विचार/लेख
-प्रमोद जोशी
सन 2020 में जब दुनिया को महामारी ने घेरा तो पता चला कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं अस्त-व्यस्त हैं। निजी क्षेत्र ने मौके का फायदा उठाना शुरू कर दिया। यह केवल भारत या दूसरे विकासशील देशों की कहानी नहीं है। ब्रिटेन और अमेरिका जैसे धनवान देशों का अनुभव है।
कोविड-19 ने इनसान के सामने मुश्किल चुनौती खड़ी की है, जिसका जवाब खोजने में समय लगेगा। कोई नहीं कह सकता कि इस वायरस का जीवन-चक्र अब किस जगह पर और किस तरह से खत्म होगा। बेशक कई तरह की वैक्सीन सामने आ रहीं हैं, पर वैक्सीन इसका निर्णायक इलाज नहीं हैं। इस बात की गारंटी भी नहीं कि वैक्सीन के बाद संक्रमण नहीं होगा। यह भी पता नहीं कि उसका असर कितने समय तक रहेगा।
महामारी से सबसे बड़ा धक्का करोड़ों गरीबों को लगा है, जो प्रकोपों का पहला निशाना बनते हैं। अफसोस कि इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक की ओर देख रही दुनिया अपने भीतर की गैर-बराबरी और अन्याय को नहीं देख पा रही है। इस महामारी ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति दुनिया के पाखंड का पर्दाफाश किया है।
नए दौर की नई कहानी
सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर वैश्विक रणनीति का जिक्र अस्सी के दशक में शुरू हुआ था। फिर नब्बे के दशक में दुनिया ने पूंजी के वैश्वीकरण और वैश्विक व्यापार के नियमों को बनाना शुरू किया। इस प्रक्रिया के केंद्र में पूंजी और कारोबारी धारणाएं ही थीं। ऐसे में गरीबों की अनदेखी होती चली गई। हालांकि उस दौर में वैश्विक गरीबी समाप्त करने और उनकी खाद्य समस्या का समाधान करने के वायदे भी हुए थे, पर पिछले चार दशकों का अनुभव अच्छा नहीं रहा है।
पिछले चार दशकों में गरीब से गरीब देशों की सरकारों ने स्वास्थ्य सेवाओं को निजी क्षेत्र को सौंपने के चक्कर में अपने बजट कम कर दिए हैं। ऐसा अनायास नहीं हुआ, यह विश्व बैंक के निर्देशों के तहत हुआ है। सन 1978 में यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अल्मा-अता घोषणा की थी- सन् 2000 में सबके लिए स्वास्थ्य! यह वह दौर था, जब दुनिया नई वैश्विक अर्थव्यवस्था पर विचार कर रही थी।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1974 में अपने विशेष अधिवेशन में नई अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की घोषणा और कार्यक्रम का मसौदा पास किया। उत्तर के विकसित देशों ने इस बात को महसूस किया कि विकासशील देशों की उचित मांगों की अनदेखी करना गलत है। इसलिए उन्होंने आपसी विचार विमर्श की प्रक्रिया आरम्भ की जिसे उत्तर-दक्षिण संवाद कहा जाता है। अल्मा-अता घोषणा भी उसी प्रक्रिया का हिस्सा थी।
उस घोषणा में स्वास्थ्य को मानवाधिकार मानते हुए इस बात का वायदा किया गया था कि दुनिया की नई सामाजिक-आर्थिक संरचना में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की जिम्मेदारी सरकारें लेंगी। पर अगले दो वर्षों में वैश्विक विमर्श पर कॉरपोरेट रणनीतिकारों ने विजय प्राप्त कर ली और सन 1980 में विश्व बैंक ने स्वास्थ्य से जुड़े अपने पहले नीतिगत दस्तावेज में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की परिभाषा सीमित कर दी और वह चिकित्सा के स्थान पर निवारक (प्रिवेंटिव) गतिविधि भर रह गई। उस मोड़ से दुनिया में स्वास्थ्य सेवाओं के जबरदस्त निजीकरण की रेस शुरू हो गई।
अस्त-व्यस्त सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं
सन 2020 में जब दुनिया को महामारी ने घेरा तो हम पाते हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं अस्त- व्यस्त हैं। निजी क्षेत्र ने मौके का फायदा उठाना शुरू कर दिया। यह केवल भारत या दूसरे विकासशील देशों की कहानी नहीं है। फ्रांस, इटली, स्पेन, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे धनवान देशों का अनुभव है। अमेरिका के बारे में तो कहा जाता है कि लोग बीमारी से नहीं इलाज की कीमत से मरते हैं। इंश्योरेंस नहीं हो तो वहां इलाज कराना आसान नहीं है।
अब दो तरह की हैल्थ केयर कंपनियों का विस्तार हो रहा है। एक, जो हैल्थ सॉल्यूशंस बेचती हैं। जैसे कार्डिनल हैल्थ, जो अमेरिका में राजस्व के लिहाज से 14वें नंबर की कंपनी है। सन् 1971 में यह कंपनी खाद्य सामग्री के थोक विक्रेता के रूप में बनी थी। सन् 1979 में इसमें दवाओं का वितरण शुरू दिया। उसी दौरान स्वास्थ्य को लेकर वैश्विक रणनीति बदली और इस कंपनी ने औषधियों का डिस्ट्रीब्यूशन शुरू कर दिया। आज हैल्थ केयर इंडस्ट्री दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते कारोबारों में एक है। इसमें दवाओं और उपकरणों से लेकर अस्पताल और सहायक सामग्री का प्रबंधन सब शामिल है। दूसरी हैं बीमा कंपनियां। दोनों तरह की ग्लोबल कंपनियों के साथ अलग-अलग देशों की सहायक कंपनियों की चेन बन गई है।
नारा 'सबके लिए स्वास्थ्य' का, लेकिन हकीकत कुछ और
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 23 सितम्बर, 2019 को ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ विषय पर संयुक्त राष्ट्र महासभा की उच्च स्तरीय बैठक में कहा कि स्वास्थ्य का मतलब सिर्फ बीमारियों से मुक्त रहना नहीं है। स्वस्थ जीवन प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। इसे सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने भारत सरकार के उपायों का जिक्र किया। उस सभा में दुनिया के 160 देशों के नेताओं ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
उस वक्त कोई नहीं जानता था कि अगले कुछ महीनों में दुनिया की इस मामले में परीक्षा होने वाली है। उस उच्च स्तरीय बैठक का विषय था-‘सबके लिए स्वास्थ्य कवरेज: स्वस्थ विश्व के निर्माण के लिए सबके साथ आगे बढ़ना।’ लक्ष्य था सरकारों और राष्ट्र प्रमुखों से 2030 तक सबके लिए स्वास्थ्य कवरेज के लिए राजनीतिक प्रतिबद्धता सुनिश्चित कराना।
तेज आर्थिक विकास के बावजूद भारत में स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्च दुनिया के तमाम विकासशील देशों के मुकाबले कम है। इस खर्च में सरकार की हिस्सेदारी और भी कम है। चीन में स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति व्यय भारत के मुकाबले 5.6 गुना है तो अमेरिका में 125 गुना। औसत भारतीय अपने स्वास्थ्य पर जो खर्च करता है, उसका 62 फीसदी उसे अपनी जेब से देना पड़ता है। एक औसत अमेरिकी को 13.4 फीसदी, ब्रिटिश नागरिक को 10 फीसदी और चीनी नागरिक को 54 फीसदी अपनी जेब से देना होता है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य कवरेज पर योजना आयोग द्वारा गठित उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह की सिफारिशों के अनुसार स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय को बारहवीं योजना के अंत तक जीडीपी के 2.5 प्रतिशत और 2022 तक कम से कम 3 प्रतिशत तक बढ़ाना चाहिए। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2017 के अनुसार सन 2025 तक भारत में स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय जीडीपी का 2.5 फीसदी हो जाएगा। पर सन 2019-20 के राष्ट्रीय और राज्यों के बजटों पर नजर डालें, तो यह व्यय जीडीपी के 1.6 फीसदी के आसपास था।
पिछले साल के केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य के लिए धनराशि का आबंटन कुल बजट का 2.4 फीसदी था, जो चालू वित्त वर्ष के बजट में घटकर 2.3 फीसदी हो गया। यह रकम जीडीपी की 0.3 फीसदी है। इन आँकड़ों की भाषा के बजाय सीधे-सीधे समझना है, तो यह समझिए की अब सरकार स्वास्थ्य सेवा प्रदाता नहीं, सेवा की ग्राहक है। स्वास्थ्य सेवाओं का जिम्मा निजी क्षेत्र के पास है। सरकार नागरिकों के लिए ‘स्ट्रैटेजिक पर्चेजिंग’ करती है। ऐसा संरचनात्मक बदलाव ज्यादातर देशों में हो रहा है।
औषधियों के शोध और विकास का काम अब निजी क्षेत्र के जिम्मे है। सिद्धांततः इस बात में कोई खामी नहीं है, पर निजी कंपनियाँ सामाजिक कल्याण के उदात्त इरादों से नहीं चलतीं। वे अपने मुनाफे और कमाई के लिए काम करती हैं। यह जिम्मेदारी नियामक संस्थाओं की है कि वे सामाजिक कल्याण को सुनिश्चित करें। पर राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली और ताकतवर नियामक संस्थाएं नजर नहीं आती हैं। ऐसी संस्थाएं, जो पूँजी के दबाव या लोभ का सामना कर सकें।
वैश्विक स्वास्थ्य से जुड़ा विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) अपेक्षाकृत कमजोर संस्था है। यहाँ ताकत के जोर पर नीतिगत बदलाव कराना आसान है। इस महामारी के दौरान हमने देखा कि इस संगठन के इस्तेमाल को लेकर चीन और अमेरिका के बीच रस्साकशी हुई और अमेरिका ने इसके साथ अपना नाता तोड़ लिया। संयुक्त राष्ट्र से लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन तक सबको अपने खर्च को चलाने के लिए पैसा चाहिए।
अंततः सारी बातें दुनिया पर छाई जबरदस्त असमानता से जुड़ी हैं। संयुक्त राष्ट्र सन 2015 के लिए गरीबी और कई तरह की असमानताओं को दूर करने से जुड़े अपने लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रहा। अब सन 2030 तक के संधारणीय विकास के नए लक्ष्य तय किए गए हैं। इन लक्ष्यों को लेकर अब आने वाले समय की बहसों में कोविड-19 जैसी महामारी का जिक्र भी जरूर होगा। इस महामारी ने दुनिया को अपने गरीबों की अनदेखी न करने और पूँजी की स्वार्थी दौड़ को रोकने की सलाह दी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड-19 से बचाव का सबसे बड़ा तरीका है हाथों को धोना। उधर यूनिसेफ का कहना है कि दुनिया की 40 फीसदी आबादी के पास पानी और साबुन से हाथ धोने की व्यवस्था भी नहीं है। हम उनसे मास्क पहनने को कह रहे हैं, जिनके पास रोटी खरीदने के लिए पैसा नहीं है। पिछले नौ महीनों के हमारे अनुभव अच्छे हैं और खराब भी। निजी स्तर पर तमाम प्रेरक प्रसंग हैं, पर गरीबों की मदद करने के लिए सामने आए लोगों या स्वास्थ्य कर्मियों को मेडल देने या उनकी शहादत का यशोगान करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। जब तक दुनिया में निःशुल्क बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं अपनी पूरी गुणवत्ता के साथ हरेक व्यक्ति को उपलब्ध नहीं हैं, तब तक सब बेकार है। आप ताली बजाएं या थाली।(https://www.navjivanindia.com/)
-रोहिणी नीलेकणी
इस साल मैंने बेंगलुरु से काबिनी (कर्नाटक का एक वन्यजीव अभयारण्य) तक कई यात्राएं की हैं. हर बार जब मैं जंगल और देहात से लौटती हूं तो मेरी आंखें और दूसरी इंद्रियां ताज़गी से भर जाती हैं और मैं अपने गृहनगर को एक नई नजर से देखती हूं. फिलहाल बेंगलुरू एक पीड़ादायक बदलाव से भरा शहर दिखता है. ऊपर देखें तो हर तरफ डरावना कंक्रीट नजर आता है और नीचे मलबे के ढेर. इस धूसर कैनवास में ट्रैफिक से ठसाठस भरी सड़कों, मनमर्जी से काम करते सिग्नलों और पेंचीदा गोल चक्करों से जूझते हुए अपनी मंजिल पर पहुंचने की कोशिश करते असहाय लोग रंग-बिरंगे बिंदुओं जैसे दिखते हैं.
ऐसा लगता है जैसे भारत के कई दूसरे शहरों की तरह बेंगलुरू भी अपने बाशिंदों का इम्तहान ले रहा है. बुनियादी सुविधाओं के मोर्चे पर यहां हो रहे काम किसी ऐसे पोस्टर सरीखे दिखते हैं जिस पर बेहतर भविष्य का वादा लिखा होता है. शहर आपसे सब्र, भरोसा और उम्मीद रखने को कहता है. लेकिन लोग अब थक चुके हैं और उन्हें कुछ भी महसूस होना बंद होता जा रहा है.
अपने घर पहुंचने पर मैं उस जंगल के शहरी संस्करण में दाखिल हो जाती हूं जो मैं पीछे छोड़कर आई थी. मेरे आस-पड़ोस में पेड़ों की घनी हरियाली है. लेकिन पूरे बेंगलुरु में ऐसा नहीं है. बल्कि कभी गार्डन सिटी कहे जाने वाले इस शहर में मेरा इलाका अब अपवाद सरीखा है. बेंगलुरु विविध और विरोधाभासी पहचानों और स्वरूपों का मेल है जिसमें शीर्ष स्तर पर विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग हैं और नीचे बुनियादी अधिकारों से भी वंचित लोग. लेकिन शहर की बदहाली इस भेद को खत्म कर देती है. ट्रैफिक और प्रदूषण जैसी समस्याओं के सामने हमारा सुरक्षित खोल टूट जाता है और एक विकृत समानता पैदा हो जाती है.
लेकिन अब शहर के भविष्य के साथ जुड़ने के नए अवसर भी बन रहे हैं. बल्कि देखा जाए तो देश में हर जगह इस तरह के प्रयास हो रहे हैं जिनमें शहरों की फिर से कल्पना की जा रही है और नागरिकों को इसमें अपना योगदान देने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है. इसका मकसद यह है कि शहर लोगों को अपने से लगें. अब बहस का विषय ठोस तरीके से इस तरफ मुड़ चुका है कि क्या शहरों को मौजूदा स्वरूप में ही विकसित होना चाहिये या फिर इनमें कोई बदलाव होना चाहिए, और इस बदलाव में किसकी भागीदारी होनी चाहिए.
आज प्रौद्योगिकी ने शहरों का स्वरूप तय करने के काम में सामूहिक भागीदारी को संभव बना दिया है. महानगरों और दूसरे इलाकों में भी डिजिटल दौर के नागरिक समाज (सिविल सोसायटी) संगठन तकनीक की मदद से शहरों का भविष्य तय करने में राज्य व्यवस्था के एकाधिकार को चुनौती दे रहे हैं. इन संगठनों की कमान अक्सर सृजनशील युवाओं के हाथ में होती है. अब लगभग हर जगह मौजूद रेजीडेंट वेलफेयर एसोसिएशंस भी अपने शहरों की कमान अपने हाथ में लेने के लिए दृढसंकल्प लगती हैं.
उदाहरण के लिए लॉकडाउन के दौरान युगांतर नाम के एक संगठन ने सूचना के अधिकार के तहत एक आवेदन दाखिल करके यह जानकारी मांगी कि ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कॉरपोरेशन में कुल कितनी झुग्गियां और उनमें कितने लोग रहते हैं. फिर यह जानकारी स्थानीय गैर सरकारी संगठनों के साथ साझा की गई जिससे राहत कार्य और भी सटीक तरीके से संभव हुआ. इसी तरह हैय्या नाम के एक दूसरे संगठन ने ‘हेल्थ ओवर स्टिग्मा’ नाम से एक अभियान चलाया जिसके जरिये खास कर महिलाओं की सुरक्षित यौन और प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच सुनिश्चित करने की कोशिश की गई.
उधर, बेंगलुरु में रीप बेनिफिट नाम की एक संस्था ने शहर की समस्याओं के समाधान में भागीदारी का एक मंच विकसित किया है. सबके लिए खुला यह मंच एक वाट्सएप चैटबोट, वेब एप और सिविक फोरम का मेल है. चैटबोट लोगों को सरल और दिलचस्प तरीके से बताता है कि शहर के प्रशासन से जुड़ी चुनौतियों में अपनी भागीदारी वे कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं. मसलन अगर किसी सड़क पर कोई गड्ढा है तो सिर्फ उसकी फोटो खींचने के बजाय संबंधित विभागों को इसकी रिपोर्ट कैसे की जा सकती है. इस तरह देखें तो तकनीक लोगों के गुस्से और ऊर्जा को सही दिशा में मोड़ने में मदद कर रही है.
सिविस समझता है कि पर्यावरण संबंधी तकनीकी कानून बनाने की प्रक्रिया में कभी-कभी नागरिक समाज को दरकिनार किया जा सकता है जबकि पर्यावरण को हो रहे नुकसान का हम सभी पर गहरा असर पड़ता है. मार्च 2020 में पर्यावरण मंत्रालय ने कई नए नियमों के साथ एक मसौदा अधिसूचना जारी की थी और इस पर लोगों से सुझाव मांगे थे. सिविस ने इन नियमों को सरल भाषा में लोगों के सामने रखा और इसका नतीजा यह हुआ कि कहीं ज्यादा लोग इस प्रक्रिया में सीधे शामिल हो सके.
हमें समाज आधारित ऐसी और कई दूसरी कोशिशों को बढ़ावा देना होगा. इससे भी ज्यादा अहम यह है कि हममें से हर एक को इन कवायदों में हिस्सा लेने का अपना तरीका खोजना पड़ेगा. लोकतंत्र में हमारी भागीदारी सिर्फ एक खेल के दर्शक जितनी नहीं हो सकती. सुशासन सिर्फ भोग की वस्तु नहीं बल्कि सह-निर्माण का उद्यम भी है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कौन हैं, आप किसी सरकारी विभाग के मुखिया हों या फिर कोई सफल कारोबार संभाल रहे हों - आप सबसे पहले एक नागरिक हैं, अपने समुदाय का एक हिस्सा. और मैं मानती हूं कि सिर्फ समाज और उसकी संस्थाएं ही शहरों को सबके रहने लायक बनाने जैसे व्यापक जनहित के कार्यों के प्रति राज्य व्यवस्था को जवाबदेह बना सकती हैं.
सौभाग्य से आज नई तकनीकों की मदद से हम इस काम में पहले के मुकाबले ज्यादा आसानी से, ज्यादा असरकारी भूमिका निभा सकते हैं. मैं ‘क्लिक्टीविज्म’ यानी सोशल मीडिया के जरिये समाज सेवा करने की बात नहीं कर रही हूं, बल्कि कैसे तकनीक से लैस एक सामाजिक तंत्र समस्याओं के हल ढूंढ़ने के काम में लोगों को शामिल कर सकता है. कैसे यह तंत्र नागरिकों की भागीदारी को लोकतांत्रिक बना सकता है और अपने शहर का भविष्य तय करने में उनकी मदद कर सकता है.
यहां पर एक अहम बात का ध्यान रखना जरूरी है. इस डिजिटल दौर में नागरिक समाज को और भी ज्यादा डिजिटल होना होगा. एक सक्रिय डिजिटल समाज ही तकनीक से जुड़े कारोबारी दिग्गजों को ज्यादा जवाबदेह बना सकता है और उन्हें ऐसे साधनों को अपनाने से रोक सकता है जो राजनीतिक और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का स्वरूप बिगाड़ते हैं या व्यक्ति और समुदाय की चेतना का नुकसान करते हैं. शहरी समाज के आंदोलन इस दिशा में बेहद अहम हैं.
मौजूदा महामारी ने हमें इस दिशा में और भी तेजी से सोचने को मजबूर किया है कि शहरों का भविष्य कैसा होना चाहिए. उनमें किसी विपदा से संभलने की सामर्थ्य पैदा करने के लिए नागरिकों के पास सक्रिय भागीदारी के अवसर अब पहले से ज्यादा हैं. युवा नेतृत्वकर्ता सजग नागरिकों को सशक्त बनाने के लिए के लिए नये-नये विकल्प तैयार कर रहे हैं. मकसद यह है कि जब हम जंगल से शहर की तरफ लौटें तो हमें जीवंतता से भरी हलचल महसूस होनी चाहिए, आंखों में जलन और सांस लेने में परेशानी नहीं. (satyagrah.scroll.in)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
फ्रांस के 56 लाख मुसलमानों में आजकल कंपकंपी दौड़ी हुई है, क्योंकि ‘इस्लामी अतिवाद’ के खिलाफ फ्रांस की सरकार ने एक कानून तैयार कर लिया है। राष्ट्रपति इमेन्यूएल मेक्रो ने कहा है कि यह कानून किसी मजहब के विरुद्ध नहीं है और इस्लाम के विरुद्ध भी नहीं है लेकिन फिर भी फ्रांस के मुसलमान काफी डर गए हैं। फ्रांस में तुर्की, अल्जीरिया और अन्य कई यूरोपीय व पश्चिमी एशियाई देशों के मुसलमान आकर बस गए हैं।
ऐसा माना जाता है कि उनमें से ज्यादातर मुसलमान फ्रांसीसी धर्मनिरपेक्षता (लायसीती) को मानते हैं लेकिन अक्तूबर में हुई एक फ्रांसीसी अध्यापक सेमुअल पेटी की हत्या तथा बाद की कुछ घटनाओं ने फ्रांसीसी सरकार को ऐसा कानून लाने के लिए मजबूर कर दिया है, जो मुसलमानों को दूसर दर्जे का नागरिक बनाकर ही छोड़ेगा। इस कानून के विरुद्ध तुर्की समेत कई इस्लामी देश बराबर बयान भी जारी कर रहे हैं। इस कानून के लागू होते ही मस्जिदों और मदरसों पर सरकार कड़ी निगरानी रखेगी। उनके पैसों के स्त्रोतों को भी खंगालेगी। वह मुस्लिम बच्चों की शिक्षा पर भी विशेष ध्यान देगी। उन्हें कट्टरवादी प्रशिक्षण देने पर रोक लगाएगी। यदि मस्जिद और मदरसे फ्रांस के ‘गणतांत्रिक सिद्धांतों’ के विरुद्ध कुछ भी कहते या करते हुए पाए जाएंगे तो उन पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। लगभग 75 प्रतिबंध पिछले दो माह में लग चुके हैं और 76 मस्जिदों के विरुद्ध अलगाववाद भडक़ाने की जांच चल रही है।
इमामों को भी अब सरकारी देखरेख में प्रशिक्षण दिया जाएगा। सरकार ने इस्लामद्रोह-विरोधी संगठन को भी भंग कर दिया है। अब तक अरबी टोपी, हिजाब, ईसाई क्रॉस आदि पहनने पर रोक सिर्फ सरकारी कर्मचारियों तक थी। उसे अब आम जनता पर भी लागू किया जाएगा। तीन साल से बड़े बच्चों को घरों में तालीम देना भी बंद होगा।
डॉक्टरों द्वारा मुसलमान लड़कियों के अक्षतयोनि (वरजिनिटी) प्रमाण पत्रों पर भी रोक लगेगी। बहुपत्नी विवाह और लव-जिहाद को भी काबू किया जाएगा। तुर्की और मिस्र जैसे देशों में इन प्रावधानों के विरुद्ध कटु प्रतिक्रियाएं हो रही हैं लेकिन फ्रांस के 80 प्रतिशत लोग और मुस्लिमों की फ्रांसीसी परिषद भी इन सुधारों का स्वागत कर रही है।
ये सुधार राष्ट्रपति मेक्रो की डगमगाती नैया को भी पार लगाने में काफी मदद करेंगे। उन्हें 2022 में चुनाव लडऩा है और इधर कई स्थानीय चुनावों में उनकी पार्टी हारी है और उनके कई वामपंथी नेताओं ने दल-बदल भी कर लिया है। (नया इंडिया की अनुमति से)
मेरे नाना जी रांची के स्टेशन मास्टर थे। लिहाजा अपने मायके में डिलीवरी के लिए गई मेरी मां के पहुंचने पर वहां मेरा उनके बंगले में जन्म हुआ। जब 70 साल का हुआ। मन में वर्षों की कुलबुलाहट के कारण पहली बार और अब तक आखिरी बार रांची गया था। दो-तीन दिन वहां रुका अपने परिवार के साथ। बहुत परेशान था कि जिस बंगले में मेरा जन्म हुआ है। वह बचा या नहीं बचा।
कुछ माह पहले रांची के रेलवे डिपार्टमेंट के एक इंजीनियर से ट्रेन में मुलाकात रायपुर बिलासपुर के बीच हुई थी। उन्होंने बताया था कि वह बंगला सुरक्षित है। रांची के प्रसिद्ध लेखक रविभूषण के साथ स्टेशन मास्टर के पास पहुंचा। स्टेशन मास्टर 70 साल पहले पैदा हुए एक बच्चे के जन्म स्थान का कैसे पता बताएं। लिहाजा एक बहुत बूढ़ा कर्मी जो रिटायर हो चुका था। अपने घर से बुलाया गया और उसने याद करके कहा कि हां गंगा प्रसाद बाजपेयी नाम के स्टेशन मास्टर थे। उनका घर फलां फलां है।
अब वहां एक कर्मचारी रहते हैं। और बंगले का स्वरूप बाहर से इसलिए समाप्त हो गया है कि कई क्वार्टर बन गए हैं। स्टेशन मास्टर का नया बंगला बन गया है। रविभूषणजी के साथ गया और बंगाली परिवार जो वहां रहता था। उनके साले साहब मिले। उनकी मदद से हमने घर देखा।
मुझे बचपन में मामा मौसी ने जो बताया था, एक एक कमरे की याद आई। मां तो मुझे साढ़े तीन साल का होने पर छोड़ कर चली गई थीं। इसलिए उनसे तो कुछ पता नहीं चल सकता था।
देखने लगा यहां पर मैं पैदा हुआ था। यहां पर गाय का कोठा अलग से बनाया गया था। यहां पर एक फायरप्लेस था अंग्रेजों के समय के हिसाब से बना हुआ। यहां पर आउटहाउस में धोबी और घर के अन्य कर्मचारी रहते थे।
सब कुछ ऐसे जीवंत हो गया जैसे मैं पिछले जन्म में चला गया हूं। मैं अभिभूत हो गया। होटल पहुंच कर मैंने अपनी पत्नी और बच्चों से कहा बहू से कहा। हम सब दूसरे दिन वहां औपचारिक तरीके से फिर पहुंचे। तब तक वे बंगीय सज्जन छुट्टी पर होने के कारण घर पर थे।
क्या स्वागत हुआ हमारा ! हमें तिलक लगाया गया ! फूल मालाएं पहनाई गईं ! हमें मिठाई खिलाई गई ! हमारे पैर छुए गए ! हमारा सम्मान किया गया। मैं यथासंभव ठीक उसी जगह पर बैठा जहां शायद मेरी मां ने मुझे जन्म दिया होगा। मैं अंदर ही अंदर महासागर अपने में समेटे हुए था। वह मुझे यादों के इतने थपेड़े मार रहा था कि मुझे लगा मेला अस्तित्व एक तिनके की तरह इस पूरे वातावरण में उड़ जाएगा। बाहर से सूखा मरुस्थल बना रहा।
मेजबान परिवार ने कहा कि हमने जीवन में ऐसा भी कोई व्यक्ति देखा सुना नहीं है कि कोई अपने जन्म के बाद 70 साल बाद अपना जन्म स्थान, मां की कोख का स्थान इस तरह देखने आए। आप लोगों ने तो चमत्कार कर दिया। मित्रों ! अगर जीवित रहा तो एक बार और जाना चाहता हूं रांची। तब बहुत मित्र नहीं थे। अब तो कुछ हो गए हैं। एक बार अपने जन्म स्थान की मिट्टी को चंदन समझकर अपने माथे पर तिलक करना चाहता हूं। तब तक मुझे चैन नहीं है।
-कनक तिवारी
दिलीप साहब ने ‘आत्मकथा‘ में लिखा है कि उन्हें राजनीति में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। वे बाद में राज्यसभा के सदस्य बनाए गए। उनकी जुबानी और जीवन कथाओं में भी उनकी ऐसी इच्छा का उल्लेख नहीं मिलता कि वे राज्यसभा में जाना चाहते थे। विस्मृत हो रही घटनाओं, संस्मरणों और यादों के साथ यह निहत्थापन होता है कि चश्मदीद गवाह या दस्तावेज़ नहीं होने से उन पर कोई भरोसा क्यों करे। ऐसी सच्ची यादों को झूठा होने का खिताब मिल जाना भी बहुत सरल होता है। किस्सा 1972 का है। विद्याचरण शुक्ल रक्षा उत्पादन मंत्री थे। प्राध्यापकी की नौकरी छोड़कर वकालत शुरू करने के पहले मैं सहसा प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स और नवभारत वगैरह का संवाददाता हो गया था। तब युवा और अभिजात्य आदतों में रचे बसे शुक्ल को छोटे भाई की उम्र के मुझ युवा पत्रकार को दिल्ली दरबार की ठसक दिखाने का अवसर आया। मैं रेसकोर्स की उनकी कोठी में रुका था। उसे बाद में प्रधानमंत्री का आवासीय दफ्तर बना दिया गया है। इतवार की दोपहर लंच के तीन निमंत्रण मंत्री जी के पास थे। एक महाराष्ट्र के राज्यपाल नवाब अली यावर जंग का, दूसरा केन्द्रीय मंत्री इंद्रकुमार गुजराल का और तीसरा पत्रकार सुदर्शन भाटिया का। उनकी पत्नी मक्के की रोटी और सरसों का साग अपने हाथों से बनाकर खिलाने वाली थीं। शुक्ल ने मुझसे मेजबान चुनने को कहा। अपने बेतुके कपड़ों, हीन भावना और पत्रकारिक मित्र से परिचय पाने की ललक में मैंने मक्के की रोटी और सरसों के साग को चुना।
शुक्ल अपनी स्पोर्ट्स् कार चलाते, जीन्स और टी शर्ट पहने फिल्मी हीरो लगते सामने की सीट पर कुर्ता पाजामा पहने बैठे मुझे ले गए। जैसे साहब और ड्राइवर साथ साथ जाते हैं। गुजराल की कोठी में हमारी कार घुस रही थी। सामने से एक खूबसूरत कार आ रही थी। मंत्री बुदबुदाए, ‘ये हज़रत उतरेंगे। तुम इन्हें संभालना। मैं गुजराल से माफी मांगकर आता हूं।‘ उस कार की पिछली सीट पर बैठा व्यक्ति ‘शुक्ला साहब, शुक्ला साहब‘ कहता अपनी कार को पलटकर हमारी कार के पीछे दौड़ा आया। उतरते उतरते उसने विद्याचरण शुक्ल को घेरा। मुझे संदर्भ मालूम नहीं था। शुक्ल ने मुझसे तआरुफ कराया ‘ये मेरे राजनीतिक सचिव हैं। छोटे भाई और बड़े पत्रकार भी। मैं इनकी सलाह से राजनीतिक फैसले करता हूं।‘ हर नेता की तरह शुक्ल ने अपने जीवन में ऐसे हजारों कामचलाऊ झूठ बोले ही होंगे। इस झूठ से लेकिन मेरे लिए सच सपना बनकर झरने लगा।
शुक्ल ने उनका तआरुफ जाहिराना कारणों से मुझसे नहीं कराया। उस आकर्षक पुरुष ने मेरा दायां हाथ गर्मजोशी से पकड़ा और कई मिनटों तक नहीं छोड़ा। इतनी देर तक तो उसे अपनी फिल्मों में किसी नायिका का हाथ पकड़े मैंने नहीं देखा था। उसके हाथों में ही उसकी भाषा थी। वह उसके मन को हिन्दुस्तानी में बयान कर रही थी। उसकी आंखों में जुंबिश थी। उसकी आंखें हर फिल्म में इस कदर साफ साफ बोलती रही हैं कि अंधे को भी दिखाई पड़ जाता है। आज ज़रूरी नहीं होने पर भी वह जुबान से भी बोल रहा था कि मैं शुक्ल के मन की थाह लूं। ऐसा आग्रह तो उसने कभी भी किसी फिल्म निर्माता से भी फिल्में पाने के लिए नहीं किया होगा। यह खुद्दार अतिमानव अपने से बीस वर्ष छोटे युवक का हाथ पकड़े खड़ा था। मुझे उनकी राजनीतिक आकांक्षा में रुचि नहीं पैदा हो रही थी।
मेरे लिए वे दिलीप कुमार नहीं, देवदास थे। कितने सौभाग्यशाली वे क्षण थे। मेरा नायक देवदास पारो की ड्योढ़ी पर मर जाने के बाद भी केवल मेरा हाथ पकड़ने के लिए दिल्ली के इस सरकारी बंगले की चौहद्दी के अंदर खड़ा था। मैं देवदास से मुखातिब होता हूं। दिलीप कुमार को अभिनय कला की उनकी चापलूसी में कोई दिलचस्पी नहीं है। मैं ‘देवदास‘ के कारुणिक संवादों का रटा हुआ कोलाज़ बिखेरता हूं। यही डायलाॅग फिल्म में उनके द्वारा बोले जाने पर चंद्रमुखी, धरमदास, पारो, उनकी मां और चुन्नी बाबू तक की आंखों में आंसू छलछलाए थे। मैं अंदर ही अंदर झुंझलाता हूं। कैसा देवदास है जो दिलीप कुमार बने रहने का अभिनय कर रहा है। ज़मींदार का बेटा होकर ऊंची जाति की गरीब लड़की पारो से प्रेम के कारण इसी ने ऐसी त्रासद मौत पाई। हम जैसे लोग भी जीवन में कुछ पाने के बदले इसके जैसी ही त्रासद मौत पाना चाहते रहे। भले ही हमें कोई पी.सी. बरुआ या बिमल राॅय नहीं मिले। यह चाहे तो हम कम से कम शरत बाबू की कलम की स्याही की एक बूंद तो हमें बना सकता है। कितना निष्ठुर है यह कलाकार! जो पारो की ड्योढी़ पर मरकर दुनिया के नौजवानों को देवदास बनाने के महान कलात्मक अभियान को इन राजनीतिज्ञों के कारण टांय टांय फिस्स कर रहा है।
मैं ‘देवदास‘ के मुकाबले उसकी एक अपेक्षाकृत कम प्रसिद्ध फिल्म की गोद से पनाह मांगता हूं। मैं पूछता हूं, ‘आपको ‘शिकस्त‘ फिल्म में अपना अभिनय कैसा लगा?‘ ‘शिकस्त‘ का नायक भी तो बांग्ला कहानी का ही नायक है। बांग्ला कुमारिकाओं ने काॅलेज के हम दोस्तों को जब जब घास नहीं डाली। तब तब हम दिलीप कुमार में ही अपना नायक ढूंढ़ते रहे। ‘शिकस्त‘ में दिलीप का अभिनय अंगरेज़ी के महान रूमानी कवि कीट्स के मृत्यु-लेख की तरह अमर है। कीट्स ने लिखा है, ‘यहां वह लेटा है, जिसका नाम पानी पर खुदा है।‘ मैं ही शिकस्त हो रहा हूं। मेरे अभिनय का दिलीप कुमार पर कोई असर नहीं हो रहा है। उन्हें आज तो नेताओं के कीड़े ने काट खाया है। नेता अभिनेता को तबाह क्यों कर देते हैं?
पठान के हाथ ने मेरी हथेली को दबोचा। इस स्पर्श ने मनुष्य होने की समझ मुझमें विकसित और विस्तारित कर दी। पठान का कड़ा हाथ ब्राह्मण पुत्र के अपेक्षाकृत मुलायम हाथ को शिकंजे में कस चुका था। इस पठान ने अपनी नायिकाओं के हाथों को भी तो इतनी सख्ती से नहीं पकड़ा होगा। मेरे मुकाबले तो वे बेचारियां कोमलांगी ही रही होंगी। इस कलाकार को भ्रम है कि उसके हाथों में सिफारिश करने का दम है। अरे दम तो उसके पैदा होने में ही है। कभी उसके ये हाथ पांव, यह देह और हमारी यह उपस्थिति भी नहीं रहेगी। तब उसकी गैरहाज़िरी इतिहास और हमारी गुमनामी का पर्याय बनेगी। अकेले में शुक्ल ने मुझे बताया था कि दिलीप साहब के राज्यसभा में जाने की बात चल रही है। मैंने उस दोपहर दायां हाथ नहीं धोया। सुदर्शन भाटिया के घर बाएं हाथ से खाया। शुक्ल की कोठी पहुंचकर मैंने आदत के खिलाफ पत्नी से हाथ मिलाया था। वह चौंकी। मैंने कहा मेरे इस हाथ में दिलीप कुमार का स्पर्श है।
-कनक तिवारी
1. दिलीप कुमार धर्म, जाति, संस्कार, भूगोल या मौसम के तकाज़ों का फकत उत्पाद नहीं हैं। यही आदमी है जिसके पास निजी पुस्तकालय के अतिरिक्त किताबों का गोदाम घर भी है। अचानक फरमाइश कर वह किसी भी किताब को मंगवा लेता है। अपनी आराम कुर्सी में अधलेटा टेबिल लैम्प की रोशनी में इसे किताबें पढ़ते देखना अमूमन इसकी पत्नी सायरा बानो को ही ज्यादा नसीब है। फिल्मकथा में मौत से आंखमिचौनी करते उसे अपनी श्रेष्ठता का अहसास करा देना त्रासद चरित्रों के निरूपण का परिपाक होता है। दिलीप कुमार इस प्रयोजनीयता में भी निष्णात होते गए हैं।
2. नेहरू युग से प्रेरित फिल्मों में दिलीप कुमार केवल रोमांटिक नायक नहीं रहे, उन्होंने पिता, शिक्षक और प्रेरक भूमिकाओं को भी स्वीकार किया। वक्त आया जब राजेन्द्र कुमार, मनोज कुमार, धर्मेन्द्र, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान और सलमान खान वगैरह ने भी राष्ट्रीय दमक की फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिकाओं का निर्वाह किया ।अमिताभ बच्चन, सुनील दत्त और राजेश खन्ना वगैरह ने कांग्रेस उम्मीदवारों के रूप में लोकसभा के चुनाव भी लड़े । दिलीप कुमार बहुत बाद में राज्यसभा में मनोनीत किए गए। नेहरू के कार्यकाल में वे अकेले प्रमुख अभिनेता थे जो नेता के आह्वान के कारण कांग्रेस समर्थन की सड़क की राजनीति में कूदे। 1964 में बनी फिल्म ‘लीडर‘ की कहानी खुद दिलीप कुमार ने लिखी थी। उसमें नेहरू के समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष आदर्शों की साफ साफ अनुगूंज सुनाई पड़ती है। दिलीप कुमार की एक भूमिका फिल्म कलाकार के अतिरिक्त एक प्रबुद्ध मुसलमान नागरिक की भी रही है। जाहिरा तौर पर दिलीप कुमार मोहम्मद अली ज़िन्ना की दो राष्ट्र की थ्योरी से सहमत भी नहीं थे। उनके परिवार ने इसीलिए विभाजन के बाद भारत के साथ रहना चुना। नेहरू युग में मुसलमान भारतीय राजनीति की मुख्यधारा में रहे। उनके साथ पाकिस्तान निर्माण की दुर्घटना के बावजूद तथाकथित सौतेला व्यवहार नहीं हुआ था।
3. ‘गंगा जमुना‘ फिल्म को तबके सूचना प्रसारण मंत्री बी.वी. केसकर के आदेश पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई। कथित तौर पर उसमें कुछ आपत्तिजनक दृष्य थे। सेंसर बोर्ड की समझ के अनुसार उससे डकैती को भी प्रोत्साहन मिलता। दिलीप कुमार ने पूरी तैयारी के साथ इन्दिरा गांधी की मदद से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से वक्त मांगा। पंद्रह मिनटों का दिया गया वक्त डेढ़ घंटे तक फैल गया। दिलीप कुमार ने अपने व्यवस्थित नोट तथा अस्तव्यस्त होने का भ्रम देती बेहद तार्किक विचारशीलता के जरिए नेहरू को आश्वस्त किया। ‘गंगा जमुना‘ जैसी की तैसी रिलीज़ हुई। कई अन्य फिल्मों को भी सेंसर बोर्ड के जेलखाने से छूट का फरमान मिला। दिलीप कुमार इन फिल्मों के जमानतदार नहीं अधिवक्ता बनकर गए थे। पता नहीं क्यों बाद में केसकर मंत्रालय से हटा दिए गए।
4. यह दिलचस्प विरोधाभास है कि मुस्लिम हितों के समय समय पर अवनत होने की स्थिति में दिलीप कुमार ने उनका भी प्रतिनिधित्व करने में गुरेज़ नहीं किया। साथ साथ यह देखना दिलचस्प है कि अपनी 57 फिल्मों में ‘मुगले आज़म‘ को छोड़कर दिलीप कुमार ने लगातार और सघन रूप से हिन्दू चरित्रों का ही अभिनय किया। यह भी जनता के बहुमत में उनकी स्वीकार्यता का एक बड़ा कारण बनता है। हिमान्शु राॅय द्वारा स्थापित बाम्बे टाॅकीज़ से दिलीप कुमार लगातार संबद्ध रहे। उस संस्था ने अपनी स्थापना से ही धर्मनिरपेक्ष और समाजोन्मुख मूल्यों और अवधारणाओं का रचनात्मक समर्थन किया।
5. आवाज़ का अर्थ केवल कंठ से निकलती हुई कुदरती ध्वनि नहीं है। मौसिकी में कुंदनलाल सहगल की आवाज़ में अद्भुत खनखनाहट सुनाई पड़ती है। वह बेजोड़ है। कई खलनायकों की आवाज़ में मर्दाना दम है। मसलन प्राण, अमरीश पुरी और रज़ा मुराद वगैरह को आवाज़ का कुदरती तोहफा मिला है। दिलीप कुमार ने लेकिन आवाज़ को अपने हुक्मनामे के ज़रिए सर्कस का रिंगमास्टर बनकर वर्जिश कराई है। दर्शक हतप्रभ हो जाने के लिए उनकी फिल्में देखने जाते रहते। आंखें सबसे अधिक तेज़ अंग हैं। वे प्रकाश की गति से देख सकती हैं। चेहरे के बदलते भावों के लिए बाकी अंग निर्भर होकर आंखों के हुक्मनामे की तामील करते हैं। कई समर्थ कलाकार बाद में बाॅलीवुड में अवतार बनकर छाए। उन्होंने भी त्रासदी नायकों के रूप में कथा के करुणा विमर्ष को खुर्दबीन से देखकर अपने अभिनय से विस्तारित किया। उसमें पीड़ा में टीसती सिम्फनी बहती है। सर्वख्यात हो चुके वे चरित्र त्रिआयामी होकर समाज में लेकिन दिलीप कुमार को आज भी ढूंढ़ते रहतें हैं। वे हर त्रासद फिल्म के निभाये किरदार को उत्तरोत्तर चरित्रों के मुकाबिल बहुत महीन अंतर के ज़रिए समझ जाते हैं। इन चरित्रों की तरल संवेदनाएं वैसे तो एक ही त्रासद कोख से उपजी हैं। इसलिए सहोदर हैं। लेकिन वे किसी एक का ही प्रतिरूप नहीं हैं।
6. शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय जैसे महान लेखक ने अपने त्रासद नायक देवदास में कई गुणों, अवगुणों को तराशा था। उनसे भी ज़्यादा कुछ और संकेत उन्हें जमींदारसुत देवदास की अभिनय बानगी के कारण ज़रूर दिलीप कुमार और बिमल राॅय के कारण मिल गए होते। यह फंतासी भले हो, लेकिन कला का वह कितना सार्थक क्षण होता! वैसे भी ‘देवदास‘ उपन्यास की मूल कथा इतनी विस्तृत नहीं है कि केवल उस पर निर्भर रहकर ही नाट्य रूपांतरण हो सके। चमत्कार यही हुआ कि जितनी संभावनाओं का नया आकाश फिल्म में बुन दिया गया, उसमें कहीं भी रचनात्मकता के लिहाज़ से प्रदूषण या अतिरेक नहीं था। ओहदे, परिस्थिति और ज़रूरत के मुताबिक पहने कपड़ों तक को अभिनय कराने के लिए इस कलाकार द्वारा प्रवृत्त किया जाता रहा।
7. वर्षों की मेहनत और लगन के कारण शाहरुख को बादशाह खान होने का लोकप्रिय मर्तबा मिला। अभिनय शिखर पर पहुंचे अमिताभ बच्चन को शहंशाह का विशेषण मिला।यदि कला की सीढ़ियां चढ़ना हो, तो वहां एक जहांपनाह रहता है। उसका नाम है दिलीप कुमार।
8. युसुफ खान मनुष्य का नाम है। यूसुफ खान का दिलीप कुमार होना मनुष्य की देह में आत्मा का छिप जाना है। वह हर उस मनुष्य की देह में पैठ जाने को तत्पर है जो जीवन को निजी जागीर नहीं समझते। मेरा यह तर्कमहल रेत की बुनियाद पर नहीं है। ‘अभिनेता होना दिलीप कुमार होना नहीं है लेकिन दिलीप कुमार होना अभिनेता होना है। किसी को मालूम था क्या कि बाॅलीवुड में कभी कोई दिलीप कुमार अभिनय का बहुब्रीहि समास बनकर आएगा?
-चैतन्य नागर
भारत की आध्यात्मिक परंपरा में अक्सर दाढ़ी की लंबाई और लंबे चोंगे के साथ ज्ञान की गहराई का संबंध जोडक़र देखा जाता है। लंबे बेतरतीब बाल भी किसी आध्यात्मिक बाबा के ‘पहुंचे’ हुए होने लक्षणों में शामिल होते हैं।
आम तौर पर यह मत बहुत गहरा है कि दाढ़ी एक घोंसला है जिसमे विशेष तरह के ज्ञान की चिडिय़ा फुदकती रहती है. वैसे कुछ सम्प्रदायों और धर्मों ने चेहरे पर और सर पर उगे केश से पूर्ण मुक्ति को भी ज्ञान का सर्वोच्च प्रतीक मान रखा है।
या तो बाल-बाल ही बचे रहें, या बाल की खाल भी न रहे। ये दोनों बातें अलग-अलग मतों और सम्प्रदायों में प्रचलित हैं।
कुल मिला कर बाकी लोगों से अलग दिखना, ‘सांसारिक मोह-माया’, सजने-सँवरने जैसी तुच्छ चीजों से दूर रहने पर जोर देना ही इसका उद्देश्य होगा. नहीं क्या?
जिद्दू कृष्णमूर्ति को दुर्भाग्य से कुछ लोग आध्यात्मिक बाबा भी मान लेते हैं. भारत में तो ऐसा होगा ही, इस बात से पहले से ही सजग थे। ऐसे में उन्हीने क्लीन शेवन रहना ही पसन्द किया, नार्मल जीन्स, टी-शर्ट, जैकेट, या फिर भारत में पायजामे कुर्ते में दिखाई देते थे। अपने कपड़ों और रंग रूप के मामले में भी उन्होंने किसी परंपरा को नहीं माना। संगठित धर्मों को लेकर जो आंतरिक विद्रोह था वह वेश भूषा और चेहरे पर भी व्यक्त हुआ।
वैसे वह न्यू एज गुरु कहलाना भी पसन्द नहीं करते थे।
गुरु शब्द कृष्णमूर्ति के लिए वैसा ही था जैसा सांड के लिए लाल कपड़ा!
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
रुस के विदेश मंत्री सर्गेइ लावरोव ने बर्र के छत्ते को छेड़ दिया है। उन्होंने रुस की अंतरराष्ट्रीय राजनीति परिषद को संबोधित करते हुए ऐसा कुछ कह दिया, जो रुस के किसी नेता या राजनयिक या विद्वान ने अब तक नहीं कहा था। उन्होंने कहा कि अमेरिका चीन और रुस को अपने मातहत करना चाहता है। वह सारे संसार पर अपनी दादागीरी जमाना चाहता है।
विश्व-राजनीति को वह एकध्रुवीय बनाना चाहता है। इसीलिए वह भारत की पीठ ठोक रहा है और उसने भारत, जापान, आस्ट्रेलिया और अमेरिका का चौगुटा खड़ा कर दिया है। उसने प्रशांत महासागर क्षेत्र को ‘भारत-प्रशांत’ का नाम देकर कोशिश की है कि भारत-चीन मुठभेड़ होती रहे। उसकी कोशिश है कि रुस के साथ भारत के जो परंपरागत मैत्री-संबंध हैं, वे भी शिथिल हो जाएं।
हो सकता है कि ट्रंप-प्रशासन की इसी नीति को आगे बढ़ाते हुए बाइडेन-प्रशासन रुस के एस-400 मिसाइल प्रक्षेपास्त्रों की भारतीय खरीद का भी विरोध करे। ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में जाते-जाते भारत के साथ ‘बेका’ नामक सामरिक समझौता भी कर डाला है, जिसके अंतर्गत दोनों देश गुप्तचर सूचनाओं का भी आदान-प्रदान करेंगे।
रुसी विदेश मंत्री के उक्त संदेह निराधार नहीं हैं। उनको इस तथ्य ने भी मजबूती प्रदान की है कि इस्राइल, सउदी अरब और यूएई, जो कि अमेरिका के पक्के समर्थक हैं, आजकल भारत उनके भी काफी करीब होता जा रहा है। भारत के सेनापति आजकल खाड़ी देशों की यात्रा पर गए हुए हैं। लेकिन रुसी विदेश मंत्री क्या यह भूल गए कि रुस से अपने संबंधों को महत्व देने में भारत ने कभी कोताही नहीं की।
पिछले दिनों भारत के रक्षामंत्री और विदेश मंत्री मास्को गए थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और व्लादिमीर पूतिन के बीच सीधा संवाद जारी है। यह ठीक है कि इस वक्त भारत और चीन के बीच तनाव कायम है। उसका फायदा कुछ हद तक अमेरिका जरुर उठा रहा है लेकिन भारत का चरित्र ही ऐसा है कि वह किसी का पिछलग्गू नहीं बन सकता है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-अनंत प्रकाश
“खेती करते-करते सत्रह बरस बीत गए हैं. अब तक सरकार से कोई ख़ास मदद नहीं मिली है. आगे का पता नहीं. हम अपने खेत में सब्ज़ी उगा लेते हैं और उसे बेच लेते हैं जिससे कुछ कमाई हो जाती है. लेकिन अब सुन रहे हैं कि बड़ी कंपनियां गाँव आकर खेती करेंगी. अभी तो हमें तीन हज़ार रुपये साल पर दो बीघा ज़मीन बटाई पर मिल जाती है. कल को कोई कंपनी इसी दो बीघा के लिए ज़मीन वाले को 5000 रुपये दे देगी तो हमारे पास मज़दूरी करने के अलावा क्या विकल्प बचेगा?”
ये शब्द उत्तर प्रदेश की एक भूमिहीन महिला किसान शीला के हैं. शीला किराए पर लिए दो बीघे के खेत में सब्ज़ियां उगाती हैं और सब्ज़ियों को बेचकर ही अपना गुज़ारा करती हैं.
शीला बताती हैं कि बटाई पर लिए खेत पर काम करते हुए वे हर साल ख़र्चा निकालकर दस हज़ार रुपये तक बचा लेती थीं.
लेकिन जब वह खेती नहीं कर रही होती हैं तो उन्हें सिर्फ़ मज़दूरी पर निर्भर रहना पड़ता है जो कि प्रतिदिन 200 रुपये से 250 रुपये के बीच मिलती है.
किसान आंदोलन में कहाँ हैं भूमिहीन किसान महिलाएँ

