विचार/लेख
अंतर-धार्मिक विवाहों के खिलाफ नफरत के मौजूदा माहौल में इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक फैसला एक ताजा बयार की तरह आया है. अदालत ने कहा है कि दो वयस्क अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हैं.
अदालत एक अंतर-धार्मिक विवाह के बाद दुल्हन के परिवार द्वारा दूल्हे के खिलाफ दायर किए गए मामले पर सुनवाई कर रही थी. सलामत अंसारी और प्रियंका खरवार ने पिछले साल अगस्त में शादी की थी. विवाह से ठीक पहले प्रियंका ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था और अपना नाम बदल कर 'आलिया' रख लिया था.
इस पर प्रियंका के परिवार वालों ने सलामत के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी थी जिसमें उस पर अपहरण और जबरन विवाह करने जैसे आरोप लगाए थे. नाबालिग बच्चियों के खिलाफ अपराध की रोकथाम के लिए बने कानून पॉक्सो के तहत भी सलामत के खिलाफ आरोप लगाए गए थे.
लेकिन पूरे मामले को सुनने के बाद अदालत ने सारे आरोप हटा दिए और एफआईआर को रद्द कर दिया. अपने फैसले में अदालत ने कहा कि धर्म की परवाह ना करते हुए अपने पसंद के साथी के साथ जीवन बिताने का अधिकार जीवन के अधिकार और निजी स्वतंत्रता के अधिकार में ही निहित है.
अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर दो बालिग व्यक्ति अपनी मर्जी से एक दूसरे के साथ रह रहे हैं तो इसमें किसी दूसरे व्यक्ति, परिवार और यहां तक कि सरकार को भी आपत्ति करने का अधिकार नहीं है. यह फैसला देते वक्त अदालत ने अपने उन पिछले फैसलों को भी गलत बताया जिनमें कहा गया था कि विवाह के लिए धर्मांतरण प्रतिबंधित है और ऐसे विवाह अवैध हैं.
We do not see Priyanka and Salamat as Hindu and Muslim, rather as two grown up individuals who out of their own free will and choice are living together peacefully and happily over a year. Allahabad High Court
— Bar & Bench (@barandbench) November 24, 2020
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अंतर-धार्मिक विवाहों को लेकर इस समय देश में बहस छिड़ी हुई है. आभूषणों की एक कंपनी के एक टीवी विज्ञापन में अंतर-धार्मिक विवाह दिखाए जाने का इतना विरोध हुआ कि कंपनी ने विज्ञापन वापस ले लिया. कई विरोधियों ने मुस्लिम पुरुषों द्वारा हिंदू स्त्रियों से शादी को 'लव जिहाद' की संज्ञा दी है. हाल ही में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसी कई राज्य सरकारों ने भी अंतर-धार्मिक विवाहों पर नाराजगी जताई थी और इन्हें रोकने के लिए नए कानून लाने की घोषणा की थी.
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
केरल की वामपंथी सरकार को हुआ क्या है? उसने ऐसा अध्यादेश जारी करवा दिया है, जिसे अदालतें तो असंवैधानिक घोषित कर ही देंगी, उस पर अब उसके विपक्षी दलों ने भी हमला बोल दिया है। इस अध्यादेश का उद्देश्य यह बताया गया है कि इससे महिलाओं और बच्चों पर होनेवाले शाब्दिक हमलों से उन्हें बचाया जा सकेगा। केरल पुलिस एक्ट की इस धारा 118 (ए) के अनुसार उस व्यक्ति को तीन साल की जेल या 10 हजार रु. जुर्माना या दोनों होंगे, ‘जो किसी व्यक्ति या समूह को धमकाएगा, गालियां देगा, शर्मिंदा या बदनाम करेगा।’ इस तरह के, बल्कि इससे भी कमजोर कानून को 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था। वह 2000 में बने सूचना तकनीक कानून की धारा 66 ए थी। अदालत ने उसे संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध माना था। केरल के इस अध्यादेश में तो किसी खबर या लेख या बहस के जरिए यदि किसी के प्रति कोई गलतफहमी फैलती है या उसे मानसिक कष्ट होता है तो उसी आरोप में पुलिस उसे सीधे गिरफ्तार कर सकती है। पुलिस को इतने अधिकार दे दिए गए हैं कि वह किसी शिकायत या रपट के बिना भी किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है। क्या केरल में अब रुस का स्तालिन-राज या चीन का माओ-राज कायम होगा ?
जाहिर है कि यह अध्यादेश बिना सोचे-समझे जारी किया गया है। बिल्कुल इसी तरह का गैर-जिम्मेदाराना काम केरल की वामपंथी सरकार ने ‘नागरिकता संशोधन कानून’ के विरुद्ध विधानसभा में प्रस्ताव पारित करके किया था। वह संघीय कानून के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में भी चली गई थी। देश की दक्षिणपंथी सरकारों पर जिस संकीर्णता का आरोप हमारे वामपंथी लगाते हैं, वैसे ही और उससे कहीं ज्यादा संकीर्णता अब वे खुद भी दिखा रहे हैं। केरल की कम्युनिस्ट सरकार इस कानून के सहारे अनेक पत्रकारों, लेखकों और विपक्षी नेताओं को डराने और कठघरों में खड़ा करने का काम करेगी। आश्चर्य तो इस बात का है कि आरिफ मोहम्मद खान जैसे राज्यपाल ने, जो अनुभवी राजनीतिज्ञ और कानून के पंडित हैं, ऐसे अध्यादेश पर दस्तखत कैसे कर दिए ? उन्होंने पहले भी राज्य सरकार को कुछ गलत पहल करने से रोका था और इस अध्यादेश को भी वे लगभग डेढ़ माह तक रोके रहे लेकिन केरल या केंद्र के सभी वामपंथी और विपक्षी नेताओं ने भी मुंह पर पट्टी बांधे रखी तो उन्होंने भी सोचा होगा कि वे अपने सिर बल क्यों मोल लें ? उनके दस्तखत करते ही कांग्रेसी और भाजपा नेताओं तथा देश के बड़े अखबारों ने इस अध्यादेश की धज्जियां उड़ाना शुरु कर दीं। इसके पहले कि सर्वोच्च न्याालय इसे रद्द कर दे, केरल सरकार इसे अपनी मौत मर जाने दे तो बिल्कुल सही होगा।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-प्रकाश दुबे
हीरे की परख जौहरी को होती है। फौजी मुंह से नहीं बोलता। उसकी तलवार बोलती है। ये महज पुराने मुहावरे नही हैं। चतुर सुजान व्यक्ति इन नुस्खों पर अमल करते हैं। जम्मू-कश्मीर की साल भर पुरानी केन्द्र शासित इकाई में लोकतंत्र की लड़ाई में इसका पूरा ध्यान रखा गया। देश की राजधानी के विधान सभा के दंगल में चुनौती देने वाले वीर की दहाड़ का जबर्दस्त असर हुआ। उसे दोबारा मैदान में उतारने की जरूरत नहीं पड़ी। लोग इस गलतफहमी में खुश रहे कि चुनाव आयोग ने प्रचार करने पर रोक लगा दी। ऐसी रोक टोक असरदार होती तो बिहार के दंगल में पहले चरण में जीत खिसकने का अंदाज लगने के बाद परमवीर फिर ताल ठोंकते न दिखते। जम्मू-कश्मीर में स्थानीय संस्थाओं के चुनाव की कमान पार्टी ने केन्द्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर को सौंप दी। सीमा पर हिमाचल के जवान लड़ते हैं। पार्टी के बढ़ते अनुराग से प्रसन्न चुनाव प्रभारी की ठकुराई के दांव कसौटी पर हैं।
जी का जंजाल
वस्तु एवं सेवाकर कहने से आप समझेंगे या समझेंगी नहीं। जीएसटी नाम की बला ही कितनों की समझ में आई? उपभोक्ता नहीं जानता कि लागू करने से पहले बताए गए फायदे मिलने लगे या नहीं? व्यापारी नाखुशी दिखा रहे हैं। सरकार ने एक दो बार अच्छी वसूली पर खुशी जतलाई। लेकिन राज्यों ने बकाया न मिलने पर हंगामा मचाकर गुड़ गोबर कर दिया। जीएसटी की पकड़ से कम ही वस्तुएं बाहर हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ने वसूली में सख्ती का फरमान जारी किया। सरकार और सरकारी विभागों को सामान की आपूर्ति करने वाले बुरे फंसे। महामारी की मार ऐसी पउ़ी कि अनेक सरकारी विभागों ने भुगतान नहीं किया। उधर जीएसटी वाले कहते हैं हम तो जीएसटी काटेंगे। तुम्हारा बकाया मिले या नहीं। मंत्रालय और निगम तक तो फिर भी खैर थी। प्रधानमंत्री कार्यालय को सप्लाई करने वाले भी इस पचड़े में फंसे हैं।
चुनाव का चक्कर
चुनाव के नाम से कई कांग्रेस जनों को बुखार आता होगा। सरकार ने नियम इस तरह बदले हैं कि अगले तीन महीने के अंदर कांग्रेस को संगठन चुनाव कराना जरूरी है। महामारी का बहाना नहीं चलेगा। अध्यक्ष के चुनाव के लिए तैयारी जारी है। महामारी का कारण बताकर बैठक टाली जा सकती है। इसलिए मतदान आन लाइन होगा। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के 1500 सदस्य मतदान कर सकेंगे। ये कब चुने गए? शायद कोई कांग्रेसी बता सके। बहरहाल डेढ़ हजार मतदाताओं को पासवर्ड भेजा जाएगा। सारी उठा पटक के बाद क्या होगा? पता नहीं। अभी तो अध्यक्ष े लिए उम्मीदवारों के नाम सामने नीं आए। चुनाव की परंपरा नहीं है। लेकिन परिवार के तीन रत्नों पर समर्थकों की निगाह टिकी है। किसी एक नाम पर आम राय बनी तो मतदाता वोट डालने की जहमत उठाने से बच जाएंगे। कोई राहुल भैया को मनाए।
बढ़ती का नाम
पश्चिम बंगाल चुनाव की चर्चा छिड़ते ही चेहरा दिखाकर चहकने वाले कवि कुल गुरु रवीन्द्र नाथ ठाकुर से तुलना करने लगे। केन्द्रीय मंत्री रह चुके अरुण शौरी ने फब्ती कसी-रूप बदलते रहते हैं। राजर्षि कहलाना चाहते हैं। घर और वार करने का जिम्मा संभालने वाले दाढी बिरादरी के। सूचना का संचार करने वाले का पुणेरी चेहरा। मध्यप्रदेश की सरकार बचाने के लिए विधायकों का इस्तीफा कराने से लेकर उपचुनाव में विधायक जिताने वाले प्रहलाद की पटैली चमक। गद्य को पद्य में बदल कर समाज कल्याण करने वाले भारतीय रिपब्लिकन दास के मुख मंडल पर ध्यान दो।
राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर प्रधानमंत्री और सूचना मंत्री तस्वीर में और प्रेस एसोसिएशन के अध्यक्ष जयशंकर गुप्त सदेह उपस्थित थे। गुप्त ने दाढी जमात में शामिल होकर चौंकाया। चलती का नाम गाड़ी फिल्म से नोट बटोरने के बरसों बाद किशोर कुमार ने बढ़ती का नाम दाढ़ी फिल्म बनाई। सिनेमाई दाढ़ी फहरा नहीं सकी। चुनावी दाढ़ी के जादू की परीक्षा बंगाल के चुनाव में होगी।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत सरकार ने देश की चिकित्सा-पद्धति में अब एक एतिहासिक पहल की है। इस एतिहासिक पहल का एलोपेथिक डॉक्टर कड़ा विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि देश के वैद्यों को शल्य-चिकित्सा करने का बाकायदा अधिकार दे दिया गया तो देश में इलाज की अराजकता फैल जाएगी। वैसे तो देश के लाखों वैद्य छोटी-मोटी चीर-फाड़ बरसों से करते रहे हैं लेकिन अब आयुर्वेद के स्नातकोत्तर छात्रों को बकायदा सिखाया जाएगा कि वे मुखमंडल और पेट में होनेवाले रोगों की शल्य-चिकित्सा कैसे करें। जैसे मेडिकल के डाक्टरों को सर्जरी का प्रशिक्षण दिया जाता है, वैसे ही वैद्य बननेवाले छात्रों को दिया जाएगा।
मैं तो कहता हूं कि उनको कैंसर, दिमाग और दिल की शल्य-चिकित्सा भी सिखाई जानी चाहिए। भारत में शल्य-चिकित्सा का इतिहास लागभग पांच हजार साल पुराना है। सुश्रुत-संहिता में 132 शल्य-उपकरणों का उल्लेख है। इनमें से कई उपकरण आज भी- वाराणसी, बेंगलुरु, जामनगर और जयपुर के आयुर्वेद संस्थानों में काम में लाए जाते हैं। जो एलोपेथी के डाक्टर आयुर्वेदिक सर्जरी का विरोध कर रहे हैं, क्या उन्हें पता है कि अब से सौ साल पहले तक यूरोप के डॉक्टर यह नहीं जानते थे कि सर्जरी करते वक्त मरीज को बेहोश कैसे किया जाए। जबकि भारत में इसकी कई विधियां सदियों से जारी रही हैं। भारत में आयुर्वेद की प्रगति इसलिए ठप्प हो गई कि लगभग डेढ़ हजार साल तक यहां विदेशी धूर्तों और मूर्खों का शासन रहा। आजादी के बाद भी हमारे नेताओं ने हर क्षेत्र में पश्चिम का अंधानुकरण किया। अब भी हमारे डॉक्टर उसी गुलाम मानसिकता के शिकार हैं। उनकी यह चिंता तो सराहनीय है कि रोगियों का किसी प्रकार का नुकसान नहीं होना चाहिए लेकिन क्या वे यह नहीं जानते कि आयुर्वेद, हकीमी, होमियोपेथी, तिब्बती आदि चिकित्सा-पद्धतियां पश्चिमी दवा कंपनियों के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं ? उनकी करोड़ों-अरबों की आमदनी पर उन्हें पानी फिरने का डर सता रहा है।
हमारे डॉक्टरों की सेवा, योग्यता और उनके योगदान से कोई इंकार नहीं कर सकता लेकिन आयुर्वेदिक चिकित्सा-पद्धति यदि उन्नत हो गई तो इलाज में जो जादू-टोना पिछले 80-90 साल से चला आ रहा है और मरीजों के साथ जो लूट-पाट मचती है, वह खत्म हो जाएगी। मैंने तो हमारे स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्द्धन और आयुष मंत्री श्रीपद नाइक से कहा है कि वे डाक्टरी का ऐसा संयुक्त पाठ्यक्रम बनवाएं, जिसमें आयुर्वेद और एलोपेथी, दोनों की खूबियों का सम्मिलन हो जाए। जैसे दर्शन और राजनीति के छात्रों को पश्चिमी और भारतीय, दोनों पक्ष पढ़ाए जाते हैं, वैसे ही हमारे डाक्टरों को आयुर्वेद और वैद्यों को एलोपेथी साथ-साथ क्यों न पढ़ाई जाए ? इन पद्धतियों के अंतर्विरोधों में वे खुद ही समन्वय बिठा लेंगे।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-महेन्द्र पांडे
पूरी दुनिया में कोरोना वायरस के कहर के बीच टीके को लेकर सामने आ रहे दावे कई तरह के सवाल खड़ा करते हैं। टीकों को लेकर हो रहे दावों के बीच कई महत्वपूर्ण तथ्य ऐसे हैं, जिसपर अभी कोई चर्चा भी नहीं की जा रही है।
कोरोना वायरस को लेकर इन दिनों भारत समेत लगभग सभी देश लापरवाही की हदें पार कर चुके हैं और दूसरी तरफ इसके टीके का बेसब्री से इंतजार भी कर रहे हैं। फाइजर और मोडेर्ना ने अपने टीकों से दुनिया की उम्मीदों को बढा दिया है। आशा है कि इस वर्ष के अंत तक या फिर अगले वर्ष के आरंभ में इन दोनों कंपनियों के टीके उपलब्ध होने लगेंगे।
इस बीच कंपनियां रहस्यमय तरीके से अपने दावों को बदलती जा रही हैं। दो दिनों पहले तक फाइजर का दावा था कि उसका टीका 90 प्रतिशत तक कामयाब है। इसके बाद अमेरिकी कंपनी मोडेर्ना ने अपने टीके का 94.5 प्रतिशत सफलता दर का दावा पेश किया। इस दावे के अगले दिन ही फाइजर ने बताया कि उसने फिर से टीके की सफलता का आकलन किया है और यह 95 फीसदी सफल है। जाहिर है, इन दोनों कंपनियों में अपने टीके को अधिक प्रभावी बताने की होड़ लगी है।
इन दावों के बीच एक महत्वपूर्ण तथ्य भी है, जिसपर अभी चर्चा भी नहीं की जा रही है। फाइजर के टीके को शून्य से भी 70 डिग्री सेल्सियस कम तापमान पर रखने की जरूरत होगी। ऐसे में सवाल यह है कि भारत जैसे कितने गरीब देश हरेक जगह ऐसी सुविधा विकसित कर पाएंगे? इसी तापमान पर इन्हें एक जगह से दूसरे जगह पहुंचाना भी पड़ेगा। फिर गांवों में ऐसा तापमान किस तरह पाया जा सकेगा?
दूसरी तरफ मोडेर्ना का दावा है कि उसके टीके का भंडारण शून्य से 20 डिग्री सेल्सियस नीचे पर लगभग 3 महीने तक किया जा सकता है। देश के बड़े अस्पतालों में तो यह तापमान मिल जाएगा, पर कस्बों और गांव में यह तापमान मिलना भी कठिन होगा। दरअसल ये दोनों टीके एक नई तकनीक, जिसमें मैस्सेंजर आरएनए की प्रमुख भूमिका है, पर आधारित हैं और इसमें टीकों को बहुत ठंढे तापमान पर रखना ही पड़ेगा, नहीं तो टीके जल्दी ही खराब हो जाएंगे।
इन दोनों टीकों का मूल्य भी एक समस्या है। फाइजर के टीके की कीमत 20 डॉलर है, जबकि मोडेर्ना के टीके की कीमत 37 डॉलर है। हरेक टीके का एक बूस्टर टीका भी होगा, ऐसे में इस कीमत पर कितने लोग टीके का खर्च उठा पाएंगे? मोडेर्ना ने वक्तव्य जारी किया है कि कोविड 19 जब तक समाप्त नहीं हो जाता, तब तक अपने टीके को वह पेटेंट के दायरे से बाहर रखेगा। इसका मतलब है कि कोई भी दूसरा देश इसे फिलहाल अपने देश में बना सकता है और अपनी जनता को सस्ते दरों पर उपलब्ध करा सकता है।
लेकिन अनेक विशेषज्ञ इस दावे को बकवास करार देते हैं। मेडिसिंस सैंस फ्रंटियर्स नामक गैर सरकारी संस्था के अनुसार यह सोचना भूल होगी कि मोडेर्ना जैसी व्यवसायिक कंपनी अमेरिका सरकार के सहयोग से कोई टीका बनाएगी और उससे मुनाफा नहीं कमाएगी। इस संस्था ने बताया कि संभवत: इसीलिए मोडेर्ना ने पेटेंट न लागू करने की कोई निश्चित समयसीमा के बारे में बात नहीं की है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और एस्ट्राजेनेका का टीका अभी अंतिम परीक्षण के दौर में है, पर इसके बारे में स्पष्ट बताया गया है कि जुलाई 2021 तक इससे कोई मुनाफा नहीं कमाया जाएगा।
हमारे देश में तो किन्हें प्राथमिकता के आधार पर टीका मिलेगा यह भी तय नहीं है। भारत सरकार के नेशनल एक्सपर्ट ग्रुप ऑन वैक्सीन एडमिनिस्ट्रेशन के अनुसार टीके को सबसे पहले बुजुर्गों और स्वास्थ्य कर्मियों के साथ ही कोविड 19 से संबंधित फ्रंटलाइन वर्कर्स को लगाया जाएगा। दूसरी तरफ बीजेपी बिहार में इसे देने की बात करती है, मध्य प्रदेश सरकार भी यही दावा कर रही है। कुछ महीनों बाद बंगाल के चुनावों के दौरान भी बीजेपी निश्चित तौर पर बंगाल के लोगों के साथ टीके का सौदा करेगी। पर, अंत में जब टीका आएगा तब प्राथमिकता निश्चित तौर पर विधायिका और वरिष्ठ कार्यपालिका तक पहुंच जाएगी।
फ्रांस के स्ट्रासबर्ग यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में किये गए अध्ययन के अनुसार कोविड 19 से संक्रमित होकर ठीक होने वाले पुरुषों के शरीर में स्त्रियों की अपेक्षा अधिक तेजी से एंटीबॉडीज नष्ट हो रहे हैं। यहां पर कोरोना से ग्रस्त होने वाले 308 मरीजों का 6 महीने तक गहन अध्ययन किया गया और एंटीबॉडीज के स्तर को 172 दिनों के अंतराल पर मापा गया। कोविड 19 के बारे में शुरू से बताया जा रहा है कि महिलाएं इससे अधिक ग्रस्त होती हैं, पर मृत्यु दर के सन्दर्भ में पुरुष बहुत आगे हैं। संक्रमण के शुरू में भी स्त्रियों की तुलना में पुरुषों के शरीर में एंटीबॉडीज अधिक बनाते हैं और नए अध्ययन के अनुसार पुरुषों के एंटीबॉडीज अपेक्षाकृत अधिक तेजी से नष्ट भी होते हैं।
जाहिर है, पुरुषों और स्त्रियों का रोग-प्रतिरोधक तंत्र इस वायरस के सन्दर्भ में अगल व्यवहार करता है। ऐसे में एक ही टीके से सबको एक समान रोग से बचा पाना असंभव है, पर किसी भी टीके के परीक्षण में ऐसा कोई अध्ययन नहीं किया गया है। कोविड 19 का टीका इस दौर में शुद्ध मुनाफे का सौदा है और पूंजीवाद में करोड़ों लोगों की जिंदगी दाव पर लगाना कोई नई बात नहीं है। (navjivanindia.com)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने डॉ. मनमोहनसिंह की अध्यक्षता में तीन कमेटियां बना दी हैं, जिनका काम पार्टी की अर्थ, सुरक्षा और विदेश नीतियों का निर्माण करना है। इन कमेटियों में वे कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी भी हैं, जिन्होंने कांग्रेस की दुर्दशा सुधारने के लिए पत्र लिखा था। इस कदम से यह अंदाज तो लगता है कि जिन 23 नेताओं ने सोनियाजी को टेढ़ी चि_ी भेजी थी, उनसे वह भयंकर रुप से नाराज़ नहीं हुईं।
ये बात और है कि उस चि_ी का जवाब उन्होंने उनको अभी तक नहीं भेजा है। उनकी इस कोशिश की तारीफ करनी पड़ेगी कि उन्होंने कोई ऐसे संकेत नहीं उछाले, जिससे पार्टी में टूट-फूट के आसार मजबूत हो जाएं लेकिन यह समझ में नहीं आता कि उक्त तीनों मुद्दों पर पार्टी के बुजुर्ग नेताओं से इतनी कसरत करवाने का उद्देश्य क्या है? मानों उन्होंने कोई दस्तावेज तैयार कर दिया तो भी उसकी कीमत क्या है ?
पार्टी में क्या किसी नेता की आवाज में इतना दम है कि राष्ट्र उसकी बात पर कान देगा ? उसकी बात पर ध्यान देना तो बहुत दूर की बात है। सारा प्रचारतंत्र जानता है कि कांग्रेस का मालिक कौन है ? मां, बेटा और अब बेटी। बाकी सबकी हैसियत तो नौकर-चाकर कांग्रेस (एन.सी.= नेशनल कांग्रेस) की है। जो कांग्रेस आज अधमरी हो चुकी है, पहले उसे जिंदा करने की कोशिश होनी चाहिए या देश को बचाने की ? देश बचाने के लिए अभी तो नरेंद्र मोदी ही काफी हैं। यदि कांग्रेस मजबूत होती और संसद में उसके लगभग 200 सदस्य होते तो वह एक वैकल्पिक सरकार बना सकती थी। वैकल्पिक छाया सरकार के नाते उसके सुझाव में थोड़ा दम भी होता लेकिन अब जो पहल हो रही है, वह हवा में लाठी घुमाने-जैसा है। कांग्रेस के सामने अभी उसके अस्तित्व का संकट मुंह फाड़े खड़ा हुआ है और वह वैकल्पिक नीतियां बनाने में लगी रहेगी। इस समय ये तीन कमेटियां बनाने की बजाय उसे सिर्फ एक कमेटी बनानी चाहिए और उसका सिर्फ एक मुद्दा होना चाहिए कि कांग्रेस में कैसे जान फूंकी जाए ? इस समय कांग्रेस का दम घुट रहा है। यदि उसे ताजा नेतृत्व की हवा नहीं मिली तो हमारा लोकतंत्र कोरोनाग्रस्त हो सकता है। सक्षम विपक्ष के बिना कोई भी लोकतंत्र स्वस्थ नहीं रह सकता।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-रियाज़ मसरूर
अब्दुल अज़ीज़ खताना पाँच पीढ़ियों से पहलगाम के लिड्रू में रहते हैं. यह कम आबादी वाली, जंगलों के बीच बसी एक ख़ूबसूरत जगह है जो जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से क़रीब सौ मील दूर पहलगाम की पहाड़ियों के बीच है.
लेकिन अब 50 साल के खताना, उनके भाई-बहन, पत्नी और बच्चे मलबे के ढेर में तब्दील हो चुके अपने घर के पास बैठे रो रहे हैं. मिट्टी की दीवारों से बने इस घर को वो 'कोठा' कहते थे.
अधिकारियों का कहना है कि सरकार ने 'वन भूमि के अतिक्रमण' को लेकर एक नया अभियान शुरू किया है जिसके तहत खताना का घर तोड़ा गया है.
अभियान का नेतृत्व कर रहे वरिष्ठ अधिकारी मुश्ताक़ सिमनानी कहते हैं कि 'जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के आदेश पर वन भूमि का अतिक्रमण करने वाले घरों और इमारतों को हटाया जा रहा है.'
पहलगाम विकास प्राधिकरण के प्रमुख मुश्ताक़ कहते हैं, "कोर्ट ने शहर में जंगल की क़रीब 300 एकड़ की ज़मीन पर किये गए सभी अतिक्रमण और ग़ैर-क़ानूनी निर्माण को हटाने का आदेश दिया है. ये अवैध ढांचे हैं और इन्हें हटाकर हम कोर्ट के आदेश का पालन कर रहे हैं."
इसी साल अक्तूबर में कोर्ट ने प्रशासन को जंगल की ज़मीन से ग़ैर-क़ानूनी अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था.
अब्दुल अज़ीज़ खताना और उनके जैसे कई लोगों के लिए यह एक सदमे की तरह है कि जिस घर में वे पीढ़ियों से रहते आये, अब वो घर उनका नहीं रहा. वो अचानक ही बेघर हो गए थे.
बीबीसी से बातचीत के दौरान ग़मगीन आवाज़ में खताना ने कहा, "मुझे नहीं पता कि ये क़ानून किस बारे में है. मुझे पता है कि ये घर जो अब मलबे का ढेर बन गया है, वो मेरे परदादा ने बनाया था."
खताना के घर के पास एक दूसरा कोठा भी है जो उनकी भाभी नसीमा अख़्तर का है.
नसीमा के तीन बच्चे हैं. जिस वक़्त अधिकारी उनका घर तोड़ने के लिए आये, उस वक़्त वो अपने बच्चों को खाना खिला रही थीं.

