विचार/लेख
Richard Mahapatra-
दिल्ली के खान मार्केट में ग्राहक का इंतजार एक दुकानदार। फोटो: विकास चौधरीदिल्ली के खान मार्केट में ग्राहक का इंतजार एक दुकानदार। फोटो: विकास चौधरी दिल्ली के खान मार्केट में ग्राहक का इंतजार एक दुकानदार। फोटो: विकास चौधरी
साल 2020 एक बुरे सपने की तरह बीत रहा है और दुनिया इस भ्रम में है कि नए साल में महामारी का सूरज भी डूब जाएगा। लेकिन सच यह है कि वायरस किसी कैंलेडर को सम्मान की नजर से नहीं देखता। उसे तो बस मेजबान यानी होस्ट चाहिए। दुनिया के 7 बिलियन से अधिक लोग उसकी विकास यात्रा को अनवरत जारी रखने के लिए पर्याप्त हैं।
नोवेल कोरोनावायरस को चीन के एक बाजार में मानव मेजबान को खोजे करीब एक साल हो गया है। तब से लेकर अब तक यह करीब 200 देशों में फैलकर 16 लाख से अधिक लोगों की जान ले चुका है। बहुत से देश महामारी के प्रारंभिक चरण के मुकाबले उच्च संक्रमण दर से जूझ रहे हैं। बहुत से देशों का दावा है कि उन्होंने वक्र को समतल कर दिया है और अब दूसरी लहर का सामना कर रहे हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि दुनिया महामारी के प्रभाव से दरक सी गई है।
एक साल बाद महामारी को बारीकी से देखने की जरूरत है जो सौ साल में एक बार स्वास्थ्य पर गंभीर संकट खड़ा करती है। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि वायरस आगे भी अपना काम करता रहेगा यानी मेजबान खोजता रहेगा। बहरहाल महामारी के एक साल होने के क्या मायने हैं? इस प्रश्न का उत्तर खोजने से पहले यह जानना जरूरी है कि वायरस दुनिया में स्थायी कैसे बन रहा है। अलग-अलग समूह के लिए इसके अलग-अलग मतलब हैं। यह स्वास्थ्य पर संकट तो बना रहेगा लेकिन इसका सबसे गंभीर प्रभाव सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय हैं।
महामारी हमें इस तथ्य की रह रहकर याद दिलाती रहेगी कि हम राजनीतिक और आर्थिक परिप्रेक्ष्य से दरकिनार कर किए जाने को अभिशप्त हैं। हम भले ही एक ग्रह पर रह रहे हों लेकिन “एक दुनिया” में नहीं हैं। हमारी शासन व्यवस्था और विकास को परिभाषित करने वाली असमानता तब खुलकर सामने आ जाती है जब हम इस महामारी से लड़ते हैं। देशों के बीच ही नहीं बल्कि देश और समाज के भीतर की असमानता भी महामारी सामने ले आई है। आंकड़े बताते हैं कि गरीब आबादी सबसे ज्यादा प्रभावित है, चाहे वह गरीब देश की हो या अमीर। देश के भीतर विकास में क्षेत्रीय असमानता ने जनसंख्या के कुछ समूहों को अधिक प्रभावित किया है।
महामारी के दौर में असमानता गरीबों और वंचितों को आर्थिक रूप से तोड़ देती है। उदाहरण के लिए भारत में असंगठित क्षेत्र को सबसे अधिक आर्थिक क्षति पहुंची और इसी वर्ग की नौकरियां सबसे ज्यादा गईं। देशों की बात करें तो सबसे कम विकसित देशों को भीषण आर्थिक संकट से जूझना पड़ रहा है, इसलिए ये देश कल्याण कार्यक्रमों पर होने वाले खर्च में कटौती कर रहे हैं। विकसित देशों में भी सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर समझा जाने वाला तबका ही सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। यानी इसी तबके को जानमाल की सबसे अधिक क्षति पहुंची है। ऐसी स्थिति में दुनिया सतत विकास लक्ष्यों से बुरी तरह पिछड़ जाएगी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि गरीब और गरीब हो रहा है। हालांकि अमीर व्यक्ति अपनी दौलत के बूते महामारी के प्रभावों से बचकर इस संकट की घड़ी को आसानी से पार कर लेगा।
पर्यावरण की नजर से देखें तो जब देशों ने सख्त लॉकडाउन लागू किया तो हमने “नीले आसमान और साफ हवा” का जश्न मनाया। इसने एक बार फिर याद दिलाया कि हमने अपने पर्यावरण के साथ कितना बुरा सलूक किया है। अब एक साल बाद पता चल रहा है कि यह हमारी समृद्धि और उपभोग की अस्थायी झलक भर थी जिसने पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी से हमें विमुख कर दिया है। ऐसा तब है जब हमारी अर्थव्यवस्था प्रकृति पर आधारित है। कार्बन का उत्सर्जन कम जरूर हुआ है लेकिन इतना नहीं कि वैश्विक तापमान कम किया जा सके। यह साल तीन सबसे गर्म सालों में शामिल हो गया है। इससे स्पष्ट है कि दुनिया उत्सर्जन लक्ष्यों को पूरा करने के ठीक रास्ते पर नहीं है।
संक्षेप में कहें तो महामारी में गुजरे साल ने हमें बता दिया है कि हमने धरती और इसमें रहने वाले जीवों को कितना नुकसान पहुंचाया है। इसके गुनहगार हम ही हैं। इसीलिए कहा भी जा रहा है कि महामारी ने धरती से हमारे संबंधों को पुन: परिभाषित किया है। भले ही इस सीख की बड़ी आर्थिक और मानवीय कीमत है। बहरहाल, नया साल के आगमन की तैयारियों में जुट जाइए। (downtoearth)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
असम सरकार ने मदरसों के बारे में जो नीति बनाई है, उसे लेकर अभी तक हमारे सेक्यूलरिस्ट क्यों नहीं बौखलाए, इस पर मुझे आश्चर्य हो रहा है। असम के शिक्षा मंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने जो कदम उठाया है, वह तुर्की के विश्व विख्यात नेता कमाल पाशा अतातुर्क की तरह है। उन्होंने अपनी मंत्रिमंडल से यह घोषणा करवाई है कि अब नए सत्र से असम के सारे सरकारी मदरसे सरकारी स्कूलों में बदल दिए जाएंगे। राज्य का मदरसा शिक्षा बोर्ड अगले साल से भंग कर दिया जाएगा। इन मदरसों में अब कुरान शरीफ, हदीस, उसूल-अल-फिका, तफसीर हदीस, फरियाद आदि विषय नहीं पढ़ाए जाएंगे, हालांकि भाषा के तौर पर अरबी जरुर पढ़ाई जाएगी। जिन छोटे-बड़े मदरसों को स्कूल नाम दिया जाएगा, उनकी संख्या 189 और 542 है। इन पर सरकार हर साल खर्च होनेवाले करोड़ों रुपयों का इस्तेमाल अब आधुनिक शिक्षा देने में करेगी।
इस कदम से ऐसा लगता है कि यह इस्लाम-विरोधी घनघोर सांप्रदायिक षडय़ंत्र है लेकिन वास्तव में यह सोच ठीक नहीं है। इसके कई कारण हैं। पहला, मदरसों के साथ-साथ यह सरकार 97 पोंगापंथी संस्कृत केंद्रों को भी बंद कर रही है। उनमें अब सांस्कृतिक और भाषिक शिक्षा ही दी जाएगी। धार्मिक शिक्षा नहीं। अब से लगभग 70 साल पहले जब मैं संस्कृत-कक्षा में जाता था तो वहां मुझे वेद, उपनिषद् और गीता नहीं, बल्कि कालिदास, भास और बाणभट्ट को पढ़ाया जाता था। दूसरा, जो गैर-सरकारी मदरसे हैं, उन्हें वे जो चाहें सो पढ़ाने की छूट रहेगी। तीसरा, इन मदरसों और संस्कृत केंद्रों में पढऩेवाले छात्रों की बेरोजगारी अब समस्या नहीं बनी रहेगी। वे आधुनिक शिक्षा के जरिए रोजगार और सम्मान दोनों अर्जित करेंगे। चौथा, असम सरकार के इस कदम से प्रेरणा लेकर जिन 18 राज्यों के मदरसों को केंद्र सरकार करोड़ों रु. की मदद देती है, उनका स्वरुप भी बदलेगा। सिर्फ 4 राज्यों में 10 हजार मदरसे और 20 लाख छात्र हैं। धर्म-निरपेक्ष सरकार इन धार्मिक मदरसों, पाठशालाओं या गुरुकुलों पर जनता का पैसा खर्च क्यों करे? हां, इन पर किसी तरह का प्रतिबंध लगाना भी सर्वथा अनुचित है। असम सरकार ने जिस बात का बहुत ध्यान रखा है, उसका ध्यान सभी प्रांतीय सरकारें और केंद्रीय सरकार भी रखे, यह बहुत जरुरी है। असम के मदरसों और संस्कृत केंद्रों के एक भी अध्यापक को बर्खास्त नहीं किया जाएगा। उनकी नौकरी कायम रहेगी। वे अब नए और आधुनिक विषयों को पढ़ाएंगे। असम सरकार का यह प्रगतिशील और क्रांतिकारी कदम देश के गरीब, अशिक्षित और अल्पसंख्यक वर्गों के नौजवानों के लिए नया विहान लेकर उपस्थित हो रहा है।
-प्रमोद भार्गव
पश्चिम बंगाल में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमला राजनीतिक हिंसा की पराकाष्ठा है। हालांकि बंगाल में चुनावों के पहले ऐसी घटनाएं पहले भी देखने में आती रही हैं। लेकिन पिछले कुछ माहों से ये घटनाएं निरंतर घट रही हैं। बावजूद राज्य सरकार इन घटनाओं पर नियंत्रण के कोई ठोस उपाय करने की बजाय आग में घी डालने का काम कर रही है। केंद्र सरकार ने कानून व्यवस्था को लेकर राज्य के मुख्य सचिव और डीजीपी को दिल्ली तलब करने की तारीख 14 दिसंबर तय की तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कह दिया कि ‘इन अधिकारियों को भेजना या नहीं भेजना राज्य सरकार के विवके पर निर्भर है। सरकार के फैसले के बिना वे प्रदेश के बाहर कदम नहीं रख सकते हैं।’ इस असंवैधानिक स्थिति पर राज्यपाल जगदीप धनखड़ का कहना है कि ‘भारत के संविधान की रक्षा करना मेरी जिम्मेदारी है। यदि मुख्यमंत्री अपने रास्ते से भटकेंगी तो मेरी भूमिका शुरू हो जाएगी। मुख्यमंत्री को आग से नहीं खेलना चाहिए।’ दरअसल केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत ही दोनों अधिकारियों को तलब किया है, लेकिन ममता ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर केंद्र से बेवजह टकराव मोल ले लिया है।