भारत में जहां एक ओर व्यापक स्तर पर किसान आंदोलन चल रहा है. देश भर में किसान केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करके इन तीन कृषि क़ानूनों को वापस लेने के लिए दबाव बना रहे हैं.
लेकिन कृषि अर्थव्यवस्था में आख़िरी पंक्ति में खड़ीं भूमिहीन महिला किसानों की इस आंदोलन में उपस्थिति बेहद कम है.
आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण साल 2018-19 के आँकड़े बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में 71.1 फ़ीसद महिलाएं कृषि क्षेत्र में काम करती हैं. वहीं, पुरुषों का प्रतिशत मात्र 53.2 फ़ीसद है.
इसके साथ ही आँकड़े ये भी बताते हैं कि खेतिहर मज़दूर वर्ग में भी महिलाओं की भागीदारी काफ़ी ज़्यादा है.
ऐसे में सवाल उठता है कि भारत में महिला किसानों का इन कृषि क़ानूनों को लेकर क्या रुख़ है.
भूमिहीनता एक बड़ी वजह
भारत में क़ानूनी रूप से सिर्फ़ उन्हीं महिला किसानों को किसान का दर्जा दिया जाता है जिनके नाम पर भूमि का पट्टा होता है.
उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र से आने वालीं भूमिहीन महिला किसान रामबेटी मानती हैं कि आंदोलन में महिला किसानों की कम संख्या की वजह जानकारी का अभाव है.
रामबेटी बीते कुछ समय से गाँव-गाँव घूमकर महिला किसानों को इन कृषि क़ानूनों से अवगत कराने की कोशिश कर रही हैं.
भूमिहीन महिला किसानों के साथ लंबी बातचीतों के अपने अनुभव साझा करते हुए रामबेटी कहती हैं, “असल बात ये है कि महिलाओं को पता ही नहीं है कि ये कृषि क़ानून उनके लिए कितने ख़तरनाक साबित हो सकते हैं. गाँव तक जानकारी ही नहीं पहुँची है. लेकिन धीरे धीरे ये जानकारी पहुंच रही है.”
हालांकि, पंजाब से आने वाली किरनजीत कौर मानती हैं कि “महिला किसान अपने स्तर से इन कृषि क़ानूनों का विरोध कर रही हैं. पंजाब में जगह जगह पर विरोध प्रदर्शन जारी हैं. ऐसे में महिलाएं अपने खेत और बच्चों की ज़रूरतों को पूरा करने के बाद विरोध प्रदर्शनों में शामिल हो रही हैं. लेकिन ये वक़्त ऐसा है जब पंजाब की महिलाएं और पुरुष कंधे से कंधा मिलाकर अपने गाँवों को बचाने के लिए लड़ रहे हैं. पहला क़दम ये है कि इन क़ानूनों को वापस कराना. और हम ये हासिल करके रहेंगे.”
क्या नुक़सान पहुंचा सकते हैं कृषि क़ानून?
किसान संगठनों का मानना है कि इन कृषि क़ानूनों की वजह से उनका भविष्य ख़तरे में पड़ सकता है.
लेकिन रामबेटी जैसे किसानों समेत कृषि क्षेत्र के कई विशेषज्ञ मानते हैं इन क़ानूनों से कृषि कार्यों में लगी महिलाओं को भारी नुक़सान हो सकता है.
राम बेटी बताती हैं, “महिलाओं को इन तीन क़ानूनों से जो सबसे बड़ा नुक़सान हो सकता है, वो ये है कि सरकार आवश्यक वस्तुओं जो कि खाने वाली चीज़ें हैं, उन्हें अपने हाथ से बाहर कर रही है. कंपनियों के हाथ में अधिकार जाने से ये होगा कि जो हम अपनी चीज़ देंगे, उसे वे सस्ते में लेंगी. लेकिन अगर हम उनका सामान ख़रीदेंगे तो वह महंगा मिलेगा.”
रामबेटी कोरोना दौर का उदाहरण देते हुए अपनी चिंताएं समझाती हैं.
वे कहती हैं, “अभी कोरोना दौर में सरकार के पास राशन था तो सरकार ने राशन की पूर्ति की है. लेकिन जब ये राशन कंपनियों के पास पहुँच जाएगा तो ये फ्री नहीं मिलेगा. ऐसे में हम कंपनियों के भरोसे हो जाएंगे, कंपनियों की मर्ज़ी होगी तो वो हमें देंगे. मर्ज़ी नहीं होगी तो हमें राशन नहीं मिलेगा.”
“दूसरी दिक़्क़त ये है कि हम भूमिहीन किसान हैं और हम ठेके पर लेकर किसानी करते हैं. अब हम दो हज़ार रुपया बीघा ले रहे हैं. और जब कंपनी आ जाएगी और वह पाँच हज़ार रुपये बीघे का प्रस्ताव रखेंगे तो ज़मीन मालिक/किसान हमें थोड़े ही अपने खेत देंगे. इस वजह से हम जैसे भूमिहीन महिला किसानों को दिक़्क़त हो जाएगी. और कंपनियां पहले तो उन्हें लालच देंगी लेकिन फिर उन्हें फंसा लेंगी. उन्हें अपना बीज, अपनी खाद देगी और अपने हिसाब से खेती कराएंगी.”
“अभी हम अपने खेत पर अपने खाने के लिए गन्ना, मूंगफली, शकरकंद जैसी चीजें उगा लेते हैं. लेकिन जब कंपनी ठेका लेगी तो कंपनी अपने हिसाब से खेती कराएगी. वो कहेंगे तो कपास उगेगा, वो कहेंगे तो नील की खेती करना है तो हमें नील की खेती करनी पड़ेगी. फिर हम खाने-पीने की चीज़ें अपने खेत में नहीं बो पाएंगे.”
भारत में भूमिहीन महिला किसानों का एक बड़ा तबक़ा छोटे से खेत को किराए पर लेकर अपने स्तर पर खेती करता है. इस खेती में वह अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए ज़रूरी अनाज को पैदा करने की कोशिश करती हैं.
खेत नहीं मिलने की स्थिति में यही महिलाएं क़स्बों में जाकर मज़दूरी आदि करती हैं. और मनरेगा जैसी योजनाओं की मदद से मज़दूरी हासिल करती हैं.
लेकिन किराए पर खेती इन्हें इनके ही गाँव में सम्मानित ढंग से जीने का अवसर देती है.
हालांकि, भूमिहीन महिला किसानों को भूमिमालिक नहीं होने की वजह से सरकार की ओर से चलाई जा रहीं डायरेक्ट बैंक ट्रांसफ़र, फ़सल बीमा योजना और किसान क्रेडिट कार्ड जैसी योजनाओं का लाभ पूरी तरह नहीं मिल पाता है.
ऐसे में गाँवों में कॉरपोरेट घरानों की ओर से बड़े स्तर पर अनुबंधीय खेती किए जाने की ख़बरें महिला किसानों के लिए चिंता का विषय बन रही हैं.
बढ़ेगा संकट
उत्तर प्रदेश में भूमिहीन महिला किसानों के सशक्तिकरण में लगी संस्था पानी संस्थान के सचिव भारत भूषण मानते हैं कि अनुबंधीय खेती होने की स्थिति में भूमिहीन महिला किसानों की समस्याओं में इजाफा होगा.
वे कहते हैं, “इस क़ानून में अनुबंधीय खेती को लेकर जो प्रावधान है, वो कहीं न कहीं भूमिहीन महिला किसानों की संख्या में बढ़ोतरी करेगा. और ये स्पष्ट है कि सरकार ने इन तीन क़ानूनों में इस तबक़े को नज़रअंदाज़ किया गया है.”
वहीं महिला किसानों के उत्थान के लिए कार्यरत एक अन्य विशेषज्ञ सुधा मानती हैं कि “भूमिहीन किसानों को ये डर सता रहा है कि अगर कंपनियां आ जाती है तो क्या होगा. लोग अपने गाँव में ही किसी परिचित व्यक्ति की जमीन को किराए पर लेकर खेती करते हैं. अब कंपनियां अगर आने लगती हैं तो इन किसानों को खेती करने के लिए किराए पर ज़मीन नहीं मिलेगी. ये किसानों का एक बड़ा डर है.''
''न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर भी एक बात ये है कि भले ही किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से दो-तीन रुपये कम मिलते हों लेकिन एक मंडी है. अब अगर कोई रेट न हो तो किसान पूरी तरह बाज़ार के भरोसे हो जाएंगे. टमाटर या जल्दी ख़राब होने वाली पैदावार के मामले में अक्सर देखा जाता है कि किसान पूरी तरह से बाज़ार के ग़ुलाम हो जाते हैं. चूंकि इस किसान वर्ग के पास अपनी फसल को रोकने का समय नहीं होता है तो उन्हें औने-पौने दामों में अपनी फ़सल बेचनी पड़ती है.''
“मंडी सिस्टम में कई ख़ामियां हैं. और उन ख़ामियों को दूर किए जाने की ज़रूरत है. कई विशेषज्ञों ने इस पर अपने सुझाव भी दिए हैं. लेकिन इस पूरे सिस्टम को हटा देना कितना जायज़ है. मान लीजिए कि कुछ कंपनियां ऐसी होंगी जो किसान के सूचना देते ही अपने एजेंट भेज देंगी. लेकिन ये तो किसान के लिए मजबूरी का सौदा हुआ. और कौन सी कंपनी है जो कि बेचने वाले की मजबूरी में उससे अच्छे दाम पर फ़सल ख़रीदती है.”

