किसी काम की योजना के बारे में नहीं बताया गया है. कश्मीर मामलों के जानकार बताते हैं कि अभी तो इन पार्टियों का लक्ष्य है जम्मू, कश्मीर और लद्दाख इलाकों में जनता के बीच जाना, उनसे संवाद स्थापित करना और फिर उनके समर्थन से आगे की योजना बनाना.

क्या उम्मीद है इस अभियान से?
श्रीनगर में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार जफर इकबाल ने डीडब्ल्यू से कहा कि इस अभियान के तहत एक दूसरे की विरोधी रही इन पार्टियों का "साथ आना और एक साझा लक्ष्य के लिए अपने मतभेदों को एक ओर रख देना एक अच्छा कदम है." उन्होंने यह भी कहा कि"यह अभियान टिकेगा और कम से कम कुछ समय तक तो चलेगा ही."
वरिष्ठ पत्रकार और कश्मीर मामलों के जानकार उर्मिलेश का मानना है कि इस अभियान की अगुआई जो पार्टियां कर रही हैं (एनसी और पीडीपी) "एक दौर में जम्मू और कश्मीर की आवाम की निगाहों में उनकी साख गिर गई थी क्योंकि उन दोनों ने लोगों को एक तरह से निराश किया है." हालांकि वो यह भी कहते हैं कि अब जब कश्मीर को भारत का हिस्सा मानने वाले सारी कश्मीरी पार्टियां इन दोनों पार्टियों के साथ आ गई हैं तो हो सकता है कि जनता में इनकी प्रति विश्वास एक बार फिर बनना शुरू हो. वो मानते हैं कि संभव है कि जनता इस गठबंधन को एक मौका देने के बारे में सोंचे.
कुछ जानकार यह भी मानते हैं कि एक साल से भी ज्यादा से सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक हर तरह के लॉकडाउन में पड़े जम्मू और कश्मीर में इस गठबंधन के बनने की वजह से राजनीतिक गतिविधि की वापसी हुई है. वरिष्ठ पत्रकार संजय कपूर कहते हैं कि यह उम्मीद की जा सकती है कि अब कश्मीर मुद्दे पर "केंद्र का विरोध और बढ़ेगा" और "मुद्दे के अंतरराष्ट्रीयकरण की संभावना भी बढ़ेगी." उनका यह भी मानना है कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अमेरिका में आने वाले चुनावों में हार जाते हैं तो डेमोक्रैटिक पार्टी भी इस अभियान को समर्थन दे सकती है.

कांग्रेस की अनुपस्थिति
गुपकार घोषणा और गुपकार घोषणा 2.0 में एक फर्क यह भी है कि इस बार कांग्रेस इस गठबंधन में शामिल नहीं हुई है. 2019 में अब्दुल्ला के निवास पर हुई बैठक में प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष ताज मोहिउद्दीन शामिल हुए थे. इस बार ना मोहिउद्दीन ने बैठक में हिस्सा लिया ना प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गुलाम अहमद मीर ने. बैठक के बाद की घोषणाओं में भी सिर्फ बाकी छह पार्टियों का जिक्र है, और कांग्रेस का नहीं है. मीर ने कहा कि उन्हें बैठक में शामिल होने का निमंत्रण मिला था लेकिन वो स्वास्थ्य कारणों से शामिल नहीं हो सके.
कश्मीर में स्थानीय कांग्रेस नेताओं के लिए शायद यह एक असमंजस की स्थिती है. कश्मीरी कांग्रेस नेता सलमान सोज ने एक ट्वीट में कहा कि भले ही कांग्रेस इस गठबंधन का हिस्सा ना हो, लेकिन व्यक्तिगत रूप से इस पहल का समर्थन करते हैं.
उर्मिलेश कहते हैं कि यह कश्मीर को लेकर कांग्रेस की पुरानी झिझक का नतीजा है. वो कहते हैं कि कांग्रेस को हमेशा से यह लगता रहा है कि इस तरह के मुद्दों पर अगर वो कश्मीरी पार्टियों के साथ जाएगी तो देश के बाकी इलाकों में उसकी परेशानी बढ़ जाएगी, क्योंकि कश्मीर को लेकर शेष भारत में जो राय है वो भारत के सत्ता के ढांचे से प्रेरित रहा है. वो यह भी कहते हैं कि अनुच्छेद 370 को कमजोर करने का काम कांग्रेस ने ही किया था और अब तो बस उसका कंकाल बचा था जिसे बीजेपी ने बस जमीन के नीचे दफन करने का काम किया है.
उत्तर प्रदेश में 1500, हरियाणा में 1700 और पंजाब में 1800 रुपए प्रति क्विंटल हुआ बासमती का भाव
- Bhagirath Srivas
पानीपत जिले के हल्दाना गांव में रहने वाले नवाब सिंह अगले साल से बासमती नहीं उगाने का मन बना चुके हैं। बासमती की खेती में हर साल हो रहे घाटे को देखते हुए उन्होंने फैसला किया है कि आगे से वह मोटा चावल (साधारण चावल) उगाएंगे। नवाब सिंह ने इस साल 11 एकड़ में बासमती उगाया है। इसमें से 4 एकड़ खेत उनका खुद का है और शेष उन्होंने 41 हजार रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से पट्टे पर लिया है। उन्होंने 7 एकड़ के खेत में बासमती-1718 और साढ़े चार एकड़ में बासमती-1121 वैरायटी उगाई है। बासमती से मोहभंग होने की वजह बताते हुए वह कहते हैं, “मैं समालखा मंडी में जब बासमती-1718 लेकर पहुंचा तो 2,151 रुपए प्रति क्विंटल का भाव मिला। मंडी में बासमती-1121 का भाव भी 2,300-2,400 रुपए प्रति क्विंटल के बीच है। इस भाव पर लागत भी नहीं निकल पा रही है।” वह बताते हैं कि 2015 से बासमती के भाव लगातार गिर रहे हैं। इस साल भाव अब तक के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गए हैं। ऐसी स्थिति में बासमती की खेती करने का कोई मतलब नहीं रह गया है।
पानीपत जिले के डिंडवाड़ी गांव के रहने वाले शमशेर सिंह भी बासमती के गिरते भाव से इस कदर निराश हो चुके हैं कि बासमती की खेती से तौबा कर सकते हैं। पानीपत अनाज मंडी में तीन दिन से वह अपनी उपज बेचने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उन्हें अब तक कामयाबी नहीं मिली है। उन्होंने अपने तीन के एकड़ के खेत में बासमती धान की 1509 वैरायटी उगाई थी। वह बताते हैं कि बासमती-1509 का बाजार भाव 1,700 रुपए प्रति क्विंटल है। यह भाव एमएसपी पर बिकने वाले साधारण चावल से भी कम है। इतने कम भाव पर भी खरीद नहीं हो पा रही है। व्यापारी कभी नमी तो कभी खराब गुणवत्ता का बहाना बनाकर उपज खरीद से इनकार कर रहे हैं। वह बताते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में बासमती का इतना कम भाव नहीं देखा है।
हरियाणा की तरह ही पंजाब, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में भी बासमती का भाव औंधे मुंह गिर गया है। दिल्ली की नजफगढ़ मंडी में बासमती 2,300-2,400 रुपए, पंजाब में 1,800-2,000 और उत्तर प्रदेश में 1,500-1,600 रुपए के भाव पर बिक रहा है। दिल्ली के घुम्मनहेड़ा गांव के किसान दयानंद बताते हैं, “एक एकड़ में बासमती की खेती की लागत करीब 40 हजार रुपए बैठती है। यह लागत साल दर साल बढ़ रही है, जबकि भाव लगातार कम होता जा रहा है।” साल 2014 में बासमती का अधिकतम भाव 4,500 रुपए प्रति क्विंटल था। उसके बाद से भाव हर साल गिर रहा है। आशंका है कि जैसे-जैसे मंडी में बासमती की आवक बढ़ेगी, भाव और कम हो सकता है। दयानंद बासमती की खेती को घाटे का सौदा मानते हैं। वह बासमती केवल इसलिए उगाते हैं क्योंकि उनके खेत में कोई दूसरी फसल नहीं होती। उनके घर के खर्चे डेरी फार्मिंग से पूरे हो रहे हैं।
दिल्ली के ढांसा गांव के रहने वाले सुखवीर के लिए भी बासमती की खेती घाटे का सौदा साबित हो रही है। कम उपज, बढ़ती लागत और गिरते भाव को देखते हुए वह साधारण चावल की खेती करना चाहते हैं, लेकिन वह चाहकर भी ऐसा नहीं पा रहे हैं क्योंकि दिल्ली में एमएसपी पर खरीद 2014 के बाद से बंद है। खुले बाजार में साधारण चावल का भाव न मिलने के चलते वह मजबूरी में बासमती की खेती कर रहे हैं।
बासमती उगाने वाले इन राज्यों और किसानों का यह हाल तब है जब दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश समेत 7 राज्यों के बासमती को जीआई (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) टैग हासिल है। इस टैग केवल उन्हीं उत्पादों को हासिल होता है जो किसी विशेष क्षेत्र में विशेष खूबियों वाले होते हैं।(downtoearth)
-शिवप्रसाद जोशी
टाटा समूह का तनिष्क भले ही गहनों का स्वेदशी ब्रांड हो लेकिन हिंदुत्ववादियों की वक्र दृष्टि पड़ते ही उसे अंतरधार्मिक परिवार की रस्म दिखाता विज्ञापन हटाना पड़ा. उसकी मंशा क्या विवाद से लाभ उठाने की थी, ये सवाल भी उठे हैं.
भारत के अलावा अंतरराष्ट्रीय विज्ञापन संगठनों ने भी तनिष्क के विज्ञापन का समर्थन किया है. इंटरनेशनल एडवर्टाइजिंग एसोसिएशन (आईएए) की भारतीय शाखा ने कहा कि अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार को दबाने की कोशिश की कड़े शब्दों में भर्त्सना की जानी चाहिए. ईएए ने सरकार से कड़ी कार्रवाई की मांग भी की. अन्य दो विज्ञापन एजेंसियों- एडवर्टाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एएएआई) और द एडवर्टाइजिंग क्लब (टीएसी) ने भी इस बात पर चिंता जतायी कि तनिष्क और उसके कर्मचारियों को धमकियां मिलने के बाद विज्ञापन हटाना पड़ा. टीएसी के मुताबिक विज्ञापन ने आचार संहिता का पालन किया है, वो किसी व्यक्ति, संगठन या धर्म के खिलाफ अभद्र नहीं है और न ही उसने राष्ट्रीय भावना को चोट पहुंचायी है. विज्ञापन जगत की नियामक संस्था एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्स काउंसिल ऑफ इंडिया (एएससीआई) ने भी अपनी जांच में पाया कि विज्ञापन में कुछ भी अश्लील, अशोभनीय या घृणास्पद नहीं था.
क्या तनिष्क ने अपना विज्ञापन कंटेंट जानबूझ कर ऐसा चुना था, उसे तत्काल वापस लेकर क्या उसने सही किया, या इसके भी कुछ कारोबारी और राजनीतिक निहितार्थ थे, इस बारे में कयास लग रहे हैं. वैसे पिछले कुछ वर्षों के दौरान हिंदू-मुस्लिम मिलाप और घनिष्ठता का संदेश देने वाले विज्ञापन आते रहे हैं, खूब सराहे भी गए हैं लेकिन अधिकांश कट्टरपंथियों के क्रोध का निशाना भी बने हैं. यूनीलीवर कंपनी के डिटर्जेंट ब्रांड सर्फ एक्सेल का बच्चों की होली का विज्ञापन ‘रंग लाए संग' पिछले साल आया था और सोशल मीडिया पर खूब वायरल भी हुआ था. 2014 में कौन बनेगा करोड़पति के, पड़ोसी एकता और भाईचारा दिखाने वाले विज्ञापन ने भी ध्यान खींचा था. ब्रुक बॉन्ड रेड लेबल चाय के ‘स्वाद अपनेपन का' विज्ञापन में गणेश की मूर्तियां बनाने वाले मुस्लिम कलाकार और हिंदू ग्राहक के बीच मार्मिक संवाद है. 2014 का इसी ब्रांड का एक और विज्ञापन दो पड़ोसी परिवारों को धर्म और पहनावे से पहले चाय की महक से जोड़ने की कोशिश करता है. 2012 में आइडिया कंपनी का संवाद रहित आकर्षक विज्ञापन आया था जिसमें एक मुस्लिम युवा दिवाली पर अपनी महबूबा को एक गिफ्ट भेजना चाहता है. क्या इस तरह के विज्ञापन सिर्फ ग्राहकों का और आलोचकों का ध्यान खींचने के लिए बनाए जाते हैं या सामाजिक उद्देश्य भी निहित होता है, इस बारे में भी जानकारों की राय बंटी हुई है.
विज्ञापनों में इंसानों को जोड़ने वाला कंटेंट
बेस्टमीडियाइंफो वेबसाइट की एक रिपोर्ट में प्रकाशित कैन्को एडवर्टाइजिंग और एशियन फेडरेशन ऑफ एडवर्टाइजिंग एसोसिएशंस के सदस्य रमेश नारायण का कहना है, "ओगिल्वी के बनाये भारत पाकिस्तान भाईचारे और अपनी जड़ों की तलाश पर बने गूगल ऐड को चौतरफा सराहा गया था. तनिष्क को मिली ये प्रतिक्रिया हमारे समय का एक संकेत है और ट्विटर जैसे मंचों के बढ़ते प्रताप का भी.” इसी रिपोर्ट में मीडिया मॉन्क्स इंडिया के क्रिएटिव हेड करन अमीन कहते हैं कि "स्क्रिप्ट लिखने के लिए धर्म का इस्तेमाल लोगों को मौका दे रहा है इस बारे में बात करने के लिए, ये सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी, खासकर भारत जैसे देश में जहां धार्मिक विभाजन है.” उनके मुताबिक, "ब्रांड और एजेंसियों को धर्म से रहित कंटेट बनाना चाहिए.” ऐसा कंटेंट जो बगैर किसी धार्मिक पहचान के, किसी भी मनुष्य को प्रभावित करने वाला हो.
पिछले साल जुलाई में भोजन डिलीवर करने वाली ऑनलाइन कंपनी जोमाटो के एक ग्राहक ने ये कहते हुए अपना ऑर्डर कैंसल कर दिया था कि पैकेट डिलिवर करने वाला लड़का गैर-हिंदू था. जोमाटो का काबिलेगौर जवाब था कि खाने का कोई धर्म नहीं होता. कहा जा सकता है कि तनिष्क ने भी अपने कर्मचारियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कदम उठाया. लेकिन तनिष्क कोई साधारण ब्रांड नहीं है और टाटा समूह जैसा दिग्गज औद्योगिक घराना उसके पीछे है. और तमाम विज्ञापन एजेंसियों और संस्थाओं ने उसका खुलकर समर्थन भी किया है. सेलेब्रिटी वर्ग और जागरूक समाज भी पीछे नहीं रहा. जानकारों का मानना है कि जाने अनजाने तनिष्क के फैसले से अराजक तत्वों को और बल मिलता है. सिने जगत पर तो ट्रॉल्स पांव जमाकर बैठे ही हैं, सुशांत रिया मामले से पहले भी हाल के वर्षों में दुनिया इसे देखती आयी है.
नफरती एजेंडा के नाम पर विज्ञापन रोका
एक तरफ तनिष्क कथित रूप से एक साफसुथरे ऐड पर पीछे हट रहा था दूसरी तरफ बजाज ऑटो और पार्ले बिस्किट जैसे समूह नफरती एजेंडा चलाने वाले टीवी चैनलों को आइंदा विज्ञापन न देने का ऐलान कर रहे थे. हो सकता है आने वाले दिनों में कुछ और नाम इस बहिष्कार में शामिल हो जाएं. लेकिन इन घटनाओं के साथ साथ कुछ और तथ्य भी देखने चाहिए जो विज्ञापन, मानहानि, अभिव्यक्ति की आजादी और मीडिया राजनीति से जुड़े हैं. सुशांत मामले पर ‘हाइपर' कवरेज कर रहे एक टीवी समाचार चैनल पर एक ओर अभिनेता सलमान खान के बारे में गरजती टिप्पणियां की जा रही थीं, तो दूसरी ओर दर्शक हैरान थे कि उसी चैनल पर फिल्मी दुनिया के ‘भाई' अपने शो बिगबॉस के विज्ञापन में चिरपरिचित आवाज में लहरा रहे हैं.
न्यूजलॉन्ड्री वेबसाइट में विस्तारपूर्वक बताया गया कि किस तरह प्रमुख टीवी समाचार चैनल जब अपनी रिपोर्टों और स्टूडियो बहसों में चीन की क्लास ले रहे थे उसी दौरान उनकी स्क्रीनों के कोने पर चीनी उत्पादों या चीनी कंपनियों से भागीदारी वाले ब्रांडों के विज्ञापन धड़ल्ले से चल रहे थे. यहां तक कि टीवी चैनलों को विज्ञापनों से पाट देने वाले पतंजलि के बाबा रामदेव भी चीनी सामान के बहिष्कार के साथ अपने उत्पादों का प्रछन्न विज्ञापन करते देखे गए. स्टैटिस्टा वेबसाइट के एक आंकड़े के मुताबिक भारत में विज्ञापन राजस्व 878 अरब रुपये का है. 2022 तक एडवर्टाइजिंग से एक खरब रुपये का कुल राजस्व जमा हो जाने का भी अनुमान है. चीनी सामान के विज्ञापन न दिखें तो शायद कुछ अंतर पड़े. लेकिन सबसे ज्यादा राजस्व कमाने वाला माध्यम टीवी ही है.
