विचार/लेख
"क्या आप कुछ मिनटों तक इंतज़ार कर सकते हैं जब तक मैं मीना को फ़ोन देती हूँ? मुझे उसे आपके बारे में बताना होगा ताकि वो आपसे बात करने में हिचके नहीं."
मैंने जवाब दिया, "ठीक है, कोई समस्या नहीं है."
अरुणा तिर्की ने यह कहते हुए दो मिनट के बाद किसी को फ़ोन दिया. फ़ोन पर उधर से एक महिला की आवाज़ आई, "हैलो! नमस्ते! हम मीना लिंडा बोल रहे हैं."
मीना लिंडा अपने परिवार की अकेली कमाने वाली शख़्स हैं. उनके परिवार में बीमार पति (50 साल) के अलावा एक बेटा (18 साल) और तीन बेटियाँ (एक 19 और दो 18 साल की) हैं. दोनों छोटी बेटियाँ जुड़वा हैं.
2016 तक उनकी ज़िंदगी मुश्किलों भरी थीं. उनके दिन की शुरुआत छह बजे सुबह से हो जाती थी. वो छह बजे सुबह उठ कर रांची में पहाड़ी मंदिर जाने वाले श्रद्धालुओं को चढ़ावा बेचने का काम करती थीं.
इसके बाद वो दिहाड़ी पर जो काम मिल जाए वो करती थीं. लेकिन काम मिलने में कठिनाई होती थी और आमदनी भी अनियमित होती थी. रोज़गार का स्थायी बंदोबस्त नहीं होने और पारिवारिक ज़िम्मेदारी बढ़ने की वजह से लिंडा के हालात दिन प्रतिदिन ख़राब होते जा रहे थे.

रेस्टोरेंट खोलने का विचार
साल 2016 में मीना की मुलाक़ात 46 साल की अरुणा तिर्की से हुई. वो एक ग्रामीण विकास पर काम करने वाली पेशेवर हैं जो अब अपना व्यवसाय करती हैं. उस वक्त संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और पुअरेस्ट एरियाज सिविल सोसायटी (पीएसीएस) में काम करने के बीच उनके पास एक साल का ख़ाली अंतराल था जिसमें वो एक महिला उद्यमी के तौर पर रांची में मोमो और हैदराबादी बिरयानी बेचने का अनुभव ले रही थीं. अरुणा ने मीना लिंडा को तभी अपनी मदद के लिए अस्थायी तौर पर नौकरी पर रखा.
बाद में अरुणा ने यूएनडीपी में काम करते हुए दुनिया के मूल निवासियों के अंतरराष्ट्रीय दिवस पर खाने पकाने की प्रतियोगिता में हिस्सा लिया. हर साल 9 अगस्त को इसका आयोजना होता है. इस प्रतियोगिता में उन्हें पहला स्थान प्राप्त हुआ. ये उनके लिए ज़िंदगी बदलने वाला लम्हा साबित हुआ. उन्होंने तभी आदिवासी खाने की महत्ता को समझा और तेज़ी से ग़ायब होते आदिवासी खानों को बचाने की मुहिम में लग गईं.
2018 में तिर्की ने अजम एम्बा नाम से एक रेस्टोरेंट खोला. अजम एम्बा का कुदुख भाषा में मतलब होता है 'शानदार स्वाद'. कुदुख उरांव आदिवासियों की भाषा है. यह रेस्टोरेंट रांची के कांके रोड पर स्थित है.
देशी महिलाएँ इस रेस्टोरेंट को चलाती हैं. इस रेस्टोरेंट का मक़सद भारतीय पारंपरिक खानों को बचाना है.
आदिवासी संस्कृति और पहचान बचाने की कोशिश

यहाँ काम करने वाली महिलाएँ खाना बनाने के साथ यह भी सीखती हैं कि कैसे वो खाने बनाने के अपने हुनर को एक कामयाब व्यवसाय में तब्दील करें. बहुत जल्दी ही मीना लिंडा इस रेस्टोरेंट की एक अहम सदस्य बन गईं.
दूसरे रेस्टोरेंट से अलग यह रेस्टोरेंट खाने के माध्यम से आदिवासी संस्कृति और पहचान को बचाने की कोशिश में लगा हुआ है. यहाँ सालों भर आदिवासी खाना मिलता है. रांची के दूसरे महंगे होटल और रेस्टोरेंट झारखंड दिवस वाले हफ्ते में ही केवल पारंपरिक खाना परोसते हैं. हर साल 15 नवंबर को झारखंड दिवस मनाया जाता है.
इस रेस्टोरेंट के मेनू में कई तरह के विकल्प मौजूद होते हैं. इसमें गेटु फिश करी, देसी मागुर करी, घोंघी तियान वेज, सानेई फूल भर्ता, कोईनार फूल भर्ता, जूट फ्लावर करी और मार झोर जैसे डिश मौजूद हैं.
रेस्टोरेंट इस बात का ख्याल रखता है कि ग्राहकों के पसंद के हिसाब से कुछ भी छूट ना जाए. आदिवासी तरीक़े से खाने से लेकर आवभगत तक सब का ख्याल रखा जाता है. किचन में काम करने वाले स्टाफ़ मिट्टी के बर्तन का इस्तेमाल करते हैं. वो खाना परोसने के लिए पत्ते या फिर तांबे के बर्तन का इस्तेमाल करते हैं.
रेस्टोरेंट में आने वाले ग्राहकों का स्वागत आकर्षक सोहराई पेंटिंग्स और पारंपरिक संगीत के साथ किया जाता है. रेस्टोरेंट की दीवारों पर मिट्टी का लेप लगा हुआ है तो वहीं बांस और गन्ने की मदद से इसे सजाया गया है. इसके अलावा अजम एम्बा रागी मोमो, वाइल्ड राइस डम्पलिंग और रागी क्रेप्स को आदिवासी तरीक़े में ढाल कर पेश किया जाता है.
आदिवासी खाना जब बना स्टेटस सिम्बल

गेटु मछली के साथ जिरहुल फूल
इन डिश को मेनू में शामिल करने के दो मक़सद हैं. पहला मक़सद युवाओं को आकर्षित करना है तो दूसरा मक़सद मेनू को ऐसा बनाना है जिससे लोग ज्यादा जुड़ाव महसूस करें.
अरुणा तिर्की को ग्राहकों से जो फ़ीडबैक मिलता है उसके हिसाब से इन डिशेज़ को लाल चावल के सूप के साथ ज़रूर हर किसी को एक बार खाना चाहिए. लाल चावल के सूप को पारंपरिक तौर पर 'चाकोर झोल' कहते हैं.
ये पूछने पर कि क्या झारखंड में ये पारंपरिक खाने आसानी से उपलब्ध है? इस पर तिर्की कहती हैं कि इन्हें बनाने वाली चीज़ें तो मिल जाती हैं लेकिन वे इसका इस्तेमाल या तो चिकित्सीय उद्देश्य से करते हैं या फिर अल्कोहल (चावल से बनने वाला मद्य पेय पदार्थ) बनाने के लिए करते हैं.
अपने पारंपरिक खानों को लेकर जानकारी नहीं होने की वजह से ऐसे हालात बने हुए हैं. तिर्की इसकी एक और वजह बताती हैं कि आम तौर पर मड़ुआ और गोंदली आदिवासियों में खाया जाता है लेकिन वो इसे आजकल एक ख़ास तरह की वर्ग चेतना विकसित होने की वजह से मानने में शर्म महसूस करते हैं.
अरुणा तिर्की और मीना लिंडा दोनों ही उरांव जनजाति से आती हैं. उरांव जनजाति मुख्य तौर पर झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में रहने वाली जनजाति है. अरुणा और मीना दोनों ने ही बचपन से ऐसे खाने खाए हैं जो स्थानीय तौर पर आसानी से उपलब्ध रहे हैं. अरुणा बचपन से किचन में अपनी मां की खाना बनाने में मदद करती रही हैं. इससे उनके अंदर खाना बनाने को लेकर एक रूचि पैदा हुई.

गोरगोरा रोटी मटन हांडी के साथ
अरुणा तिर्की कहती हैं कि आदिवासी भारत के मूल निवासी हैं और उनके खाने मुख्य तौर पर जंगल में मिलने वाली चीज़ों पर आधारित है. वो बताती हैं कि उनके पूर्वज गोंदली चावल (जंगली चावल), मड़ुआ (रागी), बाजरा और महुआ खाते थे. हालांकि हरित क्रांति (60 और 70 के दशक) के दौरान गेहूँ और सफ़ेद चावलों का उत्पादन बड़े पैमाने पर शुरू हुआ और इसने पारंपरिक खाने की जगह ले ली.
जब अरुणा ने शहरी दुकानों में बाजरे का विज्ञापन ऊंची क़ीमतों पर होते देखा तो उन्हें लगा कि इतनी क़ीमत पर तो उनके समुदाय के कई लोग इसे ख़रीद ही नहीं पाएंगे. अरुणा ने तब इसे लेकर कुछ करने की सोची. बाद में अजम एम्बा के रूप में उनकी इस दिशा में कुछ करने की सोच साकार हुई.
वो कहती हैं कि, "आज गोंदली और मड़ुआ अमीरों के लिए स्टेटस सिम्बल बना हुआ है लेकिन एक ऐसा वक़्त था जब इसे पिछड़ेपन की निशानी माना जाता था. इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ने वाले मेरे चाचों के लिए यह मानना असहज करने वाला था कि वे इन्हें खाते हैं. क्योंकि उन्हें इस बात का डर होता था कि इस आधार पर उनसे भेदभाव किया जाएगा. हालांकि जब ये ऊंचे वर्ग के लोगों के खाने के प्लेट का जब हिस्सा बन गया तो स्टेटस सिम्बल बन गया."
अरुणा बताती हैं कि इस बात को लेकर उन्हें कोई समस्या नहीं झेलनी पड़ी कि उनका रेस्टोरेंट जातीय व्यवस्था में पिछड़े माने जाने वाले लोगों की मदद से चलाया जा रहा है. उनके यहाँ आने वाले ग्राहकों में आदिवासियों से कहीं ज्यादा ग़ैर-आदिवासी लोग हैं. वे पर्यटक जो आदिवासी खाना खाना चाहते हैं उनके लिए उनका रेस्टोरेंट एक ज़रूर पहुँचने वाली जगह बन गई है.
शर्मिंदगी की जगह गर्व की अनुभूति

मड़ुआ का लड्डू
आदिवासियों ख़ासतौर पर युवा पीढ़ी में अब अपने खाने पर शर्मिंदगी की जगह गर्व की अनुभूति पैदा हो रही है. वो अपने खाने को अब पिछड़ेपन के तौर पर नहीं देख रहे हैं.
अरुणा के सामने असल चुनौती पैसे को लेकर है. उन्हें बैंक या सरकार से कोई मदद नहीं मिल पा रही है. वो कहती हैं, "बैंक अजम एम्बा जैसे छोटे स्तर के व्यवसाय को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए तैयार नहीं हैं. जबकि इस व्यवसाय का भविष्य उज्ज्वल दिखाई पड़ रहा है. सरकार के स्तर पर योजनाएँ जरूर काग़ज़ पर मौजूद हैं लेकिन वास्तव में इसे कभी लागू नहीं किया गया है."
कोरोना वायरस की वजह से लगे लॉकडाउन में अजम एम्बा को भी मजबूरन छह महीने तक बंद रखना पड़ा. चूंकि इस रेस्टोरेंट के ज्यादातर स्टाफ़ हाशिए के समाज या ग्रामीण क्षेत्र से आते हैं इसलिए वो पूरी तरह से रेस्टोरेंट से मिलने वाली सैलरी पर निर्भर हैं. अरुणा के दिमाग में कभी भी सैलरी काटने या उन्हें काम से निकालने का विचार नहीं आया. उन्होंने हर किसी को सैलरी देना जारी रखा.
हालांकि सितंबर से फिर से रेस्टोरेंट खुलना शुरू हुआ लेकिन इसकी कमाई आम तौर पर होने वाली कमाई की तुलना में 25-30 फ़ीसद कम हो गई है.
मीना लिंडा ने बातचीत ख़त्म करते वक़्त कहा कि वो अब बहुत संतुष्ट और ख़ुश हैं.
अरुणा तिर्की के साथ काम करने से पहले वो कोई भी काम जो उन्हें मिलता था वो कर लिया करती थीं इस बात की परवाह किए कि उन्हें उसके बदले कितने पैसे मिलेंगे.
अब उनके पास एक स्थायी आमदनी है. वो अपने बच्चों को पढ़ाना चाहती हैं. उन्हें अपने गांव का वार्ड सदस्य भी मनोनित किया गया है. जब उनसे पूछा गया कि उनकी ज़िंदगी में सबसे बड़ा बदलाव क्या आया है तो उन्होंने बड़ी सहजता से कहा, "अब बच्चे कुछ खाने के लिए मांगते हैं तो हम दे पाते हैं. हमारे लिए सबसे ख़ुशी की बात यही है." (bbc)
-गिरीश मालवीय
ब्रिटेन वालों को वायरस का एक और नया स्ट्रेन मिला है। यह कुछ दिनों पहले मिले दूसरे स्ट्रेन से भी ज्यादा संक्रामक है, भारत समेत सारी दुनिया ब्रिटेन आने-जाने को प्रतिबंधित कर रही है और ब्रिटेन वाले कह रहे हैं कि ये नया स्ट्रेन दक्षिण अफ्रीका से आया है। वे दक्षिण अफ्रीका की फ्लाइट पर बैन लगा रहे हैं !
मतलब यह चल क्या रहा है ?
सबसे बड़ी बात तो यह है कि क्या वायरस में यह म्यूटेशन होना दिसंबर में ही शुरू होगा? ‘अरे भाई ये म्यूटेशन तो वायरस में शुरू से ही हो रहा है आप क्या सोचते है कि वायरस इस बात का इंतजार कर रहा होगा कि कब डब्ल्यूएचओ घोषणा करे और मंै म्यूटेशन की प्रक्रिया स्टार्ट कर लूं।’
आपको याद नहीं होगा इसलिए मैं याद दिला देता हूँ जब अप्रैल 2020 में इंदौर-गुजरात में मौत के आंकड़े अचानक तेजी से बढ़े तो कहा गया था कि इसकी वजह कोरोना का एल-स्ट्रेन वायरस हो सकता है।
विशेषज्ञों के हवाले से उस वक्त यह कहा जा रहा था कि देश में कोरोनावायरस के तीन स्ट्रेन पता चले हैं। इनमें दो सबसे घातक स्ट्रेन हैं, एल-स्ट्रेन और एस-स्ट्रेन। वुहान से आया वायरस एल-स्ट्रेन है। यही ज्यादा घातक है। इससे संक्रमित होने वाले मरीज की मौत जल्दी हो जाती है। एस-स्ट्रेन का वायरस एल-स्ट्रेन के म्युटेशन से ही बना है। यह कम घातक है। केरल में अधिकांश मरीज दुबई से आए थे। वहां एस-स्ट्रेन है। संभवत: इसीलिए केरल में कम जानें गईं।
लेकिन जब उस वक्त आईसीएमआर से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने साफ मना कर दिया कि वायरस में कोई म्यूटेशन हो रहा है। तब यह भी कहा जा रहा था कि यदि बार बार वायरस में म्यूटेशन हो यानी वायरस के जेनेटिक स्ट्रक्चर में बदलाव होता रहे तो टीका काम नहीं करेगा।
अब कमाल यह हुआ है कि नए नए स्ट्रेन तो मिल रहे है लेकिन सारे टीके अब काम बराबर करेंगे चाहे वह एमआरएनए तकनीक से बनाए गए हो चाहे एडिनो वायरस से चाहे मृत वायरस की पुरानी टेक्नीक से?
सच तो यह है कि शुरू से ही यह वायरस म्यूटेंट हो रहा है। अप्रैल 2020 में ही चीन के होनजोऊ स्थित झेजियांग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर लांजुआन और उनकी टीम ने पता लगाया इस वायरस के 30 अलग म्यूटेशन पाए जिसमें से अब तक 19 के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। प्रोफेसर ली ने अपने शोधपत्र में कहा था बकि सार्स कोव-2 ने खुद में ऐसे म्यूटेशन किए हैं जिससे वह अपनी घातकता बदल पा रहा है।
साफ है कि वायरस में म्यूटेशन होना कोई नही बात नहीं है लेकिन आपको इस वक्त इसलिए डराया जा रहा है ताकि आप अपनी नोकरी से, अपने व्यापार से, अपनी रोजी-रोटी से जो हाथ धो रहे हैं उसका आपको अफसोस न हो तो मितरो रोज रोज डरिये ओर मोदीजी की जय-जयकार कीजिए उन्होंने आपकी जान बचा ली अगर मोदीजी नही होते तो आप अब तक मर जाते!....
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
जम्मू-कश्मीर के जिला विकास परिषद के चुनाव-परिणामों का क्या अर्थ निकाला जाए ? उसकी 280 सीटों में से गुपकार गठबंधन को 144 सीटें, भाजपा को 72, कांग्रेस को 26 और निर्दलीयों को बाकी सीटें मिली हैं। असली टक्कर गुपकार मोर्चे और भाजपा में है। दोनों दावा कर रहे हैं कि उनकी विजय हुई है। कांग्रेस ने अपने चिन्ह पर चुनाव लड़ा है लेकिन वह गुपकार के साथ है और निर्दलीयों का पता नहीं कि कौन किसके खेमे में जाएगा। गुपकार मोर्चे के नेता डॉ. फारुक अब्दुल्ला का कहना है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों ने धारा 370 और 35 ए को खत्म करने के केंद्र सरकार के कदम को रद्द कर दिया है। इसका प्रमाण यह भी है कि इस बार हुए इन जिला चुनावों में 51 प्रतिशत से ज्यादा लोगों ने मतदान किया। 57 लाख मतदाताओं में से 30 लाख से ज्यादा लोग कड़ाके की ठंड में भी वोट डालने के लिए सडक़ों पर उतर आए। वे क्यों उतर आए ? क्योंकि वे केंद्र सरकार को अपना विरोध जताना चाहते हैं। अंदाज लगाया जा रहा है कि अब 20 जिला परिषदों में से 13 गुपकार के कब्जे में होंगी। गुपकार-पार्टियों ने गत वर्ष हुए दो स्थानीय चुनावों का बहिष्कार किया था लेकिन इन जिला-चुनावों में उसने भाग लेकर दर्शाया है कि वह लोकतांत्रिक पद्धति में विश्वास करती है। इसके बावजूद उसे जो प्रचंड बहुमत मिलने की आशा थी, वह इसलिए भी नहीं मिला हो सकता है कि एक तो उसके नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के तीखे आरोप लगे, उनमें से कुछ ने पाकिस्तान और कुछ ने चीन के पक्ष में अटपटे बयान दे दिए। इन पार्टियों के कुछ महत्वपूर्ण नेताओं ने अपने पद भी त्याग दिए। इतना ही नहीं, पहली बार ऐसा हुआ है कि कश्मीर की घाटी में भाजपा के तीन उम्मीदवार जीते हैं। पार्टी के तौर पर इस चुनाव में भाजपा ने अकेले ही सबसे ज्यादा सीटें जीती हैं लेकिन जम्मू-क्षेत्र में 70 से ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद उसकी सीटें कम हुई हैं। उसका कारण शायद यह रहा हो कि इस बार कश्मीरी पंडितों ने ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया और भाजपा ने इस बार विकास आधारित रचनात्मक अभियान पर कम और गुपकार को सिर्फ बदनाम करने में ज्यादा ताकत लगाई। अब यदि ये जिला-परिषदें ठीक से काम करेंगी और उप-राज्यपाल मनोज सिंह उनसे संतुष्ट होंगे तो कोई आश्चर्य नहीं कि नए साल में जम्मू-कश्मीर फिर से पूर्ण राज्य बन जाएगा।
(नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
20 दिसंबर को कांग्रेस के नेता श्री मोतीलाल वोरा का 93 वाँ जन्म दिन था और 21 दिसंबर को उनका निधन हो गया। वे न तो कभी राष्ट्रपति बने और न ही प्रधानमंत्री लेकिन क्या बात है कि लगभग सभी राजनीतिक दलों ने उनके महाप्रयाण पर शोक व्यक्त किया ? यह ठीक है कि वे देश या कांग्रेस के किसी बड़े (सर्वोच्च) पद पर कभी नहीं रहे लेकिन वे आदमी सचमुच बड़े थे। उनके- जैसे बड़े लोग आज की राजनीति में बहुत कम हैं।
वोराजी जैसे लोग दुनिया के किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में आदर्श नेता की तरह होते हैं। वे अपनी पार्टी और विरोधी पार्टियों में भी समान रुप से सम्मानित और प्रिय थे। वे नगर निगम के पार्षद रहे, म.प्र. के राज्यमंत्री रहे, दो बार वहीं मुख्यमंत्री बने, उ.प्र. के राज्यपाल बने और चार बार राज्यसभा के सांसद रहे। कांग्रेस पार्टी के वे 18 वर्ष तक कोषाध्यक्ष भी रहे। असलियत तो यह कि ज्यादातर नेताओं की तरह उनमें न तो अहंकार था और न ही पदलिप्सा। उन्हें जो मिल जाए, उसी में वे खुश रहते थे। उनकी दीर्घायु और सर्वप्रियता का यही रहस्य है। उनका-मेरा संबंध पिछले लगभग 60 वर्षों से चला आ रहा था। वे रायपुर में सक्रिय थे और मैं इंदौर में। मैं कभी किसी दल में नहीं रहा लेकिन वोराजी डॉ. राममनोहर लोहिया की संयुक्त समाजवादी पाटी के कार्यकर्ता थे। मुझे जब अखिल भारतीय अंग्रेजी हटाओ सम्मेलन का मंत्री बनाया गया तो मैंने वोराजी को म.प्र. का प्रभारी बना दिया। जब मैंने नवभारत टाइम्स में काम शुरु किया तो उन्हें अपना रायपुर संवाददाता बना दिया। वे इतने विनम्र और सहजसाधु थे कि जब भी मुझसे मिलने आते तो मेरे कमरे के बाहर चपरासी के स्टूल पर ही बैठ जाते थे। मुख्यमंत्री के तौर पर वे बिना सूचना दिए ही मेरे घर आ जाते थे। 1976 में मैंने जब हिंदी पत्रकारिता का महाग्रंथ प्रकाशित किया तो उन्होंने आगे होकर सक्रिय सहायता की। स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर उन्होंने पत्रकारों के इलाज में सदा फुर्ती दिखाई। वे उम्र में मुझसे काफी बड़े थे लेकिन राज्यपाल बन जाने पर भी मुझे भरी सभा में ‘बॉस’ कहकर संबोधित करते थे। वे मेरे संवाददाता थे और मैं उनका सम्पादक लेकिन मैं हमेशा उनके गुण एक शिष्य या छोटे भाई की तरह ग्रहण करने की कोशिश करता था। वोराजी को मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि!
(नया इंडिया की अनुमति से)
2020 खत्म होने को है। बीते महीने न जाने कहां निकल गए। रह-रह कर कई बार मार्च का वह महीना, जब पहली बार जनता कर्फ्यू लगा था, याद आता है। बिलकुल अनजाना, अज्ञात समय। मालूम नहीं पड़ता था कि आगे क्या होने वाला है। न जाने कितने तरह के भय एवं अनिश्चितताएं थीं, वातावरण में। कुछ रोज बाद जब लॉकडाउन लग गया था, तब लगता था कि कुछ हफ्ते, अथवा महीनों की ही तो बात है। फिर धीरे-धीरे सच्चाई से वास्ता होने लगा था कि यह कुछ महीनों की बात कहां है?