आशा की किरण
लेकिन भूमिहीन महिला किसानों के साथ बातचीत में एक बात निकलकर आ रही है कि वे चाहती हैं कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम ख़रीद को अवैध क़रार दे.
कृषि क्षेत्र के विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा मानते हैं कि अगर ये हो जाता है तो इससे भूमिहीन किसानों को भी फ़ायदा होगा.
वे कहते हैं, “अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अपनी पैदावार बेचना किसान का एक क़ानूनी अधिकार बन जाए तो इससे हमारी बहुत सारी समस्याओं का समाधान मिल जाएगा.”(https://www.bbc.com/hindi)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
किसान नेताओं को सरकार ने जो सुझाव भेजे हैं, वे काफी तर्कसंगत और व्यवहारिक हैं। किसानों के इस डर को बिल्कुल दूर कर दिया गया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म होने वाला है। वह खत्म नहीं होगा। सरकार इस संबंध में लिखित आश्वासन देगी।
कुछ किसान नेता चाहते हैं कि इस मुद्दे पर कानून बने। याने जो सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य से कम पर खरीदी करे, उसे जेल जाना पड़े। ऐसा कानून यदि बनेगा तो वे किसान भी जेल जाएंगे जो अपना माल निर्धारित मूल्य से कम पर बेचेंगे। क्या इसके लिए नेता तैयार हैं ? इसके अलावा सरकार सख्त कानून तो जरुर बना दे लेकिन वह निर्धारित मूल्य पर गेहूं और धान खरीदना बंद कर दे या बहुत कम कर दे तो ये किसान नेता क्या करेंगे? ये अपने किसानों का हित कैसे साधेंगे ?
सरकार ने किसानों की यह बात भी मान ली है कि अपने विवाद सुलझाने के लिए वे अदालत में जा सकेंगे याने वह सरकारी अफसरों की दया पर निर्भर नहीं रहेंगे। यह प्रावधान तो पहले से ही है कि जो भी निजी कंपनी किसानों से अपने समझौते को तोड़ेगी, वह मूल समझौते की रकम से डेढ़ गुना राशि का भुगतान करेगी।
इसके अलावा मंडी-व्यवस्था को भंग नहीं किया जा रहा है। जो बड़ी कंपनियां या उद्योगपति या निर्यातक लोग किसानों से समझौते करेंगे, वे सिर्फ फसलों के बारे में होंगे। उन्हें किसानों की जमीन पर कब्जा नहीं करने दिया जाएगा। इसके अलावा भी यदि किसान नेता कोई व्यावहारिक सुझाव देते हैं तो सरकार उन्हें मानने को तैयार है। अब तक कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर और गृहमंत्री अमित शाह का रवैया काफी लचीला और समझदारी का रहा है लेकिन कुछ किसान नेताओं के बयान काफी उग्र हैं।
क्या उन्हें पता नहीं है कि उनका भारत बंद सिर्फ पंजाब और हरियाणा और दिल्ली के सीमांतों में सिमट कर रह गया है? देश के 94 प्रतिशत किसानों का न्यूनतम समर्थन मूल्य से कुछ लेना-देना नहीं है। बेचारे किसान यदि विपक्षी नेताओं के भरोसे रहेंगे तो उन्हें बाद में पछताना ही पड़ेगा। राष्ट्रपति से मिलने वाले प्रमुख नेता वही हैं, जिन्होंने मंडी-व्यवस्था को खत्म करने का नारा दिया था। किसान अपना हित जरूर साधे लेकिन अपने आप को इन नेताओं से बचाएं।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-दिनेश श्रीनेत
कॉलेज से निकलकर पत्रकारिता शुरू करते ही वीरेन डंगवाल मिले- कभी कवि, कभी संपादक और कभी एक सह्रदय इंसान के रूप में। मगर इससे भी अभूतपूर्व थी उनकी दुनिया। वीरेन जी के साथ-साथ एक पूरा संसार चलता था। जाने कितने लोग, कितनी बातें, किस्से, किताबें उनके साथ चलते थे। मंगलेश डबराल उनके किस्सों से निकलकर सामने आए। हर फुरसत वाली मुलाकात में उनके पास इलाहाबाद, लखनऊ के किस्से होते थे और उन किस्सों में मंगलेश डबराल।
इससे पहले मैं मंगलेशजी को 'पहाड़ पर लालटेन' की अविस्मरणीय कविताओं के जरिए जानता था। मुझे याद है जब वीरेन जी के बड़े बेटे की शादी हुई थी तो वीरेन जी ने मेरा परिचय मंगलेश जी और पंकज बिष्ट से कराया था। समय बीतता गया, जब मैं दिल्ली एनसीआर पहुँचा तो मंगलेश जी मेरे पड़ोसी बन गए। उन्हीं दिनों कैंसर से लड़ रहे वीरेन जी भी इंदिरापुरम रहने लगे थे। वीरेन जी की जिंदादिली मेरे लिए आजीवन प्रेरणा रहेगी। कैंसर के दौरान भी वे उसी बेफिक्री और मस्ती में रहते थे।
मैंने हमेशा मंगलेशजी को वीरेन दा की निगाहों से देखा। वीरेन जी वाचाल, हंसोड़ और मुंहफट थे। मंगलेश जी इसके विपरीत अंतर्मुखी लगे। पड़ोसी होने के नाते हमारी मुलाकात कभी सीढ़ियों पर होती थी, कभी आती-जाती मेट्रो या फिर दिल्ली में आयोजित किसी प्रोग्राम में। अपने जीवन के इस उत्तरार्ध में उन्होंने अपनी कविताओं को वैश्विक विस्तार दिया था। विश्व कविता के बेहतरीन अनुवाद मंगलेशजी की वजह से ही संभव हो सके।
मुझे निजी तौर पर उनकी दो कविताएं अपने शांत में लहजे में बहुत सशक्त लगती है। पहली 'तानाशाह' और दूसरी 'गुजरात के एक मृतक का बयान'। दोनों का निःसंग बयान देश में तेजी से बदलती राजनीति का मजबूत प्रतिरोध बनकर सामने आया। 'एक मृतक का बयान' को निसंदेह हिंदी की कुछ सबसे बेहतरीन कविताओं में रखा जा सकता है। इस कविता की बहुत सी पंक्तियों को पढ़कर भाषा में निहित संभावनाओं को समझा जा सकता है -
"जब मुझे जलाकर पूरा मार दिया गया
तब तक मुझे आग के ऐसे इस्तेमाल के बारे में पता नहीं था"
या फिर -
"और जब मुझसे पूछा गया तुम कौन हो
क्या छिपाए हो अपने भीतर एक दुश्मन का नाम
कोई मज़हब कोई तावीज़
मैं कुछ कह नहीं पाया मेरे भीतर कुछ नहीं था
सिर्फ़ एक रंगरेज़ एक मिस्त्री एक कारीगर एक कलाकार"
इसी तरह से 'तानाशाह' सपाट गद्य की शैली में लिखी गई कविता है, मगर भाषा का यही प्रयोग अपने समय की राजनीतिक हिंसा को पहचानने का टूल बन जाता है -
"तानाशाह मुस्कुराता है भाषण देता है और भरोसा दिलाने की कोशिश करता है कि वह एक मनुष्य है लेकिन इस कोशिश में उसकी मुद्राएं और भंगिमाएं उन दानवों-दैत्यों-राक्षसों की मुद्राओं का रूप लेती रहती हैं जिनका जिक्र प्राचीन ग्रंथों-गाथाओं-धारणाओं- विश्वासों में मिलता है।"
विष्णु खरे, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल का अचानक जाना इसलिए भी दुःखद है क्योंकि यह वो समय है जब भाषा की ताकत की सबसे अधिक जरूरत थी। भाषा का सबसे ज्यादा दुरुपयोग हो रहा है। टीवी चैनलों, अखबारों, वेबसाइट और हर कहीं... चारो तरफ। कविताएं तो लिखी जाती रहेंगी मगर ये दोनों कवि हमेशा हमेशा याद रहेंगे, एक कवि को भाषा में जरूरी तोड़फोड़ करते हुए उसे मृत होने बचाने के लिए, तो दूसरे कवि को उसी भाषा के संतुलित इस्तेमाल के लिए।
मेरे लिए वीरेन दा और मंगलेश डबराल को अलग अलग करके देखना संभव नहीं है। मालूम नहीं मगर वे इसी रूप में मेरी स्मृति में पैठे हैं। दो चेहरे, दो दोस्त, दो कवि। कुदरत की गोद से उतर कर अपनी दुनिया को परखते-सहेजते हुए। वीरेन दा के जाने का आधा अंधेरा जैसे काफी नहीं था, मंगलेश जी के जाने से यह एक मुकम्मल अंधेरे में बदल गया।
वीरेन दा की कविता 'रात-गाड़ी (मंगलेश को एक चिट्ठी)' याद आ रही है। जो इन पंक्तियों पर खत्म होती है -
"फिलहाल तो यही हाल है मंगलेश
भीषणतम मुश्किल में दीन और देश।
संशय खुसरो की बातों में
ख़ुसरो की आँखों में डर है
इसी रात में अपना घर है।"
(फेसबुक से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के सिर पर एक चपत लगा दी है। उसने नए संसद भवन के निर्माण पर फिलहाल रोक लगा दी है। 10 दिसंबर को उसके लिए आयोजित भूमि-पूजन को उसने नहीं रोका है लेकिन नए संसद के निर्माण के लिए कई भवनों को गिराने, पेड़ों को हटाने और सारे क्षेत्रीय नक्शे को बदलने पर रोक लगा दी है।
10 दिसंबर को इस महत्वाकांक्षी योजना को अमल में लाने के लिए प्रधानमंत्री भूमि-पूजन कर रहे हैं। इस पूरे निर्माण-कार्य पर लगभग 20 हजार करोड़ रु. खर्च होंगे और इसे अगले दो साल में पूरा करने का विचार है। नए संसद भवन के दोनों सदनों में लगभग 1500 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था होगी। अभी इस क्षेत्र में 39 मंत्रालय सिर्फ 17 भवनों में चल रहे हैं।
नए निर्माण-कार्य में ऐसे दस विशाल भवन बनाए जाएंगे, जिनमें 51 मंत्रालय एक साथ चल सकेंगे। अभी सरकार को किराए के कुछ भवन लेने पड़ते हैं। उन पर एक हजार करोड़ रु. सालाना खर्च होता है। अंग्रेज के बनाए ये सभी भवन अब 100 बरस पुराने पड़ गए हैं। नए भव्य भवनों को बनाने का संकल्प मोदी सरकार ने अभी जरुरतों को ध्यान में रखते हुए लिया है लेकिन इस संकल्प के खिलाफ लगभग 1200 आपत्तियां उठाई गई हैं। सर्वोच्च न्यायालय सहित कई अदालतों में विभिन्न लोगों ने याचिकाएं दायर की हैं।उनमें कई आरोप है, जैसे पेड़ गिराने की अनुमति पर्यावरण-नियमों के विरुद्ध दी गई है और जमीन के इस्तेमाल की इज़ाजत गलत तरीके से ली गई है। सरकार ने यह इजाजत देने में अपने ही कई नियमों का उल्लंघन किया है। सर्वोच्च न्यायालय इस बात पर नाराज हुआ कि उसने सरकार से इन सब आपत्तियों पर सफाई मांगी लेकिन वह दिए बिना उसने 10 दिसंबर को भूमि-पूजन की घोषणा कर दी।
इस भूमि-पूजन पर भी हमारे कई सेक्युलरिस्ट नेताओं ने आपत्ति की है। उनका कहना है कि क्या यह हिंदू मंदिर है ? यह भारत-भवन है। इसमें सभी धर्मों से शुभारंभ होना चाहिए। अदालत के वर्तमान रवैए से यह शंका पैदा होती है कि शायद इसकी अनुमति न मिले। अभी तो उसका तेवर यही है लेकिन सामान्य-बोध कहता है कि सरकार के इस संकल्प पर अदालत का फैसला आखिरकार भारी नहीं पड़ेगा।
(नया इंडिया की अनुमति से)
गिरीश मालवीय
भारत के सबसे पुराने बैंकों में से एक लक्ष्मी विलास बैंक (LVB) को एक विदेशी बैंक ष्ठक्चस् (‘डेवलपमेंट बैंक ऑफ सिंगापुर’) में विलय कर दिए जाने का मामला बेहद संगीन है !
अगर आपने स्कैम 1992 हर्षद मेहता देखी हो जो कि अब तक की सबसे बेहतरीन वेबसीरीज में से एक है। तो आपने उसमें हर्षद मेहता के अलावा एक विदेशी बैंक ‘सिटी बैंक’ के द्वारा किए जा रहे घोटालों को भी देखा होगा। कहते हैं जो पकड़ा गया वो चोर और जो बच गया वो सयाना होता है, तो हर्षद मेहता तो पकड़ा गए लेकिन जो सिटी बैंक जैसी विदेशी संस्थाएं जो उस वक्त देश के स्टॉक मार्केट को लगातार अस्थिर कर रही थी वह सिर्फ चेतावनी देकर और कुछ प्रतिबंधात्मक आदेश लगाकर छोड़ दी गई।
क्या आप जानते है कि पीयूष गुप्ता जो इस वक्त DBS बैंक के CEO हैं उन्होंने अपने करियर की शुरूआत वर्ष 1982 में सिटीबैंक के साथ ही की थी। 2009 में DBS के साथ जुडऩे से पहले पीयूष गुप्ता सिटी बैंक के दक्षिण पूर्व एशिया पैसेफिक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी थे।
लक्ष्मी विलास बैंक का मर्जर DBS में करने को लेकर स्वदेशी जागरण मंच के अश्विनी महाजन ने भी बहुत महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। अफसोस की बात यह है कि इस खबर को हिंदी मीडिया ने बिल्कुल तरजीह नहीं दी है। अपने 60 पन्नों के लेटर में अश्विनी महाजन ने RBI से पूछा है कि RBI की पॉलिसी में पारदर्शिता कहां है ? लक्ष्मी विलास जैसे बैंक को विदेशी बैंक में क्यों मिलाया जा रहा है?
क्या यह RBI और भारत सरकार की नई नीति है? यदि ऐसा है, तो इस पर बहस की जानी चाहिए और इसके निहितार्थ की राष्ट्रीय हित में पूरी तरह से जांच की जानी चाहिए!
डीबीएस द्वारा जो 2,500 करोड़ रुपये लक्ष्मी विलास में लगाने की बात की जा रही है वो पैसा डीबीएस इंडिया में आ रहा है, न कि परेशान लक्ष्मी विलास बैंक में।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि DBS को एक तरह से मुफ्त में लक्ष्मी विलास बैंक सौप दिया गया है दरअसल डीबीएस अधिग्रहण के लिए कोई कीमत नहीं चुका रहा है और इसके साथ ही इस विदेशी बैंक की पहुंच लक्ष्मी विलास में जमा भारतीय जमाकर्ताओं के 20,000 करोड़ रुपये पर भी हो गई है।
आपने इसे एक तरह से फ्री में सौंप दिया है। क्या होगा अगर यह विदेशी बैंक डीबीएस लक्ष्मी विलास बैंक को भविष्य में किसी अन्य विदेशी संस्था या अन्य किसी वित्तीय संस्था को बेच दे?
आखिरकार LVB के मामले में RBI का आंकलन का आधार क्या है?
-ध्रुव गुप्त
भारत सरकार द्वारा पूंजीपतियों के हित में लाए गए काले कृषि कानूनों के विरुद्ध ज़ारी किसान आंदोलन का आज तेरहवां दिन है। इस सर्द मौसम में दिल्ली पहुंचने वाले हर मार्ग पर खुले आकाश के नीचे पड़े हजारों किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में आज भारत बंद का आह्वान किया है। आईए, हम अपने अन्नदाताओं का साथ दें! आज के दिन राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त की एक हृदयभेदी कविता ‘किसान’ की याद दिलाना चाहता हूं। कविता बहुत पुरानी है, लेकिन किसानों की स्थिति आज भी बहुत अलग नहीं है।
हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है
पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है
हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ
आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में
अधपेट खाकर फिर उन्हें है काँपना हेमंत में
बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा
है चल रहा सन सन पवन, तन से पसीना बह रहा
देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे
किस लोभ से इस आँच में, वे निज शरीर जला रहे
घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा
घर से निकलने को गरज कर, वज्र वर्जन कर रहा
तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं
किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं
बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है
है शीत कैसा पड़ रहा, औ’ थरथराता गात है
तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते
यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते
सम्प्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है
है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है
मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है
शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
प्रमुख अरब देशों के साथ भारत के संबंध जितने घनिष्ट आजकल हो रहे हैं, उतने वे पहले कभी नहीं हुए। यह ठीक है कि गुट-निरपेक्ष आंदोलन के जमाने में नेहरु, नासिर, अक्रूमा के नारे लगाए जाते थे और भारत व मिस्र के संबंध काफी दोस्ताना थे लेकिन आजकल सउदी अरब और संयुक्त अरब अमारात- जैसे देशों के साथ भारत के आर्थिक और सामरिक संबंध इतने बढ़ रहे हैं कि जिसकी वजह से पाकिस्तान-जैसे देशों की चिंता बढऩी स्वाभाविक है। ईरान को भी बुरा लग सकता है, क्योंकि शिया ईरान और सुन्नी देशों में तलवारे खिंची हुई हैं।
लेकिन संतोष का विषय है कि ईरान से भी भारत के संबंध मधुर हैं और भारत को अमेरिका ने ईरान पर लगे प्रतिबंधों से छूट दे रखी है। इन इस्लामी देशों से नरेंद्र मोदी सरकार की घनिष्टता भारत के कट्टरपंथी मुसलमानों के लिए पहेली बनी हुई है।
सउदी अरब और संयुक्त अरब अमारात, दोनों ने मोदी को अपने सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान प्रदान किए हैं और कश्मीर व आतंकवाद के सवालों पर पाकिस्तान को अंगूठा दिखा दिया है। पिछले छह वर्षों में भाजपा सरकार ने इन दोनों देशों से ही नहीं, बहरीन, कुवैत, कतार, ओमान जैसे अन्य इस्लामी देशों के साथ भी अपने संबंध को नई ऊंचाइयां प्रदान की है।इस समय इन देशों में हमारे लगभग 1 करोड़ भारतीय नागरिक कार्यरत हैं और वे लगभग 50 बिलियन डालर बचाकर हर साल भारत भेजते हैं। भारत का व्यापारिक लेन-देन अमेरिका और चीन के बाद सबसे ज्यादा यूएई और सउदी अरब के साथ ही है। आजकल हमारे सेनापति मनोज नर्वणे इन देशों की चार-दिवसीय यात्रा पर गए हुए हैं। खाड़ी के इन प्रमुख देशों में हमारे प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री भी जाते रहे हैं।
ये अरब देश औपचारिक रुप से हमारे पड़ौसी देश नहीं हैं। इनकी भौगोलिक सीमाएं हमारी सीमाओं को हालांकि स्पर्श नहीं करती हैं लेकिन इन देशों के साथ सदियों से भारत का संबंध इतना घनिष्ट रहा है कि इन्हें हम अपना पड़ौसी देश मानकर इनके साथ वैसा ही व्यवहार करें तो दोनों पक्षों का लाभ ही लाभ है। इनमें से कुछ देशों में कई बार जाने और इनके जन-साधारण और नेताओं से निकट संपर्क के अवसर मुझे मिले हैं।
मेरा सोचना यह है कि इन देशों को भी मिलाकर यदि जन-दक्षेस या ‘पीपल्स सार्क’ जैसा कोई गैर-सरकारी संगठन खड़ा किया जा सके तो सिर्फ एक करोड़ नहीं, दस करोड़ भारतीयों को नए रोजगार मिल सकते हैं। सारे पड़ौसी देशों की गरीबी भी दूर हो सकती है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-डॉ. राजू पाण्डेय
यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स (यूडीएचआर) को उसका निर्णायक और अंतिम स्वरूप देने में महिलाओं की भूमिका प्राय: अचर्चित रही है जबकि वास्तविकता यह है कि बिना महिलाओं के योगदान एवं हस्तक्षेप के मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा सर्वसमावेशी नहीं बन पाती बल्कि इसके एकांगी होकर पुरुषों के अधिकारों की सार्वभौम घोषणा बन जाने का खतरा था। इस घोषणा को तैयार करने में महिलाओं के योगदान को तो कम महत्व दिया ही जाता है किंतु इसके निष्पादन में भारतीय उपमहाद्वीप की महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को तो बिल्कुल उपेक्षित कर दिया गया है।
एलेनोर रोसवैल्ट (1884-1962) 1933 से 1945 तक संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रथम महिला रहीं। उनकी असाधारण योग्यताओं को देखते हुए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन ने उन्हें दिसंबर 1945 में यूनाइटेड नेशन्स की जनरल असेंबली में बतौर प्रतिनिधि नियुक्त किया। अप्रैल 1946 में एलेनोर रोसवैल्ट को कमीशन ऑन ह्यूमन राइट्स का पहला चेयरपर्सन बनाया गया। उन्होंने मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा के ड्राफ्ट निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 28 सितंबर 1948 के अपने एक उद्बोधन में उन्होंने यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स को विश्व के प्रत्येक मनुष्य के अंतरराष्ट्रीय मैग्नाकार्टा की संज्ञा दी। वह समय पूर्व और पश्चिम के बढ़ते तनावों का था किंतु एलेनोर रोसवैल्ट की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता उन्हें सभी पक्षों के लिए स्वीकार्य बनाती थी, यही कारण था कि मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा मूर्तरूप ले सकी और इसे 10 दिसंबर 1948 को एकमत से अंगीकार किया गया, केवल सोवियत ब्लॉक के छह देश तथा सऊदी अरब और दक्षिण अफ्रीका मतदान के दौरान अनुपस्थित रहे। एलेनोर रोसवैल्ट को मरणोपरांत 1968 में संयुक्त राष्ट्र शांति पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया।
डेनमार्क की बोडिल गरट्रूड बेगट्रप(1903-1987) एक जानी मानी राजनयिक थीं और महिलाओं के अधिकारों के लिए निरंतर संघर्षरत रहा करती थीं। वे 1947 में संयुक्त राष्ट्र के कमीशन ऑन द स्टेटस ऑफ वीमेन की प्रमुख बनीं। वे यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं के समावेश हेतु जानी जाती हैं। उन्हीं के प्रयासों से मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा में ‘सभी’ अथवा ‘प्रत्येक’ को मानव अधिकारों के धारक के रूप में स्वीकारा गया अन्यथा इसके पहले ‘ऑल मेन’ का प्रयोग किया गया था। उनके विचार अपने समय से बहुत आगे थे। उन्होंने शिक्षा के अधिकार संबंधी अनुच्छेद 26 में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को समाविष्ट करने का प्रस्ताव दिया किंतु वह विवादित होने के कारण स्वीकार नहीं किया जा सका। यही कारण है यूडीएचआर में अल्पसंख्यक अधिकारों का पृथक उल्लेख नहीं है, हां, यह सभी के लिए समान अधिकारों की गारंटी अवश्य करता है।
फ्रांस की मेरी हेलेन लीफाशो(1904-1964) संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा के उद्घाटन सत्र में सम्मिलित होने वाले फ्रांसीसी प्रतिनिधिमंडल की एकमात्र महिला सदस्य थीं। उन्हें यूनाइटेड नेशंस कमीशन ऑन द स्टेटस ऑफ वीमेन के 15 संस्थापक सदस्यों में से एक होने का गौरव प्राप्त है। वे 1948 में इसकी चेयरपर्सन बनीं। उन्हें दूसरे अनुच्छेद में ‘लिंग के आधार पर भेदभाव’ न किए जाने के स्पष्ट उल्लेख हेतु श्रेय दिया जाता है। उनके प्रयासों दूसरे अनुच्छेद का अंतिम रूप निम्नानुसार निर्धारित हुआ-इस घोषणा में उल्लिखित सभी अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी प्रकार के भेदभाव (यथा नस्ल,रंग, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक या वैचारिक भिन्नता,राष्ट्रीयता या सामाजिक उद्गम, संपत्ति, जन्म या अन्य दशा पर आधारित भेदभाव) के पात्र रहेगा।
बेलारशियन सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक की एवदोकिया यूरोलोवा (1902-1985)ने 1947 में यूनाइटेड नेशंस कमीशन ऑन द स्टेटस ऑफ वीमेन में रैपोर्टर के रूप में अपनी भूमिका सम्यक रूप से निभाई। उन्होंने मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा में महिलाओं हेतु समान वेतन के प्रावधान के लिए जबरदस्त प्रयास किया। यह उन्हीं के प्रयासों का परिणाम था कि हम आज अनुच्छेद 23 को उसके वर्तमान स्वरूप में देखते हैं-‘प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के समान कार्य हेतु समान वेतन का अधिकार है।’ किंतु एवदोकिया यूरोलोवा ने इस घोषणापत्र के निर्माण में एक अन्य महत्वपूर्ण योगदान दिया था जिसकी चर्चा कम ही होती है। उन्होंने पोलैंड की कालिनोस्का तथा यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक की पोपोवा के साथ मिलकर गैर स्वशासित इलाकों के लोगों के मानवाधिकारों के अनुच्छेद 2 में समावेश हेतु संघर्ष किया। इस विषय पर तब कम ही लोगों का ध्यान गया था।
मिनर्वा बर्नार्डिनो(1907-1998) महिलाओं के अधिकारों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरंतर प्रयास करती रहीं। वे 1950 में संयुक्त राष्ट्र संघ में डोमिनिकन रिपब्लिक की प्रतिनिधि नियुक्त हुईं। वे उन चार महिलाओं में थीं जिन्होंने 1945 में सान फ्रांसिस्को में संयुक्त राष्ट्र के चार्टर पर हस्ताक्षर किए थे। वे इस चार्टर में महिलाओं के अधिकारों को सम्मिलित कराने तथा लैंगिक आधार पर भेदभाव न करने जैसे विषयों को समाविष्ट कराने में कामयाब रहीं। इस कार्य में ब्राज़ील की बर्था लुट्ज़ और उरुग्वे की इसाबेल डी विडाल ने उनकी बड़ी मदद की। वे 1953 में यूनाइटेड नेशंस कमीशन ऑन द स्टेटस ऑफ वीमेन की अध्यक्ष भी रहीं। उन्होंने यूडीएचआर की प्रस्तावना में ‘स्त्री और पुरुषों की समानता’ को शामिल करने हेतु बड़ी मजबूती से अपना पक्ष रखा।
अब चर्चा भारतीय उपमहाद्वीप की उन महिलाओं की जिन्होंने यूडीएचआर के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हंसा जीवराज मेहता(1897-1995) ने महात्मा गाँधी से प्रभावित होकर स्वाधीनता आंदोलन में बढ़ चढ़ कर भागीदारी की और विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार समेत अन्य गतिविधियों में सम्मिलित रहीं। वे 1932 में अपने पति के साथ जेल भी गईं। स्वतंत्रता के बाद वे संविधान सभा की सदस्य चुनीं गईं। संविधान सभा में कुल 15 महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिला था। वे मौलिक अधिकारों के निर्धारण संबंधी समिति की सदस्य भी रहीं।
हंसा मेहता ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में देश के प्रतिनिधि के रूप में 1947-48 में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें यूडीएचआर के आर्टिकल 1 में एक महत्वपूर्ण भाषागत सुधार हेतु जाना जाता है। पहले इसमें ‘ऑल मेन आर बॉर्न फ्री एंड इच्ल’ लिखा गया था जिससे एलेनोर रोसवैल्ट भी सहमत थीं किंतु हंसा मेहता ने अपने प्रखर तर्कों से इसे संशोधित करने हेतु बाध्य कर दिया, इसे बदल कर ‘ऑल ह्यूमन बीइंग्स आर बॉर्न फ्री एंड इच्ल’ किया गया। कालांतर में 1950 में हंसा मेहता संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग की वाईस चेयरमैन बनीं।
बेगम शाइस्ता सुहरावर्दी इकरामुल्लाह(1915-2000) जानी मानी पाकिस्तानी राजनेत्री, राजनयिक और लेखिका थीं। उन्हें लंदन विश्विद्यालय से पीएच डी की उपाधि प्राप्त करने वाली प्रथम मुस्लिम महिला होने का गौरव प्राप्त है। वे संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा की सामाजिक-सांस्कृतिक तथा मानवीय विषयों की तीसरी समिति में प्रतिनिधि थीं। इस समिति ने यूडीएचआर के मसौदे पर चर्चा करने के लिए 1948 में 81 बैठकें की थीं। उन्हें यूडीएचआर में आर्टिकल 16 को सम्मिलित कराने का श्रेय दिया जाता है जो विवाह के संबंध में महिलाओं को बराबरी के अधिकार प्रदान करता है। उनका मानना था कि अनुच्छेद 16 बाल विवाहों और दबावपूर्वक होने वाले विवाहों की रोकथाम में सहायक सिद्ध होगा। उन्होंने मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा में महिलाओं को स्वतंत्रता, समानता और चयन के अधिकार दिलाने के लिए प्रयास किया।
लक्ष्मी एन मेनन(1899-1994) ने स्वाधीनता संग्राम सेनानी एवं राजनेत्री के रूप में ख्याति अर्जित की। वे राज्यसभा की 1952,1954 और 1960 में सदस्य चुनी गईं। वे नेहरूजी और शास्त्री जी के मंत्रिमंडल में विदेश राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रहीं और देश की विदेश नीति के निर्माण में उनकी अग्रणी भूमिका रही। उन्होंने केरल में इसरो की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके जीवन का उत्तरार्ध लेखन एवं समाज सेवा को समर्पित रहा। इंग्लैंड में पढ़ाई करते समय लक्ष्मी को 1927 में मॉस्को जाने का अवसर मिला जहाँ वे सोवियत संघ की दसवीं वर्षगाँठ के अवसर पर आयोजित समारोह में एक छात्र प्रतिनिधि मंडल की सदस्या के रूप में सम्मिलित हुईं। यहाँ उनकी मुलाकात जवाहरलाल नेहरू से हुई। उनसे प्रभावित होकर वे राजनीति में आ गईं। उन्हें 1948 एवं 1950 में संयुक्त राष्ट्र हेतु भारतीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में नामित किया गया। उन्हें संयुक्त राष्ट्र की कमेटी ऑन स्टेटस ऑफ वीमेन का सदस्य भी बनाया गया। उन्होंने इस बात की आवश्यकता बताई कि संपूर्ण यूडीएचआर में स्थान स्थान पर इस बात पर बल दिया जाना चाहिए कि लैंगिक आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। उन्होंने भी प्रस्तावना में इच्ल राइट्स फॉर मेन एंड वीमेन के उल्लेख की पुरजोर वकालत की। लक्ष्मी मेनन ने उस मानसिकता को सिरे से खारिज कर दिया जो औपनिवेशिक शासन के अधीन रहने वाले देशों के नागरिकों को किसी भी तरह के मानव अधिकार देने का विरोध करती थी। उन्होंने मानव अधिकारों की सार्वभौमिकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि यदि महिलाओं और उपनिवेशों में रहने वाले लोगों का मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा में पृथक से उल्लेख नहीं किया जाएगा तो इन्हें ‘एवरीवन’ की परिधि से बाहर मान लिया जाएगा।
इस विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स को सच्चे अर्थों में यूनिवर्सल बनाने में महिलाओं की अविस्मरणीय भूमिका रही। मानव अधिकार केवल कागजों में सिमटे शुष्क आदर्श बनकर रह जाते यदि उन्हें महिलाओं की संवेदनशील जीवन दृष्टि का स्पर्श नहीं मिलता। जैसा एलेनोर रोसवैल्ट ने कहा- ‘आखिरकार सार्वभौमिक मानवाधिकारों की शुरुआत कहाँ से हुई? यह शुरुआत हुई छोटी जगहों से, घर के पास वाली छोटी जगहें- इतनी नजदीक और इतनी छोटी कि यह किसी भी नक्शे में दिखाई नहीं देंगी। यदि यह अधिकार उन घर के नजदीक वाली छोटी जगहों के लिए उपयोगी और अर्थपूर्ण नहीं हैं तो फिर इनका महत्व शायद किसी भी स्थान के लिए नहीं होगा। घरों के नजदीक इन मानव अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस नागरिक प्रयत्नों के अभाव में विराट विश्व में मानवाधिकारों के विकास की कल्पना करना भी व्यर्थ है।’
आज जब हम एक बलात्कारी, परपीडक़, हिंसक, धर्म संचालित पितृसत्तात्मक समाज एवं शासन व्यवस्था बनने की ओर अग्रसर हैं जहाँ देश के अनेक राज्यों में लिंगानुपात चिंताजनक रूप से कम है और अनेक राज्यों में नारियों की जीवन साथी चुनने की क्षमता पर संदेह किया जा रहा है तब मानव अधिकारों की इस सार्वभौमिक घोषणा को रूपाकार देने वाली इन महिलाओं से प्रेरित होने की आवश्यकता है तभी हम इन कठिन परिस्थितियों का मुकाबला कर सकेंगे।
(रायगढ़, छत्तीसगढ़)
तसलीम खान-
सरकार की नीयत तो हालांकि उसी वक्त साफ हो गई थी जब उसने अपने ही देश के अन्नदाता के लिए दिल्ली दरबार के दरवाजों पर पहरे बैठा दिए। सरकार के कानों तक अपनी बात पहुंचाने आए किसानों के साथ दुश्मनों जैसा बरताव किया गया, उनके रास्ते में खाइयां खोदी गईं, कंटीले तार बिछाए गए, आंसू गैस के गोले फेंके और जल तोपों से हमले किए। लेकिन जमीन का सीना चीरकर देश का पेट पालने वाले कहां डरने वाले थे। उन्होंने हाथ नहीं उठाया, पलटकर हमला नहीं किया, कहा सिर्फ इतना कि हमारी इतनी बात तो सुन लोग कि हमारे ही बारे में बनाए गए कानून में हमारी राय क्यों नहीं लगी गई? हमारी फसलों की कीमत तय करने का अधिकार क्यों बड़े-बड़े कार्पोरेट को दिया जा रहा है? हमारे साथ कोई धोखाधड़ी हो जाए तो हमसे अदालत जाने का संवैधानिक अधिकार क्यों छीना जा रहा है?
लेकिन अपने ही इको चैम्बर में बैठी केंद्र की मोदी सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगी। नतीजा क्या हुआ, दिल्ली की घेराबंदी कर किसान ने ऐलान कर दिया कि अब आर-पार की बात होगी।
लेकिन यह सब अचानक नहीं हुआ...
दिल्ली के विज्ञान भवन में अब अगर मोदी सरकार किसानों से बात कर रही है और किसान वही मुद्दे उठा रहे हैं जो विपक्ष ने इन कानूनों को संसद में पेश करते हुए उठाए थे, और सरकार ने तानाशाही करते हुए उन्हें अनदेखा कर दिया था, तो इसके लिए मोदी सरकार खुद ही तो जिम्मेदार है।
विपक्ष ने सरकार से यही आग्रह किया था इन कृषि बिलों को जल्दबादी में पास न किया जाए, बल्कि संसदीय समिति के पास भेज दिया जाए ताकि इसके नफे-नुकसान पर चर्चा हो और इसकी खामियों को दूर कर खूबियों को देश के सामने रखा जा सके। विपक्ष ने एमएसपी, एपीएमसी यानी मंडी व्यवस्था, कांट्रेक्ट फार्मिंग यानी ठेके पर खेती और उसके विवाद निवारण की प्रक्रिया आदि पर सवाल उठाए थे। किसान भी तो आज यही मुद्दे सरकार के सामने उठा रहे हैं।
और हां ध्यान रहे इन मुद्दों को सिर्फ विपक्षी दलों ने ही नहीं बल्कि सरकार के समर्थक माने जाने वाले बीजेडी और एआईएडीएमके ने भी संसद में उठाया था। लेकिन बहुमत के अहंकार में डूबी मोदी सरकार के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने 17 सितंबर को लेकसभा में कहा, “मैं किसानों से अपील करूंगा कि वे राजनीतिक दृष्टि से किए गए किसी भी दुष्प्रचार से प्रभावित न हों...”
अगर सिलसिलेवार देखें कि इन कानूनों को लेकर संसद में किस दल ने क्या कहा तो आइने की तरह साफ हो जाएगा कि खामी इन कानूनों में है, मोदी सरकार की दृष्टि में है न कि विपक्ष के नजरिए या किसानों की मांगों में।
लोकसभा में जब सरकार ने कृषि कानून पेश किए तो इस पर चर्चा की शुरुआत में लुधियाना से कांग्रेस सांसद रवनीत सिंह ने कहा था, “अगर आप पंजाब के किसानों को मुसीबत में डालेंगे, तो ध्यान रखना पूरा देश इसका खामियाजा भुगतेगा, अगर आप किसानों पर त्याचार करेंगे तो देश कैसे काम करेगा। पंजाब और हरियाणा से हमारे देस के जवान भी आते हैं, इसका असर हो सकता है...”
वहीं चर्चा के अंत में लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा था, “आप कह रहे हैं कि इससे किसानों को फायदा होगा। आप दिखा दीजिए कि कौन सा किसान इससे खुश है। हरियाणा और पंजाब के किसान नाराज हैं, वहां अशांति बढ़ रही है...”
इसी कानून पर राज्यसभा में 20 सितंबर को अकाली दल सांसद नरेश गुजराल का बयान था, “पंजाब के किसानों को कमजोर मत समझना मंत्री जी, मेरी सिर्फ एक दरख्वास्त है, पंजाब और हरियाणा में जो चिंगारी उठी है उसे आग मत बनने दीजिए...वरना देश के इतिहास में लिखा जाएगा कि लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई...”
पूर्व प्रधानमंत्री और जेडीएस नेता एच डी देवेगौड़ा का भी यही कहना था, “किसानों का एक डर यह भी है कि इन कानूनों से एमएसपी खत्म हो जाएगी, इससे वे प्राइवेट प्लेयर के रहमोकरम पर आश्रित हो जाएंगे...और जिस तरह जल्दबाजी में इन कानूनों को लाया जा रहा है इससे किसानों का शक गहरा गया है...” वहीं एआईएडीएमके नेता एस आर बालासुब्रहमण्यम ने कहा था कि कानून एमएसपी पर खामोश है जो कि किसानों के अस्तित्व का बड़ा आधार है। सरकार को एमएसपी को इस कानून का अभिन्न अंग बनाना चाहिए।
कांग्रेस के प्रताप सिंह बाजवा का भी तर्क था कि, “कृषि और मंडी संविधान के सातवें अनुच्छेद के मुताबिक राज्यों का विषय है, लेकिन इन कानूनों में राज्यों को बाहर कर संघीय ढांचे से छेड़छाड़ की जा रही है, हम नहीं चाहते कि कृषि मंडियों और एमएसपी को छेड़ा जाए।” डीएमके सांसद के शनमुगसुंदरम ने भी एमएसपी का मुद्दा उठाया था को शिवसेना के अरविंद सावंत ने कहा था कि ऐसा प्रावधान किया जाना चाहिए कि कोई भी एमएसपी से कम पर फसल न खरीद सके ताकि किसान का नुकसान न हो।
इसके अलावा टीडीपी के राम मोहन नायडू और सीपीए के बिनॉय बिस्वास ने भी एमएसपी का मुद्दा उठाया था। सीपीआई ने कहा था कि अगर कृषि मंत्री एमएसपी को इस कानून में शामिल कर लेत हैं तो यकीन मानिए कि आपकी नीतियों केविरोध के बावजूद हम इस कानून का समर्थन करें। लेकिन इन सबके जवाब में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंग तोमर ने सिर्फ इतना कहा था कि, “एमएसपी आधारित खरीद पहले भी होती रही है और आगे भी होती रहेगी।”
इसी तरह विवाद की स्थिति में किसानों की परेशानियों को उजागर करते हुए टीडीपी ने कहा था कि, “आखिर विवाद की स्थिति में किसान को अदालत जाने की इजाजत क्यों नहीं है...यह तो पक्षपात हुआ...ऐसे में सरकार को एक एग्रीकल्चर ट्रिब्यूनल बनाने पर विचार करना चाहिए...”
इस कानून में विवादों के निपटारे की खामियों को उजागर करते हुए कांग्रेस के एस ज्योतिमनी ने तर्क दिया था, “कानून कहता है कि विवाद की स्थिति में किसान कंसीलिएशन बोर्ड के पास जाएगा, वहां 30 दिन तक कुछ नहीं हुआ तो एसडीएम के पास जाएगा और वहां भी कुछ नहीं हुआ तो डीएम के पास जाएगा..इस प्रक्रिया से गरीब किसान की तो जान निकल जाएगी...और फिर उसके सामने तो बड़े-बडे कार्पोरेट के महंगे वकीलों की फौज होगी..और फिर इस सारी मानसिक प्रताड़ना के बाद भी उसे इंसाफ मिलेगा इसकी क्या गारंटी है...”
लेकिन नरेंद्र सिंह तोमर ने इतना कहकर पल्ला झाड़ लिया कि विवादों के निपटारने समुचित व्यवस्था कानून में की गई है।
सवाल है कि आखिर वह कौन सी हड़बड़ी थी कि सरकार इन कानूनों की खामियों को सुनने तक को तैयार नहीं थी। और राज्यसभा में जिस तरह संसदीय परंपराओं और संवैधानिक व्यवस्था की धज्जियां उड़ाते हुए इन कानूनों को पास कराया गया वह स्वतंत्र भारत के संसदीय इतिहास का काला अध्याय बन चुका है। (navjivan)
मृणाल पाण्डे-
अब अंतरधार्मिक विवाह केवल समाजशास्त्रियों या परिवारों के लिए महत्त्व का विषय नहीं, राज्य सरकारों ने भी इसमें सीधी दखलंदाजी का मन बना लिया है। उत्तर प्रदेश सरकार इस बारे में अध्यादेश ले आई और दो दिनों के अंदर ही एक मामला दर्ज भी कर लिया गया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जैसे ही लव जिहाद के खिलाफ बिगुल फूंका, इसकी गूंज विंध्य के उस पार तक सुनाई दी जब कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा ने यह कहा कि उनके राज्य में लव जिहाद के नाम पर होने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाई जाएगी।
‘लव जिहाद’ के नए विभाजनकारी प्रयोग की यात्रा दरअसल 2016 में शुरू हुई जब केरल की एक हिंदू लड़की, अकिला अशोकन ने अपने मुस्लिम प्रेमी से विवाह करने के लिए इस्लाम धर्म अपना लिया और हिजाब पहनना शुरू कर दिया। इस्लाम अपनाने के बाद उसका नाम हदिया हो गया। हदिया के घर वाले इस विवाह के सख्त खिलाफ थे और उसके पिता अशोकन इस मामले को अदालत में ले गए कि उनकी वयस्क बेटी को इस्लामवादियों की नापाक साजिश के तहत गुमराह किया गया। उनके वकील ने दावा किया कि मुस्लिम लड़के जान- बूझकर हिंदू नाम रखकरअपनी पहचान छिपाकर हिंदू लड़कियों को फांस रहे हैं ताकि उनका धर्मांतरण करके मुसलमानों का तादाद बढ़ाई जा सके। यह अदालती लड़ाई दो साल तक चली और इस दौरान भाजपा ने पिता की तरफदारी करते हुए इसे हिंदुओं के खिलाफ ‘लव जिहाद’ करार दिया। कहा कि मौलवियों और उनके समर्थकों के समूह चोरी-छिपे यह सब कर रहे हैं। तब केंद्र में भाजपा की सरकार से पुरजोर तरीके से यह बात उठी कि हदिया को उसके मां-बाप को सौंपा जाए और उसे वापस हिंदू धर्म में शामिल किया जाए। हालांकि हदिया ने मजबूती से अपना पक्ष रखा और अंततः सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि इस्लामी कानून के तहत की गई हदिया की शादी पूरी तरह वैध थी।
अदालती फैसले से इस प्रकरण का तो पटाक्षेप हो गया लेकिन शब्द ‘लव जिहाद’ चल निकला। इससे पहले तक ऐसे विवाह को कट्टर हिंदुत्व के झंडाबरदार मुस्लिम युवकों द्वारा हिंदू लड़कियों को फांसे जाने की घटना के तौर पर बताते थे लेकिन अब वे इसे आपराधिक साजिश करार देने लगे जिसके लिए दुनिया भर के मुस्लिम संगठन पैसे मुहैया कराते हैं ताकि हिंदू लड़कियों का धर्मांतरण करके इस्लाम न मानने वालों में जेहाद का संदेश फैलाया जा सके। यहां तक कि फिल्मों और विज्ञापनों में भी मुस्लिम पुरुष के साथ हिंदू महिला की जोड़ी पर भगवा ब्रिगेड हंगामा खड़ा करने लगा। फिल्म पद्मावती की बात हो या फिर तनिश्क के विज्ञापन की जिसमें एक मुस्लिम सास अपनी हिंदू बहू की गोद भराई कर रही होती है, संकीर्ण हिंदूवादियों की भीड़ सड़कों पर उतरआती है, टीवी कैमरों के सामने लाठी-डंडे और यहां तक कि तलवारें तक लहराती है। सड़कों पर उतरे लोग गला फाड़कर हिंदू भावनाओं को कथित तौर पर जान-बूझकर आहत किए जाने के खिलाफ नारे लगाते हैं। आसपास खड़े तमाशबीनों की पिटाई करते हैं और आपत्तिजनक दृश्य दिखाने के लिए सिनेमा हॉल-शोरूम को जबरन बंद कराते हैं, उन्हें माफी मांगने को मजबूर करते हैं।
अभी यह सब चल ही रहा था कि केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किशन रेड्डी ने एक तारांकित सवाल के जवाब में संसद को जानकारी दी कि एनआईए ने दो अंतरधार्मिक विवाहों की जांच की और उसे इनमें किसी भी तरह की धोखाधड़ी या जबरन धर्मांतरण का कोई सबूत नहीं मिला। उन्होंने साफ किया कि शब्द “लव जिहाद” मौजूदा कानूनों के तहत परिभाषित नहीं है। विभिन्न अन्य उच्च न्यायालयों ने भी हदिया के विवाह पर केरल उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा है जिसमें संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रावधानों का हवाला दिया गया है जो नागरिकों को सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के दायरे में रहते हुए अपनी मर्जी के धर्म को मानने और उसके मुताबिक आचरण की आजादी देता है।
दुनिया भर में महिलाओं को यौनाचार की वस्तु के तौर पर देखा जाता है और यह महिलाओं के साथ इस प्रवृत्ति का वैसा ही रिश्ता है जैसा मछली का जल से। लव जिहाद की अवधारणा उसी अजीब और कड़वी मनोवृत्ति को स्थापित करती है जो महिलाओं की यौनचारिता को यौन रिश्तों की पुरुष प्रधान व्यवस्था में ही कैद रखना चाहती हैं। रिश्तेदारों, न्यायविदों या शासकों के रूप में पुरुष विवाह और परस्पर रिश्तों की पूरी पटकथा लिखता है जो अंततःअन्य पुरुषों की ही तरफदारी करती है। पुरुष के इस्तेमाल की यौन-वस्तु होने का भाव जब लड़की की सामाजिक छवि की बुनियाद हो जाता है तो पुरुष प्रभुत्व वाली व्यवस्था के लिए लड़की के यौनाचार को नियंत्रित करना बेहद अहम हो जाता है ताकि उसकी प्रजनन क्षमता को उसी पितृ सत्तात्मक व्यवस्था में सीमित रखा जा सके जिसकी वह हिस्सा होती है। हर संस्कृति में ऐसा ही होता है और इसी का नतीजा है कि हर समाज में अंतरधार्मिक विवाहों से लेकर बलात्कार, अनाचार और विवाहेत्तर संबंधों जैसे सभी तरह के यौनाचार में पुरुष की तुलना में महिला के लिए कहीं सख्त सजा का प्रावधान है। इस तरह से परिभाषित यौनचारिता की बुनियाद इस बात पर टिकी होती है कि उनकी स्थापित पुरुष प्रभुत्व वाली व्यवस्था किसी आचरण की इजाजत देती है या नहीं।
कुल के लिए घातक होने का तर्क
अंतरधार्मिक विवाहों पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून की मांग करने वाले पुरुष मानते हैं कि महिलाओं का अपने शरीर का नियंत्रण पाना उनकी सत्ता के लिए गंभीर खतरा है। उनके लिए महिलाएं उनकी जागीर हैं और ऐसी मशीन जिनका इस्तेमाल खास तौर पर पुरुष-परिभाषित विशिष्ट समुदायों के भीतर ज्यादा से ज्यादा नस्लीय रूप से ‘शुद्ध’ लड़कों और जितना संभव हो कम लड़कियों को जन्म देने के लिए किया जा सके। ऐसी प्रतिगामी सोच महिलाओं को समुदाय की बेड़ियों को तोड़ने से रोकती है क्योंकि उसके मुताबिक ऐसा करना कुल के लिए घातक होता है।
जहां तक कानूनी व्यवस्था का सवाल है, महिलाओं का अनुभव तो यही कहता है कि यह पुरुषों की ओर झुका हुआ है। इसकी वाजिब वजह भी है। इस व्यवस्था को मुख्यतः पुरुषों ने बनाया, उन्होंने ही इसे परिभाषित किया और वही इससे जुड़े विवादों पर फैसला सुनाते हैं। न्याय मिलने में देरी होती है, सुनवाई ऐसे खिंचती है जैसे कभी खत्म ही न होने वाली हो, अदालत के बाहर मामले को निपटा लेने का भारी दबाव बनाया जाता है। महिला और उसके बच्चे के लिए मुआवजा-गुजारे का पैसा वगैरह अटका रहता है और इस दौरान उसे कलंक की तरह देखा जाता है। इसके बावजूद कि अलग-अलग धर्मों के दो वयस्कों के बीच रजामंदी से विवाह को पूर्ण कानूनी वैधता प्राप्त है, हदिया को अपने विवाह को मान्य घोषित करने वाला फैसला पाने में दो साल लग गए।
हाल के समय में दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने जिस तरह अंतरधार्मिक विवाह पर रोक लगाने के कानून बनाने के बयान दिए हैं, उससे साफ है कि एक उदार लोकतांत्रिक देश के तौर पर भारत खुद को जितना भी तटस्थ, उन्नत, उदार और लिंग-भेद से मुक्त बता दे लेकिन महिलाओं पर पुरुष नियंत्रण को बदलने को वह हरगिज तैयार नहीं।
इसलिए अंतरधार्मिक विवाहों पर प्रतिबंध की मांग दरअसल हमारे मिश्रित समाज पर पुरुषवादी सत्ता की निगरानी का परिचायक है जिसमें बताया जाता है कि बहुसंख्यक समुदाय की संरचना इतनी भेद्य है कि इसकी महिलाओं से दोस्ती और फिर विवाह करने की मंशा के साथ अल्पसंख्यक समुदाय का कोई पुरुष उसमें घुसपैठ कर सकता है। कानून के लिहाज से भारतीय महिलाओं के लिए लैंगिक समानता को सार्थक बनाने के लिए हदिया मामले के साथ शुरू हुए टकराव के इस दौर में कानूनी रोक की मांग के पीछे के वास्तविक मुद्दों की पहचान करनी चाहिए और फिर उनका सभी समुदायों की महिलाओं के दृष्टिकोण के जरिये प्रतिकार करना चाहिए। (navjivan)
कोविड-19 महामारी के दौर में सोने के दाम आसमान छूने लगे. अचानक सोने की क़ीमत में उछाल आया.
पिछले साल ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने के उत्पादन में एक प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है. सोने के उत्पादन में आई ये पिछले एक दशक की सबसे बड़ी गिरावट है.
कुछ जानकारों का तर्क है कि खदानों से सोना निकालने की सीमा अब पूरी हो चुकी है. जब तक सोने की खदानों से खनन पूरी तरह से बंद नहीं किया जाएगा, सोने का उत्पादन गिरता रहेगा.
सोने के ऊंचे दाम होने की वजह भी यही है कि अमेज़न के जंगलों में सोने की खदानों में बड़े पैमाने पर अवैध खनन का काम हुआ है.
सोने की क़ीमत में उछाल भले ही आ गया हो, लेकिन इसकी मांग में कोई कमी नहीं आई है. CFR इक्विटी रिसर्च के एक्सपर्ट जानकार मैट मिलर का कहना है कि सोने की जितनी मांग इन दिनों है, उससे ज़्यादा पहले कभी नहीं थी.
मिलर के मुताबिक़ दुनिया में पाए जाने वाले कुल सोने का लगभग आधा हिस्सा जूलरी बनाने में इस्तेमाल होता है.
इसमें वो हिस्सा शामिल नहीं है, जो ज़मीन में दफ़न है. बाक़ी बचे आधे सोने में से एक चौथाई केंद्रीय बैंकों से नियंत्रित किया जाता है जबकि बाक़ी का सोना निवेशकों या निजी कंपनियों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है.