अब्दुल अज़ीज़ खताना का घर जो अब नष्ट हो चुका है
अभियान को लेकर लोगों में नाराज़गी
नसीमा रोते-रोते कहती हैं, "हम डर गए थे. बच्चे रोने लगे और हम चीख रहे थे. यहां सैंकड़ों अधिकारी और पुलिस के लोग थे. उनके हाथों में कुल्हाड़ियां, रॉड और बंदूक़ें थीं. उन्होंने देखते ही देखते मेरे घर को गिरा दिया."
प्रशासन के इस क़दम को लेकर प्रदेश में तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है. कई वरिष्ठ राजनेताओं ने इलाक़े का दौरा किया है और आश्वासन दिया है कि वो पीड़ित परिवारों के साथ हैं.
नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और पूर्व मंत्री मियां अलताफ़ कहते हैं, "भारत का वन अधिकार क़ानून जंगलों में रहने वाले अदिवासियों और वनवासियों को ज़मीन का हक़ और जंगलजात उत्पादों को जमा करने का हक़ देता है. खानाबदोश समुदायों और आदिवासियों को सशक्त करने की बजाय इस नए क़ानून को ग़ैर-क़ानूनी तरीके से लागू किया जा रहा है ताकि ग़रीबों को बेघर किया जा सके."

मियां अलताफ़
देश की संसद ने वन अधिकार क़ानून, 2006 पारित तो कर दिया था लेकिन अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू कश्मीर को मिले विशेष अधिकार के कारण इस क़ानून को वहां लागू नहीं किया जा सका था.
बीते साल अगस्त में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को आंशिक स्वायत्तता देने वाले अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी कर दिया था जिसके बाद सरकार ने वहां कई क़ानून लागू किए हैं, इन्हीं में से एक है- वन अधिकार क़ानून.
मियां अलताफ़ सवाल करते हैं, "खानाबदोशों को बेघर करना ग़ैर-क़ानूनी है क्योंकि क़ानून उन्हें भी अधिकार देता है. और वन पारिस्थितिकी तंत्र यानी फ़ॉरेस्ट इकोसिस्टम के लिए जंगलों में रहने वाले यानी वनवासी लोग बेहद अहम हैं. आप उन्हें कैसे बेघर कर सकते हैं."
बीजेपी ने आरोपों को किया ख़ारिज
लेकिन बीजेपी ने इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज किया है और कहा है कि केंद्र शासित प्रदेश में वन अधिकार क़ानून लागू किया गया है.
जम्मू कश्मीर बीजेपी के प्रवक्ता अल्ताफ़ ठाकुर ने फ़ोन पर बीबीसी को बताया कि "आदिवासी और वनवासियों को क़ानून के तहत जो अधिकार दिए गए हैं वो उनका लाभ उठा सकते हैं. कुछ पार्टियां अपने राजनीतिक हितों के लिए इस मामले का इस्तेमाल कर रही हैं लेकिन केंद्र सरकार अपने वादे से पीछे नहीं हटेगी."
हालांकि वनवासी अल्ताफ़ ठाकुर की बात से इत्तेफ़ाक रखते नहीं दिख रहे. इस अभियान के ख़िलाफ़ वनवासियों के नेता मोहम्मद यूसुफ़ गोर्सी ग़ैर-आदिवासी लोगों और राजनीतिक पार्टियों का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं.

बकरवाल समुदाय की महिलाएं
लिड्रू में बेघर हो चुके खानाबदोशों के एक कार्यक्रम में गोर्सी कहते हैं, "हम ये बर्दाश्त नहीं कर सकते. जंगल के पास ग्रीन ज़ोन में बड़ी-बड़ी इमारतें और घर बनाए गए हैं लेकिन सरकार उन वनवासियों को सज़ा दे रही है जो पीढ़ियों से यहां रहते हैं. वन अधिकार क़ानून का ग़लत इस्तेमाल किया जा रहा है और मुझे नहीं पता कि खानाबदोश समुदाय के मुसलमानों को ही क्यों परेशान किया जा रहा है."
'सरकार ग़रीब हटाना चाहती है या ग़रीबी?'
जम्मू कश्मीर सीपीआईएम के सेक्रेटरी ग़ुलाम नबी मलिक ने एक बयान जारी कर कहा है कि ये दुख की बात है कि जो वनवासी सदियों से जंगलों का सुरक्षा कर रहे हैं उन्हें ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से बेघर किया जा रहा है.
वो कहते हैं, "धर्म और राजनीति से हटकर, उन सभी लोगों के ख़िलाफ़ कठोर क़दम उठाए जाने चाहिए जो वनभूमि का अतिक्रमण कर रहे हैं, लेकिन यहां ग़रीब खानाबदोशों को उनके ढोक (अस्थाई रिहाइश) से निकाला जा रहा है."
मीडिया से बातचीत में अनंतनाग ज़िला प्रशासन ने उन पर लगे आरोपों से इनकार किया है.

बकरवाल समुदाय के एक परिवार का घर
एक रिपोर्ट के अनुसार अनंतनाग के डिप्टी कमिश्नर कुलदीप कृष्णा सिधा ने मीडिया से कहा, "कुछ लोगों का आरोप है कि खानाबदोश समुदाय (गुर्जर-बकरवाल) के लोगों को बेघर किया जा रहा है और उनके घरों को तोड़ा जा रहा है. ये आरोप बेबुनियाद हैं."
पहलगाम में प्रशासन के अतिक्रमण के ख़िलाफ़ अभियान से स्थानीय ग़ैर-अदिवासी भी नाराज़ हैं.
पहलगाम शहर में रहने वाले मोहम्मद रफ़ी कहते हैं, "हमें सुनने को मिलता है कि सरकार ग़रीबी ख़त्म करना चाहती है. लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार ग़रीबों को उनके घर नष्ट करके और उन्हें बेघर करके सज़ा देना चाहती है. ये एक मानवाधिकार संकट है जिसके दूरगामी परिणाम होंगे."
कुछ लोग इस अभियान की तुलना फ़लस्तीनियों के अधिकारों के हनन और उनके इलाक़े में इसराइल की बस्तियां बसाने से कर रहे हैं.
इतिहासकार और टिप्पणीकार पीजी रसूल कहते हैं, "गुर्जर समुदाय में केवल मुसलमान ही नहीं हैं, बल्कि हिंदू भी खानाबदोश गुर्जर हैं और ये भारत में अनुसूचित जनजाति की आबादी का क़रीब 70 फ़ीसदी हैं. अगर मुसलमान खानाबदोशों को इस अभियान में निशाना बनाया जाएगा तो पीड़ितों को लगेगा कि उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया जा रहा है जैसा इसराइल फ़लस्तीनियों के साथ करता है."
जम्मू कश्मीर पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती ने सोमवार को केंद्र शासित प्रदेश में गुर्जर-बकरवाल समुदाय के लोगों को वनभूमि से हटाने की मुहिम को लेकर सरकार को चेतावनी दी है और कहा है कि अगर उन्हें परेशान किया गया तो नतीजे भयानक हो सकते हैं.
मीडिया के साथ बात करते हुए उन्होंने कहा, "ये केवल कश्मीर में नहीं हो रहा है. अगर आप जम्मू के दूसरे इलाक़ों को देखें भटिन्डी, सुजवान और छत्ता जैसे इलाक़े जहां गुर्जर-बकरवाल मुसलमानों की आबादी है वहां उन्हें निशाना बनाया जा रहा है जंगलों से निकाला जा रहा है. ये वो लोग हैं जो असल में जंगलों को बचाते हैं. सर्दियों में ये लोग कहां जाएंगे?"
पूर्व मुख्यमंत्री ने गुर्जर-बकरवाल समुदाय के लोगों को भरोसेमंद और शांतिप्रिय बताया और कहा कि अगर उन्हें परेशान करना जारी रहा तो सरकार को इसके भयानक परिणाम भुगतने होंगे.
हालांकि अनंतनाग के डिप्टी कमिश्नर कुलदीप ने कहा है कि केवल वही ढांचे हटाए जा रहे हैं जो अवैध रूप से बनाए गए हैं.
वन अधिकार क़ानून लागू करना