पश्चिम बंगाल में यह असहिष्णुता पंचायत, निकाय, विधानसभा और लोकसभा चुनावों में एक स्थाई चरित्र के रूप में मौजूद रहती है। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जब हिंसा और अराजकता के लिए बदनाम राज्य बिहार और उप्र इस हिंसा से मुक्त हो रहे हैं, तब बंगाल और केरल में यह हिंसा बेलगाम होकर सांप्रदायिक रूप में दिखाई दे रही है। चूंकि नए साल की शुरूआत में बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं, इस नजरिए से मुख्य राजनीतिक दलों में जनता के बीच समर्थन जुटाने की होड़ लग गई है। भाजपा के काफिले पर हुआ हमला इसी होड़ का परिचायक है। यह हिंसा तब हुई, जब जेपी नड्डा को जेड स्तर की सुरक्षा मिली हुई है। इसे उच्चतम सुरक्षा-कवच के रूप में देखा जाता है। फिर भी इसे भेदने की निंदनीय कोशिशें हुईं तो यह चिंतनीय पहलू है। पूर्व घोषित कार्यक्रम के बावजूद सुरक्षा व्यवस्था और राज्य स्तरीय गुप्तचर एजेंसियां हमले को नहीं रोक पाई तो यह एक बड़ी चूक है। कुछ समय पहले ही भाजपा विधायक देवेंद्रनाथ की हत्या कर लाश सार्वजनिक स्थल पर टांग दी गई थी। देवेंद्रनाथ पिछले साल ही माकपा से भाजपा में शामिल हुए थे। बंगाल में वामदल अर्से से खूनी हिंसा के पर्याय बने हुए हैं। इन हिंसक वारदातों से पता चलता है कि बंगाल पुलिस अन्य राज्यों की पुलिस की तरह तृणमूल कांग्रेस की कठपुतली बनी हुई है।
बंगाल की राजनीति में विरोधी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्याएं होती रही हैं। वामदलों के साढ़े तीन दशक चले शासन में राजनीतिक हिंसा की खूनी इबारतें निरंतर लिखी जाती रही थीं। दरअसल वामपंथी विचारधारा विरोधी विचार को तरजीह देने की बजाय उसे जड़-मूल खत्म करने में विश्वास रखती हैं। ममता बनर्जी जब सत्ता पर काबिज हुई थीं, तब यह उम्मीद जगी थी कि बंगाल में लाल रंग का दिखना अब समाप्त हो जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे तृणमूल कांग्रेस वामदलों के नए संस्करण में बदलती चली गई। यही कारण रहा कि 2019 के लोकसभा चुनाव के पूर्व भी बंगाल को खूब रक्त से सींचने की कवायदें पेश आती रही थीं। भाजपा में वामदलों से लेकर कांग्रेस और तृणमूल के नेताओं के जाने का जो सिलसिला चल पड़ा है, वह थम जाए, इसीलिए प्रत्येक चार-छह दिन में एक बड़ी राजनैतिक हत्या बंगाल में देखने का सिलसिला बना हुआ है।
हिंसा की इस राजनीतिक संस्कृति की पड़ताल करें तो पता चलता है कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का पहला सैनिक विद्रोह इसी बंगाल के कलकत्ता एवं बैरकपुर में हुआ था, जो मंगल पाण्डे की शहादात के बाद 1947 में भारत की आजादी का कारण बना। बंगाल में जब मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी, तब सामाजिक व आर्थिक विषमताओं के विद्रोह स्वरूप नक्सलवाड़ी आंदोलन उपजा। लंबे समय तक चले इस आंदोलन को कू्ररता के साथ कुचला गया। हजारों दोषियों के दमन के साथ कुछ निर्दोष भी मारे गए। इसके बाद कांग्रेस से सत्ता हथियाने के लिए भारतीय माक्र्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के नेतृत्व में वाममोर्चा आगे आया। इस लड़ाई में भी विकट खूनी संघर्ष सामने आया और आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में वामदलों ने कांग्रेस के हाथ से सत्ता छीन ली। लगातार 34 साल तक बंगाल में माक्र्सवादियों का शासन रहा। इस दौरान सियासी हिंसा का दौर नियमित चलता रहा। तृणमूल सरकार द्वारा जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1977 से 2007 के कालखंड में 28 हजार राजनेताओं की हत्याएं हुईं।
सर्वहारा और किसान की पैरवी करने वाले वाममोर्चा ने जब सिंगूर और नंदीग्राम के किसानों की खेती की जमीनें टाटा को दीं तो इस जमीन पर अपने हक के लिए उठ खड़े हुए किसानों के साथ ममता बनर्जी आ खड़ी हुईं। मामता कांग्रेस की पाठशाला में ही पढ़ी थीं। जब कांग्रेस उनके कड़े तेवर झेलने और संघर्ष में साथ देने से बचती दिखी तो उन्होंने कांग्रेस से पल्ला झाड़ा और तृणमूल कांग्रेस को अस्तित्व में लाकर वामदलों से भिड़ गईं। इस दौरान उन पर कई जानलेवा हमले हुए, लेकिन उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं खींचे। जबकि 2001 से लेकर 2010 तक 256 लोग सियासी हिंसा में मारे गए। यह काल ममता के रचनात्मक संघर्ष का चरम था। इसके बाद 2011 में बंगाल में विधानसभा चुनाव हुए और ममता ने वाममोर्चा का लाल झंडा उतारकर तृणमूल की विजय पताका फहरा दी। इस साल भी 38 लोग मारे गए। ममता बनर्जी के कार्यकाल में भी राजनीतिक लोगों की हत्याओं का दौर बरकरार रहा। इस दौर में 58 लोग मौत के घाट उतारे गए।
बंगाल की माटी पर एकाएक उदय हुई भाजपा ने ममता के वजूद को संकट में डाल दिया है। बांगाल में करीब 27 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। इनमें 90 फीसदी तृणमूल के खाते में जाते हैं। इसे तृणमूल का पुख्ता वोट-बैंक मानते हुए ममता ने अपनी ताकत मोदी व भाजपा विरोधी छवि स्थापित करने में खर्च दी है। इसमें मुस्लिमों को भाजपा का डर दिखाने का संदेश भी छिपा था। किंतु इस क्रिया की विपरीत प्रतिक्रिया हिंदुओं में स्व-स्फूर्त धु्रवीकरण के रूप में दिखाई देने लगी। बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिए एनआरसी के लागू होने के बाद भाजपा को वजूद के लिए खतरा मानकर चल रहे हैं, नतीजतन बंगाल के चुनाव में हिंसा का उबाल आया हुआ है। इस कारण बंगाल में जो हिंदी भाषी समाज है वह भी भाजपा की तरफ झुका दिखाई दे रहा है। हैरानी इस बात पर भी है कि जिस ममता ने ‘मां, माटी और मानुष एवं परिवर्तन’ का नारा देकर वामपंथियों के कुशासन और अराजकता को चुनौती दी थी वही ममता इसी ढंग की भाजपा की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बौखला गई हैं। उनके बौखलाने का एक कारण यह भी है कि 2011-2016 में उनके सत्ता परिवर्तन के नारे के साथ जो वामपंथी और कांग्रेसी कार्यकर्ता आ खड़े हुए थे वे भवष्यि की राजनीतिक दिशा भांपकर भाजपा का रुख कर रहे हैं।
2011 के विधानसभा चुनाव में जब बंगाल में हिंसा नंगा नाच, नाच रही थी, तब ममता ने अपने कार्यकताओं को विवेक न खोने की सलाह देते हुए नारा दिया था, ‘बदला नहीं, बदलाव चाहिए।’ लेकिन बदलाव के ऐसे ही कथन अब ममता को असामाजिक व अराजक लग रहे हैं। ममता को हिंसा के परिप्रेक्ष्य में आत्ममंथन करने की जरूरत है कि बंगाल में ही हिंसा परवान क्यों चढ़ी है ? जबकि ऐसी हिंसा देश के अन्य किसी भी राज्य में दिखाई नहीं दे रही है। अतएवं ममता को लोकतांत्रिक मूल्यों और मान्यताओं को ठेंगा दिखाने से बचना चाहिए, लेकिन बंगाल में इस खूनी सिलसिले का थमना आसान नहीं लग रहा है। क्योंकि राजनीति, पुलिस और प्रशासन के स्तर पर दूर-दूर तक सुधार की कोई पहल नहीं की जा रही है। यदि राजनीतिक वातावरण में लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर होगी तो संविधान के मूल्यों को आघात लगेगा।
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)
साल 2020 के हंगर इंडेक्स सर्वे में भारत की स्थिति पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों से भी पतली होने की रिपोर्ट के दो महीने बाद जारी हंगर वॉच और नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के नतीजे भी भारत में भूख और कुपोषण की समस्या विकराल होने का दावा करते हैं। भारत की यह हालत क्यों है? क्या पूर्व की सरकारों में भी यही स्थिति थी? जाने-माने अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज से बीबीसी हिंदी के लिए रवि प्रकाश ने ये समझने के लिए बात की। पढि़ए ज्यां द्रेज ने क्या कहा -