पहले कुछ दिन अपने पक्षियों को मैं उनका पसंदीदा दाना नहीं डाल पाई थी। वो इसलिए कि उनका मनपसंद बाजरा जो खत्म हो चला था। याद करें तो पहले कुछ रोज, माहौल में इतनी अनिश्चितिता थी कि यही मालूम नहीं पड़ता था कि कब, कहां, और कैसे दोबारा वो जाना-पहचाना समय वापिस आएगा? कि किसी चीज का यदि अभाव था, तो भी बेफिक्र रहे। उन दिनों तो 'एसेंशियल सर्विसेज' क्या हैं, बस यही ध्यान रहता था। खैर, बाजरा के अभाव में मैं चावल अपने चहेते तोतों, मैना, कबूतरों, और गौरैयाओं को मुंडेर पर परोस आती थी।
याद करें तो एक अजब सा सन्नाटा होता था, शुरुआत के कुछ दिन। एक बहुत भयभीत करने वाली शान्ति हवा में, जो चित्त को विचलित कर देती! बाहर पुलिस की गाड़ियों की आवाज के अलावा चारों तरफ सन्नाटा ही तो छाया रहता था। ऐसे लगता, मानो सभी एक लम्बे मौन-व्रत में जा चुके हों। घाटियों एवं पहाड़ों वाली शान्ति तो सबको पसंद है, लेकिन ऐसी शान्ति किस काम की, जो डरा जाए? पक्षिओं की बेफिक्र चहचहाहट भी मुश्किल से ही सुनने को मिलती। एकदम से ऐसा लगता मानों यहां होते हुए भी सब से बिछड़ गए हों!
टी.वी .पर एंकर खुले आकाश और साफ हवा की तस्वीरें दिखाने में व्यस्त होते। यह बिलकुल शुरुआत के दिनों की ही बात है। शायद मार्च के महीने की। घर में मम्मी-पापा की, हर वक्त चिंता सताती रहती। उस समय सिर्फ इटली की ही खबरें आती थीं। भैया, स्विट्जरलैंड से आश्वासन दिया करते कि घबराने की कोई जरुरत नहीं, लेकिन कभी-कभी मैं बहुत डर जाती। दिल्ली में और कोई रहता भी तो नहीं। फिर व्याकुलता में मन का आप पर कहां नियंत्रण रहता है।
पहले का एक हफ्ता इन्ही संवादों के बीच आप से चला। अजीब सी उलझने रहतीं। मतलब यह कहां लाकर पटक दिया सृष्टि ने? अभी कल ही तो एक प्रोजेक्ट के लिए बाहर निकल महिलाओं से बातचीत कर रही थी। बसंत के मौसम की बारिश में आजाद घूम रही थी। सेमल के गाढ़े, लाल फूलों को निहार रही थी। फिर अप्रैल में वर्धा और यवतमाल भी जाना था, किसानों से मिलने और जुलाई में छोटे अंतरिक्ष से भी तो मिलना है। शुरू के 2-3 हफ्ते बेवजह के भय और तमाम तरह के विचार आते रहते। मैं पापा से कहती, जहां मीटिंग्स के लिए जाती हूं, वहां तो तथाकथित 'सोशल डिस्टन्सिंग' और बार-बार हाथ धोना असंभव सा ही लगता है?
इन सबका क्या सत्य है? क्या पता क्योंकि हम तो वैसे भी पोस्ट-ट्रूथ वर्ल्ड आर्डर में ही जी रहे हैं। सबके लिए हर चीज के आशय एवं परिभाषाएं अलग-अलग हैं। इसीलिए 'कम्युनिकेशन' भी सब के लिए अलग-अलग है। जैसे हमारे संवाद, व्यवहार, हर समय खबरें देखने की आदतें, सबके लिए अलग-अलग हैं। फिर सबके लिए इस 'वर्क फ्रॉम होम' के अलग मायने हैं। आखिर घर पर भी तो वही बैठ सकते हैं, जो भरे-पेट होते हैं, अपने ही एक 'कैपिटलिज्म' अथवा 'पूंजीवाद' में जो शामिल होते हैं। फिर अधिकतर मिडिल क्लास की अपनी ही एक अजब व्यवहार-कुशलता दिखाई पड़ती है, जो मानवता पर सवाल तो खड़े करती ही है, लेकिन कई बार अनकहे जवाब भी दे जाया करती है।
अब इसी वाक्ये को लीजिये।
अपने इन्हीं ख्यालों और काम के बीच खोयी, मैं अपनी एक मोगरा की लहराती हुई बेल के बारे में तो भूल ही गई थी। मोगरा की वह बेल घर से थोड़ी दूर सड़क के एक कोने पर है। अब क्योंकि लॉकडाउन में हर जगह जाना मना था, तो मैंने एक अंकल, जो सड़क के उस किनारे रहते हैं, उनको फोन करके उनसे अपनी परेशानी व्यक्त की। मैंने कहा कि मेरी वह बेल मर जाएगी, तो प्लीज वे मुझे बता दें, कि उसकी सेवा कैसे हो? साल दर साल उसमें पानी देती आई हूं। उन्होंने मुझे कहा कि वे उसमे पानी दे देंगे और मैं बिलकुल भी घबराऊँ नहीं।
अब पहले ही इतना परेशान करने वाला सन्नाटा ! टी.वी. पर हर एक मिनट पर कोरोना के आंकड़े! एक अलग तरह का अकेलापन हवा में। इन सबके बीच मन कैसे व्याकुल न हो? वैसे भी विश्वास का अभाव तो समाज में पनपता ही जा रहा था। कि ऊपर से कोरोना के भय की मेहरबानी और हो गयी। जिस इंसान को हर समय सड़क पर होने वाले शोर-शराबे, कहीं भी खड़े होकर चाय पीने, और प्रकृति की शान्ति में ही अपना अस्तित्व आसानी से मिल जाता हो, उसके लिए इस घुटन में कुछ भी समझ पाना बहुत असंभव सा था।
और वैसे भी गर्मी के मौसम में चंद दिन के लिए ही तो तारों जैसा मोगरा हमसे मिलने आया करता है। जैसे मानो खुले आकाश में कई रोज कुछ तारे समय-समय पर दिखते हैं, और बाकी साल ओझल रहते हैं। जब बहुत छोटी थी, 1997 में, तो एक बार फ्रिसबी खेलते-खेलते एक धूमकेतु दिखाई पड़ा था। पूरे आकाश को उसकी श्वेत आभा ने प्रकाशित कर दिया था। ठीक उसी तरह जैसे अंधेरे में हम उम्मीद की एक लौ ढूंढ़ते रहते हैं। बिलकुल वैसे ही तो मोगरा गर्मियों की सुबह-सवेरे हमसे मिलने आया करता है।
सफ़ेद फूलों की गहराई को शब्दों में व्यक्त करना तो व्याख्यायों एवं श्वेत रंग की तौहीन करने के बराबर है। वो इसलिए कि बेरंग फूल हमें देखते हुए, हमसे हर पल मुस्काने के लिए ही तो कहते आए हैं। फिर मोगरा को तो वैसे भी किसी से कुछ कहने की जरुरत नहीं, उसकी तो सुगंध ही अपने-आप में हमें एक गहरे ध्यान में ले जाने के लिए काफी है।
उन दिनों मैं हर रोज रात को पूजा करने से पहले एक बार उससे माफी मांग सो जाती, कि दोस्त माफ करना मैं तुम्हें पानी नहीं दे पा रही हूं, आजकल। काश तुम्हे न्यूज समझ आती। काश हम और तुम बात कर सकते और कोरोना को ले दुःख सुख बांट सकते।
जब भी कभी कोई नुकसान कर देता है तो पापा हमेशा समझाया करते हैं कि दुनिया में अच्छे लोग भी तो हैं, हमेशा अच्छा-अच्छा सोचो, और बुराई को मत याद रखो। यह सत्य ही तो है कि इन वाक्यों के आशय हमें बड़े होने पर ही समझ आते हैं। समझदारी, रिएक्शंस, 'सरकासम' एवं आलोचना की दुनिया से कोसों दूर! हालांकि इनके महत्व को ट्विटर के लड़ाई-झगड़े की दुनिया में टटोलना मुश्किल है। परन्तु कोरोना ने बखूबी इन मूल्यों को हमारे सामने ला खड़ा कर दिया है।
दिन बीतते गए। कुछ रोज बाद अंकल ने दरवाजे की घंटी बजायी। यकीन मानिये अपने ऊपर शर्म भी आयी, जब उन्होंने मोबाइल फोन में फोटो दिखाई और कहा 'यह लो बिटिया, तुम्हारा मोगरा। सब ठीक है न?' कह वे मुस्कराते हुए चल दिए।
उनके इस खुशनुमा व्यवहार और सहजता से मैं भी प्रज्ज्वलित हो उठी, लेकिन एक स्तब्धता में भी डूब गयी।सोचने लगी चाहे कितनी ही परेशानियां क्यों न आयी हों, आखिर विश्वास ही तो है जो अंत में काम आता है। फिर चाहे हम और आप अपने शीशे के महलों में बैठ कितने ही 'आर्टिफिशल इंटेलिजेंस' और 'फोर्थ इंडस्ट्रियल रेव्लुशन' मतलब चौथी औद्योगिक क्रांति के ढोल पीटते रह जाएं। कितने ही अलेक्सा और सीरी आएंगे और जाएंगे। लेकिन रह जाएंगी तो इंसान की मानवीय संवेदनाएं।
नया साल आने वाला है। वैक्सीन का ज्यादा कुछ मुझे समझ नहीं आता, लेकिन यह पता है कि इस बार फिर से उस बेल पर फूलों की बहार आएगी। (downtoearth)
-विवेक मिश्रा
बीते दो दशकों में बाहरी वातावरण के वायु प्रदूषण के कारण मृत्यु दर में 115 फीसदी तक बढ़ोत्तरी हुई है।
एक तरफ सरकारें लगातार वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों को नकार रही हैं तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संबंधी रिपोर्ट में वायु प्रदूषण को मृत्यु का एक बड़ा कारक बताया जा रहा है।
लैंसेट प्लेटनरी हेल्थ रिपोर्ट ने दावा किया है कि वर्ष 2019 में वायु प्रदूषण के कारण 17 लाख लोगों की मृत्यु हुई है। "द इंडिया स्टेट लेवल डिजीज बर्डन इनिशिएटिव" नाम की ताजी लैंसेट रिपोर्ट में भीतरी (इनडोर) और बाहरी (आउटडोर) स्रोतों से होने वाले वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य और आर्थिक प्रभावों का आकलन किया गया है।
21 दिसंबर, 2020 को जारी नवीनतम रिपोर्ट में कहा गया है, "वर्ष 2019 में भारत में 17 लाख मौतें वायु प्रदूषण के कारण हुईं, जो देश में होने वाली कुल मौतों का 18 फीसदी थी।"
इस रिपोर्ट में भारत के लिए अच्छी और बुरी दोनों खबरें हैं। अच्छी खबर यह है कि घर से होने वाला या भीतरी वायु प्रदूषण कम लोगों को मार रहा है। यदि पिछले दो दशकों (1990-2019) की रिपोर्ट से मिलान करें तो घरों में वायु प्रदूषण के कारण मृत्यु दर में 64 प्रतिशत की कमी आई है।
बुरी खबर यह है कि बाहरी वायु प्रदूषण या परिवेशीय वायु प्रदूषण न केवल बढ़ रहा है, बल्कि अधिक भारतीयों को भी मार रहा है। अध्ययन के अनुसार, "बाहरी परिवेश में वायु प्रदूषण से मृत्यु दर इस अवधि में 115 फीसदी बढ़ गई है।"
वाशिंगटन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ मेडिसिन में स्वास्थ्य मेट्रिक्स और मूल्यांकन संस्थान के निदेशक और रिपोर्ट के सह-लेखक क्रिस्टोफर मरे ने कहा, "यह आवश्यक है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए नीति निर्माता स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर इस गंभीर खतरे को दूर करने के लिए निर्णायक कदम उठाएं।"
वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों और रुग्णता के कारण भारत ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.4 प्रतिशत खो दिया है। यह रुपये के बराबर है। मौद्रिक अवधि में 260,000 करोड़, या 2020-21 के लिए केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य सेवा के लिए आवंटन का चार गुना से अधिक। वायु प्रदूषण के कारण होने वाली फेफड़ों की बीमारियों में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी - 36.6 फीसदी - कुल आर्थिक नुकसान में हुई।
मौद्रिक रूप में यह 260,000 करोड़ रुपए के बराबर है या यूं कहें कि 2020-21 के लिए केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य सेवा के लिए आवंटन के चार गुना से अधिक है।
कुल आर्थिक नुकसान में वायु प्रदूषण के कारण होने वाली फेफड़ों की बीमारियों में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी 36.6 फीसदी रही।
अध्ययन के मुताबिक, "वायु प्रदूषण के कारण उत्तरी और मध्य भारत के राज्यों में सर्वाधिक आर्थिक नुकसान हुआ। यदि जीडीपी के फीसदी के रूप में देखें तो इनमें उत्तर प्रदेश में उच्चतम (जीडीपी का 2.2%) और बिहार (जीडीपी का 2%) आर्थिक नुकसान रहा।"
अध्ययन में कहा गया है, "वायु प्रदूषण के कारण प्रति व्यक्ति आर्थिक नुकसान के आधार पर 2019 में दिल्ली में सर्वाधिक प्रति व्यक्ति आर्थिक नुकसान हुआ है।"
परिवेशी पार्टिकुलेट मैटर प्रदूषण के कारण होने वाली रुग्णता और समय पूर्व होने वाली मौतों के कारण आउटपुट की क्षति से आर्थिक नुकसान की रेंज जहां सबसे छोटा राज्य पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश (9.5 मिलियन डॉलर आर्थिक क्षति) है वहीं उत्तरभारत में सर्वाधिक उत्तर प्रदेश (3188.4 डॉलर) है।
इनडोर वायु प्रदूषण के कारण होने वाले आर्थिक नुकसान की अवधि में, गोवा में 7 · 6 मिलियन डॉलर का कम से कम नुकसान हुआ था। उत्तर प्रदेश में 1829 · 6 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ, जो देश में सबसे अधिक है।
अध्ययन में कहा गया है, "ओजोन प्रदूषण के कारण समय से पहले होने वाली मौतों के कारण वजह से जो आर्थिक नुकसान हुआ है उसकी रेंज उत्तर-पूर्व के छोटे से पूर्वोत्तर राज्य नागालैंड में 4 मिलियन से डॉलर लेकर सर्वाधिक 286·2 मिलियन डॉलर तक है।"
भारत सरकार के सचिव, स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के महानिदेशक बलराम भार्गव कहते हैं, “विभिन्न सरकारी योजनाएँ जैसे प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना और उन्नत चूल्हा अभियान ने भारत में घरेलू वायु प्रदूषण को कम करने में सहायता की है, जिसके लाभ इस मृत्यु दर को कम करने का सुझाव में है जैसा कि इस पत्र में है। ”(https://www.downtoearth.org.in/hindistory)
-राजू साजवान
ग्रामीण मीडिया प्लेटफॉर्म गांव कनेक्शन ने ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक सर्वेक्षण किया है
कोविड-19 वैक्सीन को लेकर ग्रामीण इलाकों में खासा उत्साह है। ग्रामीण इसके लिए भुगतान करने को भी तैयार हैं, लेकिन वैक्सीन के दो शॉट के लिए 1,000 रुपए से अधिक पैसा देने वालों की संख्या काफी कम है। ग्रामीण मीडिया प्लेटफार्म गांव कनेक्शन द्वारा किए गए सर्वे के मुताबिक, सर्वे में शामिल ग्रामीणों में से लगभग आठ फीसदी लोग ऐसे हैं, जो वैक्सीन के लिए 1,000 से 2,000 रुपए का भुगतान करने को तैयार हैं, जबकि दो तिहाई ग्रामीणों ने कहा कि वे 500 रुपए से अधिक नहीं दे सकते।
गांव कनेक्शन की सर्वे रिपोर्ट "कोविड-19 वैक्सीन एंड रूरल इंडिया" आज जारी की गई। गांव कनेक्शन ने 16 राज्यों और एक केंद्र शासित क्षेत्र के 6040 परिवारों से बातचीत की। इनमें से 36 फीसदी परिवारों ने कहा कि वे वैक्सीन के लिए भुगतान नहीं कर पाएंगे, जबकि 20 फीसदी परिवारों ने इस पर कोई राय नहं दी। हालांकि 44 फीसदी परिवारों ने कहा कि वे भुगतान करने के लिए तैयार हैं। लेकिन इनमें से दो तिहाई परिवारों ने 500 रुपए से अधिक भुगतान करने में असमर्थता जताई। इनमें से एक चौथाई ग्रामीणों ने कहा कि वे दो बार वैक्सीन लेने के लिए 500 से 1,000 रुपए का भुगतान कर सकते हैं। सर्वेक्षण में शामिल ग्रामीणों में से 50 फीसदी ने कहा कि वे किसी विदेशी कंपनी की बजाय भारतीय कंपनी द्वारा तैयार वैक्सीन को अपनाएंगे।
सर्वेक्षण में शामिल परिवारों में से 15 फीसदी ने माना कि उनके परिवार का कोई न कोई सदस्य या नजदीकी व्यक्ति कोविड-19 से पीड़ित हो चुका है। दक्षिण भारत के ग्रामीण इलाकों में कोविड-19 के केस अधिक पाए गए। इन परिवारों में से लगभग 25 फीसदी का कोविड-19 टेस्ट हो चुका है।
सर्वे रिपोर्ट में बताया गया है कि लगभग 51 फीसदी ग्रामीणों का मानना है कि कोरोना वायरस संकट के पीछे चीन का षड्यंत्र है। जबकि 22 प्रतिशत लोगों ने इस संकट के लिए आम नागरिकों की लापरवाही और असावधानी को जिम्मेदार ठहराया है, लेकिन 18 फीसदी ग्रामीणों ने कोरोना के प्रसार के लिए सरकार की विफलता को जिम्मेवार माना है।
सर्वे में शामिल ग्रामीणों में से ज्यादातर ने सरकारी अस्पतालों में भरोसा जताया। लगभग दो तिहाई ग्रामीणों ने कहा कि वे अपने इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में जाना पसंद किया, जबकि केवल 11 फीसदी लोगों ने कहा कि वे अपने इलाज के लिए प्राइवेट अस्पतालों मे जाते हैं।
कोरोना वायरस संक्रमण की वजह से ग्रामीणों के खानपान की आदतों मे बदलाव आया है। सर्वे में लगभग 70 फीसदी ग्रामी परिवारों ने कहा कि उन्होंने अब बाहर का खाना बंद कर दिया है। जबकि 33 फीसदी ग्रामीणों ने माना कि उन्होंने अब सब्जियां अधिक खाना शुरू कर दिया है, जबकि 30 फीसदी ने कहा कि वे अब फल खाना पसंद करते हैं। वहीं लगभग 40 फीसदी ग्रामीणों ने कहा कि कुछ समय पहले तक उन्होंने मीट, मछली, अंडा खाना बंद कर दिया था, जबकि नौ फीसदी ने कहा कि उन्होंने मांसाहार खाना पूरी तरह बंद कर दिया है, क्योंकि इससे कोरोनावायरस संक्रमण का खतरा रहता है।
बेशक लॉकडाउन खत्म हो चुका है, लेकिन अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में कई लोगों को पूरा भोजन नहीं मिल पा रहा है। गांव कनेक्शन के इस सर्वे में शामिल गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) रह रहे परिवारों में एक चौथाई ने बताया कि उनके परिवारों को खाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं मिल रहा है। इस सर्वे में 48 फीसदी बीपीएल, 45 फीसदी एपीएल (गरीबी रेखा से ऊपर) और पांच फीसदी अंत्योदन योजना वाले परिवारों को शामिल किया गया था।(https://www.downtoearth.org.in/hindistory)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
नेपाल की संसद को प्रधानमंत्री खड्गप्रसाद ओली ने भंग करवा दिया है। अब वहां अप्रैल और मई में चुनाव होंगे। नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय में कई याचिकाएं दायर हो गई हैं। उनमें कहा गया है कि नेपाल के संविधान में संसद को बीच में ही भंग करने का कोई प्रावधान नहीं है लेकिन मुझे नहीं लगता कि अदालत इस फैसले को उलटने का साहस करेगी। यह निर्णय ओली ने क्यों लिया? इसीलिए कि सत्तारुढ़ नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के दोनों खेमों में लगातार मुठभेड़ चल रही थी। एक खेमे के नेता पुष्पकमल दहल प्रचंड हैं और दूसरे खेमे के ओली। ओली को इसी समझ के आधार पर प्रधानमंत्री बनाया गया था कि आधी अवधि में वे राज करेंगे और आधी में प्रचंड बिल्कुल वैसे ही जैसे उप्र में मायावती और मुलायमसिंह के बीच समझौता हुआ था।
अब ओली अपनी गद्दी से हिलने को तैयार नहीं हुए तो प्रचंड खेमे ने उस गद्दी को ही हिलाना शुरु कर दिया। पहले उन्होंने ओली पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। खुलेआम चि_ियां लिखी गईं, जिनमें सडक़-निर्माण की 50 करोड़ रु. की अमेरिकी योजना में पैसे खाने की बात कही गई। लिपूलेख-विवाद के बारे में भारत के विरुद्ध चुप्पी साधने का आरोप लगाया गया। इसके अलावा सरकारी निर्णयों में मनमानी करने और पार्टी संगठनों की उपेक्षा करने की शिकायतें भी होती रहीं। ओली ने भी कम दांव नहीं चले। उन्होंने लिपुलेख-विवाद के मामले में भारत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। सुगौली की संधि का उल्लंघन करके भारतीय क्षेत्रों को नेपाली सीमा में दिखा दिया। ओली के इस ‘राष्ट्रवादी पैंतरे’ को संसद में सर्वदलीय समर्थन मिला। चीन की महिला राजदूत हाउ यांकी दोनों धड़ों के बीच सरपंच की भूमिका निभाती रही।
अपनी भारत-विरोधी छवि चमकाने के लिए ओली ने नेपाली संसद में हिंदी में बोलने और धोती-कुर्ता पहनने पर रोक लगाने के पहल भी कर दी। इसकी अनुमति अब से लगभग 30 साल पहले मैंने संसद अध्यक्ष दमनाथ ढुंगाना और गजेंद्र बाबू से कहकर दिलवाई थी। नेपालियों से शादी करने वाले भारतीयों को नेपाली नागरिकता लेने में अब सात साल लगेंगे, ऐसे कानून बनाकर ओली ने अपनी राष्ट्रवादी छवि जरुर चमकाई है लेकिन कुछ दिन पहले उन्होंने भारत के भी नजदीक आने के संकेत दिए। किंतु सत्तारुढ़ संसदीय दल में उनकी दाल पतली देखकर उन्होंने संसद भंग कर दी। यह संसद प्रधानमंत्री गिरिजाप्रसद कोइराला ने भी भंग की थी लेकिन अभी यह कहना मुश्किल है कि वे जीत पाएंगे या नहीं?
