विचार/लेख
-प्रकाश दुबे
इंग्लैंड के प्रधानमंत्री बोरिस जानसन चाहते हैं कि वेस्ट मिनिस्टर यानी ब्रिटेन के संसद भवन में आधे आसनों पर महिलाएं विराजमान हों। ईसाई धर्म के कैथोलिक पंथ पर रूढिवादी सोच का दबदबा है। अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में कैथोलिक पादरी घूम घूम कर रिपब्लिकन पार्टी का प्रचार करते हैं। मतदान के लिए रात रात भर कतार में लगे रहते हैं। चर्च ने गर्भपात को अनैतिक घोषित कर रखा है। रिपब्लिकन पार्टी गर्भपात कानून का विरोध करती है।
भारत के कुछ साधु-संतों की सक्रिय सहभागिता से हल्का सा अंतर है। पादरी चुनाव राजनीति से दूरी बनाकर रखते हैं। इंग्लैंड में प्रोटेस्टेंट पंथ के अनुयायी अधिक हैं। नर नारी समता का विरोध नहीं करते। गिरजाघर और ईसाई धर्म संस्थाओं के बड़े पद पर महिलाओं की नियुक्ति के पक्ष में अभियान जोर पकड़ रहा है। यह बात और है कि गत वर्ष चुनाव में बोरिस की कंजरवेटिव पार्टी ने मात्र 30 प्रतिशत महिलाओं को उम्मीदवारी दी जबकि लेबर पार्टी ने 53 प्रतिशत महिलाओं को मैदान में उतारा।
इंग्लैंड की संसद दुनिया की संसदों की लकड़दादी है।102 वर्ष पूर्व महिलाओं को संसद चुनाव लडऩे का अधिकार मिला। पहला विरोधाभास-लोकतंत्र में सत्ता की कमान सदियों से राजपरिवार के पास है। कई दशकों से महारानी राज करती है। राजा नहीं। यूरोप विरोधाभासों का महाद्वीप है। कोरोना से बचाव में मास्क लगाने के समर्थन में महिलाओं ने जुलूस निकाला। जुलूस के चित्र और वीडियो करोड़ों लोगों ने बार बार देखे। इतने प्रभावित? कारण जानिए। महिलाओं के मुंह पर पट्?टी या नकाब था। बाकी देह अनावृत्त। जिम्मेदारी भरे ओहदों के लिए महिलाओं की पात्रता को स्वीकृति मिल रही है। अमेरिका में महिला उपराष्ट्रपति निर्वाचित हुई। इंग्लैंड की गृहमंत्री महिला है। दोनों भारतीय मूल की हैं।
चीन, रूस और भारत की तरह डोनाल्ड ट्रम्प भी अमेरिका के एकमात्र लोकप्रिय नेता बनकर उभरना चाहते थे। मतदाताओं ने उनकी दाल नहीं गलने दी। महिलाओं को खास अदा में महत्व देने में ट्रम्प की बराबरी सिर्फ ब्लादिमिर पुतिन कर सकते हैं। सहयोगी सुंदरी के साथ यात्रा के कारण कोरोना संक्रमण ट्रम्प के गले पड़ा। पुतिन ने जिमनास्ट अलीना को गले लगाकर राष्ट्रीय संवाद ग्रुप का नियंत्रण सौंपा। साढ़े 78 करोड़ रूबल सालाना (करीब सवा 6 करोड़ रुपए मासिक) की व्यवस्था कर दी। अलीना को रूस की गुप्त प्रथम महिला कहा जाता है। पहली मर्तबा राष्ट्रपति चुनाव लड़ते समय पुतिन की सहेली का नाम स्वेतलाना था। स्वेतलाना आज एक बेटी की मां तथा सात अरब रुपए की स्वामिनी हैं। स्वेतलाना की बेटी ने जन्म प्रमाणपत्र में पिता के नाम का कालम खाली छोड़ा। वह गोत्र या जातिनाम व्लादिमिरोव्ना लिखती है। 25 नवम्बर को पुतिन के प्रवक्ता पेस्कोव ने पूछताछ की बौछार का सामना करते हुए सफाई दी-एलिजावेता व्लादिमिरोव्ना नाम की लडक़ी को मैं नहीं जानता। पत्रकार पीछे पडऩे के आदी होते हैं। इसीलिए नेताओं से पिटते और प्रताडि़त होते हैं। पत्रकार ने पलट कर कहा-पेस्कोव से नहीं पूछा कि वह जानता है या नहीं। पुतिन उसे जानते हैं या नहीं? हम यह जानना चाहते हैं। पंगा लेने वाले जान लें कि राजनीति में आने से पहले पुतिन लगभग वही जिम्मा संभालते थे जो भारत में अजीत डोभाल के सिपुर्द है। विकसित या विकासशील देशों में महिलाओं को बराबरी पर लाने के नाम पर होने वाले गोरखधंधों के कई किस्से हैं।
भारत में केन्द्रीय वित्त मंत्री महिला है। झारखंड, उत्तराखंड, तेलंगाना के राजभवन महिलाओं के सिपुर्द हैं। पुद्दुचेरी में किरण बेदी बेंत फटकार रही हैं। मानव संसाधन मंत्री महिला थी। न तो ईरानी-तूरानी होने के कारण पद से हटना पड़ा, न शिक्षा-दीक्षा का बखेड़ा कारण बना। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या अन्य किसी की आपत्ति के कारण हटाने की बात गले नहीं उतरती। केन्द्रीय वित्तमंत्री के कामकाज पर अंगुली उठाने वाले विचार करें। कुछ अपवाद छोडक़र बाकी केन्द्रीय मंत्रियों ने कौन से किले फतह कर लिए? प्रतिपक्ष की काबिलियत का प्रधानमंत्री समय समय पर बखान करते रहते हैं। मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के कामकाज का कच्चा-चिट्?ठा उनकी नजऱ से छुपा नहीं है। पश्चिम बंगाल छोडक़र किसी अन्य राज्य में महिला मुख्यमंत्री नहीं है। पत्थर टांकने वाले समुदाय की बेटी को बिहार में उपमुख्यमंत्री बनाया गया। प्रशासन और शोध संस्थाओं में अनुपात कम है। सत्ता के बूते महिला मित्रों को उपकृत करना महत्वपूर्ण नहीं है। भारत में महिलाओं की बराबरी के किस्सों के अनुपात में बलात्कार और प्रताडऩा की कहानियों की भरमार है। राष्ट्रीय दल बार बार चुनाव घोषणा पत्र में महिलाओं को निर्वाचित सदनों में एक तिहाई आरक्षण देने का वादा दोहराते हैं। चुनाव के दौरान मीठी मीठी बातें कर दिलासा देते हैं। दो तिहाई बहुमत जुटाने में किसी प्रकार की कठिनाई न होने के बावजूद वचन पूरा नहीं कर सके। चुनाव में महिलाओं को एक तिहाई उम्मीदवारी नहीं मिलती। वादाखिलाफी का कलंक उनके माथे पर चिपका है। सात समुंदर पार से आकर भारत को डेढ़ सदी तक गुलाम बनाने वाले फिरंगी नर नारी समता को लागू करने के निर्णय तक पहुंच चुके हैं। राजनीतिक दलों का एक तिहाई आरक्षण का वचन समता नहीं है। इस वादे को चुनाव घोषणा पत्र में टांके रखना बेतुका लगता है। बेहतर है, इसे अन्य वादों की तरह भुला दिया जाए।
खफा मुझसे है अहले-दैरो-हरम (काशी-काबे वाले) जो मैंने का था-मुकरता नहीं।
मिरी एक खूबी यही है बहुत, जुबां से जो कहता हूं, करता नहीं।–जाजि़ब आफ़ाक़ी
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पंजाब और हरियाणा के हजारों किसानों को दिल्ली में प्रदर्शन की अनुमति देकर केंद्र सरकार ने अक्ल का काम किया है लेकिन उन्हें दो दिन तक जिस तरह दिल्ली में घुसने से रोका गया है, वह घोर अलोकतांत्रिक कदम था। देश के किसान सबसे अधिक उपेक्षित, प्रताडि़त और गरीब हैं। यदि आप उनकी मांगें नहीं सुनेंगे तो कौन सुनेगा? संसद में बहुमत का डंडा घुमाकर आप जो भी कानून बना दें, उस पर यदि उससे प्रभावित होने वाले असली लोग अपनी राय प्रकट करना चाहते हैं तो उसे ध्यान से सुना जाना चाहिए और उसका हल भी निकाला जाना चाहिए। प्रदर्शनकारियों में कुछ कांग्रेसी और खालिस्तानी हो सकते हैं और उनमें से कुछ ने यदि नरेंद्र मोदी के खिलाफ बहुत घटिया किस्म की बात कही है तो वह भी निंदनीय है।
क्या ही अच्छा हो कि सरकार अब खेती के बारे में एक चौथा कानून भी पारित कर दे और जिन 23 उपजों पर समर्थन मूल्य वह घोषित करती है, उसे वह कानूनी रुप दे दे। उसे केरल सरकार से सीखना चाहिए, जिसने 16 सब्जियों के न्यूनतम मूल्य घोषित कर दिए हैं। किसानों को घाटा होने पर वह 32 करोड़ रु. की सहायता करेगी और उन्हें उनकी लागत से 20 प्रतिशत ज्यादा मुनाफा देगी। भारत के किसानों का सिर्फ 6 प्रतिशत अनाज मंडियों के जरिए बिकता है और 94 प्रतिशत उपज खुले बाजार में बिकती है। पंजाब और हरयाणा की 90-95 प्रतिशत उपज समर्थन मूल्य पर मंडियों के जरिए बिकती है। किसानों को डर है कि खुले बाजार में उनकी उपज औने-पौने दाम पर लुट जाएगी। उनके दिल से यह डर निकालना बेहद जरुरी है।
अमेरिका में किसान खुले बाजार में अपना माल जरुर बेचते हैं लेकिन वहां हर किसान को 62 हजार डालर की सहायता प्रति वर्ष मिलती है ? वहां मुश्किल से 2 प्रतिशत लोग खेती करते हैं जबकि भारत में खेती से 50 प्रतिशत लोग जुड़े हुए हैं। हमारे यहां किसान यदि नाराज हो गया तो कोई सरकार टिकी नहीं रह सकती।खेती की उपज के लिए बड़े बाजार खोलने का फैसला अपने आप में अच्छा है। उससे बीज, खाद, सिंचाई, बुवाई और उपज की गुणवत्ता और मात्रा भी बढ़ेगी। भारत दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक देश भी बन सकता है लेकिन खेती के मूलाधार किसान को नाराज करके आप यह लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते। कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर यदि पहल करें और आगे होकर किसान नेताओं से मिलें तो इस किसान आंदोलन का सुखांत हो सकता है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-कृष्ण कांत
मीडिया इस पर बहस नहीं करता कि सरकार किसान विरोधी कानून क्यों लाई? मीडिया इस पर भी बात नहीं करता कि सरकार किसानों के संसाधन छीनकर कृषि बाजार को पूंजीपतियों का गुलाम क्यों बनाना चाहती है? मीडिया प्रोपेगैंडा पर बहस करता है कि किसानों को कोई 'भड़का' रहा है.
क्या मीडिया ने ईमानदारी से ये बताने की कोशिश की कि किसान संगठनों के विरोध के कारण जायज हैं? जनता की तरफ से दूसरी आवाज विपक्ष की हो सकती थी, अगर वह मुर्दा न होता!
नए कानून से कृषि क्षेत्र भी पूंजीपतियों और कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा और इसका सीधा नुकसान किसानों को होगा.
इन तीनों कृषि कानूनों के आने से ये डर बढ़ गया है कि ये कानून किसानों को बंधुआ मजदूरी में धकेल देंगे.
ये विधेयक मंडी सिस्टम खत्म करने वाले, न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म करने वाले और कॉरपोरेट ठेका खेती को बढ़ावा देने वाले हैं, जिससे किसानों को भारी नुकसान होगा.
बाजार समितियां किसी इलाक़े तक सीमित नहीं रहेंगी. दूसरी जगहों के लोग आकर मंडी में अपना माल डाल देंगे और स्थानीय किसान को उनकी निर्धारित रकम नहीं मिल पाएगी. नये विधेयक से मंडी समितियों का निजीकरण होगा.
नया विधेयक ठेके पर खेती की बात कहता है. जो कंपनी या व्यक्ति ठेके पर कृषि उत्पाद लेगा, उसे प्राकृतिक आपदा या कृषि में हुआ नुक़सान से कोई लेना देना नहीं होगा. इसका नुकसान सिर्फ किसान उठाएगा.
अब तक किसानों पर खाद्य सामग्री जमा करके रखने पर कोई पाबंदी नहीं थी. ये पाबंदी सिर्फ़ व्यावसायिक कंपनियों पर ही थी. अब संशोधन के बाद जमाख़ोरी रोकने की कोई व्यवस्था नहीं रह जाएगी, जिससे बड़े पूंजीपतियों को तो फ़ायदा होगा, लेकिन किसानों को इसका नुक़सान झेलना पड़ेगा.
किसानों का मानना है कि ये विधेयक "जमाख़ोरी और कालाबाज़ारी की आजादी" का विधेयक है. विधेयक में यह स्पष्ट नहीं है कि किसानों की उपज की खरीद कैसे सुनिश्चित होगी. किसानों की कर्जमाफी का क्या होगा?
नए कानूनों से जो व्यवस्था बनेगी उसकी दिक्कत ये है कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि मंडियों के समाप्त होने के बाद बड़े व्यवसायी मनमाने दामों पर कृषि उत्पादों की खरीद नहीं करेंगे.
सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य को बाध्यकारी और उसके उल्लंघन को कानूनी अपराध घोषित करना चाहिए था. यही किसानों की मांग है, लेकिन सरकार उनकी बात सुनने की जगह प्रोपेगैंडा फैलाने में लगी है. ये कृषि कानून स्पष्ट तौर पर किसानों के विरोध में और बड़े व्यावसायिक घरानों के पक्ष में हैं.
सरकार के पास पुलिस बल की ताकत है, हो सकता है सरकार लाठी और गोली चलाकर जीत जाए, लेकिन उस बर्बादी का क्या होगा जो इन कानूनों से संभावित है? सबसे पते का सवाल ये है कि आप अपनी जनता की बात सुनने की जगह जनता से ही भिड़ने की हिमाकत क्यों कर रहे हैं?