भूख और कुपोषण इस देश में सबसे बड़ी चिंता होनी चाहिए लेकिन यह है या नहीं यह बिल्कुल दूसरी बात है। यह ज़रूर होना चाहिए था। केंद्र सरकार ने नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के छठे राउंड के आंकड़े जारी किए हैं। इससे पता चला कि पिछले चार-पांच साल में बच्चों के पोषण में कोई प्रोग्रेस नहीं हुआ है। मेन स्ट्रीम मीडिया में इसकी कोई चर्चा भी नहीं है। इस मुद्दे को बड़ा मुद्दा बनाया जाना ज़रूरी है।
याद रखिए कि 2016 में भी हर तीन में से एक बच्चा अंडरवेट था। लगभग इतने ही बच्चों की लंबाई कम थी। दुनिया में देखें तो भारत में सबसे अधिक कुपोषण है। लेकिन, इस समस्या को दूर करने के लिए कितना काम और कितना ख़र्च हो रहा है, यह समझा जा सकता है। मुझे लगता है यह मुद्दा उठाया जाना चाहिए, तभी भारत की स्थिति ठीक हो सकेगी।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक 2016 से 2020 के बीच बच्चों के कुपोषण के मामले में कोई प्रगति नहीं हुई। लॉकडाउन में यह हालत और खऱाब हुई होगी। मिड डे मील और स्वास्थ्य सुविधाएं कई जगहों पर बंद हुई हैं।
हंगर वाच के सर्वे से पता चला है कि 76 फ़ीसदी लोग लॉकडाउन के कारण कम खा रहे हैं। इसका मतलब है कि हालत खऱाब हुई है। मोदी सरकार जब 2014 में आई, तो उन्होंने साल 2015 में अपने पहले ही बजट में मिड डे मील और आइसीडीएस का बजट कम कर दिया।
आज भी केंद्र सरकार का बजट इन योजनाओं के लिए 2014 से कम है। सबसे बड़ी समस्या है कि इस सरकार की विकास की समझ उल्टी है। विकास का मतलब केवल यह नहीं है कि जीडीपी बढ़ रहा है या लोगों की आय बढ़ रही है। यह आर्थिक वृद्धि है। लेकिन, आर्थिक वृद्धि और विकास में काफ़ी फर्क है।
विकास का मतलब यह भी है कि न केवल प्रति व्यक्ति आय बढ़ रही है बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, लोकतंत्र, सामाजिक सुरक्षा की हालत में भी सुधार हो रहा है। अगर उद्देश्य केवल यह है कि भारत दुनिया में सुपर पावर बन जाए, हमारी इकोनॉमी पांच ट्रिलियन की हो जाए तो आप बच्चों पर ध्यान तो नहीं देंगे न। ऐसे में संपूर्ण विकास की बात कहां हो पाएगी। असली विकास यह है कि जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो। लेकिन, मोदी सरकार का यह उद्देश्य नहीं है।
भारत में कुपोषण इतना अधिक है। इसमें प्रगति नहीं दिख रही है। नेपाल और दूसरे देशों से भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी इन देशों से ज़्यादा है। तब क्यों इतनी कम प्रगति है। मुझे लगता है कि यहां असमानता और भेदभाव के कारण नुकसान हो रहा है।
मुझे लगता है कि अगर गांव में आंगनबाड़ी चलाना है और वहां ऊंची जाति के बच्चे छोटी जातियों के बच्चों के साथ नहीं खाएंगे, तो आंगनबाड़ी कैसे चलेगा। यही हालत स्वास्थ्य सुविधाओं में भी है। इन सभी जगहों पर जातीय और लैंगिक भेदभाव है। मुझे लगता है कि सामाजिक क्षेत्र में भारत के पिछड़ेपन की मुख्य वजह इसी से संबंधित है।
हंगर वाच के ताजा सर्वे के मायने
हंगर वाच के सर्वे का सबसे बड़ा नतीजा यह है कि लॉकडाउन का प्रभाव अभी भी कई परिवारों पर है। लोग कम खा रहे हैं। बच्चों और मां-बाप की हालत और खराब हो रही है।
हंगर वाच और एनएफएचएस के सर्वे दरअसल एक वेक-अप कॉल हैं। लेकिन, दुख की बात यह है कि न सरकार और न मेन स्ट्रीम मीडिया इस पर ध्यान दे रहा है।

सामाजिक सुरक्षा और भोजन का सवाल
पिछले पांच-छह साल से आर्थिक नीति और सामाजिक नीति में बड़ा गैप बन गया है। सामाजिक नीतियों को किनारे कर दिया गया है। केंद्र सरकार ने सामाजिक नीति को पूरी तरह राज्य सरकारों के भरोसे छोड़ दिया है।
2006 और 2016 के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े देखेंगे, तो पता चलेगा कि उस दौरान काफी प्रगति हुई। चाहे स्वास्थ्य की बात करें या फिर शिक्षा की, उस दौर में पहली बार भारत में इतनी तेजी से प्रगति हुई।
इसका कारण यह था कि उस पीरियड में भारत में एक्टिव सोशल पॉलिटिक्स की शुरुआत दिख रही थी। उसी दौरान नरेगा, खाद्य सुरक्षा कानून, मिड डे मील जैसी योजनाएं लाई गईं। इसके साथ ही आइसीडीएस का विस्तार हुआ।
मतलब तब सामाजिक और आर्थिक नीति का संतुलन दिख रहा था। लेकिन, मौजूदा सरकार में सामाजिक नीतियों को किनारे कर दिया गया है। उसका बजट भी कम किया गया है। तो, इससे बड़ी असमानता पैदा हुई है। नोटबंदी के बाद आर्थिक वृद्धि पर भी असर पड़ा है। इस असमानता का नतीजा अब हमारे सामने है। (bbc.com)
-प्रकाश दुबे
महबूबा मुफ्ती अफसोस कर रही हैं। किस बुरी साइत में जम्मू-कश्मीर राज्य की मुख्यमंत्री बनी थीं? अब जम्मू-कश्मीर नीचे फिसल कर केन्द्रशासित इकाई रह गया। कश्मीर घाटी में जिला विकास परिषद के चुनाव के प्रचार के दौरान मुफ्ती घर कैद हैं। उनकी शिकायत है कि मुझे तीसरी बार गैरकानूनी तरीके से पकड़ कर आवाजाही रोकी। पहलगाम जाकर मुफ्ती ने घुमंतू समुदायों को घर से बेदखल करने का विरोध किया था। गुलमर्ग के रास्ते में आने वाले बडग़ाम जाकर बंजारों को बेदखल करने का विरोध करने वाली थीं। विशेष सुरक्षा समूह के निदेशक ने चिट्ठी थमा कर चुनाव संपन्न होने तक दौरे रूकवा दिए। हाथ जोडक़र प्रचार के लिए निकलने की अनुमति मांगती महबूबा को सुरक्षाकर्मी घर के अंदर ठेलकर राज्य के चुनाव आयुक्त का फरमान याद दिलाते हैं। पूर्व मुख्यमंत्रियों की सुरक्षा के खास इंतजाम करने का आदेश चुनाव आयुक्त शर्मा ने जारी किया था। भाजपा के कंधे पर बैठकर मुख्यमंत्री बनी महबूबा रुआंसी होकर शिकायत करती हैं-केन्द्रीय मंत्री प्रचार करते घूम रहे हैं। मुझ (पूर्व मुख्यमंत्री) को रोकते हो।
आमदनी अठन्नी
लोग आत्मनिर्भर बनने की होड़ में शामिल हैं। खाली खजाने को भरने की जिम्मेदारी एजेंसियां भी अपने तरीके से सहयोग कर रही हैं। कोरोना महामारी के सहित रोग राई का ऐसा बुरा हमला हुआ कि झाड़- फूंक बेअसर है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन पूरी ताकत से मंत्र फूंक रही हैं। आयकर विभाग की उगाही के आंकड़े देखने के बावजूद वे अब तक होशोहवास में हैं, यही बड़ी बात है। कल कारखानों और कारोबार के ठिकानों को मानो पाला मार गया है। देश की व्यापारधानी मुंबई नगरी में फिल्म क्षेत्र है। बैंकों, अंबानी, टाटा सहित कई नामी समूहों का मुख्यालय है। इसके बावजूद पिछली वसूली की तुलना में एक रुपया अधिक नहीं मिला। आयकर वसूली में सौ फीसद घाटा है। ऐसा नहीं कि मंत्री या वित्त मंत्रालय को इसका अंदेशा नहीं था। ऊपर से चेतावनी मिली इसलिए गुजरात सहित कुछ राज्यों के कुशल आयकर अधिकारियों को मुंबई समेत महानगरों में भेजा गया। दिल्ली देश की राजधानी है। वसूली की बदहाली में मुंबई से पीछे नहीं रही।
विजया कर्तव्य
दिल्ली की मुख्यमंत्री बनने की चाहत में किरण बेदी भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुईं। विधानसभा का चुनाव हारीं। पुदुचेरी की उपराज्यपाल बनकर मुख्यमंत्री पर पुलिसिया रोब चला रही हैं। किरण के पुलिस कारनामों पर बनी फिल्म कर्तव्यम में भूमिका निभाकर विजयाशांति तमिल, तेलुगु और हिंदी फिल्मों में सफल रहीं। कमाई की। पुरस्कार मिले। 23 बरस पहले विजयाशांति भारतीय जनता पार्टी में शामिल होकर महिला मोर्चा की सचिव बनीं। कुर्सी की चाहत में छलांग मारकर चंद्रशेखर राव की सहयोगी बनीं। तंलंगाना राज्य बनने के बाद चंद्रशेखर राव मुख्यमंत्री बने। विजया को पार्टी से निकाल दिया। हैदराबाद नगर निगम चुनाव के नतीजों से भाजपा और विजया दोनों उत्साहित हैं। विजया ने भाजपा में घर वापसी की। चंद्रशेखर राव की कुर्सी छीनने की कसम खाकर। किरण बेदी वाला हश्र होने का खतरा उठाते हुए। इसके बावजूद भाजपा ने राव की शांति तो फिल्हाल छीन ली।
जय गुरुदेव
अनुशासित स्वयंसेवक की तरह विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय का जिम्मा संभालने वाले डॉ. हर्ष वर्धन ने उत्तर को दक्षिण से जोडऩे राजीव गांधी जैव प्रौद्योगिकी केन्द्र का केरल में नया परिसर शुरु कराया। दो विचारों के बीच सेतु बनाने की कल्पना सूझी। राजीव गांधी का नाम हटाने से बेवजह होहल्ला मचने का अंदेशा था। इसलिए माक्र्सवादी सरकार वाले केरल राज्य में नए परिसर का नामकरण श्री गुरुजी माधव सदाशिव गोलवलकर राष्ट्रीय केन्द्र कर दिया। कुछ लोग गोलवलकर जी की विचारधारा नहीं मानते और कुछ नहीं जानते कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक ने प्राणीविज्ञान की पढ़ाई की थी। दक्षिणा में एकलव्य की तरह अंगूठा कटने का डर बना रहता है। केरल में नामकरण पर बखेड़ा खड़ा हो गया। किसी ने हिटलर की याद दिलाई। किसी ने गांधी को। मुख्यमंत्री ने वैज्ञानिक के नाम पर केन्द्र का नामकरण करने की मांग करते हुए डॉ.हर्षवर्धन को चिट्ठी लिखी है।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