(नया इंडिया की अनुमति से)
अभी कुछ महीने पहले अगस्त के पहले हफ्ते में ‘छत्तीसगढ़’ के संपादक सुनील कुमार ने छत्तीसगढ़ के कुछ नेताओं के बारे में अखबार के इंटरनेट संस्करण पर अपने संस्मरण लिखे थे। इनमें उन नेताओं के समग्र जीवन की अधिक बातें नहीं थीं, महज खुद के संपर्क की बातें थीं। इनमें दो किस्तों में मोतीलाल वोरा के बारे में भी लिखा गया था। उसे हम आज यहां प्रकाशित कर रहे हैं-संपादक
कांग्रेस पार्टी के छत्तीसगढ़ के सबसे बुजुर्ग नेता मोतीलाल वोरा एक बरगद की तरह बूढ़े हैं, और बरगद की तरह ही उनका तजुर्बा फैला हुआ है। भला और कौन ऐसे हो सकते हैं, जो राजस्थान से आकर छत्तीसगढ़ में बसे हों, और यहां के कांग्रेस के इतने बड़े नेता बन जाएं कि उन्हें अविभाजित मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया जाए, केन्द्रीय मंत्री बनाया जाए, और उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य का राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्यपाल बनाया जाए। वोराजी एक अद्भुत व्यक्तित्व हैं, और छत्तीसगढ़ी में एक कहावत है जो उनके बारे में कई लोग कहते हैं, ऐड़ा बनकर पेड़ा खाना।
मोतीलाल वोरा ने अपनी कामकाजी जिंदगी की शुरूआत रायपुर की एक बस कंपनी में काम करते हुए की थी। जैसा कि पहले किसी भी परंपरागत कारोबार में होता था, हर कर्मचारी को हर किस्म के काम करने पड़ते थे, न तो उस वक्त अधिक किस्म के ओहदे होते थे, और न ही लोगों को किसी काम को करने में झिझक होती थी। मुसाफिर बस चलाने वाली इस कंपनी में वोराजी कई किस्म के काम करते थे। लेकिन उनकी सरलता की एक घटना खुद उन्हें याद नहीं होगी।
यह बात मेरे बचपन की है, जिस वक्त हमारे पड़ोस में, बसों को नियंत्रित करने वाले आरटीओ के एक अफसर रहते थे। उनके घर पर मेरा डेरा ही रहता था, लेकिन 5-7 बरस की उस उम्र की अधिक यादें नहीं है, लेकिन बाद में पड़ोस के चाचाजी की बताई हुई बात जरूर याद है। उनके घर एक सोफा की जरूरत थी, और सरकारी विभागों के प्रचलन के मुताबिक आरटीओ अधिकारी के घर सोफा पहुंचाने का जिम्मा इस बस कंपनी पर आया था। ठेले पर सोफा लदवाकर किसी के साथ स्कूटर पर बैठकर बस कंपनी के कर्मचारी मोतीलाल वोरा पहुंचे और सोफा उतरवाकर, घर के भीतर रखवाकर लौटे। यह बात आई-गई हो गई, वक्त के साथ-साथ वोराजी राजनीति में आए, कांग्रेस में आए, विधायक बने, और अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनाए गए। इस बीच हमारे पड़ोस के चाचाजी बढ़ते-बढ़ते प्रदेश के एक सबसे बड़े संभाग के आरटीओ बने। लेकिन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा जब उनके शहर के दौरे पर पहुंचते थे, तो वे या तो छुट्टी ले लेते थे, या सामने पडऩे से बचने का कोई और जरिया निकाल लेते थे। ऐसा नहीं कि वोराजी को आरटीओ का कामकाज समझता नहीं था, लेकिन रायपुर के उस वक्त का सोफा इस वक्त झिझक पैदा कर रहा था, और चाचाजी उनके सामने नहीं पड़े, तो नहीं पड़े।
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मोतीलाल वोरा कुछ असंभव किस्म के व्यक्ति हैं। वे बहुत सीधे-सरल भी हैं, लेकिन कांग्रेस पार्टी में सोनिया गांधी के दाएं हाथ की तरह इतने बरसों से बने रहने के लिए सिधाई, और सरलता से परे भी कई हुनर लगते हैं, जिनमें से कुछ तो वोराजी के पास होंगे ही। प्रदेशों के कांग्रेस संगठनों की बात करना ठीक नहीं होगा, लेकिन अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बारे में यह कहा जाता है कि इसका यह अनोखा सौभाग्य रहा कि इसके कोषाध्यक्ष ईमानदार रहे। मोतीलाल वोरा ने कांग्रेस कोषाध्यक्ष रहते हुए हजारों करोड़ रूपए देखे होंगे, लेकिन उन पर किसी बेईमानी का कोई लांछन कभी नहीं लगा। और तो और अभी दो चुनाव पहले जब उनका बेटा अरूण दुर्ग से चुनाव लड़ रहा था, और इस सदी में चुनाव के जिन खर्चों की परंपरा मजबूत हो चुकी है, उन खर्चों के लिए आखिरी के दो-तीन दिनों में उम्मीदवारों को पार्टी से पैसा मिलता है। मोतीलाल वोरा ने प्रदेश के सभी कांग्रेस उम्मीदवारों को जो पैसा भेजा था, वही पैसा अरूण वोरा को भी मिला था। पता नहीं क्यों उस चुनाव में मोतीलाल वोरा ने हाथ खींच लिया था, और मतदान के दो दिन पहले का पैसा नहीं पहुंचा, और वह भी एक वजह थी जो अरूण वोरा चुनाव हार गए थे।
पिछले 25-30 बरसों में दो-चार बार मेरा वोराजी के दुर्ग घर पर जाकर मिलना हुआ है। लकड़ी का वही पुराना सोफा, और कमरे में प्लास्टिक की 10-20 कुर्सियों की थप्पी लगी हुई थी। कोई शान-शौकत नहीं बढ़ी, कोई खर्च भी नहीं बढ़े। ताकत की जितनी कुर्सियों पर वोराजी रहे, और कांग्रेस पार्टी के हजारों करोड़ को उन्होंने यूपीए के 10 बरसों में देखा, कई आम चुनाव निपटाए, पूरे देश की विधानसभाओं के चुनाव निपटाए, लेकिन उनके परिवार का रहन-सहन ज्यों का त्यों बना रहा। आज के जमाने में यह सादगी छोटी बात नहीं है, और शायद इसी के चलते कांग्रेस पार्टी में सोनिया गांधी के करीब और कोई विकल्प नहीं बन पाया।
15-16 बरस पहले जब मैंने अखबार की नौकरी छोड़ी, और इस अखबार, ‘छत्तीसगढ़’, को शुरू करना तय किया, तो कुछ विज्ञापनों की कोशिश करने के लिए दिल्ली गया। उस वक्त दिल्ली के मेरे एक दोस्त, संदीप दीक्षित, पूर्वी दिल्ली से कांग्रेस के सांसद बने थे, और अपनी मां शीला दीक्षित के मुख्यमंत्री निवास से अलग रहने लगे थे। उनकी जिद पर मैं उनके घर पर ही ठहरा, और दिल्ली आने की वजह बताई, यह भी बताया कि कांग्रेस मुख्यालय में आज वोराजी से मुलाकात तय है। संदीप ने कहा कि वहां तो मजमा लगा होगा क्योंकि पंजाब विधानसभा चुनाव की टिकटें तय होना है, और चुनाव समिति में वोराजी भी हैं। इसके साथ ही संदीप ने आधे मजाक और आधी गंभीरता से कहा- आप भी कहां विज्ञापनों के चक्कर में पड़े हैं, पंजाब में एक-एक टिकट के लिए लोग पांच-पांच करोड़ रूपए देने को तैयार खड़े हैं, आप वोराजी से किसी एक को टिकट ही दिला दीजिए, आपका प्रेस खड़ा हो जाएगा।
जब मैं वोराजी से मिलने एआईसीसी पहुंचा, तो सचमुच ही सारे बरामदों में पंजाब ही पंजाब था। लेकिन बाहर सहायक के पास मेरे नाम की खबर थी, मुझे तुरंत भीतर पहुंचाया गया, और वैसी मारामारी के बीच भी वोराजी ने चाय पिलाई, पान निकालकर अपने हाथ से दिया, और कांग्रेस प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों के नाम विज्ञापनों के लिए चिट्ठियां टाईप करवाईं, उनकी एक-एक कॉपी मुझे भी दी कि मैं जाकर उनसे संपर्क कर लूं।
चिट्ठी आसान होती है, लेकिन उस वक्त के उतने कांग्रेस प्रदेशों में जाना अकेले इंसान के लिए मुमकिन नहीं होता, इसलिए वे सारी चिट्ठियां मेरे पास रखी रह गईं, और भला किस प्रदेश के मुख्यमंत्री को एक चिट्ठी के आधार पर शुरू होने वाले अखबार के लिए विज्ञापन मंजूर करने का समय हो सकता है? बात आई-गई हो गई, लेकिन वोराजी ने पूरा वक्त दिया, और उन्हें जब मैंने संदीप दीक्षित की कही बात बताई तो वे हॅंस भी पड़े। टिकट दिलवाकर पैसे लेने या दिलवाने का काम वे करते होते, तो इतने बरसों में न बात छुपती, न पैसा छुपता।
वोराजी से मेरा अच्छा और बुरा, सभी किस्म का खूब तजुर्बा रहा। अच्छा ही अधिक रहा, और बुरा तो नाममात्र का था।
जब मोतीलाल वोरा अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब मैं पिछले अखबार में रिपोर्टिंग करता था। वोराजी तकरीबन हर शनिवार-इतवार रायपुर-दुर्ग आ जाते थे, और मैं दोनों जगहों पर उनके कई कार्यक्रमों में चले जाता था, और रायपुर की सभी प्रेस कांफ्रेंस में भी। ऐसी ही एक प्रेस कांफ्रेंस में मैंने उनसे पूछा- क्या रायपुर में आपके किसी रिश्तेदार को अफसर परेशान कर रहे हैं?
वे कुछ हक्का-बक्का रह गए, सवाल अटपटा था, और मुख्यमंत्री अपने रिश्तेदारों के बारे में ऐसी अवांछित बात सुनने की उम्मीद भी नहीं कर सकता था। उन्होंने इंकार किया।
लेकिन मेरे पास उससे अधिक अवांछित अगला सवाल था, मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्हें उनके अफसरों से ऐसी शिकायत मिली है कि उनके (वोराजी के) रिश्तेदार उन्हें परेशान करते हैं?
इस पर वे कुछ खफा होने लगे लेकिन उनकी सज्जनता ने उनकी आवाज को फिर भी काबू में रखा, और उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी कोई शिकायत नहीं मिली।
मैं उन दिनों रिपोर्ट लिखते हुए पत्रकारवार्ता के सवाल-जवाब भी बारीकी से सवाल-जवाब की शक्ल में लिखता था, और अपने पूछे सवालों के साथ यह भी खुलासा कर देता था कि ये सवाल इस संवाददाता ने पूछे थे, और उनका यह जवाब मिला था।
सवाल-जवाब की शक्ल में छपी प्रेस कांफ्रेंस की बात आई-गई हो गई। इसके कुछ या कई हफ्ते बाद उस अखबार के प्रधान संपादक मायारामजी सुरजन रायपुर लौटे। मुझे भनक लग गई थी कि वे किसी बात पर मुझसे खफा हैं, और मेरी पेशी हो सकती है। दफ्तर पहुंचते ही उन्होंने मुझे बुलाया, और कहा कि भोपाल में वोराजी ने उन्हें मेरी शिकायत की है। और यह कहकर शिकायत की है कि सुनील कुमार मुझसे (वोराजी से) इस टोन में बात करते हैं कि मानो वे मेरे मालिक हों। बाबूजी (मायारामजी) ने बताया कि वोराजी ने चाय पर बुलाकर अखबार की कतरन उनके सामने रख दी थी कि मैंने प्रेस कांफ्रेंस में ऐसे-ऐसे सवाल किए थे। बाबूजी ने उनसे यह साफ किया कि हमारे अखबार के रिपोर्टरों को यह हिदायत दी जाती है कि वे सवाल तैयार करके ही किसी प्रेस कांफ्रेंस में जाएं, और सवाल जरूर पूछें, महज डिक्टेशन लेकर न लौटें। इसलिए सुनील ने सवाल जरूर किए होंगे, लेकिन इन सवालों में कुछ गलत तो लग नहीं रहा।
अब यहां पर एक संदर्भ को साफ करना जरूरी है, वोराजी के एक रिश्तेदार और नगर निगम के एक कर्मचारी, वल्लभ थानवी बड़े सक्रिय कर्मचारी नेता थे। वहां के बड़े अफसरों से उनकी तनातनी चलती ही रहती थी। कुछ दिन पहले ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि म्युनिसिपल के बड़े अफसर उन्हें इसलिए परेशान करते हैं कि वे मुख्यमंत्री के रिश्तेदार हैं। इसके जवाब में निगम-प्रशासक या आयुक्त ने कहा था कि मुख्यमंत्री के रिश्तेदार होने की वजह से वल्लभ थानवी उन्हें परेशान करते हैं। इसी संदर्भ में मैंने प्रेस कांफ्रेंस में वोराजी से सवाल किया था।
लेकिन मुख्यमंत्री तो मुख्यमंत्री होते हैं, उन्हें अगर कोई बात बुरी लगी तो अखबार के मुखिया से शिकायत का उनका एक जायज हक बनता था। और बहुत लंबे परिचय की वजह से उन्होंने बाबूजी को बुलाकर ऐसी कुछ और कतरनों की भी फाईल सामने धर दी थी।
मुझे बाबूजी के शब्द अच्छी तरह याद हैं कि उन्होंने इन्हें पढकऱ वोराजी से कहा था कि उन्हें तो इसमें कोई बात आपत्तिजनक नहीं लग रही है, जहां तक मेरे बोलने के तरीके का सवाल है, तो मुख्यमंत्री का भला कौन मालिक हो सकता है। उन्होंने कहा कि सुनील के बात करने का तरीका कुछ अक्खड़ है, और वे मुझे उनसे (वोराजी से) बात करने भेजेंगे। वे तो चाय पीकर लौट आए थे, लेकिन मुझे रायपुर में यह जानकारी देते हुए बाबूजी ने कहा कि जब वोराजी अगली बार रायपुर आएं तो उनसे जाकर मैं मिल लूं, और पूछ लूं कि वे किसी बात पर नाराज हैं क्या। न मुझे खेद व्यक्त करने का निर्देश मिला, और न ही माफी मांगने की कोई सलाह दी गई, कोई हुक्म दिया गया।
वोराजी का कोई रायपुर प्रवास हफ्ते भर से अधिक दूर तो होता नहीं था, वे यहां आए, और मैं सर्किट हाऊस में जाकर उनसे मिला। भीतर खबर जाते ही उन्होंने तुरंत बुला लिया, मैंने कहा- बाबूजी कह रहे थे कि आप मेरी किसी बात से नाराज हैं?
वोराजी ने हॅंसते हुए पास आकर पीठ थपथपाई, और कहा- अरे नहीं, कोई नाराजगी नहीं है। और क्या हाल है? कैसा चल रहा है?
मुख्यमंत्री की नाराजगी महज एक वाक्य कहने से इस तरह धुल जाए, ऐसा आमतौर पर होता नहीं है, लेकिन वोराजी की सज्जनता कुछ इसी तरह की थी। उन्हें मैंने मन में गांठ बांधकर रखते नहीं देखा है, और राजनीति के प्रचलित पैमानों पर उनकी सज्जनता अनदेखी नहीं रहती।
सोनिया-राहुल के साथ एक नाव में सवार छत्तीसगढ़ से अकेले वोरा
मोतीलाल वोरा के बारे में कल बात शुरू हुई, तो किसी किनारे नहीं पहुंच पाई। दरअसल उनके साथ मेरी व्यक्तिगत यादें भी जुड़ी हुई हैं, और उनके बारे में बहुत कुछ सुना हुआ भी है। फिर उनका इतना लंबा सक्रिय राजनीतिक जीवन है कि उनसे जुड़ी कहानियां खत्म होती ही नहीं।
जब वे अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे तो उन्हें हटाने के लिए कांग्रेस के भीतर के लोग लगातार लगे रहते थे। वैसे में माधवराव सिंधिया उनके संरक्षक बनकर दिल्ली दरबार में उन्हें बचाए रखते थे। इस बात में कुछ भी गोपनीय नहीं था, और हर हफ्ते यह हल्ला उड़ता था कि वोराजी को हटाया जाने वाला है। नतीजा यह था कि उस वक्त एक लतीफा चल निकला था कि वोराजी जब भी शासकीय विमान में सफर करते थे, तो विमान के उड़ते ही उसका वायरलैस बंद करवा देते थे। उसकी वजह यह थी कि उन्हें लगता था कि उड़ान के बीच अगर उन्हें हटाने की घोषणा हो जाएगी, तो पायलट उन्हें बीच रास्ते उतार न दे।
वोराजी का पांच साल का पूरा कार्यकाल ऐसी चर्चाओं से भरे रहा, और वे इसके बीच भी सहजभाव से काम करते रहे। सिंधिया को छत्तीसगढ़ के अनगिनत कार्यक्रमों में उन्होंने बुलाया, और उस वक्त के रेलमंत्री रहे माधवराव सिंधिया ने छत्तीसगढ़ के लिए भरपूर मंजूरियां दीं। उस वक्त अखबारनवीसी कर रहे लोगों को याद होगा कि इनकी जोड़ी को उस समय मोती-माधव या माधव-मोती एक्सप्रेस कहा जाता था। माधवराव सिंधिया परंपरागत रूप से अर्जुन सिंह के प्रतिद्वंदी थे, और छत्तीसगढ़ के शुक्ल बंधुओं से भी उनका कोई प्रेमसंबंध नहीं था। ऐसे में केन्द्र में ताकतवर सिंधिया को राज्य में मोतीलाल वोरा जैसे निरापद मुख्यमंत्री माकूल बैठते थे, और ताकत में वोराजी की सिंधिया से कोई बराबरी नहीं थी। नतीजा यह था कि ताकत के फासले वाले इन दो लोगों के बीच जोड़ीदारी खूब निभी।
मुख्यमंत्री रहने के अलावा जब वोराजी को राजनांदगांव संसदीय सीट से उम्मीदवार बनाया गया, तब उन्होंने चुनाव प्रचार में उसी अंदाज में मेहनत की, जिस अंदाज में वे मुख्यमंत्री रहते हुए रोजाना ही देर रात तक काम करने के आदी थे। इस संसदीय चुनाव प्रचार के बीच मैंने उनको इंटरव्यू करने के लिए समय मांगा तो उनका कहना था कि वे सात बजे चुनाव प्रचार के लिए राजनांदगांव से रवाना हो जाते हैं, और देर रात ही लौटते हैं। ऐसे में अगर मैं मिलना चाहता था, तो मुझे सात बजे के पहले वहां पहुंचना था। मैं स्कूटर से रायपुर से रवाना होकर दो घंटे में 7 बजे के पहले ही राजनांदगांव पहुंच गया, वहां वे एक तेंदूपत्ता व्यापारी के पत्ता गोदाम में बने हुए एक गेस्टरूम में सपत्नीक ठहरे थे, और करीब-करीब तैयार हो चुके थे।
वे मेरे तेवर भी जानते थे, और यह भी जानते थे कि उनके प्रति मेरे मन में न कोई निंदाभाव था, और न ही प्रशंसाभाव, फिर भी उन्होंने समय दिया, सवालों के जवाब दिए, और शायद इस बात पर राहत भी महसूस की कि मैंने अखबार के लिए चुनावी विज्ञापनों की कोई बात नहीं की थी। चुनाव आयोग के प्रतिबंधों के बाद चुनावी-विज्ञापन शब्द महज एक झांसा है, हकीकत तो यह है कि अखबार उम्मीदवारों और पार्टियों से सीधे-सीधे पैकेज की बात करते हैं। वह दौर ऐसे पैकेज शुरू होने के पहले का था, लेकिन यह आम बात है कि अखबारों के रिपोर्टर ही उम्मीदवारों से विज्ञापनों की बात कर लेते थे, कर लेते हैं, लेकिन वोराजी से न उस वक्त, और न ही बाद में कभी मुझे ऐसे पैकेज की कोई बात करनी पड़ी, और नजरों की ओट बनी रही।
वोराजी खुद भी एक वक्त कम से कम एक अखबार के लिए तो काम कर ही चुके थे, और उनके छोटे भाई गोविंदलाल वोरा छत्तीसगढ़ के एक सबसे बुजुर्ग और पुराने अखबारनवीस-अखबारमालिक थे, इसलिए वोराजी को हर वक्त ही छत्तीसगढ़ के मीडिया की ताजा खबर रहती थी, भोपाल में मुख्यमंत्री रहते हुए भी, और केन्द्र में मंत्री या राष्ट्रपति शासन में उत्तरप्रदेश को चलाते हुए। जितनी मेरी याददाश्त साथ दे रही है, उन्होंने कभी अखबारों को भ्रष्ट करने, या उनको धमकाने का काम नहीं किया। वह एक अलग ही दौर था।
मोतीलाल वोरा मुख्यमंत्री रहे, अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे, लेकिन छत्तीसगढ़ में वे अपने कोई सहयोगी नहीं बना पाए। दुर्ग में दो-चार लोग, और रायपुर में पांच लोग उनके नाम के साथ गिने जाते थे। रायपुर में तो उनके करीबी पांच लोगों की शिनाख्त इतनी जाहिर थी कि उन्हें पंच-प्यारे कहा जाता था। इन लोगों के लिए भी वोराजी कुछ जगहों पर मनोनयन से बहुत अधिक कुछ कर पाए हों, ऐसा भी याद नहीं पड़ता। लेकिन उनकी एक खूबी जरूर थी कि वे छत्तीसगढ़ के हजारों लोगों के लिए बिना देर किए सिफारिश की चिट्ठी लिखने को तैयार हो जाते थे।
यूपीए सरकार के दस बरसों में देश में उनका नाम बड़ा वजनदार था। मेरे एक दोस्त की बेटी मुम्बई के एचआर कॉलेज में ही दाखिला चाहती थी। उस कॉलेज में दाखिला बड़ा मुश्किल भी था। उनके साथ मैं वोराजी के पास दिल्ली गया, दिक्कत बताई, तो वे सहजभाव से सिफारिश की चिट्ठी लिखने को तैयार हो गए। हम लोगों को कमरे में बिठा रखा, चाय और पान से स्वागत किया, पीछे के कमरे में जाकर अपने टाईपिस्ट के पास खड़े रहकर चिट्ठी लिखवाई उसे मुम्बई कॉलेज में फैक्स करवाया, और फैक्स की रसीद के साथ चिट्ठी की एक कॉपी मुझे दी, और कॉलेज के संस्थापक मुंबई के एक बड़े बिल्डर हीरानंदानी से फोन पर बात करने की कोशिश भी की, लेकिन बात हो नहीं पाई।
चिट्ठी के साथ जब मैं अपने दोस्त और उनकी बेटी के साथ मुंबई गया, तो एचआर कॉलेज के बाहर मेला लगा हुआ था। उस भीड़ के बीच भी हमारे लिए खबर थी, और कुछ मिनटों में हम प्रिंसिपल के सामने थे। इन्दू शाहणी, मुंबई की शेरिफ भी रह चुकी थीं। उनकी पहली उत्सुकता यह थी कि मैं वोराजी को कैसे जानता हूं, उन्होंने सैकड़ों पालकों की बाहर इंतजार कर रही कतार के बाद भी 20-25 मिनट मुझसे बात की, जिसमें से आधा वक्त वे वोराजी और छत्तीसगढ़ के बारे में पूछती रहीं। सबसे बड़ी बात यह रही कि जिस दाखिले के लिए 10-20 लाख रूपए खर्च करने वाले लोग घूम रहे थे, वह वोराजी की एक चिट्ठी से हो गया। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि बाद में उन्होंने कभी चुनाव के वक्त या किसी और राजनीतिक काम से कोई खर्च बताया हो। वे उसे सज्जनता के साथ भूल गए, और दीवाली पर मेरे दोस्त मेरे साथ सिर्फ मिठाई का एक साधारण डिब्बा लेकर उनके घर दुर्ग गए, तो भी उनका कहना था कि अरे इसकी क्या जरूरत थी।
मोतीलाल वोरा राजनीति में लगातार बढ़ती चली जा रही कुटिलता के बीच सहज व्यक्ति थे। वे बहुत अधिक साजिश करने के लिए कुख्यात नेताओं से अलग दिखते थे, और अभी भी अलग दिखते हैं। उनकी पसंद अलग हो सकती है, लेकिन अपनी पसंद को बढ़ावा देने के लिए, या नापसंद को कुचलने के लिए वे अधिक कुछ करते हों, ऐसा कभी सुनाई नहीं पड़ा।
छत्तीसगढ़ में अभी कांग्रेस की सरकार बनी, तो दिल्ली से ऐसी चर्चा आई कि वोराजी की पहल पर, और उनकी पसंद पर ताम्रध्वज साहू को मुख्यमंत्री बनाना तय किया गया था, और इस बात की लगभग घोषणा भी हो गई थी, लेकिन इसके बाद भूपेश बघेल और टी.एस. सिंहदेव ने एक होकर, एक साथ लौटकर जब यह कह दिया कि वे ताम्रध्वज के साथ किसी ओहदे पर कोई काम नहीं करेंगे, तो ताम्रध्वज का नाम बदला गया, और भूपेश बघेल का नाम तय हुआ। ये तमाम बातें वैसे तो बंद कमरों की हैं, लेकिन ये छनकर बाहर आ गईं, और इनसे मोतीलाल वोरा और भूपेश बघेल के बीच एक दरार सी पड़ गई।
अभी जब छत्तीसगढ़ से राज्यसभा के कांग्रेस उम्मीदवार तय होने थे, तब मोतीलाल वोरा से जिन्होंने जाकर कहा कि उन्हें राज्यसभा में रहना जारी रखना चाहिए, तो आपसी बातचीत में उन्होंने यह जरूर कहा था कि भूपेश बघेल उनका नाम होने देंगे? और हुआ वही, हालांकि यह नौबत शायद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के दरवाजे तक नहीं आई, और कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली में ही यह तय कर लिया कि वोराजी का उपयोग अब राज्यसभा से अधिक संगठन के भीतर है, और केटीएस तुलसी जैसे एक सीनियर वकील की पार्टी को इस मौके पर अधिक जरूरत है।
वोराजी का बहुत बड़ा कोई जनाधार कभी नहीं रहा, वे पार्टी के बनाए हुए रहे, और जनता के बीच अपने सीमित असर वाले नेता रहे। लेकिन उनके बेटों की वजह से कभी उनकी कोई बदनामी हुई हो, ऐसा नहीं हुआ, और राजनीति में यह भी कोई छोटी बात तो है नहीं। छत्तीसगढ़ की एक मामूली नौकरी से लेकर वे कांग्रेस पार्टी में उसके हाल के सबसे सुनहरे दस बरसों में सबसे ताकतवर कोषाध्यक्ष और पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के सबसे करीबी व्यक्ति रहे, आज भी हैं। आज दिन सुनहरे नहीं हैं, कांग्रेस पार्टी, सोनिया परिवार, और इन दोनों से जुड़ी हुई कुछ कंपनियां लगातार जांच और अदालती मुकदमों का सामना कर रही हैं, और उनमें मोतीलाल वोरा ठीक उतने ही शामिल हैं, ठीक उतनी ही दिक्कत में हैं, जितने कि सोनिया और राहुल हैं। किसी एक नाव पर इन दोनों के साथ ऐसे सवार होना भी कोई छोटी बात नहीं है, और रायपुर की एक बस कंपनी के एक मुलाजिम से लेकर यहां तक का लंबा सफर खुद मेरे देखे हुए बहुत सी और यादों से भरा हुआ है, लेकिन उनके बारे में बाकी बातें बाद में फिर कभी।
मृणाल पाण्डे-
हिंदी की पत्रकारिता स्वायत्त पैदा हुई और स्वायत्त रह कर ही वह लोकतांत्रिक राजनीति की सच्ची सहभागी बनी है | मोतीलाल वोरा जी उस परंपरा की एक दुर्लभ कड़ी थे। उनकी निकटता और मार्गदर्शन पाना मेरे लिए व्यक्तिश: और पत्रकारीय दोनों के नज़रिये से एक उपलब्धि रही | बढ़ती उम्र और क्षीण पड़ते शरीर के बावजूद आदरणीय वोरा जी हम सब एसोशियेटेड जर्नल्स के कर्मियों के लिए अंत तक एक बड़े और छांहदार वट वृक्ष बने रहे।
एक ऐसी सहज, मिलनसार और गर्माहट भरी आत्मीयता से भरपूर शख्सियत का चला जाना, जिसके दरवाजे अपने स्नेही जनों, मित्रों के लिए जब भी जरूरत हो, हमेशा खुले रहे, हम सब को एक ऐसे अकेलेपन के गहरे अहसास से भर गया है जो घर के सम्मानित बुजुर्ग का साया उठ जाने से होता है। अभी कुछ ही दिन पहले अपने करीबी दोस्त और सहकर्मी अहमद पटेल जी के निधन पर लिखी उनकी मार्मिक उदास सतरें लगता है एक तरह से हमारे बीच से उनकी अपनी खामोश विदाई की पीठिका बना रही थीं।
आज की मौकापरस्त राजनीति में जिसका जनता या साहित्य और विचारों की दुनिया से कोई नाता नहीं दिखता, एक पत्रकारीय जीवन से शुरुआत करने वाले साहित्य और साहित्यकारों के लिए गहरा सम्मान भाव रखने वाले वोरा जी एक दुर्लभ ऑर्किड की तरह थे। वर्ष 1993-96 तक जब वे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे मेरी माता शिवानी जी से लखनऊ में उनका बहुत सहृदय संपर्क रहा। 1996 में जब आंतरिक रक्तस्राव से शिवानी जी अचानक बेहद नाजुक दौर से गुजर रही थीं, उन्होंने जिस आत्मीय सहजता से अपना राजकीय हवाई जहाज उनको दिल्ली लाने के लिए उपलब्ध करा दिया, वह आज के माहौल में अकल्पनीय है।
बाद को उनकी स्थिति संभलने पर जब मैं वोरा जी को परिवार की ओर से धन्यवाद देने को मिली, उन्होने बहुत स्नेह से कहा, ‘देखो शिवानी जी सिर्फ तुम्हारी मां ही नहीं, हमारे हिंदी साहित्य की बहुत बड़ी विभूति भी हैं। यह तो मेरा कर्तव्य था।’ सच्चा साहित्यिक अनुराग किस तरह राजनीति का मानवीयकरण कर सकता है और राजनीति एक अच्छे मनुष्य से जुड़ कर किस हद तक मानवीय सरोकार बना सकती है, इसका प्रत्यक्ष रूप मैंने उसी दिन जाना।
हमारे प्रकाशन समूह और उसकी जननी, अपनी पार्टी के प्रति तो वोरा जी का अनुराग अनुपम था। उनके दिलो दिमाग के रास्ते कई दिशाओं, कई खिड़कियों में खुलते थे, इसलिए राजनीतिक विचारधारा की ज्यादतियों या संकीर्णता के वे कभी शिकार नहीं बने। जब कभी मिलते अपने से कहीं कम अनुभव और आयु वालों से भी वे हमेशा एक बालकोचित उत्सुकता से जानना चाहते थे कि हिंदी में इन दिनों क्या कुछ लिखा जा रहा है। पत्रकारिता की दिशा दशा पर हमारी क्या राय है?