सोना - भरोसेमंद संपत्ति
मिलर का कहना है कि कोविड-19 की वजह से पूरे विश्व का आर्थिक तंत्र चरमरा गया है. अमेरिकी डॉलर से लेकर रुपया तक कमज़ोर हुआ है.
लगभग सभी देशों के सरकारी ख़जाने का बड़ा हिस्सा महामारी नियंत्रण पर ख़र्च हो रहा है. करंसी की छपाई के लिए भारी रक़म उधार ली जा रही है.
जानकारों का कहना है कि इसी वजह से करंसी का मूल्य ज़्यादा अस्थिर हो गया है. वहीं दूसरी ओर निवेशक सोने को भरोसेमंद संपत्ति मानते हैं.
कोरोना महामारी ने सोने के खनन कार्य को भी प्रभावित किया है. निकट भविष्य में इसकी आपूर्ति बढ़ने की संभावना भी नहीं है.
मिलर का कहना है कि सोने की मांग अभी इसी तरह बढ़ती रहेगी और बाज़ार में अभी जो सोना आ रहा है वो ज़्यादातर रिसाइकिल किया हुआ है.
मिलर तो यहां तक कहते हैं कि आने वाले समय में रिसाइकिल सोना, सोने के सिक्के यहां तक कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के सर्किट बोर्ड में इस्तेमाल होने वाला सोना भी भविष्य में इस धातु का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन जाएगा.
एक रिसर्च से पता चलता है कि पिछले 20 वर्षों में सोने की जितनी आपूर्ति हुई है, उसका 30 फ़ीसद हिस्सा रिसाइकिलिंग से ही आया है.