विज्ञापन से जुड़ी आचार नीति के कुछ घोषित, अघोषित, बाध्यकारी और कुछ स्वैच्छिक बिंदु हैं. मिसाल के लिए फेयर ऐंड लवली फेसक्रीम को लंबे विवाद के बाद अपना नाम बदलना पड़ा लेकिन नया विज्ञापन भी कमोबेश दिखाता वही है जिसे लेकर इसकी आलोचना होती रही है. आचार नीति पर पूरी तरह से अमल की हिचकिचाहट और अभिव्यक्ति की आजादी पर तंग नजरिये के बीच नीति-नियमों का अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिए जिम्मेदार सरकारी, स्वयंसेवी संस्थाएं भी इस मामले में लाचार ही नजर आती हैं. ये तो हम जानते ही आए हैं कि विज्ञापन का सिर्फ उत्पाद या माध्यम से ही संबंध नहीं होता, ऑडियंस से भी होता है. लेकिन आज ऑडियंस सिर्फ विंडो शॉपर, खरीदार या उपभोक्ता नहीं, ऑडियंस उन समूहों की भी बन रही है जो खुद को समाज और नैतिकता का ठेकेदार कहते फिरते हैं. विज्ञापन की राजनीति, सफलता या नैतिकता के आकार पर उठते सवालों के बीच ये भी देखना होगा कि उस पर नजर रखने वाली स्वयंभू नैतिक पुलिस का आकार कैसे बढ़ रहा है!(DW)
भारत डोगरा
हाल ही में केन्द्रीय सरकार ने विदेशी देन नियंत्रण अधिनियम (एफसीआरए) में जो संशोधन किए हैं उनका व्यापक विरोध हुआ है। इन संशोधनों ने स्वैच्छिक संस्थाओं के संचालन में सरकार के अनावश्यक दखल को इस हद तक बढ़ा दिया गया है कि अनेक स्वैच्छिक संस्थाओं के लिए भविष्य में अपना अस्तित्व बनाए रखना भी कठिन हो सकता है। विशेषकर अनेक छोटी स्वैच्छिक संस्थाओं के लिए व पैरवी/जन-अभियान के कार्य में लगी स्वैच्छिक संस्थाओं के लिए अधिक कठिनाईयां उपस्थित हुई हैं।
इसे सभी स्वीकार करते हैं कि विदेशी अनुदानों के मामले में पारदर्शिता होनी चाहिए पर यह एनजीओ के संदर्भ में पहले से मौजूद थी और विभिन्न एनजीओ को इस बारे में पूरी जानकारी सरकार को पहले ही नियमित उपलब्ध करवानी पड़ती थी कि कहां से कितने संसाधन प्राप्त हुए हैं। कोई भी अतिरिक्त जानकारी सरकार को प्राप्त करनी हो तो इसके लिए भी उसके पर्याप्त व्यवस्था मौजूदा थी।
यदि सरकारी जांच में विदेशी धन का कोई दुरुपयोग नजर आए तो उसके विरुद्ध कार्यवाही करने की व्यवस्था भी सरकार के पास मौजूद थी। अत: इन संशोधनों का कोई औचित्य अभी स्पष्ट नजर नहीं आ रहा है।
किसी भी लोकतंत्र में एनजीओ क्षेत्र के महत्वपूर्ण योगदान को मान्यता मिलती है और इस लोकतांत्रिक भूमिका को निभाने के लिए स्वैच्छिक संस्था को अपने कार्य स्वतंत्र रूप से करने के लिए पर्याप्त जगह मिलनी चाहिए। पर जो संशोधन हाल में किए गए हैं वे स्वैच्छिक संस्थाओं के कार्य करने की स्वतंत्रता को अवरुद्ध करते हैं और इसके लिए ऐसे तौर-तरीके अपनाते हैं जिनका मकसद कतई स्पष्ट नहीं है कि इससे किस तरह का राष्ट्रीय हित प्राप्त होगा।
उदाहरण के लिए, संशोधन द्वारा यह कहना कि विदेशी देन प्राप्त करने वाली संस्था को दिल्ली के किसी विशिष्ट बैंक की इकाई में अपना खाता खोल कर यह देन प्राप्त करनी होगी। आधुनिक बैंकिंग की आज की व्यवस्था में कोई धनराशि देश में कहीं भी स्थित बैंक में प्राप्त की गई हो इसका विवरण कहीं भी प्राप्त हो सकता है। तिस पर सारी जानकारी सरकार को उपलब्ध करवाने का प्रावधान तो पहले से मौजूद है। अत: यह स्पष्ट नहीं है कि इस तरह के संशोधन से सरकार किस तरह के ‘राष्ट्रीय हित’ को प्राप्त करना चाहती है।
इसी तरह स्वैच्छिक संस्थाओं को यह कहना कि प्रशासनिक खर्च में वह इतने प्रतिशत से अधिक व्यय नहीं कर सकती है या वह आगे अन्य संस्थाओं को संसाधन उपलब्ध नहीं करवा सकती है (रीग्रांट), यह सब स्वैच्छिक संस्था के कार्य में एक अनावश्यक दखल है। इससे यह तथ्य सामने आता है कि एक खुले लोकतांत्रिक माहौल में अपनी लोकतांत्रिक भूमिका को निभाने की जगह स्वैच्छिक संस्थाओं को नहीं दी जा रही है या उनसे छीनी जा रही है।
यह ध्यान में रखना चाहिए कि कुछ वर्ष पहले तक भारत की चर्चा यहां की अनेक स्वैच्छिक संस्थाओं के रचनात्मक योगदान के रूप में विश्व स्तर पर होती थी और इस दृष्टि से भारत को एक समृद्ध लोकतंत्र माना जाता था। भारत की यह प्रतिष्ठा बनी रहे, इसके लिए केन्द्रीय सरकार को हाल के संशोधन वापस ले लेने चाहिए।
यदि सरकार को किसी संशोधन की जरूरत अनुभव होती है, तो उसे स्वैच्छिक संस्थाओं से इस बारे में पहले व्यापक विमर्श करना चाहिए।
ऐसे विमर्श से ही पता चल सकता है कि इस बारे में स्वैच्छिक संस्थाओं का क्या विचार है, उन्हें किस तरह की कठिनाईयां आ सकती हैं। हो सकता है कि जितनी कठिनाईयां आज स्वैच्छिक संस्थाओं को इन संशोधनों से आ रही हैं, उसका पूरा अंदाजा उन सरकारी अधिकारियों को भी न रहा हो जिन्होंने इन संशोधनों का मसौदा तैयार किया। अत: जरूरी है कि सरकार पहले स्वैच्छिक संस्थाओं से व्यापक और निष्ठापूर्वक विमर्श करे, तभी कानूनों को बदले।
ध्यान रहे कि इन नए संशोधनों के बिना भी यदि सरकार किसी भी संस्था को राष्ट्रीय हित के विरुद्ध कार्य करता हुआ पाती है तो वह सदा उसकी जांच कर सकती है और जांच में दोषी पाए जाने पर आगे कार्यवाही कर सकती है। पर यह सब कार्यवाही किसी बदले या उत्पीडऩ या लोकतंत्र के दमन की तरह की नहीं होनी चाहिए।
एमनेस्टी संस्था से यदि सरकार की राय मेल नहीं रखती थी तो लोकतांत्रिक विमर्श में सरकार लोगों के सामने स्पष्ट कह सकती थी कि एमनेस्टी ने क्या गलत किया है और उसे आगे अति सावधान रहने चाहिए। पर सरकार ने इतनी कड़ी कार्यवाही की कि एमनेस्टी को भारत में अपना कार्य ही बंद करना पड़ा और इस स्थिति की दुनिया के अनेक देशों में निंदा हुई। अब तो आगे के लिए बस उम्मीद की जा सकती है कि भविष्य में स्वैच्छिक संस्थाओं की लोकतांत्रिक भूमिका के प्रति सरकार अधिक सम्मान दर्शाएगी। सरकार को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि देश के अनेक प्रतिष्ठित समाचार पत्रों ने इन संशोधनों को अनुचित बताया है और इस विरोध के स्पष्ट कारण भी बताए हैं। (navjivanindia.com)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
हम भारतीय लोग अपने पड़ोसी देशों के बारे में सोचते हैं कि वे हम से बहुत पिछड़े हुए हैं। हमसे क्षेत्रफल और जनसंख्या में तो वे छोटे हैं ही लेकिन वे शिक्षा, चिकित्सा, भोजन, विदेश-व्यापार आदि के मामलों में भी भारत की तुलना में बहुत पीछे हैं। खास तौर से बांग्लादेश के बारे में तो यह राय सारे देश में फैली हुई है, क्योंकि बांग्लादेशी मजदूरों को तो भारत के कोने-कोने में देखा जा सकता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की ताजा रपट तो हमारे सामने दूसरा नक्शा पेश कर रही है। उसके अनुसार इस वर्ष बांग्लादेश का प्रति व्यक्ति समग्र उत्पाद (जीएसटी) भारत से थोड़ा ज्यादा है। 2020-21 में बांग्लादेश का प्रति व्यक्ति समग्र उत्पाद 1888 डालर होगा जबकि भारत का 1877 डालर रहेगा। पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था निरंतर आगे बढ़ती रही है। 2019 में वह 8.2 बढ़ी थी। इस वर्ष भी बांग्ला अर्थव्यवस्था 3.8 प्रतिशत बढ़ेगी जबकि भारतीय अर्थ व्यवस्था 10.3 प्रतिशत घटेगी।
कोरोना की महामारी का उल्टा असर तो भारत को पीछे खिसका ही रहा है, मोदी सरकार की नोटबंदी जैसी अन्य कई भूलें भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। इसमें शक नहीं है कि पिछले छह वर्षों में भारत की अर्थ-व्यवस्था ने कई छलांगें भरी हैं और वह पड़ोसी देशों के मुकाबले काफी आगे रही है लेकिन आज बांग्लादेश कई मामलों में हमसे कहीं आगे है। जैसे बांग्लादेशी नागरिकों की औसत आयु भारतीयों से 3 वर्ष ज्यादा है। जनसंख्या बढ़ोतरी के लिए मुसलमानों को बदनाम किया जाता है लेकिन बांग्लादेश में जन्म—दर की रफ्तार सिर्फ 2 है जबकि भारत में वह 2.2 है। इसी तरह कई अन्य मामलों में बांग्लादेश हमसे आगे हैं। बांग्लादेश की इस प्रगति से इष्र्या करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था उससे लगभग 11 गुना बड़ी है लेकिन उससे हमें कुछ सीखने की जरूरत जरूर है। बांग्लादेश ने अभी अभी बलात्कार के लिए मृत्युदंड का कानून बनाया है। वह आतंकियों के साथ भी काफी सख्ती से पेश आता है।
बांग्लादेशी लोग बेहद मेहनतकश हैं। वहां हमारे समाज की कमजोरियां कम ही हैं। वहां के लोग जातिवाद से उतने ग्रस्त नहीं हैं, जितने हम हैं। बौद्धिक कामों के मुकाबले वहां शारीरिक कामों को एक दम घटिया नहीं माना जाता। बांग्लादेश के कपड़े सारी दुनिया में गर्म पकौड़े की तरह बिकते हैं। ढाका की मलमल सारी दुनिया में प्रसिद्ध हुआ करती थी। भारत के साथ बांग्लादेश के संबंध अन्य पड़ोसी देशों के मुकाबले ज्यादा अच्छे हैं लेकिन चीन भी वहां हर क्षेत्र में घुसपैठ की पूरी कोशिश कर रहा है। बांग्लादेश की प्रगति से सबसे ज्यादा सबक पाकिस्तान को लेना चाहिए, जिसका वह 1971 तक मालिक था। (नया इंडिया की अनुमति से)
-चैतन्य नागर
जब हम सुनते हैं कि किसी कम शिक्षित इंसान ने घरेलू हिंसा की, अपनी पत्नी या पति, या सहकर्मियों के साथ बदसलूकी की, राह चलते लोगों के साथ दुव्र्यवहार किया तो हमें उतना आश्चर्य नहीं होता, पर जब यही काम कोई डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर या बड़ा अधिकारी करता है तो लोगों को बड़ा ताज्जुब होता है। ऐसा क्यों?
हमारी शिक्षा व्यक्ति का एकतरफा विकास करने पर ही जोर देती है। व्यक्ति का समेकित, सर्वांगीण, सम्पूर्ण विकास इसके उद्देश्यों में शामिल नहीं रहा है। इनका उल्लेख स्कूलों के विज्ञापनों और पत्रिकाओं में जरूर होता है, पर जमीनी हकीकत एक अलग कहानी कहती है। जब शिक्षा समेकित विकास की बात भी करती है, तो वह कई क्षेत्रों में प्रतिभा विकसित करने की बात करती है। वह छात्र को कई अलग-अलग गतिविधियों में उलझा कर रखने को ही उनका समेकित विकास मान लेती है। वह छात्र के और अधिक करने, कुछ और अधिक बनने पर जोर देती है। हमारी शिक्षा बौद्धिक उपलब्धि या ‘इंटेलीजेंट कोशेंट’ (आईक्यू ) पर अधिक जोर देती है जबकि बुद्धि या विचारणा समूचे मस्तिष्क के एक बहुत ही सीमित क्षेत्र में होने वाली घटना है।
सिर्फ विचार और बुद्धि के संवर्धन पर जोर देने वाली शिक्षा, पुस्तकों में उपलब्ध लिखित शब्द को ज्ञान का एकमात्र स्त्रोत मानने वाली शिक्षा ऐन्द्रिक बोध को कमजोर और भोथरा कर देती है। यह एक बहुत बड़ा कारण है कि हमारे सामने एक असंवेदनशील पीढ़ी निर्मित हुए जा रही है और हम इसके कारणों की तह तक नहीं जा पा रहे। जहाँ पुस्तक से मिलने वाला शाब्दिक ज्ञान कीमती हो जाए, वहां उसी अनुपात में संवेदनशीलता घटेगी। संवेदनशीलता का संबंध है संवेदनाओं, इन्द्रियों की सक्रियता से। जब विचार और बौद्धिकता पर अधिक जोर दिया जाएगा, वहां इन्द्रियों की क्षमता घटनी ही है।
समेकित शिक्षा को बुद्धि के साथ भावनाओं और इन्द्रियों की तीव्रता को विकसित करने और उसे कायम रखने की जिम्मेदारी भी लेनी होगी। ‘आईक्यू’ के साथ एक भावनात्मक स्तर भी होता है जिसे ‘इमोशनल कोशेंट’ या ‘ईक्यू’ कहते हैं। क्या हम सिर्फ बुद्धि के संवर्धन पर जोर दे रहे हैं? क्या बच्चों के भावनात्मक विकास, उनके आपसी संबंधों, घरेलू रिश्तों वगैरह को पूरी तरह अनदेखा नहीं कर रहे? विचार अक्सर पूरी तरह बौद्धिक हो जाते हैं, या पूरी तरह भावुक और इस तरह का एकतरफा जीवन हमारे लिए कई बाधाएं खड़ी करता है।
इससे जुड़ा दूसरा मुद्दा है गलत मूल्यों के सम्प्रेषण का। एक अच्छा पेशा या नौकरी इंसान की मूलभूत आवश्यकताओं के क्षेत्र में आते हैं। बुनियादी सुरक्षा देह, मन और मस्तिष्क के लिए जरुरी है और इसके बगैर अस्तित्व ही संभव नहीं, पर यदि कुछ लोग बहुत अधिक सफल होना चाहते हैं और उनका बिल्कुल भी ख्याल नहीं रखते जो तथाकथित रूप से ‘असफल’ हैं तो इसका मतलब हम लगातार एक रुग्ण समाज की ओर बढ़ रहे हैं, प्रतिस्पर्धात्मक मूल्यों को पोषित कर रहे हैं। एक बहुत ही शिक्षित और संवेदनशील पश्चिमी महिला के साथ हाल ही में हुई बातचीत याद आती है। उसने कहा कि मैं जीवन में बहुत सफल हो सकती हूँ, धन और शोहरत कमा सकती हूँ, पर मुझे अपनी बहन से बहुत प्यार है और मेरी बहन ज्यादा प्रतिभाशाली नहीं, न ही सामान्य अर्थ में ज्यादा शिक्षित है; मैं सोचती हूँ कि मैं सफल हो जाऊं तो उसे बहुत दु:ख होगा!