आज जबकि रोज बरोज राजनीति में राज्य और शक्ति के उद्दंड बर्बर रूपों ने राजनीति के क्षेत्र में कला साहित्य पर किसी भी तरह की संवेदनशील बातचीत की संभावना को मिटा डाला है, वोरा जी का जाना एक अपूरणीय क्षति है। वे उस उदार राजनैतिक संस्कृति के चंद बच रहे झंडाबरदारों में से थे जिनका आदर्श गांधी, नेहरू, आचार्य नरेंद्र देव और कृपलानी जैसे बुद्धि की गरिमा वाले राजनेता रहे। वे मानते थे कि धर्म या पारंपरिक शिक्षा दीक्षा नहीं, राजनीति से ही आम आदमी की जिंदगी में सही तब्दीली लाई जा सकती है। और इसके लिए जरूरी है कि राज्य में कलाएं राजनीति की समांतर अनुपूरक धाराएं बनी रहें। उनको राजनीति की दब्बू मातहत या राजनेताओं की कृपा पर निर्भर नहीं समझा जाए।
राजनीति की सारी हड़बड़ी और आपाधापी के बीच भी अपनी टीम को निरंतर विवेक, दिमागी ताज़गी और खुलेपन का सुखद अहसास देने वाले अपनी संस्था के इस पितृपुरुष को हमारी विनम्र ॠद्धांजलि। (navjivan)
जब अमांडा क्लेमैन न्यूयॉर्क में थीं तो क्रेडिट कार्ड के कर्ज़ में इस तरह फंस चुकी थीं कि उन्हें कुछ समझ ही नहीं आ रहा था.
अमेरिका में फाइनेंशियल थेरेपिस्ट अमांडा बीबीसी मुंडो को बताती हैं, "उस हालत ने मुझे इतना शर्मिंदा किया कि मुझे लगा कि मेरी पेशेवर और निजी उपलब्धियां सब एक झूठ हैं."
एक दिन अमांडा ने अपनी मां से अपने बाल काटने के लिए कहा. लेकिन, मां ने जिस तरह बाल काटे वो बहुत ख़राब दिख रहे थे. तब मां ने बोला कि इसे ठीक कराने के लिए तुरंत अपने हेयरड्रेसर के पास जाओ.
लेकिन, अमांडा ने कहा, "मैं नहीं जा सकती. मैं वहां वापस नहीं जा सकती क्योंकि मैंने उसे बाउंस चैक दिया है."
तब अमांडा को अपनी मां को पूरी सच्चाई बतानी पड़ी. अमांडा ने बताया कि उन पर 19 हज़ार डॉलर (करीब 14 लाख रुपये) का कर्ज़ है.
फाइनेंशियल प्लान
सबसे ख़राब बात ये थी कि अमांडा को नहीं पता था कि इतने बड़े कर्ज़ से वो कैसे निकल पाएंगी.
हालांकि, तब मां की मदद से अमांडा ने अपने बिल चुकाए. इसके बाद उन्होंने महीने का एक बजट और फाइनेंशियल प्लान बनाया. अमांडा ने पहले कभी ऐसा नहीं किया था.
अमांडा क्लेमैन कहती हैं, "मैं हमेशा बजट बनाने से बचती थी क्योंकि मुझे लगता था कि इससे मेरी आज़ादी छिन जाएगी."
लेकिन, बजट बनाने से उन्हें पता चला कि इससे उनकी आज़ादी बढ़ गई है और धीरे-धीरे खर्चे भी कम हुए हैं. उनकी बचत हो रही है जिससे उन्होंने अपने कर्ज़ चुका दिए हैं.
अमांडा कहती हैं कि उस हेयरकट के कर्ज़ के कारण मुझे मेरा सही रास्ता मिल गया जहां मैं पैसों को लेकर ज़्यादा समझदार, सशक्त हो गई और मुझे मेरी ज़िंदगी का जुनून मिल गया.
कई सालों तक सोशल वर्क का काम करने के बाद अपने इस जुनून के कारण अमांडा क्लेमैन एक फाइनेंशियल थेरेपिस्ट बन गईं.

फाइनेंशियल एंग्ज़ाइटी (वित्तीय घबराहट) क्या है
अब क्लेमैन ऐसे लोगों की मदद करती हैं जिन्हें वित्तीय तनाव की समस्या है. वो कंपनियों के साथ जुड़ी हैं, कोर्सेज कराती हैं और इन विषयों पर लिखती हैं.
अमांडा बताती हैं कि घबराहट तब होती है जब हमारा शरीर और दिमाग हमें सिग्नल देता है कि कुछ ऐसा है जो सही नहीं है, उस पर ध्यान दें.
ये हमारे लिए ख़तरे की निशानी है कि अब उस मुश्किल स्थिति से निपटने का वक़्त आ गया है. हालांकि, अक्सर होता ये है कि जब लोग घबराहट महसूस करते हैं तो मुश्किलों पर ध्यान देना ही बंद कर दते हैं.
अमांडा कहती हैं कि इसलिए हम पैसों को लेकर घबराहट महसूस करते हैं. हम अमूमन इस बारे में नहीं सोचते हैं और हालत इतनी ख़राब हो जाती है कि हम आवेश में फैसले कर लेते हैं.
वह बताती हैं कि इन फैसलों के कारण स्थितियां और ख़राब हो जाती है जिससे घबराहट और बढ़ जाती है. इस तरह हम एक दुष्चक्र में फंसते चले जाते हैं. इसलिए सबसे पहले अपनी घबराहट पर ध्यान दें और गहराई से सोचें की आपके साथ क्या हो रहा है.
अमांडा फाइनेंशियल एंग्ज़ाइटी से निकलने के ये पांच तरीके बताती हैं:
1. अपनी उत्सुकता बढ़ाएं
पहला कदम ये है कि अपने पैसे को लेकर उत्सुक होना सीखें.
आपकी वित्तीय ज़िंदगी में क्या हो रहा है, ये उसमें असल दिलचस्पी लेने जैसा है बजाए कि आप सिर्फ़ मौजूदा कर्ज़ चुकाने के बारे में सोचें.
उसके लिए, एक सही तरीका ये है कि हम खुद से पूछें कि हमारे पैसों से हमारे बारे में क्या पता चलता है कि हम अपने समय का इस्तेमाल कैसे करते हैं और हमारे लिए क्या चीजें असल में महत्वपूर्ण हैं.
2. अपने पैसों पर लगातार ध्यान दें
महीने में कम से कम एक बार ये तीन चीजें करें:
- ये देखें कि आपके बैंक अकाउंट में कितना पैसा आता है और कितना बचता है.
- इस पर विचार करें कि आगे कैसी वित्तीय स्थिति आने वाली है.
- एक योजना बनाएं.
उदाहरण के लिए, अगर आपका किराया बढ़ रहा है तो आपको अपने बजट में कुछ चीजें बदलनी होंगी ताकि किराया देने का समय आने से पहले आप कुछ इंतज़ाम कर सकें.
ये समय से पहले की तैयारी करना है ना कि समय आने का इंतज़ार करना है.

3. आपने जो हासिल किया है, उसके लिए अपनी खूबियों को पहचानें
ये महत्वपूर्ण है कि आप पहचानें की आपने अपने लक्ष्य की तरफ़ कितनी प्रगति की है.
इस बात को लेकर परेशान ना रहें कि आप लक्ष्य तक क्यों नहीं पहुंचे.
भले ही आप छोटे-छोटे कदम उठा रहे हैं लेकिन ये भी महत्वपूर्ण बदलाव है जो दिखाता है कि आपमें इसकी क्षमता है.
फाइनेंशियल एंग्ज़ाइटी को ख़त्म करना एक ऐसी प्रक्रिया है जो रातों रात पूरी नहीं हो सकती.
4. प्रयोग करने की मौका
हम अक्सर चीजों को उनके ‘सही तरीक़े’ से ही करना चाहते हैं क्योंकि कुछ अलग करने पर हमें असफल होने का डर लगता है.
लेकिन, कई बार किसी चीज़ को करने का एक ही सही तरीक़ा नहीं होता.
अगर हम थोड़ा और सोचें तो कई और रास्ते खुले हो सकते हैं.
हमें अपने आप को और रचानात्मक होने का मौका देना चाहिए.
5. पैसे ना होना ‘अच्छी ख़बर’ है
भले ही ये सुनने में अजीब लगता है कि पैसा ना होना ‘अच्छी ख़बर’ है लेकिन, ये स्थितियों से निपटने के लिए सोचने के तरीक़े में बदलाव करने जैसा है.
यह कदम हमारे दृष्टिकोण को बदलने के महत्व को दिखाता है कि हम अपने जीवन में चुनौतियों का जवाब कैसे देते हैं और उनसे निपटने के लिए लचीलापन कैसे अपनाते हैं.
"हम वित्तीय परेशानियों से नहीं निपट सकते" ये सोचने की बजाए सोचें कि "इन परेशानियों से कैसे निकलें."
इस प्रक्रिया में हमें अपने बारे में कई दिलचस्प बातें पता चलेंगी और हम जानेंगे कि व्यक्तिगत मामले कैसे पैसों को संभालने के हमारे तरीके को प्रभावित करते हैं.

ये कोई जादू नहीं
अमांडा कहती हैं, "फाइनेंशियल थेरेपी और पैसों को लेकर जो व्यवहार हम विकसित करना चाहते हैं, ये सब किसी जादू की छड़ी जैसा नहीं है."
ये एक प्रक्रिया है जो ये स्वीकार करने से शुरू होती है कि हमारे सामने एक चुनौती है. खुद को जानने का ये सफर चलता रहता है ताकि ये पता चल सके कि वो सिग्नल हमसे क्या कहना चाहते हैं और हम कुछ आदतों में बदलाव के लिए योजना बना सकें.
इस प्रक्रिया में अपने आप से कई सवाल पूछना फायदेमंद होता है. जैसे कि आपके काम का मतलब क्या है, आपकी प्राथमिकताएं क्या हैं, आपके लक्ष्य को क्या प्रभावित करता है, कौन-से रिश्ते आपकी वित्तीय सेहत को प्रभावित करते हैं, आप किन चीजों को बदल सकते हैं और किन्हें नहीं.
अगर आपकी नौकरी चली जाए
ऐसी स्थिति में फाइनेंशियल थेरेपिस्ट सलाह देते हैं कि आपको पहले शांति से बैठकर मौजूदा हालात का विश्लेषण करना चाहिए,
एक अच्छा तरीक़ा ये है कि आप उन लोगों के साथ बात करें जिनके साथ आपकी वित्तीय प्रतिबद्धताएं हैं जैसे मकान मालिक से बात करें और उसे किराये को लेकर थोड़ा समय देने के लिए कहें.
अगर नौकरी जाने से पहले आपकी कुछ बचत है तो योजना बनाएं कि आप उनसे ज़्यादा से ज़्यादा कितने दिनों तक अपना खर्च चला सकते हैं.
यह इस बारे में सोचने में भी मदद करता है कि आपको वैकल्पिक तरीकों से कैसे पैसे मिल सकते हैं.
भले ही उन पैसों से आपके सभी खर्चे पूरे ना हों लेकिन, कर्ज़ और उसके ब्याज़ से बचने के लिए ये तरीक़ा काफ़ी हद तक आपकी मदद कर सकता है. साथ ही अपने खर्चे कम करना ना भूलें
इस सबके ज़रिए ये जानने की कोशिश है कि किन चीज़ों पर आपका नियंत्रण है और कौन-सी चीजें आपके काबू से बाहर हैं. इससे हमें अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ने में मदद मिलती है. (bbc)
-सुदीप ठाकुर
मोतीलाल वोरा जी से जुड़ी बातें बचपन से सुनता आया हूं। राजनांदगांव के दिवंगत कवि और मुक्तिबोध के मित्र नंदूलाल चोटिया याद करते थे कि किस तरह वोरा जी एक समय साइकिल से चलते थे। तब वह समाजवादी राजनीति से जुड़े हुए थे। बाद में वह रहने के लिए राजनांदगांव से दुर्ग चले गए थे। राजनांदगांव के समाजवादी नेताओं मदन तिवारी, जेपीएल फ्रांसिस और विद्याभूषण ठाकुर से उनके काफी करीबी संबंध बन रहे। वोरा के मुख्यमंत्री बनने और इन नेताओं के विपक्ष में होने के बावजूद उनके संबंध बेहद सहज बने रहे। ये नेता उन्हें अक्सर राजनांदगांव के उन दिनों की याद दिलाते थे, जब वह भी वहां के श्रमिकों, किसानों और आदिवासियों के आंदोलन का हिस्सा हुआ करते थे। इन तीनों समाजवादी नेताओं का पहले ही निधन हो चुका है। वोरा जी राजनीति में आने से पहले राजनांदगांव से प्रकाशित अखबार सबेरा संकेत और रायपुर से प्रकाशित नवभारत से बतौर पत्रकार भी जुड़े थे। 1960 में जब रायपुर में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का अधिवेशन हुआ था, तो उसे उन्होंने बतौर पत्रकार ही कवर किया था। इस अधिवेशन में पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर कांग्रेस के सारे बड़े नेता शामिल हुए थे। इसी अधिवेशन के समय पुराने मध्य प्रदेश के दिग्गज आदिवासी नेता लालश्याम शाह तीस हजार से भी अधिक आदिवासियों के साथ महाराष्ट्र सीमा से सटे मानपुर मोहला से पैदल रायपुर पहुंच थे। अपनी किताब लाल श्याम शाह एक आदिवासी की कहानी के शोध के दौरान वोरा जी से कई बार मुझे मिलने का मौका मिला। इस पोस्ट के साथ की तस्वीर तब की है, जब मैंने उन्हें अपनी किताब भेंट की थी।
करीब पांच दशक पूर्व वोरा जी के प्रयास और उनकी सक्रियता से आम लोगों से चंदा लेकर राजनांदगांव के पुराने बस अड्डे में गांधी की एक प्रतिमा स्थापित की गई थी। दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में उलझने के बाद छत्तीसगढ़ और राजनांदगांव उनसे दूर होते चले गए... सादर नमन
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उन 23 नेताओं की बैठक आखिरकार बुला ही ली, जिन्होंने कांग्रेस के नेतृत्व और संगठन के बारे में उन्हें एक अप्रिय पत्र लिख भेजा था। यह बैठक उन्होंने हैदराबाद और बिहार के चुनाव में बुरी तरह से मात खाने के बाद बुलाई और उस समय बुलाई जब बंगाल में कांग्रेस का सूंपड़ा साफ होता दिखाई पड़ रहा है। इससे क्या जाहिर होता है ?