खनन का विरोध
सोने की रिसाइकिलिंग में कुछ ज़हरीले रसायनों का इस्तेमाल होता है, जो पर्यावरण के लिए घातक हैं. फिर भी ये सोने के खनन की प्रक्रिया से कम ही घातक है.
जर्मनी की गोल्ड रिफ़ाइनरी की हालिया रिसर्च बताती है कि एक किलो सोना रिसाइकल करने में 53 किलो या उसके आसपास कार्बन डाईऑक्साइड निकलती है.
जबकि खान से इतना ही सोना निकालने में 16 टन या उसके बराबर कार्बन डाईऑक्साइड निकलती है.
सोने के खनन से पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. इसलिए दुनिया भर में जहां कहीं भी सोने की खाने हैं, वहां के स्थानीय लोग इसके खनन का विरोध करते हैं.
इस विरोध की वजह से भी सोने के उत्पादन में भारी कमी आ रही है. मिसाल के लिए चिली में पास्कुआ-लामा खदान में खनन का काम इसलिए रोक दिया गया कि वहां के स्थानीय पर्यावरण संरक्षक कार्यकर्ता विरोध करने लगे थे.
इसी तरह उत्तरी आयरलैंड के देश टाइरोन में लोग सड़कों पर उतर आए. इस इलाक़े में सोने की खदानें हैं. कई कंपनियां यहां प्रोजेक्ट शुरू करना चाहती हैं. लेकिन, स्थानीय कार्यकर्ता इसका लगातार विरोध कर रहे हैं.
उनका कहना है कि खनन से इलाक़े को जो नुक़सान होगा, उसकी भरपाई स्थानीय लोगों को करनी पड़ेगी.
हालांकि इस इलाक़े में पिछले तीस साल से लोग रोज़गार की कमी से जूझ रहे हैं. कंपनी ने उन्हें रोज़गार के साथ अन्य सुविधाएं देने का वादा किया है, फिर लोग राज़ी नहीं हैं.
खदानों वाली जगह पर बदली ज़िंदगी
लेकिन एक सच ये भी है कि जहां सोने की खदानें स्थापित हो गई हैं वहां के लोगों की ज़िंदगी बदल गई है.
अमेरिका के नेवाडा सूबे की गोल्ड माइन दुनिया की सबसे बड़ी सोने की खदान है. यहां से हर साल लगभग 100 टन से ज़्यादा सोना निकाला जाता है.
इस इलाक़े के आसपास के लोगों को न सिर्फ़ इन खदानों की वजह से नौकरी मिली है, बल्कि उनका रहन सहन भी बेहतर हुआ है.
सोने की खदान से सिर्फ़ सोना ही नहीं निकलता, बल्कि इसके साथ अन्य क़ीमती धातुएं जैसे तांबा और सीसा भी निकलते हैं.
उत्तरी आयरलैंड के क्यूरेघिनाल्ट खदान से सोना निकालने में खुद आयरलैंड के सियासी हालात भी काफ़ी हद तक रोड़ा बने रहे हैं. देश में फैले आतंक और हिंसा के चलते भी यहां काम करना काफ़ी मुश्किल था.
क्यूरेघिनाल्ट, ब्रिटेन में पाई गई अब तक की सबसे बड़ी सोने की खदान है.