ऐसी उदात्त भावना सबमें होगी यह अपेक्षा करना अवास्तविक होगा पर यह तो सच है कि जब हम सफलता के पीछे भागते हैं तो उन लोगों का ख्याल नहीं करते जो अक्सर इस व्यवस्था के कारण ही असफल रह जाते हैं। वे बेहतर इंसान हैं, पर उनमें प्रतिभा नहीं है, या जो प्रतिभा है, वह समाज के मूल्यों के हिसाब से ज्यादा महत्व नहीं रखती। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या शिक्षा का उद्देश्य समाज के मूल्यों के हिसाब से सिर्फ सफल होना है? क्यों हम समझ और शालीनता, स्नेह और करुणा की तुलना में सफलता को ज्यादा महत्व देते हैं?
जाने-अनजाने में हमारी शिक्षा व्यवस्था सफलता की उपासना पर जोर दे रही है। कोई सफल होने के साथ धनी हो तो उसे बहुत ऊंचा दर्जा दिया जाता है। स्कूलों के समारोहों में कलेक्टर या आयुक्त को बुलाया जाता है; कोई स्टार क्रिकेटर मिल सके, फिर तो क्या बात है! इससे बच्चों को यह साफ संदेश मिलता है कि उन्हें बड़े होकर वैसा ही बनना है। ऐसे समारोहों में किसी स्कूल के बहुत ही ईमानदार या समर्पित शिक्षक को क्यों नहीं बुलाया जा सकता? या किसी बच्चे से ही इन कार्यक्रमों का उद्घाटन वगैरह क्यों नहीं करवाया जा सकता?
एक भूखे-प्यासे, वंचित समाज में सफलता की पूजा आपत्तिजनक इसलिए भी है क्योंकि इसे हासिल करने के अवसर सबके पास नहीं हैं। जिन परिवारों में पहले से ही लोग उच्च पदों पर हैं, उनके बच्चों के लिए बेहतर अवसर होते हैं और वे दूसरे बच्चों की तुलना में ज्यादा आगे निकलने की संभावना रखते हैं, भले ही दूसरे बच्चे ज्यादा मेहनती और प्रतिभावान हों। उनके आर्थिक और सामाजिक दबाव उन्हें उन्हीं कामों तक सीमित रखते हैं जिनसे उनका जीवन चल भर सके। बहुत ऊंचे सपने देखना उनके लिए वर्जित है। वंचित तबकों तक पहुँचते-पहुँचते पानी सूख जाता है, समृद्धि और सफलता की नदियाँ कहीं ऊंचाई पर ही रुक जाया करती हैं।
गांधी जी ह्रदय के संवर्धन या ‘कल्चर ऑफ द हार्ट’ की बात करते थे। इमोशनल कोशेंट को महत्व देते थे। यह बात उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में टॉलस्टॉय फार्म में शिक्षा सम्बन्धी प्रयोगों के दौरान ही अप्रत्यक्ष रूप से कह दी थी। बौद्धिक ताकत, सफलता, प्रतिष्ठा और आर्थिक समृद्धि प्राप्त करना जीवन का एकमात्र उद्देश्य नहीं हो सकता और शिक्षक को प्राथमिक स्तर से ही यह बात समझनी और समझानी होगी। इससे उसमें अपना आत्म-सम्मान भी बढ़ेगा, क्योंकि अभी भी हमारे समाज में शिक्षक को एक निरीह प्राणी के रूप में देखा जाता है। अक्सर लोग समझते हैं कि जब कोई, किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो पाता तो वह शिक्षक बन जाता है। शिक्षक को समाज की समूची तस्वीर बच्चों के सामने रखनी चाहिए। यह सिखाना चाहिए कि सफलता और धन ही जीवन का अकेला मकसद नहीं हो सकता। खासकर ऐसे समाज में जहाँ ये सबके लिए उपलब्ध न हो।
यह भी जरूरी है कि इन मूल्यों को परंपरागत अर्थ में व्याख्यायित न किया जाए, बल्कि उन्हें आज के सन्दर्भ में, आधुनिक परिस्थितियों में स्पष्ट किया जाए। बच्चों को संसार के उन अरबपतियों के भी उदाहरण दिए जाने चाहिए जिन्होंने जीवन के आखिर में खुदकुशी कर ली। धन और प्रसिद्धि के गहरे निहितार्थ उनकी समग्रता में समझाने चाहिए। जार्ज बर्नार्ड शॉ ने इस संबंध में बहुत अच्छी बात कही थी कि ‘एक धनी व्यक्ति और कोई नहीं, बस एक पैसे वाला गरीब इंसान होता है।‘ सही शिक्षा में धन और सफलता के बखान करने के अलावा आतंरिक समृद्धि, सृजनशीलता, समझ, तार्किक सोच और स्नेह से भरे एक ह्रदय की आवश्यकता बच्चों को किसी भी तरह समझाई जानी चाहिए। इसमें शिक्षक की स्वयं की शिक्षा भी शामिल है क्योंकि यह सब वह ईमानदारी के साथ तभी बता सकता/सकती है जब वह खुद भी उन मूल्यों को थोड़ा बहुत जीता हो।
इसमें माता-पिता की भी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। घर पर ऐसी बातें ही नहीं की जानी चाहिए जिनसे बच्चों के मन पर इस तरह के झूठे मूल्य अंकित हो जाएं कि उन्हें बस धन और शोहरत के लिए अपने जीवन को न्योछावर कर देना है। समेकित विकास का सौंदर्य ही इस बात में है कि उसमें देह, बुद्धि, धन और प्रेम के साथ-साथ जीवन के गहरे प्रश्न पूछने की क्षमता विकसित हो। अंधाधुंध धन कमाने के अलावा सुरुचिपूर्ण साहित्य, कला, संगीत वगैरह के प्रति भी बच्चे का ध्यान आकर्षित किया जाए। अपने दैहिक स्वास्थ्य के बारे में भी वह उतना ही सजग हो सके। समूची धरती और छोटे-से-छोटे जीव-जंतुओं की फिक्र करने की सीख देना शिक्षा के सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्यों में शामिल होना चाहिए। सर्वांगीण विकास इसी में निहित है। (सप्रेस)
श्री चैतन्य नागर स्वतंत्र लेखक है।
-अमिताभ पाण्डेय
दुनिया भर में महामारी की तरह फैल चुकी कोरोना की बीमारी लोगों के मन में तनाव को बढ़ावा दे रही है। कोरोना का नाम सुनते ही लोग भयभीत हो जाते हैं। कई बार तो इसका जिक्र करते ही लोगों को इतना अधिक मानसिक तनाव होने लगता है कि उनके मन में आत्महत्या के विचार आने लगते हैं। ऐसे लोगों की मानसिक स्थिति को समय रहते पहचान कर उसका उपचार शुरू न किया जाये तो जानलेवा घटनाएँ हो सकती हैं। पिछले कुछ महीनों में इंदौर तथा दिल्ली के चिकित्सालयों में भर्ती कोरोना संक्रमित मरीजों ने अस्पताल की ऊँची बिल्डिंगों से कूदकर आत्महत्या कर ली। कोरोना से संक्रमित आधा दर्जन लोग उपचार के दौरान अस्पताल से भाग गए जिनको बाद में पकड़ा गया। कुछ लोग ऐसे भी देखने-सुनने में आए जिन्होंने कोरोना पॉजिटिव रिपोर्ट की बात सुनते ही बिस्तर पकड़ लिया। वे बीमारी से ज्यादा डर के कारण बीमार हो गए।
कोरोना की बीमारी का डर ऐसा फैल गया है कि जिस घर-परिवार में कोई व्यक्ति कोरोना संक्रमित हो, उसके परिवारजन भी कई बार दूर होने लगते हैं। मोहल्ले, पड़ोस के लोगों के मन में भी ऐसा डर बैठ जाता है कि लोग कोरोना पॉजीटिव मरीज के घर से गुजरने में भी डरते हैं। कोरोना का भय, कोविड -19 बीमारी से भी बड़ा हो गया है। यह डर लोगों की जान ले रहा है। लोग निराशा के माहौल में डूबकर आत्महत्या करने की कोशिश करते देखे गए हैं। लोग बचाव और उपचार पर अपना ध्यान केंद्रित करने की बजाय इस बीमारी से ज्यादा भयभीत हो रहे हैं।
कोरोना का असर शरीर से ज्यादा मन-मस्तिष्क पर देखा जा रहा है। दरअसल आम जनता के मन में कोविड-19 को लेकर जो डर है वह अचानक नहीं आया है। इन दिनों हम अक्सर हमारे आसपास ऐसे शब्दों का प्रयोग बहुत बार बोलने-सुनने-देखने में कर रहे हैं जो सीधे कोरोना की बीमारी से जुड़े हैं। कोरोना पॉजिटिव, आइसोलेशन वार्ड, होम आईसोलेशन, सेल्फ आईसोलेशन, कोरनटाईन, कोविड वॉर्ड, कोविड सेंटर, मास्क, पीपीई किट, सायरन, एंबुलेंस, पुलिस, डॉक्टर जैसे शब्दों को बार-बार सुनकर लोग भयभीत हो रहे हैं। उनके मन में इतना गहरा डर है कि कोरोना पॉजिटिव का नाम सुनते ही लोग घर छोडक़र भाग जाने को तैयार हैं। कई लोग तो कोरोना पॉजिटिव रिपोर्ट आते ही अपना घर छोड़ कर भाग गए ऐसे लोगों को बमुश्किल पकडक़र अस्पताल भेजा गया।
अस्पताल में भी डरे हुए लोग कोविड वार्ड में ही आत्महत्याएँ कर रहे हैं। ऐसी घटनाएं मध्यप्रदेश के कुछ जिलों में देखी गयी हैं। कुछ मामलों में तो यह भी देखा गया है कि कोरोना संक्रमण पाए जाने पर पीडि़त का उपचार करने की बजाय उसे ही घर से बाहर निकाल दिया गया। कोरोना के कारण घर-परिवार-समाज में लोगों के रिश्ते बिगड़ रहे हैं। कोरोना की महामारी नौकरी, व्यापार-व्यवसाय, अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने के साथ ही सामाजिक बहिष्कार और सामाजिक भेदभाव का कारण भी बन गई है। कोरोना के बारे में आम जनता के मन में सोशल मीडिया, झूठी खबरों, अफवाहों के कारण जो डर बढ़ रहा है इस पर तत्काल प्रभावी रोक लगाने की आवश्यकता है।
सोशल मीडिया पर कोरोना के बारे में आने वाली सकारात्मक, उत्साहवर्धक खबरों से ज्यादा चर्चा नकारात्मक खबरों की होती है। नकारात्मक, निराशाजनक और डर को बढ़ाने वाली खबरों को फेसबुक, व्हाट्सएप्प, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन, ट्विटर पर पढ़े-लिखे लोग बिना पढ़े ही फारवर्ड कर रहे हैं। इस पर तत्काल रोक लगाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं समाज की भी है। ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ (डब्यएमएचओ), भारत सरकार के ‘स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय,’ राज्य सरकारों के स्वास्थ्य विभागों से जुड़े वरिष्ठ डॉक्टरों ने कई बार यह कहा है कि कोरोना का संक्रमण हो जाने पर उसका समुचित और त्वरित उपचार शुरू कर दें तो कोरोना को हराना आसान है। कोरोना से लड़ाई मुमकिन है और इससे जीत भी संभव है। सच यह है कि हमारे देश में कई लोग अपनी मजबूत इच्छाशक्ति और बेहतर आत्मविश्वास के दम पर कोरोना को हरा चुके हैं। ऐसे लोग स्वस्थ होकर फिर से अपने काम-काज पर लौट आए हैं।
अब समय आ गया है कि क?र?नॉ के विरोध में प्रभावी जागरूकता अभियान चलाया जाए। कोरोना संक्रमण से संघर्ष कर जीतने वाले लोगों को समाचार पत्रों, सोशल मीडिया के सामने आकर यह बताना चाहिए कि कोरोना से आत्मविश्वास के दम पर, चिकित्सकों की सलाह और बेहतर उपचार के दम पर आसानी से विजय पाई जा सकती है। कोरोना काल का यह समय हम सभी के लिए सामूहिक संकल्प लेने का है कि हम सब मिलकर कोरोना से लड़ेंगे और जीतेंगे। (सप्रेस)
श्री अमिताभ पाण्डेय मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विषय पर लगातार आलेख लिखते रहते हैं।
-नरेन्द्र चौधरी
एक खबर के अनुसार बीटी बैगन की दो किस्मों को ‘जेनेटिक इंजीनियरिंग अनुमोदन समिति’ (जीईएसी) की मई 2020 की बैठक में मैदानी परीक्षण की अनुमति देने का निर्णय लिया गया है। आशंका है कि सरकार कभी भी नोटिफिकेशन लाकर इस निर्णय को लागू कर सकती है। जिस ताबड़तोड़ तरीके से केन्द्र सरकार तरह-तरह के कानून पारित कर रही है, उसमें यदि कोई ऐसा नोटिफिकेशन आ भी जाता है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। अक्टूबर 2009 में भी ‘जीईएसी’ ने बीटी बैगन की खेती करने की अनुमति दी थी, लेकिन चौतरफा विरोध देखते हुए 10 फरवरी 2010 को इस अनुमति को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया था।
बीटी बैगन आनुवांशिक रूप से परिवर्तित फसल है। इसमें मिट्टी के एक जीवाणु ‘बैसिलस थुरिजिएंसिस’ (बीटी) का जीन बायो-इंजिनियरिंग द्वारा बैगन के बीज में डाल दिया जाता है। इसके कारण बैगन का पौधा ही एक कीटनाशक प्रोटीन का निर्माण करने लगता है। यह प्रोटीन एक जहर है, जो बीटी बैगन को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को मार डालता है।
इस संदर्भ में बीटी कपास, जिसकी फसल भारत में उगाते हुए लगभग 20 वर्ष हो गए हैं, का अनुभव हमारे लिए उपयोगी हो सकता है। बीटी कपास भारत में 2002 में लाया गया था। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, बीटी कपास में भी ‘बैसिलस थुरिजिएंसिस’ नामक जीवाणु का जीन बायो-इंजिनियरिंग के जरिए डाला गया है। यह जीवाणु कपास के पौधे में कीटनाशक उत्पन्न करता है, जो कपास के पौधे को नुकसान पहुंचाने वाले ‘बालवर्म’ नाम के कीट को मार डालता है। दावा किया गया कि इससे कपास की अधिक पैदावार होगी और नहीं के बराबर या कम मात्रा में कीटनाशक छिडक़ने की आवश्यकता पड़ेगी। प्रारंभ के कुछ वर्षों के अध्ययन में यह कुछ हद तक सच भी साबित हुआ। विशेषकर उन लोगों के अध्ययन में जो इसे सच साबित करना चाहते थे। हालांकि उस समय भी कुछ पर्यावरणविदों व कृषि-विशेषज्ञों ने लंबे समय में इससे होने वाले नुकसान के प्रति चेताया था और उपज बढने के दावों पर संदेह व्यक्त किया था। बाद के वर्षों में यह आशंका सच साबित हुई।
इस वर्ष मार्च में एक वैज्ञानिक पत्रिका ‘नेचर प्लांट’ ने के.आर. क्रांति और ग्लेन डेविस स्टोन का भारत में बीटी कपास की फसल के दो दशकों के अनुभवों पर आधारित एक विस्तृत अध्ययन प्रकाशित किया है। इस अध्ययन के निष्कर्ष हमें यह निर्णय लेने में सहायक हो सकते हैं कि क्या उत्पा दन बढऩे के दावे सच थे एवं क्यों हमें बीटी बैंगन की खेती करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।
यह अध्ययन पैदावार में वृद्धि के बारे में किये गए दावों की कुछ विसंगतियों को उजागर करता है। उदाहरणार्थ सन् 2003-2004 की पैदावार में 61 प्रतिशत और 2005 की पैदावार में 90 प्रतिशत वृद्धि का श्रेय कपास की बीटी नस्ल को दिया गया था। इस अध्ययन के अनुसार यह उचित नहीं था, क्योंकि 2003 में कपास उगाने वाले कुल क्षेत्र के केवल 3.4 प्रतिशत भाग में ही बीटी कपास उगाया जा रहा था तथा 2005 में भी बीटी कपास का क्षेत्र केवल 15.7 प्रतिशत हिस्से में ही था। लेकिन 2007 के बाद बी.टी. कपास के क्षेत्र में निरंतर वृद्धि के बावजूद उत्पादन में ठहराव आ गया था।
आंकड़ों के राज्यवार विश्लेषण भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि कपास के उत्पादन में वृद्धि का बीटी कपास से कोई सीधा संबंध नहीं था। जैसे कि 2003 में गुजरात में कपास के उत्पादन में 138 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई, जबकि उस अवधि में गुजरात के कपास उत्पादन के कुल क्षेत्र के केवल 5 प्रतिशत हिस्से में बी.टी. कपास लगाया जा रहा था। आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, और राजस्थान में भी बीटी कपास लगाने व कपास के उत्पादन में वृद्धि के बीच कोई संबंध नहीं पाया गया।
अध्ययनकर्ताओं के अनुसार कपास के उत्पादन में वृद्धि देश में सिंचाई सुविधाओं में सुधार और उर्वरकों के अधिक उपयोग के कारण संभव हुई, कपास की किसी विशेष प्रजाति के उपयोग से इसका कोई संबंध नहीं था। सन् 2007 से 2013 के बीच उर्वरकों का उपयोग लगभग दुगना हो गया। सन् 2003 में जहां औसत 98 किलो प्रति हेक्टेयर उर्वरक का प्रयोग हो रहा था, वह 2013 में बढक़र औसतन 224 किलो प्रति हेक्टेयर हो गया। राज्यवार अध्ययन में भी इस संबंध की पुष्टि होती है।
जहां तक कीटनाशक का संबंध है, इसके उपयोग में 2006 से 2011 के बीच जरूर उत्तरोत्तर कमी दर्ज की गई, लेकिन बाद के वर्षों में कीटनाशक के उपयोग में तेज बढ़ोत्तरी देखी गयी। ‘पिंक-बालवर्म’ कीट में कीटनाशक के प्रति प्रतिरोध भी उत्पन्न हो गया। चीन में हुए अध्ययन में भी ‘पिंक-बालवर्म’ में प्रतिरोध उत्पन्न होना पाया गया। जैसे-जैसे बीटी कपास की उपज का क्षेत्र बढ़ता गया, वैसे-वैसे कीटनाशक पर होने वाला खर्च भी बढ़ता गया। देश में बीटी कपास आने के पहले किसान जितना कीटनाशक पर खर्च कर रहे थे, बीटी कपास आने पर प्रारंभिक गिरावट के बाद 2018 तक, वे कीटनाशक पर उससे 37 प्रतिशत अधिक खर्च करने लगे।
यह अध्ययन बताता है कि बीटी कपास से होने वाले फायदे उतने नहीं थे, जितने दिखाए गए थे एवं वे भी एक सीमित अवधि तक ही रहे। पिछले तेरह सालों में कपास के उत्पादन में कोई वृद्धि नहीं हुई है। भारी मात्रा में उर्वरक और कीटनाशकों के उपयोग, सिंचाई सुविधा एवं बीटी कपास प्रजाति लगाने के बावजूद विश्व के कपास उत्पादन में भारत का 36वां स्थान है। यह अफ्रीका के उन देशों के राष्ट्रीय औसत से भी कम है, जो संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं और बीटी कपास नहीं लगाते। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि सन् 2000 के बाद कपास उत्पादन में संसाधनों (उर्वरक, सिंचाई, कीटनाशक) की जो वृद्धि हुई उसने इसकी खेती को बहुत मंहगा बना दिया है (अन्य फसलों में भी ऐसा हुआ है) और किसान के कौशल का महत्व घटा दिया है। जलवायु परिवर्तन और बाजार की अनियमितता ने इसे और जटिल बना दिया है। इस प्रकार की मंहगी खेती को विकसित देशों में सरकार से सुरक्षा प्राप्त है, जो भारत में नहीं है। इससे किसान कर्ज के जाल में फंस रहे हैं।
भारत प्राचीन काल से कपास उगा रहा है। 20वीं शताब्दी तक भारत में देसी कपास उगाया जाता था और अनेक देशों में निर्यात होता था। अध्ययनकर्ताओं के हिसाब से भारत देसी बीजों की उपेक्षा के परिणाम भुगत रहा है। देसी प्रजाति पर अनेक कीटों का प्रभाव नहीं पड़ता, संसाधनों की अधिक आवश्यकता नहीं होती और वे जलवायु परिवर्तन का बेहतर मुकाबला कर सकती हैं। इसको बढावा देने के लिए सरकार का सहयोग आवश्यक है।
इस अध्ययन से स्पष्ट है कि बीटी कपास के संदर्भ में अधिक उत्पावदन और कीटनाशकों के उपयोग में कमी के दोनों बड़े दावे सही नहीं हैं। इसके अलावा बीटी फसलों का स्वास्थ्य और पर्यावरण पर भी प्रभाव पड़ता है। इस संबंध में भी अनेक अध्ययन हुए हैं। साथ ही बीटी कपास तो खाने के रूप में प्रयुक्त नहीं होता, जबकि बैगन को हम सब्जी के रूप में उपयोग करते हैं। अभी तक भारतीय भोजन में किसी भी प्रकार के अनुवांशिक रूप से परिवर्तित खाद्य पदार्थ के उपयोग की अनुमति नहीं है। भारत में बैगन की सैकड़ों किस्में हैं। देश के विभिन्न क्षेत्रों की मिट्टी, जलवायु स्थानीय कीट से लडऩे की क्षमता के अनुसार देसी प्रजाति का चुनाव किया जा सकता है। बीटी कपास के दो दशकों के हमारे इन अनुभवों की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए हमें बीटी बैगन को पूर्णत: नकार देना चाहिए। बीटी बैगन की खेती की अनुमति अन्य बीटी खाद्य फसलों के लिए भी दरवाजे खोल देगी, जो न सिर्फ हानिकारक हैं, वरन् अनावश्यक भी हैं। (सप्रेस)
श्री नरेन्द्र चैधरी जैविक खेती से जुड़े वरिष्ठ स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं।
- संदीप सोनी
क्या आपने कभी विटामिन की गोली खाई है? दुनिया में हर दिन करोड़ों लोग विटामिन की गोलियां खाते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि आप भी उनमें से एक हैं.