क्या यह नहीं कि कांग्रेस अब बूढ़ी हो गई है, थक चुकी है और दिग्भ्रमित हो गई है ? जो बैठक हुई, उसमें क्या हुआ ? पांच घंटे चली इस बैठक के बारे में विस्तार से जनता को कुछ पता नहीं। कांग्रेसी कार्यकर्ता भी उससे अनभिज्ञ हैं। कुछ अखबारों में फूटकर जो खबरें बाहर बह आई हैं, उनसे अंदाज लगता है कि कांग्रेस में सगठनात्मक चुनाव होंगे याने उसमें कई दशकों बाद आंतरिक लोकतंत्र का समारंभ होगा। अब तक दुनिया की यह काफी पुरानी और काफी बड़ी पार्टी किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चल रही है।
अब तो उसने मां-बेटा या भाई-बहन पार्टी का रुप धारण कर लिया है। किसी भी निजी कंपनी की तरह इस पार्टी में अध्यक्ष से लेकर लघुतम पदाधिकारी तक नामजद होता रहा है। अब यदि संगठनात्मक चुनाव होंगे तो वे भी प्रांतीय और जिला पार्टी तक सीमित रहेंगे। अध्यक्ष तो फिर भी नामजद ही होगा। इस बैठक में किसी की हिम्मत नहीं पड़ी कि वह दो-टूक शब्दों में अध्यक्ष के चुनाव की बात कहे। अगर अध्यक्ष का चुनाव हो भी जाए तो राहुल और प्रियंका के सामने खड़े होने की हिम्मत किसकी है ? यह बैठक भी खुशामदियों और जी-हुजूरों का अड्डा साबित हुई। कांग्रेस-जैसी महान पार्टी की वर्तमान दुर्दशा का सांगोपांग विश्लेषण इस बैठक में भी नहीं हुआ।
कांग्रेस पार्टी में आज भी एक से एक अनुभवी और योग्य नेता हैं तथा उसके सदस्य कमोबेश देश के हर जिले में मौजूद हैं लेकिन यदि उसका शीर्ष नेतृत्व जो अभी है, वही रहा तो मानकर चलिए कि वह अपनी अंतिम सांसें गिन रही है। उसे कोई नहीं बचा सकता। कांग्रेस को आज नेता और नीति, दोनों की सख़्त जरुरत है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
मृणाल पाण्डे-
जाने-माने आर्किटेक्ट सी.एस. झाबवाला ने कभी दिल्ली को एक ऐसा फीनिक्स पक्षी बताया था जो बार-बार जल मरता है, पर फिर अपनी ही राख से नया जन्म लेकर खड़ा हो जाता है। बात सिरे से गलत भी नहीं। दिल्ली दुनिया की उन प्रसिद्ध लेकिन अभिशप्त नगरियों में से एक है जो कम-से-कम नौ बार बसी और उजड़ी है। अब मौजूदा सरकार बीसवीं सदी की शुरुआत में मुगलों की बनाई पुरानी दिल्ली (शाहजहानाबाद से इतर दसवीं बार) लुटियन की रची ‘नई’ दिल्ली की पुनर्रचना को अकुला रही है। इतनी अधिक कि कोर्ट की आज्ञा से पहले ही वह प्रधानमंत्री के हाथों राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक फैले एक नए केंद्रीय विस्टा जोन के लिए भूमि पूजन करवा चुकी है। इसके बाद यदि अदालत उसे हरी झंडी दे देती है जिसका कई लोगों की राय में वह भूमि पूजन की स्वीकृति देकर संकेत दे चुकी है और सरकार 20,000 करोड़ की अनुमानित लागत का बहुप्रचारित प्लान जमीन पर उतारती है, तो लुटियन के बाद यह नगरी शायद 11वीं बार उजड़ कर नए निजाम की मंशा से बनी बिलकुल नई शक्ल अख्तियार कर लेगी।
शायद नए की होड़ में पुरानी जन धरोहरों को बार-बार आततायियों या प्रतिस्पर्धी गुटों द्वारा क्रूरता से नष्ट होते देखना और फिर पछतावे के दौर से गुजरना इस शहर की नियति रही है। मान्यता है कि सबसे पहले यह नगरी बसी थी महाभारत काल में। धृतराष्ट्र ने राज्य के दो टुकड़े किए तो अपनों, यानी कौरवों को तो बेहतर हिस्सा दिया, पांडवों को दिया खांडवप्रस्थ का बंजर भाग। सौभाग्य से अर्जुन ने कभी उस जमाने के प्रसिद्ध स्थपतिमय दानव को आग से बचाया था। सो, उसे जा पकड़ा। उसने अर्जुन के कहने से पुराना ऋण चुकाने को चौदह महीनों के भीतर वहां पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ की जैसी दिव्यनगरी का निर्माण किया। कौरव किस तरह उसे देख कुढ़ गए और जभी महाभारत के बीज उनके मन में फूटे और फिर विनाशक युद्ध, यह सब ज्ञात है।
आज जिस दिल्ली को हम जानते हैं और जिसे बीजेपी के भक्त ‘लुटियन की दिल्ली’ कह कर उसे उजड़ा दयार बनाने को अकुला रहे हैं, बरतानवी बादशाह एडवर्ड सप्तम के राज्या रोहण के समय मशहूर ब्रिटिश एडवार्डियन एडविन लुटियन से बनवाया गया विश्व प्रसिद्ध भवनों का धरोहरी इलाका है। अपने 55,000 सरकारी कर्मचारियों सहित आज यहां भाजपानीत केंद्रीय सरकार खुद विराजमान है और अब लुटियन की दिल्ली की जगह अपनी किस्म की नगरी रचने जा रही है। सच यह है कि यह नगरी भारत में राजकीय सत्ता की केंद्रीय नाभि थी और है। और दुर्योधन के बाद से आज तक दिल्ली की खिल्ली उड़ाने वालों तक नए-नकोर शासकों के मनों के भीतर कहीं-न-कहीं यहां की भव्यता तोड़कर अपना ठप्पा लगी नई इमारतें रचवाकर इतिहास में अमर हो जाने की कामना कुलबुलाती है। क्षेत्रीय नेता भी पीछे नहीं। कभी ठीक इसी तरह दक्षिण में जयललिता ने भी अपने प्रबल प्रतिद्वंद्वी करुणा निधि के नाम की सचिवालय इमारत को हस्पताल बनवाया और जगन रेड्डी ने चंद्रबाबू की स्वप्ननगरी अमरावती को ठंडे खाते में डाल दिया।
आबादी चाहे जितनी फैली हो, राज-काज के सिलसिले में आजादी के बाद से सरकारी दिल्ली की विशाल बाबू शाही काफी हद तक औपनिवेशिक तर्ज पर ही काम करती रही है। अहंवादी राजनीति के करेले पर इस बाबू शाही की नीम चढ़ जाए तो उसकी नवनिर्माण कामना सर्व भक्षी बन जाती है। 1947 में तबके तमाम बड़े राजे-रजवाड़ों के शाही निजी आवास- पटियाला हाउस, कश्मीर हाउस, धौलपुर- बीकानेर हाउस, केरल हाउस, हैदराबाद हाउस, वगैरा, सब एक-एक कर सरकारी इमारतों के रूप में अधिगृहीत होते गए। इनके बाहरी घेरे में तीन मूर्ति भवन, विलिंगडन क्रीसेंट और राष्ट्रपति भवन के अहाते से सटा सरदार पटेल मार्ग का पॉश इलाका भी धीमे-धीमे सरकारी या अर्द्धसरकारी भवनों से भरता गया। फिर भी सरकारी लोगों में यहां बसने को मकान हमेशा कम पड़े। हर दल के सांसद और बड़े बाबू आज जो कहें, जब उनके लिए इनको ठियों को छोड़ने का समय आया तो जितनी देर तक चिपके रह सकते थे, रहे। शायर जौक तो पहले ही कह गए, कौन जाए ये दिल्ली की गलियां छोड़कर?
यह सब अपनी जगह, फिर भी समझना कठिन है कि जब देश नोटबंदी, तालाबंदी, मंदी और छंटनियों से कराह रहा है, कुपोषित बच्चों और बेरोजगार नौजवानों की तादाद इतिहास में सबसे अधिक हो गई है, उसी समय देश पर एकछत्र शासन करती बीजेपी और उसके मित्रों को अचानक धौलपुर के गुलाबी पत्थर से बनी लुटियन की बनाई सरकारी बसासत इतनी काहे खटकने लगी कि बिना जनता या विपक्ष की सुने, सिल्वेनिया लक्ष्मण के पुराने इश्तहार के शब्दों में, ‘पूरे घर को बदल डालूंगा’ नुमा घोषणा कर दी गई। उसे भी अब्भी के अब्भी कार्यान्वित करने की ऐसी उतावली? यह तो लचर-सा तर्क है कि देश की आबादी के अनुपात में जनप्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाकर 888 करना जरूरी है। लेकिन इतना बड़ा निर्माण कार्यचार दिन में तो होगा नहीं, बरसों लग जाएंगे। आर्किटेक्ट राज रेवाल (जिन्होंने संसद की लाइब्रेरी एनेक्सकी भव्य बिल्डिंग बनाई) तथा उनके अन्य जाने-माने स्थापत्यविद् एके जे मेननका कहना है कि इमारतों में नई तकनीकी और अधिक जगह बनाने की बात वाजिब है लेकिन इन खूबसूरत राष्ट्रीय धरोहर इमारतों में भीतर ही भीतर तरमीम करने से जगह तथा नई तकनीकी- दोनों समाहित की जा सकती हैं। कौन कहता है कि तनिक फेरबदल से 888 लोग मौजूदा लोकसभा भवन में नहीं अंट सकते? उनका बाहरी रूप तो बना रहे, भीतर का भाग कम समय में व्यवस्थित और नए समय के अनुकूल बनाना संभव है।
पर ताजा जानकारियों के अनुसार, सरकार की इच्छा सिर्फ कला परक नहीं, भू-अधिग्रहण से भी जुड़ी है। इस इलाके में अब एक नए प्रधानमंत्री आवास, उपराष्ट्रपति आवास, दोनों के ऑफिस सहित विशेष सुरक्षाबल कर्मियों के लिए भी आवास बनाना प्रस्तावित है। बताया जाता है कि पुरानी इमारतों को अजायबघर बना दिया जाएगा। यह सोच कुतर्कसंगत है, अन्याय पर कभी। मूल नक्शे में जनता द्वारा तथा सरकारी भवनों द्वारा इस्तेमाल करने वाली जमीन का परिमाण था कि पर्यावरण संरक्षण तथा जनता की तादाद में बढ़ोतरी के मद्देनजर 60 प्रतिशत जगह जनता के लिए छोड़कर कुल 40 प्रतिशत को सरकारी इमारतों से भरा जाए। जनता के लिए उसके हिस्से की जमीन में खुले पार्क तथा नहर, जंतर-मंतर सरीखे मैदान आदि की व्यवस्था की गई जिनका बहुत बड़े पैमाने पर आज भी जनसंकुल होती जा रही दिल्ली के आम नागरिक हर रोज प्रयोग करते हैं। नई योजना की तहत जनता के लिए अब कुल 5 प्रतिशत जगह बचेगी जबकि सरकार को 95 प्रतिशत जमीन पर कब्जा मिलेगा। जाहिर है, जब खुली जगह बेहद सिमट जाएगी तो जनता की आवाजाही सीमित होगी, पर्यावरण बिगड़ेगा, सो अलग।
दूसरा सवाल यह कि नए स्कीम की तहत विश्व धरोहर की मान्यता पाने के लिए लुटियन निर्मित दिल्ली के कुछ महत्वपूर्ण भवनों के नाम की पेशकश यूएन को भेजी जा चुकी है। उनकी रक्षा कैसे होगी? क्योंकि नए प्रस्तावित तोड़-फोड़ की तहत वह सारा इलाका आने जा रहा है जिस पर कम-से-कम तीन ऐसी बेशकीमती धरोहरों से भरी राष्ट्रीय इमारतें- नेशनल म्यूजियम, नेशनल आर्काइव्स तथा नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स खड़ी हैं। 1952 से अब तक यहां देश की नायाब कला संस्कृति की पुरातात्विक महत्ववाली धरोहरें जिनमें शिल्पकला से लेकर चित्र नक्शे, आभूषण, सिक्के, पोशाकें, हथियार और प्राचीनतम युगों के मृद्भांडतक शामिल हैं, विशेषज्ञों के द्वारा रचे गए खास कक्षों-तह खानों में सुरक्षित हैं। अब से नई इमारतें बनने तक वे राष्ट्रीय धरोहरें किस तरह कहां सुरक्षित रखी जा सकेंगी?
एक बात साफ है। अधिकतर जो दिक्कतें उभर रही हैं, कहीं-न-कहीं दिल्ली सरकार सर्वोपरि है, जनता नहीं, की अहंकारी भावना से जुड़ी हैं। शताब्दियों पुराना अपने नाम को अजर-अमर बनाने का यह अहंवादी राजनीतिक मर्ज चुटकी बजाते जाएगा नहीं। उसके लिए लंबे धीरज भरे इलाज की जरूरत है। पर लोहिया जी कहते थे, जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं। एक हद से अधिक कोंचा जाए तो कीड़ा भी पलटवार करता है। पंजाब से उत्तर प्रदेश तक फैलता किसान आंदोलन क्या जनता की आस-निरास होने के बड़े तूफान की पूर्व चेतावनी तो नहीं? (navjivan)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत के शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने देश की तकनीकी शिक्षा अब भारतीय भाषाओं के माध्यम से देने का फैसला किया है। तकनीकी शिक्षा तो क्या, अभी देश में कानून और चिकित्साशास्त्र की शिक्षा भी हिंदी और भारतीय भाषाओं में नहीं है। उच्चशोध भारतीय भाषाओं में हो, यह तो अभी एक दिवा-स्वप्न भर ही है।
1965 में जब मैंने अपने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोधग्रंथ हिंदी में लिखने की मांग की थी तो देश में तहलका मच गया था। इंडियन स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज से मुझे निकाल बाहर कर दिया गया था। संसद में जबर्दस्त हंगामा होता रहा था। मैंने अपनी मातृभाषा में लिखने की मांग इसलिए नहीं की थी कि मुझे अंग्रेजी नहीं आती थी। मैं अंग्रेजी के साथ-साथ संस्कृत, रुसी, फारसी और जर्मन भाषाएं भी जानता था लेकिन मैं इस वैज्ञानिक सत्य को भी जानता था कि स्वभाषा में जैसा मौलिक कार्य हो सकता है, वह विदेशी भाषा में नहीं हो सकता।
दुनिया के सभी सबल और समृद्ध राष्ट्रों में सभी महत्वपूर्ण कार्य स्वभाषा के जरिए होते हैं लेकिन भारत-जैसे शानदार देश भी ज्ञान-विज्ञान में आज भी इसीलिए पिछड़े हुए हैं कि उनके सारे महत्वपूर्ण काम उसके पुराने मालिकों की भाषा में होते हैं। भाषाई गुलामी का यह दौर पता नहीं कब खत्म होगा ? यदि हमारा शिक्षा मंत्रालय उच्च शिक्षा के सभी क्षेत्रों में स्वभाषा अनिवार्य कर दे तो कुछ ही वर्षों में हमारे प्रतिभाशाली छात्र पश्चिमी देशों को मात दे सकते हैं।
समस्त विषयों की विदेशी पुस्तकों का भी साल-दो साल में ही अनुवाद हो सकता है। जब तक यह न हो, मिली-जुली भाषा में छात्रों को पढ़ाया जा सकता है। ये छात्र अपने विषयों को जल्दी और बेहतर सीखेंगे। अंग्रेजी के अलावा अन्य विदेशी भाषाओं के ग्रंथों का भी वे लाभ उठाएंगे। वे सारी दुनिया के ज्ञान-विज्ञान से जुड़ेंगे। अंग्रेजी की पटरी पर चली रेल हमारे छात्रों में ब्रिटेन और अमेरिका जाने की हवस पैदा करती है। यह घटेगी। वे देश में ही रहेंगे। अपने लोगों की सेवा करेंगे। शिक्षा की भाषा-क्रांति देश का नक्शा बदल देगी।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-डॉ राजू पाण्डेय
सरकार किसान आंदोलन से जितनी भयभीत नहीं है उससे ज्यादा आतंकित इस बात से है कि कहीं इस आंदोलन से किसानों में वर्ग चेतना का उदय न हो जाए। सरकार को भय इस बात का है कि अलग अलग और अलग थलग चल रहे जन आंदोलनों में कहीं पारस्परिक सामंजस्य न स्थापित हो जाए। कहीं देश के आदिवासी यह न समझ जाएं कि उनके जल-जंगल-जमीन पर कब्जा कर उन्हें विस्थापन तथा विनाश के अंतहीन दुष्चक्र में फंसाने वाली शक्तियाँ और किसानों को कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग की ओर जबरन धकेलने वाली शक्तियाँ एक ही हैं। सरकार इस बात से परेशान है कि कहीं देश के मजदूर यह न जान जाएं कि नई श्रम संहिताओं के जरिए मजदूरों द्वारा वर्षों के संघर्ष से अर्जित अधिकारों को समाप्त करने वाली ताकतें वही हैं जो खेती को निजी हाथों में सौंपने के लिए लालायित हैं। सरकार के माथे पर चिंता की लकीरें इस लिए भी हैं कि कहीं पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स में कार्य करने वाले भुक्तभोगी कर्मचारी किसानों को यह न बता दें कि निजीकरण के पहले मौजूदा सिस्टम को किस प्रकार कमजोर किया जाता है ताकि निजीकरण की वकालत की जा सके। सरकार की घबराहट इस बात को लेकर भी है कि कहीं किसान आंदोलन के बारे में पढ़ते गुनते देश के प्रवासी मजदूर यह न समझ जाएं कि उन्हें गांव से बेदखल कर शहरों में खदेड़ने वाले लोग वही हैं जो आज खुल्लमखुल्ला खेती पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार डर रही है कि कहीं इन प्रवासी श्रमिकों को यह भी ज्ञात न हो जाए कि एनआरसी के विरोध में आंदोलनरत जनसमुदाय केवल अल्पसंख्यक वर्ग की लड़ाई नहीं लड़ रहा है बल्कि यह उन करोड़ों प्रवासी मजदूरों के हित की बात कर रहा है जो नागरिकता साबित करने के लिए आवश्यक दस्तावेजों के अभाव के कारण ऐसे किसी सरकारी निर्णय से सर्वाधिक प्रभावित होंगे। सरकार इसलिए भी चिंतित है कि कहीं किसानों के इस आंदोलन से प्रेरित होकर दलित,अल्पसंख्यक और महिलाएं अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष न प्रारंभ कर दें। कहीं वे स्वतंत्रता, समानता,धर्म पालन की आज़ादी, शोषण के विरुद्ध संघर्ष और संस्कृति तथा शिक्षा संबंधी अधिकारों की मांग न करने लगें।
सरकार यह जानती है कि ये सारे जन संघर्ष यदि एकीकृत हो जाएं तो फिर कोई बड़ा परिवर्तन होकर रहेगा। इसलिए वह इस किसान आंदोलन को कमजोर करना चाहती है। वह उन सारी रणनीतियों का सहारा ले रही है जो अभी तक उसके वर्चस्व को बनाए रखने और बढ़ाने में सहायक रही हैं। सरकार समर्थक मीडिया इन आंदोलनरत अन्न दाताओं में खालिस्तानी, पाकिस्तानी और कथित टुकड़े टुकड़े गैंग के एजेंटों की भूमिका की कपोल कल्पित कहानियां दिखाता है और फिर सरकार के मंत्री इसकी पुष्टि करते नजर आते हैं। सरकार की नीतियों का विरोध करना अब राष्ट्रद्रोही घोषित किए जाने का आधार बन गया है। सरकार हर जन उभार को कमजोर करने के लिए इन अफवाहों का उपयोग करती रही है और वह अब भी ऐसा ही करना चाह रही है। सरकार के मंत्री और सरकार समर्थक मीडिया हाउस देश के स्वतंत्रता आंदोलन में सबसे ज्यादा कुर्बानी देने वाले, स्वतंत्र भारत द्वारा लड़े गए युद्धों में बढ़ चढ़ कर शहादत देने वाले और अपने परिश्रम तथा पुरुषार्थ से पूरे देश को अन्न के संकट से मुक्ति दिलाने वाले पंजाब के वीरों और मेहनतकश किसानों पर ऐसे मिथ्या लांछन लगा सकते हैं यह देखना एक भयावह और दुःखद अनुभव है।
एक प्रयास यह भी हो रहा है कि इस आंदोलन को पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ भागों के संपन्न किसानों के आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया जाए। प्रधानमंत्री स्वयं यह आभास देते लग रहे हैं कि देश के छोटे और सीमांत किसान उनके साथ खड़े हैं। जबकि सच्चाई यह है कि पंजाब और हरियाणा के जाग्रत, जुझारू एवं जागरूक कृषक उन आसन्न खतरों के प्रति देश के अन्य किसानों को सतर्क कर रहे हैं जो इन कृषि कानूनों के क्रियान्वयन के बाद आने वाले हैं। सरकार यह चाहती है कि देश के पिछड़े प्रदेशों के किसानों की कम जानकारी और असतर्कता का लाभ उठाकर वह उन्हें भ्रमित कर ले। प्रधानमंत्री द्वारा अपनी कथित उपलब्धियां गिनाने के लिए मध्यप्रदेश के रायसेन का चयन एक राजनेता के तौर पर उनके अतिआत्मविश्वास और दुस्साहस को तो दर्शाता ही है किंतु बतौर मनुष्य यह उन्हें संवेदनहीन भी सिद्ध करता है क्योंकि मध्यप्रदेश के इस इलाके में किसान सर्वाधिक बदहाल और आंदोलित रहे हैं। यह क्षेत्र 6 जून 2018 के मंदसौर गोलीकांड के लिए चर्चित रहा है। कमलनाथ की कांग्रेस सरकार के अल्प कार्यकाल को छोड़ कर विगत डेढ़ दशक से भाजपा मप्र में शासन में रही है। 2014 से पांच वर्ष तक तो यहाँ डबल इंजन की सरकार भी थी और आज भी है। ऐसी दशा में इस क्षेत्र के किसानों की बदहाली के लिए क्षमा याचना करने के स्थान पर प्रधानमंत्री जी अपनी उपलब्धियां गिनाकर उनके साथ क्रूर मजाक करते नजर आते हैं। बहरहाल उनकी रणनीति यह है कि आंदोलन को पंजाब-हरियाणा के किसान विरुद्ध सारे देश के किसान या अमीर किसान विरुद्ध गरीब किसान के रूप में प्रस्तुत किया जाए।
एक कोशिश यह भी हो रही है कि इस आंदोलन को किसान विरुद्ध आम आदमी का रूप दे दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका का स्वरूप ऐसा ही है। अति सामान्य ढंग से लगाई गई इस याचिका पर त्वरित सुनवाई भी हुई और आवश्यकता पड़ने पर छुट्टियों के दौरान कार्य करने वाली बेंच के पास जाने का अधिकार भी दिया गया। आश्चर्य यह है कि सुप्रीम कोर्ट भी सरकार की तरह सोचता नजर आ रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा- पहले हम किसानों के आंदोलन के ज़रिए रोकी गई सड़क और इससे नागरिकों के अधिकारों पर होने वाले प्रभाव पर सुनवाई करेंगे। वैधता के मामले को इंतजार करना होगा। सुप्रीम कोर्ट की प्राथमिकता के इस क्रम से भावी घटनाक्रम का अनुमान लगाया जा सकता है जो निश्चित ही किसानों के लिए आश्वासनदायी और सुखकर नहीं होगा।
इससे भी ज्यादा चिंताजनक है सोशल मीडिया पर किसानों के विरुद्ध किया जा रहा दुष्प्रचार। किसानों को आम जनता को परेशानी में डालने वाले राष्ट्र द्रोहियों के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास हो रहा है। आंदोलनरत किसानों के खान पान पर सवाल उठाए जा रहे हैं। किसानों को भोजन कराने वाले गुरुद्वारों और अन्य संगठनों के विरुद्ध घटिया और अनर्गल आरोप लगाए जा रहे हैं। आंदोलन की फंडिंग पर प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं। यह दुष्प्रचार उस खाते पीते प्रायः शहरी मध्यम वर्ग को लक्ष्य कर किया जा रहा है जिसे सरकारी राष्ट्रवाद की रक्षा के लिए मर मिटने को तैयार आत्मघाती दस्ते के रूप में प्रशिक्षित किया गया है। धार्मिक और जातीय सर्वोच्चता के अहंकार में डूबा, घोर अवसरवादी, अपनी सुविधानुसार नैतिकता की परिभाषाएं गढ़ने वाला यह वर्ग समाज में सरकारी अनुशासन को बनाए रखने का स्वघोषित उत्तरदायित्व संभाल रहा है। यह जमीन से इस कदर कट चुका है कि उत्पादन प्रक्रिया और उसमें श्रम के महत्व से यह बिल्कुल अपरिचित है। वैश्वीकरण और उदारीकरण के बाद की उपभोक्ता संस्कृति ने जिन नए व्यवसायों और रोजगारों को जन्म दिया है उनमें अमानवीयता, अवसरवाद एवं गलाकाट प्रतिस्पर्धा के तत्व इस तरह घुले मिले हैं कि यह नई पीढ़ी को संवेदनशून्य बना रहे हैं। बहरहाल जो नया नैरेटिव सोशल मीडिया पर गढ़ा जा रहा है वह टैक्स पटाने वाली, ईमानदार, सभ्य, अनुशासित सिविल सोसाइटी विरुद्ध अराजक, अनपढ़, असभ्य किसान का नैरेटिव है। सोशल मीडिया पर ऐसी ही भावना तब देखी गई थी जब प्रवासी मजदूरों की घर वापसी की कोशिशों को कोविड-19 के प्रसार के लिए उत्तरदायी ठहराया गया था।