खदान के आसपास करीब 20 हज़ार लोगों की आबादी है. ये इलाका क़ुदरती ख़ूबसूरती से भरपूर है.
आसपास घने जंगल और खेत हैं. यहां काम करने वाली कंपनी लोगों को हर तरह से मनाने की कोशिश कर रही है.
कंपनी ने एक खुले गड्ढे वाली शैली की परियोजना के बजाय एक भूमिगत खदान का निर्माण और विदेशों में इस्तेमाल होने वाली तकनीक के सहारे छड़ें निकालने की योजना भी बनाई है.
कंपनी ने लोगों से यहां तक कहा कि पानी का 30 फ़ीसद हिस्सा कम इस्तेमाल किया जाएगा.
कार्बन उत्सर्जन भी 25 फ़ीसद तक नियंत्रित करके इसे यूरोप की पहली कार्बन न्यूट्रल माइन बनाया जाएगा.
लेकिन लोग किसी भी सूरत में राज़ी नहीं हैं. थक हार कर कंपनी ने 2019 में प्रोजेक्ट ही बंद कर दिया. (bbc)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन त्रूदो, ब्रिटेन के 36 सांसदों और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव अंतोनियो गुतरोस ने भारत में चल रहे किसान-आंदोलन से सहानुभूति व्यक्त की है। उन्होंने यही कहा है कि उन्हें शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने देना चाहिए और उनकी कठिनाइयों को सरकार द्वारा दूर किया जाना चाहिए। इस पर हमारे कुछ सरकारी और भाजपा-प्रवक्ता भडक़ उठे हैं। वे इन लोगों से कह रहे हैं कि आप लोग हमारे अंदरुनी मामलों में टांग क्यों अड़ा रहे हैं ?
उनका यह सवाल रस्मी तौर पर एक दम ठीक है। वह इसलिए भी ठीक है कि भारत सरकार के मंत्रिगण किसान नेताओं के साथ बहुत नम्रता और संयम से बात कर रहे हैं और बातचीत से ही इस समस्या का समाधान निकालना चाहते हैं।
असली सवाल यह है कि इसके बावजूद ये विदेशी लोग भारत सरकार को ऐसा उपदेश क्यों दे रहे हैं? शायद इसका कारण यह रहा हो कि पिछले हफ्ते जब यह आंदोलन शुरु हुआ तो हरियाणा और दिल्ली की केंद्र सरकार ने किसानों के साथ कई ज्यादतियां की थीं लेकिन विदेशी लोगों को फिर भी क्या अधिकार है, हमारे आंतंरिक मामलों में टांग अड़ाने का? इसका एक बड़ा कारण यह भी हो सकता है कि कनाडा और ब्रिटेन में हमारे किसानों के रिश्तेदार बड़े-बड़े पदों पर विराजमान हैं। उन्होंने अपने रिश्तेदारों को अपनी करुण-कथा बढ़ा-चढ़ाकर सुनाई होगी। उन रिश्तेदारों ने उन देशों के शीर्ष नेताओं को प्रेरित किया होगा कि वे उनके रिश्तेदारों के पक्ष में बोलें। तो उन्होंने बोल दिया। उनके ऐसे बोले पर हमारी सरकार और भाजपा प्रवक्ता का इतना चिढ़ जाना मुझे जरुरी नहीं लगता।
हालांकि उनका यह तमाचा त्रूदो पर सही बैठा है कि विश्व-व्यापार संगठन में जो त्रूदो सरकार किसानों को समर्थन मूल्य देने का डटकर विरोध कर रही है, वह किस मुंह से भारत सरकार पर उपदेश झाड़ रही है ?
भारत के विदेश मंत्री जयशंकर द्वारा कनाडा द्वारा आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय संवाद का भी बहिष्कार कर दिया गया है। उन्होंने ऐसा ही अमेरिकी सांसद प्रमिला जयपाल के एक बयान पर आपत्ति दिखाने के लिए किया था। उन्हें अपने गुस्से पर काबू करना चाहिए, वरना ये छोटी-छोटी लेकिन उग्र प्रतिक्रियाएं हमारी विदेश नीति के लिए हानिकर सिद्ध हो सकती हैं। आधुनिक दुनिया बहुत छोटी हो गई है। विभिन्न देशों के राष्ट्रहितों ने अंतरराष्ट्रीय स्वरुप ले लिया है। इसीलिए देशों के आतंरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप अपने आप हो जाता है। (नया इंडिया की अनुमति से)
समीरात्मज मिश्र-
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाक़ों के किसान इस मौसम में बहुत व्यस्त रहते हैं. गन्ने की कटाई-छिलाई के साथ-साथ गेहूं बोने का भी यही मौसम है.
आमतौर पर इस वक़्त किसान खेतों में डटे रहते हैं लेकिन इस समय उनके खेतों में सन्नाटा है या फिर कुछ मज़दूर और घर की औरतें ही खेतों में काम करती मिलेंगी.
मेरठ, बाग़पत, मुज़फ़्फ़रनगर, शामली, सहारनपुर जैसे ज़िलों के तमाम किसान दिल्ली सीमा पर नए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ चल रहे प्रदर्शन में हिस्सा लेने गए हुए हैं.
शामली ज़िले में बाबरी थाने के हाथीकरौंदा गांव के रहने वाले राजवीर ट्रैक्टर पर गन्ने लादकर जा रहे थे. उनके साथ ट्रैक्टर पर कुछ और लोग भी बैठे थे. पीछे दो महिलाएं भी बैठी थीं.
हमसे बात करने के लिए राजवीर ट्रैक्टर से नीचे उतरे. मैंने सवाल किया, "आप लोग प्रदर्शन में नहीं गए?"
उन्होंने बिना किसी देरी के कड़क आवाज़ में जवाब दिया, "गए थे जी. तीन तारीख़ वाली मीटिंग में हम थे. अभी हमारे भाई हैं वहां पे. सरकार नहीं मानी हमारी बात और आंदोलन आगे चला तो हम फिर जाएंगे."

घर से लोग बारी-बारी जा रहे
राजवीर के साथ खड़े एक अन्य बुज़ुर्ग ईश्वर बोल पड़े, "घर में पशु भी हैं. उन्हें कौन देखेगा? इसीलिए हर घर से लोग बारी-बारी से वहां जा रहे हैं."
राजवीर सिंह के पास क़रीब तीस बीघे की खेती है और ज़्यादातर पर वो गन्ना बोते हैं. गन्ने के अलावा कुछ दूसरी फ़सलें भी बो लेते हैं. बताते हैं कि जीवन ठीक से चल रहा है लेकिन नए क़ानून से हमारा बहुत नुक़सान होगा.
नुक़सान के सवाल पर कहते हैं, "क़ानून जो बनाया है सरकार ने, वो पक्का नहीं बनाया है. एसएमपी (यहाँ के किसान एमएसपी को यही कहते हैं) जो है ये पक्की कर दी जाए तब सही रहेगा. सरकार तो आती-जाती रहेगी लेकिन क़ानून पक्का रहेगा तो उसे कोई छेड़ नहीं पाएगा. सरकार क्यों नहीं कर रही है? इसका मतलब उसकी नीयत में कोई खोट है. खेती का तो इस समय बहुत नुक़सान हो रहा है, फिर भी किसान डटे हैं. क्या करें? अभी तो एक सीज़न की फ़सल बर्बाद होवैगी, क़ानून तो किसानों का भविष्य ही चौपट कर बैठेगा."

खेती का नुक़सान
नए कृषि क़ानून के ख़िलाफ़ किसान इस समय दिल्ली सीमा पर डटे हैं. पश्चिमी यूपी के कई ज़िलों से बड़ी संख्या में किसान दिल्ली बार्डर पर पहुंचे हैं और जगह-जगह सड़कों पर धरना प्रदर्शन चल रहा है.
कई दौर की वार्ता के बाद भी कोई हल न निकलने के कारण किसानों को लग रहा है कि आंदोलन लंबा खिंच सकता है. इसके लिए किसान इस रणनीति पर काम कर रहे हैं कि बारी-बारी से कुछ लोग वहां से आ रहे हैं और दूसरे लोग यहां से जा रहे हैं.
साथ में राशन-पानी की आपूर्ति भी क़ायदे से हो जाती है. पश्चिमी यूपी के इन इलाक़ों की दिल्ली से दूरी भी ज़्यादा नहीं है.
यह ज़रूर है कि पुरुष सदस्यों के आंदोलन में जाने के कारण खेती को नुक़सान हो रहा है क्योंकि ज़्यादातर किसान अपनी खेती ख़ुद ही करते हैं. बड़े किसानों के यहां मज़दूर भी काम करते हैं लेकिन छोटे किसानों के यहां घर के ही सभी सदस्य मिलकर खेती करते हैं.
किसानों के आंदोलन में शामिल होने के चलते अभी उनके घर की महिलाओं ने खेती और फ़सलों की देख-रेख का ज़िम्मा सँभाल रखा है.
इन सभी ज़िलों में खेतों में गन्ने की खड़ी फ़सल दिखेगी जहां कुछ हिस्सों में गन्ने की कटाई हुई है लेकिन उसके बाद से कटाई बंद है.
कुछ जुते खेत सूख रहे हैं लेकिन अभी उनमें गेहूं नहीं बोया जा सका है. कुछ खेतों में बुवाई हो चुकी है लेकिन ऐसे खेत कम ही हैं.
शामली ज़िले में हाईवे के किनारे स्थित बुटराड़ा गांव में दो मज़दूर गन्ने की छिलाई करने के बाद खेत में ही खाना खा रहे थे. ये दोनों मध्य प्रदेश के सीधी ज़िले के रहने वाले हैं और हर साल आठ-नौ महीने यहीं आकर गन्ने की कटाई-छिलाई करते हैं.
उन्हीं में से एक छविलाल ने बताया, "घर के लोग भी छिलाई करते थे लेकिन अभी हम दोनों ही काम कर रहे हैं. घर के लोग कहीं गए हुए हैं और खेत के मालिक पास के खेत में स्प्रे कर रहे हैं."
छविलाल को यह नहीं पता था कि घर के और लोग कहां गए हुए हैं.
मुज़फ़्फरनगर के सिसौली में दोपहर के वक़्त एक खेत में कुछ महिलाएं और लड़कियां खेत में काम करती मिलीं. बातचीत को तैयार हो गईं लेकिन तस्वीर नहीं खिंचाना चाहती थीं.
नीता चौधरी मेरठ विश्वविद्यालय से बीए दूसरे साल की छात्रा हैं. लॉकडाउन के बाद से ही कॉलेज बंद है तो घर पर ही पढ़ाई हो रही है.
नीता कहने लगीं, "पापा और भाई गांव के दूसरे लोगों के साथ धरने पर गए हैं इसलिए हम लोग खेत में आकर अपना काम कर रहे हैं. पहले भी करते रहे हैं लेकिन अब पूरी ज़िम्मेदारी हमारे ऊपर ही है. पता नहीं उन लोगों को वहां कितने दिन रहना पड़े. हम लोग अकेले नहीं हैं बल्कि सभी घरों की महिलाएं ही इस समय यह ज़िम्मेदारी निभा रही हैं. नहीं करेंगे तो खड़ी फ़सल ख़राब हो जाएगी. इसी के भरोसे अगले साल का पूरा ख़र्च चलता है."
आख़िरी वाक्य में नीता के चेहरे पर मुस्कान उभर आई थी लेकिन सरकार के रवैये को लेकर ग़ुस्सा भी था.
बोलीं, "हमारे यहां तो कहा जाता है कि जाट बड़े ज़िद्दी होते हैं लेकिन हमें तो लग रहा है इस सरकार से ज़्यादा ज़िद्दी कोई नहीं है. कोई बात ही सुनने को राज़ी नहीं है."
कुछ और लोगों से बातचीत में पता चला कि सिर्फ़ पुरुष ही नहीं बल्कि सिसौली क्षेत्र से कई महिलाएं भी धरने में गई हैं. तमाम लोगों के यहां शादी-विवाह भी है, बावजूद इसके लोग आंदोलन को समर्थन दे रहे हैं और वहां पहुंच रहे हैं.
शामली ज़िले में बनत गांव की एक महिला घूंघट के अंदर से ही हँसते हुए बताती हैं, "मेरा तीस साल का बेटा सूरज भी एक हफ़्ते से दिल्ली गया हुआ है. उसका छह साल का बेटा पूछता है कि पापा कहां गए हैं? रोज़ शाम को मोबाइल में फ़ोटो देखते हुए हम लोग सूरज से बात करते हैं. बच्चा उसे देखकर उसे ख़ुश हो जाता है. सूरज मोबाइल में हमें यह भी दिखाता है कि कितने लोग वहां जमा हुए हैं और कैसे लोग खाने-पीने का इंतज़ाम कर रहे हैं."

किसान सब समझ रहा है
शामली ज़िले में बाबरी थाने के बंतीखेड़ा गांव में जगबीर सिंह के घर पर बैठे कुछ लोग किसान आंदोलन के बारे में ही बातें कर रहे थे. बीच में हुक्का रखा हुआ था.
सभी लोग बारी-बारी से उसका आनंद ले रहे थे. हमें पत्रकार जान कर बुज़ुर्ग जगबीर सिंह मुस्कराए और ख़ुद ही सवाल कर बैठे- "सरकार म्हारी बात मानैगी कि नहीं?"
जगबीर सिंह के सवाल का जवाब वहां मौजूद युवा किसान वीर सिंह देते हैं जो ख़ुद तीन दिन धरने में शामिल होने के बाद गांव आए थे और अगले दिन राशन-पानी लेकर फिर से वहीं जाने को तैयार थे.
वीर सिंह कहते हैं, "मानैगी जी....मानैगी. नहीं मानौगी तो जाएगी कहां. देश भर का किसान डटा है वहां. ये तो रेल बंद है, ना तो और किसान इकट्ठा हो जाता. देर-सबेर सरकार की समझ में आएगा ही कि वो किसानों का नुक़सान करने जा रही है और इन्हीं किसानों ने उसकी सरकार बनवाई है."
नए क़ानून में किसानों की आशंकाओं को वीर सिंह कुछ इस तरह बताते हैं, "आज किसान अनपढ़ नहीं है. सब समझ रहा है. किसान को इस बात का डर है कि उसे सौ साल पहले की स्थिति में पहुंचा दिया जाएगा और अंबानी-अडानी जैसे लोगों के हवाले सारी ज़मीन हो जाएगी. वो अपने हिसाब से किसानों को बताएंगे कि भाई एमएसपी इतनी है, तुम्हारा अनाज ख़राब है, इस पर बिकेगा नहीं. मजबूरी में किसान औने-पौने दाम पर उसे बेचेगा. वो लोग अपनी मनमर्ज़ी से किसानों से खेती कराएंगे, जो चाहेंगे, उसी की खेती किसान करेगा. किसान को सबसे ज़्यादा डर इसी बात का है."

किसानों के साथ बातचीत में शामली के वरिष्ठ पत्रकार शरद मलिक भी हमारे साथ थे.
शरद मलिक बताते हैं, "क़ानून को लेकर नाराज़गी यहां के किसानें में भी थी लेकिन शुरू में ये लोग धरना-प्रदर्शन में नहीं गए. जब देखा कि हरियाणा-पंजाब के किसान डटे हुए हैं तो ये लोग भी पहुंचने लगे. दरअसल, ये पूरी बेल्ट बीजेपी समर्थक किसानों की है. इनसे बीजेपी और ख़ासकर प्रधानमंत्री मोदी के विरोध में आप एक शब्द भी नहीं सुन सकते हैं लेकिन यह मामला चूंकि सीधे इनके नफ़े-नुकसान से जुड़ा है तो अब खुलकर विरोध में आ गए हैं."
शरद मलिक की बातों की पुष्टि किसानों से बातचीत में भी हो जाती है. किसानों का सरकार से कोई विरोध नहीं है.
उनका विश्वास है कि सरकार को किसी ने भ्रमित किया होगा, अन्यथा इस तरह का क़ानून मोदी सरकार ला ही नहीं सकती थी.
बंतीखेड़ा के रहने वाले कृष्णपाल सिंह तो अब भी सरकार के समर्थन में हैं, बस सरकार थोड़ा सा सुधार कर ले.
कहते हैं, "बिल तो ठीक है जो पास करे हैं. बस डर ये है कि एमएसपी कहीं ख़त्म न कर दें. यही लिखित में दे दें तो धरना तो कल ख़त्म हो जाए." (bbc)
गांधी और आंबेडकर के संबंध कैसे थे? इस सवाल पर लंबी बहसें होती रही हैं और काफ़ी कुछ कहा-सुना जा चुका है.
ख़ुद बाबा साहब आंबेडकर ने तो गांधी को इसलिए कठघरे में खड़ा किया था कि जब आप 'भंगी' नहीं हैं तो हमारी बात कैसे कर सकते हैं?
जवाब में गांधी ने इतना ही कहा कि इस पर तो मेरा कोई बस है नहीं लेकिन अगर 'भंगियों' के लिए काम करने का एकमात्र आधार यही है कि कोई जन्म से 'भंगी' है या नहीं तो मैं चाहूंगा कि मेरा अगला जन्म 'भंगी' के घर में हो.
साल 1955 में डॉक्टर आंबेडकर ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में महात्मा गांधी के साथ अपने संबंधों और मतभेदों पर लंबी बात की थी.
बीबीसी आर्काइव से पेश इस ऐतिहासिक इंटरव्यू के कुछ अंश.
आंबेडकर: मैं 1929 में पहली बार गांधी से मिला था, एक मित्र के माध्यम से, एक कॉमन दोस्त थे, जिन्होंने गांधी को मुझसे मिलने को कहा. गांधी ने मुझे ख़त लिखा कि वो मुझसे मिलना चाहते हैं. इसलिए मैं उनके पास गया और उनसे मिला, ये गोलमेज़ सम्मेलन में भाग लेने के लिए जाने से ठीक पहले की बात है.
फिर वह दूसरे दौर के गोलमेज़ सम्मेलन में आए, पहले दौर के सम्मेलन के लिए नहीं आए थे. उस दौरान वो वहां पांच-छह महीने रुके. उसी दौरान मैंने उनसे मुलाक़ात की और दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में भी उनसे मुलाक़ात हुई. पूना समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद भी उन्होंने मुझसे मिलने को कहा. लिहाज़ा मैं उनसे मिलने के लिए गया.
वो जेल में थे. यही वो वक़्त था जब मैंने गांधी से मुलाक़ात की. लेकिन मैं हमेशा कहता रहा हूं कि तब मैं एक प्रतिद्वंद्वी की हैसियत से गांधी से मिला. मुझे लगता है कि मैं उन्हें अन्य लोगों की तुलना में बेहतर जानता हूं, क्योंकि उन्होंने मेरे सामने अपनी असलियत उजागर कर दी. मैं उस शख़्स के दिल में झांक सकता था.
आमतौर पर भक्तों के रूप में उनके पास जाने पर कुछ नहीं दिखता, सिवाय बाहरी आवरण के, जो उन्होंने महात्मा के रूप में ओढ़ रखा था. लेकिन मैंने उन्हें एक इंसान की हैसियत से देखा, उनके अंदर के नंगे आदमी को देखा, लिहाज़ा मैं कह सकता हूं कि जो लोग उनसे जुड़े थे, मैं उनके मुक़ाबले बेहतर समझता हूं.