जंगल की ज़मीन पर अतिक्रमण हटाने का अभियान
सरकार के प्रवक्ता के हवाले से समाचार एजेंसी पीटीआई ने कहा है कि जम्मू कश्मीर के चीफ़ सेक्रेटरी बीवीआर सुब्रमण्यम ने बुधवार को अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकार की मान्यता) क़ानून, 2006 लागू करने संबंधी रिव्यू मीटिंग में शिरकत की थी. जम्मू और कश्मीर पुर्नगठन अधिनियम, 2019 के लागू होने के बाद वन अधिकार क़ानून भी प्रदेश में लागू हो गया था.
उनका कहना था कि इस साल अक्तूबर से अदिवासी मामलों के विभाग समेत, जंगल, पारिस्थितिकी और पर्यावरण विभाग ने इस क़ानून को लागू करने के लिए काम करना शुरू कर दिया था.
वो कहते हैं, "ये बताया जाना ज़रूरी है कि वन अधिकार क़ानून, 2006 देश भर के वनवासियों को अधिकार दिए गए हैं."
पीटीआई के अनुसार प्रवक्ता का कहना था कि क़ानून के तहत ये तय किया गया है कि पारंपरिक तौर पर वनवासी और जंगलों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति के लोगों के रहने के लिए, ख़ुद खेती करने के लिए, आजीविका कमाने के लिए, मालिकाना हक़ और लघु वन उत्पाद जमा करने, इस्तेमाल करने और बेचने का अधिकार दिया गया है. इसके अलावा जंगलों से मिलने वाले मौसमी संसाधनों पर भी उनका अधिकार होगा.
चीफ़ सेक्रेटरी बीवीआर सुब्रमण्यम ने जम्मू कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकार की मान्यता) क़ानून, 2006 लागू करने के लिए वन विभाग से चार-स्तर पर समितियां बनाने के लिए कहा है. ये समितियां हैं - राज्य स्तरीय मॉनिटरिंग समिति, ज़िला स्तरीय मॉनिटरिंग समिति, सब डिविज़नल स्तरीय समिति और वन अधिकार समिति. (bbc)
राम पुनियानी
मंगलसूत्र पर सवाल उठाकर गोवा के लॉ स्कूल में सहायक प्रोफेसर शिल्पा सिंह उन पितृसत्तात्मक प्रतीकों का विरोध कर रहीं हैं, जो हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक परम्पराओं का हिस्सा बन गईं हैं और जिन्हें विभिन्न धार्मिक समुदायों द्वारा अपनी महिलाओं पर थोपा जाता है।
गोवा के लॉ स्कूल में सहायक प्राध्यापक शिल्पा सिंह के खिलाफ हाल में (नवम्बर 2020) में इस आरोप में एक एफआईआर दर्ज की गई है कि उन्होंने मंगलसूत्र की तुलना कुत्ते के गले में पहनाए जाने वाले पट्टे से की। शिकायतकर्ता का नाम राजीव झा बताया जाता है। वो राष्ट्रीय युवा हिन्दू वाहिनी नामक संस्था से जुड़ा है। एफआईआर में कहा गया है कि शिल्पा सिंह ने जानबूझकर शिकायतकर्ता की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई। एबीवीपी ने कॉलेज के मैनेजमेंट से भी शिल्पा की शिकायत की है।
अपने जवाब में शिल्पा सिंह ने कहा, ‘बचपन से मुझे यह जिज्ञासा रही है कि विभिन्न संस्कृतियों में केवल महिलाओं को ही उनकी वैवाहिक स्थिति का विज्ञापन करने वाले चिन्ह क्यों धारण करने होते हैं, पुरुषों को क्यों नहीं?’ उन्होंने मंगलसूत्र और बुर्के का उदाहरण देते हुए हिन्दू धर्म और इस्लाम की कट्टरवादी परम्पराओं की आलोचना की। उनके इस वक्तव्य से एबीवीपी आगबबूला हो गई।
शिल्पा, दरअसल, उन पितृसत्तात्मक प्रतीकों का विरोध कर रहीं हैं जो हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक परम्पराओं का हिस्सा बन गईं हैं और जिन्हें विभिन्न धार्मिक समुदायों द्वारा अपनी महिलाओं पर थोपा जाता है। ये काम शिल्पा तब कर रहीं हैं जब हमारे देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में धार्मिक राष्ट्रवाद का बोलबाला बढ़ रहा है। भारत में इस तरह के नियमों और परम्पराओं को अचानक अधिक सम्मान मिलने लगा है। रूढि़वादी नियमों को आक्रामकता के साथ सब पर लादा जा रहा है। उन्हें नया ‘नार्मल’ बनाने की कोशिशें हो रहीं हैं।
सतही तौर पर देखने से लग सकता है कि हिन्दू राष्ट्रवाद का एकमात्र लक्ष्य धार्मिक अल्पसंख्यकों का हाशियाकरण है। परंतु यह हिन्दू धार्मिक राष्ट्रवाद (हिंदुत्व) के एजेंडे का केवल वह हिस्सा है जो दिखलाई देता है। दरअसल, धर्म का चोला पहने इस राष्ट्रवाद के मुख्यत: तीन लक्ष्य हैं। इसमें पहला है, धार्मिक अल्पसंख्यकों का हाशियाकरण। यह हमारे देश में देखा जा सकता है। मुसलमानों को समाज के हाशिये पर धकेला जा रहा है और उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने के हर संभव प्रयास हो रहे हैं।
इसके बाद दूसरा लक्ष्य है, दलितों को उच्च जातियों के अधीन बनाए रखना। इसके लिए सोशल इंजीनियरिंग का सहारा लिया जा रहा है। तीसरा और महत्वपूर्ण लक्ष्य है महिलाओं का दोयम दर्जा बनाए रखना। एजेंडे के इस तीसरे हिस्से पर अधिक चर्चा नहीं होती है, लेकिन वह भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितने कि अन्य दो हिस्से।
भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में जहां भी राजनीति धर्म के रैपर में लपेट कर पेश की जा रही है, वहां वह पितृसत्तात्मकता को मजबूती देने के लिए विविध तरीकों से प्रयास करती है। भारत में महिलाओं के समानता की तरफ कदम बढ़ाने की शुरुआत सावित्रीबाई फुले द्वारा लड़कियों के लिए पाठशाला स्थापित करने और राजा राममोहन राय द्वारा सती प्रथा के उन्मूलन जैसे समाज सुधारों से हुई। आनंदी गोपाल और पंडिता रामाबाई जैसी महिलाओं ने अपने जीवन और कार्यों से सिद्ध किया कि महिलाएं पुरुषों की संपत्ति नहीं हैं और ना ही वे पुरुषों के इशारों पर नाचने वाली कठपुतलियां हैं।
ये सभी क्रान्तिकारी कदम पितृसत्ता की इमारत पर कड़े प्रहार थे और इनका विरोध करने वालों ने धर्म का सहारा लिया। जैसे-जैसे महिलाएं स्वाधीनता आन्दोलन से जुडऩे लगीं, पितृसत्तात्मकता की बेडिय़ां ढीली पडऩे लगीं। पितृसत्तात्मकता और जातिगत पदक्रम के किलों के रक्षकों ने इसका जमकर विरोध किया। हमारे समाज में जातिगत और लैंगिक दमन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
भारत में मुस्लिम साम्प्रदायिकता भी एक समस्या बन कर उभरी। मुस्लिम लीग के संस्थापक इस समुदाय के श्रेष्ठी वर्ग के पुरुष थे। इसी तरह, हिन्दू महासभा की स्थापना उच्च जातियों के पुरुषों ने की। ये दोनों ही संगठन सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को थामना चाहते थे।
इस समय भारत में ऊंच-नीच को बढ़ावा देने में हिन्दू साम्प्रदायिकता सबसे आगे है। सांप्रदायिक ताकतों का नेतृत्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के हाथ में है, जो केवल पुरुषों का संगठन है। जो महिलाएं ‘हिन्दू राष्ट्र’ के निर्माण में सहयोगी बनना चाहती थीं, उन्हें राष्ट्रसेविका समिति बनाने की सलाह दी गई। कृपया ध्यान दें कि महिलाओं के इस संगठन के नाम से ‘स्व’ शब्द गायब है।
यह मात्र संयोग नहीं है। यह इस बात का द्योतक है कि पितृसत्तात्मक विचारधाराएं महिलाओं के ‘स्व’ को पुरुषों के अधीन रखना चाहती हैं। इन विचारधाराओं के पैरोकारों के अनुसार महिलाओं को बचपन में अपने पिता, युवा अवस्था में अपने पति और बुढ़ापे में अपने पुत्रों के अधीन रहना चाहिए। संघ द्वारा लड़कियों के लिए दुर्गा वाहिनी नामक संगठन भी अलग से बनाया गया है।
सती प्रथा का उन्मूलन, महिलाओं की समानता की ओर यात्रा का पहला बड़ा पड़ाव था। परन्तु बीजेपी सन 1980 के दशक तक इस प्रथा की समर्थक बनी रही। राजस्थान के रूपकुंवर सती कांड के बाद बीजेपी की तत्कालीन राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विजयाराजे सिंधिया ने संसद तक मार्च निकाल कर यह घोषणा की थी कि सती प्रथा न केवल भारत की महान परंपरा का हिस्सा है, वरन् सती होना हिन्दू महिलाओं का अधिकार है।
‘सैवी’ नामक पत्रिका को अप्रैल 1994 में दिए गए अपने साक्षात्कार में बीजेपी महिला मोर्चा की मृदुला सिन्हा ने दहेज प्रथा और पत्नियों की पिटाई को उचित ठहराया था। संघ के एक पूर्व प्रचारक प्रमोद मुतालिक ने मंगलौर में पब में मौजूद लड़कियों पर हमले का नेतृत्व किया था।
वैलेंटाइन्स डे पर बजरंग दल नियमित रूप से प्रेमी जोड़ों पर हमले करता रहा है। लव जिहाद का हौव्वा भी महिलाओं के जीवन को नियंत्रित करने के लिए खड़ा किया गया है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने अभिवावकों से कहा है कि वे अपनी लड़कियों पर नजर रखें और यह देखें कि वे मोबाइल पर किससे बातचीत कर रही हैं।
अमेरिका में महिलाओं को जो स्वतंत्रताएं हासिल हैं, उन्हें देखकर भारत से वहां गए हिन्दू प्रवासियों को इतना धक्का लगता है कि वे विश्व हिन्दू परिषद और संघ से जुड़ी अन्य संस्थाओं के शरण में चले जाते हैं। वे उन लैंगिक समीकरणों को बनाए रखना चाहते हैं, जिन्हें वे भारत से अपने साथ ले जाते हैं।
ऐसा नहीं है कि केवल संघ ही पितृसत्तात्मकता को औचित्यपूर्ण ठहराता है और ‘लड़कियों पर नजर रखने’ की बात कहता है। हमारा पूरा समाज इस पश्यगामी सोच के चंगुल में है। यही कारण है कि शिल्पा सिंह जैसी महिलाएं, जो मंगलसूत्र या बुर्के के बारे में अपने विचार प्रकट करतीं हैं, तो उन्हें घेर लिया जाता है। संघ के अलावा धर्म के नाम पर राजनीति करने वाली अन्य ताकतें भी लैंगिक मसलों पर ऐसे ही विचार रखती हैं। इस मामले में तालिबान और बौद्ध और ईसाई कट्टरपंथी एक ही नाव पर सवार हैं। हां, उनकी कट्टरता के स्तर और अपनी बात को मनवाने के तरीकों में फर्क हो सकता है।
शिल्पा सिंह इसके पूर्व रोहित वेमुला, बीफ के नाम पर लिंचिंग और दाभोलकर, पंसारे, कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसे तर्कवादियों की हत्या जैसे मुद्दों पर भी अपनी कक्षा में चर्चा करती रहीं हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि एबीवीपी उन पर क्यों हमलावर है। (navjivanindia.com)
(लेख का अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पाकिस्तान की जमात-उद-दावा के सरगना हाफिज सईद को 10 साल की जेल की सजा हो गई है। वह पहले से ही लाहौर में 11 साल की जेल काट रहा है। अब ये दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी। ये सजाएं पाकिस्तान की ही अदालतों ने दी हैं। क्यों दी हैं ? क्योंकि पेरिस के अंतरराष्ट्रीय वित्तीय कोश संगठन ने पाकिस्तान का हुक्का-पानी बंद कर रखा है। उसने पाकिस्तान का नाम अपनी भूरी सूची में डाल रखा है, क्योंकि उसने सईद जैसे आतंकवादियों को अभी तक छुट्टा छोड़ रखा था।
हाफिज सईद की गिरफ्तारी पर अमेरिका ने लगभग 75 करोड़ रु. का इनाम 2008 में घोषित किया था लेकिन वह 10-11 साल तक पाकिस्तान में खुला घूमता रहा। किसी सरकार की हिम्मत नहीं हुई कि वह उसे गिरफ्तार करती। दुनिया के मालदार मुल्कों के आगे पाकिस्तान के नेता भीख का कटोरा फैलाते रहे लेकिन मुफ्त के 75 करोड़ रु. लेना उन्होंने ठीक नहीं समझा। क्यों नहीं समझा ? इसीलिए कि हाफिज सईद तो उन्हीं का खड़ा किया गया पुतला था। जब मेरे-जैसा घनघोर राष्ट्रवादी भारतीय पत्रकार उसके घर में बे-रोक-टोक जा सकता था तो पाकिस्तान की पुलिस क्यों नहीं जा सकती थी ? अमेरिका ने जो 75 करोड़ रु. का पुरस्कार रखा था, वह भी किसी ढोंग से कम नहीं था। यदि वह उसामा बिन लादेन को उसके गुप्त ठिकाने में घुसकर मार सकता था तो सईद को पकडऩा उसके लिए कौनसी बड़ी बात थी ? लेकिन सईद तो भारत में आतंक फैला रहा था। अमेरिका को उससे कोई सीधा खतरा नहीं था। अब जबकि खुद पाकिस्तान की सरकार का हुक्का-पानी खतरे में पड़ा तो देखिए, उसने आनन-फानन सईद को अंदर कर दिया। सईद की यह गिरफ्तारी भी दुनिया को एक ढोंग ही मालूम पड़ रही है। सईद और उसके साथी जेल में जरुर रहेंगे लेकिन इमरान-सरकार के दामाद की तरह रहेंगे। अब उनके खाने-पीने, दवा-दारु और आने-जाने का खर्चा भी पाकिस्तान सरकार ही उठाएगी। उन्हें राजनीतिक कैदियों की सारी सुविधाएं मिलेंगी। आंदोलनकारी कैदी के रूप में मैं खुद कई बार जेल काट चुका हूं। जेल-जीवन के आनंद का क्या कहना ? भारत में आतंकवाद फैलाकर इन तथाकथित जिहादियों ने, पाकिस्तानी फौज और सरकार की जो सेवा की है, उसका पारितोषिक अब उन्हें जेल में मिलेगा। ज्यों ही पाकिस्तान भूरी से सफेद सूची में आया कि ये आतंकवादी रिहा हो जाएंगे। पाकिस्तानी आतंकवादियों के कारण पाकिस्तान सारी दुनिया में ‘नापाकिस्तान’ बन गया है और भारत और अफगानिस्तान से ज्यादा निर्दोष मुसलमान पाकिस्तान में मारे गए हैं। पाकिस्तान यदि जिन्ना के सपनों को साकार करना चाहता है और शांतिसंपन्न राष्ट्र बनना चाहता है तो उसे इन गिरफ्तारियों की नौटंकी से आगे निकलकर आतंकवाद की नीति का ही परित्याग करना चाहिए।
(नया इंडिया की अनुमति से)
राजा नरेशचन्द्र की 112 वीं जन्मतिथि
-डॉ. परिवेश मिश्रा
एक समय था जब हैजा भारत की सबसे बड़ी जानलेवा महामारी था। इसकी एक एक खेप (या आज की भाषा में ‘वेव’) लाखों लोगों की जान ले जाती थी। वैक्सीन आने तक यही सिलसिला आम था।
एक ‘वेव’ 1941 से 45 के बीच भी आयी थी। दूसरा विश्वयुद्ध उन दिनों जारी था। बंगाल के साथ साथ देश के अन्य इलाके भीषण अकाल और भुखमरी की चपेट में थे। देश की कृषि पैदावार फौजियों के लिये थी और बाकी इंगलैंड भेज दी गयी थी। डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मी फौज में ले लिए गए थे। दवाईयां फौजी इस्तेमाल में खप जा रही थीं।
देश में स्थिति भयावह थी। बंगाल में अनेक गांवों में गलियाँ लाशों से पटने की खबरें आम हो गयी थीं। सारंगढ़ राज्य भी इस महामारी की चपेट में था।
शरदचंद्र बेहार मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव रहे हैं। उनका जन्म छत्तीसगढ़ के सारंगढ़ में हुआ और बचपन भी यहीं बीता। 1944 में वे 5 वर्ष के थे। वे दुखी मन से याद करते हैं इस दौरान उन्होंने अपने घर से एक दिन में तीन शव निकलते देखे थे।
किन्तु कुछ मामलों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर थी। अनाज की उपलब्धता में कमी नहीं होने दी गयी थी। सारंगढ़ स्टेट के अपने डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मी थे जिनकी मौज़ूदगी भी महत्वपूर्ण साबित हो रही थी। बाकी सारे विभागों के कर्मचारियों को भी हैजा नियंत्रण के काम में लगाया गया था।
किन्तु सबसे बड़ा ‘गेम-चेन्जर’ साबित हुआ था हैजे का वैक्सीन। विश्व युद्ध के कारण पैदा हुई स्थितियों के बावज़ूद अपने संबंधों का इस्तेमाल कर राजा जवाहिर सिंह सारंगढ़ राज्य के लिये वैक्सीन प्राप्त करने में सफल हुए थे। खडग़पुर में जहाँ इन दिनों प्रसिद्ध आय.आय.टी. है वहां उन दिनों अमरीकी एयरफोर्स का बेस हुआ करता था। अमरीकी सैनिकों के लिए खडग़पुर पहुंची सप्लाई में से पेनिसिलिन के इन्जेक्शन और हैजा वैक्सीन भारत के इस हिस्से में पहली बार विमानों के जरिये सारंगढ़ हवाई पट्टी तक पहुंचे थे। (पेनिसिलिन की कहानी फिर कभी)।
हैजा का वैक्सीन पहली बार प्राप्त करना ज़ाहिर है बहुत मुश्किल काम था। किन्तु इससे कहीं अधिक मुश्किल काम इसके आगे था, लोगों को यह वैक्सीन लगाने का।
सारंगढ़ के शहरी और ग्रामीण, दोनों, इंजेक्शन नाम की किसी चीज से परिचित नहीं थे। लोगों को वैक्सीन लगाने का जिम्मा दिया गया मैदान में अगुवाई कर रहे स्टेट के युवराज नरेशचन्द्र सिंहजी को। उनके नेतृत्व में स्टेट के डॉक्टर और बाकी लोग नगर की गलियों में पैदल और गांवों में साइकिलों में जाया करते थे। टीम के लोग बोरों में भर कर ब्लीचिंग पाउडर और थैलियों में भर कर सल्फाग्युनाडीन पाउडर की एक-एक ग्राम की पुडिय़ा साथ ले कर चला करते थे।
थोड़ी थोड़ी दूरी पर लोगों को इकट्ठा किया जाता। उन्हें वैक्सीन के लाभ के बारे में समझाईश दी जाती। और फिर किसी सफल स्टेज-शो के क्लाइमेक्स के रूप में युवराज नरेशचन्द्र सिंह जी पूरी नाटकीयता के साथ अपनी बांह ऊपर करते, कौतूहल अपने चरम पर पहुंचता और डॉक्टर उन्हें इंजेक्शन की सुई चुभोता। यह सब किया जाता देखने वालों को आश्वस्त करने के लिये कि इन्जेक्शन एक सुरक्षित तरीका है। युवराज को लगाए जाने वाले इन्जेक्शन में वैक्सीन नहीं होता था यह बात उनके अलावा सिर्फ डॉक्टर जानता था। लेकिन इसके बाद लोग सामने आ जाते और वैक्सीन ले लेते। इससे मृत्यु दर पर तेजी से अंकुश लगाने में बहुत सफलता मिली। लेकिन ऐसे हर दिन के अंत तक तीस से चालीस बार इन्जेक्शन की सुई चुभवाने के कुछ दिनों के बाद जब नरेशचन्द्र जी की बांह सूज गयी तो इस बात को गोपनीय रखा गया ताकि लोग इसे वैक्सीन का दुष्प्रभाव न समझ बैठें।
1946 में पिता की मृत्यु के बाद नरेशचन्द्र सिंह जी सारंगढ़ के राजा बने। 1 जनवरी 1948 को राज्य का भारतीय गणराज्य में विलीनीकरण करने के बाद वे औपचारिक रूप से कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए। 1949 से वे मध्यप्रदेश में कैबिनेट मंत्री रहे तथा 1969 में राजनीति से सन्यास की घोषणा करने से पूर्व राज्य के पहले और अब तक के एकमात्र आदिवासी मुख्यमंत्री बने।
राजा नरेशचन्द्र सिंह का जन्म रायपुर के राजकुमार कॉलेज में 21 नवम्बर 1908 के दिन हुआ था। आज उनकी 112वीं जन्मतिथि है।
-फ़रहत जावेद
मेरे सामने साल 2005 में पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के उस वक़्त के प्रधानमंत्री को लिखा गया एक ख़त पड़ा है. यह ख़त एक मां ने लिखा है जो पिछले तीन बरसों से अपने बेटे फ़ारूक़ के जवाब की प्रतीक्षा कर रही है.
वो लिखती हैं, "मैं अपने बच्चे की रिहाई के लिए हर क़िस्म की क़ुर्बानी देने को तैयार हूं."
उनके इस ख़त के बाद एक स्थानीय संगठन ने रेडक्रॉस से संपर्क किया फिर रेडक्रॉस के लोगों ने भारत के राजस्थान जेल में बंद फ़ारूक़ से मुलाक़ात की.
रेडक्रॉस के दस्तावेज़ के अनुसार उन्होंने फ़ारूक़ की मां को लिखा कि उनका बेटा ठीक है और वो अपने बेटे को ख़त लिखना जारी रखें.
उसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव के कारण उन मां-बेटे का क्या हुआ, क्या फ़ारूक़ वापस लौटे और मां से मिल सके, इन सारे सवालों का जवाब नहीं मिल सका.
बीबीसी के पास मौजूद दूसरे कई ख़तों में से एक ख़त एक बूढ़े बाप के बारे में भी है.
यह ख़त पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के भारत दौरे से पहले लिखा गया था.
ख़त लिखने वाले व्यक्ति के अनुसार, उनके पिता मोहम्मद शरीफ़ लाइन ऑफ़ कंट्रोल के क़रीब मवेशी चरा रहे थे कि उन्हें भारत की बीएसएफ़ ने गिरफ़्तार कर लिया था और वो जम्मू सेंट्रल जेल में पिछले पाँच साल से अपनी रिहाई की राह देख रहे हैं.
भारत, पाकिस्तान और दोनों के बीच बंटे कश्मीर में पिछले दो दशकों में सरकारें बदलती रही हैं और सरकारों के साथ-साथ उनकी प्राथमिकताएं भी बदलती रही हैं.
भारत और पाकिस्तान के बीच सीज़फ़ायर हुआ और एलओसी के बड़े हिस्से पर बाड़ भी लगा दी गई. मगर इस तरह की कहानियां ख़त्म नहीं हुईं.

शमशाद बेगम के पति जो 2008 से लापता हैं
शमशाद बेगम से मिलें
13 साल पहले शमशाद बेगम के पति लापता हुए और वह आज तक अपने पति की राह तक रही हैं.
उनका संबंध नीलम घाटी के गांव चकनार से है.
चकनार नाम का यह गांव एलओसी से महज़ 50 मीटर की दूरी पर बसा हुआ है और यहां जाने की इजाज़त नहीं है.
साल 2008 की बात है. चकनार गांव की तरफ़ जाने वाला रास्ता एक भारतीय सैन्य पोस्ट से गुज़रता है. शमशाद बेगम ने अपने पति की गुमशुदगी की कहानी सुनाते हुए कहा था कि वो पाकिस्तानी सेना की एक यूनिट में धोबी की हैसियत से काम कर रहे थे लेकिन वो सरकारी मुलाज़िम नहीं थे.
शमशाद बेगम कहती हैं, "एक दिन जब वो छुट्टी पर घर आ रहे थे तो रास्ते में गांव के ही दो लोग उनके साथ हो लिए. जब वे लोग सैन्य पोस्ट के पास पहुँचे तो भारतीय सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया. जब शाम तक कोई घर नहीं आया तो गांव वालों ने तलाशना शुरू किया. मेरे पति का सामान जिसमें मेरे लिए नए कपड़े भी थे, वहीं सैन्य पोस्ट के क़रीब पड़ा मिला. आज तक मेरे पति वापस नहीं आए."
शमशाद बेगम ने इंतज़ार करने का फ़ैसला किया
कश्मीर दुनिया के उन क्षेत्रों में से एक है जहां सबसे ज़्यादा सेना तैनात है. उसे विभाजित करती हुई सीमा रेखा कई जगहों पर ऐसी है कि कोई भी धोखा खा सकता है. भारत और पाकिस्तान दोनों के सैनिक यहां तैनात हैं और दोनों एक-दूसरे पर कड़ी नज़र रखते हैं.
शमशाद बेगम कहती हैं कि वो पाकिस्तान और भारत की सरकार से गुज़ारिश करती रही हैं कि उनके पति का पता लगाया जाए.
वो कहती हैं, "मैंने हर दर पर हाथ फैलाएं हैं, जब मौक़ा मिला कहती रही कि मेरे पति का पता करवाया जाए. मगर किसी ने नहीं सुनी. आख़िर में मुझे यह विधवा का कार्ड पकड़ा दिया गया. मैंने तो अपने पति को मरा हुआ नहीं देखा, किसी ने नहीं देखा मगर किसी ने ख़बर भी नहीं ली."
शमशाद बेगम की हालत यह हो गई है कि अब हंसते हुए भी उनकी आंखें नम ही रहती हैं.
"मैं हर रोज़ उन्हें ख़्वाब में देखती थी...हर रोज़. मैं देखती थी कि वो ज़िंदा हैं. मुझे अभी भी यक़ीन है कि वो ज़िंदा हैं और जब तक मुझमें आख़िरी सांस है, मैं उनका इंतज़ार करूंगी. मुझे बस यह पता है कि अभी वो बस अपनी क़िस्मत में लिखी तकलीफ़ काट रहे हैं."
उनके पति के साथ लापता होने वाले दूसरे दो लोगों की पत्नियों ने दोबारा शादी कर ली है मगर शमशाद बेगम ने इंतज़ार करने का फ़ैसला किया है.
यह और ऐसी कई कहानियां उन लोगों की हैं जो 1990 से अब तक सिर्फ़ इसलिए भारतीय सेना की हिरासत में गए क्योंकि उन पर एलओसी पार करने का आरोप था.
उनके परिजन दावा करते हैं कि उनमें से कई लोगों ने अनजाने में एलओसी पार कर ली और कई तो अपने ही इलाक़े में मौजूद थे जब उन्हें गिरफ़्तार किया गया.
लाइन ऑफ़ कंट्रोल (एलओसी) भारत और पाकिस्तान के बीच विवादित कश्मीर को बांटती हुई एक लकीर है. उसके ज़्यादातर हिस्से पर भारत ने अपनी तरफ़ बाड़ लगा दी है लेकिन फिर कई जगह ऐसे हैं जहां बाड़ नहीं लगाई गई है और कई जगहों पर आबादी के पीछे बाड़ लगा दी गई है.
अगर एलओसी के साथ सफ़र करें तो एक बड़े हिस्से पर सैन्य चौकियां या तो आबादी के पीछे हैं और कई जगहों पर ये बाड़ से आगे पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की तरफ़ हैं. और यह दोनों तरफ़ है.
हर साल ख़ासतौर पर फसलों और घांस की कटाई के दौरान ग़लती से एलओसी पार करने की घटना सामने आती रहती है.
एलओसी पार करने वाले तो ख़ैर दूसरे देश की जेलों में क़ैद हो जाते हैं लेकिन पीछे रह जाने वाले उनके घरवालों की ज़िंदगी भी किसी क़ैद से कम दुश्वार नहीं होती है.
ख़ासकर उन घरानों में जहां घरवालों को लंबे अर्से तक यह पता नहीं चलता कि उनके घर के लापता लोग ज़िंदा भी हैं या नहीं.
शमशाद बेगम के बेटे मोहम्मद सिद्दीक़ ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि उनकी उम्र 10 साल थी जब उनके पिता लापता हुए थे.
उस गांव में इस तरह का यह चौथा मामला था. यह गांव ज़ीरो लाइन पर होने के कारण क्रॉस बॉर्डर फ़ायरिंग की ज़द में भी रहता था जिसके बाद फ़ैसला किया गया कि गांववालों को किसी सुरक्षित जगह पर भेज दिया जाए.
शमशाद बेगम के अनुसार उनके गांव चकनार और क़रीबी आबादी वाले ढक्की को ख़ाली कराया गया और उन्हें नीलम घाटी में ही एक अस्थायी कैंप में शिफ़्ट कर दिया गया.
शमशाद बेगम कुछ अर्से तक तो कैंप में रहीं लेकिन बाद में मुज़फ़्फ़राबाद चली गईं.
उस वक़्त को याद करते हुए शमशाद बेगम कहती हैं, "मैंने घरों में, खेतों में काम शुरू किया तो मेरे बच्चों ने कहा कि वो मुझे काम नहीं करने देंगे. मेरा बड़ा बेटा सिर्फ़ 10 साल का था, उसने स्कूल छोड़ दिया और मुज़फ़्फ़राबाद में मज़दूरी करने लगा. मेरे दूसरे बच्चों ने भी ऐसा ही किया. हमारा गुज़र-बसर बहुत मुश्किल था. लोगों से क़र्ज़ लेते और घर का सौदा लाते. यह कमरा और टीन की छत भी क़र्ज़ लेकर बनाई. पति के चले जाने से मेरी और मेरे बच्चों की ज़िंदगी तबाह हो गई."