बीते सौ साल में दुनिया बहुत बदल गई है. विटामिन की इन गोलियों ने बदलती हुई दुनिया को देखा है. 100 साल के भीतर विटामिन की ये गोलियां अरबों डॉलर का बाज़ार बन गई हैं.
शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए विटामिन का बड़ा योगदान माना गया है. लेकिन क्या उसके लिए हर व्यक्ति को विटामिन की गोलियां खाना ज़रूरी है.
विटामिन की गोलियां कब और कैसे, करोड़ों लोगों की ज़िंदगियों में शामिल हो गईं ? इस सवाल की पड़ताल बड़ी रोचक है.
100 साल पहले विटामिन के बारे में किसी ने सुना तक नहीं था, लेकिन अब दुनिया भर में हर उम्र के लोग फूड-सप्लीमेंट के तौर पर विटामिन की गोलियां खा रहे हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ के लिए काम करने वाली डॉक्टर लीसा रोजर्स के मुताबिक 17वीं शताब्दी में वैज्ञानिकों को पहली बार अहसास हुआ कि प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा के अलावा खाने-पीने में कुछ तो ऐसा है जो अच्छी सेहत के लिए बेहद ज़रूरी है.
वो कहती हैं, "उस दौर में वैज्ञानिकों ने ये नोटिस किया कि जो नाविक लंबी समुद्री यात्राओं पर जाते हैं, उन्हें खाने के लिए ताज़े फल-सब्ज़ियाँ नहीं मिल पाते. इसकी वजह से उनके खान-पान में कमी रह जाती है जिसका असर सेहत पर पड़ता है."
लेकिन वैज्ञानिक 20वीं सदी की शुरुआत में ही वाइटल-अमीन्स को समझ पाए, जिन्हें हम आज वाइटामिन या विटामिन के नाम से जानते हैं.
हमारे शरीर को 13 तरह के विटामिनों की ज़रूरत होती है. ये हैं विटामिन ए,सी,डी,ई और के.
अल्फ़ाबेट के हिसाब से देखें तो विटामिन ए और सी के बीच में है विटामिन बी, जो आठ तरह के होते हैं. इस तरह कुल विटामिन हुए 13.
हर विटामिन दूसरे से अलग है और हर अच्छी सेहत के लिए सही मात्रा में बेहद ज़रूरी है.
इनमें से विटामिन डी को हमारा शरीर सूर्य के प्रकाश में बना सकता है, लेकिन बाक़ी विटामिन हमें भोजन से ही मिलते हैं.

डॉक्टर लीसा रोजर्स के मुताबिक, "दुनिया में अभी भी दो अरब से ज्यादा लोग विटामिन या मिनरल्स की कमी से पीड़ित हैं. इनमें से ज़्यादातर, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में रहते हैं. बच्चों के मामले में विटामिन की कमी जानलेवा साबित होती है, क्योंकि जब वो बीमार पड़ते हैं या उन्हें किसी तरह का संक्रमण होता है, तो भूख पहले ही कम हो चुकी होती है और यदि वो कुछ खाते भी हैं, तब शरीर पोषक तत्वों को ग्रहण ही नहीं कर पाता."
विज्ञान की इतनी तरक्की के बावजूद विटामिंस के बारे में अभी बहुत कुछ जानना बाकी है. ऊपर से हमारी खान-पान की बिगड़ती आदतों ने मुश्किल और बढ़ा दी है.
डॉक्टर लीसा रोजर्स का मानना है, "ज़्यादातर लोग यही सोचकर विटामिन की गोलियां खाते हैं कि इससे उन्हें फ़ायदा होगा, मानो इन गोलियों से कोई जादू हो जाएगा, लेकिन वो ये भूल जाते हैं कि विटामिन तो शरीर को तभी मिलते हैं जब हम संतुलित खाना नियमित रूप से खाते हैं. सिर्फ़ गोली लेने से बात नहीं बनती. प्रेग्नेंसी या बुढ़ापा जैसी ख़ास स्थितियों में विटामिन की गोलियां लेना अलग बात है."
लेकिन फिर भी ऐसे लाखों लोग हैं जो सिर्फ सप्लीमेंट के तौर पर विटामिन की गोलियां खाते हैं. क्या स्वस्थ लोगों के लिए विटामिन के सप्लीमेंट लेना ज़रूरी है?
डर और उम्मीद का बाज़ार
साइंस जर्नलिस्ट कैथरीन प्राइस ने विटामिनों के बारे में काफ़ी अध्ययन किया है. उनका मानना है कि 20 शताब्दी की शुरुआत में विटामिन शब्द को ईजाद करने वाले पोलैंड के बायोकेमिस्ट कैशेमेए फंक को मार्केटिंग अवॉर्ड मिलना चाहिए.
वो कहती हैं, "इस दिशा में काम कर रहे अन्य वैज्ञानिकों ने इसे फूड-हॉर्मोन या फूड-एक्सेसरी फैक्टर जैसे नाम दिए. मैं अक्सर ये बात मज़ाक में कह देती हूं कि फूड-एक्सेसरी फैक्टर जैसा नाम वो कमाल नहीं दिखा पाता जो विटामिन ने दिखाया. कोई अपने बच्चे को हर दिन फूड-एक्सेसरी फैक्टर देना पंसद नहीं करता."

कैथरीन प्राइस का दावा है कि जो लोग उस दौर में पैसा बनाने के बारे में सोच रहे थे, विटामिन के 'नए कॉन्सेप्ट' से उनकी लॉटरी लग गई.
कैथरीन प्राइस का मानना है, "फूड प्रॉडक्ट की मार्केटिंग करने वालों को लगा कि ये तो गज़ब की चीज़ है, क्योंकि ख़ुद वैज्ञानिक कह रहे थे कि खाने में कुछ ऐसी चीज़ें होती हैं जो किसी को दिखाई नहीं देतीं, जिनका अपना कोई स्वाद नहीं होता. ये मात्रा में बहुत कम होते हैं, लेकिन इनकी कमी से होने वाली बीमारियां आपकी जान भी ले सकती हैं."
जिस दौर में विटामिनों की खोज हो रही थी, उसी दौर में फूड-इंडस्ट्री में कई बदलाव आ रहे थे. खाने-पीने की चीजों में जो पोषक तत्व कुदरती तौर पर मौजूद थे, अधिकतर मामलों में फूड-प्रोसेसिंग के दौरान वो सारे पोषक तत्व नष्ट हो रहे थे.
कैथरीन प्राइस कहती हैं, "नैचुरल विटामिन ऑयल्स में मौजूद होते हैं, लेकिन ऑयल की वजह से प्रोसेस्ड फूड ज्यादा दिनों में ख़राब हो जाते हैं. इसलिए नैचुरल ऑयल्स को प्रोसेसिंग के दौरान ख़त्म करना ज़रूरी था. तो इस तरह प्रोसेस्ड फूड से नैचुरल विटामिन ख़त्म हो गए. इसकी भरपाई करने के लिए प्रोसेस्ड फूड में ज़्यादा से ज़्यादा सिंथेटिक विटामिन मिलाए जाने लगे."
लेकिन मार्केटिंग की भाषा में इसे 'ऐडेड-वाइटामिंस' कहा गया और इस तरह 'ऐडेड-वाइटामिंस' का कॉन्सेप्ट चल निकला. इसी कड़ी में 1930 के दशक में अमरीका में विटामिन की गोलियों का जन्म हुआ और इन गोलियों का निशाना थीं महिलाएं.
कैथरीन प्राइस बताती हैं, "उन्होंने अपनी मार्केटिंग का रुख़ महिलाओं की तरफ़ किया. महिलाओं की मैग्ज़ीन में विज्ञापन दिए. यही तरीका आज भी आज़माया जा रहा है कि माँओं को विटामिन के मामले में बहुत अलर्ट रहना चाहिए ताकि उनका परिवार सेहतमंद रहे. इसके लिए बच्चों को 'वाइटामिन-सप्लीमेंट' भी देना चाहिए."
1930 के बाद के दशकों में अमरीका में विटामिन के बूते, फूड इंडस्ट्री जमकर फली-फूली और फूड-सप्लीमेंट्स का ये मार्केट बढ़ते-बढ़ते 40 अरब डॉलर पर पहुंच गया. कैथरीन प्राइस का दावा है मार्केट तो बढ़ता गया, लेकिन विटामिन कहीं पीछे छूट गए.
वो कहती हैं, "इंसानों के लिए 13 विटामिन ज़रूरी है. लेकिन आज 87 हज़ार से ज्यादा फूड-सप्लीमेंट्स बाज़ार में मौजूद हैं. विटामिंस की पूरी इंडस्ट्री खड़ी हो गई और हम उस पर निर्भर भी हो गए. इसमें संदेह नहीं कि विटामिन हमारे लिए बेहद ज़रूरी है. लेकिन फूड-सप्लीमेंट्स की मेगा इंडस्ट्री ने ख़ूब मेहनत करके ये बात हमारे दिमाग़ में बैठा दी है कि अच्छी सेहत और लंबी उम्र का राज़ गोलियों में छिपा है."
विटामिंस फॉर विक्टरी
"विटामिंस फॉर विक्टरी…ऐसा माना जाता है कि जीत के लिए विटामिंस ज़रूरी हैं. जंग जीतने के लिए सेहत का अच्छा होना ज़रूरी था. जीती हुई जंग को सहेजने के लिए ज़रूरी था कि लोगों की सेहत अच्छी हो. कामयाब देश के लिए ज़रूरी था कि उस देश की जनता कुपोषित ना हो."
ये कहना है हमारे तीसरे विशेषज्ञ डॉक्टर सलीम अल-गिलानी का जो ब्रिटेन की केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में 'फूड एंड न्यूट्रीशन' की हिस्ट्री पढ़ाते हैं.

वो बताते हैं कि विटामिन के मामले में सरकारी दख़ल के सबसे रोचक मामले दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान देखने को मिले. साल 1941 में राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट की सरकार ने अमरीकी सैनिकों के लिए 'विटमिंस-एलाउएंस' की घोषणा की.
ब्रिटेन की सरकार भी सेहत को लेकर परेशान थी. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन ने ये सुनिश्चित किया कि उसके सैनिकों में विटामिनों की कमी ना होने पाए.
लेकिन डॉक्टर सलीम अल-गिलानी के मुताबिक, "1940 के दशक में ब्रिटेन, विटामिनों को लेकर कुछ ज्यादा ही सजग हो गया. पढ़े-लिखे लोग मार्केटिंग की वजह से विटामिन सप्लीमेंट लेने के लिए प्रेरित हुए. विटामिन की गोलियों को व्हाइट-मैजिक कहा जाने लगा."
विटामिन कम मिले तो सेहत के लिए ख़तरा है, लेकिन ज़्यादा विटामिन लेना उससे भी ज्यादा ख़तरनाक साबित हो सकता है.
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद डॉक्टरों ने नोटिस किया कि ज़रूरत से ज़्यादा विटामिन की वजह से बच्चे गंभीर रूप से बीमार पड़ रहे हैं. सरकार के कान खड़े हुए और उसे अपनी योजना बदलनी पड़ी.
फिर 1980 के दशक में ये बात तय हो गई कि भ्रूण के शुरुआती विकास के लिए फोलिक एसिड बहुत ज़रूरी है जो विटामिन बी का ही रूप है.
महिलाओं को प्रेग्नेंट होने से पहले फोलिक एसिड की कमी दूर करने और प्रेग्नेंसी के शुरुआती हफ्तों में फोलिक एसिड की भरपाई करने के लिए कहा जाता है.
इस बारे में डॉक्टर सलीम अल-गिलानी का मानना है, "तर्क ये दिया जाता रहा कि चूंकि ज़्यादातर प्रैग्नेंसी अन-प्लांड होती हैं, इसलिए फोलिक एसिड की भरपाई करने में काफी देर हो जाती है. यही वजह है कि अनाज से बनने वाले फूड-प्रोडक्ट्स को फोलिक एसिड से भरपूर कर दिया गया. दुनिया के लगभग 75 देशों में इसे अनिवार्य बना दिया गया. ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन के देश इस मामले में काफी सुस्त रहे. उन पर काफी दबाव रहा है कि वो भी अपने यहां फूड-प्रोडक्ट्स में फोलिक एसिड की मौजूदगी अनिवार्य बना दें."