-डॉ राजू पाण्डेय
छत्तीसगढ़ राज्य के स्वप्न द्रष्टाओं और राज्य निर्माण हेतु निरंतर संघर्ष करने वाले मनीषियों ने छत्तीसगढ़ के मुखिया की जैसी छवि अपने हृदय में गढ़ी होगी वह छवि श्री भूपेश बघेल की तरह ही रही होगी- छत्तीसगढ़ के स्वाभिमान के लिए मर मिटने को तैयार एक ठेठ छत्तीसगढ़िया व्यक्तित्व जिसके पास प्रदेश के विकास के ढेरों सपने हैं और इन सपनों को पूरा करने का संकल्प भी। भूपेश 'छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़िया प्रथम' के नारे को चरितार्थ करने में लगे हैं। भूपेश का छत्तीसगढ़वाद इतर-प्रांतवासियों और अन्य भाषा भाषियों को बहिष्कृत करने वाली संकीर्ण अवधारणा नहीं है बल्कि यह उन्हें छत्तीसगढ़ में समाविष्ट करने वाला- उन्हें छत्तीसगढ़ के रंग में रंग देने वाला एक उदार विचार है।
भूपेश को पता है कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में जनकल्याण करना और जनकल्याण करते दिखना दोनों ही आवश्यक हैं। यही कारण है कि उन्होंने शासकीय योजनाओं और शासन की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। गाँव, किसान और गरीब उनकी योजनाओं के केंद्र में हैं- भूपेश जानते हैं कि छत्तीसगढ़ महतारी का असली निवास कहाँ है।
भूपेश ने मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पारी की शुरुआत अपने चुनावी वादों को पूरा करने से की। किसानों की कर्ज माफी, 2500 रुपए प्रति क्विंटल पर धान खरीदी, सभी परिवारों को 35 किलो चावल, 400 यूनिट तक बिजली बिल हाफ, जैसे निर्णय लोकप्रिय बनाने वाले तो थे किंतु इनके दूरगामी वित्तीय प्रभावों के दबाव का सामना भूपेश को निरंतर करते रहना पड़ेगा। लोहंडीगुड़ा के किसानों को उनकी भूमि लौटाने का ऐतिहासिक फैसला लिया गया और उस पर अमल कर भूपेश ने अपनी किसान हितैषी छवि को और पुख्ता किया।
भूपेश सरकार द्वारा नगरीय क्षेत्रों में छोटे भूखंडों की रजिस्ट्री प्रारंभ हुई। कलेक्टर दर में 30 प्रतिशत की कमी की गई, भूखंडों को फ्री होल्ड करने का निर्णय लिया गया। गुमाश्ता एक्ट में संशोधन किया गया। स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच लोगों तक बढ़ाने के लिए मुख्यमंत्री हाट बाजार क्लीनिक योजना, शहरी क्षेत्रों में मुख्यमंत्री शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना, कुपोषण मुक्ति के लिए सुपोषण अभियान प्रारंभ किए गए। वन अधिकार पट्टा देने का कार्य छत्तीसगढ़ में पुनः प्रारंभ किया गया। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए नरवा-गरवा-घुरवा-बाड़ी योजना प्रारम्भ की गई।
वर्ष 2020 में भूपेश अनेक ऐसी योजनाएं लाए हैं जो आदिवासियों के कल्याण को समर्पित हैं- समर्थन मूल्य पर 7 के स्थान पर 25 वनोपजों की खरीद की व्यवस्था, महुआ का समर्थन मूल्य 17 रुपए से बढ़ाकर 30 रुपए करना, 856 हाट बाजारों में लघु वनोपजों की खरीद की व्यवस्था, 139 वन धन विकास केंद्रों में लघु वनोपजों के प्रसंस्करण का प्रबंध, तेंदूपत्ता संग्रहण में पारिश्रमिक दर 2500 रुपए से बढ़ाकर 4000 रूपए करना आदि। छत्तीसगढ़ सरकार का कहना है कि यह योजनाएं 13 लाख आदिवासी परिवारों की आय में वृद्धि करेंगी। सरकार का दावा है कि उसने लॉक डाउन की अवधि में वनवासी हितग्राहियों को 30 करोड़ रुपए का भुगतान किया है और लॉक डाउन में हुई वनोपजों की कुल खरीद का 98 प्रतिशत छत्तीसगढ़ द्वारा किया गया है।
भूपेश सरकार ने किसानों को लेकर राजीव गांधी किसान न्याय योजना प्रारंभ की जिसके तहत धान, मक्का और गन्ना के 19 लाख किसानों के खाते में 5700 करोड़ रुपए का भुगतान 4 किश्तों में किया जाना है। सरकार इस योजना को किसानों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करती रही है। किसानों और उनके पशुधन के लिए छत्तीसगढ़ सरकार अन्य अनेक योजनाएं लेकर आई है। खुले में घूमते पशुओं द्वारा खेतों की चराई की समस्या से छुटकारा दिलाने के लिए राज्य सरकार गौठान बना रही है। छत्तीसगढ़ सरकार के जनसंपर्क विभाग के अनुसार 2200 गौठान बन चुके हैं और इस वर्ष के अंत तक 5000 गौठान बनकर तैयार हो जाएंगे। गौठान समितियों को 10000 रुपए प्रतिमाह सहायता का प्रावधान किया गया है और हर गौठान में गोवंश के लिए चारे-पानी की व्यवस्था होगी। गोठानों से गोबर गैस और अन्य उत्पाद निर्मित किए जाएंगे, गोठानों के निकट कुक्कुट पालन का प्रबंध भी होगा।
ऐसा नहीं है कि भूपेश के यह दो वर्ष निर्विवाद रहे हैं। भ्रष्टाचार इन दो वर्षों में निरंतर चर्चा में रहा है। तबादलों में भ्रष्टाचार ने सुर्खियां बटोरी हैं। मुख्यमंत्री की प्रिय नरवा-गरवा-घुरवा-बाड़ी योजना में गौठान निर्माण और इनकी देखरेख में जमकर भ्रष्टाचार की शिकायतें मिल रही हैं। यह शिकायतें लगभग हर जिले से आ रही हैं। प्रशासनिक अमला निरंकुश होकर कार्य कर रहा है। मुख्यमंत्री को उनके प्रिय अधिकारी वही तस्वीर दिखा रहे हैं जो कि वह देखना चाहते हैं न कि वह तस्वीर जो वास्तविक है। स्वाभाविक है जो योजनाएं मुख्यमंत्री के हृदय के निकट हैं उनके लिए फण्ड उदारता से दिया जाता है। इस फण्ड का दुरुपयोग करने के अवसर भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र निकाल ही लेता है।
मुख्यमंत्री की विकास की अवधारणा मानव केंद्रित है। भूपेश कहते हैं- “सेवा ही हमारा सनातन धर्म है। इसी रास्ते पर चलते हुए हमें आर्थिक मंदी और कोरोना संकट काल में अर्थव्यवस्था को बचाये रखने में सफलता मिली है।
छत्तीसगढ़ में हमने अपनी संस्कृति, अपने खेतों, गांवों, जंगलों, वनोपजों, प्राकृतिक संसाधनों, लोककलाओं, परंपराओं और इन सबके बीच समन्वय से अपना रास्ता बना लिया। हमें गर्व है कि अर्थव्यवस्था का हमारा छत्तीसगढ़ी मॉडल संकट मोचक साबित हुआ। हमने बड़े और महंगे निर्माण से अर्थव्यस्था के संचालन का मिथक तोड़ दिया है। स्थानीय जनता की सोच से विकास का रास्ता अपनाया है जिसके कारण निवेश और विकास हमराही बन गए हैं। विकास की हमारी सोच, नीति और क्रियान्वयन के बीच इतना गहरा नाता है कि दो वार्षिक बजट काल पूरा होने के पहले ही हम इस दौरान देश के सबसे बड़े रोजगार सृजक राज्य बन गए हैं।' (स्वतंत्रता दिवस उद्बोधन,2020)।
निश्चित ही भूपेश का ध्यान किसी स्थान पर भौतिक संरचनाओं का ढेर लगाने से अधिक उस स्थान पर निवासरत लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाने पर है। किंतु मानव विकास के सूचकांकों पर विकास की सुनिश्चित और सकारात्मक दिशा हासिल करना एक समय साध्य कार्य है। इसके लिए योजनाओं में वैज्ञानिक दृष्टि का समावेश, वस्तुनिष्ठता और पारदर्शिता आवश्यक है। इससे भी बड़ी आवश्यकता योजनाओं को क्रियान्वित करने वाले प्रशासनिक अमले और योजना से लाभान्वित होने वाले आम जनों को जागरूक, संवेदनशील और उत्तरदायी बनाने की है। नरवा-गरवा-घुरवा-बाड़ी जैसी योजनाएं निश्चित ही गांव-गरीब, खेती-किसानी और पशुपालन को विमर्श के केंद्र में लाने में सहायक रही हैं। लेकिन समाज की अंतिम पंक्ति के आखिरी आदमी को राहत पहुंचाने के लिए इनमें अभी बहुत संशोधन, परिष्कार और सुधार की आवश्यकता है। जिस प्रकार भ्रष्ट तंत्र इन योजनाओं हेतु आबंटित राशि की बंदरबांट में लगा है और शीर्ष अधिकारी आंकड़ों की बाजीगरी दिखा रहे हैं इन योजनाओं के शैशवावस्था में दम तोड़ने की आशंका अधिक लगती है।
लोगों में एक आम धारणा यह भी बनती दिखती है कि प्रदेश में राज्य शासन के उत्तरदायित्व वाली सड़कों की स्थिति बदतर हुई है। राज्य सरकार द्वारा अधोसंरचना निर्माण के कार्यों में शिथिलता आई है। कुल मिलाकर एक ठहराव और बिखराव की अनुभूति अनेक प्रेक्षकों को हो रही है। यद्यपि राज्य सरकार के दावे कुछ अलग हैं। राज्य सरकार के अनुसार उसने पिछले 2 वर्ष में सड़क और पुलों के निर्माण तथा उनकी मरम्मत के 4 हजार 50 कामों के लिए 13 हजार 230 करोड़ रूपए की स्वीकृति प्रदान की है। इसके साथ ही प्रदेश के पहुंच विहीन सभी महत्वपूर्ण स्थानों तक सड़क निर्माण के लिए जून 2020 में प्रारंभ की गई सुगम सड़क योजना के तहत 2 हजार 169 कार्यों के लिए 252 करोड़ रूपए आबंटित किए गए हैं। छत्तीसगढ़ सड़क विकास निगम के अधीन 768 कार्यों के लिए 8 हजार 400 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। सरकारी दावों और जमीनी अनुभव के मध्य के गहरे अंतर को मिटाने में भूपेश कितनी जल्दी कामयाब होते हैं इसकी सभी को प्रतीक्षा रहेगी।