राज ढाल
एक महेन्द्र सिंह टिकैत थे जो दिल्ली-लखनऊ कूच का ऐलान करते तो सरकारों के प्रतिनिधि उनको मनाने रिझाने सिसौली रवाना होने लगते। लेकिन टिकैत जो चाहते थे करते वही थे। प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक उनके फोन को तरसते थे लेकिन यह उनकी ताकत का असर था जो उनकी सादगी, ईमानदारी और लाखों किसानों में उनके भरोसे के कारण थी। आंदोलनों में चौधरी साहब हमेशा मंच पर नहीं होते थे। वे हुक्का गुडगुडाते हुए किसानों की भीड़ में शामिल रहते थे। बहुत से विदेशी पत्रकारो को उनसे मिल कर समझ नहीं आता था कि वे जिससे मिल रहे हैं वे वही चौधरी साहब हैं। धूल माटी से लिपटा उनका कुर्ता, धोती और सिर पर टोपी के साथ बेलाग वाणी, उनको सबसे अलग बनाए हुई थी। जब पूरा देश उनकी ओर देखता था तो भी वे रूटीन के जरूरी काम उसी तरह करते हुए देखे जाते थे जैसा भारत में आम किसान अपने घरों में करता है। उनमें कभी कोई दंभ नहीं दिखा। आंदोलन सफल हुए हों या विफल हरेक से वे सीख लेते थे। किसी आंदोलन के लिए कभी किसी ने किसी बड़े आदमी से चंदा मांगते नहीं देखा। किसान अपना आंदोलन भी अपने दम खम पर करते थे और खुद नहीं बाकी लोगों को खिलाने के लिए भी साथ सामग्री ले जाते थे।
विशाल आंदोलनों को नियंत्रित करना आसान काम नहीं होता है। लेकिन टिकैत इस मामलें में बहुत सफल रहे। बड़ा से बड़ा और सरकार को हिला देने वाला आंदोलन क्यों न रहा हो, वह अनुशासनहीन नहीं रहा। मेरठ या दिल्ली में लाखों किसानों के जमावड़े के बाद भी न कहीं मारपीट न किसी दुकान वालों से लूटपाट या कोई अवांछित घटना नहीं हुई। आंदोलनों में भीड़ को नियंत्रित करना सरल नहीं होता। लेकिन चौधरी साहब ने आंदोलनों को अलग तरीके से चलाया। गांव से महिलाएं खाने पीने की सामग्री, हलवा, पूड़ी, छाछ, गुड़ इतनी मात्रा में भेजती थीं कि किसान ही नहीं पुलिस, पत्रकार और आम गरीब लोग सब खा पी लेते थे, कम नहीं पड़ता था। हर आंदोलन में टिकैत पूर्व सैनिकों को भी जोड़ लेते थे।
हर आंदोलन में चौधरी टिकैत ने किसानों के वाजिब दाम को केंद्र मे रखा। जीवन भर वे किसानों की लूट के खिलाफ सरकारों को आगाह करते रहे। उनका यह कहना एक हद तक सही है कि अगर 1967 को आधार साल मान कर कृषि उपज और बाकी सामानों की कीमतों का औसत निकाल कर फसलों का दाम तय हो तो एक हद तक किसानों की समस्या हल हो सकती है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
संविधान-दिवस पर यह मांग फिर उठी है कि देश में सारे चुनाव एक साथ करवाएं जाएं। 1952 से 1967 तक यही होता रहा। विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ होते रहे। इनमें प्रायः सर्वत्र कांग्रेस ही सरकार बनाती रही लेकिन 1967 से हालात बदलने लगे। कई राज्यों में सरकारें गिरती-उठती-बदलती रहीं। अब ढर्रा ऐसा बिगड़ा कि पांच साल क्या, हर साल और उससे भी ज्यादा लगभग हर महिने देश में कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं। पंचायतों, नगरपालिकाओं और नगर-निगमों के चुनावों में भी लाखों-करोड़ों रु. खर्च होते हैं और विभिन्न पार्टियों के बड़े-बड़े नेता भी उनमें सक्रिय हो जाते हैं। इसका नतीजा क्या होता है ? पहला, देश और प्रदेश का शासन चलाने से हमारे नेताओं का ध्यान हटता है। वे अपनी शक्ति और समय चुनावों में खर्च करते रहते हैं। दूसरा, चुनावी खर्च बहुत बढ़ जाता है।
2019 के अकेले संसदीय चुनाव में 55 हजार करोड़ रु. के खर्च का अनुमान है। अलग-अलग चुनावों का खर्च सब मिलाकर इससे कई गुना हो जाता है। तीसरा, चुनाव के लिए पैसा जुटाने के लिए भ्रष्टाचार का झरना बह निकलता है। कई चुनावों के लिए इस झरने का बटन कई बार दबाना पड़ता है। चौथा, चुनावी दंगल में कई नैतिक-अनैतिक, जातीय और मजहबी पैंतरे सभी दल मारते हैं। इन पैंतरों की धारावाहिकता कभी रुकती नहीं, क्योंकि आए दिन कोई न कोई चुनाव होता रहता है। इसीलिए पिछले कई वर्षों से यह मांग उठ रही है कि देश की समस्त विधायी संस्थाओं के चुनाव एक साथ करवाए जाएं। मैं भी इस मांग का कई वर्षों से समर्थन कर रहा हूं। इधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मांग को बार-बार उठा रहे हैं लेकिन जो इस मांग के विरुद्ध हैं, उनके भी कुछ ठोस तर्क हैं। उनका पहला तर्क है कि मोदी का जोर इस मांग पर इसलिए है कि आजकल पूरे देश में राष्ट्रीय स्तर का कोई विपक्षी नेता है नहीं, जो मोदी को टक्कर दे सके। इसीलिए एक साथ चुनाव हुए तो केंद्र में तो भाजपा सरकार बनाएगी ही, सभी राज्यों में भी वह छा जाएगी। लेकिन मेरा कहना है कि इसका उल्टा भी तो हो सकता है ! 1977 में इंदिरा गांधी की कांग्रेस का क्या हुआ था ? दूसरा, यदि सभी निकायों के चुनाव एक साथ होंगे तो स्थानीय और प्रांतीय महत्व के मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों के साथ गुम हो जाएंगे।
यह संभव है लेकिन ऐसा असाधारण स्थितियों युद्ध, महामारी, अकाल या सर्वोच्च नेता की हत्या आदि में ही होता है। ऐसा कई बार हुआ है कि राष्ट्रीय और प्रांतीय चुनाव एक साथ होने पर भी नतीजे अलग-अलग आए हैं। तीसरा, दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र के लगभग 90 करोड़ मतदाता यदि एक साथ लोकसभा, विधानसभा, नगरपालिका और पंचायत के लिए वोट डालेंगे तो क्या उनका दिमाग हिचकोले नहीं खा जाएगा और उनकी गिनती कैसे होगी ? भारत का नागरिक काफी जागरुक है और अब तकनीक इतनी विकसित हो गई है कि मत-गणना कठिन नहीं होगी। चौथा, यदि विधानसभाएं और लोकसभा बीच में ही और अलग-अलग समय में भंग हो गईं तो उनके चुनाव एक साथ कैसे होंगे ? पांच साल की निश्चित अवधि के पहले उन्हें भंग न करने का संवैधानिक संशोधन करना होगा और वैकल्पिक सरकार बने बिना चलती सरकार का हटना संभव नहीं होगा। यह विषय ऐसा है, जिस पर देश में जमकर बहस चलनी चाहिए।
Vivek Mishra-
क्वींस यूनिवर्सिटी बेलफास्ट के स्कूल ऑफ बॉयोलाजिकल साइंस से जुड़े शोधार्थियों की नई थ्योरी यह बता रही है कि जैसे जीत और हार के मौकों पर मनुष्यों के भीतर सकारात्मक या नकारत्मक भाव पैदा होते हैं लगभग वैसी ही भावनाएं पशुओं के जरिए भी संसाधनों के इस्तेमाल की प्रतियोगिता के दौरान अनुभव की जाती हैं। इतना ही नहीं यह भीतरी अनुभव उनके बाहरी और भविष्य के व्यवहार को भी बदल सकता है।
शोध के सार और निष्कर्ष को प्रोसीडिंग ऑफ द रॉयल सोसाइटी बी जर्नल में प्रकाशित किया गया है।
दरअसल पशुओं के बीच संसाधनों को हासिल करने के लिए होने वाली प्रतियोगिता ही वह शुरुआती बिंदु है जो वैज्ञानिकों को उनके मनोभावों की पड़ताल करने के लिए खींच कर ले गई है।
विकास, प्रजनन और टिके रहने के कोशिश में संसाधनों के इस्तेमाल के लिए दो जीवों के बीच आपसी बातचीत ही पशु प्रतियोगिता है, और इस प्रतियोगता में भावनाएं भी हैं। यह तथ्य है कि संसाधन सीमित होने के कारण प्रतिस्पर्धाएं होती है। साथ ही कुछ ऐसे संसाधन भी हैं, जिनका सभी के लिए एकसमान पहुंच और आपूर्ति भी संभव नहीं है।
अब तक वैज्ञानिक इस बात पर जोर दे रहे थे कि पशु कैसे संसाधनों का और अपने विरोधी की लड़ाई संबंधी क्षमताओं का मूल्यांकन करते हैं लेकिन नया शोध इस बात का तर्क देता है कि पशुओं के मूल्यांकन की यही समझ उन्हें भावनाओं के चरण पर ले जाती है। और आगे यही भावनाएं उनके व्यवहार को भी चलाते हैं।
पशु प्रतियोगिता को एक केस स्टडी के तौर पर शोधार्थियों ने लिया, उन्होंने सुझाया कि जैसे एक अवसाद या गुस्से से ग्रस्त व्यक्ति भविष्य को लेकर निराशावादी हो जाता है, उसी तरह से वह जीव जो लड़ाई हार जाते हैं और भी नकारात्मक भाव वाली दशा में पहुंच जाते हैं। वे जहां जीत सकते हैं वहां भी निराशावादी हो जाते हैं, यही वजह है कि भविष्य की लड़ाइयों में भी उनकी इच्छाएं बिल्कुल कम हो जाती हैं।
बॉयोलाजिकल साइंसेज स्कूल से जुड़े और इस नए पेपर के प्रमुख शोधार्थी एंड्रु क्रंप ने कहा कि मानवीय भावनाएं बगैर संबंध वाली संज्ञान और व्यवहार से प्रभावित होती हैं। मिसाल के तौर पर लोग अपने समूचे जीवन में संतुष्टि के भाव को वर्षा वाले दिनों के बजाए धूप वाले दिनों में अधिक आंकते हैं।
हमने पाया कि पशुओं के भाव भी ऐसे ही गैर संबंध वाले संज्ञान और व्यवहार से प्रभावित होते हैं। मिसाल के तौर पर यदि कोई पशु प्रतियोगिता में जीत का अनुभव करते हैं तो वे अधिक सकारात्मक भाव वाले होते हैं और पर्यावरण में ऐसे बहुत कम प्रीडेटर्स की उम्मीद करते हैं। ठीक इसी तरह प्रतियोगिता में हारने का अनुभव करने वाले पशुओं के भीतर नकारात्मकता का भाव होता है और भविष्य में वे दोबारा किसी लड़ाई से कतराते हैं। वहीं, इन प्रभावों के कारण उनमें अधम व्यवहार भी पनप सकता है। जीवन और मौत से जुड़ी ऐसी घटनाएं जो खराब भावनाओं के लिए जिम्मेदार होती हैं वे आभासी तौर पर निर्णयों को प्रभावित कर सकती हैं।
वहीं, शोधकर्ताओं में डॉ गारेथ एरनॉट कहते हैं कि आम तौर पर पशुओं के व्यवहार का शोध करने वाले आमतौर पर काम में पशुओं के भावनाओं का ख्याल नहीं करते हैं। हालांकि, इस शोध का निष्कर्ष बताता है कि इससे पशुओं के भावनाओं की भूमिका को स्वीकार करने की जरूरत को बताता है जो कि उनके व्यवहार को समझने मे काफी मददगार हो सकता है। इसकी वजह से पशुओं के कल्याण की योजनाओं पर भी बेहतर काम हो सकता है। उनके नकारात्मक भावनाओं को सकारत्मक भावनाओं में बदलने के लिए उन्हें ढ़ेर सारे मौके दिए जा सकते हैं। (downtoearth)
निधि राय
भारतीय रिज़र्व बैंक की ओर से गठित एक आंतरिक कार्य समूह की हालिया रिपोर्ट चर्चा का विषय बनी हुई है.
इस आंतरिक कार्य समूह (आईडब्ल्यूजी) का गठन देश के निजी क्षेत्र के बैंकों के लिए मौजूदा स्वामित्व दिशा-निर्देशों और कॉरपोरेट संरचना की समीक्षा करने के लिए किया गया था.
इस कार्य समूह की सिफारिशें इसलिए चर्चा का कारण बनी हुई हैं क्योंकि इसमें सुझाव दिया गया है कि बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 में आवश्यक संशोधन के बाद बड़े कॉरपोरेट/ औद्योगिक घरानों को बैंकों के प्रवर्तकों के रूप में अनुमति दी जा सकती है.
इसका मतलब ये है कि अडानी, अंबानी, टाटा, पिरामल और बजाज जैसे बड़े कॉरपोरेट घराने बैंक के लिए लाइसेंस ले सकते हैं और अगर वो उपयुक्त पाए जाते हैं तो वो बैंक भी खोल सकते हैं.
इस बात पर बहस नहीं की जा सकती कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली अत्यधिक कमज़ोर है.
आंतरिक कार्य समूह की रिपोर्ट कहती है, ''1947 में भारत की आज़ादी के समय व्यावसायिक बैंक (इनमें से कई बैंक कारोबारी घरानों के नियंत्रण में थे) सामाजिक उद्देश्यों को पूरा करने में पिछड़ गए थे. इसलिए, भारत सरकार ने 1969 में 14 और 1980 में छह बड़े व्यावसायिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था.''
''हालांकि, नब्बे के दशक के प्रारंभ में आर्थिक सुधारों की शुरुआत के साथ, निजी बैंकों की भूमिका को तेज़ी से स्वीकारा गया है.''
रिपोर्ट में इस तथ्य पर भी विचार किया गया है कि ''भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में काफ़ी वृद्धि हुई है लेकिन भारत में बैंकों की कुल बैलेंस शीट अब भी जीडीपी के 70 फ़ीसद से कम है, जो कि वैश्विक स्तर पर मौजूद समकक्षों के मुक़ाबले बहुत कम है, वो भी एक बैंक-प्रभुत्व वाली वित्तीय प्रणाली के लिए.'
देश की ज़रूरत और बैंक
इसका मतलब ये है कि भारतीय बैंक एक विकासशील अर्थव्यवस्था की वित्त की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
वर्तमान में स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया भारत का एकमात्र ऐसा बैंक है जो दुनिया के शीर्ष 100 बैंकों का हिस्सा है. रिपोर्ट बताती है कि निजी क्षेत्र के बैंक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को पीछे छोड़ रहे हैं क्योंकि वो अधिक कुशल, लाभदायक और जोखिम लेने वाले हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक़, ''सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक निजी बैंकों के हाथों लगातार बाज़ार में हिस्सेदारी खो रहे हैं, ये प्रक्रिया पिछले पाँच सालों में तेज़ हुई है.''
इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर भारत पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना चाहता है, तो उसे अपने बैंकिंग क्षेत्र को बढ़ाना होगा और आईडब्ल्यूजी के सुझाव ज़्यादातर इसी से जुड़े हुए हैं.
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आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य
समस्या कहां है?
लेकिन, आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने इससे आने वाली समस्या को उठाया है. रघुराम राजन ने अपने लिंक्डइन अकाउंट पर इसे लेकर पोस्ट शेयर किया है.
इस तीन पेज के पोस्ट में उन्होंने कहा है कि कॉरपोरेट घरानों को बैंकिंग क्षेत्र में आने की अनुमति देना विस्फोटक है.
उन्होंने इन सिफ़ारिशों के समय को लेकर भी सवाल उठाया है.
राजन और आचार्य ने एक संयुक्त पोस्ट में कहा है, ''क्या हमें ऐसा कुछ पता चला है जो हमें औद्योगिक घरानों को बैंकिंग में अनुमति देने से पहले की सभी सावधानियों की अवहेलना करने की अनुमति देता है? हम बहस नहीं करेंगे. असल में, इसके उलट, आज ये और भी महत्वपूर्ण है कि बैंकिंग में कॉरपोरेट भागीदारी को लेकर आज़माई गईं और परखी हुईं सीमाओं को बनाए रखा जाए.''
राजन और आचार्य का कहना है कि अगर ऐसा करने की अनुमति दी जाती है तो आर्थिक ताक़त कुछ ही कॉरपोरेट्स के हाथों में सिमट कर रह जाएगी.
इन कॉरपोरेट्स को ख़ुद भी वित्तपोषण की ज़रूरत होती है और ऐसे में वो अपने ही बैंकों से जब चाहे आसानी से पैसा निकाल लेंगे. उनसे सवाल करना बहुत मुश्किल होगा. ये ऋण की बुरी स्थिति की ओर ले जाएगा.
राजन और आचार्य ने लिखा है, ''ऐसे जुड़े हुए ऋणों का इतिहास बेहद विनाशकारी रहा है. जब क़र्ज़दार ही बैंक का मालिक होगा, तो ऐसे में बैंक ठीक से ऋण कैसे दे पाएंगे? दुनियाभर की सूचनाएं पाने वाले एक स्वतंत्र और प्रतिबद्ध नियामक के लिए भी ख़राब क़र्ज़ वितरण पर रोक लगाने के लिए हर जगह नज़र रखना मुश्किल होता है. ऋण प्रदर्शन को लेकर जानकारी शायद ही कभी समय पर आती है या सटीक होती है. यस बैंक अपने कमज़ोर ऋण जोखिमों को काफ़ी समय तक छुपाने में कामयाब रहा था.''
उन्होंने यह भी कहा कि नियामक इन संस्थाओं के कारण भारी राजनीतिक दबाव में भी आ सकता है.
और भी ख़तरे
राजन और आचार्य का कहना था, ''इसके अलावा, अत्यधिक ऋणग्रस्त और राजनीति से जुड़े व्यावसायिक घरानों के पास लाइसेंस के लिए ज़्यादा ज़ोर लगाने की क्षमता होगी. इससे हमारी राजनीति में पैसे की ताक़त का महत्व और अधिक बढ़ जाएगा.''
दोनों ने इस बात पर सहमति जताई है कि भारत को और बैंकों की ज़रूरत है क्योंकि जीडीपी के लिए जमा धन बहुत कम है यानी देश में अपने देयताएं चुकाने की कितनी क्षमता है.
उन्होंने इस पर ज़ोर दिया है कि आरबीआई ने पहले "औद्योगिक घरानों को पेमेंट बैंकों के साथ आने की अनुमति दी है. ये बैंक रिटेल क़र्ज़ (जैसे पर्सनल लोन, क्रेडिक कार्ड और गिरवी रखना) देने के लिए अन्य बैंकों के साथ गठजोड़ कर सकते हैं."
उन्होंने कहा है कि जब हमारे पास पहले से ये विकल्प हैं तो हमें औद्योगिक घरानों को पूरा बैंक खोलने का लाइसेंस देने की क्या ज़रूरत है. अभी क्यों, वो भी उस समय पर जब हम आईएलएफएस और यस बैंक की विफलता से सबक़ सीखने की कोशिश कर रहे हैं?
इस सिफ़ारिश के समय और इरादों के अलावा दोनों ने ये सुझाव दिया है कि ख़राब प्रदर्शन करने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को कॉरपोरेट्स के हवाले कर दिया जाना बेहद मूखर्तापूर्ण होगा.
इन सार्वजनिक बैंकों को कॉरपोरेट्स को देने का मतलब है कि हम इन मौजूदा बैंकों के ख़राब प्रशासन को कॉरपोरेट्स के विवादित स्वामित्व के हवाले कर देंगे.
अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने भी इन सिफ़ारिशों को लेकर चिंता ज़ाहिर की है. एजेंसी ने कहा है, ''कॉरपोरेट्स को बैंक खोलने की इजाज़त देने में हितों में टकराव, आर्थिक ताक़त का केंद्रीयकरण और वित्तीय स्थिरता से जुड़ी आंतरिक कार्य समूह की चिंताएं संभावित जोखिम हैं.''
इस बात में कोई शक नहीं है कि भारत को वृद्धि करने के लिए वित्त की आवश्यकता है और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं.
सरकार कोरोना वायारस महामारी के कारण पहले बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है. ऐसे में वित्तीय क्षमता रखने वाले बड़े औद्योगिक घराने देश में पैसे की कमी को पूरा कर सकते हैं. लेकिन, इन कॉरपोरेट्स को पूरी तरह बैंकों का मालिक बनने देना कितना सुरक्षित है, इस सवाल का जवाब आरबीआई को देना बाक़ी है.
आरबीआई ने समिति की रिपोर्ट पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए आमंत्रित किया है जिसे 15 जनवरी, 2021 तक प्रस्तुत किया जा सकता है. (bbc.com)
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने पाया है कि सभी एशियाई देशों में भारत में सबसे ज्यादा रिश्वत ली और दी जाती है. आखिर पिछले 12 महीनों में भारत में भ्रष्टाचार बढ़ा है या घटा?
डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय का लिखा-
सबसे ऊंची रिश्वत की दर
इसी साल जुलाई से सितंबर के बीच एशिया के 17 देशों में 20,000 लोगों के बीच यह सर्वेक्षण किया गया। भारत में 39 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें सरकारी सुविधाओं का इस्तेमाल करने के लिए रिश्वत देनी पड़ी। ये एशिया में सबसे ऊंची रिश्वत की दर है। नेपाल में यह दर 12 प्रतिशत, बांग्लादेश में 24, चीन में 28 और जापान में दो प्रतिशत पाई गई।
सबसे ज्यादा रिश्वत पुलिस को
सर्वेक्षण के लिए लोगों से छह सरकारी सुविधाओं से संबंधित उनके तजुर्बे के बारे में पूछा गया - पुलिस, अदालत, सरकारी अस्पताल, पहचान पत्र लेने की प्रक्रिया और बिजली, पानी जैसी सेवाएं। सबसे ज्यादा (42 प्रतिशत) लोगों ने माना कि उन्हें पुलिस को रिश्वत देनी पड़ी। पहचान पत्र और अन्य सरकारी कागजात लेने के लिए 41 प्रतिशत लोगों को रिश्वत देनी पड़ी।
निजी संपर्कों का इस्तेमाल
पुलिस, अदालतें और कागजात हासिल करने जैसे कामों में निजी ताल्लुकात का इस्तेमाल करने की बात भी भारत में बड़ी संख्या (46 प्रतिशत) में लोगों ने मानी। यह दिखाता है कि प्रक्रियाएं ठीक से काम नहीं कर रही हैं जिसकी वजह से जान पहचान का सहारा लेना पड़ता है। चीन में यह दर 32 प्रतिशत है और जापान में चार प्रतिशत।
चुनावी भ्रष्टाचार
एशिया में बड़ी मात्रा में रिश्वत ले कर वोट देने की बात भी लोगों ने मानी है। 18 प्रतिशत की दर के साथ भारत इसमें चौथे नंबर पर है। सबसे ऊपर हैं थाईलैंड और फिलीपींस, 28 प्रतिशत दर के साथ। 26 प्रतिशत की दर के साथ इंडोनेशिया तीसरे नंबर पर है।
सेवा के बदले सेक्स
पहली बार सर्वेक्षण में सरकारी अधिकारियों द्वारा सेवा के बदले सेक्स मांगने को भी शामिल किया है। भारत में इसकी दर 11 प्रतिशत है। 18 प्रतिशत की दर के साथ इंडोनेशिया सबसे ऊपर है। श्रीलंका में यह दर 17 प्रतिशत है पाई गई और थाईलैंड में 15 प्रतिशत।
बढ़ा है भ्रष्टाचार
भारत में 47 प्रतिशत लोगों को लगता है कि पिछले 12 महीनों में भ्रष्टाचार बढ़ा है। नेपाल में ऐसा 58 प्रतिशत लोगों को लगता है, जबकि चीन में 64 प्रतिशत लोगों को लगता है कि उनके देश में भ्रष्टाचार कम हुआ है।
सरकार की छवि
भारत में भ्रष्टाचार बढऩे के बावजूद 63 प्रतिशत लोगों को लगता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में भारत का प्रदर्शन अच्छा है। म्यांमार में यह दर 93 प्रतिशत है और बांग्लादेश में 87।
सरकार में विश्वास
भ्रष्टाचार की वजह से सरकार की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ता है। भारत में 51 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें सरकार पर या तो कम विश्वास है या बिल्कुल विश्वास नहीं है। जापान में ऐसा 56 प्रतिशत लोगों ने कहा।
बोलने से डर
भारत में 63 प्रतिशत लोगों को लगता है कि अगर उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ मुंह खोला तो उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। बांग्लादेश में भी 63 प्रतिशत लोग ऐसा ही महसूस करते हैं।
गिरीश मालवीय
गाँधी कहते थे किसान भारत की आत्मा है आज देखिए उसी आत्मा को दिल्ली बॉर्डर पर छलनी किया जा रहा है, उन्हें रोकने की हर कोशिश की जा रही है!