पाक प्रशासित कश्मीर
जब पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के पीएम भी पार कर गए सीमा
लेकिन इस तरह की घटना आम नागरिकों तक ही सीमित नहीं है.
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के प्रधानमंत्री राजा फ़ारूक़ हैदर ने इस बारे में बीबीसी उर्दू को बताया कि वो भी ग़लती से एलओसी पार कर गए थे.
वो कहते हैं, "मैं चुनाव प्रचार के लिए अपने इलाक़े में गया हुआ था और वाशरूम नहीं होने के कारण मुझे लोगों से कुछ दूर जाना पड़ा. अचानक एक व्यक्ति की आवाज़ आई, तुम इधर क्या कर रहे हो मैंने ऊपर देखा तो एक भारतीय सैनिक था. मैंने उसको बताया कि भाई मुझे क्या पता कि यह तुम्हारा इलाक़ा है, मैं तो अब कॉल ऑफ़ नेचर अटेंड करके ही जाऊंगा."
राजा फ़ारूक़ हैदर कहते हैं, "मेरी जगह कोई आम आदमी होता तो उसको गिरफ़्तार कर लिया जाता या गोली मार दी जाती."
लेकिन एक भूल कैसे ज़िंदगी भर का ख़ौफ़ बन सकती है, अपनी पहचान ज़ाहिर ना करने की शर्त पर उस व्यक्ति ने बीबीसी को बताया जिसने ग़लती से एलओसी पार कर ली थी और भारतीय सेना की हिरासत में भी रहे.
साद (बदला हुआ नाम) को भारतीय सेना ने यह कहते हुए हिरासत में ले लिया था कि वो भारत प्रशासित कश्मीर में दाख़िल हो गए हैं. हालांकि साद का कहना है कि वो अपने दोस्त के साथ अपने ही गांव में घास काट रहे थे जब भारतीय सैनिको ने उन्हें पकड़ा था.
साद कहते हैं, "हम घास काट रहे थे और मवेशी चरा रहे थे. हम गांव के क़रीब अपने ही इलाक़े में मौजूद थे. इतने में चारों तरफ़ से सैनिक आए और हममें से दो लोगों को ले गए. उन्होंने ख़ुद को भारतीय सैनिक बताया और कहा कि हम उनके इलाक़े में आ गए हैं. हमने कहा भी कि यह तो हमारा अपना इलाक़ा है मगर उन्होंने हमारी बात नहीं सुनी और हमें क़ैद कर लिया."
"जब हमें यह एहसास हुआ कि भारतीय सैनिक हमें अपने कैंप में ले जा रहे हैं तो हमारी ज़िंदा रहने की उम्मीद भी ख़त्म हो गई थी. उन्होंने हमारी आंखों पर कानों पर कई दिनों तक पट्टी बांधे रखी थी. हम जब भी कहते कि हम बेकसूर हैं तो वो हमें मारते थे. हमें यह भी नहीं पता था कि हम कहां हैं और हमारे साथ कोई और है या नहीं."
साद के परिजनों ने पाकिस्तानी सेना से संपर्क किया और पाकिस्तानी सरकार ने भारत सरकार से बातचीत की.

वापसी का तरीक़ा
लगभग एक हफ़्ते बाद लाइन ऑफ़ कंट्रोल के एक क्रॉसिंग प्वाइंट पर उन्हें पाकिस्तानी सेना के हवाले कर दिया गया.
बीबीसी ने इस बारे में जब पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता से संपर्क किया और पूछा कि एलओसी पर बाड़ लगने के बाद अब हालात कैसे हैं तो सेना की तरफ़ से कहा गया कि साल 2005 के बाद इस तरह की घटनाओं में कमी आई है.
सेना का कहना था, "पहले इस तरह की घटना बहुत ज़्यादा होती थी. लेकिन यह समझना भी ज़रूरी है कि यह कश्मीरी जनता का इलाक़ा है और वो जहां चाहें जा सकते हैं. कई जगहों पर दोनों तरफ़ आबादी सैनिक पोस्टों के आगे है. ऐसी स्थिति में हम लोगों को लगातार बताते रहते हैं कि उन्होंने ध्यान रखना है और उस तरफ़ नहीं जाना है. यह भी बताया जाता है कि एलओसी कहां है. एलओसी की पूरी तरह से निशानदेही नहीं की जा सकी है, इसलिए लोग ग़लती से दूसरी तरफ़ चले जाते हैं."
सेना के प्रवक्ता के अनुसार इम मामले में दो तरह की घटनाएं अमूमन होती हैं. एक वो जिनमें किसी ने ग़लती से एलओसी क्रॉस कर ली हो और दूसरी वो जिन्हें भारतीय सैनिक हमारी तरफ़ आकर गिरफ़्तार कर लेते हैं. दोनों हालत में गिरफ़्तार किए गए लोगों को वापस लाने की कोशिश की जाती है.
अगर कोई व्यक्ति एलओसी के इलाक़े से लापता हुआ है या उसको भारतीय सैनिकों ने अपनी हिरासत में लिया है तो उनकी वापसी का क्या तरीक़ा होगा, इस सवाल के जवाब में पाकिस्तानी सेना के एक अधिकारी ने बताया कि लापता या हिरासत में लिए जाने वाले व्यक्ति के घर वाले क़रीबी सैन्य पोस्ट से संपर्क करते हैं जिसके बाद केस को फ़ॉलो किया जाता है.
केस को फ़ॉलो करने के दो तरीक़े होते हैं.
"एक तो मिलिट्री ऑपरेशन डायरेक्टरेट को सूचना दी जाती है, दूसरी तरफ़ स्थानीय सतह पर भी पहले से स्थित हॉटलाइन पर भारतीय अधिकारियों से संपर्क किया जाता है और उन्हें बताया जाता है कि फ़लां व्यक्ति ने ग़लती से एलओसी पार कर ली है, क्या वो आपके पास है?"
सेना के अनुसार साल 2005 के बाद से इस तरह की घटना में कमी आई है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले 15 वर्षों में इस तरह के 52 मामले सामने आएं हैं जिनमें से 33 लोगों को भारतीय सेना ने हिरासत में लेने के बाद वापस भेज दिया. मगर उनमें से छह लोग ऐसे भी थे जिनकी लाशें वापस मिलीं.
उनमें से ज़्यादातर उस वक़्त मारे गए जब एलओसी पर तैनात बॉर्डर फ़ोर्स ने उन पर गोली चला दी.
पाकिस्तानी सेना के अनुसार 13 लोग अभी भी भारतीय सेना की हिरासत में हैं और अपने देश लौटने का इंतज़ार कर रहे हैं.
मगर पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की सरकार के अनुसार एलओसी के क़रीबी देहातों से साल 2005 से पहले लापता हुए लोगों की सही संख्या का कोई सरकारी रिकॉर्ड मौजूद नहीं है.
उस इलाक़े में लापता लोगों के लिए काम करने वाली एक ग़ैर-सरकारी संस्था के अनुसार साल 2005 तक लापता होने वालों की संख्या क़रीब 300 थी. लेकिन उस एनजीओ ने भी साल 2008 के बाद वहां काम करना बंद कर दिया था.

पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के प्रधानमंत्री राजा फ़ारूक़ हैदर
भारत-पाकिस्तान के अपने-अपने दावे
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के प्रधानमंत्री राजा फ़ारूक़ हैदर ने बीबीसी को बताया था कि इस तरह की घटनाएं पहले भी होती रहीं हैं.
उन्होंने कहा था, "अगर पहले कोई ग़लती से चला जाए तो हम भी वापस कर देते थे और वो भी कर देते थे. मगर पाँच अगस्त 2019 के बाद दोनों तरफ़ तनाव पैदा हो गया है. अक्सर वो मार देते हैं. यहां कोई नहीं मारता किसी को. वो गोली मार देते हैं. वापस नहीं करते, बताते भी नहीं कि वहां गया था या नहीं. मैं विदेश मंत्रालय को लिखूंगा कि वो यूएन में यह मामला उठाएं ताकि उनकी वापसी हो सके."
वो कहते हैं, "जो बाड़ लगी है वो एलओसी से कुछ पीछे है. हमारे यहां मवेशी के लिए घास की बहुत ज़्यादा ज़रूरत पड़ती है. इस कारण यह लोग घास काटने के लिए चले जाते हैं. वो उन्हें पकड़ लेते हैं कि एलओसी पार किया है. हालांकि फ़ेन्स तो पीछे लगा है. इस तरह के बेशुमार लोग हैं."
लेकिन भारत इन तमाम आरोपों को ख़ारिज करता है. भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार पाकिस्तान एलओसी के पार चरमपंथी और हथियार भेजता है.
बीबीसी के सवालों का जवाब देते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, "पाकिस्तान की जानिब से सिविलियन सरगर्मियों की आड़ में असलहा और बारूद एलओसी की इस जानिब भेजने की कोशिश की गई हैं. हमने सीमापार दहशतगर्दी, हथियारों और ड्रग्स की तस्करी में भी पाकिस्तान की मदद देखी है. उन सरगर्मियों के लिए ड्रोन और काडकॉप्टर भी इस्तेमाल किए गए हैं."
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के लापता (एलओसी पार करके भारत में दाख़िल होने वाले) लोगों की संख्या और उनकी रिहाई के बारे में पूछे गए सवाल का भारत ने कोई सीधा जवाब नहीं दिया.
भारतीय प्रवक्ता का कहना था, "पाकिस्तानी सेना एक तरफ़ तो सीज़फ़ायर का उल्लंघन करती है और अक्सर इस तरह का उल्लंघन आबादी वाले इलाक़ों में होता है जिनसे चरमपंथियों को एलओसी पार करने में मदद मिलती है. यह 2003 के सीज़फ़ायर का खुल्लम खुल्ला उल्लंघन है."
इस बारे में पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय का क्या कहना है, बीबीसी की तमाम कोशिशों के बावजूद भी उनका कोई जवाब नहीं मिल सका.
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के प्रधानमंत्री मानते हैं कि पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय में उन लापता लोगों के लिए काम होना चाहिए और एक ऐसा डेस्क बनाया जाना चाहिए जो भारतीय अधिकारियों से उनकी वापसी या उनसे संबंधित जानकारियां जमा करने के लिए बात करे.
लेकिन यह होगा या नहीं और होगा तो कब होगा?
इसका जवाब फ़िलहाल किसी के पास नहीं है.
जिन्होंने ना तो यह जंग शुरू की और न ही इसे ख़त्म करने की हैसियत रखते हैं, उनकी मदद करने वाला कोई नहीं.
जब हम शमशाद बेगम से मिलकर वापस आ रहे थे, वो अपने घर में अपनी भतीजी का स्वागत कर रही थीं. उनकी भतीजी की शादी थी और वो एक स्थानीय रस्म के तहत दुलहन को एक दिन के लिए अपने घर ले आई थीं.
उनके बेटे सिद्दीक़ मेहमानों के लिए खाना बना रहे थे.
यह ख़ानदान भी कश्मीर को विभाजित करने वाली एलओसी की दोनों जानिब बसे दर्जनों परिवारों की तरह ज़िंदगी में आगे बढ़ रहा है. मगर उनका ना तो दुख कम हुआ है और ना ही लापता हुए लोगों की वापसी की उम्मीद टूटी है. (bbc)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने घोषणा की है कि वह अपनी सेना के 2500 जवानों को अफगानिस्तान से वापस बुलवाएगा। यह काम क्रिसमिस के पहले ही संपन्न हो जाएगा। जिस अफगानिस्तान में अमेरिका के एक लाख जवान थे, वहां सिर्फ 2 हजार ही रह जाएं तो उस देश का क्या होगा ? ट्रंप ने अमेरिकी जनता को वादा किया था कि वे अमेरिकी फौजों को वहां से वापस बुलवाकर रहेंगे क्योंकि अमेरिका को हर साल उन पर 4 बिलियन डॉलर खर्च करना पड़ता है, सैकड़ों अमेरिकी फौजी मर चुके हैं और वहां टिके रहने से अमेरिका को कोई फायदा नहीं है। 2002 से अभी तक अमेरिका उस देश में 19 बिलियन डॉलर से ज्यादा पैसा बहा चुका है।
ट्रंप का तर्क है कि अमेरिकी फौजों को काबुल में अब टिकाए रखने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि अब तो सोवियत संघ का कोई खतरा नहीं है, पाकिस्तान से पहले-जैसी घनिष्टता नहीं है और ट्रंप के अमेरिका को दूसरों की बजाय खुद पर ध्यान देना जरुरी है। ट्रंप की तरह ओबामा ने भी अपने चुनाव-अभियान के दौरान फौजी वापसी का नारा दिया था लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने इस मामले में काफी ढील दे दी थी लेकिन ट्रंप ने फौजों की वापसी तेज करने के लिए कूटनीतिक तैयारी भी पूरी की थी।
उन्होंने जलमई खलीलजाद के जरिए तालिबान और काबुल की गनी सरकार के बीच संवाद कायम करवाया और इस संवाद में भारत और पाकिस्तान को भी जोड़ा गया। माना गया कि काबुल सरकार और तालिबान के बीच समझौता हो गया है लेकिन वह कागज पर ही अटका हुआ है। अमल में वह कहीं दिखाई नहीं पड़ता। आए दिन हिंसक घटनाएं होती रहती हैं। इस समय नाटो देशों के 12 हजार सैनिक अफगानिस्तान में हैं। अफगान फौजियों की संख्या अभी लगभग पौने दो लाख है जबकि उसके-जैसे लड़ाकू देश को काबू में रखने के लिए करीब 5 लाख फौजी चाहिए। मैं तो चाहता हूं कि बाइडन-प्रशासन वहां अपने, नाटो और अन्य देशों के 5 लाख फौजी कम से कम दो साल के लिए संयुक्तराष्ट्र की निगरानी में भिजवा दे तो अफगानिस्तान में पूर्ण शांति कायम हो सकती है।
ट्रंप को अभी अपना वादा पूरा करने दें (25 दिसंबर तक)। 20 जनवरी 2021 को बाइडन जैसे ही शपथ लें, काबुल में वे अपनी फौजें डटा दें। हालांकि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान पहली बार काबुल पहुंचे हैं लेकिन तालिबान को काबू करने की उनकी हैसियत 'नाÓ के बराबर है। बाइडन खुद अमेरिकी फौजों की वापसी के पक्ष में बयान दे चुके हैं लेकिन उनकी वापसी ऐसी होनी चाहिए कि अफगानिस्तान में उनकी दुबारा वापसी न करना पड़े। यदि अफगानिस्तान आतंक का गढ़ बना रहेगा तो अमेरिका सहित भारत-जैसे देश भी हिंसा के शिकार होते रहेंगे। (नया इंडिया की अनुमति से)
वेटिकन ने कहा है कि उन्होंने इंस्टाग्राम से स्पष्टीकरण माँगा है कि 'आख़िर पोप फ़्रांसिस के आधिकारिक अकाउंट से ब्राज़ीलियन मॉडल नतालिया गेरीबोतो की एक तस्वीर कैसे लाइक हुई?'
वेटिकन ने यह भी बताया है कि वो इस मामले की जाँच कर रहे हैं.
अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि पोप के आधिकारिक अकाउंट से नतालिया की कम कपड़ों वाली तस्वीर कब लाइक की गई.
नतालिया की जिस तस्वीर को पोप के अकाउंट से लाइक किया गया, उसमें उन्होंने स्कूल यूनिफ़ॉर्म से मिलती जुलती ड्रेस पहनी हुई थी.

ब्राज़ीलियन मॉडल नतालिया गेरीबोतो
इस घटना पर वेटिकन के अधिकारियों ने हैरानी ज़ाहिर की है.
वहीं नतालिया की मैनेजमेंट कंपनी ने कथित तौर पर 'पोप द्वारा लाइक की गई' उस तस्वीर को यह कहते हुए दोबारा पोस्ट किया कि "उन्हें आधिकारिक तौर पोप की दुआएं मिली हैं."
ब्राज़ीलियन मॉडल नतालिया गेरीबोतो के इंस्टाग्राम पर 24 लाख फ़ॉलोअर्स हैं. उनके बीच नतालिया ने चुटकी लेते हुए यह लिखा, "मैं तो अब पक्का स्वर्ग जाने वाली हूँ."
वेटिकन द्वारा बताया गया है कि कुछ लोगों की टीम मिलकर पोप के आधिकारिक सोशल मीडिया पन्नों को संभालती है. (bbc.com)
फर और फैशन के लिए उदबिलाव की एक प्रजाति मिंक को जंगल से घसीटकर बड़े ब्रीडिंग फार्मों में कैद किया गया. अब आशंका है कि मिंक फार्मों के कारण भी कोरोना फैल रहा है.
आयरलैंड में प्रशासन पूरे देश के फार्मों में पल रहे मिंकों को कुचलकर मारने की तैयारी कर रहा है. आयरलैंड के कृषि मंत्रालय के मुताबिक डेनमार्क के मिंक फार्म में कोविड-19 के म्यूटेशन की आशंका के बाद यह कदम उठाया जा रहा है.
अब तक किए गए टेस्टों में आयरलैंड के किसी मिंक फार्म में कोविड-19 के सबूत नहीं मिले हैं. इसके बावजूद स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है, "मिंक पालन जारी रखने से मिंकों में फैलने वाले कोरोना वायरस के नए रूप का खतरा बना हुआ है." आयरिश मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक देश के तीन बड़े मिंक फार्मों में ही करीब एक लाख मिंक पाले जा रहे हैं.
मिंक की शामत क्यों आई?
बीते हफ्ते डेनमार्क में मिंक फार्म में काम करने वाला एक कर्मचारी कोविड-19 पॉजिटिव पाया गया. जांच में बड़े अलग किस्म का कोविड-19 वायरस मिला. इसके बाद आशंका जताई जा रही है कि मिंकों में कोविड-19 म्यूटेट कर चुका है. वायरस के किसी जीव में दाखिल होकर रूप बदलने को म्यूटेशन कहा जाता है.
इस बीच गुरुवार को स्वीडन के स्वास्थ्य अधिकारियों ने दावा किया कि मिंक इंडस्ट्री में काम करने वाले कई लोग कोविड-19 पॉजिटिव पाए गए हैं. प्रशासन अब इस बात की जांच कर रहा है कि क्या मिंक में मिला कोरोना वायरस का स्ट्रेन ही इंसानों में भी मिला है.
महामारी को रोकने के लिए डेनमार्क में डेढ़ करोड़ से ज्यादा मिंकों को मारने की योजना है. हालांकि इतने बड़े पैमाने पर मिंक मारने का डेनमार्क में विरोध भी हो रहा है. मिंको को मारने का आदेश देने वाले कृषि मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा है. उन पर अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाते हुए सारे मिंक फॉर्मों के लिए आदेश जारी करने के आरोप सही साबित हुए.
58 लाख की जनसंख्या वाले डेनमार्क में इंसान के मुकाबले तीन गुना ज्यादा मिंक पाले जाते हैं. डेनमार्क दुनिया में मिंक का सबसे बड़ा निर्यातक है.
मिंक पालक चिंता में
डेनमार्क, स्वीडन और आयरलैंड से आ रही खबरों ने अमेरिका, इटली, नीदरलैंड्स और स्पेन के मिंक पालकों को परेशान कर दिया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक अमेरिका, इटली, नीदरलैंड्स और स्पेन के मिंकों में भी कोरोना वायरस मिला है.
कोरोना महामारी फैलने के 11 महीने बाद नंवबर में डब्ल्यूएचओ ने कहा कि मिंक कोरोना वायरस से संक्रमित हो सकते हैं और ये इंसान में भी वायरस का संक्रमण कर सकते हैं.
मिंक उदबिलाव प्रजाति का ही एक जीव है. जमीन और पानी में रहने वाले मिंक उदबिलाव से थोड़े छोटे होते हैं. मूल रूप से मिंक उत्तरी अमेरिका और यूरोप में पाई जाने वाले प्रजाति है. फर के लिए अमेरिकन मिंक की लंबे समय के फार्मिंग हो रही है. पशु प्रेमियों के विरोध के बावजूद हर साल लाखों मिंक फर के लिए मारे जाते हैं.
केंद्र सरकार ने इंसानों द्वारा सीवर की सफाई को पूरी तरह से खत्म करने के लिए नया अभियान शुरू किया है. क्या ये नए कदम इस अमानवीय प्रथा को खत्म कर पाएंगे?
डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय की रिपोर्ट-
केंद्र सरकार ने गुरूवार 19 नवंबर को दो नई घोषणाएं की. सामाजिक कल्याण मंत्रालय सीवरों और सेप्टिक टैंकों की सफाई के लिए मशीनों का उपयोग अनिवार्य करने के लिए एक कानून लेकर आएगा. दूसरी तरफ शहरी कार्य मंत्रालय ने इंसानों द्वारा सीवर की सफाई रोकने के लिए राज्यों के बीच एक प्रतियोगिता की शुरुआत की.
243 शहरों के बीच होने वाली इस प्रतियोगिता के लिए 52 करोड़ रुपए आबंटित किए गए हैं. राज्य सरकारों ने प्रण लिया है कि अप्रैल 2021 तक इस तरह की सफाई की प्रक्रिया को पूरी तरह से मशीन आधारित बना दिया जाएगा. सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले शहरों को इनाम दिया जाएगा.
भारत में मैन्युअल स्केवेंजिंग या इंसानों द्वारा नालों की सफाई एक बड़ी समस्या है. 2013 में एक कानून के जरिए इस पर प्रतिबंध भी लगा दिया गया था, लेकिन बैन अभी तक सिर्फ कागज पर ही है. देश में आज भी लाखों लोग सीवरों और सेप्टिक टैंकों की सफाई करने के उद्देश्य से उनमें उतरने के लिए मजबूर हैं.
282 सफाईकर्मियों की मौत
यह अमानवीय होने के साथ साथ जानलेवा भी है. नालों में फैली गंदगी से उनमें घातक गैसें बन जाती हैं जिन्हें सूंघ लेने मात्र से इंसान बेहोश हो जाता है. गैसें अधिक मात्रा में नाक में गईं तो जान ले लेती हैं. 2016 से 2019 के बीच देश के अलग अलग हिस्सों में कम से कम 282 सफाईकर्मी सीवर और सेप्टिक टैंक साफ करने के दौरान मारे गए.