पहली तस्वीर में मुम्बई के अपने निवास स्थान 'राजगृह' पर डॉक्टर आंबेडकर और उनका परिवार. बाईं ओर से- उनके पुत्र यशवंत, आंबेडकर, पत्नी रमाबाई आंबेडकर, भाभी लक्ष्मी बाई, भतीजा मुकुंदराव और उनका प्यारा कुत्ता टॉबी. 'राजगृह' में आंबेडकर फरवरी, 1934 में रहने के लिए आए थे. फ़ोटो साभारः दीक्षाभूमि, नागपुर और लोकवांग्मय प्रकाशन
सवाल: आपने जो भी देखा, उसके बारे में संक्षेप में क्या कहेंगे?
आंबेडकर: ख़ैर, शुरू में मुझे यही कहना होगा कि मुझे आश्चर्य होता है जब बाहरी दुनिया और विशेषकर पश्चिमी दुनिया के लोग गांधी में दिलचस्पी रखते हैं. मैं समझ नहीं पा रहा हूं. वो भारत के इतिहास में एक प्रकरण था, वो कभी एक युग-निर्माता नहीं थे.
गांधी पहले से ही इस देश के लोगों के ज़ेहन से ग़ायब हो चुके हैं. उनकी याद इसी कारण आती है कि कांग्रेस पार्टी उनके जन्मदिन या उनके जीवन से जुड़े किसी अन्य दिन सालाना छुट्टी देती है. हर साल सप्ताह में सात दिनों तक एक उत्सव मनाया जाता है. स्वाभाविक रूप से लोगों की स्मृति को पुनर्जीवित किया जाता है.
लेकिन मुझे लगता है कि अगर ये कृत्रिम सांस नहीं दी जाती तो गांधी को लोग काफ़ी पहले भुला चुके होते.

औरंगाबाद में महाविद्यालय की इमारत के शिलान्यास के बाद आंबेडकर डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद को वेरुल की गुफाएं दिखाने ले गए. तस्वीर एक सितम्बर, 1951 की है. फ़ोटो साभारः दीक्षाभूमि, नागपुर और लोकवांग्मय प्रकाशन
सवाल: क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि उन्होंने मूलभूत बदलाव किए?
आंबेडकरः नहीं, कभी नहीं. बल्कि, वो हर समय दोहरी भूमिका निभाते थे. उन्होंने युवा भारत के सामने दो अख़बार निकाले. पहला 'हरिजन' अंग्रेज़ी में, और गुजरात में उन्होंने एक और अख़बार निकाला जिसे आप 'दीनबंधु' या इसी प्रकार का कुछ कहते हैं.
यदि आप इन दोनों अख़बारों को पढ़ते हैं तो आप पाएंगे कि गांधी ने किस प्रकार लोगों को धोखा दिया. अंग्रेज़ी समाचार पत्र में उन्होंने ख़ुद को जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता का विरोधी और ख़ुद को लोकतांत्रिक बताया. लेकिन अगर आप गुजराती पत्रिका को पढ़ते हैं तो आप उन्हें अधिक रूढ़िवादी व्यक्ति के रूप में देखेंगे.
वो जाति व्यवस्था, वर्णाश्रम धर्म या सभी रूढ़िवादी सिद्धांतों के समर्थक थे, जिन्होंने भारत को हर काल में नीचे रखा है. दरअसल किसी को गांधी के 'हरिजन' में दिए गए बयान और गुजराती अख़बार में दिए उनके बयानों का तुलनात्मक अध्ययन करके उनकी जीवनी लिखनी चाहिए. गुजराती पेपर के सात खंड हैं.
पश्चिमी दुनिया सिर्फ़ अंग्रेज़ी पेपर पढ़ती है, जहां गांधी लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले पश्चिमी लोगों के सम्मान में ख़ुद को बनाए रखने के लिए लोकतांत्रिक आदर्शों की वकालत कर रहे थे. लेकिन आपको ये भी देखना होगा कि उन्होंने वास्तव में अपने स्थानीय पेपर में लोगों से क्या बात की थी.
ऐसा लगता है कि किसी ने इसका कोई संदर्भ नहीं लिया है. उनकी जितनी भी जीवनियां लिखी गई हैं, वो उनके 'हरिजन' और 'युवा भारत' पर आधारित हैं, और गांधी के गुजराती लेखन के आधार पर नहीं.

तस्वीर नेपाल की राजधानी काठमांडू में 20 नवम्बर 1956 को आयोजित 'बौद्ध भ्रातृ संघ' की चौथी परिषद में आंबेडकर ने नेपाल नरेश महेंद्र और महास्थविर चंद्रमणि की उपस्थिति में अपना प्रख्यात भाषण 'बुद्ध और कार्ल मार्क्स' दिया. फ़ोटो साभारः दीक्षाभूमि, नागपुर और लोकवांग्मय प्रकाशन
सवाल: फिर जाति संरचना में हरिजन को भगवान के रूप में प्रस्तुत करने के पीछे उनका असली इरादा क्या था?
आंबेडकर: वो सिर्फ़ ऐसा चाहते थे. अनुसूचित जाते के बारे में दो चीज़ें हैं. हम अस्पृश्यता समाप्त करना चाहते हैं. लेकिन साथ ही हम ये भी चाहते हैं कि हमें समान अवसर दिया जाना चाहिए ताकि हम अन्य वर्गों के स्तर तक पहुंच सकें. अस्पृश्यता को बिलकुल धो देना कोई अवधारणा नहीं है.
हम पिछले 2000 वर्षों से अस्पृश्यता को ढो रहे हैं. किसी ने इसके बारे में चिंता नहीं की है. हां, कुछ कमियां हैं जो बहुत हानिकारक हैं. उदाहरण के लिए लोग पानी नहीं ले सकते हैं, लोगों के पास खेती करने और अपनी आजीविका कमाने के लिए भूमि नहीं हो सकती है.
लेकिन उससे भी महत्त्वपूर्ण अन्य चीज़ें हैं, अर्थात देश में उनकी स्थिति एक समान होनी चाहिए और उनके पास उच्च पदस्थ होने के अवसर भी होने चाहिए, ताकि न केवल उनकी गरिमा बढ़े, बल्कि वो रणनीतिक स्थितियों में रहते हुए अपने लोगों की रक्षा कर सकें. गांधी इस विचार के बिलकुल विरुद्ध थे, बिलकुल ख़िलाफ़.

मुम्बई प्रदेश शेड्यूल कास्ट्स फेडरेशन और समाजवादी पार्टी की ओर से बोरीबंदर रेलवे स्टेशन पर आयोजित उनके स्वागत कार्यक्रम का एक हंसमुख पल. रायबहादुर सीके बोले के बैठने की जगह न होने के कारण आंबेडकर ने उन्हें अपनी गोद में बिठा लिया. उनके साथ में माई आंबेडकर. फ़ोटो साभारः दीक्षाभूमि, नागपुर और लोकवांग्मय प्रकाशन
सवाल: वो (गांधी) मंदिर में प्रवेश होने जैसे मुद्दों से संतुष्ट थे.
आंबेडकरः वो मंदिर में प्रवेश का अधिकार देना चाहते थे. अब हिंदू मंदिरों की कोई परवाह नहीं करता. अस्पृश्य इस बात को अच्छी तरह समझ चुके हैं कि मंदिर जाने का कोई परिणाम नहीं है. वो अस्पृश्य ही बने रहेंगे, चाहे वो मंदिर जाएं अथवा नहीं. उदाहरण के लिए लोग अछूतों को रेलवे में यात्रा करने की इजाज़त नहीं देते.
अब उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, क्योंकि रेलवे उनके लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं करने जा रही. वो ट्रेन में एक साथ यात्रा करते हैं. जब भी रेल में हिंदू और अस्पृश्य साथ यात्रा करते हैं तो वो अपनी पुरानी भूमिका में होते हैं.

क़ानून मंत्री डॉक्टर आंबेडकर हिन्दू कोड बिल पर संसद में चर्चा करते हुए. फ़ोटो साभारः दीक्षाभूमि, नागपुर और लोकवांग्मय प्रकाशन
सवालः तो क्या आप कहना चाहते हैं कि गांधी रूढ़िवादी हिंदू थे?
आंबेडकरः हां, वो बिलकुल रूढ़िवादी हिन्दू थे. वो कभी एक सुधारक नहीं थे. उनकी ऐसी कोई सोच नहीं थी, वो अस्पृश्यता के बारे में सिर्फ़ इसलिए बात करते थे कि अस्पृश्यों को कांग्रेस के साथ जोड़ सकें. ये एक बात थी. दूसरी बात, वो चाहते थे कि अस्पृश्य स्वराज की उनकी अवधारणा का विरोध न करें.
मुझे नहीं लगता कि इससे अधिक उन्होंने अस्पृश्यों के उत्थान के बारे में कुछ सोचा.
सवाल: क्या आपको लगता है कि गांधी के बिना राजनीतिक आज़ादी मिल सकती थी?
आंबेडकरः जी हां. मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं. ये धीरे-धीरे हो सकता था. लेकिन व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि अगर स्वराज भारत में धीरे-धीरे आता तो ये लोगों के लिए फ़ायदेमंद होता. विकृतियों से ग्रस्त हर समुदाय या लोगों का हर समूह स्वयं को मज़बूत करने में सक्षम होता, अगर ब्रिटिश सरकार से सत्ता हस्तांतरण धीरे-धीरे होता.
आज हर चीज़ एक बाढ़ के समान आ गई है. लोग इसके लिए तैयार नहीं थे. मुझे अक्सर लगता है कि इंग्लैंड में लेबर पार्टी सबसे वाहियात पार्टी है.

आंबेडकर की मुम्बई की कान्हेरी गुफाओं की सैर. तस्वीर 1952-53 की है. फ़ोटो साभारः दीक्षाभूमि, नागपुर और लोकवांग्मय प्रकाशन
सवाल: क्या गांधी में धीरज नहीं था, या कांग्रेस पार्टी में?
आंबेडकरः मुझे नहीं मालूम कि अचानक एटली आज़ादी देने के लिए तैयार क्यों हो गए. ये एक गोपनीय विषय है, जो मुझे लगता है, कि एटली किसी दिन अपनी जीवनी में दुनिया के सामने लाएंगे. वो उस मुक़ाम तक कैसे पहुंचे. किसी ने अचानक इस बदलाव के बारे में नहीं सोचा था. किसी ने उम्मीद नहीं की थी.
ये मुझे अपने आकलन से लगता है. मुझे लगता है कि लेबर पार्टी ने दो कारणों से ये फ़ैसला किया. पहला है सुभाष चन्द्र बोस की राष्ट्रीय सेना. इस देश पर राज कर रहे ब्रिटिश को पूरा भरोसा था कि देश को चाहे कुछ भी हो जाए और राजनीतिज्ञ चाहे कुछ भी कर लें, लेकिन इस मिट्टी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता नहीं बदलेंगे.
इस सोच के साथ वो अपना प्रशासन चला रहे थे. उस सोच को बुरी तरह धक्का पहुंचा, जब उन्हें पता चला कि सैनिक एक पार्टी या बटालियन बना रहे हैं, जो ब्रिटिश को उखाड़ फेंकेगी. मुझे लगता है कि ऐसे में ब्रिटिश इस नतीजे पर पहुंचे, कि अगर उन्हें भारत पर शासन करना है तो इसका इकलौता आधार ब्रिटिश सेना से संचालन हो सकता है.
1857 की बात करें, जब भारतीय सैनिकों ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया था. उन्होंने पाया कि ब्रिटिश के लिए ये संभव नहीं होगा कि वो भारत में लगातार इतनी यूरोपीय सेना मुहैया कराते रहें, जिसके ज़रिये शासन किया जा सके.
दूसरी बात, जो मुझे लगती है, हालांकि मेरे पास ऐसा सबूत नहीं है, लेकिन मैं सोचता हूं कि ब्रिटिश सैनिक सेना को फ़ौरन समाप्त करना चाहते थे, ताकि वो नागरिक पेशे अपना सकें.
आप जानते हैं कि सेना को धीरे-धीरे कम करने के पीछे कितनी नाराज़गी थी?
क्योंकि जिन्हें सेना से नहीं निकाला गया था, वो सोचते थे, कि जिन लोगों को सेना से निकाल दिया गया है, वो उनका नागरिक पेशा हथिया रहे हैं और उनके साथ कितनी नाइंसाफ़ी हो रही है. लिहाज़ा भारत पर शासन करने के लिए पर्याप्त ब्रिटिश सेना रखना उनके लिए मुमकिन नहीं था.
तीसरी बात, मुझे लगता है कि इसके अलावा उन्होंने सोचा कि भारत से उन्हें सिर्फ़ वाणिज्य चाहिए था और सिविल सर्वेंट की पगार या सेना की आमदनी नहीं. ये तुच्छ चीज़ें थीं.
व्यापार और वाणिज्य के रूप में इनका बलिदान करने में कोई हर्जा नहीं था. भारत आज़ाद हो जाए या उसकी स्थिति स्वीकृत डोमेन या उससे कमतर हो.
लेकिन व्यापार और वाणिज्य बना रहना चाहिए. मैं इसके बारे में सुनिश्चित नहीं हूं, लेकिन मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है, लेबर पार्टी की मंशा यही रही होगी.

औरंगाबाद की एक कोर्ट में आंबेडकर. औरंगाबाद बार एसोसिएशन ने उनको आमंत्रित किया था. तस्वीर की तारीख 28 जुलाई, 1950. फ़ोटो साभारः दीक्षाभूमि, नागपुर और लोकवांग्मय प्रकाशन
सवाल: पूना समझौते की बात करते हैं. आप उस समझौते में शामिल थे. क्या आपको याद है कि उस दौरान गांधी से आपकी क्या बातचीत हुई?
आंबेडकर: (हल्के स्वर में) हां... मैं ये बात अच्छी तरह जानता था. ब्रिटिश सरकार ने मैकडोनल्ड के दिए मूल प्रस्ताव में मेरा सुझाव मान लिया था. मैंने कहा था कि हम एक समान निर्वाचित प्रतिनिधि चाहते हैं, ताकि हिन्दुओं और अनुसूचित जातियों के बीच दरार बनी रहे.
हमें लगता है कि अगर आप एक समान निर्वाचन प्रतिनिधि उपलब्ध कराते हैं तो हम समाहित हो जाएंगे और अनुसूचित जाति के नामित वास्तव में हिन्दुओं के ग़ुलाम बन जाएंगे, आज़ाद नहीं रहेंगे. अब मैंने रामसे मैकडोनल्ड से कहा, कि वो इसी विषय को आगे बढ़ाना चाहते हैं, हमें अलग निर्वाचन प्रतिनिधि और आम चुनाव में अलग मत दें.
ताकि गांधी ये नहीं कह सकें कि हम चुनाव के मामले में अलग हैं. पहले मेरी सोच यही थी, कि पहले पांच वर्ष हम हिन्दुओं से अलग रहें, जिसमें कोई व्यवहार, कोई संवाद न हो. ये सामाजिक और आध्यात्मिक क़दम होता. आप एक आम मतदाता में भागीदारी के चक्र में क्या देख सकते हैं?
इन कठिनाइयों को दूर करने के लिए आप जिस अलगाववाद के बारे में सोचते हैं, वो सदियों से बढ़ी है. ये सोचना मूर्खता है कि यदि दो लोगों के एक साथ मतदान केन्द्रों पर मतदान करने से उनके दिल बदल जाएंगे. ऐसा कुछ भी नहीं है. ये गांधी का पागलपन है. ख़ैर, इसे अलग रखा जाना चाहिए.
इस तरह की व्यवस्था में अस्पृश्यों से मतदान कराते हैं, तो आप उन्हें उसी अनुपात की अपनी आबादी का प्रतिनिधित्व करने देते हैं, ताकि मतदान पर बल मिले और प्रतिनिधि पर नहीं. ताकि गांधी और अन्य लोग शिकायत न कर सकें. रामसे मैकडोनाल्ड ने इसे स्वीकार कर लिया. ये वास्तव में मेरा सुझाव था. मैंने नेपल्स से उन्हें पत्र लिखा था.
मैं चाहता था कि वो यही करें, ताकि कोई समस्या न हो. उन्होंने यही किया, हमें अलग से निर्वाचन क्षेत्र और आम चुनाव में मतदान का अधिकार दिया. लेकिन गांधी नहीं चाहते थे कि हम अपने वास्तविक प्रतिनिधियों को भेजें. लिहाज़ा वो समझौते में अलग निर्वाचन क्षेत्र को नहीं जोड़ना चाहते थे और अनशन पर चले गए. फिर ये मेरे ऊपर आ गया.
ब्रिटिश सरकार ने कहा कि अगर आप समझौता नहीं मानना चाहते तो हमें कोई ऐतराज़ नहीं है. लेकिन हम समझौता स्वयं समाप्त करना चाहते थे. हमने समझौता छोड़ दिया. हमने हर वो चीज़ छोड़ दी, जो सर्वश्रेष्ठ थी.
आपको रामसे मैकडोनल्ड का पत्र पढ़ना चाहिए, जिसमें स्पष्ट लिखा है कि हमने अलगाववाद को बढ़ावा देने जैसा कुछ भी नहीं किया है. बल्कि हम एक समान निर्वाचन के ज़रिये दोनों गुटों को एक मंच पर लाकर इस खाई को भरना चाहते हैं. लेकिन गांधी का विरोध इस बात पर था कि हमें आज़ादी के साथ प्रतिनिधित्व न मिले.
लिहाज़ा उन्होंने खुलकर विरोध किया कि हमें कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिलना चाहिए. गोलमेज़ सम्मेलन में उनका यही रुख़ था. उन्होंने कहा कि वो सिर्फ़ हिन्दू, मुस्लिम और सिख समुदाय को जानते हैं. संविधान में सिर्फ़ इन्हीं तीन समुदायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए.
लेकिन इसाई, एंग्लो-इंडियन्स, अनुसूचित जाति के लिए संविधान में कोई जगह नहीं. उनके मुताबिक़ इन लोगों को आम लोगों के साथ मिश्र कर देना चाहिए. मैं जानता हूं कि उनके सभी दोस्त इस सोच को मूर्खता बता रहे थे. इस विषय पर उनके दोस्तों ने ही उनका विरोध किया.
अगर सिख और मुसलमानों को विशेष प्रतिनिधित्व दिया जाता है, जो राजनीतिक और आर्थिक रूप से हज़ारों गुना बेहतर स्थिति में हैं, तो अनुसूचित जाति और ईसाइयों को कैसे छोड़ा जा सकता है?
उनका यही कहना था कि आपलोग हमारी समस्या नहीं समझते. वो, बस, यही कहते थे.
इस मुद्दे पर उनके गहरे मित्र अलेक्जेन्ड्रिया का उनसे खासा झगड़ा हुआ, जैसा उन्होंने मुझे बताया. एक फ्रेंच महिला, जो उनकी अनुयायी थी, मैं उसका नाम भूल गया. उसने भी गांधी से जमकर झगड़ा किया, कि हम इस सोच को समझ नहीं पा रहे. या तो आप कहें कि हम किसी को कुछ नहीं देंगे और एक सामान्य प्रक्रिया होनी चाहिए.
हम इस बात को समझ सकते हैं कि आप इसमें लोकतांत्रिक प्रक्रिया देखते हैं. लेकिन ये कहना कि मुसलमानों और सिखों को प्रतिनिधित्व देना और अनुसूचित जातियों को नहीं, अजीब लगता है. वो कोई जवाब नहीं दे पाए. कोई जवाब नहीं. हमने ये उपाय सुझाया था.
शुरू में उन्होंने भी इसे स्वीकार नहीं किया, जब उन्होंने ख़त में लिखा; रामसे मैकडोनल्ड ने कहा कि अनुसूचित जातियों के पास कुछ भी नहीं है, कोई प्रतिनिधित्व नहीं है. फिर उनके दोस्तों ने ही कहा कि वो ज़रूरत से ज़्यादा कर रहे हैं, और इसमें कोई उन्हें समर्थन नहीं देगा.
फिर मालवीय और अन्य लोग मेरे पास आए और कहा, कि क्या आप इस समस्या के समाधान में हमारी मदद नहीं कर सकते? मैंने कहा कि हमने ब्रिटिश शासन से जो पाया है, उसकी बलि चढ़ाकर आपकी मदद नहीं करना चाहते.

अपने शिक्षण संस्थान के विद्यार्थियों का राजनैतिक ज्ञान परिपक्व हो, इस सिलसिले में आंबेडकर ने मुम्बई के सिद्धार्थ महाविद्यालय की 'विद्यार्थी संसद' में 11 जून, 1950 को हिन्दू कोड बिल के समर्थन में भाषण दिया. फ़ोटो साभारः दीक्षाभूमि, नागपुर और लोकवांग्मय प्रकाशन
सवाल: और आप अपने विचार पर टिके रहे.
आंबेडकर: (हल्के स्वर में) जैसा मैंने कहा कि मैंने दूसरा विकल्प सुझाया था. विकल्प ये था कि हम अलग इलेक्टोरेट छोड़ने को तैयार नहीं थे. लेकिन इसके लिए तैयार थे कि आप कुछ भी परिवर्तन कर सकते हैं. अंतिम चुनाव में खड़े होने वाले अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों को पहले प्राथमिक चुनाव में अनुसूचित जाति के सदस्य ही चुनते.
उन्हें चार लोगों को चुनना चाहिए. फिर उन चार लोगों को आम चुनाव में खड़ा होना चाहिए. हमारे पास सर्वश्रेष्ठ आना चाहिए, ताकि हम कुछ भरोसा दे सकें कि आप अपने उम्मीदवार को वापस न लें. ऐसे में हम उन लोगों को चुन सकेंगे, जो संसद में हमारी आवाज़ बन सकें. ये प्रस्ताव गांधी को स्वीकार करना था, तो उन्होंने किया.
हमें इस प्रस्ताव का सिर्फ़ एक चुनाव में फ़ायदा मिला, 1937 के चुनाव में. फेडरेशन ने चुनाव में बहुमत हासिल किया. गांधी के एक भी उम्मीदवार को जीत नहीं मिली.