अपने मूल्यांकन के दौरान हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भूपेश सरकार के दूसरे वर्ष पर कोरोना महामारी की छाया रही है और यह भी कि कई अन्य प्रदेशों की तुलना में छत्तीसगढ़ ने कोविड काल में आर्थिक गतिविधियों का बेहतर संचालन किया है। लेकिन यह भी सत्य है कि छत्तीसगढ़ की आर्थिक संरचना ने इस कोविड काल में भूपेश की बड़ी सहायता की है। छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था में कृषि और वानिकी की केंद्रीय भूमिका है। देश के कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन इस वैश्विक महामारी के दौरान कहीं बेहतर रहा है। प्रदेश के औद्योगिक क्षेत्र के विषय में भूपेश ने अपने स्वतंत्रता दिवस उद्बोधन 2020 में कहा- 'कोरोना काल में भी छत्तीसगढ़ में 26 लाख मीट्रिक टन लौह इस्पात सामग्रियों के उत्पादन और आपूर्ति से सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि पूरे देश को सहारा मिला है।' छत्तीसगढ़ का औद्योगिक ढांचा ऊर्जा उत्पादक इकाइयों और स्टील उत्पादक कारखानों पर आधारित है। इन्हीं से जुड़ी माइनिंग की गतिविधियां हैं। जैसे ही अनलॉक की प्रक्रिया प्रारंभ हुई पॉवर और स्टील उद्योग तथा माइनिंग पटरी पर वापस लौटने वाली पहली गतिविधियां थीं। जबकि ऐसे प्रदेश जो सेवा या पर्यटन क्षेत्रों पर निर्भर थे अभी भी कोविड-19 की मार झेल रहे हैं। बहरहाल भूपेश की इस बात के लिए तो प्रशंसा होनी ही चाहिए कि उन्होंने कोविड-19 के प्रबंधन में केंद्र से बेहतर तालमेल बनाए रखा और कुछ अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों की तरह हठधर्मी रुख अपनाते हुए केंद्र से टकराव और आरोप-प्रत्यारोप का रास्ता नहीं चुना।
प्रदेश की वित्तीय स्थिति और कर्ज के बढ़ते बोझ को लेकर विपक्ष लगातार हमलावर रहा है और विकास कार्यों की धीमी गति के लिए प्रदेश की दयनीय वित्तीय हालत को उत्तरदायी ठहराता रहा है। भूपेश सरकार द्वारा रिज़र्व बैंक से कर्ज लेने की खबरें तब चर्चा का विषय बनी थीं जब सरकार ने वर्ष 2019 के प्रारंभ में जनवरी माह में कर्ज माफी, धान खरीदी और उस पर दिए जाने वाले बोनस के भुगतान के लिए आरबीआई से 2000 करोड़ रुपए का कर्ज लिया था। इसके बाद अगस्त 2020 में राजीव गाँधी किसान न्याय योजना की दूसरी क़िस्त के भुगतान के लिए प्रदेश सरकार ने 4 साल की प्रतिभूतियों की नीलामी का निर्णय लिया जिससे 1300 करोड़ रुपए प्राप्त हुए इसमें 200 करोड़ की अतिरिक्त राशि मिलाकर कुल 1500 करोड़ रुपए का कर्ज हासिल किया गया। फरवरी 2020 में विधानसभा में सदस्यों द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में मुख्यमंत्री ने बताया था कि दिसंबर 2018 से 31 जनवरी 2020 तक राज्य सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक से 16400 करोड़ रुपए, राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक से 934.38 करोड़ रुपए तथा केंद्र सरकार के माध्यम से एशियन डेवलपमेंट बैंक व विश्व बैंक से 394.74 करोड़ रुपए, कुल 17729 करोड़ रुपए का ऋण लिया है। उक्त कर्ज पर 31 जनवरी 2020 तक 582.25 करोड़ ब्याज चुकाया जा गया है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बताया कि राज्य सरकार पर कुल 57,848 करोड़ रुपये का कर्ज है। इस प्रकार कर्ज की यह राशि बजट के आधे से भी अधिक हो गई है।
अर्थशास्त्रियों का एक समूह यह विश्वास करता है कि छत्तीसगढ़ सरकार के वित्तीय घाटे के बढ़ने का सीधा अर्थ है कि सरकार की उधारी बढ़ेगी। इन अर्थशास्त्रियों के अनुसार सरकार के बांड बेचने और बार- बार ऋण लेने से विकास कार्यों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। सरकार बांड बेचकर जो ऋण ले रही है वह उसे मय ब्याज चुकाना पड़ेगा। इसके लिए सरकार को स्वयं पूंजी की व्यवस्था करनी पड़ेगी। हाल ही में नवंबर 2020 में राजीव गाँधी किसान न्याय योजना की तीसरी क़िस्त के भुगतान के लिए सरकार ने पुनः 1000 करोड़ रुपए का कर्ज लिया जिसके लिए भी आरबीआई ने राज्य सरकार के फिक्स्ड डिपॉजिट्स की नीलामी की। कहा यह जा रहा है कि राज्य सरकार को जीएसटी क्षतिपूर्ति के रूप में जो चार हजार करोड़ की तीन किस्तें मिलनी थीं, वह अब तक नहीं मिली हैं। यही कारण है कि सरकार को कर्ज लेने की आवश्यकता पड़ रही है।
कर्ज के यह आंकड़े चिंता तो उत्पन्न करते हैं लेकिन यदि ब्लूमबर्ग क्विंट की मानें तो भूपेश सरकार कर्ज लेने के बावजूद फिस्कल रैंकिंग में बेहतरीन प्रदर्शन करने में कामयाब रही है और वह महाराष्ट्र के बाद दूसरे स्थान पर है। छत्तीसगढ़ के बाद ओडिशा, कर्नाटक और उत्तरप्रदेश का स्थान है। फिस्कल रैंकिंग की गणना फिस्कल डेफिसिट, स्वयं की टैक्स रेवेन्यू तथा स्टेट डेट की ग्रॉस स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट में प्रतिशत हिस्सेदारी के आधार पर की जाती है। वित्तीय वर्ष 2019 के आंकड़ों पर आधारित फिस्कल रैंकिंग में शानदार प्रदर्शन करने वाले भूपेश अपने साथी कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों से बिल्कुल अलग नजर आते हैं क्योंकि पंजाब और राजस्थान 16 वें और 17 वें स्थान पर हैं। जीएसटी कलेक्शन में छत्तीसगढ़ 24 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी के साथ देश में दूसरे पायदान पर है। इज ऑफ डूइंग बिज़नेस की नवीनतम रैंकिंग में छत्तीसगढ़ का स्थान छठवां है।
भूपेश के अब तक के कार्यकाल में कुछ घटनाएं ऐसी रही हैं जिन्होंने नकारात्मक सुर्खियां बटोरी हैं। भूपेश सरकार पर प्रेस की स्वतंत्रता के हनन के आरोप लगते रहे हैं। अंबिकापुर नगर निगम द्वारा किसानों की पकने को तैयार धान की खड़ी फसल पर जेसीबी चलवाना और इसके बाद इस घटना की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराना सरकार की गरीबों के प्रति संवेदनशीलता की गर्वोक्तियों एवं प्रेस की आजादी के पैरोकार होने के उसके दावों पर गंभीर प्रश्न उठाने वाला मामला है। कांकेर के एक पत्रकार को सत्ताधारी दल के नेताओं द्वारा पीटने और धमकी देने का मामला अब तक शांत नहीं हुआ है। यह तो हालिया घटनाएं हैं। ऐसे अनेक उदाहरण पिछले 2 वर्ष में देखने को मिले हैं जब छत्तीसगढ़ सरकार ने पत्रकारों के प्रति दमनकारी रवैया अपनाया है।
पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने का वादा करके सत्ता में आए भूपेश अब इसी माँग के लिए पत्रकारों के आंदोलन का सामना कर रहे हैं। दुर्भाग्य यह है पत्रकारों के दमन की सर्वाधिक घटनाएं बस्तर में हुई हैं जहाँ पत्रकार अपनी जान जोखिम में डाल कर सच उजागर करने का कार्य कर रहे हैं। नक्सलियों द्वारा कभी उन्हें मुखबिर और प्रशासन का दलाल मान लिया जाता है और कभी पुलिस उन्हें नक्सल समर्थक होने के शक में प्रताड़ित करती है।
मोटे तौर पर पत्रकारों का यह मानना रहा है कि नक्सल प्रभावित बस्तर में कांग्रेस की सरकार आने के बाद कुछ बदला नहीं है। सरकार ने निर्दोष ग्रामीणों पर लगे झूठे मामले हटाने का अपना वादा पूरा नहीं किया है। बस्तर में ग्रामीणों के असंतोष के बावजूद पुलिस कैम्पों की संख्या में असाधारण वृद्धि हुई है। चाहे वे सोनी सोरी हों या आदिवासियों के हितों के लिए कार्य करने वाले अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ता, प्रशासन का रुख इनके प्रति संवेदनहीन ही रहा है और इन्हें संदेह की दृष्टि से देखा जाता रहा है। भूपेश के कार्यकाल में सरकार की नक्सल नीति में बड़े बदलाव की उम्मीद थी क्योंकि बतौर विपक्षी नेता भूपेश ने नक्सल समस्या के समाधान में निर्दोष आदिवासियों के हितों को सर्वोपरि प्राथमिकता देने और उनके जल-जंगल-जमीन को सुरक्षित रखने की बात बारंबार कही थी। किंतु ऐसा होता नहीं दिखता। प्रदेश के अन्य जिलों में भी जहाँ माइनिंग की गतिविधियां होनी हैं, यह जानते हुए भी कि इनका परिणाम आदिवासियों और वन वासियों के विस्थापन और विनाश के रूप में होगा अडानी समेत अन्य औद्योगिक घरानों के प्रति छत्तीसगढ़ सरकार का रुख अतिशय उदार रहा है और इन्हें मनचाहे ढंग से नियमों को तोड़ने मरोड़ने की छूट मिली हुई है।