बैरिकेडिंग की जा रही है, कंटीले तारों का पहरा बनाया जा रहा है। सडक़ों पर रेत बिछाई जा रही है ताकि ट्रैक्टर आगे न बढ़ पाए, इस कडक़ड़ाती ठंड में किसानों पर पानी की बौछारें मारी जा रही है, लाठीचार्ज किया जा रहा है। बस कैसे भी किसान दिल्ली न पहुंचने पाए, कृषि कानूनों के विरोध में उत्तरप्रदेश, हरियाणा और पंजाब के किसान ‘दिल्ली चलो’ रैली निकाल रहे हैं।
आप बताइये की अगर दिल्ली किसान पुहंच गया तो ऐसा क्या हो जाएगा! क्या देश के किसान को इतना भी अधिकार नहीं है कि वह दिल्ली में अपनी बात न कह सके? क्या देश के लोकतंत्र में शांतिपूर्ण धरना-प्रर्दशन भी वह नहीं कर सकता? क्या इतना सा लोकतांत्रिक अधिकार भी आप उससे छीन लेना चाहते हैं ?
पानीपत बॉर्डर पर रुके किसान पूछ रहे हैं कि क्या हम आतंकवादी हैं? हमें देश की राजधानी के अंदर जाने से कैसे रोका जा सकता है?
आप पूछेंगे कि आखिरकार किसान को दिल्ली क्यों आना चाहता है ? किसान को दिल्ली इसलिए आना पड़ रहा है क्योंकि मनमाने कानून लागू किए जा रहे हैं, उसकी बात कोई सुन नहीं रहा बल्कि वह जहाँ आंदोलन कर रहा है वहाँ की केंद्र सरकार ने सप्लाई लाईन काट दी है। वहां खाद की किल्लत होने लगी है। उद्योगों में सामान का स्टॉक बढऩे लगा है। बिजली की हालत तो यह है कि 24 घंटे जहाँ बिजली मिलती थी वहां अब 8 घंटे रोज की कटौती हो रही है। कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के लगातार विरोध के चलते केंद्र सरकार ने पंजाब में रेल सेवा पूरी तरह से रोक दी है।
ऐसा भी नही हैं कि इस मामले का शांतिपूर्वक समाधान निकालने की कोशिश नहीं की गई। जब से तीन किसान अध्यादेश संसद ने पास किए तबसे किसान इसका विरोध कर रहे हैं। पहले अनुयय विनय की नीति अपनाई गई। केंद्र सरकार अपनी हठधर्मिता पर अड़ी रही तो किसानों ने आंदोलन का सहारा लिया। दशहरे पर मोदी का पुतला जला कर अपना गुस्सा प्रकट किया। महीने भर पहले पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर प्रदेश के सभी विधायकों के साथ दिल्ली में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मिलना चाहते थे, लेकिन मुलाकात के लिए राष्ट्रपति की ओर से समय नहीं दिया गया।
सच यही है कि मोदी सरकार ने इन अध्यादेशों ने व्यापारियों को किसानों के साथ लूट मचाने का एक मार्ग उपलब्ध करा दिया है। किसानों को उन्हीं के खेतों पर मजदूर बना दिया जाएगा। किसान अब बाजार में अकेला खड़ा होगा, उसे सरकार का सहारा नहीं होगा। एक ओर छोटा किसान और दूसरी ओर उसके सामने बड़े-बड़े राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय व्यापारी। यह एक तरह की प्रॉक्सी वार है, जिसमें छल के जरिए सरकार बड़े पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाना चाहती है।
आज अगर यह विरोध-प्रदर्शन सफल नहीं होता है तो इसके दुष्परिणाम पीढिय़ां भोगेगी।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
ट्रांसपेरेन्सी इन्टरनेशनल की ताजा रपट के अनुसार एशिया में सबसे अधिक भ्रष्टाचार यदि कहीं है तो वह भारत में है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को इससे गंदा प्रमाण-पत्र क्या मिल सकता है ? इसका अर्थ क्या हुआ ? क्या यह नहीं कि भारत में लोकतंत्र या लोकशाही नहीं, नेताशाही और नौकरशाही है ? भारत में भ्रष्टाचार की ये दो ही जड़े हैं। पिछले पांच-छह साल में नेताओं के भ्रष्टाचार की खबरें काफी कम आई हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत की राजनीतिक व्यवस्था भ्रष्टाचार मुक्त हो गई है। उसका भ्रष्टाचार मुक्त होना असंभव है।
यदि नेता लोग रिश्वत नहीं खाएंगे, डरा-धमकाकर पैसा वसूल नहीं करेंगे और बड़े सेठों की दलाली नहीं करेंगे तो वे चुनावों में खर्च होनेवाले करोड़ों रु. कहां से लाएंगे ? उनके रोज खर्च होनेवाले हजारों रु. का इंतजाम कैसे होगा ? उनकी और उनके परिवार की ऐशो-इसरत की जिंदगी कैसे निभेगी ? इस अनिवार्यता को अब से ढाई हजार साल पहले आचार्य चाणक्य और यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने अच्छी तरह समझ लिया था। इसीलिए चाणक्य ने अपने अति शुद्ध और सात्विक आचरण का उदाहरण प्रस्तुत किया और प्लेटो ने अपने ग्रंथ ‘रिपब्लिक’ में ‘दार्शनिक राजा’ की कल्पना की, जिसका न तो कोई निजी परिवार होता है और न ही निजी संपत्ति। लेकिन आज की राजनीति का लक्ष्य इसका एक दम उल्टा है।
परिवारवाद और निजी संपत्तियों के लालच ने हिंदुस्तान की राजनीति को बर्बाद करके रख दिया है। उसको ठीक करने के उपायों पर फिर कभी लिखूंगा लेकिन नेताओं का भ्रष्टाचार ही नौकरशाहों को भ्रष्ट होने के लिए प्रोत्साहित करता है। हर नौकरशाह अपने मालिक (नेता) की नस-नस से वाकिफ होता है। उसे उसके हर भ्रष्टाचार का पता या अंदाज होता है। इसीलिए नौकरशाह के भ्रष्टाचार पर नेता उंगली नहीं उठा सकता है। भ्रष्टाचार की इस नारकीय वैतरणी के जल का सेवन करने में सरकारी बाबू और पुलिसवाले भी पीछे क्यों रहें ? इसीलिए एक सर्वेक्षण से पता चला था कि भारत के लगभग 90 प्रतिशत लोगों के काम रिश्वत के बिना नहीं होते। इसीलिए अब से 60 साल पहले इंदौर में विनोबाजी के साथ पैदल-यात्रा करते हुए मैंने उनके मुख से सुना था कि आजकल भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार है। हमारे नेताओं और नौकरशाहों को गर्व होना चाहिए कि एशिया में सबसे अधिक शिष्ट (भ्रष्ट) होने की उपाधि भारत को उन्हीं की कृपा से मिली है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
गिरीश मालवीय
अमेरिका की सितंबर तिमाही में आर्थिक विकास दर रिकॉर्ड 33.1% रही है, अमेरिका की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था कही जाती है वहाँ तिमाही-दर-तिमाही आधार पर दर्ज की गई 33.1% की विकास दर 1947 के बाद सबसे तेज तिमाही विकास दर है।
कोरोना से सबसे पहले प्रभावित होने वाले चीन की अर्थव्यवस्था में भी रिकवरी शुरू हो गयी है चीन की आर्थिक विकास दर सितंबर तिमाही में 4.9% रही, अप्रैल-जून में तिमाही में ही चीन की अर्थव्यवस्था ट्रैक पर वापस आ गई थी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन ने इस साल की जुलाई-सितंबर तिमाही में पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 4.9 फीसदी विकास दर्ज किया ताजा विकास दर के साथ अब चीन ग्लोबल रिकवरी की अगुआई कर रहा है।
फ्रांस की इकोनॉमी में भी जबरदस्त सुधार देखने को मिला है। शुक्रवार को राष्ट्रीय स्टेटस्टिक्स ऑफिस इन्सी (Insee) ने बताया कि सितंबर तिमाही में देश की जीडीपी 18.2% बढ़ी है।
यूरोप की यूरो जोन की इकोनॉमी उम्मीद से बेहतर रिकवर हुई है। यूरो जोन की जीडीपी तीसरी तिमाही में 12.7% की ग्रोथ है। यूरो जोन में कुल 19 देश शामिल हैं, जो करेंसी के रूप में यूरो का उपयोग करते हैं इससे पहले कोरोना महामारी के कारण इस क्षेत्र की जीडीपी में भारी गिरावट देखने को मिली थी। यूरोपियन यूनियन (EU) के स्टेटस्टिक्स विभाग द्वारा जारी डेटा के मुताबिक तीसरी तिमाही में जीडीपी की शानदार रिकवरी हुई है जिनमे इटली, फ्रांस और स्पेन की सबसे अहम भूमिका रही।
यानी दुनिया के सभी बड़े देशो की अर्थव्यवस्था विकास के रास्ते पर लौट आयी है सिवाए भारत की अर्थव्यवस्था के यहाँ इस वित्तवर्ष की दूसरी तिमाही के रिजल्ट अभी आए नही है लेकिन यह तय है कि यह माइनस 8 के आसपास रहेगी .....इस तिमाही में बेहतरी की उम्मीद को भी लॉक डाउन की संभावना ने बर्बाद कर दिया है
अशोक पांडेय
दिएगो माराडोना ने अपने टखने और बांह पर बीसवीं सदी के दो सबसे बड़े लातीन अमेरिकी क्रांतिकारियों फिदेल कास्त्रो और चे गुएवारा के टैटू गुदवा रखे थे। एक बहुत बड़ी सेलेब्रिटी के तौर उसे अधिकार था कि जितनी चाहे उतनी रकम मांग कर अमेरिकी पूंजीवाद का टट्टू बन जाता। अमेरिकी साम्राज्यवाद के झंडाबरदारों ने उसे अपने पाले में लाने के लिए ऐसी अकल्पनीय रकमें देने के प्रस्ताव दिए जिन की हमारे भारतीय सुपरस्टार कल्पना नहीं कर सकते। उसने उन पर थूक दिया। उसने कहा वह अपने लोगों से मोहब्बत करता है।
फुटबॉल को समझने-चाहने वालों में से आधे लोग उसे भगवान मानते हैं। इतनी ही तादाद उसे बर्बाद नशेड़ी बताने वालों की भी है। कुछ भी हो आपने उसे पिछले सौ सालों के सबसे बड़े दो या तीन फुटबॉलरों में गिनना ही होगा। उसके जैसी बेबाक राजनैतिक प्रतिबद्धता और सजगता बहुत कम खिलाडिय़ों में रही।
इस चैम्पियन ने अपने समय के सबसे ताकतवर आदमी यानी अमेरिकी राष्ट्रपति को सार्वजनिक रूप से ‘मानव गू का हिस्सा’ कहा। माराडोना कहता था- ‘जब आपको दुनिया जानने लगती है तो आपको अमरीका या उसके राष्ट्रपति के बारे में कुछ भी कहने की अनुमति नहीं होती। ऐसे और भी बहुत से निषिद्ध विषय होते हैं लेकिन आपको यह सीखना होता है कि किसे कितनी इज़्जत दी जानी चाहिये। आप चाहे कितने ही मशहूर फुटबॉलर या और कोई खिलाड़ी क्यों न हों, आपको एक हत्यारे व्यक्ति के बारे में अपने विचार व्यक्त करने का पूरा अधिकार होता है।’
अगर माराडोना की मौत पर कुछ लिखे-कहे बिना चैन न आ रहा हो तो तेल और फ्लैट बेचने वाले महानायकों वाले हमारे देश के हर खेलप्रेमी नागरिक को सर्बिया के जबदस्त फिल्मकार एमीर कुस्तुरिका की 2008 में बनाई फिल्म ‘माराडोना’ एक बार जरूर देखनी चाहिए।
माराडोना कहता था- ‘अमेरिका की यह बात मुझे जरा भी पसंद नहीं है कि वह दुनिया पर अपनी दादागीरी चलाने के लिए बहुत मेहनत करता है और उसे दुनिया के हर नागरिक की समस्या दूर करने का फितूर है।’
सलाम चैम्पियन! अलविदा चैम्पियन!
(फोटो- कास्त्रो को कास्त्रो का टैटू दिखाते मारादोना)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
उत्तरप्रदेश सरकार ने लव जिहाद के खिलाफ अध्यादेश जारी कर दिया है। उस अध्यादेश में लव जिहाद शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, यह अच्छी बात है, क्योंकि लव और जिहाद, ये दोनों शब्द परस्पर विरोधी हैं। जहां लव होगा, वहां जिहाद हो ही नहीं सकता। लव के आगे सारे जिहाद ठंडे पड़ जाते हैं। लव जिहाद का हिंदी रुप होगा- ‘प्रेमयुद्ध’। जहां प्रेम होगा, वहां युद्ध नहीं हो सकता और जहां युद्ध होगा, वहां प्रेम कैसे होगा ?
लव जिहाद में न लव होता है और न ही जिहाद होता है। उसमें धोखाधड़ी होती है, तिकड़म होती है, दुष्कर्म होता है, बल-प्रयोग होता है और गंदी राजनीति होती है। इसे रोकना तो हर सरकार का कर्तव्य है। इस उद्देश्य से बने हर कानून का स्वागत किया जाना चाहिए। उ.प्र. के मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा है कि धर्म-परिवर्तन याने हिंदू लड़कियों को जबर्दस्ती मुसलमान बनाने के लगभग 100 ऐसे मामले सामने आए हैं। यदि ऐसे मामलों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए यह कानून लाया जा रहा है तो इसका अवश्य स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन छल-छिद्र से धर्म-परिवर्तन करने के खिलाफ तो पहले से ही कठोर कानून बने हुए हैं और कई राज्यों ने इन्हें पूरी दृढ़ता के साथ लागू भी किया है।
उ.प्र. सरकार के इस अध्यादेश में एक नई और अच्छी बात यह है कि सामूहिक धर्म-परिवर्तन करनेवाली संस्थाओं पर प्रतिबंध लगेगा और उसकी सजा भी कठोर है लेकिन सरकार यह कैसे सिद्ध करेगी कि फलां धर्म-परिवर्तन शादी के लिए ही किया गया है ? अगर धर्म-परिवर्तन के लिए शादी का बहाना बनाया गया है तो ऐसी शादी कितने दिन चलेगी ? और शादी के खातिर यदि कोई हिंदू या मुसलमान बनना चाहेगा तो कानून उसे कैसे रोकेगा ? जो हिंदू लडक़ी किसी मुसलमान से शादी करेगी, वह दो माह पहले इसकी सूचना पुलिस को देगी लेकिन किसी हिंदू लडक़े से शादी करनेवाली मुसलमान लडक़ी को भी यह सूचना देनी होगी। सूचना देने भर से शादी कैसे रुकेगी ?
‘हिंदू मेरिज एक्ट’ और ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ के मुताबिक ऐसी शादी अवैध होती है लेकिन ‘स्पेश्यल मेरिज एक्ट’ यह अनुमति देता है कि शादी करनेवाले वर और वधू अपने-अपने धर्म को बदले बिना भी शादी कर सकते हैं। इसीलिए जो भी वर या वधू अपना धर्म बदलेंगे, उन्हें बदलने से कैसे रोका जा सकता है और जो नहीं बदलना चाहेंगे, उन्हें भी शादी करने से कैसे रोका जाएगा? क्या यह कानून ‘घर वापसी’ याने शुद्धि करनेवालों पर भी लागू होगा? यदि होगा तो तबलीगी जमात और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी इसे लागू करना पड़ेगा। जिस प्रदेश में जिस पार्टी की सरकार होगी, वह अपने वोटों के गणित के आधार पर इस कानून का लागू करेगी।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-कबीर संजय
उत्तराखंड से बेहद बुरी खबर आ रही है। उत्तराखंड के लोग अपनी जमीन को देवभूमि भी कहते हैं। आशय यह है कि यह देवताओं की पवित्र भूमि है। लेकिन, इस देवभूमि की सरकार अब हाथियों का आशियाना छीन लेने वाली है। जी हां, उत्तराखंड सरकार 14 एलीफेंट रिजर्व खत्म करने जा रही है। उसके हिसाब से एलीफेंट रिजर्व विकास परियोजनाओं के लिए अड़ंगा साबित हो रहे हैं।
आज के जमाने के लिए विकास एक भयंकर और खौफनाक शब्द होता जा रहा है। विकास परियोजनाओं के नाम पर तमाम जगहों पर पर्यावरण और वन्यजीवन का विनाश ही देखने को मिलता है। आम लोगों को भी इसका लाभ नहीं मिलता। जबकि, कारपोरेट और उनसे कमीशन खाने वाले राजनीतिज्ञ इसकी मलाई चाटते हैं। जाहिर है उनके खयाल में भी कहीं वन्यजीवन, जंगल और पर्यावरण नहीं है। उनके लिए तो यह एक पार्टी चल रही है। जिसमें जितना ज्यादा वे भकोस और ठूंस सकते हैं, उतना भकोस और ठूंस लेना चाहते हैं। भले ही आगे आने वाली पीढिय़ों को उनकी झूठी पत्तलें उठानी पड़ें और गंदगी साफ करनी पड़ें। उन्हें इसकी जरा भी परवाह नहीं है। यह विकास आखिर इतना मानव और प्रकृति द्रोही क्यों है।
कुछ ही दिन पहले उत्तराखंड सरकार ने जौलीग्रांट एयरपोर्ट को विस्तार देने के लिए थानों के जंगलों के एक हिस्से को अधिकार में लेने का प्रस्ताव किया था। इसके लिए हजारों पेड़ों का काटा जाना था और देहरादून, ऋषिकेश और हरिद्वार का प्रबुद्ध समाज और युवा इसके खिलाफ प्रदर्शन भी कर रहे थे। पेड़ों को रक्षासूत्र बांधे जा रहे थे। अब सरकार इससे भी एक कदम आगे बढ़ गई है।
उत्तराखंड के शिवालिक एलीफेंट रिजर्व में चौदह प्रकोष्ठ में हैं। इनमें लगभग दो सौ वर्ग किलोमीटर का हिस्सा एलीफेंट रिजर्व के नाम पर नोटीफाइड हैं। उत्तराखंड के वन मंत्री द्वारा इस पूरे इलाके को डी-नोटीफाई करने की बात कही गई थी। मंगलवार की शाम को स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड की बैठक में इस प्रस्ताव को हरी झंडी भी दे दी गई। यानी हाथियों से उनका आशियाना छीने जाने पर मुहर लग गई। वन मंत्रालय हो या वाइल्ड लाइफ बोर्ड, ऐसा लगता है कि ये जंगल को बढ़ाने और जंगली जीवों के जीवन के संरक्षण के लिए नहीं बल्कि उनकी मौत के परवाने पर दस्तखत करने के लिए ही बने हुए हैं।
आशियाना छिन जाने के बाद हाथियों का क्या होगा। उनके अपने जंगल सुरक्षित नहीं रहेंगे। उनके अपने जंगलों में तमाम योजनाएं बनाई जाएंगी। इंसान उन इलाकों में घुस जाएगा। हाथी और इंसान के बीच टकराव और तनाव बढ़ेगा। जिसका खामियाजा इंसान और हाथी दोनों ही भुगतना पड़ेगा। जाहिर है कि हाथियों को करंट लगाकर मार देने की घटनाओं में भी इजाफा होने वाला है।
सरकारें जंगलों को चूस लेना चाहती हैं, वे वन्यजीवों के रक्त की एक-एक बूंद को मुनाफे में ढाल लेना चाहती हैं। हाथियों के जीवन की परवाह किसे है। उसकी पूजा तो सिर्फ मूर्तियों में की जानी है।
एक दिन ऐसा भी आएगा जब सिर्फ मूर्तियां ही बचेंगी।
-दिव्या आर्य
अमूमन भारत में बलात्कार के मामले इतने भयावह होते हैं कि देश में सुर्खियां बनने के साथ साथ दुनियाभर के मीडिया में उनकी चर्चा होती है.