Twitter/ Shiv Sunny
केंद्र सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक इनमें से सबसे ज्यादा (40) सफाईकर्मियों की मृत्यु तमिल नाडु में हुई, 31 की हरियाणा में और 30 की दिल्ली और गुजरात में हुई. सफाईकर्मियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों का कहना है कि असली आंकड़े इस से कहीं ज्यादा हैं और असली तस्वीर कहीं ज्यादा भयावह.
इसी स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार ने ये नए कदम उठाए हैं. सरकार ने निर्णय लिया है कि कानून में संशोधन करके सीवरों और सेप्टिक टैंकों की मशीन आधारित सफाई को अनिवार्य कर दिया जाएगा और शब्दावली में से 'मैनहोल' शब्द को हटा कर 'मशीन-होल' शब्द का उपयोग किया जाएगा.
इसके अलावा कानून के उल्लंघन के मामलों की शिकायत करने के लिए एक राष्ट्रीय हेल्पलाइन भी शुरू की जाएगी. सामाजिक कल्याण मंत्रालय ने यह भी फैसला लिया है कि सफाई मशीनें खरीदने के लिए नगर पालिकाओं और ठेकेदारों की जगह सीधे सफाई कर्मचारियों को पैसे दिए जाएंगे.
नोएडा के सेक्टर 50 मेट्रो स्टेशन को ट्रांसजेंडरों के लिए समर्पित कर इसका नाम प्राइड किया गया है. यहां काम करने वाले ट्रांसजेंडर मान-सम्मान पाकर बेहद खुश हैं और कहते हैं कि इस तरह के अवसर अन्य सदस्यों को भी मिलने चाहिए.
डॉयचे वैले पर आमिर अंसारी की रिपोर्ट-
बिहार के कटिहार से निकलकर माही गुप्ता मुंबई रोजगार की तलाश में पहुंची लेकिन वहां कुछ समय बिताने के बाद उन्हें प्राइड स्टेशन में काम करने का मौका मिला. माही गुप्ता एक ट्रांसजेंडर हैं और उनकी नई नौकरी नोएडा के सेक्टर 50 स्थित "प्राइड" स्टेशन में लगी है. यह उत्तर भारत का पहला मेट्रो स्टेशन है जो ट्रांसजेंडरों को समर्पित किया गया है. मकसद बेहद साफ है इस समुदाय से जुड़े लोगों को रोजगार और सम्मान देकर मुख्यधारा में लाना और समाज में उनके प्रति सोच में बदलाव लाना शामिल है. माही गुप्ता टिकट काउंटर पर आने वाले मेट्रो यात्रियों के सवालों के जवाब देती हैं और उन्हें कोई परेशानी होने पर उसे हल करने की भी कोशिश करती हैं. माही का काम काउंटर पर मेट्रो टोकन बेचने का है लेकिन वे इस नौकरी से बेहद खुश हैं. माही डीडब्ल्यू से कहती हैं, "हमारे लिए यह बेहद अनोखा अनुभव है इसी के साथ उन लोगों के लिए भी जो यहां आते हैं. हमें पहले सिर्फ ट्रैफिक सिग्नल पर भीख मांगने वालों की तरह देखा जाता था लेकिन मौका मिलना पर हम अपनी क्षमता दिखा सकते हैं."

Aamir Ansari/DW
नौकरी पाकर खुश हैं ट्रांसजेडर समुदाय के लोग.
ट्रांसजेंडर के लिए अवसर
नोएडा मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (एनएमआरसी) ने सेक्टर 50 स्टेशन को ट्रांसजेंडर समुदाय को समर्पित किया है. इस पहल का मकसद है कि ट्रांसजेंडर को मुख्यधारा से जोड़ा जा सके. एनएमआरसी ने छह ट्रांसजेंडरों को टिकट काउंटर और हाउस कीपिंग की ट्रेनिंग दिलवाकर इस स्टेशन पर तैनात किया है. यह पहल ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक 2019 से प्रेरित है, जिसके मुताबिक किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति के साथ शैक्षणिक संस्थानों, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं आदि में भेदभाव नहीं किया जा सकता है. प्राइड स्टेशन में हाउस कीपिंग का काम करने वाली प्रीति कहती हैं, "तीसरे लिंग के लोगों को सिर्फ गलत नजरों से ही देखा जाता रहा है. लेकिन जब से मैं यहां काम कर रही हूं तो मेरे अंदर आत्मविश्वास बढ़ा है और मैं गर्व महसूस करती हूं. हम ट्रांसजेंडर हैं तो क्या हुआ जो इज्जत हमें समाज में मिलनी चाहिए वो यहां काम करने के बाद मिल रही है."

Aamir Ansari/DW
ट्रांसजेंडर समुदाय को समर्पित है प्राइड स्टेशन.
"सम्मान वाली जिंदगी"
माही कहती हैं कि उन्होंने 2013 में अपना लिंग बदलवाया और उसके बाद गांव गई तो गांव वालों ने उन पर तरह तरह के ताने मारे जिसके बाद वह गांव छोड़ कर चली गई. माही ने इस दौरान बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया और बाद में एनजीओ के साथ मिलकर एचआईवी के लिए कार्यक्रम में काम किया. माही के मुताबिक, "नौकरी से लोगों की सोच में बदलाव आना एलजीबीटी समुदाय के लिए बहुत मायने रखता है, क्योंकि यह समुदाय समाज में स्वीकृति पाने के लिए बोल बोल कर थक चुका है. अब इस समुदाय के सदस्यों को काम की जरूरत है क्योंकि बिना काम के वे समाज में अपने आपको साबित नहीं कर सकते हैं."

Aamir Ansari/DW
नोएडा मेट्रो रेल कॉरपोरेशन की पहल से समाज में सोच बदलेगी.
स्टेशन के बाहर और भीतर इस समुदाय को महत्व देने के लिए दीवारों पर सतरंगी रंग और चित्र बनाए गए हैं. 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में 4.9 लाख ट्रांसजेंडर रहते हैं और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में इनकी संख्या 35,000 के करीब है. गौरतलब है कि सेक्टर 50 स्टेशन का नाम बदलने से पहले एनएमआरसी ने ऑनलाइन सुझाव मांगे थे, अधिकतर लोगों ने स्टेशन का नाम "प्राइड" करने का सुझाव दिया.
2017 में केरल के कोच्चि मेट्रो रेल लिमिटेड ने इसी तरह 23 ट्रांसजेंडरों को नौकरी पर रखा था.
भारतीय सेना के इतिहास में पहली बार महिला अधिकारियों का स्थायी सेवा के लिए चयन हुआ है. यह फरवरी में आए सुप्रीम कोर्ट के आदेश की वजह से संभव हो पाया है.
डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय की रिपोर्ट-
सेना ने बताया है कि स्थायी सेवा यानी परमानेंट कमिशन (पीसी) के लिए जिन 615 महिला प्रत्याशियों का मूल्यांकन किया गया था उनमें से 300 को चुन लिया गया है. मीडिया में आई खबरों में दावा किया गया है कि जिनका चयन नहीं हो पाया उनमें चयन के मानदंडों पर खरी ना उतरने वाली और मेडिकल जांच में उत्तीर्ण ना होने वाली प्रत्याशियों के अलावा वो महिला अधिकारी भी शामिल हैं जिन्होंने स्थायी सेवा नहीं चुनी.
ऐसी महिला अधिकारी 20 सालों की सेवा के बाद सेवानिवृत्त हो जाएंगी और उन्हें पेंशन भी मिलेगी. पीसी मिलने वाली महिला अधिकारी सेना में अपने पूरे कार्यकाल तक सेवाएं दे सकेंगी और वो समय समय पर पदोन्नति की पात्र भी बन जाएंगी. 13 लाख सिपाहियों और अधिकारियों वाली भारतीय सेना में 43,000 अधिकारी हैं जिनमें महिला अधिकारियों की संख्या लगभग 1,600 है.
इन्हें अभी तक शॉर्ट सर्विस कमिशन के जरिए भर्ती किया जाता था, लेकिन फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने सेना में लिंग के आधार पर भेदभाव को खत्म करने का आदेश दिया था. उसके बाद सेना ने अपनी 10 शाखाओं में महिला अधिकारों को पीसी देने के लिए चयन प्रक्रिया शुरू कर दी थी.
13 लाख सिपाहियों और अधिकारियों वाली भारतीय सेना में 43,000 अधिकारी हैं जिनमें महिला अधिकारियों की संख्या लगभग 1,600 है.
सेना की कानूनी और शिक्षा संबंधी शाखाओं में महिला अधिकारियों को इसके पहले से पीसी दिया जा रहा था, लेकिन अब ये बाकी आठ शाखाओं में भी हो पाएगा. इसके लिए एक विशेष चयन बोर्ड का गठन किया गया जिसके अध्यक्ष एक लेफ्टिनेंट जनरल थे. बोर्ड में ब्रिगेडियर रैंक की एक महिला अधिकारी भी थी.
महिला अधिकारियों को आब्जर्वर की तरह बोर्ड की कार्यवाही देखने का भी अवसर दिया गया था, जिससे प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे. हालांकि महिला अधिकारियों को अभी भी लड़ाई की किसी भी भूमिका में शामिल होने की अनुमति नहीं है. नौसेना में भी महिलाएं लड़ाकू जहाजों और सबमरीनों में सेवा नहीं कर सकती हैं. सिर्फ वायु सेना में महिलाएं लड़ाकू भूमिका में सक्रिय हैं.
-ज़ुबैर अहमद
इस समय भारतीय मुसलमानों का राष्ट्रीय स्तर का कोई नेता है? - अक्सर वो लोग जो ये सवाल करते हैं कि भारतीय मुसलमानों में लीडरशिप की कमी है उनके लिए इम्तियाज़ जलील का सीधा जवाब है - एआईएमआईएम के अध्यक्ष भारतीय मुसलमानों के एक ही लीडर हैं.
इम्तियाज़ जलील ऑल इंडिया मजलिस-ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन या एआईएमआईएम के महाराष्ट्र से चुने सांसद हैं. उनके इस दावे को चुनौती देने वालों से वो पूछते हैं, "आप दूसरा कोई मुसलमान नेता बताएं?"
अपने नेता का नाम लेकर, एक और सवाल करते हैं, "मुसलमानों का उतना ही लोकप्रिय नेता बता सकते हैं जितना ओवैसी साहब हैं? इतना डट कर, जम कर बोलने वाले, संसद के अंदर मुसलमानों के लिए बोलने वाले किसी और (मुस्लिम) नेता का नाम बता दीजिये? किसी भी राज्य और शहर में पूछ लीजिये आपको कोई दूसरा नाम मिलेगा ही नहीं."
इम्तियाज़ जलील अपनी पार्टी को भी वही दर्जा देते हैं जो वो अपने नेता को देते हैं.
बिहार विधानसभा के चुनाव में पांच सीटें जीतने के बाद कहा ये जा रहा है कि एआईएमआईएम मुसलमानों की राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बन कर उभरी है और इसके अध्यक्ष असद्दुदीन ओवैसी समुदाय के सबसे बड़े नेता के रूप में सामने आए हैं.
एआईएमआईएम का गठन साल 1927 में हुआ था. शुरूआत में ये पार्टी केवल तेलांगना तक महदूद थी. 1984 से ये पार्टी लगातार हैदराबाद लोकसभा सीट से जीतती आ रही है.
2014 में हुए तेलांगना विधानसभा चुनाव में पार्टी ने सात सीटें जीती और 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में दो सीटें जीतने के बाद इस पार्टी ने अपना दर्जा एक छोटी शहरी पार्टी से हटाकर राज्य स्तर की पार्टी के रूप में स्थापित कर लिया.
बिहार में जीत दर्ज करने के बाद पार्टी के हौसले बुलंद हैं. तेलंगाना और महाराष्ट्र के बाद पार्टी ने अब बिहार में अपना खाता खोला है और अपने मुख्यालय हैदराबाद के बाहर विधानसभा की सबसे अधिक सीटें पहली बार जीती है.
पार्टी ने अब पश्चिम बंगाल में अपनी क़िस्मत आज़माने का फ़ैसला किया है जहाँ चुनाव अगले छह महीने के भीतर होने वाला है. बिहार की तुलना में यहां मुसलमानों की कहीं बड़ी आबादी है.
पार्टी उत्तर प्रदेश में 2017 में कई सीटों पर ज़मानत ज़ब्त होने के बाद भी 2022 के विधानसभा चुनाव में भाग लेने की बात कर रही है.
इम्तियाज़ जलील का कहना है पार्टी की चुनावी सफलता के पीछे ओवैसी पर लोगों का बढ़ता विश्वास भी है.
वो कहते हैं, "लोगों को अब एहसास हो रहा है कि ओवैसी थोड़ा तीखा बोलेगा, थोड़ा टेढ़ा बोलेगा लेकिन जो बोलेगा वो सच बोलेगा. लोगों को उनकी ज़बान पसंद नहीं आती होगी, उनको लगता होगा कि उनका लहज़ा सही नहीं है लेकिन वो सही बात करेगा."
मुस्लिम समुदाय में फिलहाल बहस का मुद्दा ये है कि क्या एआईएमआईएम समुदाय के लिए एक मसीहा बन कर उभर रही है या फिर ये आगे चल कर समुदाय के लिए मुश्किलें खड़ा कर सकती है?
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हैदराबाद के ज़ैद अंसार, पार्टी के पक्के समर्थकों में से एक है. वो कहते हैं, "मुसलमानों को देश की सियासत और सत्ता से दूर रखने की कोशिश की जा रही है. हमें लगता है कि हम अनाथ हैं. हमारे लिए कोई बोलने वाला नहीं. वो पार्टियाँ जो हमारा वोट हासिल करती आई हैं वो भी ख़ामोश रहती हैं. ऐसे में ओवैसी साहब ने हमें आवाज़ दी है, हमारे हक़ में बोलते हैं जिससे हमें ताक़त मिलती है."
सांसद इम्तियाज़ जलील पहले तो ये साफ़ करते हैं कि उनकी पार्टी केवल मुसलमानों की पार्टी नहीं है. वो कहते हैं कि पार्टी ने कई दलितों और हिंदुओं को चुनाव में टिकट दिए हैं, ख़ास तौर से स्थानीय चुनावों में.
लेकिन वो इस बात पर ज़ोर देते हैं कि उनकी पार्टी सियासी सिस्टम में मुसलमानों के सिकुड़ते स्पेस को पूरा कर रही है.
वो कहते हैं, "हमने कभी और कहीं पर ये नहीं कहा है कि एआईएमआईएम मुसलमानों की ही पार्टी है. ये सही बात है कि मुसलमानों के सबसे ज़्यादा मुद्दे हैं इस वजह से इन मुद्दों को जब कोई नहीं उठता है तो हम को उठाना पड़ रहा है. अगर दूसरी पार्टियाँ मुसलमानों के मुद्दे उठाती तो मेरे विचार में हमारी पार्टी को वो स्पेस ही नहीं मिला होता."
कहा ये जा रहा है कि मुस्लिम युवाओं में एआईएमआईएम को खासी लोकप्रिय हासिल है.
मुंबई में एक कंपनी में मैनेजर की पोस्ट पर काम करने वाली दीबा अरीज किराये के अपने मकान को बदलना चाहती हैं. लेकिन उनके अनुसार उन्हें मुसलमान होने के नाते दूसरा घर नहीं मिल पा रहा है. उनका ब्वॉयफ़्रेंड एआईएमआईएम के समर्थक हैं लेकिन वो ख़ुद ओवैसी या ज़ाकिर नाइक जैसे मुस्लिम नेताओं को पसंद नहीं करतीं.
वो कहती हैं, "मैं हमेशा ओवैसी के बढ़ते फेम (लोकप्रियता) से परेशान थी. अपने ब्वॉयफ़्रेंड और उनके दोस्तों से हमारा कई बार इस मुद्दे पर झगड़ा भी हो चुका है. मैं सेकुलर मुस्लिम परिवार से हूँ. लेकिन जब मेरे साथ धर्म के नाम पर भेदभाव होने लगा, घर ढूंढने में दिक्कत होने लगी, तो मेरे ज़ेहन में बात घूमने लगी कि क्या अब तक मैं ग़लत थी और मेरा ब्वॉयफ़्रेंड और उसके एआईएमआईएम समर्थक सही थे?"

दीबा को अब भी किराए पर घर नहीं मिला है. लेकिन इस कड़वे अनुभव के बावजूद वो कहती है कि वो ओवैसी की सियासत का विरोध करती रहेंगी क्योंकि कि उनकी सियासत "मुस्लिम समाज के लिए नुक़सानदेह है".
फहद अहमद भी मुंबई में रहते हैं. वो टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के छात्र हैं. बिहार विधानसभा चुनाव में रुचि के कारण वो चुनाव के दौरान बिहार में ही थे.
उनका कहना है कि एआईएमआईएम के पक्ष या विरोध में दिए जा रहे दोनों तरह के तर्क को वो सही नहीं मानते. वो कहते हैं कि मुसलमान युवाओं में ये एहसास है कि सेकुलर पार्टियाँ मुस्लिम मुद्दे उठाती नहीं हैं और ओवैसी ऐसे मुद्दे उठाते हैं.
वो कहते हैं, "ओवैसी को सेकुलर पार्टियां एक पंचिंग बैग की तरह इस्तेमाल कर रही हैं. उनको अगर आप एक लगाओगे तो वापस आपको ही चोट लगेगी."
फहद अहमद के अनुसार ओवैसी की पार्टी का पनपना अंततः मुसलमानों के हक़ में नहीं है. उनके विचार में अगर सेकुलर पार्टियां नौजवान, उभरते हुए मुसलमान नेताओं को जगह दें तो ओवैसी की अहमियत ख़ुद-बख़ुद से कम हो जाएगी.
28 जनवरी 2020 को मुंबई के बायकुला में आयोजित असदउद्दीन ओवैसी की रैली में शामिल भीड़
एआईएमआईएम एक सांप्रदायिक पार्टी?
ये बात सही है कि असदउद्दीन ओवैसी अक्सर संसद में मुसलमान समुदाय से जुड़े मुद्दे उठाते रहे हैं. चाहे वो बाबरी मस्जिद पर फ़ैसले का मुद्दा हो, कथित 'लव जिहाद का' मुद्दा हो या फिर नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी का.
उनकी आवाज़ संसद में गूंजती है और अक्सर दूसरे नेताओं की तुलना में वो बेहतर तर्क देते सुनाई देते हैं. वो बेबाक तरीके से ख़ुल कर बोलते दिखते हैं.
लेकिन ये भी सही है कि एक तरफ़ आम मुसलमानों में पार्टी की लोकप्रियता बढ़ रही है तो दूसरी तरफ़ मुस्लिम समाज के एक बड़े तबक़े में इससे चिंता भी है.
इंडियन मुस्लिम फ़ॉर प्रोग्रेस एंड रिफ़ॉर्म की सदस्य शीबा असलम फ़हमी कहती हैं, "(एआईएमआईएम का लोकप्रिय होना) बिलकुल ख़तरनाक है. ये बहुत अफ़सोसनाक़ भी है. हम लोगों को उम्मीद नहीं थी कि 1947 में जो इलाक़े बंटवारे से बेअसर रहे वहां पर टू-नेशन या दो क़ौमों का जो तसव्वुर है वो उन इलाक़ों में परवान चढ़ाया जा सकता है."
"उन इलाक़ों से होकर बँटवारे की लकीर नहीं गुज़री, न उन इलाक़ों ने नफ़रतें देखी थीं, न शरणार्थियों का आना देखा था, न लुटे सरदारों और बंगालियों का आना देखा था. इतना आसान है कि कितना भी नाकाम प्रधानमंत्री हो उसके सामने कोई मुसलमान आकर कहे कि हम मुसलमान हैं हम मुसलमानों की सियासत करेंगे तो फिर उसके लिए कुछ ज़्यादा मेहनत करने के लिए बचता ही नहीं है."
शीबा कहती हैं कि भारत के मुसलमानों को साम्प्रदायिकता की जगह सेकुलर सिस्टम की सबसे अधिक ज़रुरत है. इसी सिस्टम में मुसलमान सुरक्षित रह सकता है.
वो कहती हैं, "देखिये मुझे बहुत साफ़ दिख रहा है कि बीजेपी चाहती है कि उनका विपक्ष उनकी पसंद का होना चाहिए और ओवैसी साहब से वो अपनी पसंद का विपक्ष पैदा करवा रहे हैं. ये एक आज्ञाकारी विपक्ष है जो बीजेपी को सूट करता है."
शीबा आगाह करना चाहती हैं कि स्थिती देश के बँटवारे से पहले की तरह से बनती जा रही है. उनके अनुसार इसकी असल ज़िम्मेदार बीजेपी है जिसे देश की अखंडता से अधिक हिन्दू राष्ट्र बनाने की पड़ी है.
हालांकि राजनीतिक विश्लेषक और स्वराज इंडिया के नेता योगेंद्र यादव ओवैसी के बढ़ते प्रभाव को सेक्लुर राजनीति की हार और सेकुलर पार्टियों की राजनीति की विफलता मानते हैं.
अपने एक वक्तव्य में वो कहते है कि "बंटवारे के बाद मुसलमानों ने कभी मुस्लिम पार्टी को वोट नहीं दिया. अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए उन्होंने मुस्लिम नेताओं का सहारा नहीं लिया क्योंकि उनका मानना था कि जो पार्टी बहुसंख्यकों का ख़याल रख सकती है वो उनके हितों का भी ख़याल रख सकती है."
"लोकतंत्र के लिए यही सबसे ख़ूबसूरत चीज़ होती है. लेकिन इस देश की सेकुलर पार्टियों ने मुसलमानों को वोट का बंधक बनाने की कोशिश की है. मुसलमान तंग आ चुका है इस राजनीति से."
इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के कामयाब उम्मीदवारों में से एक शकील अहमद ख़ान ओवैसी के उदय की तुलना बिहार के दिवंगत नेता सैयद शहाबुद्दीन से करते हैं जिन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव के दौर में मुसलमानों के मुद्दे उठाये थे और समुदाय के राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरने की कोशिश की थी.