ऐसा बिल्कुल नहीं है कि छत्तीसगढ़ सरकार नक्सल मोर्चे पर एकदम नाकाम रही है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हालात सुधरे हैं,आदिवासियों के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए उनकी वनोपजों तथा कलाकृतियों की ब्रांडिंग और मार्केटिंग की अनेक नई योजनाएं भी प्रारंभ हुई हैं किंतु इन योजनाओं के जोर शोर से किए जा रहे प्रचार से हटकर जमीनी स्तर पर आकलन करने पर इनका प्रभाव बहुत अधिक नहीं दिखता और इनका स्वरूप प्रतीकात्मक अधिक लगता है। छत्तीसगढ़ सरकार का दावा रहा है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जनकल्याणकारी योजनाओं के सफल क्रियान्वयन, पुलिस एवं जिला प्रशासन के मध्य बेहतर समन्वय तथा प्रशासनिक चुस्ती के कारण नक्सल घटनाओं में वर्ष 2018 की तुलना में वर्ष 2019 में 40 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। पुलिस मुख्यालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार इस अवधि में नक्सल घटनाओं में कमी के साथ ही सुरक्षाबलों की शहादत में 62 प्रतिशत और आम नागरिकों की हत्याओं में 48 प्रतिशत की कमी आयी है। सरकार यह भी कहती रही है कि 2020 में नक्सल घटनाओं में कमी का यह ट्रेंड जारी है। किंतु नक्सली हिंसा की घटनाएं हुई हैं और बड़ी संख्या में लोग मारे भी गए हैं। वर्ष 2020 में 22 मार्च को नक्सलियों से मुठभेड़ में 17 जवान शहीद हुए थे। इधर एक नई चिंताजनक प्रवृत्ति भी देखी जा रही है। बस्तर के पुलिस अधिकारियों के अनुसार नक्सलियों में पनप रहा विवाद गैंगवार का रूप धारण कर रहा है। इसका मुख्य कारण नक्सलियों द्वारा मुखबिरी के शक में की जा रहीं ग्रामीणों की हत्याओं और कैडर सदस्यों के लगातार आत्मसमर्पण को माना जा रहा है। अधिकारियों द्वारा साझा की गई सूचनाएं यह बताती हैं कि नक्सलियों ने 2020 में करीब 60 ग्रामीणों को पुलिस का मुखबिर बताकर मौत के घाट उतार दिया। कारण जो भी हो मारे तो आदिवासी ही जा रहे हैं।
इन दो वर्षों में प्रदेश में अनेक ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हुई हैं जिन पर जम कर राजनीति हुई है और विपक्ष ने सरकारी तंत्र पर असंवेदनशीलता तथा सम्पूर्ण विफलता के आरोप लगाए हैं। इसी माह केन्द्री में एक युवक ने अपने परिवार के चार सदस्यों की हत्या के बाद स्वयं आत्महत्या कर ली। लॉक डाउन के कारण बेरोजगारी से परेशान युवक का परिवार अनेक बीमारियों से भी ग्रस्त था जिनका इलाज नहीं हो पा रहा था। पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला देकर भूपेश सरकार पर आक्रमण करते रहे हैं। वर्ष 2019 में छत्तीसगढ़ में आत्महत्या के मामलों में 8.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह वृद्धि 3.4 प्रतिशत थी। वर्ष 2019 में छत्तीसगढ़ 7629 आत्महत्याओं के साथ देश में नवें क्रम पर रहा। भाजपा वर्ष 2019 में 233 किसानों और 1679 मजदूरों की आत्महत्या को कांग्रेस सरकार की विफलता के रूप में प्रस्तुत करती रही है। अभी हाल ही में किसान आत्महत्या के ऐसे मामले सामने आए जिनमें किसानों की फसल नकली कीटनाशकों के प्रयोग से बर्बाद हो गई और हताश किसानों ने आत्महत्या कर ली। सौभाग्य से इन सभी मामलों में सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों ने प्रभावित परिवार की पीड़ा कम करने की कोशिश की है और समस्या को नकारने के बजाए उसकी तह तक जाने का प्रयास किया है।
भूपेश ने उम्मीदें खूब जगाई हैं। भाजपा की छत्तीसगढ़ के गठन में केंद्रीय भूमिका रही। जबसे राज्य बना है तब से अधिकांश समय भाजपा सत्ता पर काबिज रही है और जो छत्तीसगढ़ आज हम देख रहे हैं उसे गढ़ने में निश्चित ही राज्य की भाजपा सरकारों की भूमिका भी रही है। किंतु आम छत्तीसगढ़िया को यह अनुभूति पहली बार हो रही है कि वह खुद सत्ता में है। वह भूपेश के साथ तादात्म्य स्थापित करने में सफल रहा है। भूपेश भी अंधविश्वासी करार दिए जाने के खतरों के बावजूद ठेठ छत्तीसगढ़िया नायक की छवि को पुख़्ता करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं- वे प्रदेश की सुख समृद्धि के लिए गोवर्धन पूजा के दौरान कोड़े खाने वालों की कतार में भी खड़े होने को भी तैयार हैं।
किंतु भूपेश यह भी जानते हैं कि केवल करिश्मा ही काफी नहीं है, विकास भी आवश्यक है। उनके दिमाग में जो योजनाएं हैं उनमें छत्तीसगढ़ की भौगोलिक-आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना की गहरी समझ स्पष्ट दिखती है। प्रचार पर उनका खूब विश्वास है। चतुर से चतुर राजनेता भी यह भांप नहीं पाता कि उसके अच्छे कार्यों की पब्लिसिटी ने कब प्रोपेगंडा का रूप ले लिया है। उस बहुचर्चित उक्ति को झुठला पाना सफलतम राजनेताओं के लिए भी आसान नहीं रहा है जिसके अनुसार प्रोपेगंडा का सबसे बड़ा शिकार उसे रचने वाला ही होता है। यह आशा की जानी चाहिए कि भूपेश इस मामले में अपवाद सिद्ध होंगे।
जैसे जैसे प्रदेश की कांग्रेस सरकार पुरानी होती जाएगी, वांछित पद और लाभ पाने से वंचित, हाशिए पर धकेल दिए गए पार्टी कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ती जाएगी और जैसे जैसे अगले चुनाव निकट आएंगे उनका असंतोष भी मुखर होकर सामने आने लगेगा। भाजपा के साथ भी यह होता है किंतु भाजपा का संगठन मजबूत है और सत्ता की मुख्यधारा में जिन कार्यकर्ताओं को जगह नहीं मिल पाती उन्हें संगठन में महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व दे दिए जाते हैं। भूपेश को भी संगठन को मजबूत बनाना ही होगा।
आज जब कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व साम्प्रदायिकता और उग्र हिंदुत्व के उभार से हतप्रभ और दिग्भ्रमित दिखता है तब भूपेश के सामने यह अवसर रहेगा कि साम्प्रदायिक सौहार्द के छत्तीसगढ़ मॉडल को देश के लिए उदाहरण के तौर पर गढ़ें। लेकिन यदि वह मानते हैं कि उग्र हिंदुत्व की काट छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाकों से गुजरने वाले राम वन गमन पथ में 51 स्थानों पर मंदिर बनाने जैसे कदमों द्वारा संभव है तो वे गलती पर हैं। यह आशा करनी चाहिए कि वे अपने भाषणों में जितने प्रखर सांप्रदायिकता विरोधी हैं उसी प्रकार अपनी नीतियों और निर्णयों में भी वे निर्णायक और स्पष्ट रूप से सेक्युलरिज्म के पोषक सिद्ध होंगे।
भूपेश का सफल होना आवश्यक है क्योंकि उनकी विफलता आम छत्तीसगढ़िया की योग्यता और प्रशासनिक कौशल पर प्रश्न चिह्न खड़ा करने हेतु प्रयुक्त की जा सकती है जो कदापि छत्तीसगढ़ के हित में न होगा।
(रायगढ़, छत्तीसगढ़)
बेबाक विचार : डॉ. वैदिक
पिछले साल भाजपा सांसद राकेश सिंहा ने संसद में एक विधेयक पेश किया और मांग की कि दो बच्चों का कानून बनाया जाए याने दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने को हतोत्साहित किया जाए। इस मुद्दे पर अश्विनी उपाध्याय ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका भी लगा दी। उस पर सरकार ने साफ़-साफ कह दिया है कि वह परिवारों पर दो बच्चों का प्रतिबंध नहीं लगाना चाहती है, क्योंकि ऐसा करना लोगों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करना होगा और यों भी लोग स्वेच्छा से जनसंख्या-नियंत्रण कर ही रहे हैं।
अब से 20 साल पहले देश में जनसंख्या की बढ़त प्रति परिवार 3.2 थी जबकि अब वह घटकर 2.2 रह गई है। अब पति-पत्नी स्वयं सजग हो गए हैं। अब 36 में से 25 राज्यों में जनसंख्या-वृद्धि की दर 2.1 हो गई है। सरकार का यह तर्क तो ठीक है लेकिन भारत की जनसंख्या लगभग 150 करोड़ को छू रही है। शायद हम चीन को भी पीछे छोडऩे वाले हैं। हम दुनिया के सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश बनने वाले हैं। सरकार का लक्ष्य है- प्रति परिवार 1.8 बच्चों का! यदि डेढ़ अरब लोगों के इस देश में सब लोगों को भरपेट खाना मिले, उनके कपड़े-लत्ते और रहने का इंतजाम हो तो कोई बात नहीं। उन्हें शिक्षा और चिकित्सा भी थोड़ी-बहुत मिलती रहे तो भी कोई बात नहीं लेकिन असलियत क्या है?