दिल्ली में 2012 में निर्भया के सामूहिक बलात्कार के बाद क़ानून को सख़्त बनाया गया और इसके बाद पुलिस के पास दर्ज होने वाले मामलों की संख्या भी बढ़ी है.
इसकी एक वजह महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली यौन हिंसा पर बढ़ती बहस बताई जाती है, तो कई जानकार क़ानूनी सुधार की ओर भी इशारा करते हैं.
सरकार मौत की सज़ा जैसे कड़े प्रावधान भी लाई है.लेकिन कुछ विश्लेषकों के मुताबिक ऐसे प्रावधान खोखले और आम लोगों का गुस्सा ठंडा करने के लिए लाए जाते हैं और इनमें समस्या की गहराई और उसको जड़ से निपटाने पर ध्यान नहीं दिया गया है.
बीबीसी 100 वीमन सीरीज़ के तहत बीबीसी ऐसी तीन कहानियाँ बता रहा है, जिनसे ज़ाहिर होता है कि भारत के सख़्त क़ानूनों से बलात्कार की शिकार महिलाओं को मदद नहीं मिल रही है.

"यही ख़्वाहिश है कि हमारे जीवित रहते न्याय मिल जाए"
आज इस गांव की पहचान यही है कि यह वो 'गाँव है जहां लड़कियां फंदे पर लटकती' मिली थीं.
15 और 12 साल की दो चचेरी बहनें इस गांव में आम के पेड़ पर 'फंदे पर लटकती' मिली थीं. उनके परिवार वालों का दावा है कि बलात्कार के बाद उनकी हत्या की गई.
2012 के दिल्ली गैंगरेप के बाद यह बलात्कार का पहला बड़ा मामला बना था. घटना को छह साल से ज़्यादा हो चुके हैं लेकिन कइयों के जहन में यह ताज़ी घटना ही है, मानो कल की बात हो.
उत्तर प्रदेश के बदायूं ज़िले की संकरी सड़कों पर जब हमने लोगों से गांव का रास्ता पूछा तो हर किसी ने गांव को पहचान लिया और हमें वहां तक पहुंचने का सही रास्ता भी बताया.
हालांकि बदायूं में प्रभावित परिवार के लिए लड़ाई इतनी आसान नहीं रही है. मैं इन लोगों से 2014 की गर्मियों में मिली थी. तब कार से आठ घंटे लंबा सफ़र तय करके मैं दिल्ली से यहां सबसे पहले पहुंचने वाले संवाददाताओं में थी.
फाँसी लगाने वाली लड़कियों में एक के पिता ने मुझसे उसी पेड़ के नीचे बात की जिस पेड़ पर उनकी बेटी लटकी हुई मिली थी.
उन्होंने कहा था कि वे बेहद डरे हुए हैं क्योंकि स्थानीय पुलिस ने ताने मारते हुए मदद करने से इनकार कर दिया था. लेकिन उनमें बदला लेने की एक चाहत भी दिखी. उन्होंने कहा, "इन लोगों को आमलोगों की भीड़ में फांसी पर लटकाना चाहिए, जैसा इन लोगों ने हमारी बेटियों के साथ किया."

बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य पीड़िताओं के पिता के साथ
जब कानून कड़े किए गए तो मक़सद था कि महिलाओं और लड़कियों को पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराने में आसानी हो. बलात्कार के मामलों में मौत की सज़ा को भी शामिल किया गया और मामलों की सुनवाई के लिए विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित किए गए.
नए प्रावधानों में एक के मुताबिक किसी भी नाबालिग़ लड़की के साथ बलात्कार के मामले की सुनवाई हर हाल में एक साल के अंदर पूरी होनी चाहिए. इसके बाद भी बलात्कार के लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है.
सरकार के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक साल 2013 के अंत तक ऐसे लंबित मामलों की संख्या 95 हज़ार थी जो 2019 के अंत तक बढ़कर एक लाख 45 हज़ार हो गई.
बदायूं में हम फिर उस पेड़ की तरफ गए लेकिन लड़की के पिता ने नज़रें नीची रखीं. बोले कि पुरानी यादें बहुत दर्द देती हैं. उन्हें देख लगा कि छह साल में उनकी उम्र मानो कई साल बढ़ गई है.
गुस्सा अब भी कायम है, लेकिन साथ ही उस कड़वी सच्चाई का एहसास भी है कि न्याय हासिल करने की लंबी लड़ाई अकेले ही लड़नी पड़ती है.
उन्होंने कहा, "क़ानून के मुताबिक मामले की सुनवाई जल्दी होनी चाहिए लेकिन हमारी याचिकाओं को लेकर अदालतें बहरी हैं. मैं अदालतों के चक्कर लगा रहा हूं लेकिन ग़रीबों को शायद ही न्याय मिलता है."

हालांकि मामले की जांच तेज़ गति से हुई. पर जांच करने वाले अधिकारियों ने कहा कि बलात्कार और हत्या को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिले हैं, जिसके चलते संदिग्ध छूट गए.
परिवार ने इसको चुनौती दी और मामले को फिर से शुरू कराया. लेकिन अदालत ने इस बार छेड़छाड़ और अपहरण के कहीं कम संगीन अपराध दर्ज किए. अब परिवार ने इसे भी चुनौती देकर दोबारा बलात्कार और हत्या के आरोप कायम करने की याचिका दायर की है.
भारतीय न्यायिक व्यवस्था के पास संसाधन और कर्मचारी, दोनों ही कम हैं. बदायूं मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो रही है लेकिन परिवार के वकील ज्ञान सिंह के मुताबिक यहां भी कोई विशेष सुविधाएं नहीं हैं.
उन्होंने कहा, "फास्ट ट्रैक कोर्ट तेज़ी से सुनवाई करने की कोशिश करती है लेकिन कभी फॉरेंसिक तो कभी कोई अन्य रिपोर्ट में देरी हो जाती है, डॉक्टर और जांच अधिकारियों का तबादला हो जाता है और गवाहों के अदालत में पलट जाने से भी देरी होती है."
बदायूं में परिवार के घर में पिछले सालों में दस्तावेज़ों और फाइलों का ढेर लग चुका है. फांसी के फंदे पर झुलती पायीं गई दो लड़कियों में एक की मां के लिए ये लड़ाई बर्दाश्त से ज़्यादा लंबी चल चुकी है.
उनसे विदा लेने के बाद भी उनके शब्द मेरे कानों में गूंजते रहे. मां ने कहा, "यही ख़्वाहिश है कि हमारे जीवित रहते न्याय मिल जाए."

'मेरे माता-पिता ने मेरे प्रेमी को बलात्कार के मामले में जेल भिजवाया'
उषा (बदला हुआ नाम) 17 साल की थी जब उनके माता पिता को स्थानीय लड़के के साथ उनके प्रेम प्रसंग का पता चला.
गुजरात के पंचमहल ज़िले के छोटे से गांव में यह अनोखा मामला भी नहीं था. लेकिन उषा के माता-पिता ने इस जोड़ी को अपनी मंजूरी नहीं दी.
तब प्रेमी जोड़े ने घर से भागने का फ़ैसला लिया. लेकिन वो कुछ ही दिनों के लिए आज़ाद रह पाए. उषा के मुताबिक पिता ने उन दोनों का पता लगा लिया और घर ले आए.
उषा ने कहा, "उन्होंने मुझे रस्सी और डंडों से पीटा. भूखा रखा और फिर मुझे एक दूसरे शख़्स के हाथों सवा लाख रूपये में बेच दिया."
पर उषा उस दूरे शख़्स के घर से शादी की रात ही भाग निकलीं. वापस अपने प्रेमी के पास गईं, शादी की और गर्भवती भी हो गईं. लेकिन इस प्रेम कहानी में दूसरी बड़ी बड़ी मुश्किल आ गई.

क़ानूनी सुधारों के तहत लड़कियों के लिए सेक्स के लिए सहमति देने की उम्र 16 साल से बढ़ाकर 18 साल कर दी गई थी. ऐसे में ऊषा अपनी मर्ज़ी से प्रेम करे तो भी उन्हें कानून की नज़र में सेक्स के लिए सहमति देने लायक नहीं माना जा सकता.
इसी वजह से उषा के मां-बाप ने उनके प्रेमी पर उनके बलात्कार का आरोप लगाकर जेल भिजवा दिया.
लड़के के परिवार वालों को भी बख़्शा नहीं गया. उषा के बलात्कार के बाद उसके अपहरण करने की साज़िश का आरोप लड़के की मां पर लगाया गया.
लड़के की मां ने बताया, "मैं दो सप्ताह तक जेल में रही. लड़की के परिवार वालों ने हमारे घर को लूट लिया, दरवाज़े तोड़ दिए, हमारे जानवरों को ले गए. हमें अपना जान बचाने के लिए छिपना पड़ा."
यह 'उषा' के नाम पर दर्ज कराया गया बलात्कार का एक 'झूठा' मामला है, जबकि क़ानून का काम 'ऊषा' की सुरक्षा करना था.
अदालतों तक पहुंचने वाले ऐसे झूठे मामलों की संख्या के बारे में कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है. पर वकीलों का कहना है कि उनके पास इस बात के पुख़्ता सबूत हैं कि ऐसे मामलों से पहले से चरमरा रही व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है.
वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामले गहरी समस्या की ओर इशारा करते हैं जिसे कोई क़ानून नहीं बदल सकता.

गरिमा जैन नीदरलैंड्स के टिलबर्ग विश्वविद्यालय के इंटरनेशनल विक्टिमॉलॉजी इंस्टीट्यूट से अपने शोध के लिए बलात्कार पीड़िताओं की साइकॉलोजी पर अध्ययन कर रही हैं.
गरिमा के मुताबिक किसी भी युवती के लिए अपने माता-पिता के फ़ैसले से अलग जाना काफ़ी मुश्किल भरा होता है ख़ासकर तब जब वह नाबालिग हों और आर्थिक तौर पर अपने घर वालों पर निर्भर भी.
उन्होंने ने कहा, "बलात्कार पीड़िताओं के अनुभव जुटाने के दौरान मैंने देखा है कि जब उनके प्रेमी को बलात्कार के झूठे मामले में जेल भिजवा दिया जाता है तो ना केवल उनके आपसी संबंध नष्ट हो जाते हैं बल्कि महिला अंदरूनी तौर से सहम जाती है और नतीजा ये कि उन पर माता-पिता का नियंत्रण और बढ़ जाता है."
उषा को गैर सरकारी संगठन 'आनंदी' की मदद मिली. इसी के चलते ऊषा अपने पति के परिवार वालों को ज़मानत पर बाहर निकलवा सकीं और अपने माता-पिता के ख़िलाफ़ खड़ी हुईं.

सामाजिक कार्यकर्ता सीमा शाह
जैसे ही उषा 18 साल की हुईं तो उन्होंने अपने ही माता-पिता के ख़िलाफ़ तस्करी का मामला दर्ज कराया. हालांकि वो ये नहीं चाहती थीं कि उन्हें ऐसा करना पड़े.
उषा ने कहा, "अगर युवतियां अपने पसंद के शख़्स से शादी कर पाएं तो दुनिया कहीं ज़्यादा सुखी होगी."
लेकिन दुर्भाग्य से, जब लड़कियां समाज की तय सीमाओं को लांघने की कोशिश करती है तो माता-पिता उन्हें रोकने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हो जाते हैं.
उषा के परिवार वालों ने भी आनंदी के सामाजिक कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ तस्करी का मामला दर्ज करने की धमकी दी.
इस ग्रामीण इलाके में सहमति देने के उम्र वाले क़ानून का ऐसा ग़लत इस्तेमाल काफी हो रहा है. 'आनंदी' की ओर से किए गए 2013, 2014 और 2015 में दर्ज की गई प्राथमिकियों के अध्ययन के मुताबिक इनमें से 95 प्रतिशत मामले माता-पिता की ओर से दर्ज कराए गए थे.
आनंदी की सामाजिक कार्यकर्ता सीमा शाह ने कहा, "ऐसा लगता है कि क़ानून का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा है. यह एक बड़ी समस्या है जहां युवतिओं को वस्तु के तौर पर देखा जाता है और उन्हें स्वतंत्र रूप से बोलने की अनुमति नहीं होती है."

'क़ानून की पढ़ाई कर अपनी जैसी दलित महिलाओं के लिए लड़ना चाहती हूं'
माया की मुस्कान उनकी आंखों तक नहीं पहुंचती. पर अपना दर्द छिपाने के लिए वो उसका इस्तेमाल करने की खूब कोशिश करती हैं.
वो अपनी ज़िंदगी की कहानी विस्तृत ढंग से बांटना चाहती हैं लेकिन पिछले साल में जिस सदमे से गुज़री हैं उसे याद करने में बार-बार गला रुंध जाता है.
माया दलित हैं. और महिला भी. यानी भेदभाव दोगुना है. वो इंजीनियर बनने की चाह से पढ़ाई कर रही थीं जब एक ऊंची जाति के शख़्स ने उनका पीछा करना शुरू किया. उस शख़्स ने अपने हाथ की नस काट ली और माया की 'ना' सुनने के तैयार ही नहीं हुआ. आख़िर में उसने माया के साथ बलात्कार किया.
माया ने कहा, "वह काफी भारी भरकम था, मैंने कोशिश की लेकिन उसे रोक नहीं सकी."
माया के माता पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज भी कराई, लेकिन जब उस शख़्स ने शादी का प्रस्ताव दिया तो समाज के दबाव में आकर मामला वापस ले लिया.
उनका ख़याल था कि उन्होंने अपनी बेटी को बलात्कार पीड़ित होने के सामाजिक 'कलंक' से बचा लिया, लेकिन ये शादी एक दूसरे तरह का नरक साबित हुई.
सुबकते हुए माया ने कहा, "मेरे पति के परिवार वाले कहते थे कि तुम दलित हो, गंदे नाले की तरह, हमें तुम्हें देख कर भी घृणा होती है."
"पति शराब के नशे में घर आता. पुलिस केस दर्ज कराने के लिए मुझे गालियां देता, प्रताड़ित करता और मेरे इनकार करने के बाद भी अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करता."
माया के मुताबिक वो इतना असहाय महसूस करने लगीं कि उन्होंने अपनी जान लेने के बारे में तक सोच डाला. पर एक दिन जब उनके पति ने ग़लती से दरवाजा खुला छोड़ दिया, वो वहां से भाग निकलीं.

सामाजिक कार्यकर्ता मनीषा मशाल
उन्हें आज़ादी का पूरा अहसास तब हुआ जब माया की मुलाकात एक दलित वकील और सामाजिक कार्यकर्ता मनीषा मशाल से हुई.
मनीषा तब हरियाणा में दलित महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कार के मामलों का अध्ययन कर रही थीं. उन्होंने पाया कि जाति उन्मूलन और यौन हिंसा मिटाने के लिए बनाए गए क़ानून कारगर नहीं हैं क्योंकि दलित महिलाओं को इन क़ानूनों के बारे में पूरी जानकारी ही नहीं है.
इसके अलावा अमूमन अभियुक्त दलितों की तुलना में बेहतर आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के होते हैं. मनीषा के मुताबिक प्रशासन, पुलिस और न्यायपालिका में भी जातिगत असमानता है जो पीड़िता के इंसाफ पाने के रास्ते में आती है.
मनीषा के लिए समस्या का एक हल दलित महिलाओं को सशक्तीकरण था. लिहाज़ा वह माया जैसी बलात्कार पीड़ितों को क़ानून की पढ़ाई करने में सहायता करने लगीं.
वकालत की पढ़ाई माया के लिए ज़िंदगी जीने की एक नई वजह बनी. जिस जीवन को वो ख़त्म करने को तैयार ती अब उसका एक मक़सद मिल गया. उन्होंने अपने बलात्कार की शिकायत को दोबारा शुरू करवाया और उसमें अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोपों को शामिल करवाया.
माया ने बताया, "मनीषा दीदी से मिलने के बाद ही मुझे आवाज़ उठाने और ज़िंदगी की ओर सकारात्मक बने रहने का आत्मविश्वास मिला."
"मैंने तब क़ानून पढ़ने का फ़ैसला लिया ताकि मैं अपनी जैसी दलित महिलाओं के लिए लड़ सकूं जिन्हें अत्याचार के बाद चुप रहने के लिए मज़बूर किया जाता है."

माया उन छह बलात्कार पीड़िताओं में एक हैं जो मनीषा के साथ रहती हैं. इनके छोटे से किराए के फ़्लैट में गर्मजोशी, मज़बूती और एकता का अहसास है. यह उनकी खतरनाक और दम घोंटने वाली पुरानी ज़िंदगी से एकदम अलग है.
मनीषा ने बताया, "दलित महिलाओं को ऊंची जाति के लोग वस्तु की तरह देखते हैं, जिसका मर्ज़ी के मुताबिक इस्तेमाल हो सकता है या छोड़ा जा सकता है. अगर कोई महिला इस अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की कोशिश करती है तो उसकी हत्या हो जाती है."
अभियुक्तों के परिवार वालों की तरफ से मनीषा को नियमित तौर पर धमकियां मिलती हैं लेकिन इससे उनके क़दम नहीं डगमगाए हैं. मनीषा दलित समुदाय की उभरती हुई नेत्री बनकर सामने आयी हैं और वह युवतियों और न्यायिक व्यवस्था के बीच पुल की भूमिका निभा रही हैं.
उन्होंने कहा, "हमारे समुदाय के लोग हिंसा के शिकार होते रहे हैं और पीड़ित के तौर पर मरते आए हैं. मैं ऐसा नहीं चाहती. मैं एक नेता के तौर पर संघर्ष करना चाहती हूं, एक पीड़िता के तौर पर नहीं."
(भारतीय क़ानून के मुताबिक बलात्कार पीड़िताओं के नाम में बदलाव किए गए हैं.) (bbc.com)
-ज़ुबैर अहमद
"कांग्रेस पार्टी ऊपर से बहुत भारी हो गई है, इसमें बहुत सारे बुद्धिजीवी जमा हो गए हैं."
"नेता आरामतलब और आलसी हो चुके हैं. इन्हें दिल्ली में रहने की आदत हो चुकी है."
"ज़मीनी सच से बहुत परे हो चुके हैं, पार्टी कार्यकर्ताओं से कट गए हैं और आम जनता से भी."
"लीडरशिप का एक बड़ा संकट है. सोनिया गाँधी अपने बेटे राहुल से अंधे प्यार के कारण पार्टी की बागडोर किसी और को सौंपना नहीं चाहतीं."