किसानों के विरुद्ध जहर उगलने वाले यह लोग कृषि कानूनों के बाद आने वाले संभावित बदलावों से अछूते नहीं रहेंगे। प्रभात पटनायक आदि विशेषज्ञों के अनुसार इन कृषि कानूनों के बाद खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। देश में कृषि भूमि सीमित है, फसलों की उत्पादन वृद्धि में सहायक सिंचाई आदि सुविधाओं तथा कृषि तकनीकों में सुधार की भी एक सीमा है। इस अल्प और सीमित भूमि में ग्लोबल नार्थ(विकसित देशों की अर्थव्यवस्था एवं बाजार, ग्लोबल नार्थ एक भौगोलिक इकाई नहीं है) के उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए खाद्यान्नों के स्थान पर उन फसलों का उत्पादन किया जाएगा जो इन देशों में पैदा नहीं होतीं। जब तक पीडीएस सिस्टम जारी है तब तक सरकार के लिए आवश्यक खाद्यान्न का स्टॉक बनाए रखने के लिए अनाजों की खरीद जरूरी होगी। किंतु बदलाव यह होगा कि वर्तमान में जो भी अनाज बिकने के लिए आता है उसे खरीदने की अब जो बाध्यता है, वह तब नहीं रहेगी। सरकार पीडीएस को जारी रखने के लिए आवश्यक अनाज के अलावा अधिक अनाज खरीदने के लिए बाध्य नहीं होगी। इसका परिणाम यह होगा कि कृषि भूमि का प्रयोग अब विकसित देशों की जरूरतों के अनुसार फसलें पैदा करने हेतु होने लगेगा। विश्व व्यापार संगठन की दोहा में हुई बैठक से ही भारत पर यह दबाव बना हुआ है कि सरकार खाद्यान्न की सरकारी खरीद में कमी लाए किंतु किसानों और उपभोक्ताओं पर इसके विनाशक प्रभावों का अनुमान लगाकर हमारी सरकारें इसे अस्वीकार करती रही हैं। विकसित देश अपने यहाँ प्रचुरता में उत्पन्न होने वाले अनाजों के आयात के लिए भारत पर वर्षों से दबाव डालते रहे हैं। 1960 के दशक के मध्य में बिहार के दुर्भिक्ष के समय हमने अमेरिका के दबाव का अनुभव किया है और खाद्य उपनिवेशवाद के खतरों से हम वाकिफ हैं। यह तर्क कि नया भारत अब किसी देश से नहीं डरता, केवल सुनने में अच्छा लगता है। वास्तविकता यह है कि अनाज के बदले में जो फसलें लगाई जाएंगी उनकी कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव दर्शाती हैं, इसी प्रकार के बदलाव विदेशी मुद्रा में भी देखे जाते हैं और इस बात की आशंका बनी रहेगी कि किसी आपात परिस्थिति में हमारे पास विदेशों से अनाज खरीदने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा नहीं रहेगी। आज हमारे पास विदेशी मुद्रा के पर्याप्त भंडार हैं किंतु आवश्यक नहीं कि यह स्थिति हमेशा बनी रहेगी। विदेशों से अनाज खरीदने की रणनीति विदेशी मुद्रा भंडार के अभाव में कारगर नहीं होगी और विषम परिस्थितियों में करोड़ों देशवासियों पर भुखमरी का संकट आ सकता है। भारत जैसा विशाल देश जब अंतरराष्ट्रीय बाजार से बड़े पैमाने पर अनाज खरीदने लगेगा तो स्वाभाविक रूप से कीमतों में उछाल आएगा। जब कमजोर मानसून जैसे कारकों के प्रभाव से देश में खाद्यान्न उत्पादन कम होगा तब हमें ज्यादा कीमत चुका कर विदेशों से अनाज लेना होगा। इसी प्रकार जब भारत में अनाज के बदले लगाई गई वैकल्पिक फसलों की कीमत विश्व बाजार में गिर जाएगी तब लोगों की आमदनी इतनी कम हो सकती है कि उनके पास अनाज खरीदने के लिए धन न हो। यह एक सर्वज्ञात तथ्य है कि खाद्यान्न के बदले में लगाई जाने वाली निर्यात की फसलें कम लोगों को रोजगार देती हैं। जब लोगों का रोजगार छिनेगा तो उनकी आमदनी कम होगी और क्रय शक्ति के अभाव में वे भुखमरी की ओर अग्रसर होंगे। भारत जैसे देश में भूमि के उपयोग पर सामाजिक नियंत्रण होना ही चाहिए। भूमि को बाजार की जरूरतों के हवाले करना विनाशकारी सिद्ध होगा। कोविड-19 के समय देश की जनता को भुखमरी से बचाने में हमारे विपुल खाद्यान्न भंडार ही सहायक रहे।
प्रधानमंत्री जी उस विपक्ष को इस आंदोलन के लिए जिम्मेदार बता रहे हैं जो खुद इस स्वतः स्फूर्त जन उभार को देखकर चकित है और स्वयं असमंजस में है कि क्या स्टैंड ले? प्रधानमंत्री अपनी सारी शक्ति यह सिद्ध करने में लगा रहे हैं कि किसानों की दुर्दशा के लिए उत्तरदायी कांग्रेस इन कृषि सुधारों की हमेशा वकालत करती थी। किंतु इन्हें अमलीजामा पहनाने का उसमें हौसला न था। आज हमारी निर्णय लेने वाली सरकार द्वारा इन सुधारों को क्रियान्वित किए जाने के बाद ईर्ष्याग्रस्त होकर कांग्रेस किसानों को आंदोलन के लिए भड़का रही है।
1991 के बाद हमारा देश एलपीजी (लिबरलाइजेशन,प्राइवेटाइजेशन,ग्लोबलाइजेशन) की राह पर तेजी से चल निकला। नई वैश्विक व्यापार व्यवस्था के सबक बहुत साफ हैं- कृषि में सब्सिडी समाप्त की जाए, पीडीएस खत्म हो, कृषि भूमि का उपयोग बाजार की जरूरतों के अनुसार हो, कृषि क्षेत्र में जरूरत से ज्यादा मैन पॉवर लगा है अतः कृषि का यंत्रीकरण किया जाए जिससे मैन पॉवर की आवश्यकता कम होगी, उत्पादन लागत में कमी आएगी,(बहुराष्ट्रीय कंपनियों का) मुनाफा बढ़ेगा, गांवों से लोग शहरों में जाएंगे जहाँ शहरी कारखानों को सस्ते मजदूर मिलेंगे। कांग्रेस भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के दबावों के कारण किसानों को एलपीजी की ओर धकेल रही थी, उसी नीति को मोदी सरकार ने आगे बढ़ाया है। अंतर केवल इतना है कि कांग्रेस स्वाधीनता आंदोलन की अपनी विरासत के कारण(जिसमें किसानों की अग्रणी भूमिका थी) और अपने पूर्ववर्ती नेतृत्व के वेलफेयर स्टेट की अवधारणा में गहन विश्वास के कारण भी वैसी निर्लज्ज निर्ममता से इन कृषि सुधारों को लागू नहीं कर पा रही थी जैसी वर्तमान मोदी सरकार ने दिखाई है। पुनः जो नैरेटिव गढ़ा जा रहा है वह है कांग्रेस और विरोधी दलों द्वारा भड़काए गए किसान विरुद्ध सकारात्मक सोच वाले समझदार राष्ट्रभक्त और तरक्की पसंद सरकार समर्थक किसान।
कुल मिलाकर सरकार यह चाहती है कि इस आंदोलन की कोई ऐसी व्याख्या जनता के लिए स्वीकार्य बनाई जाए जो नफरत, संदेह और बंटवारे के नैरेटिव को सपोर्ट करे। यह सरकार का होम ग्राउंड है और यहाँ वह अपराजेय है। किसानों ने अपने आंदोलन का स्वरूप अराजनीतिक बनाए रखा है। यह एक दृष्टि से उचित भी है। किसान आंदोलन के वास्तविक लक्ष्य देश के प्रमुख राष्ट्रीय दलों के आर्थिक दर्शन से संगति नहीं रखते। किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को विमर्श के केंद्र में लाना तो दूर इन्हें गौण और महत्वहीन बनाना इन राजनीतिक दलों की प्राथमिकता है। किंतु फिर प्रश्न यह उठता है कि इस आंदोलन का हासिल क्या होगा? क्या लिबरलाइजेशन-प्राइवेटाइजेशन-ग्लोबलाइजेशन का समर्थन करने वाले राजनीतिक दल किसानों के साथ न्याय कर पाएंगे? शायद यह आंदोलन सरकार को इन कृषि सुधारों के क्रियान्वयन को कुछ समय तक स्थगित रखने हेतु विवश कर दे। और कुछ समय बाद इन्हें कुछ कॉस्मेटिक चेंज के साथ फिर पेश किया जाए।
केंद्र सरकार को यदि लगातार चुनावी सफलताएं नहीं मिलतीं तो उसका अहंकार शायद कुछ कम होता। किसानों और मजदूरों का जन असंतोष यदि वोटों में तबदील हो जाता तो शायद बिहार के चुनावों का परिणाम कुछ और होता। जब तक किसानों और मजदूरों में वर्ग चेतना का विकास नहीं होगा तथा वे वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध मतदाता समूह की भांति मतदान नहीं करेंगे तब तक चुनावी राजनीति से अपनी प्राथमिकताएं तय करने वाली पार्टियां उनकी समस्याओं के प्रति गंभीर नहीं होंगी।
क्या कोई यह विश्वास भी कर सकता है कि किसान, ग्रामीण अर्थव्यस्था और सहकारिता की जीवन भर पैरवी करने वाले महात्मा गाँधी के देश में किसानों की यह स्थिति हो जाएगी कि उन्हें न केवल आत्मरक्षार्थ आंदोलनरत होना पड़ेगा अपितु राष्ट्र विरोधी, खालिस्तानी और पाकिस्तानी जैसे अपमानजनक संबोधनों का सामना भी करना पड़ेगा। गाँधी के देश के किसान इस धरा को बचाने का संघर्ष कर रहे हैं। आशा करनी चाहिए कि सरकार के तमाम हथकंडों के बावजूद न तो किसान भ्रमित होंगे न ही देश की जनता। इस आंदोलन का शांतिपूर्ण स्वरूप तथा इसकी पारदर्शिता एवं पवित्रता का बने रहना इसके परिणाम से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि आने वाले संघर्षों बुनियाद इन्हीं विशेषताओं पर रखी जायेगी।
(रायगढ़, छत्तीसगढ़)
पेरिस समझौते को सफल बनाने के लिए आवश्यक है कि देशों और दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की सटीक जानकारी हो, पर समस्या यह है कि जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि के बारे में वैज्ञानिकों को जितनी ठोस जानकारी है, उतनी इसके उत्सर्जन के बारे में नहीं हैI
महेन्द्र पांडे
पिछले महीने आयोजित जी-20 समूह की बैठक को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संबोधित करते हुए कहा था कि जलवायु परिवर्तन रोकने के मुद्दे पर हम अपने निर्धारित लक्ष्य से भी अधिक काम कर रहे हैंI इस सन्दर्भ में उदाहरण के तौर पर लगातार नवीनीकृत ऊर्जा क्षेत्र के आंकड़े प्रस्तुत किये जाते हैं, पर उसमें भी पिछले दो वर्षों से मंदी छा गई हैI सौर और पवन ऊर्जा की अनेक कम्पनियां बंद हो चुकी हैं, अनेक परियोजनाएं रोक दी गई हैंI
दूसरी तरफ बड़े देशों में भारत ही एक ऐसा देश है जहां कोयले की मांग और खपत लगातार बढ़ती जा रही है और कोयला आधारित नए बिजलीघर आज भी स्थापित किये जा रहे हैंI भारत के कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन के उत्सर्जन के आंकड़ों पर लगातार देशी-विदेशी वैज्ञानिक प्रश्न चिह्न लगाते रहे हैंI संयुक्त राष्ट्र ने भारत सरकार द्वारा प्रस्तुत वनों के आंकड़ों पर भी सवाल खड़ा किया था और इन्हें फिर से पेश करने को कहा थाI इन सबके बीच, सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या भारत जैसा देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन या फिर पर्यावरण विनाश के सही आंकड़े प्रस्तुत कर सकता है?
पिछले वर्ष जब भारत सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 को हटा दिया और उसके बाद नागरिकता संशोधन कानून लागू किया तब देश-विदेश में तीखी प्रतिक्रया व्यक्त की गई थीI इसके विरोध में मलेशिया के प्रधानमंत्री महाथिर मोहम्मद ने भी तीखे बयान दिए थे। जाहिर है ये बात पीएम मोदी और उनकी सरकार को नागवार गुजरीI सरकारी तौर पर तो इस पर विरोध दर्ज कराया ही गया, पर पर्दे के पीछे से मलेशिया को व्यापारिक तौर पर कमजोर भी किया गयाI
दरअसल भारत पाम आयल का दुनिया में सबसे बड़े उपभोक्ता और आयातक देशों में सम्मिलित हैI परंपरागत तौर पर मलेशिया से भारत में सबसे अधिक पाम आयल का आयात किया जाता हैI जब सरकार ने मलेशिया के प्रधानमंत्री के वक्तव्यों पर विरोध दर्ज किया, तब सरकार को खुश करने के लिए देश के पाम आयल व्यापारी संघ ने अचानक मलेशिया से पाम आयल के आयात को बंद करने का ऐलान कर दिया और महंगे दामों पर इंडोनेशिया से इसका आयात करना शुरू कर दियाI
इंडोनेशिया को जब भारत से बड़े आर्डर मिलने लगे तब वहां इसके उत्पादन को बढाने के तरीके आजमाए जाने लगेI इन तरीकों में एक था, पाम आयल के पौधों को नए क्षेत्र में लगाना और इनका दायरा बढ़ानाI इसके लिए नए क्षेत्र तलाशे गए, जिनमें अधिकतर क्षेत्र वहां के वर्षा वनों को काट कर निकाले गएI इंडोनेशिया के वर्षा वन विशेष हैं और ऐसे जंगल पूरे एशिया में दूसरे नहीं हैंI विशेष वनस्पतियों और वन्यजीवों से भरे ये वन सामान्य वनों की अपेक्षा वायुमंडल में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड का अधिक अवशोषण करते हैंI
ऐसे में जब पाम आयल प्लान्टेशन के लिए जंगलों का बड़ा हिस्सा साफ किया गया, तब जाहिर है वनस्पतियों में अवशोषित कार्बन वायुमंडल में मिल गयाI भारत को पाम आयल का निर्यात करने के लिए इंडोनेशिया में जंगल काटे गए और इससे कार्बन डाइऑक्साइड भारी मात्रा में वायुमंडल तक पहुंची, पर इसका उल्लेख हमारे देश के उत्सर्जन में कहीं नहीं होगाI
इन दिनों देश में अधिकतर बड़े ताप बिजली घर गौतम अडानी की कंपनियों के नाम हैं और अनेक नए बड़े बिजलीघर उनकी कंपनी स्थापित भी कर रही हैI समस्या यह है कि अपने देश में कोयला के भंडार तो बहुत हैं पर उनकी गुणवत्ता अच्छी नहीं हैI ऑस्ट्रेलिया के कोयले की गुणवत्ता बहुत अच्छी मानी जाती हैI अडानी की कंपनी ने ऑस्ट्रेलिया के सबसे बड़े कोयला खदानों में से एक को खरीदा और अब उस पर काम अंतिम चरण में है और जल्द ही उत्पादन शुरू होगाI इसके लिए बड़े पैमाने पर वनस्पतियों का सफाया किया गया, रेल लाइन बिछाने के लिए जंगल काटे गए और पोर्ट बनाने के लिए कोरल रीफ को बर्बाद किया गयाI जाहिर है, देश के ताप बिजली घरों को चलाने के लिए ऑस्ट्रेलिया में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ गयाI
कुछ दिनों पहले की खबर के अनुसार दुनिया भर में बड़ी खान-पान से जुड़ी अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां जो चिकेन परोसती हैं, उन मुर्गों/मुर्गियों का मुख्य भोजन सोयाबीन है, जो पहले चीन से मंगाया जाता था, पर अब चीन का बहिष्कार करने के चक्कर में ब्राजाल से मंगाया जाता हैI ब्राजील में सोयाबीन की खेती का क्षेत्र बढाने के नाम पर अमेजन के वर्षा वन काटे जा रहे हैं, जिनसे एक तरफ तो पर्यावरण का विनाश हो रहा है तो दूसरी तरफ ग्रीनहाउस गैसें वायुमंडल में मिल रही हैंI ब्राजील के अमेजन के वर्षा वनों को धरती का फेफड़ा कहा जाता है, क्योंकि हवा को साफ करने में इनका बड़ा योगदान हैI
जाहिर है कि किसी देश द्वारा ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बता पाना कठिन काम है, क्योंकि मुक्त व्यापार के इस दौर में हरेक देश के कारण उत्सर्जन दूसरे देशों में भी हो रहा हैI अब, अमेरिका में नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन के निर्वाचन की इलेक्टोरल कॉलेज से स्वीकृति मिलने के बाद से फिर से जलवायु परिवर्तन के नियंत्रण से संबंधित पेरिस समझौते, जिसके हाल में ही पांच वर्ष पूरे हुए हैं, की चर्चा जोर-शोर से की जा रही हैI जो बाइडेन ने जलवायु परिवर्तन से संबंधित अपनी प्रतिबद्धता को फिर से दुहराया हैI उनके अनुसार राष्ट्रपति पद का जिम्मा संभालते ही पहले दिन वे पेरिस समझौते में वापस शामिल होने की कार्यवाही शुरू कर देंगे और अपने कार्यकाल के 100 दिनों के भीतर ग्रीनहाउस गैसों के प्रमुख उत्सर्जक देशों का सम्मलेन अमेरिका में आयोजित करेंगेI
पेरिस समझौते को सफल बनाने के लिए आवश्यक है कि देशों और दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की सटीक जानकारी हो, पर समस्या यह है कि जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि के बारे में वैज्ञानिकों को जितनी ठोस जानकारी है, उतनी इसके उत्सर्जन के बारे में नहीं हैI नीतियों में भले ही विभिन्न देशों में भिन्नता हो, पर व्यापार के मामले में सभी देश एक दूसरे से मिले हुए हैंI एक देश की मांग दूसरे देश से पूरी हो रही है, ऐसे में दूसरे देश के ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का जिम्मेदार किसे माना जाएगा, यह भी स्पष्ट नहीं हैI (navjivanindia.com)
-राजेश प्रियदर्शी
वास्को डी गामा 1498 में भारत आए और इसके 12 वर्षों के भीतर पुर्तगालियों ने गोवा पर कब्ज़ा जमा लिया।
1510 से शुरू हुआ पुर्तगाली शासन गोवा के लोगों को 451 सालों तक झेलना पड़ा। 1961 में 19 दिसंबर को उन्हें आज़ादी मिली यानी भारत के आजाद होने के करीब साढ़े 14 साल बाद।
आजादी के लिए गोवा के संघर्ष को मानो भुला दिया गया है। गोवा, दमन और दीव के भारत में शामिल होने के पीछे अनेक लोगों की भूमिका थी जिनके बारे में लोगों को शायद ही पता हो।
भारतीय सेना के ऑपरेशन विजय के 36 घंटों के भीतर पुर्तगाली जनरल मैनुएल एंटोनियो वसालो ए सिल्वा ने ‘आत्मसमर्पण’ के दस्तावेज़ पर दस्तख़त कर दिए, लेकिन ऑपरेशन विजय इस लड़ाई का अंतिम पड़ाव था। आजादी की अलख गोवा में डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने 1946 की गर्मियों में जलाई थी।
डॉक्टर लोहिया अपने मित्र डॉक्टर जूलियाओ मेनेज़ेस के निमंत्रण पर गोवा गए थे। लोहिया गोवा के असोलना में डॉ। मेनेजेस के घर पर रुके, जहां उन्हें पता चला कि पुर्तगालियों ने किसी भी तरह की सार्वजनिक सभा पर रोक लगा रखी है।
ओमप्रकाश दीपक और अरविंद मोहन की किताब ‘लोहिया एक जीवनी’ में गोवा में लोहिया के संघर्ष के बारे में इस तरह लिखा गया है, ‘उनका इरादा तो बीमार शरीर को आराम देने का था, लेकिन गोवा जाकर उन्होंने देखा कि पुर्तगाली शासन, ब्रितानियों से भी अधिक वहशी है। लोगों के किसी भी तरह के नागरिक अधिकार नहीं थे। डॉक्टर लोहिया ने 200 लोगों को जमा करके एक बैठक की, जिसमें तय किया गया कि नागरिक अधिकारों के लिए आंदोलन छेड़ा जाए।’
गोवा में लोहिया की पहली चुनौती
18 जून 1946 को बीमार राम मनोहर लोहिया ने पुर्तगाली प्रतिबंध को पहली बार चुनौती दी। तेज़ बारिश के बावजूद उन्होंने पहली बार एक जनसभा को संबोधित किया, जिसमें उन्होंने पुर्तगाली दमन के विरोध में आवाज उठाई। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और मडग़ांव की जेल में रखा गया।
महात्मा गांधी ने ‘हरिजन’ में लेख लिखकर पुर्तगाली सरकार के दमन की कड़ी आलोचना की और लोहिया की गिरफ़्तारी पर उन्होंने सख़्त बयान दिया, जिसके बाद पुर्तगालियों ने माहौल गर्माता देखकर लोहिया को गोवा की सीमा से बाहर ले जाकर छोड़ दिया।
रिहाई के बाद लोहिया के गोवा में प्रवेश पर पांच साल का प्रतिबंध लगा दिया गया, लेकिन वे अपना काम कर चुके थे, पुर्तगाली दमन से परेशान गोवा के हिंदुओं और कैथोलिक ईसाइयों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरणा ली और ख़ुद को संगठित करना शुरू किया।
गोवा से पुर्तगालियों को हटाने के काम में एक क्रांतिकारी दल सक्रिय था, उसका नाम था-आजाद गोमांतक दल। विश्वनाथ लवांडे, नारायण हरि नाईक, दत्तात्रेय देशपांडे और प्रभाकर सिनारी ने इसकी स्थापना की थी।
इनमें से कई लोगों को पुर्तगालियों ने गिरफ़्तार करके लंबी सज़ा सुनाई और इनमें से कुछ लोगों को तो अफ्ऱीकी देश अंगोला की जेल में रखा गया। विश्वनाथ लवांडे और प्रभाकर सिनारी जेल से भागने में कामयाब रहे और लंबे समय तक क्रांतिकारी आंदोलन चलाते रहे।
लोहिया को गांधी का समर्थन
1954 में लोहिया की प्रेरणा से गोवा विमोचन सहायक समिति बनी, जिसने सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा के आधार पर आंदोलन चलाया। महाराष्ट्र और गुजरात में आचार्य नरेंद्र देव की प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के सदस्यों ने भी उनका भरपूर साथ दिया।
‘लोहिया एक जीवनी’ बताती है कि गोवा छोडऩे से पहले डॉक्टर साहब ने आह्वान किया कि गोवा के लोग अपना संघर्ष जारी रखें।

लोहिया ने तीन महीने बाद गोवा लौटने का वादा किया लेकिन दिसंबर 1946 आते-आते भारत के दूसरे हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा की आग भडक़ उठी और लोहिया गोवा नहीं जा सके क्योंकि वे गांधी के साथ हिंसा की आग बुझाने में लगे थे।
किताब के मुताबिक, ‘लोहिया अपने वादे को नहीं भूले, वे दोबारा गोवा गए लेकिन उन्हें रेलवे स्टेशन पर ही गिरफ़्तार कर लिया गया। इस बार भी गांधी लोहिया की गिरफ़्तारी पर लगातार बोलते रहे। दस दिन तक जेल में रखे जाने के बाद लोहिया को दोबारा गोवा की सीमा से बाहर ले जाकर छोड़ दिया गया।’
गौर करने की बात ये भी है कि गोवा की आजादी की लड़ाई में लोहिया की भूमिका को सिर्फ गांधी का समर्थन मिला, कांग्रेस पार्टी के बड़े नेताओं नेहरू और पटेल का ध्यान गोवा की तरफ नहीं था, वे समझते थे कि इससे अंग्रेजों के खिलाफ चल रही मुख्य लड़ाई से ध्यान भटकेगा।
इस बीच, लोहिया ने गोवा से लगे कई जि़लों का दौरा किया। उन्होंने गोवा की आज़ादी की भावना रखने वाले लोगों को संगठित करने का काम शुरू किया।
उन्होंने मुंबई में बसे गोवा के लोगों को जुटाया और आंदोलन की तैयारी में जुट गए। ‘लोहिया एक जीवनी’ बताती है कि ‘गोवा वाले चाहते थे कि लोहिया ही उनका नेतृत्व करें, लेकिन गांधी जी की राय थी कि गोमान्तक लोगों को अपनी लड़ाई ख़ुद लडऩी चाहिए। इसके बाद गांधी ने लोहिया को अपने पास बुला लिया।’
‘गोवा की पराधीनता भारत के गाल पर फुंसी’
‘लोहिया एक जीवनी’ में लिखा है, ‘फऱवरी 1947 में नेहरू ने यहां तक कह दिया कि गोवा का प्रश्न महत्वहीन है। उन्होंने इस पर भी संदेह जताया कि गोवा के लोग भारत के साथ आना चाहते हैं। इसके बाद गोवा की स्वतंत्रता का आंदोलन मुरझाने लगा। लेकिन गोवा के लोगों का मन बदल चुका था, उनकी स्वतंत्र आत्मा के प्रतीक बन चुके थे डॉक्टर राममनोहर लोहिया।’
मुख्तार अनीस ने अपनी किताब ‘समाजवाद के शिल्पी’ (पेज-142) पर लिखा है कि ‘तब भारत में कांग्रेस और मुस्लिम लीग की अस्थायी सरकार थी, उस सरकार के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने एक बयान में कहा कि गोवा की पराधीनता भारत के गाल पर एक छोटी-सी फुंसी है, जिसे अंग्रेज़ों के जाते ही आसानी से मसलकर हटाया जा सकता है।’
मुख्तार अनीस लिखते हैं कि ‘सरदार पटेल ने भी साफ़ कह दिया कि गोवा से (अस्थायी) सरकार का कोई वास्ता नहीं है लेकिन लोहिया को गांधी जी का आशीर्वाद प्राप्त था।’
भारत के साथ आजाद नहीं हुआ गोवा
बँटवारे और भयावह सांप्रदायिक हिंसा के बाद भारत को आजादी मिल गई लेकिन गोवा पुर्तगाल के ही कब्जे में रहा। यहां तक कि 1954 में फ्रांसीसी पांडिचेरी छोडक़र चले गए मगर गोवा आजाद नहीं हो पाया।
भारत सरकार ने 1955 में गोवा पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। इन प्रतिबंधों के जवाब में पुर्तगाल ने क्या किया, इसकी जानकारी गोवा में रहने वाले एक बुज़ुर्ग होटल व्यवसायी ने बीबीसी को दी थी। तब हिगिनो रोबेलो की उम्र 15 साल थी।
उन्होंने बताया, ‘हम वास्को में रहते थे जो मुख्य पोर्ट था। भारतीय प्रतिबंध के बाद नीदरलैंड्स से आलू, पुर्तगाल से वाइन, पाकिस्तान से चावल और सब्जिय़ां और श्रीलंका (तब सीलोन) से चाय भेजी जाने लगी।’
भारत और पुर्तगाल के बीच तनाव गहरा रहा था। डॉक्टर लोहिया के कई युवा समाजवादी शिष्य गोवा की आज़ादी के आंदोलन में कूद पड़े। इन लोगों में सबसे अहम नाम मधु लिमये का है जिन्होंने गोवा की आज़ादी के लिए 1955 से 1957 के बीच दो साल गोवा की पुर्तगाली जेल में बिताए, जहां उन्हें कई तकलीफ़ों का सामना करना पड़ा। उन दिनों गोवा की जेलें सत्याग्रहियों से भर गई थी और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इन आंदोलनकारियों की रिहाई के लिए पोप से हस्तक्षेप करने की अपील की थी।
आखिरकार आज़ादी कैसे मिली?