डॉक्टर सलीम अल-गिलानी का मानना है कि विटामिन बेचने वाली कंपनियां बढ़ा-चढ़ाकर दावे करती हैं और सरकार उन्हें ठीक से रेग्यूलेट नहीं करती है, जिसकी वजह से ज़्यादातर लोग विटामिनों के मामले में मार्केटिंग के जाल में फंस जाते हैं.
वो कहते हैं, "ख़तरों की आशंका और संभावित फ़ायदों के बारे में सोचकर लोग विटामिन की गोलियां और दूसरे फूड सप्लीमेंट लेने लगते हैं. वो ऐसा तब भी करते हैं जब उन्हें विटामिन के मामले में भ्रमित करने वाली जानकारी मिलती है और कोई उन भ्रमों को दूर नहीं करता."
और यही वजह है कि विटामिनों का कारोबार पूरी दुनिया में जमकर फल-फूल रहा है.
परफ़ेक्शन की चाहत
"मिडिल क्लास लोगों की संख्या पूरी दुनिया में बढ़ी है. मिडिल क्लास के पास 'पर्चेसिंग-पावर' होती है, ख़र्च करने के लिए उनके पास पैसा होता है. उनके पास समय भी होता है जिसमें वो अपनी सेहत के बारे में ठीक से सोच सकते हैं."
ऐसा मानना है मैथ्यू ओस्टर का जो रिसर्च कंपनी यूरो मॉनिटर में काम करते हैं. उनका काम है हेल्थ के मामले में दुनिया भर के कंज़्यूमर-डेटा का विश्लेषण करना.
वो कहते हैं, "हेल्थ प्रोडक्ट की खपत, एशिया में सबसे तेज़ी से बढ़ रही है. चीन भी तेज़ी से चढ़ता बाज़ार है. दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में, ख़ासतौर पर थाइलैंड और वियतनाम में हेल्थ प्रोडक्ट का मार्केट बढ़ा है. एशिया में बीते कुछ वर्षों में ये मार्केट बेहद कमर्शियल हो गया है."
मैथ्यू ओस्टर का मानना है कि इंडस्ट्री में ग्लोबल ग्रोथ की एक वजह ये भी है कि अब नौजवान विटामिनों की खूब गोलियां खा रहे हैं.
वो कहते हैं," हाल के वर्षों में हमने देखा है कि कम उम्र में ही लोग विटामिनों की गोलियां खाना शुरू कर देते हैं जबकि उनसे पहले की पीढ़ी ऐसा नहीं करती थी. अब हर कोई "सेक्सी और कूल" दिखना चाहता है. सेलेब्रिटीज़ भी अपने लुक्स से, अपनी फिटनेस से इसे बढ़ावा देते हैं."
लेकिन क्या ये ट्रेंड इसी तरह जारी रहेगा या इस बात की संभावना है कि लोगों का ध्यान गोली के बजाय अपनी थाली पर जाएगा ? वैसे ये सवाल और इसका जवाब बाज़ार के विपरीत है.
मैथ्यू ओस्टर का मानना है, "मुझे लगता है कि इस इंडस्ट्री की रफ्तार कुछ धीमी पड़ सकती है. कंज़्यूमर्स का एक बड़ा ग्रुप ऐसा है जो दिन में एक भी गोली नहीं खा रहा है. कंज़्यूमर को अपने आप से ये कहना होगा कि मुझे अपनी थाली से ही पूरा पोषण चाहिए. मार्केट तो आपकी आदतों को भुनाता है. यदि हम संतुलित भोजन करें और तनाव को कम से कम कर सकें, तो कुछ ख़ास मामलों को छोड़कर कभी किसी को किसी सप्लीमेंट की ज़रूरत नहीं होगी."
इसमें संदेह नहीं कि कुछ लोगों की सेहत की स्थिति ऐसी होती है जिनमें मरीज़ के पास फूड-सप्लीमेंट लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता. लेकिन सवाल तो यही है कि अच्छा-ख़ासा भला-चंगा, चलता-फिरता व्यक्ति आख़िर क्यों सप्लीमेंट लेता है.
क्या वाकई उसे इसकी ज़रूरत होती है, या ये सिर्फ़ और सिर्फ़ खान-पान में लापरवाही की वजह से है.
अब कुछ सवाल अपने आप से पूछकर देखिए और उनका जबाव ईमानदारी से दीजिए, क्योंकि सेहत है आपकी और उस पर ख़र्च होने वाला पैसा भी आपका ही है.(bcc)
- विवेक त्रिपाठी
दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बढ़ने के साथ ही पराली जलाने का मुद्दा भी सामने आ जाता है. हवा की गुणवत्ता को खराब होने के लिए पराली जलाने को जिम्मेदार ठहराया जाता है. किसान अपनी लागत कम करने के लिए पराली जला देते हैं.
धान की कटाई शुरू हो चुकी है. रबी के सीजन में आम तौर पर कंबाइन से धान काटने के बाद प्रमुख फसल गेंहू के समय से बोआई के लिए पराली (डंठल) जलाना आम बात है. चूंकि इस सीजन में हवा में नमी अधिक होती है. लिहाजा पराली से जलने से निकला धुआं धरती से कुछ ऊंचाई पर जाकर छा जाता है. जिससे वायु प्रदूषण का स्तर बहुत बढ़ जाता है. कभी-कभी तो यह दमघोंटू हो जाता है.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल) ने पराली जलाने को दंडनीय अपराध घोषित किया है. किसान ऐसा न करें इसके लिए कई सरकार भी लगातार जागरुकता अभियान चला रही है. ऐसे कृषि यंत्र जिनसे पराली को आसानी से निस्तारित किया जा सकता है, उनपर 50 से 80 फीसद तक अनुदान भी दे रही है.
बावजूद इसके अगर आप धान काटने के बाद पराली जलाने जा रहे हैं तो ऐसा करने से पहले कुछ देर रुकिए और सोचिए. क्योंकि पराली के साथ आप फसल के लिए सर्वाधिक जरूरी पोषक तत्व नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश (एनपीके) के साथ अरबों की संख्या में भूमि के मित्र बैक्टीरिया और फफूंद भी जलाने जा रहे हैं. यही नहीं भूसे के रूप में बेजुबान पशुओं का हक भी मारा जाता है.
कृषि विषेषज्ञ गिरीष पांडेय बताते हैं कि शोधों से साबित हुआ है कि बचे डंठलों में एनपीके की मात्रा क्रमश: 0.5, 0.6 और 1.5 फीसद होती है. वे कहते हैं कि जलाने की बजाय अगर खेत में ही इनकी कम्पोस्टिंग कर दें तो मिट्टी को एनपीके की क्रमश: 4, 2 और 10 लाख टन मात्रा मिल जाएगी. भूमि के कार्बनिक तत्वों, बैक्टीरिया, फफूंद का बचना, पर्यावरण संरक्षण और ग्लोबल वॉर्मिंग में कमी बोनस होगी.
अगली फसल में करीब 25 फीसद उर्वरकों की बचत से खेती की लागत इतनी घटेगी और लाभ इतना बढ़ जाएगा. एक अध्ययन के अनुसार प्रति एकड़ डंठल जलाने पर पोषक तत्वों के अलावा 400 किलो ग्राम उपयोगी कार्बन, प्रतिग्राम मिट्टी में मौजूद 10-40 करोड़ बैक्टीरिया और 1-2 लाख फफूंद जल जाते हैं. प्रति एकड़ डंठल से करीब 18 क्विंटल भूसा बनता है. सीजन में भूसे का प्रति क्विंटल दाम करीब 400 रुपए मान लें तो डंठल के रूप में 7,200 रुपये का भूसा नष्ट हो जाता है. बाद में यही चारे के संकट की वजह बनता है.
पांडेय के मुताबिक फसल अवशेष से ढंकी मिट्टी का तापमान सम होने से इसमें सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ जाती है, जो अगली फसल के लिए सूक्ष्म पोषक तत्व मुहैया कराते हैं. अवशेष से ढंकी मिट्टी की नमी संरक्षित रहने से भूमि के जल धारण की क्षमता भी बढ़ती है. इससे सिंचाई में कम पानी लगने से इसकी लागत घटती है. साथ ही दुर्लभ जल भी बचता है.
पांडेय कहते हैं कि डंठल जलाने की बजाय उसे गहरी जुताई कर खेत में पलट कर सिंचाई कर दें. शीघ्र सड़न के लिए सिंचाई के पहले प्रति एकड़ 5 किलोग्राम यूरिया का छिड़काव कर सकते हैं.(dw)
(आईएएनएस)
सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर साज़िश रचने का अपराध टीवी के बड़े संपादकों और एंकरों ने एक नागरिक के खिलाफ किया है। लिहाज़ा इन्हें प्रेस की आज़ादी की आड़ में न तो शरण मिलनी चाहिए और न ही सहानुभूति। ये अपराधी हैं, ये टीआरपी के राक्षस हैं।
-आशुतोष
फ़्रांसीसी क्रान्ति ने इतिहास बदल दिया। राजशाही और सरकार में चर्च की भूमिका को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया। पूरी दुनिया को समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का सिद्धान्त दिया। इस क्रान्ति की प्रक्रिया में अकल्पनीय हिंसा हुई। बहुत कम लोगों को याद होगा कि क्रांति के जिन नेताओं ने राजसत्ता को समाप्त करने के लिये जिस हिंसा को जायज़ ठहराया था, वो उसी हिंसा की बलि चढ़ गये। मैक्समीलियन राब्सपियरे क्रांति के आयोजकों में सबसे बड़ा नाम था। पर जिस तरह उसने क्रांति के नाम पर लोगों को गिलोटीन पर चढ़ाया, लोगों की जान ली, उसकी विभीषिका को पढ़ सुनकर दहशत होती है। बाद में उसी राब्सपियरे को घसीटते हुये गिलोटीन पर लाया गया और उसकी गर्दन धड़ से अलग की गयी। ऐसा ही एक नाम ज्या पां मरा का था।
मरा एक पत्रकार था। फ़्रेंड्स आफ पीपुल नाम से एक अख़बार निकालता था। क्रांति के दौरान उसका अख़बार खूब पढ़ा जाता था। उसका अख़बार क्रांतिकारियों की वकालत करता था। इतना होता तो ग़नीमत होती। पत्रकारिता के नाम पर उसने लोगों को भड़काना शुरू कर दिया। सच्ची झूठी खबरे छापना शुरू कर दिया। प्रति क्रांतिकारियों की लिस्ट छाप कर उनके क़त्ल की वकालत भी करने लगा। फ़्रांस के राजा लुई और उनकी पत्नी मरिया अंतोनियोत अकुशल और जनता से कटे हुये थे लेकिन जब ज्या पा मरा ने ये खबर छापी कि एक तरफ़ फ़्रांस की जनता भूखों मर रही है, दूसरी तरफ़ राजा और उसकी पत्नी अनाज का भंडार महल में रखे हुये और गुलछर्रे उड़ाये जा रहे है, तो लोग भड़क उठे और महल पर हमला कर दिया। क्रांति के लिहाज़ से ये खबर सही हो सकती है लेकिन पत्रकारिता के लिहाज़ से ये सफ़ेद झूठ था, फेक न्यूज़ था। खबर नहीं प्रोपगंडा था।
आज देश में एक तबके को ये लग सकता है कि फ़्रांस की क्रांति की तरह ही भारत में हिंदू राष्ट्र के लिये क्रांति का वातावरण बन रहा है, कुछ पत्रकार इस मुग़ालते में जी सकते हैं पर क्या उन्हें 1789 से 1794 की तर्ज़ पर झूठी और फेक न्यूज़ फैलाने की इजाज़त दी जा सकती है? क्या उन्हें हिंसा के लिये माहौल बनाने की अनुमति होनी चाहिये? क्या ऐसे लोगों की ज्या पा मरा की तरह एक समुदाय विशेष के विरूद्ध नफ़रत की दीवार खड़ी करने की कोशिश को सही ठहराया जा सकता है? ये सवाल आज देश की पत्रकारिता और टीवी चैनलों के साथ देश की जनता से पूछना चाहिये और ये भी सवाल पूछना चाहिये कि जब वो इस तरह की कुत्सित हरकत कर रहे हो तो उनके ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई होनी चाहिये?
यहाँ सवाल फ़्रांसीसी क्रांति से तुलना कर मौजूदा माहौल को महिमामंडित करने का नहीं है। दोनों घटनाओं की आपस में तुलना हो ही नहीं सकती। फ़्रांसीसी क्रांति ने इतिहास की जड़ता को ख़त्म कर इतिहास को नयी दिशा दी, उसने नागरिक और जनता को सम्मान दिया, सत्ता को एक व्यक्ति के हाथ से छीन कर आम जन को सौंप दिया। और लोकतंत्र की स्थापना की। आज इतिहास के पहिये को पीछे ले जाने का प्रयास हो रहा है, आम जन से अधिकार छीन कर कुछ लोगों को सत्ता सौंपी जा रही है और लोकतंत्र का अपहरण किया जा रहा है। यहां सवाल सिर्फ़ एक संपादक का है कि कैसे वो अपने पत्रकारीय धर्म को भूल कर नफ़रत और ज़हर की फसल खड़ी कर रहा है, कैसे वो हिंसा के लिये वातावरण तैयार कर रहा है, कैसे वो पत्रकारिता के नाम पर लोकतंत्र की जड़ों में मुठ्ठा डाल रहा है।
ये सच है कि कई बार इस देश की पत्रकारिता अपने पथ से विमुख हुयी है। आज़ादी के पहले एक जमाना वो भी था जब गांधी जी “यंग इंडिया” और “हरिजन” जैसे अख़बार निकालते थे, बाल गंगाधर तिलक ने “मराठा” और “केसरी” अख़बार निकाल जनता से संवाद किया था, बाबा साहेब आंबेडकर ने “मूक नायक” निकाल दलित तबके में चेतना का संचार करने का काम किया था। पर इसी देश में आपात काल के दौरान सारे पत्रकारों ने घुटने टेक दिये। और सरकार की हाँ में हाँ मिलाई। लेकिन बाद में इसी प्रेस ने तत्कालीन सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। राम मंदिर आंदोलन के समय इस मीडिया का एक हिस्सा पूरी तरह से सांप्रदायिक रंग में रंग गया था, और मुस्लिम तबके के ख़िलाफ़ नफ़रत का माहौल खड़ा करने की कोशिश की। लेकिन यही वो मीडिया भी था जिसने यूपीए शासन के कामकाज पर खुलकर सवाल उठाए। लेकिन 2014 के बाद मीडिया ने जो भूमिका, और ख़ासतौर पर टीवी ने अपने लिये चुनी है वो शर्मनाक है, पीड़ादायक है, लोकतंत्र विरोधी है, समाज को तोड़ने वाला है और इतिहास का दुश्मन है।
पत्रकारिता का बुनियादी स्वभाव सत्ता विरोध का है। उसका काम सरकारों को चुनौती देना नहीं बल्कि सरकार की ख़ामियों को उजागर कर उसे जवाबदेह बनाना है। आज, एकाध टीवी चैनेल को छोड़ कर बाकी सभी सरकार के अघोषित प्रवक्ता बन गये हैं। वो सरकार से सवाल नहीं पूछते । प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से सवाल पूछना ईशनिंदा है। उलटे पूरी कोशिश विपक्ष को कठघरे में खड़ा करना है। उनकी नरम पीठ पर चाबुक फटकारना है। चीन भारत की ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर ले तो सरकार से सवाल पूछने की जगह विपक्ष को चीनी हरकत के लिये ज़िम्मेदार ठहराना है। कोरोना के लिये भी विपक्ष को गाली देनी है और अर्थव्यवस्था अगर नीचे जा रही तो भी विपक्ष की ही लानत मलामत करनी है। यानी सरकार की ग़लतियों को छिपाना हैं और विपक्ष को कोसना है। ये भारतीय मीडिया में नया फिनामिना है। इसके साथ साथ सरकार के एजेंडे और उनकी विचारधारा को बड़े पैमाने पर फैलाना भी टीवी बेशर्मी से करता है।
भारतीय मीडिया नब्बे के दशक के शुरूआती दौर को अगर छोड़ दें तो कभी भी वो सांप्रदायिक नहीं रहा। लेकिन 2014 के बाद से वो खुलेआम उसका रवैया बहुसंख्यकवाद का हो गया है, और एक समुदाय के खिलाफ नफ़रत का माहौल बना रहा है। कोरोना के समय तब्लीगी जमात पर हमला इसकी एक बानगी भर है। टीवी चैनलों पर डिबेट के समय मुस्लिम पैनलिस्ट, जो सरकार की आलोचना करते हैं, उनके साथ जो बर्ताव एंकर करते हैं, वो किसी दुश्मन देश जैसा है। इनकी नज़र में कश्मीर पर शांति की बात करने वाला देश का सबसे बड़ा दुश्मन। उसके निशाने पर लिबरल और लेफ़्ट विचारधारा के लोग भी हैं । जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पर हमला हो या फिर शाहीन बाग आंदोलन, उसने उनके ख़िलाफ़ हिंसक वातावरण बनाने की पूरी कोशिश की है। मीडिया इस देश में हिंसक समाज बना रहा है। किसी को भी वो देशद्रोही करार देता है, फिर चाहे वो कन्हैया कुमार हो या फिर नागरिकता क़ानून विरोधी आंदोलनकारी। उनकी नज़र में ये सब ग़द्दार है।
पिछले दिनों सुशांत सिंह राजपूत के मुद्दे को जिस तरह से उछाला गया, उसने सारी लक्ष्मण रेखायें तोड़ दी है। मीडिया के नाम पर जो थोड़ी बहुत शर्म दिखती थी वो झीना पर्दा भी गिरा दिया। बिना किसी सबूत और साक्ष्य, रिया और उसके परिवार को सूली पर चढ़ाया गया। वो डरावना है, ख़ौफ़नाक है ये देश के किसी भी नागरिक के साथ हो सकता है । पहले उसे सुशांत का क़ातिल ठहराया गया, फिर 15 करोड का घोटालेबाज़ और अंत में ड्रग पेडलर। खुलेआम एक नागरिक और इसके परिवार को आत्महत्या के कगार पर पंहुचा दिया बिना किसी कारण के। सीबींआई और प्रवर्तन निदेशालय जब कोई सबूत नहीं जुटा पाये तो नारकोटिक्स ब्यूरो ने झूठा केस बना कर जेल भेज दिया। मीडिया को नारकोटिक्स ब्यूरो की धज्जियाँ उडा देनी चाहिये लेकिन वह रिया और पूरे बालीवुड को नशेडी साबित करने में जुटा रहा।
एक नागरिक के ख़िलाफ़ सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर साज़िश रचने का अपराध टीवी के बड़े संपादकों और एंकरों ने किया है। लिहाज़ा इन्हें प्रेस की आज़ादी की आड़ में न तो शरण मिले और न ही सहानुभूति। ये अपराधी हैं, समाज के, लोकतंत्र के और देश के। ये टीआरपी के राक्षस हैं। ये नागरिकों के दुश्मन हैं। टीआरपी के घोटाले ने साबित कर दिया है कि इनका कोई दीन ईमान नहीं है।
पुरानी कहावत है, जो इतिहास से सबक़ नहीं लेते वो इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिये जाते हैं । ज्या पा मरा को लगा था कि वो अपने अख़बार के ज़रिये क्रान्ति की सेवा कर रहा था । वो भूल गया था जब वो हिंसा की वकालत कर रहा था, जब वो तथाकथित क्रांति के शत्रुओं की सूची बना लोगों को उनके क़त्ल के लिये उकसा रहा था, तब वो दरअसल अपनी मौत की ज़मीन खुद तैयार कर रहा था। एक दिन उसके द्वारा उकसाई हिंसा उसके ही ख़िलाफ़ खड़ी हो गयी । अपने ही घर में उसका कत्ल हो गया। शरला कोदेत नामक की एक लड़की ने उसका खून कर दिया था। कोदेत मरा की हिंसा के संपादकत्व से तंग आ चुकी थी ।(navjivan)

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में न्यूरोबायोलॉजी की प्रोफेसर कैथरीन डुलाक हमेशा से मां बाप के रवैये से अभिभूत रहती थीं और सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं बल्की सभी जीवों में. 57 साल की फ्रांसीसी वैज्ञानिक ने चूहे के दिमाग में बच्चों के प्रति रवैये के लिए जिम्मेदार तंतुओं की खोज की है. यह खोज इंसान और दूसरे स्तनधारियों में और ज्यादा प्रयोगों के लिए आधार बनेगी.