एआईएमआईएम की बढ़ती लोकप्रियता के कारण
एआईएमआईएम मुसलमानों को केंद्र में रखकर बनाई गई पहली पार्टी नहीं है. केरल की मुस्लिम लीग हो या असम की एआीयूडीएफ़ हो- इससे पहले भी इस पहचान के साथ पार्टियां बनी है लेकिन दोनों ही पार्टियां अपने इलाक़े तक सीमित रही हैं.
एआईएमआईएम इस तरह से अलग है कि अब ये हैदराबाद से निकलकर दूसरे राज्यों में अपनी राजनीतिक पैठ बना रही है. लेकिन एआईएमआईएम की बढ़ती लोकप्रियता के बावजूद विरोधी दलों में चिंता का अभाव नज़र आता है.
शकील अहमद ख़ान बिहार में एआईएमआईएम की कामयाबी को 'सोडा वाटर के बुलबुले' की तरह बताते हैं जिसका जितनी तेज़ी से उभार होता है उतनी ही तेज़ी से अंत भी होता है.
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह इसे भारतीय जनता पार्टी की B-टीम की तरह से देखते हैं और लगभग सभी विरोधी दल इसे मुसलमानों की एक सांप्रदायिक पार्टी मानते हैं.
हालांकि असद्दुदीन ओवैसी हमेशा बीजेपी की टीम-बी जैसे तमगों को नकारती रहे हैं. उन पर 'वोटकटवा पार्टी' होने का भी आरोप लगता रहा है. लेकिन एआईएमआईएम के आगे बढ़ने पर विश्लेषण लगभग सभी के पास है.
कांग्रेस नेता शकील अहमद ख़ान की नज़रों में एआईएमआईएम के आगे बढ़ने के मुख्य तीन कारण हैं, "पहला, पिछले पांच सालों में संसद में जो फ़ैसले हुए और ओवैसी ने जिस तरह से उन्हें भंजाने की कोशिश की इससे उन्हें मदद मिली है क्योंकि युवाओं को लगता है उनकी आवाज़ सबसे मज़बूत है. लेकिन वो समझ नहीं पाते हैं कि इस तरह की सियासत की मुश्किलें क्या हैं और लोकतंत्र में इसका नुक़सान क्या हो सकता है."
"दूसरी वजह ये है कि जहाँ से पार्टी ने जीत दर्ज की है उन इलाक़ों की आबादी में 73-74 फीसदी मुसलमान हैं. तो वहां इस पार्टी का आगे बढ़ना वहां की मुस्लिम लीडरशिप का निकम्मापन है."
"और तीसरा कारण ये है कि अगर कोई सांप्रदायिक बातें करता है तो मुस्लिम समाज के लोगों को उसका उतना ही सख्ती से विरोध करना चाहिए जो नहीं किया गया".
शकील अहमद ख़ान का कहना था कि उन्होंने एआईएमआईएम की साम्प्रदायिकता का सामना किया और इसलिए वो अपनी सीट से जीते.
वो कहते हैं, "ओवैसी की तरह मैं भी लच्छेदार उर्दू बोल सकता हूँ, शेर पढ़ सकता हूँ लेकिन इससे यहाँ के मुसलमानों के मसले तो हल नहीं हो सकते? मैं कहता हूँ कि उनके भड़काऊ भाषणों से मुस्लिम समाज का कोई फायदा नहीं होने वाला है. मुस्लिम समाज या किसी भी समाज का फायदा एक सेकुलर सियासत में ही हो सकता है. मैंने इसी लाइन को फॉलो किया और लोगों ने हमारा साथ दिया."
शीबा फ़हमी के मुताबिक़ ओवैसी पीड़ितों की राजनीति कर रहे हैं. वो कहती हैं, "इस देश में किसी को सामाजिक न्याय नहीं मिल रहा है. केवल मुसलमान ही पीड़ित नहीं हैं. दलितों और ग़रीबों को भी सामाजिक न्याय नहीं मिल रहा. लेकिन मुस्लिम समुदाय को ये बताया जा रहा है कि सिर्फ आपको न्याय नहीं मिल रहा है. ऐसे में लोग आपके साथ जुड़ सकते हैं."
इम्तियाज़ जलील अपनी पार्टी के बचाव में कहते हैं कि क्या वो कांग्रेस या दूसरी पार्टियों से पूछ कर सियासत करेंगे? उन्होंने कांग्रेस को दोहरी पॉलिसी अपनाने और मुसलमानों को धोखा देने वाली पार्टी बताया.
वो कहते हैं, "मेरी नज़र में कांग्रेस, एनसीपी जैसी पार्टियाँ - ये सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं. मुसलमानों का इलेक्शन के वक़्त में इस्तेमाल करो और उसके बाद उन्हें भूल जाओ. ये अपने नुक़सान की बात करते हैं, लेकिन सबसे बड़ा नुकसान तो मुसलमानों का हुआ है."
वो कहते हैं, "सोशल मीडिया के दौर में छोटा बच्चा भी देख रहा है कि क्या हो रहा है. मध्यप्रदेश में सेकुलरिज़्म के नाम पर कांग्रेस के विधायक जीतते हैं और बाद में वो बीजेपी की गोद में बैठ जाते हैं."
"2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में मुसलमान नीतीश कुमार के साथ खड़े थे क्योंकि उन्हें लगा कि मोदी को वही बिहार में हरा सकते हैं. लेकिन उन्होंने मुसलमानों का वोट हासिल किया और डेढ़ साल बाद मोदी से हाथ मिला लिया. महाराष्ट्र में जो शिव सेना मुसलमानों को गालियाँ देती थी अब कांग्रेस और एनसीपी उनके साथ मिलकर सरकार में है. ये कब तक चलेगा? कम से कम लोगों को ये यक़ीन है कि हमारी पार्टी बीजेपी के साथ हाथ नहीं मिलाएगी."
लेकिन एआईएमआईएम के ख़िलाफ़ बीजेपी को जानबूझ कर फायदा पहुँचाने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं.
अखिलेश प्रताप सिंह कहते हैं वो शुरू से कहते आए हैं कि ओवैसी की पार्टी बीजेपी की B-टीम है. वो कहते हैं, "जब से मोदी जी आए हैं एक तरह से एआईएमआईएम को प्रमोट कर रहे हैं, चाहे वो महाराष्ट्र के चुनाव में हों, दिल्ली में लोकल बॉडीज़ के चुनाव में या फिर इससे पहले बिहार विधानसभा चुनाव में या उत्तर प्रदेश में."
"उनका उद्देश्य ये है कि वो अल्पसंख्यकों के वोट बांट दें जिससे उनको जीतने में आसानी हो. ये हकीक़त है कि जब से मोदी जी आए हैं, दोनों तरफ़ कट्टरता की राजनीति में इज़ाफा हुआ है."
योगेंद्र यादव ओवैसी की पार्टी पर लग रहे बीजेपी की टीम-बी और वोटकटवा के आरोप से सहमत नहीं हैं. हालांकि वो कहते हैं कि इस पार्टी की सफलता सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा देगी.
वो मानते है कि हिंदुत्व की राजनीति ने मुसलमानों की एक्सक्लूसिव पार्टी को बढ़ावा दिया है और ये ट्रेंड भारतीय लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है.
वो कहते हैं, "इससे निपटने का एक ही उपाय है कि सेकुलर पार्टियों को मुसलमान हिंदू और सभी धर्म के साधारण लोगों का विश्वास जीतना होगा. अभी न तो हिंदू उन पर भरोसा करता है ना मुसलमान."
तारिक़ अनवर बिहार के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता हैं जो कई साल तक राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में भी रह चुके हैं. उनका कहना है कि बीजेपी और एआईएमआईएम दोनों साम्प्रदायिक सियासत करने वाली पार्टियाँ हैं और इन दोनों का विरोध ज़रूरी है क्योंकि ये देश की एकता को भंग करने वाली ताक़तें हैं.
वो कहते हैं, "जहाँ तक एआईएमआईएम या ओवैसी साहब का सवाल है, मैं कहूंगा कि किसी तरह की साम्प्रदायिकता देश के ख़िलाफ़ है. हिन्दू साम्प्रदायिकता हो या मुस्लिम साम्प्रदायिकता- दोनों एक दूसरे के लिए ख़ुराक़ हैं और इसका नुक़सान देश को उठाना पड़ेगा."
"एआईएमआईएम के नाम का मतलब है मुस्लिम इत्तेहाद या एकता. जब आप मुस्लिम एकता की बात करते हैं तो ज़ाहिर है इससे जो हिन्दू फ़िरकापरस्त हैं या कट्टरपंथी है उनको इसका फायदा पहुँचता है. अगर सीधे तौर पर नहीं तो अप्रत्यक्ष तौर पर एआईएमआईएम ज़रूर हिन्दु साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दे रही है और ये केवल मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि पूरे मुल्क के लिए नुक़सानदेह है."
ओवैसी पर ये भी इल्ज़ाम है कि वो मोदी सरकार की आलोचना करने से बचने की कोशिश करते हैं और उनका निशाना अक्सर कांग्रेस और दूसरे सेकुलर दल होते हैं.
शीबा कहती हैं, "अकबरुद्दीन ओवैसी (असद्दुदीन ओवैसी के छोटे भाई) के एक गंदे बयान से 100 तोगड़िया के गंदे बयान जस्टिफाई हो रहे हैं, 100 उमा भारती के बयान जस्टिफाई किये जाते हैं."
ओवैसी विरोधी तत्व ये भी कहते हैं कि उनकी पार्टी केवल उन्हीं सीटों पर चुनाव लड़ती है जहाँ मुसलमान आबादी अधिक है.
तारिक़ अनवर के अनुसार ओवैसी मुसलमानों की भावनाओं से खेल कर वोट हासिल करने की कोशिश करते हैं जिसके कारण वोटों का बंटवारा होता है और इसका फायदा बीजेपी को होता है जबकि सेकुलर पार्टियों को इसका नुकसान होता है.
वो कहते हैं, "ओवैसी ने बिहार चुनाव में गठबंधन के 15 सीटों में वोट काटे. अगर ये 15 सीट हम जीत जाते तो आज बिहार में सरकार हमारी होती."
लेकिन पार्टी सांसद इम्तियाज़ जलील मुसलमानों के हित में बोलने को साम्प्रदायिकता नहीं मानते और ये भी नहीं मानते कि उनकी पार्टी की सियासत से बीजेपी को फायदा होता है.
वो कहते हैं, "अगर हम उन इलाक़ों से चुनाव नहीं लड़ेंगे जहाँ हमारी मुसलमान अधिक हैं तो क्या वहां से आरएसएस वाले, बजरंग दल वाले, शिव सेना वाले चुनाव लड़ेंगे?"
पार्टी का अगला पड़ाव बंगाल है जहाँ छह महीने के बाद विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. बंगाल में मुस्लिम वोट 25 प्रतिशत से अधिक है. इम्तियाज़ जलील कहते हैं, "इंशाल्लाह हम लड़ेंगे. हम हर जगह जाएंगे".
बंगाल विधानसभा चुनाव को जीतने के लिए बीजेपी पूरा ज़ोर लगा रही है. शायद ये ख़बर कि एआईएमआईएम बंगाल में चुनाव लड़ेगी बीजेपी के लिए खुशख़बरी होगी.
लेकिन कांग्रेस के लिए ये ख़बर कैसी होगी? अखिलेश प्रताप सिंह कहते हैं, "हम अभी से राज्य में सक्रिय हो गए हैं और एआईएमआईएम को रोकने की हमारी तैयारी शुरू हो चुकी है."(bbc.com)
-सर्वप्रिया सांगवान
पत्रकार, सरकार की बदले की कार्रवाई, सुप्रीम कोर्ट और आज़ादी का मौलिक अधिकार. पिछले कुछ दिनों से ये शब्द मीडिया में छाए हुए हैं. हाल ही में आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में रिपब्लिक न्यूज़ चैनल के मालिक और पत्रकार अर्नब गोस्वामी को सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिली है.
आम लोगों में इस सवाल पर चर्चा हो रही है कि क्या देश की सर्वोच्च अदालत का रवैया और रूख़ सभी पत्रकारों के मामले में समान है या नहीं.
केरल के एक पत्रकार सिद्दीक़ कप्पन का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. आज उत्तर प्रदेश सरकार ने भी अपना जवाब कोर्ट में दाखिल किया है.
पत्रकार कप्पन को उत्तर प्रदेश पुलिस ने तब गिरफ्तार कर लिया था जब वह एक दलित महिला के साथ बलात्कार और हत्या मामले की कवरेज के लिए हाथरस जा रहे थे.
उन्हें पांच अक्तूबर को हिरासत में लिया गया था. बाद में पुलिस ने उन पर यूएपीए एक्ट के तहत मामला दर्ज किया. उनके साथ तीन और लोगों को गिरफ्तार किया गया था जिसमें दो आंदोलनकारी छात्रों के साथ एक टैक्सी ड्राइवर शामिल है.
पत्रकार कप्पन और तीन अन्य लोगों को मथुरा पुलिस ने पांच अक्तूबर को 'प्रिवेंटिव पावर' के तहत हिरासत में लिया था.
क्या है पूरा मामला?
पत्रकार कप्पन और तीन अन्य लोगों को मथुरा पुलिस ने 'प्रिवेंटिव पावर' के तहत हिरासत में लिया था. सीआरपीसी की धारा 151 के तहत पुलिस किसी अपराध की आशंका के कारण किसी को हिरासत में ले सकती है.
इन चारों को छह अक्तूबर के दिन एक्ज़ेक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और कोर्ट ने उन्हें 14 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया. जबकि एक्ज़ेक्यूटिव मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र में सिक्योरिटी या बॉन्ड भरवाना है ना कि हिरासत में भेजना.
दूसरी तरफ़, छह अक्तूबर को ही केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स ने संविधान के आर्टिकल 32 के तहत कप्पन के लिए हेबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल कर दी.
याचिका में कहा गया था कि उनके सहकर्मी, परिवार या किसी को भी कप्पन को हिरासत में लिए जाने की ख़बर नहीं दी गई थी. किसी को नहीं बताया गया कि उन्हें कहां रखा गया है और किस मामले में हिरासत में लिया गया है.
ये सब होने के बाद सात अक्तूबर को पुलिस ने इस मामले में पहली एफ़आईआर दर्ज की.
इस एफ़आईआर में यूएपीए के सेक्शन 17 और 18, भारतीय दंड संहिता के सेक्शन 124A(राजद्रोह), 153A(दो समूहों के बीच वैमनस्य बढ़ाने), 295A(धार्मिक भावनाएं आहत करने) और आईटी एक्ट के सेक्शन 62, 72, 76 लगाए गए थे.
क्या है एफआईआर में?
सिद्दीक़ कप्पन के साथ-साथ अतिकुर्रहमान, आलम और मसूद पर एफ़आईआर दर्ज की गई. रहमान और आलम छात्र और एक्टिविस्ट हैं और मसूद एक टैक्सी ड्राइवर हैं जिनकी टैक्सी में बाक़ी लोग हाथरस के पीड़ित परिवार से मिलने जा रहे थे.
एफ़आईआर के मुताबिक़ "अभियुक्तों के पास कुल छह फोन पाए गए और एक लैपटॉप. उनके पास 'जस्टिस फॉर हाथरस विक्टिम' लिखा एक पोस्टर था. ये लोग शांति भंग करने के मक़सद से हाथरस जा रहे थे. मीडिया रिपोर्ट्स से प्रतीत हो रहा है कि कुछ असामाजिक तत्व जातिगत तनाव और दंगा भड़काने का प्रयास कर रहे हैं. अभियुक्त carrd.co नाम की वेबसाइट भी चला रहे हैं और इस वेबसाइट के माध्यम से विदेशी चंदा इकट्ठा कर रहे हैं. इनके पास से बरामद पोस्टर 'एम आई नॉट इंडियास डॉटर' सामाजिक वैमनस्यता बढ़ाने और जन विद्रोह भड़काने वाले हैं. वेबसाइट के कृत्यों से यूएपीए के सेक्शन 17 और 18 के अंतर्गत मामला बन रहा है. आईटी एक्ट की धारा 65, 72 और 75 में मामला बन रहा है."
कोर्ट में अब तक क्या हुआ?
कप्पन की हेबियस कॉर्पस याचिका पर 12 अक्तूबर को चीफ़ जस्टिस बोबडे, एएस बोपन्ना, वी रामासुब्रमनियन की बेंच ने पहली सुनवाई की.
कप्पन के लिए केस लड़ रहे वकील कपिल सिबल ने कोर्ट को बताया था कि उनके मुवक्किल से परिवार को और वकील को नहीं मिलने दिया जा रहा.
उनकी मांग थी कि कोर्ट राज्य सरकार को नोटिस जारी करे और मथुरा ज़िला जज को जेल में मानवाधिकार उल्लंघन की जांच करने का निर्देश दे.
लेकिन कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस नहीं दिया और वकील सिबल को पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट जाने की सलाह दी. लेकिन सिबल के आग्रह पर कोर्ट ने चार हफ्ते बाद की तारीख़ दी.
16 नवंबर की सुनवाई के दिन कोर्ट ने कहा कि वो आर्टिकल 32 की याचिकाओं को बढ़ावा नहीं देना चाहता. हालांकि कोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस भेजने के लिए राज़ी हो गया.
उसी नोटिस पर 20 नवंबर को उत्तर प्रदेश सरकार ने कोर्ट ने अपना जवाब दाखिल किया है. सरकार का कहना है कि पत्रकार की याचिका नहीं टिकती क्योंकि वह अपने वकीलों के संपर्क में हैं.
इसके अलावा सरकार ने कहा है कि कप्पन पीएफआई संस्था के सचिव हैं और हाथरस में कवरेज के लिए जा रहे थे जबकि जिस अख़बार में वह काम करने का दावा करते हैं, वो 2018 में बंद हो चुका है.
दूसरी ओर, बाकी तीन अभियुक्तों की हेबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई इलाहाबाद हाई कोर्ट में चल रही है और अगली सुनवाई 14 दिसंबर को होगी.
लेकिन इसी बीच 11 नवंबर को पत्रकार अर्नब गोस्वामी को सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिली है जिसमें जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि अगर हम एक संवैधानिक कोर्ट के तौर पर आज़ादी की सुरक्षा नहीं करेंगे तो फिर कौन करेगा.
इसके बाद पत्रकार कप्पन के केस की तुलना अर्नब के केस से की जाने लगी है क्योंकि अर्नब 4 नवंबर को गिरफ्तार हुए और 11 को उन्हें ज़मानत मिल गई. वहीं कप्पन 5 अक्तूबर से जेल में हैं.
अर्नब गोस्वामी और सिद्दक़ी कप्पन के केस में तुलना क्यों?
सबसे पहली बात तो दोनों ही केस 'पर्सनल लिबर्टी' यानी निजी आज़ादी के बारे में है. आर्टिकल 21 कहता है कि किसी भी व्यक्ति से उसकी ज़िंदगी या निजी आज़ादी नहीं छीनी जा सकती और सिर्फ़ कानून पालन की प्रक्रिया में ही ऐसा हो सकता है.
दोनों ही केस में कोर्ट के सामने सवाल था और है कि क्या अभियुक्त को हिरासत में रखना क़ानून के हिसाब से सही है.