"नेताओं में अब भी घमंड बाक़ी है, वो सोचते हैं जनता वापस उनके पास जल्द ही लौटेगी."
"पार्टी में उभरते हुए सियासी रुझानों से निपटने के लिए कोई मेकेनिज़्म नहीं है."
"पार्टी डूब रही है, इसका अंत नज़दीक है."
हाल के बिहार विधानसभा चुनाव और कई राज्यों में हुए उप-चुनावों में पार्टी को लगे झटके के बाद ऐसे ही विचार, कांग्रेस के भीतर और बाहर गूंज रहे हैं.
पार्टी में सुधार की मांग
साल 2014 में हुए आम चुनाव में हार के बाद से कांग्रेस पार्टी जब भी कोई चुनाव हारती है तो पार्टी में दबा-दबा सा विद्रोह जैसा माहौल बनता है जो कुछ समय बाद टल जाता है.
मीडिया में पार्टी के भविष्य और इसके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगना शुरू हो जाता है.
कांग्रेस के अंदर कई नेता पार्टी में सुधार की मांग तेज़ कर देते हैं, जिनमें वो लोग भी शामिल हैं जो पार्टी के प्रति पूरी तरह से वफ़ादार माने जाते हैं.
लेकिन एक संकट से दूसरे संकट के बीच कांग्रेस ने कर्नाटक, पंजाब, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में चुनाव जीते भी और मध्य प्रदेश और कर्नाटक में सत्ता गंवाई भी.
इस बार "बग़ावत" करने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद और कपिल सिब्बल उन 23 नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने पिछले साल अगस्त में पार्टी में सुधार के लिए लिखी गई चिट्ठी पर दस्तख़त किए थे.
इन नेताओं की पहचान अनौपचारिक रूप से G23 कहकर की जाती है. इनमें से एक कपिल सिब्बल मीडिया को दिए गए एक इंटरव्यू में पूछते हैं कि डेढ़ साल पहले लिखी गई चिट्ठी के सुझावों पर अब तक अमल क्यों नहीं हुआ.
ये नेता पार्टी में एक नई जान डालने की बात करते हैं, पार्टी को एक ऐसी शक्ति बनाना चाहते हैं जो बीजेपी का मुक़ाबला हर चुनाव में कर सके.

गाँधी परिवार कांग्रेस की राह का रोड़ा?
कांग्रेस पार्टी के एक पूर्व प्रवक्ता संजय झा ने मार्च में एक अंग्रेज़ी अख़बार में एक लेख लिखकर पार्टी में सुधार लाने पर ज़ोर दिया था जिसके नतीजे में पार्टी ने उन्हें प्रवक्ता के पद से हटा दिया था.
अब तक उन्हें कोई परिवर्तन नज़र आया है? वो बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "नहीं, कोई खास नहीं, जो हमें उम्मीदें थीं, जिन मुद्दों की हमने अपने लेख में चर्चा की थी, इच्छाशक्ति और बदलाव लाने का जज़्बा जो पार्टी के लिए ज़रूरी है वो अब भी पार्टी नहीं कर सकी है. अभी बयानबाज़ी हम ज़्यादा सुन रहे हैं. लेकिन ज़मीनी स्तर पर कोई खास बदलाव नहीं हुआ है."
पार्टी के नेताओं की सुधार की मांग की पुकार में सबसे अहम लीडरशिप के चयन की है. राहुल गाँधी में पिछले साल मई में आम चुनाव में हार की नैतिक ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हुए पार्टी अध्यक्ष के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. कुछ समय के लिए सोनिया गाँधी अंतरिम अध्यक्ष बनीं लेकिन वो अक्सर बीमार रहती हैं.
संजय झा के अनुसार पार्टी का नया अध्यक्ष कब का बन जाना चाहिए था लेकिन वो मायूस हैं कि ऐसा अब तक नहीं हुआ है.
कांग्रेस के भीतर लोगों को लगने लगा है कि गांधी परिवार ही पार्टी की राह का रोड़ा बन गया है.
कई नेता सीधे तौर पर गाँधी परिवार पर हमला नहीं करते हैं लेकिन वो नहीं चाहते कि परिवार का कोई सदस्य अध्यक्ष बने "क्योंकि अब उनमे पहले जैसी वोटरों को आकर्षित करने की शक्ति नहीं रही". उनके मुताबिक़ सबसे बड़ी समस्या गाँधी परिवार है.

परिवार गया पार्टी टूटी?
दूसरी तरफ़, पार्टी के कई दूसरे नेता ये समझते हैं कि गाँधी परिवार के नेतृत्व के बग़ैर पार्टी टूट जाएगी, ठीक उसी तरह जब सीताराम केसरी के नेतृत्व के दौर में कई कांग्रेसी नेता पार्टी छोड़ गए थे और जो पार्टी में थे वो सोनिया गाँधी से अधिक क़रीब थे. उनकी पसंद और वफ़ादारी गाँधी परिवार से जुड़ी है.
पार्टी के सूत्रों का कहना है कि राहुल गाँधी अध्यक्ष के पद से इस्तीफ़ा देने के बाद भी पार्टी के बड़े फैसले लेते हैं और बड़े मुद्दों पर वही अधिक बोलते हैं. सोनिया गाँधी की मुहर एक औपचारिकता है. एक सूत्र ने कहा "वो बेताज बादशाह हैं."
लेकिन ज़मीन पर आम कार्यकर्ताओं में राहुल गाँधी की लोकप्रियता और वफ़ादारी अब भी सुरक्षित दिखती है.
मैंने नवंबर-दिसंबर 2018 में कांग्रेस पार्टी पर रिपोर्टिंग के लिए कई राज्यों का दौरा किया था. उस दौरे में आम कार्यकर्ताओं से बात करके मुझे एहसास हुआ था कि राहुल गाँधी कार्यकर्ताओं के हीरो हैं.
मुंबई स्थित ऑल इंडिया महिला कांग्रेस की सेक्रेटरी भावना जैन ज़मीनी सतह पर आम कार्यकर्ताओं के बीच काम करती हैं .
मैंने फ़ोन करके उनसे पूछा कि बड़े नेताओं की परिवर्तन की मांग का असर आम कार्यकर्ताओं पर कितना पड़ा है तो उनका कहना था कि राहुल गाँधी की कार्यकर्ताओं में लोकप्रियता वैसी है जैसे चुनाव में हार से पहले थी.
उनका कहना था कि पार्टी का हर कार्यकर्ता उन्हें अध्यक्ष के पद पर देखना चाहता है. "मुझे लगता है कि आम कार्यकर्ता और नेताओं को अलग करके देखना चाहिए, कार्यकर्ता का राहुल गाँधी के प्रति विश्वास और आस्था दृढ़ है. ये आपने भी महसूस किया होगा."
भावना जैन कहती हैं कि उनके इस्तीफ़े पर दो राय है. "अगर उन्होंने इस्तीफ़ा दिया तो बुरे बने और नहीं देते तो और बुरे बनते. अब सारे कार्यकर्ता चाहते हैं कि वो अध्यक्ष पद पर वापस लौटें. आप देखेंगे कि छह महीने में ये परिवर्तन आएगा."
कार्यकर्ताओं का मनोबल
ग्वालियर में डॉक्टर रश्मि पवार शर्मा पार्टी की नेता हैं. वहां से 2008 में विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुकी हैं और आज मध्य प्रदेश कांग्रेस कमिटी की सेक्रेटरी हैं. वो कहती हैं कि उनके शहर और राज्य का हर कार्यकर्ता चाहता है कि राहुल गाँधी पार्टी के अगले अध्यक्ष बनें.
"राहुल गाँधी को पार्टी का नेतृत्व करना चाहिए, हमारे सब लोग ये चाहते हैं कि राहुल जी आएं और कमान संभालें. मुझे लगता है कि मार्च तक पार्टी में बदलाव हो जाना चाहिए और पार्टी का एक नया अध्यक्ष होगा, हमारी मांग है कि वो राहुल गाँधी जी हों."
उनके अनुसार राहुल गाँधी की क़ाबिलियत पर किसी कार्यकर्ता को संदेह नहीं है. "वो बहुत अच्छा काम कर रहे थे. देखिये कांग्रेस अपने आप में एक बहुत बड़ा समुद्र है. तो मैं आपसे ये नहीं कहूँगी कि उनके आने से एकदम से कोई चमत्कार हो जाएगा, लेकिन धीरे-धीरे परिवर्तन आएगा."
रश्मि पवार का कहना है कि ग्वालियर और चंबल इलाक़े में पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा है. उन्होंने कहा कि पार्टी के प्रति कार्यकर्ताओं की वफ़ादारी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि "ज्योतिरादित्य सिंधिया के पार्टी छोड़ने के बावजूद आम कार्यकर्ताओं ने उनके साथ जाने से इनकार कर दिया."
तीन नवंबर को हुए उप चुनाव के नतीजों में ज्योतिरादित्य सिंधिया के 'घटते असर' पर टिप्पणी करते हुए वो कहती हैं, "ग्वालियर पूर्व चुनावी क्षेत्र से, जहाँ उनका महल है, उनका गढ़ है और जहाँ की जनता को वो कहते हैं कि ये मेरी जनता है, तो उनकी जनता ने उनके उम्मीदवार मुन्ना लाल गोयल को कांग्रेस के उम्मीदवार से हरवा दिया."
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कांग्रेस और राहुल गाँधी का दामन
रश्मि पवार उत्तेजित हो कर कहती हैं कि पार्टी के कार्यकर्ताओं ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के पार्टी छोड़ने के बाद जश्न मनाया और खुद को आज़ाद महसूस किया क्योंकि "पहले वो उनसे डरते थे."
रश्मि पवार, जो एनएसयूआई की प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुकी हैं, कहती हैं कि वो कांग्रेस और राहुल गाँधी का दामन कभी नहीं छोड़ेंगी, चाहे कुछ भी हो जाए. उनके मुताबिक़ पार्टी और राहुल गाँधी के लिए वफ़ादारी की झलक आम कार्यकर्ताओं में भी मिलेगी.
भावना जैन कहती हैं कि दिल्ली में नेताओं के बयानों से आम कार्यकर्ताओं में ग़लत पैग़ाम तो जाता है लेकिन उनके मनोबल पर इसका असर नहीं होता, लेकिन राहुल गाँधी के बारे में कहा ये जाता है कि अध्यक्ष के पद से इस्तीफ़ा देने के बाद भी पार्टी में उन्हीं की चलती है, जैसे कि वो एक बेताज बादशाह हैं.
इस पर भावना जैन कहती हैं, "आप कहते हैं कि राहुल जी सारे बड़े फैसले अब भी लेते हैं तो बिलकुल, क्यों नहीं. वो आज भी पार्टी के एक अहम नेता हैं, उनके विचारों और उनकी भूमिकाओं का महत्त्व है. अगर सोनिया जी उनसे सलाह लेती हैं वो पार्टी के भले के लिए सलाह लेती हैं. आखिर में फैसला सोनिया जी ही लेती हैं, बीमार रहने के बावजूद."
जम्मू में पार्टी के एक युवा कार्यकर्ता राज रैना कहते हैं कि वो राहुल गाँधी के पक्ष में ज़रूर हैं लेकिन वो चाहते हैं कि इस पद का खुलेपन के साथ चुनाव हो.
कांग्रेस कार्यसमिति और अध्यक्ष के पदों का चुनाव हो और इसी तरह के चुनाव नीचे से ऊपर तक कराए जाएँ.
वो पार्टी के बड़े नेताओं से नाराज़ हैं, "हम जब दिल्ली जाते हैं तो बड़े नेताओं से मिलना असंभव होता है. इनमें से कोई जम्मू नहीं आता. और भूले-भटके आया भी तो ज़रूरी नहीं है कि हमारी पहुँच उन तक हो."
पार्टी का कोई नेता नहीं
संजय झा भी इस मुद्दे को उठा चुके हैं. वो कहते हैं, "अगर आप किसी को उत्तरदायी नहीं ठहराते तो पार्टी इसी तरह से हारती रहेगी. पार्टी में ज़िम्मेदारी इस समय किसी के पास नहीं है. अब लगभग दो साल हो जाएंगे लेकिन पार्टी के पास कोई अध्यक्ष नहीं है. ये पार्टी के साथ मज़ाक़ हो रहा है."
संजय झा आगे कहते हैं, "परिवार का पार्टी या देश के लिए जो योगदान है उस पर कोई विवाद नहीं है. परिवार ने जो बलिदान दिया है वो इतिहास में लिखा जा चुका है. परन्तु ये भी सच है कि अभी कांग्रेस पार्टी से लोग उम्मीद कर रहे हैं कि अब आप एक नए नेता को मौक़ा दीजिए."
संजय झा कहते हैं, "राहुल गाँधी जी से जो ग़लती हुई है वो ये कि उन्होंने इस्तीफ़ा दिया,लेकिन उन्होंने ये नहीं कहा कि एक महीने के अंदर नए नेता को आना चाहिए.
उन्होंने ये प्रक्रिया नहीं शुरू की. अंत में सोनिया जी को वापस आना पड़ा. अब दुनिया बोलती है कि कांग्रेस पार्टी के पास कोई नेता नहीं है. उन्होंने अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारी है".
संजय झा के अनुसार पार्टी के दूसरे नेता भी इसकी गिरती साख के ज़िम्मेदार हैं. उनके अनुसार पार्टी में सुधार न लाने के पीछे बड़े नेताओं का घमंड और सुस्ती है.
वो कहते हैं कि इन नेताओं को ये ग़लतफ़हमी है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सियासत को लोग जल्द रद्द करेंगे और वो उनके पास वापस आ जाएँगे.
संजय झा कहते हैं, "पार्टी किसी एक शख़्स या एक परिवार की तो है नहीं है. पार्टी को जब इस समय फ्रंट फुट पर खेलना था हम अपने ही अंदरूनी मसलों में फंसे हुए हैं. नेतृत्व कुछ बोलता नहीं है, मुंह खोलता नहीं है. G23 के नेताओं ने सुझाव दिए हैं. किसी ने पार्टी छोड़ी नहीं है. पार्टी ने हमें निलंबित किया है, हमने पार्टी छोड़ी नहीं है."
बिहार में कांग्रेस के नए चुने विधायक शकील अहमद खान को ये बात कुछ साल पहले समझ में आई थी कि उनके नेता आरामतलब हो गए हैं और दिल्ली छोड़कर नहीं जाना चाहते. उनके अनुसार वो दिल्ली में कई साल रहे और जब खुद को आम जनता और आम कार्यकर्ता से कटा हुआ महसूस किया तो वापस बिहार लौट गए.
वे कहते हैं, "मैंने कुछ साल पहले बिहार वापस लौटने का फैसला किया ताकि मैं आम लोगों से जुड़ सकूं और उनके लिए काम करूँ".
दिल्ली में वरिष्ठ पत्रकार पंकज वोहरा पिछले 40 से कांग्रेस पर रिपोर्टिंग करते आए हैं. पार्टी के उतार-चढ़ाव पर उनकी गहरी नज़र है. उनकी राय है कि राहुल गाँधी को अपने परिवार से बाहर किसी को अध्यक्ष बनाने में मदद करके पार्टी को मज़बूत बनाना चाहिए.
बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं " बिहार विधानसभा चुनाव में बुरी शिकस्त के बाद राहुल गाँधी को 135 साल पुरानी पार्टी के निर्विवाद नेता के रूप में स्वीकार करना कठिन होगा इसलिए उन्हें अध्यक्ष के पद की दौड़ में शामिल होने की जगह किसी और को अध्यक्ष बनाने में मदद करनी चाहिए."
लेकिन भावना जैन और रश्मि पवार शर्मा को अटल विश्वास है कि अगर अध्यक्ष के पद के लिए पारदर्शी चुनाव हुआ तो आम कार्यकर्ता राहुल गाँधी के अलावा किसी और को नहीं चुनेंगे. (bbc.com)
अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्रा अगले साल से वापस पटरी पर लौट सकती है लेकिन एक नए नियम के साथ. कुछ देशों की यात्रा करने से पहले यात्रियों के लिए कोरोना वायरस के खिलाफ पहले टीका लगवाना जरूरी होगा.
वैक्सीन कार्यक्रम को लेकर आती सकारात्मक खबरों ने एयरलाइंस और देशों को उत्साहित कर दिया है कि वे जल्द ही निलंबित फ्लाइट रूट्स पर दोबारा उड़ान शुरू कर पाएंगे. इसी के साथ पर्यटन और होटल उद्योग के भी दोबारा पटरी पर लौटने की उम्मीद जगी है. लेकिन एशिया के कुछ देश और खास तौर से प्रशांत क्षेत्र के देश कोरोना वायरस के खिलाफ कड़ी मेहनत को बर्बाद नहीं होना देना चाहते हैं.
ऑस्ट्रेलिया में क्वांटास के प्रमुख ने कहा है कि जब एक बार वैक्सीन व्यापक तौर पर उपलब्ध हो जाती है तो उनकी एयरलाइंस चाहेगी कि यात्री यात्रा करने से पहले वैक्सीन लगवा लें या फिर ऑस्ट्रेलिया की जमीन पर उतरने से पहले टीका लगवाया लिया हो. क्वांटास के मुख्य कार्यकारी एलन जॉयस ने कहा है कि उनकी बातचीत कुछ और एयरलाइंस के प्रमुखों से अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के लिए संभावित ''वैक्सीनेशन पासपोर्ट'' के बारे में हो रही है.
उनके मुताबिक, ''अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के लिए हम अपने नियम और शर्तों को बदल रहे हैं, जिसमें यात्रियों से विमान में चढ़ने से पहले वैक्सीन लगवाने के बारे में कहा जाएगा.''
उनके मुताबिक वे इलेक्ट्रॉनिक रूप से सत्यापित करने के तरीकों को भी देख रहे हैं ताकि लोग अपनी मंजिल पर जाने से पहले टीका लगवा पाए. हालांकि यह एक मुश्किल काम है. उनके मुताबिक, "लेकिन निश्चित रूप से हमें लगता है कि बाहर से आने वाले अंतरराष्ट्रीय यात्रियों और देश छोड़कर जाने वालों के लिए यह जरूरी है."
यात्रा से पहले कोरोना वैक्सीन
दक्षिण कोरिया की सबसे बड़ी एयरलाइंस का भी ऐसा ही कुछ संदेश है. कोरियन एयर की प्रवक्ता जिल चुंग ने कहा है कि ऐसी पूरी संभावना है कि यात्रा से पहले यात्रियों को टीका लगवाने की जरूरत होगी. उनके मुताबिक ऐसा इसलिए क्योंकि सरकारों को नए आगमन के लिए क्वारंटीन की शर्त खत्म करने के लिए टीका जरूरी होगा. एयर न्यूजीलैंड ने भी कुछ इसी तरह का बयान दिया है. एक बयान में एयर न्यूजीलैंड ने कहा, ''अंत में सरकारों पर निर्भर करता है कि कब और कैसे सीमाओं को फिर से खोला जाए और वह कितना सुरक्षित है. हम प्रशासन के साथ मिलकर काम करना जारी रखेंगे.''
गौरतलब है कि ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड सभी कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने में कामयाब रहे हैं. इस कामयाबी के लिए सबसे बड़ा योगदान संक्रमित लोगों को बाहर रखने पर ध्यान देने को दिया जाता रहा है. ऑस्ट्रेलिया में बहुत कड़ाई के साथ बॉर्डर सील किए गए. देश ने अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के लिए सीमा बंद कर दी और अपने नागरिकों को विशेष हालात में ही यात्रा की इजाजत दी तो वहीं न्यूजीलैंड ने भी अपनी सीमाएं सील कीं, जबकि दक्षिण कोरिया ने बाहर से आने वाले सभी यात्रियों के लिए दो हफ्ते का क्वारंटीन नियम बनाया.