गोवा को 19 दिसंबर 1961 को कैसे आजादी मिली, इसकी कहानी बहुत दिलचस्प है। जिस फुंसी की बात नेहरू कर रहे थे, उसे मसलना उतना आसान नहीं था जितना उन्होंने सोचा था।
पुर्तगाल आसानी से गोवा को छोडऩे के मूड में नहीं था, वह नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन (नेटो) का सदस्य था और नेहरू किसी सैनिक टकराव से हिचक रहे थे।
1961 के नवंबर महीने में पुर्तगाली सैनिकों ने गोवा के मछुआरों पर गोलियां चलाईं जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई, इसके बाद माहौल बदल गया। (बाकी पेज 8 पर)
भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री केवी कृष्णा मेनन और नेहरू ने आपातकालीन बैठक की।
इस बैठक के बाद 17 दिसंबर को भारत ने 30 हज़ार सैनिकों को ऑपरेशन विजय के तहत गोवा भेजने का फैसला किया, इस ऑपरेशन में नौसेना और वायुसेना भी शामिल थी।
भारतीय सेना की बढ़त को रोकने के लिए पुर्तगालियों ने वास्को के पास का पुल उड़ा दिया। लेकिन 36 घंटे के भीतर पुर्तगाल ने कब्जा छोडऩे का फैसला कर लिया।
इस तरह डॉक्टर लोहिया का आजाद गोवा को देखने का सपना पूरा हुआ, लेकिन वैसे नहीं जैसे वे चाहते थे। गांधी की तरह लोहिया भी चाहते थे कि गोवा सत्याग्रह से आजाद हो, न कि बंदूक की ताकत से। (bbc.com)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
बांग्लादेश की जयंति के 49 वें और शेख मुजीबुर्रहमान के शताब्दि समारोह के उपलक्ष्य में भारत और बांग्लादेश के प्रधानमंत्रियों के बीच जो संवाद हुआ, वह दोनों देशों के बीच संबंधों की घनिष्टता का द्योतक तो है ही, इस अवसर पर दोनों देशों के बीच जो 7 समझौते हुए हैं, वे आपसी व्यापार, लेन-देन और आवागमन में काफी बढ़ोतरी करेंगे। 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान बंद हुआ हल्दीबाड़ी-चिलहटी रेल-मार्ग भी अब खुल जाएगा। पहले चार रेल मार्ग तो खुल ही चुके हैं। इस रेल-मार्ग के खुल जाने से बंगाल और असम के बीच आवागमन बहुत सुगम हो जाएगा।
दोनों नेताओं के सहज संवाद से यह आशा भी बंधती है कि जल-बंटवारा, रोहिंग्या संकट, सीमाई हिंसा और कोरोना-संकट जैसे मामलों में भी भारत बांग्लादेश की मदद करेगा। वास्तव में बांग्लादेश के साथ भारत का पिता-पुत्र का संबंध है। यदि भारत नहीं चाहता तो बांग्लादेश बन ही नहीं सकता था। 1971 में श्रीमती इंदिरा गांधी ने विलक्षण साहस का परिचय दिया और पाकिस्तानी फौज के चंगुल से बांग्लादेश को मुक्त कर दिया।
उन दिनों दिल्ली के स्रपू हाउस में जब हम बांग्ला-आंदोलन के समर्थन में सभाएं करते थे तो हम कहा करते थे कि शेख मुजीब ने उस आधार को ही उलट दिया है, जिसके दम पर मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान बनाया है। पाकिस्तान का आधार मजहब था लेकिन मुजीब ने प्रश्न किया कि मजहब बड़ा कि भाषा? मुजीब ने सिद्ध किया कि मजहब से भी बड़ी है, भाषा और संस्कृति ! इसी आधार पर इस्लामी होते हुए भी मजहब के आधार पर बने पाकिस्तान से बांग्लादेश अलग हो गया। इस देश का नाम ही इसकी भाषा पर रखा गया है। मुझे खुशी है कि प्रधानमंत्री शेख हसीना ने हमारी इसी बात को फिर दोहराया है। इस अवसर पर उन्होंने कहा बांग्लादेश में हम सांप्रदायिक अराजकता को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करेंगे। ‘हिफाजते-इस्लाम’ के कट्टरपंथी लोग शेख मुजीब की मूर्ति लगाने का भी विरोध कर रहे हैं। हसीना ने इस्लामी कट्टरवादियों को फटकारते हुए कहा है कि यह बांग्लादेश जितना काजी नजरुल इस्लाम, लालन शाह, शाह जलाल और खान जहानअली का है, उतना ही रवींद्रनाथ ठाकुर, जीवानंद और शाह पूरन का है। इस देश की आजादी के लिए मुसलमानों, हिंदुओं, बौद्धों और ईसाइयों-सबने अपना खून बहाया है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
पुष्य मित्र
बंगाल में इन दिनों कुछ बड़े तृणमूल नेताओं के द्वारा पार्टी छोडक़र भाजपा में शामिल होने की खबरें हैं। इनमें सुभेंदु अधिकारी का जैसा बड़ा नाम है, जो हाल तक बंगाल की सरकार में मंत्री रहे हैं। इस घटना को बंगाल में बीजेपी की बढ़त के रूप में देखा जा रहा है। इससे पहले भी बंगाल में मुकुल राय जैसे बड़े तृणमूल कांग्रेस के नेता भाजपा जा चुके हैं और वे अभी बंगाल बीजेपी के बैकबोन हैं। मगर सबसे दिलचस्प बात है कि इन दोनों बड़े नेताओं का नाम शारदा चिटफंड घोटाले से जुड़ा है और भाजपा को इस बात से कोई दिक्कत नहीं है।
हाल ही में इस मामले से जुड़ी एक विचित्र घटना बंगाल में हुई। 5 दिसंबर को मीडिया में शारदा चिटफंड घोटाले के प्रमुख अभियुक्त सुदीप्त सेन की जेल से लिखी एक चि_ी वहां की मीडिया में वायरल हुई। वह चि_ी उन्होंने पीएम मोदी और बंगाल की सीएम ममता बनर्जी के नाम लिखी थी।
उस चि_ी में उन्होंने खास तौर पर इस बात पर निराशा जताई थी कि जिन बड़े तृणमूल नेताओं ने उनकी करोड़ों की राशि हड़प ली थी, वे अब भाजपा में शामिल हो रहे हैं। इसमें उन्होंने पांच बड़े नेताओं का नाम लिया, जिसमें दो नेता ऐसे थे, जो अब भाजपा की तरफ हैं।
इनमें पहला नाम मुकुल राय का है, जिसका नाम शारदा घोटाले में आने के बाद 2015 में उन्हें तृणमूल कांग्रेस से छह साल के लिए निकाल दिया गया था। मगर भाजपा ने मुकुल राय को हाथोंहाथ लपक लिया, क्योंकि वे बंगाल के कद्दावर नेता थे। कभी ममता दीदी के बहुत करीबी रहे मुकुल राय अब बंगाल में भाजपा की बैकबोन हैं।
दूसरा नाम उस सुभेंदु अधिकारी का है, जो तृणमूल कांग्रेस से अभी हाल में अलग हुए हैं और कल उनके भाजपा ज्वाइन करने की खबरें हैं। मतलब साफ है कि भाजपा हर हाल में बंगाल में मजबूत होने की कोशिश कर रही है, उसे इसके लिए भ्रष्टाचारी नेताओं से भी परहेज नहीं है, अगर वे कुछ वोट उसे दिला सकें।
सुदीप्त सेन की चि_ी में कुछ कांग्रेस औऱ वाम नेताओं के भी नाम हैं। मगर उन नेताओं ने इन आरोपों का खंडन किया है। सुदीप्त की जेल से लिखी चि_ी इन पोस्ट के साथ लगी है।
बंगाल में वैसे भी माइक्रोफाइनेंस औऱ चिटफंड कंपनियों का ग्रामीण इलाकों में बड़ा असर है। वे अक्सर वहां की राजनीति को भी प्रभावित करते हैं, क्योंकि गांव के इलाकों में बड़ी संख्या में इनके सदस्य होते हैं। अब तक इनके बीच तृणमूल कांग्रेस का बड़ा असर रहा है, अब भाजपा इनके बीच पैठ बनाने की कोशिश कर रही है।
बंगाल में अब तक जो राजनीति हो रही है, उससे समझ आ रहा है कि आने वाला चुनाव वहां किसी युद्ध की तरह लड़ा जायेगा, जिसमें अभी से सच्चाई और इमानदारी जैसी चीजें और सिद्धांत की बातों का लोप हो गया है। वहां चुनाव का अर्थ सिर्फ यह होने वाला है कि भाजपा कैसे जीतती है और ममता कैसे अपनी कुर्सी बचा लेती है। इस बीच सवाल वाम दल और कांग्रेस का भी है, जो बीजेपी और टीएमसी की आमने-सामने की फाइट में लगातार अप्रासंगिक हो रहे हैं। मीडिया में कहीं भी इनकी बातें नजर नहीं आ रही।
-कनक तिवारी
दिसम्बर के एक पखवाड़े भर कब तक लोग गुरु घासीदास पर केवल मंत्रियों के भाषण झेलने के लिए जीते रहेंगे? हमारे नेता, उद्योगपति, नौकरशाह और राजनीति के दलाल जनता के जीवन, आदर्शों, हालत और भविष्य को लेकर झूठ बोलते रहते हैं।
18 दिसम्बर को जन्मे गुरु घासीदास की सत्यनिष्ठा छत्तीसगढ़ के विचार संसार की आत्मा है। जातिवाद के खिलाफ किया गया उनका सैद्धांतिक संघर्ष झूठ के चरित्र का चेहरा नोचता रहता है। इस इलाके की सहज, निष्कपट बयानी में उनकी याद गाहे-बगाहे कौंधती रहती है। ऐसे ऋषि चिन्तक यदि सर्वजन सुलभ नहीं हों तो एक क्षेत्रीय संस्कृति के सामने कई नये खतरे मंडराने लगेंगे। उन्होंने शराबखोरी जैसी सामाजिक लत को लेकर भी वैचारिक जेहाद किया। मनुष्य को आदर्श जीवन जीने के लिए बहुत अधिक आडम्बर की जरूरत नहीं होती। यह भी गुरु घासीदास के जीवन का एक महत्वपूर्ण सन्देश है। छत्तीसगढ़ के जनजीवन की सादगी, सहजता और मिलनसारिता के तत्वों को यदि सबसे ज्यादा पोषक खाद मिलती रहती है, तो वह संत घासीदास के ही विचारों से।
ईसा मसीह, मोरध्वज, हरिश्चंद्र और गांधी जैसे सत्यशोधकों ने चाहे अनचाहे पंथ नहीं चलाया। घासीदास के नाम के पीछे वीरपूजा की भावना के साथ सत्य का अनुयायी पंथ स्वयमेव चला। सतनामी शब्द का असली अर्थ आध्यात्मिक है। उस पर जातीय चश्मा भले चढ़ गया है। सत्य के नाम के अनुयायी पंथ को अनुसूचित जाति क्यों कहा जाता है? घासीदास के अनुयायी समाज की तलहटी में क्यों रहें? सतनामी शब्द धार्मिक सामाजिकता का श्रेष्ठतम संस्कार है। एक माह या पखवाड़ा घासीदास की याद में सभा सम्मेलनों के लिए सुरक्षित हो गया है। लोग उनके नाम का राजनीतिक शोषण करते चलते हैं। छत्तीसगढ़ के इस अद्वितीय महापुरुष को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित करना चाहिए। सत्य पर लिखे ग्रंथ, इतिहास के शोध और आचरण की व्यवस्थाएं दैनिक व्यवहार से लेकर अनन्त आकाश तक की वृत्तियों का आत्माघर छत्तीसगढ़ क्यों नहीं बन सकता।
अन्य पंथों तथा धर्मों ने जातियों और तरह तरह के समूहों को प्रश्रय दिया है। गुरु घासीदास हैं जो कहते हैं आओ सत्य के रास्ते पर चलकर एक नया संसार बनाएं। वही धर्म है, वही अर्थ है, वही काम और वही मोक्ष है। दु:खद है कि उनके रास्ते चलने वाले समाज को दलित, पिछड़ा और अछूत तक समझा जाता है। वह नौकरी में तरक्की का आरक्षण लेकर सडक़ से संसद तक लड़ रहा है। उसे समाज के उच्च वर्गों तथा उच्च पदों पर बिठाने से अब तक सवर्णों को कोफ्त है। बिहार की महावीर, गुरु गोविन्द सिंह और बुद्ध के कारण प्रतिष्ठा है। अपनी तमाम प्रशासनिक उपलब्ध्यिों का प्रचार करने वाले छत्तीसगढ़ को देश में यह आध्यात्मिक गौरव अब तक क्यों नहीं मिलता कि वह गुरु घासीदास की जन्मस्थली है। गांधी ने यही कहा था आवश्यक होने पर अहिंसा छोड़ी जा सकती है लेकिन सत्य कभी नहीं। यह गांधी ने गुरु घासीदास के बहुत बाद में कहा था। गिरोदपुरी छत्तीसगढ़ ही नहीं पूरे देश का तीर्थ केन्द्र कब बनेगा?
गुरु घासीदास ने सतनाम क्या कहा, छत्तीसगढ़ की आत्मा शुद्ध कर दी। सत्य का आचरण करते रहने की उनकी सीख विसंगतियों के बावजूद कुछ लोगों की सामाजिक आदत बनी। यह भी है कि सच के रास्ते चलने का उपक्रम करते लोग अनुसूचित जाति के कहलाने लगे। समाज में जातीय विग्रहों के कारण वे तलहटी में पहुंचा दिए गए। वे फिर भी ‘सतनामी‘ तो हैं। झूठ का तिलिस्म आततायी होता है। उसमें सत्तालोलुपता के कारण वंचितों का शोषण करने की हिंसा है। उसे सम्पत्ति के साथ सम्पृक्त होकर लहलहाते देखना भी छत्तीसगढ़ के नसीब में रहा है। कम प्रदेश होंगे जहां गुरु घासीदास की सत्यपरक अभिव्यक्ति की कद काठी के समाज सुधारक हुए होंगे। वर्ण, वर्ग और जातिवाद से संघर्ष करना भारत में दुस्साहस और जोखिम का काम है। ताजा इतिहास इस तरह की हजारों दुर्घटनाओं से पटा पड़ा है।
छत्तीसगढ़ भी सामूहिक हिंसा के षडय़ंत्रों से फारिग नहीं है। इसके बावजूद दिसम्बर का महीना गुरु के जन्मदिन के आसपास उष्ण सामाजिकता का पर्याय हो जाता है। गिरौदपुरी को वैचारिक अनुष्ठान का विश्वविद्यालय क्यों नहीं बनाया जा सकता? आत्मा के लोहारखाने में बैठकर गुरु घासीदास ने सादगी की शैली में मनुष्य की महानता के अप्रतिम गीत गाए। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि वे कब और किन परिस्थितियों में पैदा हुए और रहे। यह भी कि उनकी याद में उनकी जन्मतिथि के आसपास गांव गांव में यादध्यानी जश्न किए जाते हैं। राजनीतिक और सामाजिक जमावड़े उनके उत्तराधिकारी होने का दावा और ढोंग करते हैं।
गुरु के तात्विक यश की सामाजिक उपयोगिता को लेकर कोई सार्थक प्रयोजन होता दीखता नहीं। राजनीतिक कारणों की वजह से छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास और कोमाखान जमींदारी के विद्रोही नारायणसिंह की स्मृति में विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा हुई। घासीदास के नाम का प्रादेशिक विश्वविद्यालय केन्द्रीय विश्वविद्यालय हो गया है। सरकारी फाइलों में उनके नाम का गलत उल्लेख भी किया जाना पाया गया।
छत्तीसगढ़ का कोई विश्वविद्यालय, कॉलेज या स्कूल देश के चुनिंदा शिक्षा संस्थानों में नहीं है। घासीदास विश्वविद्यालय से शीर्ष लेखक मुक्तिबोध को दुरूह होने का आरोप लगाकर पाठ्यक्रम से निकाल दिया गया। गुरु घासीदास विश्वविद्यालय नाम रख देने भर से छत्तीसगढ़ के इस महान संत के प्रति हमारा दाय पूरा नहीं होता। विश्वविद्यालय प्रशासन में आए दिन भ्रष्टाचार, घूसखोरी और हिंसा तक की खबरें प्रकाशित होती रहती हैं।
क्यों नहीं इस संस्थान को घासीदास की स्मृति में दर्शन और विचारों के एक विश्वस्तरीय बौद्धिक संस्थान की तरह तब्दील किया जा सकता जहां अन्य विषयों की पढ़ाई के साथ-साथ दर्शन और नीतिशास्त्र के एक दुर्लभ अध्ययन-केन्द्र की स्थापना की जाए। उसमें सच का विभाग अपनी अतिविशिष्टता के लिए ख्यातनाम हो। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चमत्कार पुरुषों ओशो, महेश योगी आदि से कहीं बड़ा योगदान है गुरु घासीदास का। अन्य आग्रही व्यक्तियों को लेकर सरकारें कुछ करती रहती हैं। दिसम्बर के एक पखवाड़े भर कब तक लोग गुरु घासीदास पर केवल मंत्रियों के भाषण झेलने के लिए जीते रहेंगे? हमारे नेता, उद्योगपति, नौकरशाह और राजनीति के दलाल जनता के जीवन, आदर्शों, हालत और भविष्य को लेकर झूठ बोलते रहते हैं। फिर भी सत्ता की कुर्सी पर ये लोग क्यों बैठे रहते हैं बाबा घासीदास? कब तुम्हारे बेटे समाज में अपना हक इस तरह पाएंगे कि हरिश्चंद्र, मोरध्वज, ईसा मसीह, सुकरात, युधिष्ठिर, गांधी और तुम्हारे जैसे सप्तर्षि सत्य को धुवतारा बनाकर एक नया इतिहास लिखा जाए?