अखिल भारतीय दलित फेडरेशन का चुनावी घोषणा पत्र, 1946. फ़ोटो साभारः दीक्षाभूमि, नागपुर और लोकवांग्मय प्रकाशन
सवालः तो क्या उन्होंने अपनी ओर से भारी मोल-तोल किया?
आंबेडकरः बिलकुल उन्होंने तोल-मोल किया. मैंने कुछ नहीं कहा. मैं आपकी ज़िंदगी बचाने को तैयार हूं, बशर्ते आप अड़ियल मत बनें. लेकिन मैं अपने लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ करके आपकी ज़िंदगी बचाने नहीं जा रहा. आप देख सकते हैं कि इसके लिए मैंने कितना परिश्रम किया. मैं इस बात को अच्छी तरह जानता हूं.
मैं आपकी सनक के लिए अपने लोगों के हितों का बलिदान नहीं करने जा रहा हूं. ये सिर्फ़ उनकी सनक थी. ये कैसे हो सकता है कि जिस सामान्य चुनाव से स्थितियां बदलने की बात की जा रही है, वो स्थितियां न बदल पाए?

चक्रवर्ती सी राजगोपालाचारी के भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बनने के उपलक्ष्य में सरदार पटेल द्वारा जून 1948 में आयोजित किए गए भोज समारोह में प्रधानमंत्री नेहरू के साथ आंबेडकर और केन्द्रीय मंत्रीमंडल के अन्य सदस्य. फ़ोटो साभारः दीक्षाभूमि, नागपुर और लोकवांग्मय प्रकाशन
सवालः तो इसपर उन्होंने क्या कहा?
आंबेडकरः ओह. वो कुछ भी नहीं कह सके. उन्हें अनुसूचित जाति को लेकर भारी डर था... कि वो सिख और मुस्लिम की तरह आज़ाद निकाय बन जाएंगे और हिन्दुओं को इन तीन समुदायों के समूह से लड़ना पड़ेगा. ये उनके दिमाग़ में था और वो हिन्दुओं को दोस्तों के बिना छोड़ना नहीं चाहते थे.
सवालः तो शायद ही उन्होंने... उन्होंने पूरी तरह राजनीतिज्ञ की तरह काम किया.
आंबेडकरः राजनीतिज्ञ की तरह. वो कभी महात्मा नहीं थे. मैं उन्हें महात्मा कहने से इनकार करता हूं. मैंने अपनी ज़िंदगी में उन्हें कभी महात्मा नहीं कहा. वो इस पद के लायक़ कभी नहीं थे, नैतिकता के लिहाज़ से भी.(https://www.bbc.com/hindi)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
हैदराबाद की नगर-निगम के चुनाव और उसके परिणामों की राष्ट्रीय स्तर पर विवेचना हो रही है लेकिन मुझे इस स्थानीय बिल में से एक अंतरराष्ट्रीय सांप निकलता दिखाई पड़ रहा है। यह स्थानीय नहीं, अंतरराष्ट्रीय चुनाव साबित हो सकता है। यह एक भारत को कई भारत बनानेवाली घटना बन सकता है। मोहम्मद अली जिन्ना ने तो सिर्फ एक पाकिस्तान खड़ा किया था लेकिन अब भारत में दर्जनों पाकिस्तान उठ खड़े हो सकते हैं। भाजपा के नेता खुशी मना रहे हैं कि उन्होंने अ.ओवैसी की मुस्लिम एकता पार्टी के मुकाबले ज्यादा सीटें जीत ली हैं। पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार की जीत 12 गुनी हो गई है। 4 से 48 हो गई है। भाजपा इस प्रचंड विजय पर अपना सीना फुलाए, यह स्वाभाविक है। इसे वह पूर्ण दक्षिण-विजय का शुभारंभ मान रही है। इस अपूर्व विजय का श्रेय सभी भाजपा नेता अपने महान नेता नरेंद्र मोदी को दे रहे हैं। इसके अलावा वे किसी को दे भी नहीं सकते। लेकिन इसका श्रेय मैं ओवैसी को भी देता हूं। मोदी और ओवैसी ने हैदराबाद के मतदाताओं के बीच हिंदू-मुसलमान की दीवार खड़ी कर दी है। ओवैसी की पार्टी ने सिद्ध किया है कि वह भाजपा से भी अधिक मजबूत है। उसने पिछली बार 60 सीटें लड़ी थीं और 44 सीटें जीती थीं। इस बार उसने 51 सीटें लड़ीं और फिर भी वह 44 सीटें जीतीं जबकि भाजपा ने 149 सीटें लड़ीं थी। ओवैसी की पार्टी सिर्फ 6 सीटें हारी जबकि भाजपा 101 सीटें हार गई। दूसरे शब्दों में हैदराबाद का चुनाव का असली महाविजेता ओवैसी है। ओवैसी ने बिहार के चुनाव में भी अपना जल्वा दिखा दिया था। बिहार और हैदराबाद में कांग्रेस का सफाया किस बात का सूचक है ? क्या इस बात का नहीं कि सारे मुस्लिम वोट अब ओवैसी-पार्टी की तरफ खिंचे चले जा रहे हैं ? क्या ओवैसी की पार्टी जिन्ना, लियाकत अली और खलीकुज्जमान की मुस्लिम लीग नहीं बनती जा रही है ? मुस्लिम लीग ने भी 1906 में पैदा होने के वक्त भारत-विभाजन की मांग नहीं की थी। जिन्ना के जमाने में वह भारत के अंदर ही मुसलमानों के लिए जगह-जगह स्वायत्त इलाके मांगने लगी थी। ऐसे मुस्लिम-बहुल इलाके 1947 में तो थे। जैसे पंजाबी, सिंधी, बलूच, पठान और बंगाली। वे पाकिस्तान बन गए। अलग हो गए। अब किस इलाके को आप अलग करेंगे? 25-30 साल बाद क्या देश के अंदर ही दर्जनों मुस्लिम भारतों की मांग खड़ी नहीं हो जाएगी? देश के इन दर्जनों टुकड़ों की घंटियां मुझे आज हैदराबाद से सुनाई पड़ रही हैं।
अप्रत्याशित विजय के शंखनाद में भाजपा के नेताओं को ये वीभत्स घंटियां चाहे सुनाई न पड़ें लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा समस्त राष्ट्रवादी और राष्ट्रप्रेमी चिंतकों के लिए यह चिंता का विषय है। इस चिंता को लव-जिहाद और नागरिकता संशोधन जैसे अपरिपक्व कानूनों ने ज्यादा गहरा कर दिया है। भारत को यदि हमें सबल और अटूट बनाए रखना है तो उसे सांप्रदायिकता से मुक्त रखना पड़ेगा।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-अजीत साही
मैं वेजिटेरियन हूँ। अंडा भी नहीं खाता हूँ। अंडे वाला केक तक नहीं खाता हूँ। पिछले करीब बारह सालों से मैं मुसलमानों के बीच खासा उठ-बैठ रहा हूँ। जब इंडिया में था तो देश भर में कई मुस्लिम संगठनों ने मुझे दर्जनों बार तकरीर के लिए बुलाया। बंगाल, केरल, बिहार, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, यूपी, मध्यप्रदेश, राजस्थान और यहाँ तक कि गोवा में भी भाषण दिया है। खाड़ी के देशों में प्रवासी भारतीय मुसलमानों के निमंत्रण पर भी कई बार गया।
पिछले पाँच सालों से अमेरिका में बसे भारतीय मुसलमानों ने भी अलग-अलग शहरों में मेरा भाषण रखा। इसके अलावा इंग्लैंड और साउथ अफ्रीका में भी मुस्लिम संगठनों का मेहमान रहा हूँ। इतने सालों में एक बार छोडक़र ऐसा कभी नहीं हुआ कि ऐसे मौकै पर मेरे लिए वेजिटेरियन खाना न रहा हो। लगभग सभी जगह मुझे छोडक़र कोई दूसरा वेजिटेरियन नहीं होता है। सौ-दो-सौ लोगों का खाना आर्डर पर बना हुआ होता है लेकिन मेरे लिए अलग से वेजिटेरियन खाना तैयार मिलता है। मुझे बहुत बाद में पता चला कि हर लोकेशन पर किसी एक की पहले से जिम्मेदारी मुकर्रर होती है कि मेरे लिए वेजिटेरियन खाने का इंतजाम करें।
भारत के बाहर कई बार तो मुसलमान बहनें अपने घर से मेरे लिए वेजिटेरियन खाना पका कर लाती हैं और उनके शौहर मुझे बताते हैं कि आप बिंदास खाइए क्योंकि आज हमने घर पर नॉनवेज बनाया ही नहीं इसलिए मांस के छू जाने का सवाल नहीं उठता। मुझे शर्मा कर उन्हें बताना पड़ता है कि मैं छुआछूत नहीं करता हूँ और मांस खऱीद के भी लाता हूँ और अपने परिवार के लिए पकाता भी हूँ, बस खाता नहीं हूँ। और हर जगह मेरे लिए खाना इतना ले आते हैं कि दस लोग खा लें। आगे चल कर मैंने पहले से कहना शुरू कर दिया कि, भईया, एक आदमी का ही खाना लाना वरना खाना बेकार जाता है। जब कभी तकरीर के बाद भोज नहीं होता है तो मेजबान संगठन के छह-सात लोग रेस्तराँ का प्रोग्राम बना के तैयार रहते हैं। दस में नौ बार वो मुझे वेजिटेरियन रेस्तराँ में ले जाते हैं।
मुझे कहना पड़ता है कि, देखिए, मुझे मांसाहार से परहेज है मांसाहारी से नहीं। इस पर या तो मुसलमान भाई-बहन हंस के कहते हैं कि, अरे, अजित भाई, हम तो रोज़ मांस खाते ही हैं, आज आपके बहाने वेजिटेरियन का मजा लेना चाहते हैं। या ये कहते हैं कि, अरे, ऐसा नहीं है कि हम हर समय मांस खाते हैं। इन बारह सालों में आज तक एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी मुसलमान भाई या बहन ने मेरे वेजिटेरियन होने का मज़ाक़ बनाया हो या नीचा दिखाया हो। या ये बोला हो कि अगर मांस नहीं खाते हो तो प्रोटीन कहाँ से मिलता है फिर? अभी पिछले महीने यहाँ अमेरिका में छह-सात दोस्तों ने, जो कि सभी मुसलमान हैं, एक पिकनिक का प्रोग्राम रखा। सबकी पत्नियाँ और बच्चे साथ थे। सब लोग घर से एक-एक डिश पका कर लाए। हमें कुछ भी लाने से मना कर दिया। जब हम वहाँ पहुँचे तो देखा कि उन्होंने मुझ अकेले के लिए वेजिटेरियन बिरयानी, पनीर की सब्ज़ी, मिक्स्ड वेजिटेबल और दाल बनाई थी। पुरु की बर्थडे तभी बीती थी तो सब लोग उसके लिए सरप्राइज गिफ़्ट्स लेकर आए थे। और पुरु से केक की जगह रसमलाई कटवाई ये कहकर कि केक लाते तो उसमें अंडा होने की वजह से अजित भाई नहीं खाते।
हिंदू दोस्तों के साथ मेरा अनुभव थोड़ा अलग है। अपने परिवार वाले तो बहुत खयाल रखते हैं। लेकिन जब कभी दूसरे और लोगों के साथ बाहर खाता हूँ तो ये बताने से कतराता हूँ कि मैं वेजिटेरियन हूँ। वजह ये है कि मांसाहारी हिंदू मेरे वेजिटेरियन होने का अक्सर मज़ाक़ उड़ाने लगते हैं। कई बार ये भी अनुभव हुआ है कि हिंदू दोस्त ने छह-सात दोस्तों को घर पर बुलाया और इसका ख्याल ही नहीं रखा कि कोई वेजिटेरियन भी हो सकता है। या खय़ाल रखा भी तो उनको यही ठीक लगा कि बाक़ी सब को तो तीन प्रकार के मटन-चिकन और कबाब खिलाना लाजमी है, बस इस वेजिटेरियन को एक सब्ज़ी दे देंगे और एक दाल रख देंगे तो बहुत होगा, क्योंकि अब एक आदमी के लिए क्या सर खपाएँ। पचासों हिंदू मुझे कह चुके हैं कि वेजिटेरियन क्यों हो? मीट क्यों नहीं खाते? ये क्या ड्रामा है? अब शुरू कर दो। मांस न खाना बेवकूफी है। वगैरह वगैरह।
राकेश दीवान
‘नीति आयोग’ के कृषि विशेषज्ञ रमेश कुमार ने लघु और सीमान्त किसानों को लेकर एक अध्ययन किया है जिसकी अनुशंसाओं में अनेक बेहद महत्वपूर्ण हैं और उन पर विचार करना जरूरी है। आज देशभर का किसान कृषि संबंधी कानूनों को लेकर सडक़ों पर उतरा है, लेकिन क्या उसका संघर्ष देश के तीन-चौथाई से अधिक किसानों की बात भी सुन रहा है? क्या वे भी उनके संघर्ष में शामिल हैं? क्या खेती का मौजूदा मॉडल किसान को आज सरीखी गफलतों में फिर नहीं फांसेगा? यह मौका है जब हम अपनी खेती का खाका बदलने की शुरुआत कर सकते हैं। यदि यह नहीं हुआ, तो किसानों की यह लडाई भी आधी-अधूरी ही रह जाएगी।
नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार ने हड़बड़ी में कृषि संबंधी तीन कानूनों को पारित कर और कुछ भले ही किया, ना किया हो, देश में आजादी के बाद के सबसे बड़े किसान आंदोलन की अलख जरूर जगा दी है। ऐसा पहली बार हुआ है कि देशभर के किसान 20 और 22 सितम्बर को संसद में ध्वनिमत से पारित तीन कृषि बिलों के विरोध में लामबंद हुए हैं।
‘कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक- 2020,’ ‘कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन, कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020’ और ‘आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक-2020’ के विरोध ने ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (एमएसपी) को कानूनी रूप देने से लगाकर ‘संविदा खेती’ तक कई सवाल खड़े कर दिए हैं। लेकिन क्या सरकार को अपने ही फैसलों को वापस लेने को मजबूर करने भर से कृषि के संकटों से निजात मिल सकेगी? क्या खेती के मौजूदा तौर-तरीके वापस इसी संकट में नहीं ले जाएंगे? मसलन-क्या विवादास्पद तीनों कानूनों को वापस लेने से देशभर में किसान आत्महत्याओं पर रोक लग जाएगी?
किसानी की बदहाली की कहानी आजादी के पहले तब से ही शुरू हो गई थी जब खेती के ‘अतिरिक्त उत्पादन’ से उद्योगों को पाला-पोसा गया था। साठ का दशक आते-आते सभी के गले यह बात उतार दी गई थी कि अपनी भुखमरी के लिए अपने बेपानी-खेत और उनमें कम-से-कमतर होता उत्पादन जिम्मेदार हैं। भुखमरी की इस बदहाली पर पक्का ठप्पा लगाने की खातिर अमरीका से ‘पब्लिक लॉ-480’ (पीएल-480) के तहत ‘कांस’-(जिसे ‘कांग्रेस घास’ के नाम से प्रसिद्धि मिली थी)-युक्त गेहूं मंगवाया गया। अमरीका का यह कानून डॉलर की बजाए भारतीय रुपयों में भुगतान करने की छूट देता था। भुखमरी के संकट के इसी दौर में विशालकाय भाखरा-नंगल की योजना बनी जिससे आधुनिक संकर गेहूं, धान आदि की पैदावार बढ सके। आयातित अनाज पर निर्भरता और ‘नए भारत के तीर्थ’ के दर्जे के बांध की पृष्ठभूमि में साठ के दशक में कृषि के वैश्विक ज्ञाता नार्मन बोरलाग की सीख-सलाहों पर ‘हरित क्रांति’ को खडा किया गया। अनाज उत्पादन के नाम पर गेहूं, धान उगाने वाली यह ‘हरित क्रांति’ भारी लागत के बदले भारी पैदावार को बढ़ावा देती थी।
विडम्बना यह थी कि ना तो भुखमरी और ना ही सिंचाई और उत्पादन में कोई कमी थी जिसके लिए दुनियाभर से कर्जों और अनुदानों के बल पर विशालकाय सिंचाई परियोजनाएं और आधुनिक तकनीक क्रियान्वित की जाएं। आजादी के शुरुआती सालों में भुखमरी की वजहों पर अमत्र्य सेन सरीखे ख्यात अर्थशास्त्रियों ने लिखा है कि उन दिनों की भुखमरी की वजहें अनाज की कमी की बजाए योजनागत राजनीति की गफलतें थीं। बंगाल के भीषण अकाल पर तो अब साफ उजागर हो गया है कि इसकी वजहें तत्?कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विन्स्ट्न चर्चिल की अमानवीय, कूटनीतिक चालें थीं। ठीक इसी तरह ‘मंथन अध्ययन केन्द्र’ के श्रीपाद धर्माधिकारी, स्वाती शेषाद्री, रेहमत मंसूरी और मुकेश जाट का भाखरा-नंगल परियोजना का अध्ययन बताता है कि वहां उस जमाने में सिंचाई और उसके चलते होने वाले उत्पादन में ऐसी कोई कमी नहीं थी जिसकी वजह से उन्हें बढ़ाने की जरूरत हो।
पचास और साठ के दशकों के इन कृषि सुधारों ने ‘हरित क्रांति’ के क्षेत्रों में अव्वल तो उत्पादन में खासी बढ़ोत्तरी की। बढ़े उत्पादनों के कारण उनकी कीमतों पर नियंत्रण रखने की खातिर ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (एमएसपी) की अवधारणा अस्तित्व में आई। दूसरे, आधुनिक कही जाने वाली इस खेती में लागत-निवेश बढ़ गया जिसके चलते किसानों को कर्जों की चपेट में फंसना पड़ा। तीसरे, ‘हरित क्रांति’ ने सीमित नस्लों के अनाजों को प्राथमिकता दी। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी-उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश जैसे ‘हरित क्रांति’ के इलाकों में तो केवल गेहूं, धान और कभी-कभार मक्का पैदा की गईं। तरह-तरह के रासायनिक खाद-दवाओं-कीटनाशकों से लदी-फंदी भारी लागत वाली इस आधुनिक खेती ने एक तरफ तो जरूरत से ज्यादा उत्पादन दिया और दूसरी तरफ, किसानों को उनकी फसलों के वाजिब दाम नहीं मिलने दिए। नतीजे में एक तरफ, लाखों टन अनाज खुले मैदानों में सडता रहा और दूसरी तरफ, किसान अपनी फसलों, खासकर फलों-सब्जियों-दूध आदि को खुले आम सडकों पर फैंकने लगे। इसी तरह एक तरफ, भंडारण के आभाव में करीब दस फीसदी उत्?पादन कीट-पतिंगों और चूहों को होम होने लगा और दूसरी तरफ, खरीदने की क्षमता नहीं होने के कारण देशभर में तीखी भुखमरी बढ़ी।
किसान और किसानी की इस बदहाली में नीति-निर्माताओं और सत्ताधारियों की उन मान्यताओं ने और रंग चढ़ाया जिनके मुताबिक किसानों की बदहाली कम उत्पादन, बाजारों से दूरी और कृषि-क्षेत्र पर अधिक दबाव के कारण हो रही है। नतीजे में सरकारी स्तर पर इसी तर्ज की योजनाएं बनी और क्रियान्वित की गईं। बेंगन, सरसों सरीखी फसलों के भरपूर उत्पादन के बावजूद उनका उत्पादन बढ़ाने के लिए ‘बीज संवर्धन’ (जीनेटिकली मॉडाफाइड) तकनीक से तैयार बीजों को परोसा गया। साल-दर-साल कृषि-क्षेत्र और बोनी बढाकर उत्पादन में गैर-जरूरी इजाफा किया गया। किसानी से कोसों दूर बैठे व्यापारियों, बिचौलियों को बाजार बढ़ाने-फैलाने और मुनाफा कमाने की खुली छूट दी गई। इस गोरखधंधे में बात यहां तक आ गई कि कृषि-क्षेत्र का दबाव कम करने की खातिर बड़े पैमाने पर खेतिहर आबादी को उद्योगों के हवाले किया जाने लगा। सन् 1996 में विश्वबैंक ने इन नीतियों की तस्दीक की और फिर 2005 में रिमॉइंडर भेजकर गांवों को शहरों में हकालने की चेतावनी दी। कांग्रेस, भाजपा सरकारों के सभी वित्तमंत्रियों को गांवों और ग्रामीण आबादी की लगातार होती कमी और शहरी ‘मलिन’ बस्तियों की बढ़ती आबादी ने खुश किया।
जाहिर है, इन और ऐसी ही अनेक गफलतों को सुलझाने की खातिर इन नीतियों, योजनाओं पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। मसलन-आंदोलनरत किसानों को उन 94 फीसदी लघु और सीमांत किसानों को भी अपनी लड़ाई से जोडना होगा जिन्हें ‘शांताकुमार समिति’ के अनुसार ‘एमएसपी’ और मंडी से कोई लेना-देना नहीं होता। ‘नीति आयोग’ के कृषि विशेषज्ञ रमेश कुमार ने लघु और सीमान्त किसानों को लेकर एक अध्ययन किया है जिसकी अनुशंसाओं में अनेक बेहद महत्वपूर्ण हैं और उन पर विचार करना जरूरी है। आज देशभर का किसान कृषि संबंधी कानूनों को लेकर सडक़ों पर उतरा है, लेकिन क्या उसका संघर्ष देश के तीन-चौथाई से अधिक किसानों की बात भी सुन रहा है? क्या वे भी उनके संघर्ष में शामिल हैं? क्या खेती का मौजूदा मॉडल किसान को आज सरीखी गफलतों में फिर नहीं फांसेगा? यह मौका है जब हम अपनी खेती का खाका बदलने की शुरुआत कर सकते हैं। यदि यह नहीं हुआ, तो किसानों की यह लडाई भी आधी-अधूरी ही रह जाएगी।