कैथरीन डुलाक उन सात वैज्ञानिकों में शामिल हैं जिन्हें 2021 के ब्रेकथ्रू पुरस्कार के लिए चुना गया है. यह पुरस्कार सिलिकॉन वैली के कुछ प्रबुद्ध लोगों की तरफ से विज्ञान और आधारभूत भौतिकी के क्षेत्र में बड़ी खोजों के लिए दिया जाता है. पुरस्कार जीतने वाले हर उम्मीदवार को 30 लाख डॉलर या फिर नोबेल पुरस्कार में मिलने वाली रकम से तीन गुना ज्यादा राशि दी जाती है.
प्रोफेसर डुलाक हार्वर्ड ह्यूग्स मेडिकल इंस्टीट्यूट में काम करती हैं. वे इस बात की पड़ताल कर रही थीं कि क्यों चुहिया हमेशा अपने छोटे बच्चों का ख्याल रखती है, उन्हें प्यार करती है जबकि नर चूहा परिस्थितियों के मुताबिक उन पर हमले करता है. यह रवैया खास तौर से कुंवारे चूहों में दिखाई देता है.
डुलाक ने अपने प्रयोग के जरिए दिखाया है कि इस रवैये के लिए जिम्मेदार तंतु नर और मादा दोनों में होते हैं. हार्मोंस में बदलाव के कारण यह बदल सकते हैं लेकिन फिर ये दोनों तरफ जा सकते हैं. यही वजह है कि कुंवारे चूहे बाप बनने के बाद बच्चों को प्यार करने लगते हैं, दूसरी तरफ तनाव के आलम में कोई मां अपने बच्चों को मार भी सकती है.
प्रोफेसर डुलाक ने समाचार एजेंसी एएफपी से बातचीत में कहा, "हमें लगता है कि हमने कुछ ऐसा पा लिया है जो दूसरे जीवों तक जामसकता है. यह एक प्रवृत्ति है और यह प्रवृत्ति इन न्यूरॉन्स का काम है, जो मैं शर्त लगा सकती हूं कि सारे स्तनधारियों के दिमाग में हैं, और जब वे नवजातों की मौजूदगी में होते हैं, तो वे उन्हें बताते हैं - तुम्हें इनका ख्याल रखना है."
डुलाक अपना काम चूहों पर ही केंद्रित रखना चाहती हैं. हालांकि यह एक बुनियादी रिसर्च है और जाहिर है कि जो लोग इस तरह के लैंगिक मामलों पर काम कर रहे हैं उनमें इसके प्रति स्वाभाविक रुचि होगी. प्रोफेसर डुलाक कह रही हैं कि ये "नर" और "मादा" तंतु सारे जीवों के दिमाग में मौजूद हैं. डुलाक का कहना है, "मैं वैज्ञानिक हूं, मैं आंकड़े देखती हूं, मैं तटस्थ हूं," हालांकि उन्होंने माना, "यह सचमुच मुझे छू गया, तभी मैं कहती हूं, मैं उपयोगी हूं."
बड़ी इनामी रकम के बारे में डुलाक ने कहा कि वे इसका एक हिस्सा स्वास्थ्य, महिलाओं की शिक्षा और असहाय आबादी पर खर्च करेंगी. डुलाक 25 साल पहले फ्रांस से अमेरिका आ गईं. वे पहले वापस जाना चाहती थीं, "लेकिन मेरी पोस्ट डॉक्टरेट की पढ़ाई काफी अच्छी रही और मुझे अमेरिका में अपनी लैब बनाने का मौका मिला और फ्रांस में मेरी अपनी लैब नहीं होती. वहां तो मुझे सचमुच पितृसत्तात्मक संरचना से जूझना पड़ता, जहां लोग कहते, 'ओह तुम अभी बहुत जवान हो, तुम्हें अपना बजट नहीं मिल सकता, तुम्हारा अनुभव इतना नहीं है कि तुम स्वतंत्र रूप से काम कर सको."
यही वजह है कि डुलाक ने हार्वर्ड को चुना और अपनी जिंदगी खुद से बनाई, आखिरकार उन्हें दोहरी नागरिकता भी मिल गई. वे मानती हैं कि जब लैंगिक समानता को बढ़ावा देने की बात होती है तो अमेरिका फ्रांस से काफी आगे नजर आता है. (dw.com)
नीलेश द्विवेदी
यह कहानी 1910 के किसी महीने की है। हेमाडपंत नाम के भक्त एक रोज सुबह-सुबह सांई बाबा से मिलने पहुंच गए थे। लेकिन जब वे साई के ठिकाने पर पहुंचे तो वहां का नजारा देखकर उनके अचरज का ठिकाना न रहा। उन्होंने देखा कि सांई हाथ की चक्की से गेहूं पीस रहे हैं। इस घटना को याद करते हुए हेमाडपंत यह भी बताते हैं कि शिरडी में 60 साल तक रहने के दौरान ऐसा कोई दिन शायद ही कभी गुजरा हो, जिस दिन सांई ने सुबह-सुबह उस चक्की से गेहूं न पीसा हो। यानी यह उनका रोज का काम था।
शिरडी के सांईबाबा संस्थान ट्रस्ट (एसएसएसटी) की वेबसाइट पर मौजूद 51 अध्यायों वाले सांई सच्चरित्र के पहले अध्याय में इस घटना का जिक्र है। अब तक 15 भाषाओं में अनुवाद किए जा चुके साई सच्चरित्र को हेमाडपंत ने ही लिखा है। इसी में उन्होंने यह दिलचस्प तथ्य भी बताया है कि साई ने कभी अपने हाथ से पीसे हुए आटे तक का संग्रह नहीं किया। उसे वे कभी गांव की मेड़ (सीमा) पर फिंकवा देते थे ताकि जीवजंतुओं के काम आ जाए और कभी किसी जरूरतमंद को दे देते थे। क्योंकि उनका अपना भरण-पोषण तो भिक्षा के जरिए होता था।
अब याद कीजिए सांई की वेशभूषा। कंधे से पैर तक झूलता हुआ गाउननुमा लबादा और सिर पर बंधा एक कपड़ा। इसके अलावा उनकी कोई और तस्वीर न तो याद आएगी और न शायद होगी। क्योंकि फिर वही बात कि उन्होंने अपनी जिंदगी में कभी कुछ संग्रह किया ही नहीं। लेकिन आज देखिए, इन्हीं सांई के नाम पर साल-दर-साल हजारों करोड़ रुपए का कारोबार फलफूल रहा है। कैसे? उसकी एक मिसाल देखिए। सितंबर-2016 की बात है। एसएसएसटी ने ऐलान किया था कि सांईं के देहावसान को 100 साल पूरे होने के मौके पर 2017 से 2018 की विजयादशमियों (15 अक्टूबर 1918 को सांई ने इसी रोज शरीर छोड़ा था) के बीच सालभर देश-विदेश में विभिन्न आयोजनों का एक सिलसिला (आधिकारिक नाम-सांईं बाबा महासमाधि सोहला) चलाया जाएगा। ताकि सांई की शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया जा सके।
साल भर के इस आयोजन के दौरान साई की शिक्षा का कितना प्रचार-प्रसार हुआ यह तो आयोजक ही जानें। लेकिन इस दौरान पैसा खूब जुटा और जुटाया गया। द टाईम्स ऑफ इंडिया ने सितंबर-2016 में ही खबर दी थी कि इस आयोजन पर लगभग 3,050 करोड़ रुपए खर्च किए जाने का अनुमान है। और गौर करने की बात है कि एसएसएसटी ने यह पूरी रकम अपने खजाने से खर्च नहीं की है। इसके लिए उसने महाराष्ट्र सरकार से मदद ली है और ‘भक्तों’ से खुले हाथों दान करने की अपील की है।
इसीलिए ये विरोधाभासी तथ्य हैरान भी करते हैं क्योंकि जिन सांईं ने अपने हाथ से पीसे आटे का भी संग्रह नहीं किया उन्हीं के नाम की आड़ में अब इतने बड़े पैमाने पर धन जुटाए जाने का प्रयास जारी है। वह भी तब जबकि मंदिर के पास अथाह संपदा स्वाभाविक रूप से आ रही है। सिर्फ यही नहीं, सांई बाबा की भक्ति के नाम पर ऐसा और भी बहुत कुछ हो रहा है जो उनकी शिक्षाओं के उलट दिखता है।
सांई फकीर थे लेकिन उनका मंदिर अरबों का मालिक है
पूरी जिंदगी फकीरी में गुजार देने वाले साई का मंदिर देश के उन चुनिंदा तीन-चार धर्मस्थलों में शुमार होता है, जहां सालाना सैकड़ों करोड़ रुपए का चढ़ावा आता है। फ्री-प्रेस जर्नल की एक खबर के मुताबिक 2016 में 18 से 20 जुलाई तक ही शिरडी साई मंदिर में गुरु पूर्णिमा के आयोजन के दौरान 3.50 करोड़ रुपए का दान और चढ़ावा इकट्ठा हुआ। दिसंबर-2017 के आखिरी चार दिनों में श्रद्धालुओं ने मंदिर की झोली में करीब साढ़े पांच करोड़ रुपए डाल दिए और 2018 में गुरु पूर्णिमा पर 6.66 करोड़ रुपए आए। इतना ही नहीं एसएसएसटी की मुख्य कार्याधिकारी रूबल अग्रवाल के हवाले से खबरों में यह भी आ चुका है कि मंदिर के कोषागार में 425 किलोग्राम सोना और 4,800 किलोग्राम चांदी भी है। ट्रस्ट ने अलग-अलग राष्ट्रीयकृत बैंकों में 2,180 करोड़ रुपए का सावधि जमा (फिक्स्ड डिपॉजिट) भी किया है।
सो ऐसे में सवाल स्वाभाविक है कि अपने पास आ रहे इस अकूत पैसे का ट्रस्ट करता क्या है। इसका कुछ अंदाजा 2013-14 की उसकी अपनी ऑडिट रिपोर्ट से होता है। इसके मुताबिक कि उस वित्तीय वर्ष में आई कुल 347.27 करोड़ में से 188 करोड़ रुपए यानी करीब 54 फीसदी बैंक में संग्रहित कर दिए गए। बाकी 24.4 करोड़ रुपए का खर्च सडक़ और बस स्टैंड बनवाने जबकि 66.4 करोड़ रुपए का खर्च अन्य मदों में दिखाया गया। करीब 25 करोड़ रुपए महाराष्ट्र सरकार को बाढ़ राहत के लिए दिए गए। यह बात अलग है कि उस साल महाराष्ट्र में कोई बाढ़ नहीं आई थी। इसके अलावा 35.4 करोड़ रुपए कर्मचारियों की तनख्वाह पर खर्च हुए। आठ करोड़ रुपए का खर्च मंदिर पर हुआ। यानी संग्रह न करने की शिक्षा देने वाले साई के नाम पर आए पैसे का सबसे ज्यादा इस्तेमाल संग्रह में ही हुआ।
जहां अमीर-गरीब में फर्क नहीं था वहीं अब कुछ लोग वीआईपी होते है-
सांई सच्चरित्र में ही जिक्र है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में अमीर-गरीब में कभी कोई फर्क नहीं किया। बल्कि गरीबों को अमीरों से पहले और ज्यादा तवज्जो दी। लेकिन अब, जैसा कि श्री सांई निवास की वेबसाइट बताती है, ‘एसएसएसटी ने 2010 से भक्तों के लिए वीआईपी दर्शन का प्रबंध शुरू किया। पहले यह सुविधा शनिवार-रविवार को ही थी। अब पूरे हफ्ते मिलती है। वह भी बढ़ी हुई दरों के साथ।’ इस वेबसाईट पर वीआईपी दर्शन के शुल्क की दो श्रेणियां बताई गई हैं। एक-सुबह 4.30 होने वाली काकड़ आरती के लिए प्रतिव्यक्ति 500 रुपए। दूसरी- मध्यान्ह (दोपहर 12 बजे), धूप (सूर्यास्त के वक्त) और सेज (रात 10.30 पर) आरती के लिए प्रतिव्यक्ति 300 रुपए। इसके अलावा बताया जाता है कि सामान्य समय में भी 100 रुपए प्रतिव्यक्ति के हिसाब से शुल्क देकर लोग वीआईपी की तरह ‘उस फकीर’ के दर्शन कर सकते हैं।
हिंदू-मुस्लिम एकता की छीजती परंपरा
शिरडी में सांई जिस मस्जिद में रहते थे, उसे उन्होंने ‘द्वारकामयी’ नाम दिया था। कहने की जरूरत नहीं कि यह नाम श्रीकृष्ण की द्वारका से ही लिया गया होगा ताकि ‘मस्जिद’ से हिंदुओं को और ‘द्वारका’ से मुस्लिमों को भाईचारे का संदेश मिलता रहे। यही वजह है कि हिंदू-मुस्लिम एकता सांई बाबा की भक्ति परंपरा का अभिन्न हिस्सा रही है।
लेकिन कुछ समय से यह हिस्सा लगातार छीजता गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक दशक के भीतर देश भर में अस्सी हजार के करीब ‘सांई मंदिर’ अस्तित्व में आ चुके हैं। उनमें भी करोड़ों रुपए का चढ़ावा आ रहा है। शिरडी के इतर देश के दूसरे हिस्सों में साई मंदिरों के विस्तार के साथ-साथ उनकी पूजा पद्धतियों में भी धीरे-धीरे बदलाव आता गया है। उनकी पूजा-अर्चना का पूरी तरह से हिंदूकरण हो गया है। यही वजह है कि साई भक्तों में मुसलमानों की संख्या तेजी से घटी है।
कुछ समय पहले एक साक्षात्कार में एसएसएसटी के तत्कालीन चेयरमैन जयंत सासने ने यह बात मानी थी। हालांकि उनका कहना था कि मुसलमान साई से इसलिए दूर हुए हैं क्योंकि उन्हें साई की मूर्ति से परेशानी होती है जो इस्लाम की मूल धारणा के खिलाफ है। वैसे कुछ साल पहले ही खबर यह भी आई थी कि साई संस्थान ट्रस्ट ने इस संकट को देखते हुए अपनी वेबसाइट पर देश के दूसरे हिस्सों में स्थित साई मंदिरों के पुजारियों के लिए 15 दिन की ट्रेनिंग की व्यवस्था की है ताकि पूजा-पद्धति में आते जा रहे भटकाव को रोका जा सके।
हालांकि एसएसएसटी से जुड़े शैलेष कुटे साई स्थल को हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक अब भी मानते हैं। उनके मुताबिक शिरडी साई मंदिर देश में इकलौता ऐसा धार्मिक स्थल है जहां हर साल रामनवमी और उर्स, दोनों का आयोजन होता है। वे कहते हैं, ‘यहां आज भी रोज सुबह 10 बजे की आरती में मुस्लिम शामिल होते हैं और साई की समाधि पर फूलों की चादर चढ़ाते हैं।’
शैलेष की बात अपनी जगह सही हो सकती है। लेकिन वे जिस ट्रस्ट के सदस्य हैं उसके सब काम भी सही हैं, इस पर कइयों को संशय होने लगा है जो दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। (satyagrah.scroll.in)
कृष्ण कांत
ये विचित्र देश है। जिस वक्त बुजुर्गों की पेंशन छीन ली गई, उस दौर में एक ढाबे वाले बाबा को ट्रेंड कराकर लोग उनकी मदद करना चाह रहे हैं। लेकिन ये कोई नहीं पूछता कि बुजुर्गों को पेंशन क्यों नहीं दी जाती ताकि वे अपना बुढ़ापा आराम से काट सकें।
जिन बुजुर्गों की मदद के लिए फोटो वायरल कराई जा रही है, क्या इन्हें वृद्धावस्था पेंशन मिलती है?