दोनों ही केस में अभियुक्त पत्रकार हैं. कप्पन को जब गिरफ्तार किया गया तो वह रिपोर्टिंग के लिए जा रहे थे.
हालांकि अर्नब के केस में उन्हें एक पुराने मामले में गिरफ्तार किया गया था जिसका संबंध उनकी पत्रकारिता से नहीं था. लेकिन आरोप है कि महाराष्ट्र सरकार ने उनकी पत्रकारिता के जवाब में ऐसी कार्रवाई की.
कप्पन मामले में भी उत्तर प्रदेश सरकार पर आरोप है कि ये पत्रकारों पर दबाव बनाने की कोशिश का हिस्सा है. यानी मामला मीडिया की आज़ादी का भी है.
लेकिन ये दोनों मामले कई वजहों से अलग भी हैं.
क्यों हैं दोनों मामले अलग?
अर्नब गोस्वामी को 2018 के एक मामले में गिरफ्तार किया गया था. उन पर आरोप है कि उन्होंने अन्वय नाइक को आत्महत्या के लिए उकसाया. अन्वय नाइक ने अपनी मौत से पहले एक ख़त में लिखा था कि अर्नब और अन्य दो लोगों ने उनके लाखों रूपयों का भुगतान नहीं किया.
अर्नब ने पहले हाई कोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की थी. हेबियस कॉर्पस को आसान शब्दों में समझाया जाए तो अगर किसी व्यक्ति को ग़ैर-कानूनी तरीक़े से हिरासत में रखा गया है चाहे पुलिस की या किसी और अथॉरिटी की तो वह इसके ख़िलाफ़ कोर्ट में जा सकता है.
कोर्ट में पुलिस को या अथॉरिटी को हिरासत में रखने की वजह बतानी होगी और अगर कोई वाजिब और क़ानूनी वजह नहीं सामने आती है तो कोर्ट याचिकाकर्ता की रिहाई का आदेश देता है.
भारत में ऐसी याचिका सुनने का अधिकार सिर्फ़ हाई कोर्ट (आर्टिकल 226) और सुप्रीम कोर्ट (आर्टिकल 32) के पास है.
लेकिन अर्नब की हेबियस कॉर्पस याचिका बॉम्बे हाई कोर्ट ने ख़ारिज कर दी.
फिर उनके वकील हरीश साल्वे ने अंतरिम ज़मानत के लिए हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की. उसे भी कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया और कहा कि पहली नज़र में ऐसा केस नहीं दिख रहा कि कोर्ट आर्टिकल 226 के अंतर्गत अर्नब को ज़मानत दे और अर्नब सीआरपीसी के मुताबिक़ ही सेक्शन 439 के तहत ज़मानत के लिए सेशन कोर्ट जाएं.
ज़मानत याचिका ख़ारिज होते ही अर्नब ने 10 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट का रूख़ कर स्पेशल लीव पीटीशन दाखिल की और अगले ही दिन वहां से उन्हें ज़मानत मिल गई. सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि हाई कोर्ट ने अर्नब को ज़मानत ना देकर ग़लती की है.
वहीं, कप्पन के केस में हाई कोर्ट का रूख नहीं किया गया है और सीधा सुप्रीम कोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की गई है. ज़मानत याचिका में ये तर्क दिया जाता है कि किसी ट्रायल के लिए अभियुक्त को हिरासत या जेल में रखने की ज़रूरत क्यों नहीं है. वहीं, हेबियस कॉर्पस में तर्क दिया जाता है कि क्यों किसी की हिरासत ग़लत है और कानून के मुताबिक़ नहीं है. सुप्रीम कोर्ट में ही अब कप्पन के लिए ज़मानत याचिका भी दाखिल कर दी गई है.
कप्पन पर मथुरा पुलिस ने यूएपीए के सेक्शन भी लगाए हैं. इसलिए भी मामला अर्नब के मामले से अलग हो जाता है. जब किसी पर राज्य सरकार यूएपीए कानून के तहत मामला दर्ज करती है तो इसकी जानकारी केंद्र को दी जाती है.
केंद्र को 15 दिन के अंदर रिपोर्ट बनानी होती है कि जिस अपराध में मामला दर्ज किया गया है क्या वो अपराध नैशनल इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी एक्ट 2008 के अंतर्गत बनता है, अगर बनता है तो क्या उस पर राज्य सरकार मामला चलाएगी या एनआईए. लेकिन अब तक इस पर कोई जानकारी सामने नहीं आई है.
केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स के लिए याचिका दायर करने वाले वकील विल मैथ्यूस ने बताया कि उन्होंने हाई कोर्ट जाने की बजाय सीधा सुप्रीम कोर्ट का रूख क्यों किया?
"हम पहले हाई कोर्ट में नहीं गए, उसके कुछ कारण हैं. पहला तो ये कि याचिकाकर्ता की मर्ज़ी है कि वह पहले कहां जाना चाहता है. हमें ये नहीं पता कि अभी हम कहां स्टैंड कर रहे हैं. डीके बसु बनाम स्टेट ऑफ़ वैस्ट बंगाल केस में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन थी कि अगर किसी को हिरासत में लिया जाए तो उसे बताया जाए कि क्यों लिया जा रहा है, उसके परिवार में किसी को ख़बर दी जाए. लेकिन कप्पन के केस में पुलिस ने ऐसा नहीं किया. ये सिर्फ़ ज़मानत की बात नहीं है, कानूनी प्रक्रिया की बात है. ये केस मीडिया बनाम सरकार का भी है. कप्पन किसी निजी केस में नहीं पकड़े गए हैं, वह एक रिपोर्ट करने के लिए जाते हुए हिरासत में लिए गए हैं. तो ये मीडिया की आज़ादी की बात भी है. सुप्रीम कोर्ट को इस मामले पर जल्द फ़ैसला देना चाहिए."
लेकिन बाक़ी तीन अभियुक्त हेबियस कॉर्पस पिटिशन लेकर पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ही गए हैं. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 18 नवंबर को राज्य सरकार, केंद्र सरकार और पुलिस अधिकारियों को नोटिस देकर जवाब मांगा है.
इस मामले में उनकी पैरवी कर रहे हैं सुप्रीम कोर्ट के वक़ील शाश्वत आनंद. वे बताते हैं कि इस मामले में पुलिस ने उनके मुवक्किल को ग़लत तरीके से हिरासत में लिया, गिरफ्तारी की जानकारी नहीं दी गई, एक्ज़ेक्यूटीव मजिस्ट्रेट ने अपने दायरे से बाहर जाकर हिरासत में भेजने का आदेश दे दिया और मुवक्किल से मिलने भी नहीं दिया जा रहा.
वे कहते हैं, "इसलिए ही अर्नब मामले से इस केस की तुलना की जा रही है क्योंकि वहां हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जिस तेज़ी से सुनवाई कर रहे थे, वो तेज़ी और ज़रूरत इस केस में नहीं दिखाई जा रही. हमें अगली तारीख 14 दिसंबर की दे दी गई है. तो क्यों कप्पन के केस के लिए वकील कपिल सिबल को हाई कोर्ट जाना चाहिए?"
सुप्रीम कोर्ट में इतनी जल्दी कैसे हुई अर्नब की ज़मानत याचिका पर सुनवाई?
कोई भी मामला सुप्रीम कोर्ट में एओआर (एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड) दाखिल करता है और उसके बाद मुक़दमा रजिस्ट्री विभाग में जाता है.
रजिस्ट्री विभाग को याचिका में कोई ग़लती नज़र आती है तो उसे ठीक करने के लिए वापस भेज देता है. ग़लती ठीक होने के बाद मामला सुनवाई के लिए लिस्ट हो जाता है.
कोर्ट में हेबियस कॉर्पस और ज़मानत की याचिकाओं को वरीयता दी जाती है. उसके बाद ऐसे केस जिसमें तुरंत दख़ल की ज़रूरत है और फिर बाक़ी मामले आते हैं.
अर्नब मामले में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल को ख़त लिख कर सवाल पूछा था कि 'एक तरफ़ हज़ारों नागरिक जेल में लंबे वक्त से हैं और उनका मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में हफ्तों महीनों तक लिस्ट नहीं होता है.'
'ये चिंताजनक है कि अर्नब गोस्वामी का केस हर बार कोर्ट में इतनी जल्दी कैसे सुनवाई के लिए लिस्ट हो जाता है.'
लेकिन सुप्रीम कोर्ट में वक़ील बजिंदर सिंह कहते हैं कि जिस तरह से रजिस्ट्री ने अर्नब के मामले में पर्सनल लिबर्टी को लेकर तेज़ी दिखाई या काम किया, वैसा ही होना चाहिए. लेकिन समस्या ये है कि ऐसा अधिकतर मामलों में नहीं होता.
ऐसा ही एक मामला जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का भी था. आर्टिकल 370 हटने के बाद से ही उन्हें हिरासत में रखा गया था.
उनकी बेटी ने सुप्रीम कोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका भी डाली लेकिन लंबे वक्त तक उस पर सुनवाई नहीं हुई.
आख़िरकार, जब एक साल बाद सरकार ने ही उन्हें रिहा कर दिया तो सुप्रीम कोर्ट ने याचिका ये कहते हुए ख़ारिज कर दी कि इसे सुनने की ज़रूरत नहीं क्योंकि अब वे हिरासत में नहीं हैं.(bbc.com)
प्रभाकर मणि तिवारी
क्या चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर यानी पीके अगले साल होने वाले अहम विधानसभा चुनावों से पहले पश्चिम बंगाल में सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस का आशियाना बिखरने से रोक सकेंगे?
हाल के घटनाक्रम से अब राजनीतिक हलकों के साथ ख़ुद तृणमूल कांग्रेस के भीतर यही सवाल उठ रहे हैं.
बिहार के चुनावी परिदृश्य से हैरतअंगेज़ तरीक़े से नदारद रहने वाले पीके ने बीते साल लोकसभा चुनावों में बीजेपी से मिले करारे झटकों के बाद तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति की कमान संभाली थी.
लेकिन पार्टी की जीत की हैट्रिक का जिम्मा संभालने वाले पीके ख़ुद तृणमूल के वरिष्ठ नेताओं के आंखों की किरकिरी और असंतोष की वजह बनते जा रहे हैं. कई विधायकों ने हाल में उनके ख़िलाफ़ सार्वजनिक तौर पर टिप्पणी की है.
पूर्व मेदिनीपुर के ताक़तवर नेता और राज्य के परिवहन मंत्री शुभेंदु अधिकारी लंबे समय से बग़ावत की राह पर चल रहे हैं. लेकिन पीके अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद अब तक उनको मनाने में नाकाम रहे हैं.
वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री पद के बीजेपी उम्मीदवार नरेंद्र मोदी और उसके अगले साल बिहार में महागठबंधन के चुनाव अभियान को कामयाबी से संचालित कर पीके सुर्खियों में आए थे.
उसके बाद तो उनके लिए विभिन्न राजनीतिक दलों में होड़ मच गई थी. उस दौर में पीके का नाम ही जीत की गारंटी बन गया था.
लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बढ़ते मतभेदों और सीएए के मुद्दे पर प्रतिकूल टिप्पणी की वजह से उनको इस साल जनवरी में जद(यू) से निकाल दिया गया था.
वर्ष 2015 में पीके बिहार विधानसभा चुनावों में छाए हुए थे. लेकिन इस बार चुनावी परिदृश्य में कहीं नज़र ही नहीं आए.
अब नीतीश के शपथग्रहण के बाद अपने एक ट्वीट में पीके ने कहा है, "भाजपा मनोनीत मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने के लिए नीतीश कुमार को बधाई. मुख्यमंत्री के रूप में एक थके और राजनीतिक रूप से महत्वहीन हुए नेता के साथ बिहार को कुछ और सालों के लिए प्रभावहीन शासन के लिए तैयार रहना चाहिए."
यह चार महीनों में उनका पहला ट्वीट था.
भाजपा मनोनीत मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने पर @NitishKumar जी को बधाई।
— Prashant Kishor (@PrashantKishor) November 16, 2020
With a tired and politically belittled leader as CM, #Bihar should brace for few more years of lacklustre governance.
पीके से बढ़ती नाराज़गी
बीते साल लोकसभा चुनावों में बीजेपी से मिले ज़बरदस्त झटके के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और सांसद अभिषेक बनर्जी पीके को तृणमूल के खेमे में ले आए थे.
प्रशांत किशोर की फर्म आई-पैक के हज़ारों कार्यकर्ता अगले विधानसभा चुनावों में तृणमूल की जीत की रणनीति पर काम कर रहे हैं.
लेकिन हाल में उनकी सलाह पर ममता ने जो फ़ैसले किए हैं वह पार्टी के कई नेताओं को काफ़ी नागवार गुज़रे हैं. ख़ासकर संगठनात्मक फेरबदल से कई पुराने नेता काफ़ी नाराज़ चल रहे हैं.
परिवहन मंत्री शुभेंदु अधिकारी की नाराज़गी के पीछे भी पीके एक प्रमुख वजह हैं. यही वजह है कि घर जाकर अधिकारी से मुलाक़ात के बावजूद पीके उनको मनाने में नाकाम रहे हैं.
इससे शुभेंदु के बीजेपी में शामिल होने या नई पार्टी बनाने के कयास लगातार तेज़ हो रहे हैं. शुभेंदु हाल में कैबिनेट की बैठक में भी नहीं पहुंचे.
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परिवहन मंत्री शुभेंदु अधिकारी
पूर्व मेदिनीपुर के तहत वह नंदीग्राम ही है जहां जमीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने ममता की पार्टी के सत्ता में पहुंचने की राह तैयार की थी. शुभेंदु, तृणमूल कांग्रेस से इतर अपने स्तर पर लगातार रैलियां और सभाएं आयोजित कर रहे हैं.
हाल में तृणमूल कांग्रेस के कई विधायकों और नेताओं ने पीके के मुद्दे पर सार्वजनिक तौर पर नाराज़गी जताई है. इन नेताओं का आरोप है कि पुराने चेहरों को दरकिनार कर नए लोगों को जगह दी जा रही है, उनमें से कइयों ने पिछले चुनाव में बीजेपी समर्थन किया था.
मुर्शिदाबाद जिले के हरिहरपाड़ा के तृणमूल कांग्रेस विधायक नियामत शेख़ ने तो रविवार को एक रैली में पीके पर सीधा हमला किया.
नियामत का कहना था, "पार्टी में तमाम परेशानियों की वजह प्रशांत किशोर हैं. शुभेंदु अधिकारी ने मुर्शिदाबाद में पार्टी को मज़बूत किया और अब उनसे बात करने वाले नेताओं पर कार्रवाई की जा रही है."
उनका सवाल है कि क्या हमें अब प्रशांत किशोर से राजनीति सीखनी होगी? वह कहते हैं कि पश्चिम बंगाल में अगले चुनावों में अगर तृणमूल कांग्रेस को झटका लगता है तो इसके लिए सिर्फ पीके ही ज़िम्मेदार होंगे.
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विधायक नियामत शेख़
यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि बीते महीने मुर्शिदाबाद ज़िला मुख्यालय बरहमपुर टाउन में मूल तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं के नाम से लगे पोस्टरों में पीके की टीम पर जबरन उगाही के आरोप लगाए गए थे.
हालांकि पार्टी के मुर्शिदाबाद जिला अध्यक्ष और सांसद अबू ताहिर खान टीम पीके के ख़िलाफ़ उगाही के आरोपों को निराधार बताते हुए दावा करते हैं कि कुछ विपक्षी नेताओं ने उक्त पोस्टर लगाए थे.
कूचबिहार के विधायक मिहिर गोस्वामी भी सार्वजनिक तौर पर अपनी नाराज़गी का इज़हार कर चुके हैं.
गोस्वामी ने सोशल मीडिया पर अपने एक पोस्ट में सवाल उठाया है कि क्या तृणमूल कांग्रेस सचमुच ममता बनर्जी की पार्टी है. वो कहते हैं कि ऐसा लग रहा है कि इस पार्टी को किसी ठेकेदार के हाथ में सौंप दिया गया है.
मिहिर कहते हैं, "अब पार्टी पर ममता बनर्जी का कोई नियंत्रण नहीं है. तृणमूल कांग्रेस बदल गई है. आप या तो जी-हुज़ूरी करिये या फिर पार्टी छोड़ दीजिए."
गोस्वामी ने फिलहाल सक्रिय राजनीति से अलग रहने का ऐलान किया है.
इसी ज़िले में सिताई के विधायक जगदीश वर्मा बसुनिया कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस को अगर अगले चुनावों में जीतना है तो सबको अपना अहं छोड़ना होगा. पुराने नेताओं को पार्टी से निकालने की साज़िश चल रही है."
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विधायक मिहिर गोस्वामी
नाराज़गी की वजह
लेकिन अचानक पीके के ख़िलाफ़ पार्टी के नेताओं में बढ़ती नाराज़गी की वजह क्या है?
दरअसल, पीके की सलाह पर ममता बनर्जी ने बीती जुलाई में सांगठनिक फेरबदल शुरू किया था. इसमें राज्य समिति के अलावा जिला और ब्लॉक समितियों में भी बड़े पैमाने पर फेरबदल किए गए. इससे नेताओं में नाराज़गी बढ़ गई.
तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "टीम पीके ने तमाम जिलों के दौरे के बाद जो रिपोर्ट तैयार की थी उसी के आधार पर सांगठनिक बदलाव किए गए हैं. पीके की टीम ने असंतुष्ट नेताओं की भी एक सूची बनाई थी. इस फेरबदल का मकसद साफ-सुथरी छवि वाले नेताओं को सामने की कतार में लाना था."
प्रशांत किशोर से तो संपर्क नहीं हो सका. लेकिन टीम पीके के एक सदस्य नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "हम पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी और वरिष्ठ नेताओं की सलाह के आधार पर ही रणनीति तय कर रहे हैं. हमारा काम सुझाव देना है. उसे लागू करने या नहीं करने का फ़ैसला तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व पर है. इसलिए पार्टी में नाराज़गी के मुद्दे पर हमारे लिए कोई टिप्पणी करना संभव नहीं है."