देश में गरीबी, अशिक्षा, बीमारी, बेरोजगारी और भुखमरी भी बढ़ती ही जा रही है। उससे निपटने की भरपूर कोशिश हमारी सरकारें कर रही हैं लेकिन यदि आबादी की बढ़त रुक जाए तो ये कोशिशें जरुर सफल हो सकती हैं। यह ठीक है कि रुस, जापान, रोमानिया जैसे कुछ देश आबादी की बढ़त पर रोक लगाकर अब परेशान हैं। उनकी आबादी काफी तेजी से घट रही है।यदि भारत में भी 10-15 साल बाद ऐसा ही होगा तो उस कानून को हम वापस क्यों नहीं ले लेंगे ? यह ठीक है कि इस वक्त देश के ज्यादातर पढ़े-लिखे, शहरी और ऊंची जातियों के लोग स्वेच्छया ‘हम दो और हमारे दो’ की नीति पर चल रहे हैं लेकिन गरीब, ग्रामीण, अशिक्षित, मजदूर आदि वर्गों के लोगों में अभी भी ये आत्म-चेतना जागृत नहीं हुई है। यह चेतना जागृत करने के लिए उन्हें दंडित करना जरुरी नहीं है लेकिन उन्हें प्रोत्साहित करना बेहद जरुरी है। क्या सरकार ऐसा करने में संकोच करती है ? उसे ऐसे कौनसे डर हैं, वह जरा बताए।
-डाॅ शिवकुमार डहरिया
दो साल पहले तक शहरों की तस्वीर कुछ और ही थी। न तो नागरिकों के लिए बेहतर सुविधाएं थीं और न ही विकास का ऐसा रोडमेप, जो जनता की सुविधाओं से जुड़ा हो। वक्त के साथ समय का पहिया आगे बढता़ गया। यह जनता की एक ऐसी सरकार है, जिसे भरोसा और विश्वास के साथ जनता ने बहुत मजबूती के साथ सत्ता में बिठाया। जनता की इन्हीं आकांक्षाओं, उम्मीदों पर खरा उतरने नई सरकार ने विकास का ऐसा रोडमेप तैयार किया कि आम नागरिकों को नई तस्वीर दिखाई देने के साथ उनसे जुड़ी सुविधाएं भी उनके द्वार तक पहुंचने लगी हंै। विगत दो साल में किए गए कार्यों का ही परिणाम है कि मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में नगरीय प्रशासन विभाग अंतर्गत योजनाओं और नागरिकों से जुड़ी सेवाओं में उल्लेखनीय कार्य करने पर पूरे देश में शहरी गवर्नेंस इंडेक्स-2020 रैंकिंग में छत्तीसगढ़ को तीसरा स्थान हासिल किया है। छत्तीसगढ़ ने देश भर में ओपन डाटा पोर्टल तक नागरिकों की पहुंच के मामले में पहला स्थान, नागरिक समस्याओं के समाधान के मामले में दूसरी रैंक और करों के राजकोषीय प्रबंधन में पहली रैंक नगरीय निकायों के चुने हुए जनप्रतिनिधियों और विधायी परिषदों के सशक्तीकरण के मामले में दूसरी रैंक, नागरिक सशक्तीकरण में तीसरी रैंक हासिल की है।
विकास के नये आयाम को देखे तो शहर अब सिर्फ शहर ही नहीं है, शहर अब स्मार्ट शहर के रूप में पहचान बनाने जा रही है। स्वाभाविक है कि नई कालोनियां छोटे-छोटे शहरों की अपेक्षा वर्तमान और भविष्य की जरूरतों के मुताबिक अनेक सुविधाओं का स्वप्न लेकर बस रही हैं। इन काॅलोनियों में नई पीढ़ी है। नई सोच है और नई जरूरतें हैं। यूं कहें कि शहरों की परिभाषा अब सिर्फ व्यावसायिक दुकानें और बड़े-बड़े दफ्तर, शैक्षणिक संस्थान ही नहीं रहे। शहर अब चैड़ी सड़कों में सरपट भागती मोटर-कारों, दिन के उजालों में सड़क के आजू-बाजू हरियाली,रंगबिरंगी फूलों और रात के अंधेरों में जगमगाती स्ट्रीट लाइट, रेडियम से चमकते हुई रोड डिवाइडर और रोड स्टड से ब्लींक करते चैराहे, बहुमंजिला पार्किंग के साथ व्यवस्थित दुकानें, सुंदरता पर चार चांद लगाती चैराहे सहित अनगिनत नए दृश्य वर्तमान में एक नए शहर का स्वरूप है। शहरों के इस बदलते स्वरूप के बीच नई पीढ़ी के नागरिकों की अनेक आवश्यकताएं हैं। इन आवश्कताओं की पूर्ति के लिए छत्तीसगढ़ की सरकार भी पुरानी पीढ़ी की सुविधाओं का ख्याल रखते हुए नई पीढ़ी के लोगों के साथ नई सोच के साथ कदम बढ़ा रही है।
मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग छत्तीसगढ़ के शहरों का कायाकल्प करने में जुटा है। शहर स्वच्छ हो सुंदर हो और स्मार्ट हो इस दिशा में निरन्तर कार्य किये जा रहे हंै। शहर और गली मुहल्लों में स्ट्रीट लाइट के माध्यम से अंधेरा दूर कर हर जगह नई रोशनी बिखेरी जा रही है। आम नागरिकों की जरूरतों के अनुरूप सड़कों को चैड़ी ही नहीं अपितु अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हंै। व्यवस्थित बाजार, व्यवस्थित पार्किंग, पानी निकासी, ड्रेनेज निर्माण, अपशिष्ट का प्रबंधन, स्वच्छ पेयजल व्यवस्था, बच्चों-बुजुर्गों, आकर्षक उद्यान से लेकर नागरिकों की मूलभूत सुविधाओं का विकास किया जा रहा है।
नगरीय क्षेत्रों में लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने के साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य, गरीबों के उन्नयन, स्वच्छता से संबंधित कार्य, शहरी गरीबों के लिए आवास, घर-घर पेयजल उपलब्ध कराने की दिशा में पहले से बेहतर कदम उठाया जा रहा है।
इस कड़ी में मुख्यमंत्री वार्ड कार्यालय नागरिक सुविधाओं के लिए वरदान बनता जा रहा है। प्रदेश भर में 14 नगर निगम के 101 वार्डों में यह वार्ड कार्यालय संचालित हो रहे हंै। 18285 प्राप्त आवेदनों में से 16305 को निराकृत भी कर दिया गया है। मुख्यमंत्री वार्ड कार्यालय एक ऐसा माध्यम बन गया है जहां आसानी से किसी भी समस्या का निदान संभव हो पाया है। यह सरकार की दूरदर्शी सोच और जनता के प्रति जवाबेदही का ही परिणाम है कि वार्डों में समस्याओं को सुनने कार्यालय की स्थापना की गई है। आम नागरिकों के लिए टोल फ्री नंबर निदान-1100 की व्यवस्था भी है, यहां फोन कर नगरीय निकायों से संबंधित किसी भी समस्या की शिकायत आसानी से दर्ज कराई जा सकती है। निदान से एक लाख से अधिक लोगों की शिकायतों को निराकृत किया जा चुका है। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें शिकायतकर्ता की संतुष्टि के बाद ही शिकायतों को निराकृत माना जाता है। इसमें लापरवाही करने पर अधिकारियों पर जुर्माना भी लगाया जाता है। हमारी कोशिश है कि भविष्य में शिकायत निवारण प्रणाली को और भी आसान व सहज बनाया जाए ताकि आमनागरिकों को सरकार की सेवाओं का लाभ सुनिश्चित हो सके।
किसी भी व्यक्ति का बेहतर स्वास्थ्य उसके बेहतर जीवन का आधार होता है। कभी कभी छोटी-छोटी बीमारी, पीडित ही नहीं उसके परिवार को भी बर्बाद कर देता है। गरीबी या अपनी व्यस्तता की वजह से अस्पताल नहीं जा सकने वालों के उपचार के लिए मुख्यमंत्री शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना और दाई-दीदी क्लीनिक योजना किसी की बीमारी को ठीक करना ही नहीं, उनकी जिंदगी को बेहतर बनाना भी है। मुख्यमंत्री स्लम स्वास्थ्य योजना से राज्य के 14 नगर निगमों में 60 मोबाइल मेडिकल यूनिट एंबुलेस के जरिए डाक्टरों की टीम सेवाएं प्रदान कर रही हैं। स्लम क्षेत्रों में स्वास्थ्य शिविर लगाकर मुफ्त में परामर्श, उपचार, दवाइयां तथा शुगर, खून, पेशाब, बीपी विभिन्न प्रकार की निःशुल्क जांच भी की जाती है। मुख्यमंत्री दाई-दीदी क्लीनिक योजना से महिलाओं को नई सुविधा प्रदान की जा रही है। देश में ऐसा पहली बार हुआ है कि दाई-दीदी क्लीनिक योजना जिसमें महिलाओं की जांच उनके ही घर के आसपास महिला चिकित्सकों द्वारा की जा रही है।
नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के माध्यम से गरीबों को अपनी बीमारी की जांच के लिए अनावश्यक खर्च करना न पडे़, इसका भी ख्याल रखा जा रहा है। पैथोलाॅजी एवं डायग्नोस्टिक्स सुविधा देने डाॅ.राधाबाई डायग्नोस्टिक्स सेंटर सभी जरूरतमंद परिवारों के लिए वरदान बनेगा और जांच के नाम पर अधिक पैसा लेने वालों की गतिविधियों पर इससे लगाम भी लगेगी।
हमारी सोच है कि शासन की योजनाओं का लाभ नागरिकों को घर बैठे मिल सके, मुख्यमंत्री मितान योजना भी ऐसी सुविधा है जिसके माध्यम से लगभग सौ से अधिक शासकीय सेवाओं जैसे ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड, बिजली बिल,पेंशन, राजस्व, जन्म प्रमाण पत्र,राजस्व अभिलेख आदि उपलब्ध कराई जाएगी। नगरीय प्रशासन विभाग गर्मी के दिनों में व्याप्त होने वाली पेयजल संकट को दूर करने की दिशा में कार्य कर रहा है। टैंकरों से होने वाली पानी आपूर्ति और आम नागरिकों को होने वाली दुविधा को ध्यान रखकर शासन द्वारा इन बस्तियों में पेयजल की स्थायी व्यवस्था और टैंकर मुक्त करने की पहल की जा रही है। 62 शहरी स्थानीय निकायों को टैंकर मुक्त बनाया गया है। 4 नगर निगमों,43 नगर परिषदों एवं 109 नगर पंचायतों में जलप्रदाय योजना शुरू की गई है। वर्ष 2023 तक अनेक परियोजनाओं को पूरा करने का लक्ष्य भी रखा गया है। गर्मी के दिनों में उत्पन्न होने वाली पेयजल संकट को दूर करने 20 करोड़ की राशि जारी की गई है।