क्या आपको पता है कि 2004 में सरकारी कर्मचारियों को पेंशन की व्यवस्था खत्म कर दी गई और नेशनल पेंशन स्कीम लाई गई जो एक तरह की बीमा योजना है? इसमें आप जितना पैसा निवेश करेंगे, वही बुढ़ापे में आपको पेंशन के रूप में मिलेगा।
क्या आपको पता है कि एम्प्लॉय पेंशन स्कीम यानी श्वक्कस्-1995 के तहत आने वाले रिटायर्ड कर्मचारियों से भारत सरकार मुकदमा लड़ रही है ताकि उन्हें पेंशन न देना पड़े?
श्वक्कस् पेंशनर्स अपनी पेंशन के लिए सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और केंद्र से गुहार लगा चुके हैं, पीएम को कई बार पत्र लिख चुके हैं, सुप्रीम कोर्ट से काफी पहले फैसला आ चुका, लेकिन सरकार ने अमल नहीं किया। मजे की बात है कि सरकार अपने देश के ही बुजुर्गों को पेंशन देने की जगह उनसे मुकदमा लड़ रही है।
क्या आपको मालूम है कि कई महीनों तक रिटायर्ड सेना के जवान जंतर-मंतर पर महीनों तक धरना देते रहे, लाठी खाते रहे और उनसे किया गया ‘वन रैंक वन पेंशन’ का वादा पूरा नहीं किया गया। रिटायर्ड जवानों ने आरोप लगाया कि मोदी ने पूर्व सैनिकों को वन रैंक वन पेंशन का आश्वासन दिया था, लेकिन ओआरओपी की परिभाषा को बदलकर पूर्व सैनिकों को गुमराह किया।
क्या आपको पता है कि जीवन भर सरकारी नौकरी के जरिये देश की सेवा करने वालों का बुढ़ापा का सहारा छीन लिया गया है?
क्या आपको पता है कि देश भर में रिटायर्ड कर्मचारियों के अलग अलग संगठन पेंशन बहाल करने की मांग कर रहे हैं और अलग अलग अदालतों में मुकदमे चल रहे हैं?
देश का हर व्यक्ति जो भी काम करता है, वह देश की सेवा कर रहा होता है. चाहे वह सेना में अधिकारी हो, चाहे अध्यापक हो, चाहे एमएनसी में हो, चाहे नगरनिगम हो, हर व्यक्ति देश की सेवा करता है. जो व्यक्ति अपना जीवन सरकारी सेवाओं में खर्च कर दे, सरकार बुढ़ापे में उसका आर्थिक सहारा छीन रही है. हम आप कितने लोगों के ठेले पर खाना खाकर उनकी रोजी चलाएंगे?
क्या आपको ये सवाल कचोटता है कि जिसने 60 बरस तक देश की सेवा की, उसे बुढ़ापे में बेसहारा क्यों किया जा रहा है? क्या आपने इस बारे में कभी सवाल पूछा है?
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
देश के 34 फिल्म-निर्माता संगठनों ने दो टीवी चैनलों और बेलगाम सोशल मीडिया के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में मुकदमा ठोक दिया है। इन संगठनों में फिल्मी जगत के लगभग सभी सर्वश्रेष्ठ कलाकार जुड़े हुए हैं। इतने कलाकारों का यह कदम अभूतपूर्व है। वे गुस्से में हैं। कलाकार तो खुद अभिव्यक्ति की आजादी के अलम बरदार होते हैं। लेकिन सुशांत राजपूत के मामले को लेकर भारत के कुछ टीवी चैनलों ने इतना ज्यादा हो-हल्ला मचाया कि वे अपनी मर्यादा ही भूल गए। उन्होंने देश के करोड़ों लोगों को कोरोना के इस संकट-काल में मदद करने, मार्गदर्शन देने और रास्ता दिखाने की बजाय एक फर्जी जाल में रोज़ घंटों फंसाए रखा।
सुशांत ने आत्महत्या नहीं की बल्कि उसकी हत्या की गई है, इस मनगढ़त कहानी को लोक-लुभावन बनाने के लिए इन टीवी चैनलों ने क्या-क्या स्वांग नहीं रचाए ? इन्होंने सुशांत के कई साथियों और परिचितों पर उसे ज़हर देने, उसे नशीले पदार्थ खिलाने, उसके बैंक खाते से करोड़ों रु. उड़ाने और उसकी रंगरलियों के कई रसीले किस्से गढ़ लिए। यह सारा मामला इतना उबाऊ हो गया था कि आम दर्शक सुशांत का नाम आते ही टीवी बंद करने लगा था। इन बेबुनियाद फर्जी किस्सों के कारण उस दिवंगत कलाकार की इज्जत तो पैंदे में बैठी ही, फिल्मी जगत भी पूरी तरह बदनाम हो गया। यह ठीक है कि फिल्मी जगत में भी कमोबेश वे सब दोष होंगे, जो अन्य क्षेत्रों में पाए जाते हैं लेकिन इन चैनलों ने ऐसा खाका खींच दिया जैसे कि हमारा बॉलीवुड नशाखोरी, व्यभिचार, ठगी, दादागीरी और अपराधों का अड्डा हो। सच्चाई तो यह है कि फिल्मी जगत पर जैसी सेंसरशिप है, किसी क्षेत्र में नहीं है। इसीलिए भारतीय फिल्में राष्ट्र निर्माण में बेजोड़ भूमिका अदा करती हैं। मुंबई के कलाकार मजहब, जाति और भाषा की दीवारों को फिल्मों में ही नहीं लांघते, अपने व्यक्तिगत जीवन में भी जीकर दिखाते हैं। सुशांत-प्रकरण में हमारे टीवी चैनलों ने अपनी दर्शक-संख्या (टीआरपी) बढ़ाने और विज्ञापनों से पैसा कमाने में जिस धूर्ततता का प्रयोग किया है, वह उनकी इज्जत को पैंदे में बिठा रही है। यह ठीक है कि जिन नेताओं और पार्टी प्रवक्ताओं को अपना प्रचार प्रिय है, वे इन चैनलों की इस बेशर्मी को बर्दाश्त कर सकते हैं लेकिन देश में मेरे-जैसे लोग भी हैं, जो इन चैनलों के बेलगाम एंकरों को ऐसी ठोक लगाते हैं कि वे जिंदगी भर उसे याद रखेंगे। देश के कुछ टीवी चैनलों का आचरण बहुत मर्यादित और उत्तम है लेकिन सभी चैनलों पर 1994 के ‘केबल टेलिविजन नेटवर्क रुल्स’ सख्ती से लागू किए जाने चाहिए। उनको अभिव्यक्ति की पूरी आजादी रहे लेकिन यह देखना भी सरकार की जिम्मेदारी है कि कोई चैनल लक्ष्मण-रेखा का उल्लंघन न कर पाए और करे तो वह उसकी सजा भुगते।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-चारु कार्तिकेय
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में जो ताजा अनुमान आया है उससे अर्थव्यवस्था के कोरोना वायरस महामारी के असर से जल्द बाहर निकलने की उम्मीदों पर पानी फिर गया है.
हालांकि आईएमएफ के अनुमान को अगर सटीक भी माना जाए तो भी तस्वीर चिंताजनक ही है. आईएमएफ के अनुसार इस वित्त वर्ष में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 10.3 प्रतिशत गिरेगी. संस्था ने खुद जून में सिर्फ 4.5 प्रतिशत गिरावट की बात की थी, लेकिन उसने अब अपना अनुमान और नीचे कर दिया है. यही नहीं, उसने यह भी कहा है कि 10.3 प्रतिशत की गिरावट के बाद प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में भारत बांग्लादेश से भी पीछे हो जाएगा.
चालू वित्त वर्ष के अंत तक मार्च 2021 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी गिर कर 1,877 डॉलर पर पहुंच जाएगी, जब की बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी में बढ़ोतरी होगी और वो 1,888 डॉलर पर पहुंच जाएगी. आईएमएफ के अनुसार दक्षिण एशिया में श्रीलंका के बाद भारत ही सबसे बुरी तरह से प्रभावित अर्थव्यवस्था होने जा रहा है. जानकारों ने इन आंकड़ों पर चिंता जताई है.
विश्व बैंक के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री कौशिक बासु ने ट्विटर पर लिखा कि यह आंकड़े चौंकाने वाले हैं क्योंकि पांच साल पहले भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी बांग्लादेश से 25 प्रतिशत ज्यादा थी.
लेकिन कई जानकार यह सवाल उठा रहे हैं कि ये आंकड़े भी कितने सटीक हैं? नई दिल्ली के इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में चेयर प्रोफेसर अरुण कुमार ने डीडब्लू को बताया कि आईएमएफ इस तरह का डाटा खुद इकठ्ठा नहीं करता है बल्कि सरकारों से लेता है, इसलिए उसके आंकड़े मोटे तौर पर सरकारों की अपनी समीक्षा के अनुरूप ही होते हैं.
अरुण कुमार ने बताया कि इस वजह से इन आंकड़ों और असली स्थिति में बहुत बड़ा फर्क होने की संभावना है क्योंकि सरकार के पास भी पूरी जानकारी नहीं है.उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया कि सरकार के पास भारत के विशाल असंगठित क्षेत्र का कोई डाटा नहीं है और उत्पादन क्षेत्र की बड़ी कंपनियों और कृषि क्षेत्र का भी डाटा अभी तक नहीं आया है.
केंद्र सरकार ने कहा था कि अप्रैल से जून के बीच की तिमाही में भारत की जीडीपी 23.9 फीसदी गिर गई थी, लेकिन अरुण कुमार कहते हैं कि अगर सरकार के गणित से गायब इन आंकड़ों को भी हिसाब में लें तो इसी अवधि में जीडीपी में असली गिरावट 40 से 50 प्रतिशत के बीच है. उनका आकलन है कि पूरे वित्त वर्ष में जीडीपी 10 नहीं, 20 भी नहीं बल्कि 30 प्रतिशत के आस पास गिरेगी.
अर्थव्यवस्था अभी भी फिर से अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पाई है. विमानन, हॉस्पिटैलिटी, पर्यटन, व्यापार जैसे सभी बड़े क्षेत्र अभी तक मंदी से गुजर रहे हैं. भारत की तस्वीर विशेष रूप से दयनीय इसलिए भी है क्योंकि दूसरे किसी भी देश में इतना बड़ा असंगठित क्षेत्र नहीं है. महामारी के दौरान नौकरियां तो पूरी दुनिया में गईं लेकिन करोड़ों लोगों का शहरों से गांव की तरफ वैसा पलायन और कहीं देखने को नहीं मिला जैसा भारत में मिला.