हरियाणा के पानीपत के रहने वाले अर्श शाह दिलबगी ने महज 16 साल की उम्र में ‘टॉक’ नाम से एक ऐसे यंत्र को बना डाला था, जो एमियोट्रॉफ़िक लैटरल स्कलिरॉसिस और पार्किंसन रोग जैसी बीमारियों की वजह से अपनी आवाज खो बैठे लोगों को साँसों के जरिए बोलने में मदद कर सकती है।
कुमार देवांशु देव
देश में रोबोट के प्रयोग को लेकर लंबे समय से बहस जारी है। जहाँ कई लोग रोबोट को मानवता के लिए खतरा बताते हैं, वहीं कुछ लोग इसे उपयोगी भी मानते हैं। हम सभी ने कोरोना महामारी के दौरान देखा कि रोबोट ने अस्पताल से लेकर सड़क पर भोजन बाँटने में, इंसानियत की किस तरह से मदद की।
तो, आज हम आपको एक ऐसे ही शख्स से मिलाने जा रहे हैं, जिन्होंने महज 22 साल की उम्र में रोबोटिक्स और इनोवेशन के क्षेत्र में कई उल्लेखनीय कार्य किए हैं।
यह कहानी है मूल रूप से हरियाणा के पानीपत के रहने वाले अर्श शाह दिलबगी की। अर्श फिलहाल, प्रिंसटन यूनिवर्सिटी, यूएस में ऑपरेशन रिसर्च एंड फाइनेंशियल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन कर रहे हैं।
अर्श
लेकिन, उन्होंने 16 साल की उम्र में एक ऐसा यंत्र बना डाला था, जो एमियोट्रॉफ़िक लैटरल स्कलिरॉसिस और पार्किंसन रोग जैसी बीमारियों की वजह से अपनी आवाज खो बैठे लोगों को साँसों के जरिए बोलने में मदद कर सकती है। उनके इस प्रोजेक्ट को ‘गूगल साइंस फेयर अवॉर्ड 2014’ के लिए चुने गए 15 प्रोजेक्ट में भी शामिल किया गया।
अर्श के इस डिवाइस का नाम ‘टॉक’ है और यह संवर्धी एवं वैकल्पिक संचार यंत्र है। यह एम्योट्रोफिक लेटरल स्केलेरोसिस (एएलएस) बीमारी से निपटने में मदद करता है। बता दें कि एएलएस एक न्यूरो-डिसॉर्डर रोग है, जो मस्तिष्क और रीढ़ की तंत्रिका कोशिकाओं को प्रभावित करता है।
टॉक डिवाइस
इसे लेकर वह बताते हैं, “मैं एक बदलाव लाना चाहता था और कुछ ऐसा बनाना चाहता था, जिससे समस्त मानव जाति की मदद हो। ‘टॉक’ एक ऐसा ही एक डिवाइस है।”
‘टॉक’ का डिजाइन काफी सरल है और यह काफी आसानी से पोर्टेबल है। यह उस वक्त दुनिया का एकमात्र एएसी उपकरण था, जो साँसों को आवाज देता है।
यह कैसे काम करता है?
अन्य एएसी उपकरणों के विपरीत, टॉक उपयोगकर्ताओं को व्हीलचेयर तक सीमित नहीं करता है, जो इसे और अधिक आरामदायक और सुलभ बनाता है। इस यंत्र में अलग लिंग और आयु वर्ग के लिए नौ अलग-अलग आवाजें हैं।
दिलबगी कहते हैं, “इसमें भाषा के संश्लेषण के मद्देनजर यूजर को सही सिंबल का चयन करने के लिए जटिल मैट्रिक्स मैप सीखने की जरूरत नहीं है और न ही उन्हें खुद को व्यक्त करने के लिए किसी स्क्रीन पर टकटकी लगाने की जरूरत है।”
यह दो मोड में काम करता है – कम्युनिकेशन मोड और कमांड मोड। कमांड मोड के जरिए यूजर डब्ल्यू – वाटर जैसे पूर्वनिर्धारित कमांड को बोल सकता है, जबकि कम्युनिकेशन मोड, आम बोलचाल के वाक्यांशों को एनकोड करने और बोलने में मदद करता है।
उस वक्त बाजार में ऐसे एएसी उपकरणों की कीमत हजारों डॉलर थी, लेकिन अर्श के टॉक डिवाइस की कीमत महज 100 डॉलर थी। अर्श का इरादा इस डिवाइस को आम लोगों तक पहुँचाने का था, लेकिन दुःखद रूप से इस प्रोजेक्ट को साल 2015 में रोकना पड़ा।
इसे लेकर वह कहते हैं, “टॉक एक मेडिकल डिवाइस है और हमें जल्द ही एहसास हो गया था कि ऐसे किसी भी डिवाइस को आम लोगों के लिए लॉन्च करने के लिए कई नियामक संस्थाओं और क्लीनिकल ट्रायल से गुजरना पड़ता है और टॉक के मामले में हमें समझ में आ गया था कि यह प्रक्रिया काफी महंगी होने वाली है और उस वक्त हमारे लिए इतना खर्च उठाना संभव नहीं था।”
इसके बाद उन्होंने पेटेंट फाइल किया और साल 2015 में इस प्रोजेक्ट पर काम करना बंद कर दिया। इस वजह से टॉक एक कंज्यूमर डिवाइस नहीं बन पाई।
इसके अलावा, अर्श ने साल 2016 में क्लमसी नाम से एक रोबोट डॉग को भी बनाया, जो फिलहाल नई दिल्ली में प्रेजिडेंट एस्टेट के संग्राहलय में सुरक्षित है।
इसे लेकर वह कहते हैं, “क्लमसी 16 सर्वो मोटर्स और आईएमयू यूनिट के साथ एक रोबोट डॉग है। यह एक रिसर्च प्रोजेक्ट था और इसके तहत हम डीप लर्निंग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंट न्यूरल नेटवर्क विकसित करना चाहते थे। इसके तहत हमने सॉफ्टवेयर के जरिए एक वाकिंग मैकेनिज्म को विकसित किया। यह रोबो डॉग, फिलहाल राष्ट्रपति भवन संग्रहालय, नई दिल्ली में सुसज्जित है।”
पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को रोबो डॉग क्लमसी के बारे में जानकारी देते अर्श
इसके अलावा, पिछले 5 वर्षों के दौरान अर्श ने एप्पल, ब्रिजवाटर जैसी कई प्रतिष्ठित संस्थाओं में भी काम किया है और कुछ ही महीने पहले उन्होंने अपना एक एप लॉन्च किया है – जेच एप।
इस एप के बारे में वह कहते हैं, “यह एक बैंकिंग एप है और इसके तहत हमारा उद्देश्य मूल्यों के आदान-प्रदान को सहज और न्यायसंगत बनाना है। क्योंकि, आज सभी बड़े बैंक ट्रांजेक्शन के दौरान काफी चार्ज करते हैं। इससे छोटे व्यवसायों को 11 प्रतिशत तक शुल्क चुकाना पड़ता है। हमारी कोशिश इसे न्यूनतम करने की है।”
क्या कहते हैं रोबोटिक्स के बारे में
अर्श कहते हैं, “रोबोट के बारे में हमारे दिमाग में जो पहली छवि उभरती है, वह हॉलीवुड की फिल्मों को लेकर होती है। लेकिन, रोबोटिक्स का दायरा यहीं तक सीमित नहीं है, आज के दौर में मशीनें हमारी जिंदगी से काफी बड़े पैमाने पर जुड़ी हुई हैं। आज ऑटोमेशन का इस्तेमाल अस्पतालों में हार्ट सर्जरी करने से लेकर सड़कों पर भोजन वितरण करने तक किया जा रहा है, जिससे हमारी जिंदगी में इसकी उपयोगिता साबित होती है।”
भारत के संदर्भ में क्या है राय
आज के समय में भारत को विज्ञान और तकनीकी विकास के क्षेत्र में काफी कमतर आँका जाता है, लेकिन अर्श के विचार इससे ठीक विपरीत हैं।
वह कहते हैं, “भारत, तकनीकों के विकास को लेकर कई मायनों में पूरी दुनिया से आगे है। उदाहरण के तौर पर हम मिशन मंगलयान को ले सकते हैं। इसरो के इस महत्वाकांक्षी परियोजना की पूरी दुनिया में तारीफ हुई थी। इसके साथ ही, भारत में डिजिटल बैंकिंग का चलन भी काफी तेजी से बढ़ रहा है, जो एक बेहद सकारात्मक संदेश है।”
टॉक डिवाइस के संबंध में अर्श का वीडियो यहाँ देखें।
द बेटर इंडिया अर्श शाह दिलबगी के उज्जवल भविष्य की कामना करता है। (thebetterindia.com)
ध्रुव गुप्त
उर्दू शायरी के लंबे सफऱ में पाकिस्तान की लोकप्रिय शायरा परवीन शाकिर को शायरी के तीसरे पड़ाव का मीलस्तम्भ माना जाता है। उनकी शायरी खुशबू के उस सफऱ की तरह है जो रूह की गहराईयों तक पहुंचती है। परवीन ने स्त्री के प्रेम, एकांत, भावुकता, निजी और वैचारिक स्वतंत्रता, जिजीविषा, स्वाभिमान और अथक संघर्षों का जैसा हृदयस्पर्शी चित्र खींचा है, उससे गुजऱना एक विरल अनुभव है।
परवीन की शायरी में यथास्थिति के खिलाफ गहरा प्रतिरोध तो है, लेकिन उस प्रतिरोध का स्वर कर्कश नहीं, मुलायम है। कठोर परिस्थितियों के बीच यह मुलायमियत उनकी शायरी की रूह है। मात्र बयालीस साल की उम्र में एक सडक़ दुर्घटना में दिवंगत परवीन की कविताओं में एक जीवंत लडक़ी भी है, प्रेमिका भी, पत्नी भी, कामकाजी स्त्री भी, मां भी और पुरूषों की दुनिया में पांव टिकाने की जद्दोज़हद करती एक ख़ुद्दार औरत भी। यानी एक मुकम्मल औरत उनकी कविताओं में सांस लेती महसूस होती है।.अपनी नज़्मों और गज़़लों में उन्होंने प्रेम और विरह के ज़ुदा-ज़ुदा रंगों की कसीदाकारी के अलावा स्त्री-जीवन के उन अछूते मसलों को भी छुआ है जिनपर पारंपरिक शायरों की नजऱ नहीं गई। यह बेवज़ह नहीं कि आज की युवा पीढ़ी की वे सबसे प्रिय शायरा हैं। उनके यौमे विलादत (24 नवंबर) पर ख़ेराज-ए-अक़ीदत, उनकी एक गज़़ल के अशआर के साथ !
उसी तरह से हर इक जख़़्म खुशनुमा देखे
वो आये तो मुझे अब भी हरा-भरा देखे
गुजऱ गए हैं बहुत दिन रिफ़ाक़ते-शब में
इक उम्र हो गई चेहरा वो चांद - सा देखे
तेरे सिवा भी कई रंग ख़ुशनजऱ थे मगर
जो तुझको देख चुका हो वो और क्या देखे
बस एक रेत का जर्ऱा बचा था आंखों में
अभी तलक जो मुसाफिऱ का रास्ता देखे
उसी से पूछे कोई दश्त की रफ़ाकत जो
जब आंख खोले पहाड़ों का सिलसिला देखे
बस एक रेत का जर्ऱा बचा था आंखों में
अभी तलक जो मुसाफिऱ का रास्ता देखे
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस वक्त तहलका मचाए हुए हैं। उन्होंने चुपचाप सउदी अरब की यात्रा कर ली, जो पिछले 68 साल में किसी भी इजराइली नेता ने नहीं की। सच्चाई तो यह है कि सउदी अरब और इजराइल, दोनों ही अमेरिकापरस्त रहे हैं लेकिन दोनों में हमेशा 36 का आंकड़ा बना रहा है। सउदी अरब फिलिस्तीन की आजादी का सबसे बड़ा हिमायती और प्रवक्ता रहा है।
हालांकि इजराइल की सउदी अरब के साथ वैसी लड़ाई नहीं हुई, जैसी मिस्र और जोर्डन के साथ हुई है लेकिन इजराइल के खिलाफ संपूर्ण इस्लामी जगत को खड़ा करने में सउदी अरब का बड़ा योगदान रहा है। इसीलिए जब इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू लाल समुद्र के पास स्थित इजराइल के नियोम में जाकर सउदी शासक मुहम्मद बिन सलमान और अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो से चुपचाप मिल लिये तो सारे अरब जगत में झनझनी फैल गई।
सउदी अरब के विदेश मंत्री ने तो अखबारों को कह दिया कि यह खबर ही झूठी है। सउदी युवराज सिर्फ पोंपियो से मिले हैं। लेकिन इजराइल के पत्रकारों ने साफ़-साफ़ तथ्य पेश करके बताया है कि नेतन्याहू कितने बजे किसके जहाज में बैठ कर किसके साथ उस शहर में गए थे। सउदी राज परिवार को यह डर लग रहा है कि दुनिया के इस्लामी देश उसकी अब टांग खिंचाई करेंगे।
कोई आश्चर्य नहीं कि ईरान और तुर्की अब सउदी अरब पर बरस पड़ें। वे सउदी अरब को अमेरिका के लिए बिकाऊ माल घोषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। वे यह शंका भी प्रकट करेंगे कि हाल ही में जैसे संयुक्त अरब अमारात (यू.ए.ई.) और बहरीन के साथ इजराइल के कूटनीतिक संबंध स्थापित हुए हैं, वैसे ही सउदी अरब के साथ भी होने वाले हैं।इस वक्त इजराइल के सिर्फ चार मुस्लिम देशों के साथ कूटनीतिक संबंध हैं- मिस्र, जोर्डन, यूएई और बहरीन लेकिन सउदी के साथ उसके यही संबंध हो गए तो मान लीजिए कि सारे मुस्लिम देश उसकी पकड़ में आ जाएंगे। इतना बड़ा पट-परिवर्तन अरब-जगत में अमेरिका के दबाव में तो हो ही रहा है, उसका मूल कारण ईरान ही है।
सबको लग रहा है कि अमेरिका का बाइडन-प्रशासन ईरान के प्रति ट्रंप-नीति को जरुर बदलेगा। उस स्थिति का सामना करने के लिए इजराइल और मुस्लिम देशों का एकजुट होना जरुरी है। ओबामा-काल में संपन्न हुआ ईरानी परमाणु-समझौता यदि फिर जीवित हो गया तो सबसे ज्यादा इजराइल डरेगा। इसीलिए इजराइल जरुरत से ज्यादा सक्रिय दिखाई पड़ रहा है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-चैतन्य नागर
लिखने के स्त्रोत को निर्मल वर्मा खंगालने की कोशिश किया करते थे। करीब तेईस वर्ष पहले जब निर्मल वर्मा वाराणसी में राजघाट के कृष्णमूर्ति फाउंडेशन स्थित सेंटर पर आये थे तो उस समय उनसे यही सवाल मैंने पूछा था : लेखक क्या लिखता है और क्यों? क्यों में 'कैसे' भी छिपा हुआ है, और क्या लिखता है से ज्यादा कीमती सवाल है कि लेखक कैसे लिखता है।
मेरा प्रश्न यह भी है कि क्या हर रचनाकार अपनी रचनात्मकता के स्त्रोत तक जाने की कोशिश करता होगा? यह सवाल सिर्फ लेखन से जुड़े लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि हर विधा में काम कर रहे कलाकार के लिए हैं। विन्सेंट वॉन गो यह मानता था कि हर पेंटिंग में जीवन होता है और वह जीवन कलाकार की आत्मा ही उसे प्रदान करती है। महान संगीतकार बेटोफेन के बारे में एक मशहूर लेखक ने लिखा कि वह तो इतने बधिर हैं कि खुद को चित्रकार समझ बैठते हैं! रचनात्मकता के स्त्रोत में थोड़ी गहराई में उतरने पर दिखता है कि विधाएं भले ही अलग अलग हों, कोई स्त्रोत है जो हर कलाकार के मन-मस्तिष्क से होकर प्रवाहित होता है, और वह अक्सर एक ही स्त्रोत होता है, अलग अलग वाह्य अभिव्यक्तियों के बावजूद। किशोरी अमोनकर जब गाती थीं तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता था कि कौन है जो उनके जरिये, उन्हें गा रहा है! अक्सर कोई रचनात्मक ऊर्जा कलाकार का एक माध्यम के रूप में मानो इस्तेमाल करती प्रतीत होती है।पर ऐसा कहने में रचनात्मकता को एक रहस्यमयी प्रक्रिया बनाने के खतरे हैं। उसपर अनावश्यक और बोझिल आध्यात्मिकता की खरोंचे भी पड़ सकती हैं।
विक्टर ह्यूगो कहते थे कि मैं तभी लिखता हूँ जब प्रेरणा मिलती है पर मैंने यह तय किया हुआ है कि किसी भी हालत में मैं रोज़ सुबह नौ बजे प्रेरित होता रहूँ! टी एस एलियट ने रचनात्मकता के बारे में एक बड़ी ही विवादस्पद बात कह डाली। उनका कहना था कि अपरिपक्व कवि नक़ल करते हैं; महान कवि तो चोरी करते हैं। इस बात को लेकर भी बड़ा विवाद था कि यह बात ऑस्कर वाइल्ड ने कही है या पाब्लो पिकासो ने, पर यह अब करीब करीब तय हो चुका है कि यह वक्तव्य एलियट का ही है। इसे स्पष्ट करते हुए एलियट कहते हैं : 'खराब कवि जो भी उठाते हैं, उसे भद्दा बना कर छोड़ देते हैं जबकि उम्दा कवि उसे बेहतर बना डालता है या कम से कम कुछ अलग तो बना ही देता है'।
हर लेखक के अपने अनुभव होते हैं, जिन्हें वह अपने संस्कारों के आलोक में देखता-समझता है। उन अनुभवों के साथ उसका गहरा तादात्म्य भी स्थापित हो जाता है। उन्ही अनुभवों को ही वह अपनी रचनाओं में व्यक्त किये चला जाता है। ऐसा अचेतन या अवचेतन स्तर पर भी होता है क्योंकि लेखक के लिए खुद यह जान पाना मुश्किल हो सकता है कि कौन सी रचना अतीत में हुए किस अनुभव से उपजी है। अक्सर लेखक इस बारे में कोई प्रश्न उठाने में खतरा भी महसूस कर सकता है कि वे अनुभव वास्तविक हैं या काल्पनिक, छिछले हैं, या गहरे; या फिर मूलभूत रूप से किस मानसिक उद्वेलन से उपजे हैं। इन बातों को उठाने से लेखन के प्रवाह रुक सकता है।अक्सर इस तरह के मूलभूत सवालों में लेखक खतरा महसूस करता है। लेखक या कवि किसी गहरी या अब्सोल्युट या अंतिम अंतर्दृष्टि की खोज में नहीं रहता, अपनी आंशिक अंतर्दृष्टि को साझा करने की एक व्याकुलता होती है उसमें और अपनी 'खोज' पर प्रश्न उठाने से उसकी अभिव्यक्ति बाधित होगी इस तथ्य से वह अच्छी तरह परिचित होता है। प्रश्न की आंच में बहुधा कई निष्कर्ष मुरझा सकते हैं, जबकि लेखक उन निष्कर्षों को पूरे विश्वास के साथ व्यक्त करना चाहता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो लेखक की संस्कारबद्धता उसके लिखने का स्त्रोत हो सकती है।
भावनाएं या विचार भी रचनाकार को लेखन की दिशा में ले जाते हैं। पर विचार का महिमामंडन न करके उनकी संरचना को खंगालने की कोशिश की जानी चाहिए। गौरतलब है कि विचार भी खास किस्म के संस्कार से ही उपजते हैं। अक्सर वे स्मृतियों के प्रत्युत्तर के रूप में व्यक्त होते हैं। लेखक स्मृतियों से अपनी ऊर्जा लेता है। सुखद स्मृतियों से भी और दुखदायी यादों से भी। इन्हें लेकर अलग- अलग रस निर्मित करता है। क्या मृत स्मृतियाँ उत्कृष्ट, जीवंत लेखन को जन्म दे सकती हैं? इस प्रश्न को लेखक दर्शन और मनोविज्ञान के पाले में धकेल देता है। हाइकू के जनक बाशो स्मृतियों पर निर्भर नहीं रहते, सिर्फ और सिर्फ वर्तमान क्षण को उकेरते हैं।'ताल पुराना/ कूदा दादुर/ डुबुक', में अतीत की कोई परछाई नहीं, सिर्फ वर्तमान का शुद्ध अवलोकन है, उसका उत्सव है जो कि स्मृतियों के नीचे दबे मन की सीमाओं से परे है। कहीं ऐसा इशारा है कि स्मृतियों से परे भी कोई ऐसा अवलोकन है, जो वर्तमान क्षण में है, ज़्यादा टटका है, सिर्फ नए वस्त्र धारण किये हुए कोई मृत देह नहीं। 'तुमि केमोन कोरे जे गान कोरो हे गुनी, आमी ओवाक होए शुनी, केबोल शुनी', गुरुदेव टैगोर के इस सुनने में, अवाक होकर सुनने में स्मृति कहाँ, कहाँ है कोई संचित ज्ञान, कहाँ है बीते हुए कल की कोई परछाई!