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विधायक जगदीश वर्मा बसुनिया
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस में प्रशांत किशोर के बढ़ते क़द और प्रभाव की वजह से कई पुराने नेता उपेक्षित महसूस कर रहे हैं.
बाग़ी तेवर अपनाने वाले परिवहन मंत्री शुभेंदु अधिकारी भी कई बार सांगठनिक मामलों में टीम पीके के हस्तक्षेप पर नाराज़गी जता चुके हैं.
टीम पीके की ओर से अधिकारी के गृह जिले पूर्व मेदिनीपुर जिले में आयोजित कई कार्यक्रमों में परिवहन मंत्री की ग़ैर-मौजूदगी ने प्रशांत किशोर से उनकी बढ़ती नाराज़गी के बारे में लगने वाले कयासों को मज़बूत किया है.
राजनीतिक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस सीपीएम की तरह काडर-आधारित पार्टी नहीं है. पीके की टीम पार्टी ब्लॉक स्तर से प्रदेश स्तर तक में अनुशासन और पेशेवर रवैया कायम करने की दिशा में काम कर रही है. इससे कुछ नेताओं का असंतुष्ट होना स्वाभाविक है. लेकिन शीर्ष नेतृत्व का भरपूर समर्थन होने की वजह से इस नाराज़गी का पीके के कामकाज पर कोई ख़ास असर पड़ने की आशंका नहीं है."
लेकिन लंबे अरसे से बंगाल की राजनीति पर निगाह रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार श्यामलेंदु मित्र कहते हैं, "पीके की राह इस बार काफ़ी मुश्किल है. तृणमूल कांग्रेस के नेता और विधायक ममता बनर्जी को अपना नेता मानते हैं. लेकिन पीके की ओर से सांगठनिक मामलों में हस्तक्षेप से नाराज़गी बढ़ रही है. इससे लगता है कि पीके को यहां वैसी कामयाबी नहीं मिलेगी जिसके लिए वे मशहूर हैं." (bbc.com)
-Raju Sajwan
28 फरवरी 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के शहर बरेली में किसान रैली को संबोधित करते हुए कहा कि उनका सपना है कि जब देश साल 2022 में आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा हो तो किसानों की आमदनी दोगुनी हो जाए।
इसके बाद कुछ विशेषज्ञों ने इसे अव्यवहारिक बताते हुए कहा था कि पांच साल में किसानों की आमदनी दोगुनी करने के लिए 14.86 फीसदी सालाना कृषि विकास दर की जरूरत पड़ेगी। लेकिन बाद में यह स्पष्ट किया गया कि सरकार किसानों की आमदनी का आधार वर्ष 2015-16 मानेगी और कृषि वर्ष 2022-23 में यह लक्ष्य हासिल किया जाएगा। जिसका मतलब था कि सरकार सात साल में किसानों की आमदनी दोगुनी करेगी। नीति आयोग के सदस्य रमेश कुमार द्वारा मार्च 2017 में जारी पॉलिसी पेपर में आकलन किया गया कि सालाना विकास दर 14.86 फीसदी नहीं बल्कि 10.4 प्रतिशत की जरूरत पड़ेगी।
इस आधार पर देखा जाए तो अब दो साल 4 माह का समय बचा है। अब तक किसान की आमदनी कितनी बढ़ी है। इस बारे में सरकार के पास कोई जानकारी नहीं है।
15 सितंबर 2020 को लोकसभा में मारगनी भरत और रणजीत रेड्डी द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तौमर ने जानकारी दी कि किसानों की आय का आकलन राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के द्वारा किया जाता है। इस संगठन ने पिछला अनुमान कृषि वर्ष 2012-13 तैयार किया था। नए अनुमान अभी उपलब्ध नहीं हुए हैं। हालांकि किसानों के कल्याण के लिए कार्यान्वित किए जा रहे विभिन्न गतिविधियां व योजनाओं के प्रभाव से यह संकेत मिलता है कि किसानों की आय दोगुनी करने संबंधी कार्यनीति सही दिशा में चल रही है। तौमर ने स्पष्ट तौर पर कहा कि ऐसी कोई भी आय मूल्यांकन रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है, जिससे किसानों की आय दोगुनी करने संबंधी लक्ष्य पर कोरोना वायरस से पड़ने वाले प्रभाव का मूल्यांकन किया जा सके।
इसका मतलब है कि सरकार आय दोगुनी करने की बात तो कर रही है, लेकिन साल दर साल इस तरह का कोई आकलन नहीं किया जा रहा है, जिससे पता चल सके कि सरकार अपने लक्ष्य से कितनी दूर है। हालांकि कृषि मंत्री ने यह भी बताया कि एनएसओ वर्ष 2019-20 के लिए परिवारों का भूमि स्वामित्व और पशुधन का सर्वेक्षण व कृषि भू स्वामियों की स्थिति का मूल्यांकन कर रहा है। यानी कि एनएसओ की इस रिपोर्ट में ही पता चल पाएगा कि चार साल के दौरान किसानों की आमदनी में कितनी वृद्धि हुई।
सरकार का कहना है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कई स्तर पर काम चल रहा है। सरकार ने सभी संबंधित विभागों को इस काम में जुटने के निर्देश दिए थे। इसके मद्देनजर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने किसानों की आय दोगुना करने के लिए राज्य विशिष्ट कार्यनीति दस्तावेज तैयार किया और राज्य सरकारों को भेज दिया। लेकिन इस कार्यनीति को सही मायने में लागू करने के लिए आईसीएआर ने हर जिले में मॉडल के तौर पर दो गांवों के किसानों की आमदन दोगुनी करने का बीड़ा उठाया और हर जिले में कृषि विज्ञान केंद्र को यह जिम्मेवारी सौंपी गई कि वे दो गांव को गोद ले लें। तीन मार्च 2020 को संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत कृषि पर बनी स्थायी समिति की रिपोर्ट में बताया गया कि तीस राज्यों व केंद्र शासित क्षेत्रों के 651 कृषि विज्ञान केंद्रों ने 1,416 गांवों को गोद ले लिया है। इन गांवों को "डबलिंग फार्मर्स इनकम विलेज " नाम दिया गया है।
इसके अलावा आईसीएआर से सबंद्ध अलग-अलग संस्थान भी कुछ मॉडल पर काम कर रहा है। जैसे कि इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ शुगर रिसर्च, लखनऊ ने पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल अपनाते हुए उत्तर प्रदेश के आठ गांव को गोद लिया है और यहां की 2028 किसान परिवारों की आमदनी दोगुनी करने का बीड़ा उठाया है।
डाउन टू अर्थ ने पांच राज्यों के कुछ गांवों की तफ्तीश की कि आखिर यह योजना किस स्तर पर चल रही है और किसानों की आमदनी कैसे बढ़ रही है। अगली कड़ियों में आप राज्यवार जानेंगे कि क्या 2022 तक इन गांवों के किसानों की आमदनी दोगुनी हो जाएगी, क्या ये गांव दूसरे गांवों के मिसाल बनेंगे। कल पढ़िए, डाउन टू अर्थ की तफ्तीश की पहली कड़ी- (downroearth)
- Lalit Maurya
रटगर्स यूनिवर्सिटी द्वारा किए नए शोध से पता चला है कि जिन शिशुओं को शुरुआती 2 वर्षों में एंटीबायोटिक्स दिया जाता है, उनमें कई अन्य बीमारियों जैसे अस्थमा, सांस संबंधी एलर्जी, सीलिएक, एक्जिमा, मोटापा और एकाग्रता में कमी जैसे रोगों का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही उनके इम्यून सिस्टम पर भी इसका बुरा असर पड़ता है।
मायो क्लीनिक और रटगर्स यूनिवर्सिटी द्वारा किया यह शोध जर्नल मायो क्लिनिक प्रोसीडिंग्स में छपा है। इस शोध में 2003 से 2011 के बीच जन्मे 14,572 बच्चों का अध्ययन किया है। जिनमें से करीब 70 फीसदी को जन्म के दो वर्षों के भीतर कम से कम एक एंटीबायोटिक दिया गया था। उनमें से ज्यादातर बच्चे मुख्य रूप से सांस या कान सम्बन्धी संक्रमण से ग्रस्त थे।
शोध के अनुसार हमारे शरीर में मौजूद माइक्रोबायोम की संरचना इस तरह होती है जो बचपन में इम्युनिटी, मेटाबोलिज्म और मानसिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। गौरतलब है कि माइक्रोबायोम हमारे शरीर में मौजूद वो खरबों सूक्ष्मजीव होते हैं जो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से लाभदायक होते हैं।
इस शोध से जुड़े शोधकर्ता और रटगर्स के सेंटर फॉर एडवांटेड बायोटेक्नोलॉजी एंड मेडिसिन के निदेशक मार्टिन ब्लेसर ने बताया कि एंटीबायोटिक्स का ज्यादा उपयोग न चाहते हुए भी शरीर में एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स बैक्टीरिया के विकास का कारण बन जाता है। बचपन में बीमारियों के ग्रस्त होने पर जब एंटीबायोटिक्स का प्रयोग किया जाता है तो वो बच्चों के इम्यून सिस्टम और मानसिक विकास पर असर डालता है। एंटीबायोटिक्स का प्रयोग शरीर में मौजूद माइक्रोबायोम पर असर डालता है, जो आगे चलकर कई अन्य समस्याओं का कारण बन जाता है।
जरुरी है एंटीबायोटिक्स के ज्यादा और अनावश्यक उपयोग से बचना
हालांकि इससे पहले भी कई शोधों में एंटीबायोटिक दवाओं और किसी रोग के बीच सम्बन्ध को देखा गया है। पर यह पहला मौका है जब किसी शोध में एंटीबायोटिक्स और कई बीमारियों के बीच के सम्बन्ध को देखा गया है। शोध के अनुसार एंटीबायोटिक्स मेटाबोलिज्म से जुड़ी बीमारियों (मोटापा, वजन का बढ़ना), इम्यून से जुड़ी बीमारियों (अस्थमा, फूड एलर्जी, हे फीवर और मानसिक विकार (जैसे एडीएचडी और ऑटिज्म) के खतरे को बढ़ा सकते हैं, हालांकि अलग-अलग एंटीबायोटिक का भिन्न-भिन्न प्रभाव पड़ता है। सेफालोस्पोरिन नामक एंटीबायोटिक कई बीमारियों के जोखिम को बढ़ा देता है, खासतौर पर इसके चलते फूड ऐलर्जी और ऑटिज्म का खतरा काफी बढ़ जाता है।
साथ ही शोधकर्ताओं के अनुसार बच्चों को जितनी कम उम्र में एंटीबायोटिक्स दवाएं दी जाती हैं उनमें उतना ही ज्यादा खतरा बढ़ता जाता है। विशेष रूप से जब जन्म के शुरुवाती 6 महीनों में बच्चों को एंटीबायोटिक्स किया जाता है, तो वो ज्यादा खतरनाक होता है। ऐसे में शोधकर्ताओं का मानना है कि डॉक्टर्स को एंटीबायोटिक्स के ज्यादा और अनावश्यक प्रयोग से बचना चाहिए, जब तक जरुरी न हो इनका प्रयोग बच्चों पर नहीं किया जाना चाहिए। (downtoearth)
- Dayanidhi
कोरोना जैसी कई बीमारियां जानवरों से लोगों में फैली है, जिसके कई गंभीर परिणाम सामने आए हैं। एक अंतरराष्ट्रीय शोध दल का कहना है कि पशुओं में पाए जाने वाले इन वायरसों को फैलने से रोकने के लिए जब तक तत्काल कार्रवाई नहीं की जाए, तब तक और अधिक महामारियों के फैलने के आसार हैं। शोधकर्ताओं ने चेतावनी देते हुए कहा कि भविष्य में होने वाली महामारियों से बचाव करना और भी कठिन हो सकता है। इसलिए अभी से पर्याप्त कदम उठाने आवश्यक है, इसमें सरकारों से वन्यजीवों के व्यापार, लोगों से वन्यजीवों के आवासों की सुरक्षा, वन्यजीवों और घरेलू पशुओं के बीच संपर्क को कम करने जैसे प्रभावी कानूनों को लागू करना शामिल है।
रोग फैलाने वाले (पैथोजन) से होने वाली संक्रामक बीमारी किसी एक जीवाणु, वायरस या परजीवी से होती है, जो जानवरों से लोगों में फैलता है इसे "ज़ूनोसिस" के रूप में जाना जाता है। वन्यजीव या पशुओं से उत्पन्न रोगों ने पिछले तीस वर्षों में अधिकतर लोगों के स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान पहुंचाया है। ऐसी बीमारियों में इबोला, एड्स और सार्स शामिल हैं। कोविड-19 इन जूनोटिक रोगों में से एक है और वर्तमान में फैली एक ऐसी महामारी है जिसके कारण दुनिया भर में करोड़ों मौतें हुई हैं।
इस तरह के प्रकोप के फैलने के दो मुख्य कारण है जिसमें वन्यजीव व्यापार और प्राकृतिक आवास का तोड़ा जाना शामिल है, दोनों ही मनुष्यों और वन्यजीवों के बीच सीधे संपर्क को बढ़ाते हैं। इसके अलावा बढ़ती मानव आबादी, उनकी बढ़ती मांगों को पूरा करने के लिए प्राकृतिक आवासों में रहने, उनका उपयोग करने की मंजूरी दी जा रही है, जो पशुओं और लोगों में जूनोटिक रोग फैलाने वाले जंगली जानवरों के साथ निकट संपर्क को बढ़ावा दे रहा है। इन दो कारणों के बारे में गहन विचार करने से भविष्य में होने वाली बीमारियों को रोकने में मदद मिल सकती है। यह अध्ययन इकोलॉजी एंड ऐवोलुशन पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
यह स्वीकार करते हुए कि कोविड-19 बाजार में बिक रहे वन्यजीवों से फैला हो सकता है। चीन, वियतनाम और कोरिया की सरकारों ने प्रकोप के बाद से वन्यजीव व्यापार को नियंत्रित करने के लिए नियमों में कुछ बदलाव किए हैं, जिससे वन्यजीवों से फैलने वाली बीमारियों पर रोक लगने के साथ-साथ इनके संरक्षण को भी मदद मिलेगी। वन्यजीव व्यापार के नियमों में दुनिया भर में बदलाव किए जाने की आवश्यकता है।
हालांकि अध्ययनकर्ता वन्यजीव बाजारों पर अचानक पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं है, क्योंकि इससे वंचित, प्रवासी और ग्रामीण आबादी पर असमान रूप से बुरा प्रभाव पड़ेगा जो कि अपने निर्वाह के लिए ऐसे बाजारों पर निर्भर करते हैं। क्या उपाय किए जाए इन पर विस्तार से विचार किया जाना चाहिए, जिसमें स्थानीय समुदायों के साथ काम करने वाली सरकारों का शामिल होना, उचित प्रतिबंधों से पहले निर्वाह के वैकल्पिक साधनों को बनाने और बनाए रखने के लिए-विशेष रूप से जीवित जानवरों और खाने में उपयोग नहीं किए जाने वाले वन्यजीव उत्पादों पर विचार किया जाना चाहिए।
जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ गोटिंगन, वन्यजीव विज्ञान विभाग के डॉ. तृष्णा दत्ता कहती है कि दुनिया भर में कोरोनावायरस महामारी ने रोग प्रबंधन करने में काफी ऊर्जा लगी है, कुछ हद तक देशों ने इस पर काबू भी पाया है। लेकिन भविष्य में होने वाले प्रकोप को रोकने के लिए, यह कैसा रूप लेगा, इसके लिए तैयारी करने की आवश्यकता है। साथ ही प्राकृतिक दुनिया के साथ लोगों के रिश्ते में भी बदलाव लाने की आवश्यकता है। (downtoearth)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के संस्मरण ‘ए प्रोमिज्ड लेंड’ नामक पुस्तक में भारत संस्मरण प्रकाशित हुए हैं। इस पुस्तक के पहले भाग में उन्होंने अपनी 2010 की पहली भारत-यात्रा का वर्णन किया है। उसके दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल से हुई उनकी भेंट का भी विवरण है। उसे लेकर भारत के पक्ष-विपक्ष में काफी नोक-झोंक हो रही है।
यह नोक-झोंक उस वक्त हो रही है, जबकि कांग्रेस पार्टी बिहार, म.प्र., उ.प्र., गुजरात आदि प्रांतों में बुरी तरह से हार गई हैं। राहुल गांधी को पसंद करते हुए भी ओबामा ने उन्हें आत्मविश्वासरहित उथला-सा नौजवान बताया है। इसे लेकर राहुल पर आक्रमण करने की जरूरत क्या है ? यह तो राहुल पर बड़ी तात्कालिक, नरम और तटस्थ टिप्पणी है।
भारत के लोग यह कई बार बता चुके हैं कि वे राहुल के बारे में क्या सोचते हैं लेकिन कांग्रेसी लोग सार्वजनिक तौर पर या तो चुप रहते हैं या फिर राहुल के कसीदे काढ़ते हैं। यह उनकी मजबूरी है। ओबामा की इस टिप्पणी को लेकर उनकी आलोचना करना भी ठीक नहीं है, क्योंकि उन्हें जो ठीक लगा, सो उन्होंने लिख दिया। यदि वे कांग्रेस-विरोधी और मोदीभक्त होते तो क्या उसी प्रसंग में वे डॉ. मनमोहनसिंह और सोनिया गांधी की इतनी ज्यादा तारीफ करते ?
उनकी टिप्पणियों से यह अंदाज जरूर लगता है कि ओबामा खुले दिल के आदमी हैं। 1999 में वे जब शिकागो से सीनेटर थे, उनसे मेरी मुलाकात अचानक हो गई। मैं एक भारतीय मूल के मित्र से मिलने गया तो उन्होंने उनके पास बैठे एक अश्वेत व्यक्ति से मिलवाया था और वह सज्जन मेरे साथ 5-10 मिनिट बैठे रहे। कई वर्ष बाद 2008 में मुझे मेरे मित्र ने बताया कि वे बराक ओबामा ही थे, जो हिलैरी के खिलाफ राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे हैं।
बराक ओबामा की सज्जनता के कई किस्से अमेरिका में मशहूर हैं। यह पूछा जा रहा है कि उन्होंने नरेंद्र मोदी के बारे में कुछ क्यों नहीं लिखा? हो सकता है कि वे अपनी पुस्तक के दूसरे खंड में लिखें और कुछ ऐसा लिख दें कि उसे लेकर कांग्रेसी लोग भाजपा पर टूट पड़ें। यदि डोनाल्ड ट्रंप आपबीती लिख मारें तो वह दुनिया की सबसे ज्यादा बिकने वाली किताब बन सकती है। ओबामा ने अपनी संस्मरणों में अन्य कई देशों के नेताओं पर भी टिप्पणी की है। इन टिप्पणियों के कारण उनकी किताब कई देशों में बहुत बिकेगी।
ओबामा की तुलना यदि हम अमेरिका के अन्य राष्ट्रपतियों-रिचर्ड निक्सन, रोनाल्ड रेगन, जर्ॉ बुश, जिमी कार्टर आदि से करें और उनके गोपनीय दस्तावेज देखे तो हम दंग रह जाएंगे। उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्रियों के बारे में इतनी फूहड़ और आपत्तिजनक टिप्पणियां की हैं कि उनका उल्लेख करना भी उचित नहीं लगता।
यदि भारत के प्रधानमंत्री लोग भी ओबामा की तरह अपने संस्मरण लिखते तो उन पर जमकर बहस चल सकती थी लेकिन ज्यादातर प्रधानमंत्री अपने पद से हटने के बाद देवगौड़ा या मनमोहनसिंह की तरह ज्यादा जिये नहीं। हमारे कुछ पूर्व राष्ट्रपतियों ने जरूर अपने संस्मरण लिखे हैं, जो कि पठनीय हैं लेकिन उनमें वह वजन नहीं है, जो किसी प्रधानमंत्री के संस्मरण में होता है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-शंकर शरण
अभी एक साक्षात्कार में वरिष्ठ लेखक-पत्रकार अरुण शौरी ने कहा कि मीडिया का ध्यान एक बड़े परिवर्तन पर नहीं गया है। यह है भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) में आया बदलाव। शौरी का संघ-भाजपा से लंबे समय तक निकट संबंध रहा। उन्हें एक बार आर.एस.एस. ने अपना सर्वोच्च सम्मान भी दिया था। वैसे भी, शौरी तथ्य लेखन के लिए जाने जाते रहे हैं। इसलिए उन की बातें ध्यातव्य हैं।
शौरी ने कहा कि कि पहले भाजपा में आर.एस.एस. के कुछ लोग भेजे जाते थे। तब भाजपा के पास अपने कार्यकर्ता होते थे। लेकिन अब भाजपा के पास अपने कैडर नहीं हैं। वह कोई पार्टी नहीं रह गई है। केवल ऊपर नेताओं का एक फेन या झाग (‘फ्रॉथ’) है, जिसे दिखाकर वोट लिया जाता है। वे चाहे नाटक, तमाशे कर या किसी चतुराई से चुनाव जीतते हैं। बाकी नीचे लोग उन के आसरे रहते हैं। मंत्री जैसे लोग भी, जिन्हें अब कुछ बोलने का अवसर नहीं है।
इस बीच, उन ऊपरी नेताओं के लिए पूरे देश में कैडर का काम आर.एस.एस. के लोग कर रहे हैं। वे आर.एस.एस. के सरसंघचालक के हाथ में नहीं रह गए। शौरी के अनुसार, “मोहन भागवत बड़े भले आदमी हैं। मगर अब उन के हाथ-पैर नहीं हैं। यदि भाजपा सत्ताधारी ने कह दिया कि एक हजार आर.एस.एस. कार्यकर्ता बिहार भेजने हैं, तो वे भेजे जाएंगे। चाहे भागवत जी चाहें या न चाहें।” इस प्रकार, आर.एस.एस. पूरी तरह भाजपा की सेना बन गई है।
यह अनायास नहीं हुआ। शौरी 1980 के दशक का एक प्रसंग सुनाते हैं, जब वे अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस के संपादक थे। एक बार तात्कालीन आर.एस.एस. सरसंघचालक बालासाहब देवरस के छोटे भाई, और प्रमुख संघ नेता भाऊराव जी देवरस ने उन्हें दिल्ली के झंडेवालान मिलने बुलाया। शौरी गए तो देखा कि एक छोटी सी कोठरी में भाऊराव रहते हैं, जिस में एक चारपाई और एक कुर्सी है। एक आदमी उन की सेवा के लिए है। बातचीत से शौरी चकित हुए कि भाऊराव जी की दृष्टि कितनी पैनी थी, उन्हें शौरी के लेखन के नुक्तों की गहरी समझ थी। वापस आकर उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका को बताया कि उतना प्रखर और बड़ा व्यक्ति कैसा साधु सा रहता है! किन्तु गोयनका पर कुछ असर नहीं हुआ। वे बोले, कि ‘अरे, उन लोगों को अभी तक कुछ मिला ही नहीं, इसलिए साधु बने फिर रहे हैं! एक बार सत्ता-सुन्दरी मिलने दो, फिर देखना उन की साधुता या भोग-विलास।”
शौरी के अनुसार, आर.एस.एस. के आम नेता गोयनका के इस टेस्ट में फेल हुए हैं। भाजपा सत्ताधारियों ने आर.एस.एस. के मँझोले, निचले नेताओं को अपना आदमी बना लिया है। इस से इन की पूछ बढ़ गई है। जिन्हें कोई पहचानता तक न था, उन्हें लेने के लिए गाड़ी आती है, बढ़िया गेस्ट-हाउस रहता है, एयरपोर्ट पर लोगों को किनारे हटा कर उन के लिए रास्ता खाली कराया जाता है। बेचारों को यह महत्व कब मिला था! लिहाजा वे भाजपा चुनाव-मशीनरी के पुर्जों में बदल गए हैं। ऊपर के चार-पाँच आर.एस.एस. नेता संस्कृति, हिन्दुत्व, आदि पर भाषण देते रहते हैं। जबकि उन के राज्य और जिले स्तर के लोग अब सीधे भाजपा सत्ताधारियों के कब्जे में हैं, और खुश हैं। संघ के ऊपरी नेता यह पसंद करें या नहीं, अब बेबस हैं।
भाजपा-आर.एस.एस में आया यह परिवर्तन विचारणीय है। यह केवल शौरी का अवलोकन नहीं। कुछ पुराने संघ-भाजपा नेता भी मानते हैं कि बहुत कुछ बदल गया है। पुराने, प्रतिष्ठित आर.एस.एस. कार्यकर्ताओं की स्थिति चुपचाप सब स्वीकारने या किनारे पड़े रहने की है। भाजपा मशीनरी शहर के किसी भी व्यक्ति को कार्यकारी बना कर चुनावी काम करवाती है। वह व्यक्ति आर.एस.एस. से बाहर का व्यापारी, चालबाज, कारकुन, आदि कोई भी हो सकता है। मुख्य.काम है – चुनाव जीतना। ताकि आगे फिर चुनाव जीता जा सके। यह अपने आप में संपूर्ण गतिविधि हो गई है। सत्ता ने भाजपा को खोखला कर दिया है। उस में अब कोई नया विचार, समाधान, आदि देने की क्षमता नहीं है। भाजपा मानो एक रोजगार-एजेंसी भर है, जिस में किसी तरह ऊपर का ध्यान आकृष्ट कर, ठकुरसुहाती करके कोई पद, सुविधा, आदि पाई जाती है।
यह दयनीय दृश्य है। बड़े-बड़े पदों पर लोग काम के लिए नहीं, बल्कि ऊपर की कृपा बनाए रखने के लिए हैं। ऐसे में हमारी राष्ट्रीय स्थिति शोचनीय हो सकती है। क्योंकि ऐसे लोगों में कोई रीढ़ या विवेक होने की संभावना संयोग भर है। यद्यपि वे गंभीर जिम्मेदार पदों पर हैं। इस पर हम जैसों की आलोचना का कोई महत्व नहीं। किन्तु चीन जैसी ताकतें पूरे हालात को गौर से देख रही होंगी, कि ऐसे कार्यकारी लोग उन का दबाव बर्दाश्त नहीं कर सकता। कोई संकट झेल नहीं सकता। क्योंकि कार्यकारी बड़े औसत किस्म के हैं, जिन की स्थितियाँ योग्यता और सामर्थ्य से नहीं बनी है। वे तो केवल ऊपर का मुँह जोहते हैं। जो अपने नेता से साफ-साफ कुछ बोलने तक का साहस नहीं रखते।
यदि शौरी की बातों में आधा भी सही हो, तो चिन्ता का विषय है। चुनाव जीतना कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है। असल चीज है कि देश का क्या हो रहा है? ब्राजील और तुर्की जैसे समृद्ध देशों के उदाहरण से शौरी कहते हैं कि वहाँ नेता चुनाव जीतते गए हैं, पर अपने देश को कहाँ पहुँचा दिया! तुर्की पूरे मुस्लिम विश्व में इस्लाम की जकड़ से निकल कर विकसित होने का उदाहरण बन सकता था। यही कमाल पाशा की महान विरासत थी। उसे एरदोगान ने तहस-नहस कर दिया। भारत में भी भाजपा के चुनाव जीतते जाने के हजार कारण बताए जा सकते हैं। जिस में विपक्ष की दुर्गति और राष्ट्रीय संस्थाओं का पतन भी कारण हो सकते हैं। यदि संस्थाएं बिगाड़ी जाती रहें, जो इंदिरा गाँधी के समय से शुरू होकर लगातार चल रहा है, तो लोग किस के पास जाएंगे? कानून सत्ताधारियों को लाभ पहुँचाने के लिए बनाए जाते हैं। जैसे, हाल के चुनावी बाँड कानून के कारण बड़े उद्योगपति सत्ताधारी दल को ही चंदा देंगे, जिस का हिसाब भी दल को नहीं देना है। इस का मुकाबला विपक्षी दल कैसे कर सकते हैं? फिर उन में स्वार्थ, आपसी ईर्ष्या, आदि से वे थोड़े समय के लिए भी एकताबद्ध नहीं हो पाते। अतः भाजपा का चुनाव जीतना अपने-आप में कोई अनोखी बात नहीं।
कई लोग अरुण शौरी की आलोचना को ‘अंगूर खट्टे हैं’ जैसा लेते हैं। किन्तु उन आलोचनाओं को स्वतंत्र रूप से परखा जा सकता है, इसलिए परखा जाना चाहिए। क्योंकि वही बात कोई दूसरा अवलोकनकर्ता, कोई तटस्थ लेखक कहे, तो क्या उत्तर दिया जाएगा? सदैव आलोचक का चरित्र-हनन करना कोई उत्तर नहीं है। यह तो उलटे आलोचना के सही होने का संकेत हो जाता है। चूँकि देश और समाज किसी पार्टी या संगठन से बहुत ऊँचा है। उस के भवितव्य को किसी पूर्वाग्रह से उपेक्षित करना अनुचित है। फिर, देश-सेवा के दावे को किसी कसौटी से क्यों बचना चाहिए?
स्वयं शौरी को अपने बारे में अधिक मुगालता नहीं है। वे कहते हैं, “हम जैसे लिखने-पढ़ने, टीका-टिप्पणी करने वाले तो कीट-पतंग हैं, जिन की तकलीफ बेमानी है। किन्तु हमारे द्वारा दिखाए तथ्यों की उपेक्षा करने वाले ही कष्ट भोगेंगे। साथ ही, देश की और आम लोगों की हानि होगी । चिन्ता उसी की करनी चाहिए।” निस्संदेह। विचारशील लोगों को सारी बात पर शान्ति से अवश्य सोचना चाहिए। (nayaindia.com)