एक आकलन के अनुसार सिर्फ अप्रैल में ही करीब 20 करोड़ लोगों का रोजगार छीन गया और उनमें से अधिकतर को अभी तक दोबारा रोजगार नहीं मिला है. रोजगार का आकलन करने वाली निजी संस्था सीएमआईई के मुताबिक संगठित क्षेत्र में भी कम से कम 1.70 करोड़ लोगों की नौकरियां गईं. जब तक इन लोगों को रोजगार वापस नहीं मिलता, तक इस स्थिति में सुधार की गुंजाइश नहीं है. (DW)
जीनोम का अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं ने पाया कि दूध उत्पादन, आवरण का रंग, शरीर का आकार और रोग प्रतिरोध सहित, प्रजातियों के प्रमुख लक्षणों में सुधार किया जा सकता है।
- Dayanidhi
घरेलू भैंस (बुबलस बुबलिस) जो अधिकतर पानी में रहना पसंद करती हैं, इसलिए इन्हें पानी की भैंसे भी कहा जाता है। भैंस भारतीय उपमहाद्वीप में दूध का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। एशिया में खासकर भारत के छोटे किसान किसी अन्य पालतू प्रजातियों की तुलना में भैंसों पर अधिक निर्भर हैं। भैंस के दूध की मात्रा गाय के दूध की तुलना में दोगुनी होती है।
अब एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि जीनोमिक्स की मदद से भैंसों और मवेशियों की चयनात्मक प्रजनन में सुधार करके दूध में बढ़ोतरी और दूध की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा, पोषण और भैंस कें को पालने वालों की आय में सुधार होगा।
यह कई तरह की पानी की भैंसों के जीनोम की जांच करने वाला पहला अध्ययन है। जीनोम एक जानवर या जीव का डीएनए का पूरा समूह होता है। यह अध्ययन द रोसलिन इंस्टीट्यूट, यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग, यूके द्वारा एशिया और अफ्रीका के सहयोगियों के साथ मिलकर किया गया है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि दूध उत्पादन, आवरण का रंग, शरीर का आकार और रोग प्रतिरोध सहित, प्रजातियों के प्रमुख लक्षणों में सुधार किया जा सकता है। उनके जीनोम में इन सब का पता लगाने योग्य संकेतों को छोड़ दिया जाता है। यह चयनात्मक प्रजनन के माध्यम से छोटे पशुपालकों के लिए बेहतर कृषि, पशु स्वास्थ्य और उत्पादन का मार्ग दिखाता है।
रोजलिन इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता प्रसून दत्ता ने कहा अब हम महत्वपूर्ण जीनोम की जगह (लोकी) को जानते हैं जो महत्वपूर्ण लक्षणों से जुड़े हुए हैं। स्थानीय किसानों के लिए अधिक उत्पादक नस्लों को विकसित करने हेतु, मार्कर-असिस्टेड ब्रीडिंग योजना बनाना आसान होगा। लोकी या लोकस आनुवांशिकी में, एक स्थान एक गुणसूत्र पर एक विशिष्ट, निश्चित स्थिति है जहां एक विशेष जीन स्थित रहता है।
हमने भैंस की नस्लों के बीच देखी गई दूध की वसा सामग्री में अंतर से जुड़े एक जीनोमिक क्षेत्र की पहचान की है। दत्ता कहते हैं कि यह जानते हुए कि, इस विशेष स्थान (लोकस) को ध्यान में रखते हुए बेहतर दूध वसा सामग्री के साथ नस्लों को विकसित करना आसान होना चाहिए।
शोधकर्ताओं ने सात भारतीय नस्लों के 79 पानी की भैंसों के जीनोम की तुलना 294 घरेलू मवेशियों (बोस टौरस टौरस, बोस टौरस इंडिकस) के जीनोम से की। ये एशिया, अफ्रीका और यूरोप सहित दुनिया भर की 13 नस्लों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अध्ययन नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित किया गया है।
अध्ययन से पता चलता है कि एक प्रजाति में वांछित लक्षणों से जुड़े कार्य-संबंधी अंतर को अन्य प्रजातियों में डाला जा सकता है। इन निष्कर्षों में जीनोमिक दृष्टिकोण का उपयोग करके न केवल भैंस प्रजनन के बेहतर कार्यक्रमों में तेजी लाई जा सकती है, बल्कि कुछ चुनिंदा विभिन्न तरह के पालतू प्रजातियों में इसका प्रयोग किया जा सकता है।
जेम्स प्रेंडरगैस्ट ने कहा जीन जो शरीर के आकार से दृढ़ता से जुड़े हुए हैं, लगता है कि यह प्रजातियों को पालतू बनाकर पूरा किया गया है। मवेशियों की नस्लों के बीच सबसे बड़ा अंतर दिखाने वाले जीनोमिक स्थानों को अक्सर शरीर के आकार से जोड़ा गया है। जिनमें उनका रंग और दूध की विशेषता से जुड़े स्थान (लोकी) को पानी की भैंसों के विश्लेषण में देखा गया था। जेम्स प्रेंडरगैस्ट अध्ययनकर्ता और ट्रॉपिकल पशुधन आनुवंशिकी और स्वास्थ्य केंद्र में वरिष्ठ शोधकर्ता हैं।
प्रेंडरगैस्ट कहते है जर्मन शेफर्ड कुत्तों में काले रंग का आवरण डीएनए में परिवर्तन करके बनता है। यही चीज कुछ पानी की भैंसों में पाया गया था, जिसे आवरण के रंग के लिए चुना गया है।
2017 के खाद्य और कृषि संगठन के सांख्यिकीय डेटाबेस के अनुसार, दक्षिण एशिया में दुनिया की 20 करोड़ (200 मिलियन) पानी की भैंसों में से अधिकांश यहां रहती हैं। नदी की भैंस मुख्य रूप से भारत में और पूर्वी एशिया में दलदल में रहने वाली भैंस पाई जाती है। आयात और प्रवासन ने पानी कि भैंस को मध्य पूर्व और भूमध्यसागरीय देशों में दूध उत्पादन का एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक स्रोत बना दिया है।
मेलबोर्न विश्वविद्यालय के पशु चिकित्सा और कृषि विज्ञान के फैकल्टी सुरिंदर सिंह चौहान ने कहा यह शोध भारतीय नदी की भैंसों की आबादी के भीतर व्यापक आनुवंशिक विविधता को उजागर करता है। भविष्य के जीनोमिक चयन के लिए एक आधार प्रदान करता है जो उत्पादकों को कम उम्र में अधिक उत्पादक जानवरों का चयन करने और आनुवंशिक लाभ की दर में तेजी लाने के लिए अधिक सटीकता के साथ मदद कर सकता है।
चौहान कहते हैं एशियाई देशों के लिए सबसे बड़ी चुनौती अनुत्पादक मवेशियों की बढ़ती संख्या और भोजन की बढ़ती मांग है। यह शोध भविष्य में टिकाऊ, कुशल और बेहतर उत्पादन के लिए पानी की भैंसों के जीनोमिक चयन की संभावनाओं पर प्रकाश डालता है, जो संसाधनों पर बोझ को कम करेगा और स्थिरता को बढ़ावा देगा।(downtoearth)
कोविड-19 महामारी ने दुनिया भर में मानव जीवन को नुकसान पहुंचाया है और सार्वजनिक स्वास्थ्य, खाद्य प्रणालियों और काम की दुनिया में एक अभूतपूर्व चुनौती पेश की है।
- Dayanidhi
आईएलओ, एफएओ, आईएफएडी और डब्ल्यूएचओ द्वारा दिए गए एक संयुक्त वक्तव्य में कहा गया कि, हमें संयुक्त राष्ट्र महासचिव द्वारा जारी नीति विवरण (पालिसी ब्रीफ) को समझना चाहिए और इस कोरोनाकाल में इसे सही ढ़ग से लागू करना चाहिए।
कोविड-19 महामारी ने दुनिया भर में मानव जीवन को नुकसान पहुंचाया है और सार्वजनिक स्वास्थ्य, खाद्य प्रणालियों और काम की दुनिया में एक अभूतपूर्व चुनौती पेश की है। महामारी से उत्पन्न आर्थिक और सामाजिक व्यवधान विनाशकारी है। करोड़ों लोगों के अत्यधिक गरीबी के चरम स्तर में पहुंचने का खतरा है, जबकि कुपोषित लोगों की संख्या, वर्तमान में लगभग 69 करोड़ (690 मिलियन) है, जो वर्ष के अंत तक 13.2 करोड़ (132 मिलियन) तक और अधिक बढ़ सकती हैं।
लाखों उपक्रम अस्तित्व के खतरे का सामना कर रहे हैं। दुनिया के 330 करोड़ (3.3 बिलियन) लोगों को अपनी आजीविका खोने का खतरा है। अनौपचारिक (इनफॉर्मल) अर्थव्यवस्था के कार्यकर्ता विशेष रूप से कमजोर होते हैं, क्योंकि इनकी सामाजिक सुरक्षा और गुणवत्ता वाले स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच में बहुत कमी होती है। लॉकडाउन के दौरान आय अर्जित करने के साधनों के बिना, कई लोग खुद को और अपने परिवार को खिलाने में असमर्थ थे।
महामारी पूरे भोजन प्रणाली को प्रभावित कर रही है। लॉकडाउन के दौरान तथा कुछ जगहों पर अभी भी सीमाएं बंद होने से, व्यापार में प्रतिबंध और रोक लगने के कारण किसानों को बाजार तक पहुंचने से रोक रहे हैं, जिससे वे अपनी उपज बेचने में असमर्थ थे। कृषि श्रमिकों को फसलों की कटाई करने से रोका गया था। इस प्रकार महामारी ने घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित किया और स्वस्थ, सुरक्षित और विविध आहारों तक पहुंच को कम कर दिया है। महामारी ने नौकरियों को कम कर दिया है और लाखों की आजीविका को खतरे में डाल दिया है। जैसा कि कमाने वाले रोजगार खो रहे हैं, बीमार पड़ जाते हैं और मर भी जाते हैं। लाखों महिलाओं और पुरुषों की खाद्य सुरक्षा और पोषण खतरे में है। कम आय वाले देशों में, विशेष रूप से सबसे अधिक हाशिए की आबादी, जिसमें छोटे पैमाने पर किसान और देशी लोग शामिल हैं, उन्हें सबसे तगड़ा झटका लगा है।
लाखों कृषि श्रमिक, स्वरोजगार करने वाले कुपोषण और खराब स्वास्थ्य का सामना कर रहे हैं। कम और अनियमित आय और सामाजिक समर्थन की कमी के साथ, उनमें से कई को काम करना जारी रखने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसके अलावा, जब लोगों को आय में कमी का सामना करना पड़ता है, तो वे गलत रणनीतियों का सहारा ले सकते हैं, जैसे कि संपत्ति की बिक्री, लूट-पाट करना, बाल श्रम आदि। प्रवासी कृषि श्रमिक विशेष रूप से कमजोर हैं, क्योंकि वे काम करने और रहने की स्थिति में अधिक खतरे का सामना करते हैं। ये लोग सरकारों द्वारा किए जा रहे उपायों तक पहुंचने के लिए संघर्ष करते हैं। सभी कृषि-खाद्य श्रमिकों की सुरक्षा और स्वास्थ्य की गारंटी देना, प्राथमिक उत्पादकों से लेकर खाद्य प्रसंस्करण, परिवहन और खुदरा क्षेत्र से जुड़े लोगों तक, जिनमें स्ट्रीट फूड विक्रेता शामिल हैं - साथ ही बेहतर आय और संरक्षण, जीवन बचाने और सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा देना जरूरी है।
मौजूदा आपात स्थिति से निपटने वाले देश विशेष रूप से कोविड-19 के प्रभावों से अवगत हैं। महामारी के दौर में तेजी से प्रतिक्रिया करते हुए, यह सुनिश्चित करना कि लोगों तक सहायता पहुंचे। अब वैश्विक एकजुटता और समर्थन का समय है, विशेष रूप से उभरती और विकासशील दुनिया में सबसे कमजोर का साथ देना आवश्यक है।
हमें स्वास्थ्य और कृषि-खाद्य क्षेत्रों की चुनौतियों का सामना करने के लिए दीर्घकालिक स्थायी रणनीति विकसित करने की आवश्यकता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अधिक और बेहतर नौकरियों के माध्यम से, सभी को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना, सुरक्षित प्रवास मार्गों को सुविधाजनक बनाना और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना जरूरी है।
हमें अपने पर्यावरण के भविष्य पर पुनर्विचार करना चाहिए और तुरंत जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय गिरावट से निपटना चाहिए। तभी हम सभी लोगों के स्वास्थ्य, आजीविका, खाद्य सुरक्षा और पोषण की रक्षा कर सकते हैं।(downtoearth)
जलवायु परिवर्तन के कारण हर वर्ष आपदाओं में 60 हजार लोग जान गंवा रहे हैं। साथ ही दो दशकों में जलवायु संबंधी आपदाओं में दोगुनी बढ़ोत्तरी हुई है।
- Richard Mahapatra
आपदा जोखिम को कम करने वाले संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के कार्यालय (यूएनडीआरआर) की आपदाओं पर केंद्रित ताजा रिपोर्ट ने स्पष्ट चेतावनी दे रही है कि जलवायु परिवर्तन अब बेलगाम है। ह्यूमन कास्ट ऑफ डिजास्टर्स 2000-2019 रिपोर्ट में कहा गया है कि "बारिश की बदलती हुई प्रवृत्ति और अनिश्चितता ने खेती पर वर्षा पर निर्भर रहने वाली 70 फीसदी वैश्विक कृषि और इससे जुड़े 1.3 अरब लोगों को खतरे में डाल दिया है।"
वर्षा आधारित खेती-किसानी वैश्वकि खाद्य उत्पादन में बड़ी भूमिका निभाती है। साथ ही कृषि पर आधारित एक बड़े गरीब तबके की आजीविका बनती है जिससे उनका जीवन यापन संभव होता है। वर्षा आधारित खेती में खेती लायक 95 फीसदी जमीने उप-सहारा अफ्रीका में मौजूद हैं। वहीं, 90 फीसदी लैटिन अमेरिका और 75 फीसदी पूर्व और उत्तरी अफ्रीका साथ ही 65 फीसदी पूर्वी एशिया और 60 फीसदी दक्षिण एशिया में वर्षा आधारित खेती की जमीनें मौजूद हैं।
कृषि मंत्रालय के मुताबिक भारत में 51 फीसदी बुआई क्षेत्र वर्षा पर आधारित है और इस क्षेत्र से देश का करीब 40 फीसदी अनाज उत्पादन होता है।
यूएनडीआरआर की रिपोर्ट कहती है कि 2000 से 2019 के बीच, जलवायु संबंधी आपदाओं ने दुनिया भर में कुल 3.9 अरब लोगों को प्रभावित किया जिसमें 5 लाख (0.51 मिलियन) से अधिक लोगों की मौत हुई। पिछले दो दशकों में जलवायु से संबंधित आपदाएं दोगुनी हो गई हैं। 1980-1999 में 3,656 आपदाएं दर्ज हुई थीं जो 2000-2019 में बढ़कर 6,681 हो गई हैं। वर्ष 2000 से 2019 के बीच चीन और भारत के 2 अरब से अधिक लोग आपदा प्रभावित हुए। यह संख्या वैश्विक आबादी का लगभग 70 फीसदी है। पिछले दो दशकों में आपदाओं ने हर साल 20 करोड़ (200 मिलियन) लोगों को प्रभावित किया है।
बेल्जियम की यूनिवर्सिटी ऑफ लौवेन में सेंटर फॉर रिसर्च ऑन द एपिडेमियोलॉजी ऑफ डिजास्टर्स की प्रोफेसर देबब्रती गुहा-सपिर इस रिपोर्ट के लिए यूएनडीआरआर के साथ साझेदार हैं। उनका कहना है, "यदि चरम मौसमी घटनाओं में वृद्धि का यह स्तर अगले बीस वर्षों तक इसी तरह जारी रहता है तो मानव जाति का भविष्य वास्तव में बहुत अंधकारमय है।"
वर्षा आधारित खेती से जुड़ी आपदाओं के लिए सूखा एक दूसरा सबसे बड़ा कारण है। इस आपदा के कारण प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या के मामले में यह दूसरा सबसे प्रभावशाली प्रकार है।
यह कुल आपदा घटनाओं का सिर्फ 5 प्रतिशत है। लेकिन इसने 2009-19 में 1.4 अरब लोगों को प्रभावित किया। पिछले दो दशकों में अफ्रीका सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ था। 2009-19 के कुल वैश्विक सूखे में इसका 40 फीसदी हिस्सा था। रिपोर्ट में कहा गया है, "सूखा भूख, गरीबी और अल्प-विकास के मामले में लगने वाला उच्च मानव टोल की तरह है।"
यह व्यापक कृषि विफलताओं, पशुधन की हानि, पानी की कमी और महामारी के रोगों के प्रकोप से जुड़ा है। यदि सूखा कुछ वर्षों तक रहता है तो इसका व्यापक और दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव पड़ता है, साथ ही साथ यह जनसंख्या के बड़े हिस्से को विस्थापित भी करता है।(downtoearth)
- महेश झा
फिनलैंड की प्रधानमंत्री सना मारीन ने फैशन पत्रिका के लिए तस्वीरें क्या खिंचवाई उनके पेशेवर बर्ताव पर सोशल मीडिया में बहस छिड़ गई. उनकी शुरू में तो आलोचना हुई फिर समर्थक भी खड़े हो गए. कैसी तस्वीर खिंचवाई प्रधानमंत्री ने?
तस्वीर में प्रधानमंत्री को लो कट ब्लेजर पहने और ज्वेलरी के साथ दिखाया गया है. तस्वीर के सामने आने के बाद आलोचकों का कहना है कि पोशाक शरीर का प्रदर्शन करने वाली है और उनकी हैसियत की महिला के लिए पेशेवर अंदाज वाली नहीं है.
सना मारीन 34 साल की हैं और 10 दिसंबर 2019 से देश की प्रधानमंत्री हैं. वे 2015 से देश की संसद में सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी की सदस्य हैं और प्रधानमंत्री बनने से पहले करीब छह महीने परिवहन और संचार मंत्री रह चुकी हैं. 34 साल की उम्र में वे दुनिया की तीसरी सबसे कमउम्र वाली सरकार प्रमुख हैं. वे फिनलैंड की अब तक की सबसे युवा प्रधानमंत्री हैं और दुनिया की अब तक की सबसे कमउम्र महीला सरकार प्रमुख भी.
फैशन पत्रिका में उनकी तस्वीरों पर हुई भारी आलोचना के बाद सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के लिए समर्थन की बाढ़ आ गई. उन्होंने #iamwithsanna के साथ प्रधानमंत्री के समर्थन में पोस्ट किए. उसके बाद बहुत से पुरुषों और महिलाओं ने उसी तरह की ब्लेजर पहने अपनी तस्वीरें पोस्ट कीं.
#iamwithsanna https://t.co/Bdu9jvw2Bw
— Pirkko pitää maskia (@PirkkoPiirainen) October 12, 2020
मारीन के समर्थकों का कहना है कि महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कहीं ज्यादा उनके पहनावे के आधार पर देखा जाता है. उन्होंने रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन का हवाला दिया है जिनकी टॉपलेस तस्वीरें आती रही हैं. पुरुष राजनीतिज्ञों की इसी तरह की कुछ और तस्वीरों के हवाले से कहा गया है कि उनके व्यवहार को गैरपेशेवराना नहीं कहा गया था.
अभी इसी साल अगस्त में प्रधानमंत्री ने की है शादी
इसी महीने 16 वर्षीया आवा मूर्तो ने संयुक्त राष्ट्र के गर्ल्स टेकओवर प्रोग्राम के तहत एक दिन के लिए फिलनैंड की प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली थी. दक्षिण फिनलैंड के एक छोटे से गांव से आने वाली मूर्तो ने प्रधानमंत्री के साथ कैबिनेट सदस्यों और सांसदों से बातचीत की.
Tänään vietetään YK:n kansainvälistä tyttöjen päivää.
— Valtioneuvosto | Statsrådet (@valtioneuvosto) October 11, 2020
Suomi haluaa edistää teknologian tasa-arvoa. On tärkeää, että tytöt pääsevät käyttämään ja kehittämään teknologiaa globaalisti myös kehittyvissä maissa.#tyttöjenpäivä #tyttöjenpuolella #GirlsTakeover pic.twitter.com/gaMIlinOYp
मूर्तो और मारीन ने इस बात पर भी चर्चा की 55 लाख की आबादी वाला तकनीकी रूप से अगुआ फिनलैंड लड़कियों के लिए ज्यादा मौके उपलब्ध कराने के लिए क्या कर सकता है. दोनों प्रधानमंत्रियों ने लैंगिक बराबरी पर भी बातचीत की और कहा कि इंटरनेट पर लड़कियों को परेशान करना दुनिया भर में प्रमुख मुद्दा रहेगा.
सना मारीन की यह तस्वीर पिछले हफ्ते फैशन पत्रिका ट्रेंडी के इंटाग्राम पेज पर छपी थी. पत्रिका को दिए गए एक इंटरव्यू में सना मारीन ने दबाव और थकान की बात की थी और अपने काम के बारे में कहा था कि यह सामान्य नौकरी नहीं है, सामान्य जिंदगी भी नहीं है, बल्कि कई तरह से बहुत बोझ वाली है.(dw)
रिपोर्ट महेश झा