हाँ, गहरी ऊब और द्वंद्व भी लेखन या किसी अन्य तरह की सृजनशीलता की ऊर्जा को जन्म दे सकते हैं। अक्सर कलाकार के जीवन और लेखन में भयंकर द्वंद्व देखा जा सकता है। वॉर एंड पीस का संत लेखक टॉलस्टॉय अपनी पत्नी के साथ भयंकर कलह में जीता रहा। अपने मशहूर उपन्यास एना कारेनीना के प्रारंभ में ही उन्होंने दुखी परिवार की दशा के बारे में लिखा है। दरअसल द्वंद्व एक तरह की ऊर्जा पैदा करता है और किसी सृजनशील व्यक्ति में यह ऊर्जा सौन्दर्यपूर्ण और प्रभावी ढंग से व्यक्त भी हो सकती है पर उसके पीछे छिपा बैठा, बिलबिलाता, तड़पता रचनाकार दुनिया की नज़र से बचा रह जाता है। निदा फाजली इसे बखूबी कहते हैं: 'मेरी आवाज़ तो पर्दा है मेरे चेहरे का, मैं हूँ खामोश जहाँ मुझको वहां से सुनिए'। पर खामोशी के पीछे छिपे ज़ख्मों को कौन देख पाता है! शब्दों के सौन्दर्य में खोये पाठक और दर्शक बस वाह-वाही में मगन हो जाते हैं।
प्रतिष्ठा की कामना, खुद को बाकियों से अलग दिखाने की इच्छा भी लेखन के लिए प्रेरित कर सकती है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा लेखन या किसी और कला की ओर ले जा सकती है। और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से प्रेरित लेखक किसी राजनेता की तरह भयंकर परिश्रमी और उर्वर भी हो सकता है।
अनवरत चलने वाले विचार के बीच का पल भर का अंतराल सृजनशीलता का एक बहुत ही समृद्ध स्त्रोत होता है। यह अंतराल बहुत ही कीमती होता है और संभवतः यही सृजनात्मक संवेग को जन्म देता है; उसके बाद इसकी अभिव्यक्ति तो एक तरह से यंत्रवत होती है, बाहरी माध्यमों का सहारा लेती है। नन्दलाल बोस ने इस यांत्रिकता से बचने के लिए रंग भी खुद ही बनाए। तो यह प्रश्न प्रासंगिक है कि क्या अनवरत चलने वाले विचारों में कोई सृजनशीलता होती है, या फिर उनके खुद बखुद थम जाने से उपजी खामोशी सृजनशील होती है। विज्ञान के क्षेत्र में आर्किमिडीज़ की अंतर्दृष्टि जो उनके दिमाग में नहाते वक़्त कौंधी थी, एक अलग तरह की रचनात्मकता की तरफ इशारा करती है जिसकी ज़मीन विचारों के निरंतर प्रवाह से हट कर है। जो वैज्ञानिक निर्वस्त्र होकर अपनी खोज की घोषणा करते हुए सड़कों पर दौड़ लगा सकता है, वह परंपरागत विचारों की गिरफ्त से तो जरुर ही बाहर रहा होगा।
और भी बहुत कुछ हो सकता है। मन की हर बारीक से बारीक हरकत और उसकी अभिव्यक्ति पर आँखे टिकाये रखना आसान नहीं होता। सृजनात्मकता अपने आपमें ही बड़ी कोमल वस्तु है, इसकी पीड़ा को समझना, इसके मार्ग पर चलना, इसे संजोये रखना, बुझने से रोकना, यह सब कुछ एक चुनौती जैसा है, खासकर आज के माहौल में जहाँ हर स्तर पर एक उठा पटक मची हुई है। सही अर्थ में एक गहरे सृजनशील व्यक्ति के लिए आज का समय तरह तरह की अनिश्चितताओं और संदेहों से भरा हुआ है। फिर भी बात यही सच है कि जो रचेगा, आखिर में वही बचेगा।
Dayanidhi-
कोलोराडो और हार्वर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नए अध्ययन के अनुसार, तेजी से लोगों का कोविड-19 परीक्षण (रैपिड टेस्ट) करने से कुछ ही हफ्तों के भीतर वायरस को खत्म किया जा सकता है। भले ही परीक्षण सस्ता और मानकों की तुलना में काफी कम संवेदनशील ही क्यों न हों? अध्ययन में रैपिड टेस्ट को कम संवेदनशील जिसके, परिणाम 15 मिनट में आ जाते हैं और पीसीआर (पोलीमरेज चेन रिएक्शन) जिसके परिणाम आने में 48 घंटे तक का समय लग जाता है, उसे अधिक संवेदनशील बताया गया है।
यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर (सीयू बोल्डर) में कंप्यूटर विज्ञान के सहायक प्रोफेसर डैनियल लारमोरे ने कहा जब सार्वजनिक स्वास्थ्य की बात आती है, तो तेजी से कम संवेदनशील परीक्षण करना बेहतर होता है। हर किसी को घर पर रहने के लिए कहने के बजाय, आप यह सुनिश्चित कर सकें कि जो व्यक्ति बीमार है वह घर पर ही रहे, ताकि उसके संक्रमण फैलाने की आशंका कम हो जाए। इस तरह हम केवल संक्रमण फैलाने वाले लोगों को ही घर पर रहने के लिए कह सकते हैं ताकि बाकी सभी लोगों में संक्रमण न फैले।
अध्ययनकर्ताओं ने कहा कि इस तरह की रणनीति बाजार, रेस्तरां, खुदरा स्टोर और स्कूलों को बंद किए बिना "घर पर रहने के आदेश" को बढ़ावा दे सकती है।
लारमोरे ने सीयू के बायोफ्रीस्टियर्स इंस्टीट्यूट और हार्वर्ड टीएच चैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के सहयोगियों के साथ मिलकर यह पता लगाया कि क्या परीक्षण संवेदनशीलता, अधिक परीक्षण करना, कोविड-19 के प्रसार पर अंकुश लगाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। यह अध्ययन साइंस एडवांस में प्रकाशित हुआ है।
शोधकर्ताओं ने बताया कि संक्रमण के दौरान शरीर के अंदर संक्रमण कैसे बढ़ता है और कम होता है, जब लोग इन लक्षणों का अनुभव करते हैं, इसका मतलब है कि वे संक्रमण फैला सकते हैं।
फिर उन्होंने तीन काल्पनिक परिदृश्यों पर विभिन्न प्रकार के परीक्षणों के साथ जांच के प्रभाव का पूर्वानुमान लगाने के लिए गणितीय मॉडल का उपयोग किया। इसमें 84 लाख की आबादी के शहर में, विश्वविद्यालय की तरह 20,000 लोगों की एक परिस्थिति तैयार की गई और इसमें से 10,000 लोगों को चुना गया।
जब संक्रमण फैलने पर अंकुश लगाने की बात आई तो उन्होंने पाया कि बार-बार परीक्षण और इसके समय में बदलाव इसकी संवेदनशीलता की तुलना में बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, एक बड़े शहर का एक परिदृश्य में, जहां काफी बड़े क्षेत्र में सप्ताह में दो बार तेजी से लेकिन कम संवेदनशील परीक्षण किया गया, जिसने वायरस की संक्रामकता की दर या आरओ की डिग्री 80 फीसदी कम हो गई। लेकिन जब अधिक संवेदनशील पीसीआर (पोलीमरेज चेन रिएक्शन) परीक्षण सप्ताह में दो बार किया गया, जिसके परिणाम आने में 48 घंटे तक का समय लग जाता है, इसने केवल 58 फीसदी संक्रामकता को कम किया। अधिक तेजी से होने वाले परीक्षणों ने धीमी, अधिक संवेदनशील पीसीआर परीक्षण की तुलना में हमेशा संक्रमण फैलाने की गति को कम किया।
ऐसा इसलिए है क्योंकि लगभग दो-तिहाई संक्रमित लोगों में कोई लक्षण नहीं होते हैं और जैसा कि वे अपने परीक्षण के परिणामों की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं, वे इस दौरान वायरस फैलाना जारी रखते हैं।
बायोफ्रीस्टियर्स इंस्टीट्यूट के निदेशक और हावर्ड ह्यूजेस मेडिकल के वरिष्ठ अध्ययनकर्ता रॉय पार्कर ने कहा, यह दिखाने वाला पहला अध्ययन है जो हमें परीक्षण की संवेदनशीलता के बारे में कम चिंता करने के बारे में बताता है और जब सार्वजनिक स्वास्थ्य की बात आती है, तो बार-बार परीक्षण किए जाने चाहिए।
एक परिदृश्य जिसमें एक शहर में 4 फीसदी लोग पहले से ही संक्रमित थे, चार में से तीन का हर तीन दिनों में तेजी से परीक्षण किया गया, इसने संख्या को 88 फीसदी तक कम कर दिया। यह छह सप्ताह के भीतर महामारी को खत्म करने के लिए पर्याप्त था।
संवेदनशीलता का स्तर व्यापक रूप से भिन्न होता है। एंटीजन परीक्षणों में संक्रमण का पता लगाने के लिए पीसीआर परीक्षण की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में संक्रामक (वायरल लोड) - लगभग 1,000 गुना वायरस की आवश्यकता होती है। एक अन्य परीक्षण, जिसे आरटी-लैंप के रूप में जाना जाता है (रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन लूप-मेडिटेड इजोटेर्मल एम्प्लीफिकेशन), पीसीआर की तुलना में लगभग 100 गुना अधिक वायरस का पता लगा सकता है। बेंचमार्क पीसीआर परीक्षण के लिए प्रति मिली लीटर प्रति 5,000 से 10,000 संक्रमित आरएनए की आवश्यकता होती है, जिसका अर्थ है कि यह वायरस को या तो बहुत जल्दी या बहुत देर से पकड़ सकता है।
हार्वर्ड टी.एच. में महामारी विज्ञान के सहायक प्रोफेसर डॉ माइकल मीना ने कहा रैपिड टेस्ट किए जा सकते हैं, जब लोग संक्रामक होते हैं तब यह कोविड-19 का पता लगाने में बेहद प्रभावी हैं। उन्होंने कहा वे सस्ती भी हैं, हर रैपिड टेस्ट की लागत 1 डॉलर जितनी हो सकती है और इसके परिणाम 15 मिनट में आ सकते हैं। कुछ पीसीआर परीक्षणों में कई दिन लग सकते हैं। लारौर ने कहा रैपिड टेस्टिंग से सुपर स्प्रेडर के खतरों जैसे फुटबॉल स्टेडियमों, कॉन्सर्ट वेन्यू और एयरपोर्ट्स में संक्रमण फैलने से रोका जा सकता है।
अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि उन्हें यह देखकर खुशी होती है कि कई देशों ने पहले ही अपने सभी नागरिकों का परीक्षण शुरू कर दिए हैं। लारमोर ने कहा यह कोविड परीक्षण के बारे में सोच में बदलाव लाने का समय है क्योंकि ट्रांसमिशन श्रृंखला को तोड़ने और अर्थव्यवस्था को खुला रखने के लिए एक परीक्षण महत्वपूर्ण हैं। (downtoearth)
-रशीद किदवई
वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
अहमद पटेल कांग्रेस में हमेशा संगठन के आदमी माने गए. वे पहली बार चर्चा में तब आए थे जब 1985 में राजीव गांधी ने उन्हें ऑस्कर फर्नांडीस और अरुण सिंह के साथ अपना संसदीय सचिव बनाया था, तब इन तीनों को अनौपचारिक चर्चाओं में 'अमर-अकबर-एंथनी' गैंग कहा जाता था.
अहमद पटेल के दोस्त, विरोधी और सहकर्मी उन्हें अहमद भाई कह कर पुकारते रहे, लेकिन वे हमेशा सत्ता और प्रचार से खुद को दूर रखना ही पसंद करते थे.
सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और संभवतः प्रणब मुखर्जी के बाद यूपीए के 2004 से 2014 के शासनकाल में अहमद पटेल सबसे ताकतवर नेता थे.
इसके बावजूद वे उस दौर में केंद्र सरकार में मंत्री के तौर पर शामिल नहीं हुए.
2014 के बाद से, जब कांग्रेस ताश के महल की तरह दिखने लगी है तब भी अहमद पटेल मज़बूती से खड़े रहे और महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी के निर्माण में अहम भूमिका निभाई और धुर विरोधी शिवसेना को भी साथ लाने में कामयाब रहे.
इसके बाद जब सचिन पायलट ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ बग़ावत की तब भी अहमद सक्रिय हुए.
सारे राजनीतिक विश्लेषक ये कह रहे थे कि पायलट ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह बीजेपी में चले जाएंगे तब अहमद पटेल पर्दे के पीछे काम कर रहे थे, उन्होंने मध्यस्थों के जरिए यह सुनिश्चित किया कि सचिन पायलट पार्टी में बने रहे.
पर्दे के पीछे की सक्रियता
अहमद पटेल से जुड़ी ऐसी कई कहानियां हैं. और ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी, अगर कहा जाए कि 2014 के बाद गांधी परिवार की तुलना में पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच सद्भाव क़ायम रखने में अहमद पटेल का प्रभाव ज़्यादा दिखा.
लेकिन हर आदमी की अपनी खामियां या कहें सीमाएं होती हैं. अहमद पटेल हमेशा सतर्क रहे और किसी भी मुद्दे पर निर्णायक रुख लेने से बचते रहे.
जब 2004 में यूपीए की सरकार बनी तब कपिल सिब्बल और पी चिदंबरम जैसे कांग्रेसी नेताओं का समूह गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और मौजूदा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की 2002 के गुजरात दंगों में कथित भूमिका पर कड़ी कानूनी कार्रवाई चाहता था.
लेकिन अहमद पटेल इसको लेकर दुविधा में थे, उनकी इस दुविधा और हिचक को सोनिया गांधी और डॉक्टर मनमोहन सिंह ने भांप लिया था और ये दोनों अहमद पटेल की राजनीतिक सूझबूझ पर भरोसा करते थे.
यही वजह है कि अहमद पटेल की सलाह पर दोनों ने अपने राजनीतिक विरोधियों के प्रति धीमी और सहज प्रक्रिया का सहारा लिया.
वहीं, बाहरी दुनिया के लिए अहमद पटेल हमेशा एक पहेली बने रहे. लेकिन जो लोग कांग्रेसी संस्कृति को समझते हैं उनकी नज़र में वो हमेशा एक पूँजी रहे.
वे हमेशा सतर्क दिखते, लेकिन थे मिलनसार और व्यावहारिक. उनकी छवि भी अपेक्षाकृत स्वच्छ थी.
पार्टी के कोषाध्यक्ष के तौर पर...
संभवतः राहुल गांधी, अहमद पटेल को ऐसे शख़्स के तौर पर देखते रहे जो कम से कम नरेंद्र मोदी और अमित शाह की रणनीति को ठीक-ठीक भांपने में सक्षम हों.
अब यह कोई रहस्य की बात भी नहीं रही कि अगस्त 2017 में अहमद पटेल कांग्रेस की ओर से पांचवीं बार राज्यसभा भेजे जाने (यह अपने आप में अनोखा था, क्योंकि कांग्रेस ने इससे पहले किसी भी नेता को पांच बार राज्य सभा नहीं भेजा था) को लेकर बहुत उत्सुक नहीं थे.
लेकिन कहा जाता है कि तत्कालीन पार्टी सर्वेसर्वा सोनिया गांधी ने उन्हें इसके लिए मनाया था और कहा था कि अकेले वही हैं जो अमित शाह और पूरी बीजेपी की बराबरी करने में सक्षम हैं.
पार्टी के कोषाध्यक्ष के तौर पर, उनकी जिम्मेदारी पार्टी के लिए ना केवल फंड जुटाने की थी बल्कि विभिन्न विधानसभा चुनावों और 2019 के आम चुनाव के दौरान जब राहुल गांधी की किस्मत उनका साथ नहीं दे रही थी, ऐसे समय में पार्टी कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना और उन्हें सहायता पहुंचाने की जिम्मेदारी भी उनकी थी.
भारत के सभी राज्यों में ज़िला स्तरीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों में अधिकांश को अहमद पटेल व्यक्तिगत तौर पर जानते थे, ऐसा कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी.
वे समझदारी और गोपनीय ढंग से संसाधनों (एक घंटे के अंदर पैसा, भीड़, प्राइवेट जेट और दूसरे तमाम लॉजिस्टिक शामिल हैं) की व्यवस्था करने में माहिर थे.
कारोबारी घरानों में अहमद पटेल की पहुंच
इतना ही नहीं, अहमद पटेल राहुल गांधी और संभावित साझीदार होने वाले नेताओं ममता बनर्जी, मायावती, और चंद्रबाबू नायडू के बीच में महत्वपूर्ण कड़ी भी थे.
इनके अलावा ग़ैर एनडीए और गैर यूपीए क्षेत्रीय दलों में भी उनकी पैठ थी. नौकरशाही, मीडिया और कारोबारी घरानों में अहमद पटेल की पहुंच के बारे में कांग्रेस सर्किल में तरह-तरह के किस्से सुनने को मिलते हैं.
इस सर्किल में कहा जाता है कि लो प्रोफाइल रहने वाले कांग्रेस के इस वरिष्ठ नेता के एहसानों के तले दबे लोग समाज के सभी हिस्सों में हैं, ढेरों लोग उनके एहसानों का बदला चुकाने के लिए हमेशा तैयार होते थे.
लेकिन अहमद पटेल ने उनमें से अधिकांश का इस्तेमाल शायद ही किया हो.
राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में अहमद पटेल का 23, मदर टेरेसा मार्ग का आवास, 10 जनपथ (सोनिया गांधी का आवास), 12 तुगलक क्रेसेंट (राहुल गांधी का आवास) और 15, गुरुद्वारा रकाबगंज मार्ग (कांग्रेस का वाररूम) के बाद पावर सेंटर जैसा ही था.
उनके घर में कई रास्तों से प्रवेश किया जा सकता है और निकला जा सकता है.
घर में कई कमरे, चैंबर्स हैं और ढेरों लोगों के बैठने की व्यवस्था भी, जहां निकाय चुनावों से लेकर संसदीय चुनाव तक के उम्मीदवारों, राज्यों के पार्टी अधिकारियों और कांग्रेस मुख्यमंत्रियों तक के भाग्य का फ़ैसला होता रहा है.
राजनीतिक चतुराई
हालांकि अहमद पटेल की रानजीतिक यात्रा जितनी आकर्षक आज नजर आती है, उतनी आसान भी नहीं रही.
साल 1985 में युवा और उत्साही राजीव गांधी नौकरशाही के बंधनों (इसे प्रधानमंत्री कार्यालय पढ़ा जा सकता है) को तोड़ना चाहते थे, लेकिन अहमद पटेल, अरुण सिंह और ऑस्कर फर्नांडीस को लेकर किया गया उनका प्रयोग नाकाम हो गया था.
क्योंकि इन तीनों के पास सशक्त आईएस लॉबी से पार पाने का ना तो कोई प्रशासनिक अनुभव था और ना ही राजनीतिक चतुराई.
लेकिन अहमद पटेल राजीव गांधी की 1991 में हुई मौत के बाद भी अहम भूमिका में बने रहे. राजीव गांधी के बाद पीवी नरसिम्हाराव ने अपने और 10 जनपथ के बीच सेतु के तौर पर अहमद पटेल का इस्तेमाल किया.
इस प्रक्रिया के दौरान अहमद पटेल ने सोनिया गांधी का भरोसा हासिल किया. जब सीताराम केसरी नरसिम्हाराव की जगह कांग्रेस अध्यक्ष बने तो अहमद पटेल कोषाध्यक्ष बने.
तब शरद पवार ने कांग्रेस अध्यक्ष पद की होड़ में सीताराम केसरी को चुनौती दी थी. वे केसरी के आसपास मौजूद घेरे की आलोचना करते हुए कहा करते थे, तीन मियाँ, एक मीरा (तीन मियाँ यानी अहमद पटेल, ग़ुलाम नबी आजाद, तारिक अनवर और एक मीरा यानी मीरा कुमार).
मार्च, 1998 में सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनीं. तब उनके निजी सचिव विंसेंट जॉर्ज से पटेल की नहीं बनी. जल्दबाज़ी में पटेल ने तब अपना इस्तीफा दे दिया था.
राहुल की पहली पसंद नहीं थे
बिना किसी ज़िम्मेदारी के अहमद एक तरह से कोपभवन में रहे. लेकिन सोनिया गांधी ने ही उन्हें वहां से बाहर निकाला, यह एक तरह से विसेंट जॉर्ज का दबदबा कम होने का संकेत था.
इस दौरान अहमद पटेल को मोतीलाल वोरा और माधवराव सिंधिया का सहयोग मिला और इन दोनों ने 10 जनपथ में उनकी वापसी में मदद की. अहमद पटेल, इसके लिए हमेशा मोतीलाल वोरा के आभारी रहे.
यह भी दिलचस्प है कि जब दिसंबर, 2017 में सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान राहुल गांधी को थमानी शुरू की तब अहमद पटेल राहुल की पहली पसंद नहीं थे.
राहुल गांधी एक बार लंबे समय के लिए अवकाश पर चले गए तो कांग्रेस के अंदर इस बात की खूब चर्चा हुई कि युवा राहुल चाहते हैं कि सोनिया गांधी पुराने लोगों को बाहर करें.
इसमें थोड़ी सच्चाई भी नज़र आई क्योंकि राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस में पार्टी के अहम चेहरा रहे जनार्दन द्विवेदी को जगह नहीं मिली थी.
लेकिन किसी तरह से अहमद पटेल और मोतीलाल वोरा वापसी में कायमाब रहे.
अहमद पटेल और मोतीलाल वोरा को बनाए रखने की कोई वजह होगी, लेकिन पिछले तीन दशकों में देखें तो भारत की सबसे पुरानी पार्टी का भार दो मियां- अहमद पटेल और ग़ुलाम नबी आजाद और अहम पदों पर मौजूद कुछ पुराने नेताओं के कंधों पर रहा.
पार्टी आलाकमान का भरोसा
पार्टी के अंदर पीढ़ीगत बदलाव की बात अहमद के सामने परवान नहीं चढ़ी. कई कांग्रेसी नेता मानते थे कि अहमद और वोरा पदमुक्त किए जाएंगे और उनकी जगह कनिष्क सिंह, मिलिंद देवड़ा या फिर नई पीढ़ी का कोई नेता लेगा जो पार्टी का वित्त प्रबंधन संभालेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.
अगस्त, 2018 में अहमद पटेल कांग्रेस के कोषाध्यक्ष पद पर लौटे. यह एक तरह से अहमद पटेल की अहमियत को साबित करने वाला था.
पार्टी संगठन पर उनके प्रभाव को देखते हुए ही शायद राहुल गांधी ने पार्टी में सुधार लाने या प्रयोग करने के बदले निष्ठा को सम्मानित करने का मन बनाया होगा और यथास्थिति को बनाए रखा.
परंपरागत तौर पर, कांग्रेस मुख्यालय में कोषाध्यक्ष का पद सबसे लोकप्रिय और प्रतिष्ठित माना जाता है.
उमाशंकर दीक्षित, अतुल्य घोष, प्रणब मुखर्जी, पीसी सेठी, सीताराम केसरी और मोतीलाल वोरा जैसों को पार्टी आलाकमान का भरोसा इसलिए भी हासिल रहा क्योंकि उन्हें गोपनीय जानकारी होती थी कि पार्टी फंड में पैसा कहां से आ रहा है और कहां जा रहा है.
ऐसे में समझना मुश्किल नहीं है मौजूदा दौर में सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के बाद कांग्रेस में सबसे सम्मानित शख़्स पार्टी कोषाध्यक्ष के तौर पर अहमद पटेल ही थे.
-अदिति फडनीस
वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
9 अगस्त 2017
(करीब तीन बरस पहले का बीबीसी का यह लेख अहमद पटेल के बारे में बहुत कुछ बताता है)
''अहमद पटेल की हार सोनिया गांधी की हार है, उनकी जीत सोनिया गांधी की जीत है.'', गुजरात में मंगलवार को हुए राज्यसभा चुनाव में हुए सियासी ड्रामे की ख़बरों में ये चर्चा सुनने को मिल रही थी.
यही दिखाता है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल की अहमियत क्या है.
मंगलवार को गुजरात में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए चुनाव हुआ जिसमें कांटे की टक्कर में अहमद पटेल जीत गए.
तो अहमद पटेल इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं?
अहमद पटेल का ये क़द सिर्फ़ इसलिए नहीं है कि वो तीन बार लोकसभा में कांग्रेस के सांसद रहे और पांच बार कांग्रेस की तरफ़ से राज्यसभा सांसद रह चुके हैं, बल्कि कांग्रेस के सबसे शीर्ष परिवार यानी गांधी परिवार के प्रति उनकी वफ़ादारी से उन्हें ये क़द हासिल हुआ है.
बात 1977 की है जब कांग्रेस की हार के घावों से जूझ रहीं इंदिरा गांधी को अहमद पटेल और उनके साथी सनत मेहता ने अपने चुनाव क्षेत्र भरूच बुलाया, इंदिरा गांधी की वापसी की कहानी की शुरुआत इसी दौरे से हुई थी.
लेकिन अहमद पटेल कांग्रेस की पहली पंक्ति में 1980 और 1984 के बीच आए जब इंदिरा गांधी के बाद ज़िम्मेदारी संभालने के लिए बेटे राजीव गांधी को तैयार किया जा रहा था, तब शर्मीली शख्सियत वाले अहमद पटेल राजीव गांधी के क़रीब आए.
राजीव गांधी और सोनिया गांधी
उन दिनों को क़रीब से देखने वाले बताते हैं कि जब भी राजीव गांधी गुजरात के दौरे पर आते तब अहमद पटेल उनके विमान तक सेव-भूसा, चूड़ा और मूंगफली लेकर दौड़ जाते, इन गुजराती खानों को गांधी परिवार ख़ास तौर पर पसंद करता था.
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी 1984 में लोकसभा की 400 सीटों के बहुमत के साथ सत्ता में आए थे. और अहमद पटेल कांग्रेस सांसद होने के अलावा पार्टी की संयुक्त सचिव बनाए गए, उन्हें कुछ समय के लिए संसदीय सचिव और फिर कांग्रेस का महासचिव भी बनाया गया.
नरसिम्हा राव के दौर में किनारे
लेकिन नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने तो गांधी परिवार से अहमद पटेल की नज़दीकी के बावजूद उन्हें किनारे कर दिया गया.
कांग्रेस वर्किंग कमेटी की सदस्यता के अलावा अहमद पटेल को सभी पदों से हटा दिया गया.
कांग्रेस की बात करें तो उन वर्षों में गांधी परिवार का प्रभाव कम हुआ तो परिवार के वफ़ादार क़रीबियों के लिए भी ये मुश्किलों से भरा समय था.
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राजीव गांधी फ़ाउन्डेशन को बजट से 20 करोड़ रुपए का फंड दिलाया लेकिन सोनिया गांधी ने इसे अस्वीकार कर दिया और अहमद पटेल के कंधों पर राजीव गांधी फ़ाउन्डेशन के लिए फंड इकट्ठा करने की ज़िम्मेदारी आई.
जब पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने मंत्री पद की पेशकश की तो उसे पटेल ने ठुकरा दिया. अहमद पटेल गुजरात से लोकसभा चुनाव भी हार गए और उन्हें सरकारी आवास खाली करने के लिए लगातार नोटिस मिलने लगे.
उनकी मित्र नज़मा हेपतुल्ला ने उनके लिए कई सरकारी आवासों के विकल्प खोजे, लेकिन इसके लिए राव सरकार से मंज़ूरी मिलना ज़रूरी था. अहमद पटेल ने नज़मा हेपतुल्ला का शुक्रिया तो अदा किया लेकिन मदद स्वीकार करने से इनकार कर दिया. पटेल के समर्थक कहते हैं कि अगर वो नजमा हेपतुल्ला की मदद स्वीकार कर लेते तो इसका मतलब होता नरसिम्हा राव से मदद लेना. बताया जाता है कि एक बार उन्होंने तिरस्कार से भरे लहज़े में कहा था, ''उस शख्स से? मदद मांगूं?''
अहमद पटेल बहुत धार्मिक बताए जाते हैं, ये भी एक वजह थी कि वो नरसिम्हा राव के दौर में ख़ुद को अलग-थलग महसूस करते थे.
धार्मिक पहचान से दूर
पटेल बाबरी मस्जिद विध्वंस में नरसिम्हा राव की भूमिका को कभी माफ़ी नहीं कर पाए. लेकिन ये भी देखने वाली बात है कि धार्मिक होने के बावजूद वो दाढ़ी और शेरवानी जैसे धार्मिक चिह्नों से दूर रहते हैं.
जिस तरह कांग्रेस के दमदार नेता कमला पति त्रिपाठी ने कहा था कि बाबरी मस्जिद गिराने वाले का पहला कुदाल हमारे सिर पर गिरेगा. उसी तरह अहमद पटेल भी कांग्रेस की परंपरा के मुताबिक हिंदूवाद समेत सभी धर्मों को समझते हैं और स्वीकार करते हैं.
लेकिन ये भी उतना ही सही है कि कांग्रेस की परंपरा में वो बहुत सधे हुए और प्रेरणादायक नेता नहीं हैं.
उनके भाषण मामूली होते हैं और वो किरश्माई नेता नहीं हैं, वो साधारण आदतों वाले सामान्य व्यक्ति हैं.
न ही उनके बच्चों, न ही बहुओं और दामाद ने राजनीति में आने की इच्छा दिखाई है. उनके दामाद वकील हैं लेकिन वो इतना साधारण जीवन जीते हैं कि ज़ाहिर नहीं हो पाता कि वो कांग्रेस के एक बड़े नेता के दामाद हैं. बहुत बड़ा हिसाब-किताब उनके हाथ में होता है लेकिन वो इससे अछूते नज़र आते हैं.
कार्यकर्ताओं में गहरी पैठ
कहते हैं कि राजनीति में वो नेता सफल होते हैं जो लोगों को उनके नाम से पहचानते और याद रखते हैं. अहमद पटेल कांग्रेस के उन कार्यकर्ताओं को जानते हैं, जिनके बारे में किसी ने नहीं सुना.
अहमद पटेल सबको जानते हैं, वो पहले से भांप लेते हैं कि जिनसे वो मिल रहे हैं उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी और वो क्या कहेंगे, उनकी पृष्ठभूमि के बारे में भी जानकारी रखते हैं. उनकी इस याददाश्त के कारण ही पार्टी में वो एक संस्था की तरह हैं.
उनकी कुछ ख़ास आदतें हैं जैसे रात बहुत देर तक काम करना और वो किसी भी कांग्रेस कार्यकर्ता को फ़ोन कर गहरी नींद से उठा कर कोई भी काम सौंप देते हैं.
वो बहुत योजनाबद्ध तरीके से काम करते हैं, एक मोबाइल फ़ोन हमेशा खाली रखा जाता है जिस पर सिर्फ़ 10 जनपथ से ही फ़ोन आते हैं.
अहमद पटेल कभी भी गप नहीं मारते. न ही भावनाओं में बहते हैं. वो नरेंद्र मोदी को एक राजनीतिक चुनौती के तौर पर देखते हैं और मानते हैं कि एक बेहद लोकप्रिय नेता के खिलाफ़ लगातार बयानबाज़ी करना नुकसानदेह ही साबित हो सकता है. नरेंद्र मोदी की चुनौती का सामना करने के लिए वो एक रणनीति के साथ काम करने की बात कहते हैं.
जिस बात के लिए अहमद पटेल की आलोचना हो सकती है वो है कांग्रेस में मुस्लिम नेता की ग़ैरमौजूदगी. उनसे कभी ये सवाल पूछा भी नहीं गया है.
सलमान ख़ुर्शीद को कांग्रेस में मुस्लिम नेता की पहचान बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा. मोहसिना किदवई से कहा गया था कि उन्हें राज्यपाल बनाया जाएगा जिसके बाद वो सक्रिय राजनीति से रिटायर हो जाएंगी लेकिन जब वो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिली तो कुछ और ही संकेत मिला था.
आने वाले पांच साल अहमद पटेल के लिए सक्रिय राजनीति के आख़िरी पांच साल हो सकते हैं. अब कांग्रेस की कमान उपाध्यक्ष राहुल गांधी के हाथ में है जिनकी राजनीति का तरीक़ा अलग है, पटेल इससे कुछ अलग-थलग दिखते हैं.
वो कांग्रेस नेताओं की उस पीढ़ी के हैं जिसका तालमेल कांग्रेस की नई पीढ़ी से आसानी से बैठता नज़र नहीं आता.
बड़ी कंपनियों को बैंक खोलने की अनुमति देने के आरबीआई के प्रस्ताव के नतीजे कैसे होंगे? क्या कॉरपोरेट घरानों के बैंक भारतीय बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत करेंगे और क्या खाताधारकों की जमा-पूंजी को सुरक्षित रखेंगे?
डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय का लिखा
आरबीआई की एक समिति ने बड़े कॉरपोरेट और औद्योगिक घरानों को बैंक खोलने की अनुमति देने का प्रस्ताव दिया है. साथ ही इस समिति ने बड़ी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को बैंक में बदलने की अनुमति देने का भी प्रस्ताव दिया है. केंद्रीय बैंक के इंटरनल वर्किंग ग्रुप (आईडब्ल्यूजी) द्वारा दिए गए इन प्रस्तावों पर 15 जनवरी, 2021 तक प्रतिक्रिया स्वीकार की जाएगी और उसके बाद आरबीआई अपना फैसला सुना देगी.
आरबीआई का क्या फैसला होगा यह इस समय कहना मुश्किल है, लेकिन कई जानकार इस प्रस्ताव पर आपत्ति जता रहे हैं. बीते कुछ सालों में पीएमसी बैंक, यस बैंक और लक्ष्मी विलास जैसे बैंकों की वित्तीय हालत बेहद खराब हो गई और आरबीआई को उनका नियंत्रण अपने हाथों में ले लेना पड़ा.
दूसरे बैंक भी ऐसे हाल तक तो नहीं पहुंचे हैं लेकिन बड़े-बड़े ऋण के ना चुक पाने के कारण सबका वित्तीय स्वास्थ्य अच्छा नहीं है. एसबीआई और एचडीएफसी जैसे शीर्ष बैंक भी इस समस्या से जूझ रहे हैं. ऐसे में पूरा बैंकिंग क्षेत्र अनिश्चिततताओं से गुजर रहा है और तरह तरह के सुधारों का प्रस्ताव दिया जा रहा है.
बीते कुछ सालों में पीएमसी बैंक, यस बैंक और लक्ष्मी विलास जैसे बैंकों की वित्तीय हालत बेहद खराब हो गई और आरबीआई को उनका नियंत्रण अपने हाथों में ले लेना पड़ा.
इस प्रस्ताव की भी यही पृष्ठभूमि है, लेकिन कई जानकारों ने इस से असहमति जताई है. यहां तक की आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने भी इस प्रस्ताव का विरोध किया है. उनके अनुसार आईडब्ल्यूजी ने जितने विशेषज्ञों से सलाह ली थी उनमें से एक को छोड़ सबने प्रस्ताव का विरोध किया था और इसके बावजूद समूह ने प्रस्ताव की अनुशंसा कर दी.
दोनों अर्थशास्त्रियों का कहना है कि कॉरपोरेट घरानों को बैंक खोलने की अनुमति देने से "कनेक्टेड लेंडिंग" शुरू हो जाएगी. "कनेक्टेड लेंडिंग" यानी ऐसी व्यवस्था जिसमें बैंक का मालिक अपनी ही कंपनी को आसान शर्तों पे लोन दे देता है. राजन और आचार्य के अनुसार इससे "सिर्फ कुछ व्यापार घरानों में आर्थिक और राजनीतिक सत्ता के केन्द्रीकरण की समस्या और बढ़ जाएगी."
लेकिन आईडब्ल्यूजी के प्रस्ताव से बैंकिंग लाइसेंस पाने की इच्छुक कंपनियों में उत्साह है. भारत में 1980 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था और उसके बाद 1993 में निजी कंपनियों को बैंक खोलने की अनुमति दी गई थी. तब से कई बड़े औद्योगिक घराने बैंक खोलने का लाइसेंस मिलने की राह देख रहे हैं.
पिछले कुछ सालों में इन सभी ने एनबीएफसी भी खोल लिए हैं, जिनमें बजाज फिनसर्व, एम एंड एम फाइनेंस, टाटा कैपिटल, एल एंड टी फाइनैंशियल होल्डिंग्स, आदित्य बिरला कैपिटल इत्यादि शामिल हैं. लेकिन कई जानकार 2007-08 के वैश्विक वित्तीय संकट की भी याद दिला रहे हैं जिसके बाद कई देशों में कॉरपोरेट घरानों द्वारा चलाए जाने वाले बैंकों के प्रति संदेह उत्पन्न हो गया था.