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
संसद का शीतकालीन सत्र स्थगित हो गया। अब बजट सत्र ही होगा। वैसे सरकार ने यह फैसला लगभग सभी विरोधी दलों के नेताओं की सहमति के बाद किया है। संसदीय कार्यमंत्री प्रहलाद पटेल का यह तर्क कुछ वजनदार जरुर है कि संसद के पिछले सत्र में सांसदों की उपस्थिति काफी कम रही और कुछ सांसद और मंत्री कोरोना के कारण स्वर्गवासी भी हो गए।
अब अगला सत्र, बजट सत्र होगा, जो जनवरी 2021 याने कुछ ही दिन में शुरु होनेवाला है। पटेल ने कुछ कांग्रेसी और तृणमूल सांसदों की आपत्ति पर यह भी कहा है कि भाजपा पर लोकतांत्रिक मूल्यों की अवहेलना का आरोप लगानेवाले नेता जरा अपनी पार्टियों में से पारिवारिक तानाशाही को तो कम करके दिखाएं। इन तर्कों के बावजूद यदि सरकार चाहती तो वह सभी दलीय नेताओं को शीतकालीन सत्र के लिए राजी कर सकती थी। यदि वे उस सत्र का बहिष्कार करते तो उनकी ही नाक कट जाती।
यदि संसद का यह सत्र आहूत होता तो सरकार और सारे देश को झंकृत करनेवाले कुछ मुद्दों पर जमकर बहस होती। यह ठीक है कि उस बहस में विपक्षी सांसद, सही या गलत, सरकार की टांग खींचे बिना नहीं रहते लेकिन उस बहस में से कुछ रचनात्मक सुझाव, प्रामाणिक शिकायतें और उपयोगी रास्ते भी निकलते। इस समय कोरोना के टीके का देशव्यापी वितरण, आर्थिक शैथिल्य, बेरोजगारी, किसान आंदोलन, भारत-चीन विवाद आदि ऐसे ज्वलंत प्रश्न हैं, जिन पर खुलकर संवाद होता।
यह संवाद इसलिए भी जरुरी है कि भाजपा के प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री तथा अन्य नेतागण पत्रकार-परिषद करने से घबराते हैं। आम जनता-दरबार लगाने की तो वे कल्पना भी नहीं कर सकते। संवाद की यह कमी किसी भी सरकार के लिए बहुत भारी पड़ सकती है। संवाद की इसी कमी के कारण हिटलर, मुसोलिनी और स्तालिन जैसे बड़े नेता मिट्टी के पुतलों की तरह धराशायी हो गए। इसमें तो विपक्षियों को जितना लाभ है, उतना किसी को नहीं है।
जिन लोगों को भारत राष्ट्र और इसके लोकतंत्र की चिंता है, वे चाहेंगे कि अगले माह होनेवाला बजट सत्र थोड़ा लंबा चले और उसमें स्वस्थ बहस खुलकर हो ताकि देश की समस्याओं का समयोचित समाधान हो सके।
(नया इंडिया की अनुमति से)
जरूरत है कि परंपरा का ढोल पीटती शब्द बहादुर राजनीति पहले सही मायनों में लोकमुखी बनकर इसके पीछे के लोक विज्ञान को समझे। तभी वह अन्न के बाजार और खेतों का धंधा चलाने वाले उस अमूर्त ग्लोबल बाजार की ताकतों का फर्क समझ सकेगी जो मीडिया और अपने एजेंटों की मार्फत अन्न के विश्व उत्पादन पर कब्जा करना चाहती हैं
पिछले लंबे दौर से हम देख रहे हैं कि साक्षरता से लेकर पर्यावरण या कृषि में सही सुधार लाने और जनचेतना जगाने की बातें हम आम जनता को लेकर अक्सर एक नकारात्मक टोन में शुरू करते हैं- कि हमारा किसानी प्रधान देश कॉरपोरेट किसानी से अज्ञानवश बिदकता है; कि हमारा ग्रामीण पर्यावरण जंगलों को चरागाह बनाने, पराली जलाने और भूमि के भीतर छुपे पानी के दोहन से बिगड़ रहा है। इसी तरह हमारे शहरी पर्यावरण की तबाही के लिए झुग्गी-झोपडिय़ों के अनगिनत निवासियों की बढ़ती अवैध बस्तियां और उनका अवैध जल-मल व्ययन जिम्मेदार है। हमारे किसान जिद में सिर्फ गेहूं या धान ही उगाना चाहते हैं ताकि उनको न्यूनतम समर्थन मोल मिलता जाए। अपने बच्चों की पढ़ाई भी वे अक्सर अधबीच छुड़ाकर उनको कमाने पर लगा देते हैं... आदि।
सोच-विचार का यह तरीका हालात को बेहतर बनाने में अब तक अक्षम रहा है। अलबत्ता राजनीतिक पार्टियों को इससे यह फायदा हुआ है कि चुनावी जनसभाओं में किसी भी संज्ञा के आगे ‘जन’ या ‘लोक’ जैसे शब्द जोडक़र खुद को असली आदर्श जनसेवक, जनांदोलनकारी, लोक हितैषी, लोक चेतना का वाहक वगैरह बना कर प्रोजेक्ट करना और विपक्ष को वातानुकूलित कमरों के शहरी बहसबाज बताना उनके लिए आसान बन गया है। इतने लोक हितैषी दलों की जनसेवकाई और भारी आत्मप्रचार के बावजूद अगर किसानों का ताजा आंदोलन बिना राजनीतिक अगुआई और मीडिया से कवरेज मांगे सारे देश के किसानों को आंदोलित कर सका है, तो मतलब साफ है- अब समय आ गया है कि देश राजनीति और लोक या जन के नाम पर खेले गए ओछे भाषाई खेलों के परे जाकर खेती के भविष्य पर सोचे।
मौजूदा संकट बता रहा है कि भारत में खेती महज बाजार और उत्पादक के बीच तक सीमित मामला नहीं है। उसको खाद-पानी देने वाली जड़ें भारत के समग्रराज, हमारे बहुरंगी समाज और पर्यावरण से भी कैसी गहराई से जुड़ी हुई हैं। इसलिए सोचने की बात यह नहीं कि खेती का स्वरूप सहकारी बना कर उसे बेहतर अन्न भंडारण और बिक्री की राह देने वाले निजी कॉरपोरेट क्षेत्र का सहयात्री किस तरह बनाया जाए। बल्कि यह कि कॉरपोरेट क्षेत्र के बीज उपलब्धि, फसलों की खरीद-बिक्री, भंडारण और वाजिब दाम चुकाई के स्थापित तौर-तरीकों को हमारे देश की अपनी क्षेत्रीय जरूरतों के अनुरूप किस तरह तराशा जाए। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का मसला इतने दशकों तक चुनाव-दर-चुनाव राजनीति की जरूरतों से ही तय होता रहा है। लोकशक्ति, यानी किसानी वोट बैंकों को अंतिम बूंद तक दुहने वाले हमारे सभी राजनीतिक दल किसानी की सहज लोकबुद्धि की उपेक्षा के दोषी हैं। कभी जल विरल राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा या पंजाब के जो किसान जल की हर बूंद को रजत कण मानते हुए लोकबुद्धि से संजोते हुए कम पानी में उग सकने वाले मोटे अनाज पैदा करते थे, वे अब एमएसपी की तहत अधिकतम कमाई की गारंटी बन चुकी गेहूं, धान और गन्ना-जैसी फसलें उगाने में अधिक रुचि लेते हैं।
चूंकि भारत की दलगत राजनीति हाईकमान की रुचि-अरुचि से हांकी जाती है, हमारे कृषि मंत्रालय के मंत्री और उनके विशेषज्ञ संसद से यूएन की बैठकों तक में विज्ञान और नई तकनीक के नाम पर ट्यूबवेल की पैरोकारी करते हुए गेहूं-धान की भारी उपज को हरित क्रांति की संज्ञा देते रहे।
दरअसल समाज का अधिकांश हिस्सा अभी भी अपना जीवन उस ढंग से चलाना चाहता है जहां उसके हाथ में पहल, शक्ति और साधन बने रहें। पहले आनन-फानन लाई गई नोटबंदी, फिर कोविड के आगमन बाद की तालाबंदी और अंतत: कृषि के रूप को सिरे से बदलने वाले तीन नए कानून जिन पर विपक्ष या लाभार्थियों से मशवरा नहीं किया गया, सारे समाज को आशंका से भर गए हैं। ये सारे कदम अचानक नागरिकों से उनके निजी साधन, पहल और ताकत लेकर एक बेचेहरा सरकारी मशीन को थमाने वाले साबित हुए हैं। और वह मशीनरी भी अचानक आए बदलाव से कदम मिला कर चलने में बहुत काबिल नहीं साबित हुई है। हरेक पुराने समाज का अपना एक पारंपरिक गणित और गणितज्ञ होता है। खेतिहर समाज के लिए जो देश का तीन चौथाई रोजगार सृजक है, वह गणितज्ञ लोक कवि घाघ थे। घाघ का दिया मोटा मंत्र है, ‘जो हल चाले खेती वाकी, और नहीं तो जाकी ताकी।’ यानी जो खेती करता है, खेत उसी का होता है। स्थानीय मालिक के हाथ न रही, तो खेती न इधर की रहती है, न उधर की।
दिल्ली की सीमा पर बैठे बुजुर्ग किसानों से पूछिए, उनकी मुख्य चिंता यही है कि कहीं राजनेताओं और उनके मित्र कॉरपोरेट क्षेत्र की जरूरतों से संचालित सहकारी खेती भी तमाम राष्ट्रीयकृत बैंकों और सहकारी गन्ना मिलों की तरह देर-सबेर गरीब की वह जोरू न बन जाए जिसे हर कोई भाभी कह कर छेड़ जाता है। ऐसे में नई किसम की कृषि तकनीकी सीखने, सहकारी प्रयोग करने, नेट बैंकिंग अपनाने या कॉरपोरेट ताकतों से भाव-ताव न कर पाने की क्षमता की वजह से वे नए कानूनों को लेकर बहुत आशंकित हैं।
दिक्कत यहीं से शुरू होती है। हर कॉरपोरेटीकरण को फायदेमंद और वैज्ञानिकता आधारित कहने के चक्कर में नेतृत्व की लच्छेदार घोषणाओं ने और उनके पीछे इक्के के घोड़े की तरह सर झुकाए चलने वाली सरकार ने कई अच्छे उपजाऊ उपक्रमों की जड़ में घुन लगा दिया है। फिर भी अब तक कृषि सुधारों की बाबत हो रही सरकारी संस्थानों की बातचीत आधुनिक शाब्दिक खिलवाड़ से ऊपर नहीं उठ रही है।
नई तरह की खेती, मने नई तरह के बीजों और रासायनिक खाद से पंप लगाकर हर तरह की जमीन से अधिकतम पैसा देने में सक्षम और ग्लोबल बाजारों में बिक सकने वाली पैदावार किस तरह हासिल की जाए। इसे साकार करने की प्रक्रिया में पिछले चार दशकों में उत्तर से दक्षिण तक, पूरब से पश्चिम तक, हर राज्य में कुदरत के बुनियादी नियमों को तोड़ा गया और पैदावारों के पुराने रूप और क्रम को बदल दिया गया। नदियों का बहाव बदला, जंगलों को काटकर खेत-कारखाने लगे, रासायनिक उर्वरकों के उत्पादन और छिडक़ाव को भरपूर सरकारी तवज्जो दी गई। नतीजा हुआ, बंजर बनती जमीन, पानी की बढ़ती किल्लत, प्रदूषित नदियां और झीलें तथा जंगली जानवरों से मानव बस्तियों तक कभी सार्स, कभी स्वाइन फ्लू, तो कभी कोविड-जैसे नए संक्रामक रोगों का आगमन। यह भारत ही नहीं, सारी दुनिया में हुआ है। हरी क्रांति के लाभ-हानि पर बहस अभी हमारे यहां ठीक से परवान भी नहीं चढ़ी कि उस क्रांति के जनक हम पर एक और क्रांति लाद रहे हैं। बीज क्रांति। इसके लिए उनको बड़े सहकारी फार्म चाहिए। भारत जैसे बीज विविधता भरे देशों के पारंपरिक बीजों का खात्मा चाहिए ताकि उनकी जगह नए सहकारी फार्मों में वे अपने प्रामाणिक उत्तम बीज बुआ सकें। उन बीजों का दबदबा बनाए रखने के लिए विदेशों में प्रशिक्षित हुए सरकारी कृषि वैज्ञानिकों ने कृषि विज्ञान का काग भगोड़ा हर राज्य के कृषि मंत्रालय के सामने खड़ा कर रखा है। ‘लोकल’, ‘ग्लोबल’, ‘वोकल’ की तुकबंदियां हो रही हैं जिनका जुमलेबाजी से आगे कोई मतलब नहीं।
जरूरत यह है कि परंपरा का दिन-रात ढोल पीटती शब्द बहादुर राजनीति पहले सही मायनों में लोकमुखी बनकर परंपरा के पीछे के लोक विज्ञान को समझे। तभी वह अन्न के बाजार और खेतों का धंधा चलाने वाले उस अमूर्त ग्लोबल बाजार की ताकतों का फर्क समझ सकेगी जो मीडिया और अपने एजेंटों की मार्फत अन्न के विश्व उत्पादन पर कब्जा करना चाहती हैं। घाघ पहले ही कह गए : ‘उत्तम खेती, मध्यम बान।’ पहले खेती, फिर वणिज।
अगर सरकार सचमुच चाहती है कि हमारे किसानों की आजीविका सुरक्षित रहे, उनका पैदा किया अन्न प्रदूषण रहित बने और वाजिब कीमत पर भारतीय उपभोक्ताओं को हासिल होता रहे, तो उसे दिन- रात राजनीतिक नफा-नुकसान या बजटीय आना-पाई का हिसाब बिठाने का मोह छोडऩा पड़ेगा। अपनी बात कहने को आतुर किसानों पर लाठी या पानी की तोप चलाने की बजाय अपने नीति निर्माता बाबुओं और कृषि पंडितों की फौज सहित आमने-सामने बैठकर किसानों से खेतिहर समाज की स्थानीय परंपराओं और शहरी विकास से उनके रिश्तों की बारीकियों को समग्रता से समझना होगा। कृषि और पर्यावरण के एक गहन अध्येता और जानकार अनुपम मिश्र के शब्दों में : ‘खेती का पवित्र रहस्य और उसकी सृजनशीलता वहीं है जहां वह हमेशा रही है, किसानी परिवारों में। ये ही किसान धरती के बीजों को सुरक्षित रखते आ रहे हैं, भविष्य में भी ये ही उन्हें सुरक्षित रख पाएंगे, बीजों के सौदागर नहीं।’ (navjivanindia.com)
-समीरात्मज मिश्र
किसान आंदोलन में शामिल होने से रोकने की शिकायतों के बीच उत्तर प्रदेश के संभल ज़िले में कुछ किसान नेताओं को 'शांति भंग' की आशंका के कारण 50 रुपये के बॉन्ड भरने संबंधी नोटिस जारी किया गया है.
हालाँकि प्रशासन का कहना है कि बॉन्ड की राशि को कम करके 50 हज़ार कर दिया गया है लेकिन जिन नेताओं को ये नोटिस दिए गए हैं, उन्होंने इस बात से इनकार किया है.
संभल के उप जिलाधिकारी दीपेंद्र यादव कहते हैं कि ये नोटिस सीआरपीसी की धारा 107 और 116 को तामील करने के संबंध में भेजे गए हैं जिसमें शांति भंग की आशंका होती है.
एसडीएम दीपेंद्र यादव ने बीबीसी को बताया, "यह एक निरोधात्मक कार्रवाई है जो कि पुलिस रिपोर्ट के आधार पर शांतिभंग की आशंका के चलते की जाती है. सीआरपीसी की धारा 111 के तहत ये नोटिस जारी किए गए हैं. यह एक औपचारिक कार्रवाई है ताकि किसी आंदोलन या प्रदर्शन के दौरान कोई आक्रामक कार्रवाई न हो."
संभल ज़िले में भारतीय किसान यूनियन (असली) के ज़िलाध्यक्ष राजपाल सिंह के साथ ही किसान नेता जयवीर सिंह, सतेंद्र उर्फ़ गंगाफल, ब्रह्मचारी, वीर सिंह और रोहतास को 50-50 लाख रुपये के निजी मुचलके से पाबंद करने के लिए नोटिस जारी किए गए हैं.
एसडीएम दीपेंद्र यादव ने बताया कि हयातनगर थाने की पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर ये नोटिस जारी किए गए हैं. रिपोर्ट में बताया गया था कि ये लोग गाँव-गाँव जाकर दिल्ली और अन्य स्थानों पर चल रहे किसान आंदोलन का प्रचार कर रहे हैं जिससे शांति भंग होने का ख़तरा है.

YAWAR NAZIR
'ना नोटिस का जवाब देंगे, न बॉन्ड भरेंगे'
किसान आंदोलन में शामिल होने से शांति भंग का ख़तरा कैसे हो सकता है?
इसके जवाब में एसडीएम दीपेंद्र यादव कहते हैं, "दरअसल, यह प्राथमिक और औपचारिक कार्रवाई होती है. नोटिस जारी करने का मतलब ही यही है कि लोग जो भी आंदोलन या प्रदर्शन करें, शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से करें. यदि आक्रामक होंगे, तो ये लोग ज़िम्मेदार होंगे. हालांकि बाद में जब रिपोर्ट मिली कि मुचलके की राशि ज़्यादा है तो इसे कम करके अब 50 हज़ार रुपया कर दिया गया है."
इन सभी छह नेताओं को 50-50 लाख रुपये के व्यक्तिगत मुचलके भरने और इतनी ही राशि की दो-दो ज़मानतें दाखिल कराने के लिए नोटिस दिया गया है. एसडीएम दीपेंद्र यादव कह रहे हैं कि बॉन्ड की राशि कम करके पचास हज़ार कर दी गई है लेकिन जिन नेताओं को नोटिस मिले हैं, वो इस बात से इनकार कर रहे हैं.
इसके अलावा कुछ अन्य किसान नेताओं को भी कम राशि के बॉन्ड भरने संबंधी नोटिस जारी किए गए हैं. हालांकि किसान नेताओं का कहना है कि वो नोटिस का जवाब नहीं देंगे और न ही बॉन्ड भरेंगे.
संभल ज़िले में भारतीय किसान यूनियन (असली) के ज़िलाध्यक्ष राजपाल सिंह को भी 50 लाख रुपये के बॉन्ड भरने का नोटिस मिला है.
हालाँकि राजपाल सिंह इस समय दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन में भाग लेने आए हुए हैं, लेकिन उनका कहना है कि वो लोग गांव में किसानों को इस क़ानून के बारे में बता रहे हैं और इसके विरोध में लगातार प्रदर्शन भी कर रहे हैं.

राजपाल सिंह
बीबीसी से बातचीत में राजपाल सिंह कहते हैं, "सीधी सी बात है सरकार हमें डराने-धमकाने के लिए ये सब कर रही है. किसान अपनी बात भी नहीं रख सकता. 50 लाख रुपये की ज़मानत हम ग़रीब किसानों से ली जा रही है. किसान क़ानून के विरोध को किसानों को भड़काना बता रहे हैं."
वो कहते हैं "अरे, किसान तो ख़ुद ही भड़का हुआ है. कितनों को आप 50 लाख रुपये का नोटिस देंगे और कितनों को जेल में बंद करेंगे? किसानों को दिल्ली तक आने नहीं दिया जा रहा है और अब डराने के लिए यह नया काम शुरू कर दिया है प्रशासन ने. पर हम डरने वाले नहीं हैं. एसडीएम ग़लत कह रहे हैं कि बॉन्ड की राशि 50 लाख से कम करके 50 हज़ार कर दी गई है. ऐसा नहीं हुआ है."
उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों से किसान दिल्ली के पास चिल्ला और ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर किसान क़ानूनों के ख़िलाफ़ धरना दे रहे हैं. धरने पर मौजूद कई किसानों का आरोप है कि उन्हें जगह-जगह रोकने की कोशिश की गई जिसकी वजह से उन लोगों को छिपकर यहाँ तक आना पड़ा.
लखनऊ से आए एक युवा किसान शैलेंद्र मिश्र का कहना था, "एक्सप्रेस वे पर पहले तो पुलिस वालों ने हमें रोककर चाय पिलाई, फिर हमसे कहा कि आप लोग गाड़ी से झंडे उतार लीजिए और वापस चले जाइए. हम लोगों ने झंडे लगी गाड़ी को वापस भेज दिया और फिर किसी तरह से बसों में बैठकर यहाँ तक आए."
इसके अलावा रामपुर, संभल, फ़िरोज़ाबाद, आगरा और अन्य ज़िलों के किसानों ने भी यही शिकायत की.
हालांकि पुलिस का कहना है कि किसी भी किसान को रोका नहीं जा रहा है लेकिन जगह-जगह धरने पर बैठे किसानों की यही शिकायत है कि उन्हें आगे नहीं जाने दिया जा रहा है, तभी वो लोग वहाँ बैठे हैं.

SAJJAD HUSSAIN
राजनीतिक दलों के नेताओं को भी नोटिस
लखनऊ में टाइम्स ऑफ़ इंडिया अख़बार के वरिष्ठ पत्रकार सुभाष मिश्र कहते हैं कि किसानों से बॉन्ड भराने जैसी कार्रवाई कुछ उसी तरह की है जैसे कि सीएए विरोधी प्रदर्शनों के बाद तमाम लोगों से ज़बरन वसूली जैसे नोटिस भेजे गए और प्रदर्शन से पहले भी कुछ लोगों को नोटिस भेजे गए थे.
उनके मुताबिक़, "किसान आंदोलन जहाँ भी हो रहा है, अब तक तो किसी तरह की कोई शांति भंग जैसी स्थिति नहीं आई. ऐसे में किसान नेताओं को नोटिस जारी करना समझ से परे है. प्रशासन का नोटिस जारी करने का सीधा मतलब है कि लोग डरें, जैसा कि पहले भी हो चुका है. 50 लाख रुपये के बॉन्ड का नोटिस जारी करने से पहले देखा तो होता कि यह नोटिस किसे जारी किया जा रहा है."
संभल में न सिर्फ़ किसानों को बल्कि कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं को भी इस तरह के नोटिस जारी किए गए हैं लेकिन और लोगों को दी गई नोटिस में मुचलके की राशि कम है. 50 रुपये के बॉन्ड संबंधी नोटिस छह किसान नेताओं को ही दिए गए हैं. (bbc.com)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
धोखेबाजी, जोर-जबर्दस्ती, लालच या भय के द्वारा धर्म-परिवर्तन करने को मैं पाप-कर्म मानता हूं लेकिन लव-जिहाद के कानून के बारे में जो शंका मैंने शुरु में ही व्यक्त की थी, वह अब सही निकली। संस्कृत में इसे कहते हैं- प्रथमग्रासे मक्षिकापात:। याने पहले कौर में ही मक्खी पड़ गई। मुरादाबाद के कांठ नामक गांव के एक मुस्लिम लडक़े मोहम्मद राशिद से पिंकी नामक एक हिंदू दलित लडक़ी ने 22 जुलाई को शादी कर ली थी। दोनों देहरादून में काम करते थे। दोनों में ‘लव’ हो गया था। पिंकी मुस्कानजहान बन गई। अब इन दोनों के खिलाफ बजरंग दल के कुछ अतिउत्साही नौजवानों ने ‘जिहाद’ छेड़ दिया।
पिंकी की मां को भडक़ाया गया। उसने थाने में रपट लिखवा दी कि मेरी बेटी को धोखा देकर शादी की गई है। एक मुसलमान ने हिंदू नाम रख कर उसे प्रेमजाल में फंसाया, मुसलमान होने के लिए मजबूर किया और फिर शादी कर ली। पुलिस ने राशिद और पिंकी दोनों को पकड़ लिया।राशिद और उसके भाई को जेल में डाल दिया गया और पिंकी को सरकारी शेल्टर होम में। यह लव-जिहाद कानून 2020 के तहत किया गया। यह कानून लागू हुआ 28 नवंबर 2020 से और यह शादी हुई थी, 24 जुलाई को। याने यह गिरफ्तारी गैर-कानूनी थी। इसके लिए किस-किस को सजा मिलनी चाहिए और किस-किस को उन पति-पत्नी से माफी मांगनी चाहिए, यह आप स्वयं तय करें।
पिंकी का पति और जेठ अभी भी जेल में हैं। पिंकी ने अपने बयान में साफ-साफ कहा है कि राशिद मुसलमान है, यह उसे शादी के पहले से पता था। उसने स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन किया, शादी की और गर्भवती हुई। उस मुस्कानजहान का गर्भ, जो दो-तीन महिने का था, इस पकड़ा-धकड़ी और चिंता में गिर गया। यह मानना जरा कठिन है कि सरकारी अस्पताल के डाक्टरों ने उसे जान-बूझकर गिराया होगा। हमारे डाक्टर ऐसी नीचता नहीं कर सकते लेकिन क्या इसका जवाब ‘‘हमारे लवजिहादियों’’ के पास है ? यदि जोर-जबर्दस्ती, लालच या डर के मारे पिंकी ने मुस्कानजहान बनना मंजूर किया होता तो शेल्टर होम से छूटने के बाद वह अपने हिंदू मायके में क्यों नहीं गई ? कांठ के मुस्लिम सुसराल में वह स्वेच्छा से क्यों चली गई ? इस घटना-चक्र ने लव-जिहाद के कानून के मुंह पर कालिख पोत दी है। उसे शीर्षासन करा दिया है।