सरकार की लगभग सभी योजनाओं में गरीबों को प्राथमिकता दी गई है। भूमिहीन व्यक्तियों को भूमि धारण का अधिकार प्रदान करने हेतु अधिनियम लाया गया है। 19 नवंबर 2018 के पूर्व काबिज कब्जा धारकों को भू-स्वामित्व अधिकार प्रदान किया जाएगा। इसमें ऐसे व्यक्ति भी लाभान्वित होंगे जिन्हें पूर्व में पट्टा प्रदान किया गया था परंतु नवीनीकरण प्रावधानों के अभाव में वह भूमि का उपभोग नहीं कर पा रहे थे। इस निर्णय में राज्य के लगभग दो लाख से अधिक शहरी गरीब परिवार सीधे लाभान्वित होंगे तथा उन्हें ‘मोर जमीन मोर मकान‘ योजना में 2.5 लाख तक वित्तीय सहायता प्रदान की जा सकेगी। अवैध/अनियमित हस्तांतरण/ भूमि प्रयोजन में परिवर्तन प्रकरण में नियमानुसार भूमि स्वामी अधिकार दिया गया। अतिरिक्त कब्जे की स्थिति में निकाय श्रेणी अनुसार 900 से 1500 वर्गफीट तक नियमतीकरण की सुविधा दी गई है। कालातीत पट्टों का 30 वर्षों हेतु नवीनीकरण की मान्यता दी गई है।
मोर जमीन मोर मकान योजना से गरीबों को जोड़कर हितग्राहियों को लाभान्वित किया जा रहा है। अभी तक 74365 हितग्राहियों का आवास पूर्ण हो गया है। किफायती आवास योजना-मोर मकान मोर चिन्हारी अंतर्गत 1782.83 करोड़ की लागत से 48326 नवीन आवासों को स्वीकृति देकर कार्य प्रारंभ किया गया है।
नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा तय की गई प्राथमिकताओं को ध्यान रखकर शहरी क्षेत्र के गरीबों के उन्नयन, गरीबों को सुविधाएं देने और आम नागरिकों को सेवाएं प्रदान करने के साथ उन्हें बेहतर सुविधा प्रदान करने की दिशा में कार्य कर रही है।
(नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री, छग शासन)
छत्तीसगढ़ राज्य में कांग्रेस सरकार के दो वर्ष पूर्ण होने जा रहे हैं। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में इन दो वर्षों में बस्तर के लोहांडीगुड़ा के आदिवासियों की टाटा द्वारा अधिग्रहित कृषि भूमि को वापस दिलवाने तथा किसानों को उनके धान का वाजिब दाम दिलवाने जैसे जनहितकारी काम किए गए हैं। जिसके लिए यह सरकार बधाई की हकदार है। किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए यह शानदार उपलब्धि है।
कांग्रेस सरकार के इन दो वर्षों में देश एवं प्रदेश के साहित्यकारों तथा संस्कृति कर्मियों को यह उम्मीद थी कि छत्तीसगढ़ राज्य में भी साहित्य एवं संस्कृति को फलने फूलने की दिशा में कुछ बेहतर कार्य किए जाएंगे।
पूरे देश और प्रदेश के साहित्यकारों एवं संस्कृति कर्मियों के लिए यह खुशी की बात थी कि छत्तीसगढ़ सरकार ने 14 जुलाई 2020 को मंत्रिमंडल की बैठक में यह निर्णय लिया था कि छत्तीसगढ़ में संस्कृति परिषद की स्थापना होगी जिसके फलस्वरूप राज्य में साहित्य अकादमी, कला अकादमी , लोक कला अकादमी जैसी संस्थाएं अस्तित्व में आ सकेंगी। छत्तीसगढ़ राज्य का यह दुर्भाग्य रहा है कि छत्तीसगढ़ बनने के 20 वर्षों के बाद भी ना तो यहां साहित्य अकादमी ही बन पाया और न ही कला अकादमी और न लोक कला अकादमी ही ।
14 अप्रैल 2020 को कैबिनेट द्वारा पारित इस निर्णय के बाद उम्मीद थी कि देखते ही देखते छत्तीसगढ़ की बंजर भूमि पर भी साहित्य एवं संस्कृति के फूल खिलने और महकने लगेंगे।
साहित्य अकादमी के बनने के पश्चात ठाकुर जगमोहन सिंह, मुकुटधर पांडे, शानी, श्रीकांत वर्मा, मुक्तिबोध और विनोद कुमार शुक्ल जैसे रचनाकारों पर केंद्रित समारोह होंगे। नए रचनाकारों की पांडुलिपि का प्रकाशन होगा, राज्य के जिलों और तहसीलों में पाठक मंच की स्थापना होगी । अकादमी द्वारा एक साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन होगा, राष्ट्रीय और प्रादेशिक अलंकरण प्रारंभ होंगे और कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ में साहित्य का एक ऐसा माहौल बनेगा जिसे पूरा देश सराहेगा।
लोक कला अकादमी के गठन से छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा। पंडवानी, भरथरी नाचा ,चंदैनी पर कार्यशाला होंगी। नाचा की अग्रणी संस्थाओं को अनुदान मिलेगा और कलाकारों को राजकीय संरक्षण। मृतप्राय रतन पुरिया गम्मत तथा चंदैनी को हर संभव बचाने की कोशिश की जाएगी।
ठीक ऐसे ही कला अकादमी के माध्यम से प्रदेश की चित्रकला और नाटकों को प्रश्रय दिया जाएगा।
हबीब तनवीर, पंडित सत्यदेव दुबे तथा शंकर शेष जैसे शीर्षस्थ रंग कर्मियों पर केंद्रित कार्यक्रम होंगे।
राज्य के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल 17 दिसंबर 2020 को अपने कार्यकाल का 2 वर्ष पूर्ण करने जा रहे हैं उन्हें हम बधाई देते हैं और यह उम्मीद भी करते हैं कि 14 जुलाई 2020 को मंत्रिमंडल द्वारा संस्कृति परिषद की स्थापना के संबंध में लिए गए निर्णय को शीघ्र ही क्रियान्वित करने की दिशा में वे आवश्यक पहल करेंगे।
जिससे साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में भी यह राज्य पूरे देश में एक अग्रणी राज्य का दर्जा पा सकेगा। इन्हीं उम्मीदों के साथ प्रदेश के सारे साहित्यकारों एवं संस्कृति कर्मियों की ओर से पुनः बधाई एवं शुभकामनाएं।
-कनक तिवारी
आज सरदार वल्लभभाई पटेल का निधन दिवस है। सरदार को मुख्यतः देसी रियासतों के विलीनीकरण का श्रेय देते जनमानस ने लौह पुरुष का खिताब सौंप दिया। दूसरे सबसे बड़े सरकारी पद पर बैठकर निर्णयों को लागू कराना छोटा काम नहीं था। वह वल्लभभाई पटेल होने का यही समूचा अर्थ नहीं है। उन्होंने अंगरेजों की खिलाफत में बारदोली किसान सत्याग्रह के जरिए अनोखी अलख जगाई थी। किसान को राजनीति के केन्द्र में रखने के गुर गांधी के अतिरिक्त सरदार में थे। वल्लभभाई ने वक्तन बावक्तन जवाहरलाल नेहरू की कई नीतियों और फैसलों को प्रभावित और नियंत्रित किया। नेहरू की भावुकता और पटेल का विवेक मिलकर भारतीय राजनीति के सर्वोच्च नेतृत्व की गरिमा थे।
कम लोग जानते होंगे कि भारत विभाजन के अंतिम निर्णय में सरदार पटेल ने निर्णायक भूमिका निभाई। विभाजन को लेकर लिखी किताबों में डाॅ. राममोहर लोहिया द्वारा लिखा गया वृत्तांत प्रामाणिक होने के कारण प्रश्नांकित नहीं हो सका। बकौल लोहिया सरदार ने बंद कमरे में बैठकर लगभग दो घंटे तक गांधी पर विभाजन को मान लेने का निर्णायक दबाव डाला। मनोवैज्ञानिक युद्ध में पराजित गांधी विषण्ण चेहरा लिए बंगाल की ओर मुखातिब हुए। देश नेहरू-पटेल युति के फैसले के कारण विभाजित हो गया। गांधी की हत्या के बाद नेहरू ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर कड़े प्रतिबंध लगाने चाहे। पटेल ने भी हिंसा और सांप्रदायिकता का समर्थन नहीं किया। संघ से माफीनामे लिखवाए गए। फिर भी सरदार ने कूटनीतिक बुद्धि का परिचय देते हुए संघ नेतृत्व और स्वयंसेवकों को दिशाहारा देशभक्त करार दिया। इसी निर्णय के कारण संघ को अपने काम और विचार का विस्तार करने का सुयश मिला।
कांग्रेस कार्यसमिति के कई प्रस्तावों में पटेल के दृढ़निश्चय की झलक है। अंगरेजों द्वारा स्थापित वरिष्ठ भारतीय नौकरशाही के ढांचे और विश्वसनीयता को बनाए रखने में सरदार का योगदान सबसे असरदार है। वे मौलिक चिंतक नहीं थे लेकिन अपनी समझ के प्रति ईमानदार थे। संविधान सभा ने सरदार पटेल को नागरिकों के लिए मूल अधिकारों का ब्यौरा तय करने का काम सौंपा था। साथ साथ आदिवासियों के अधिकारों को लेकर भी कई प्रारूप पाठ तैयार करने थे। संविधान में मूल अधिकार नकारात्मक भाषा में लिखे गए हैं। अर्थात यदि वे अधिकार सरकार या अन्य प्रतिष्ठान द्वारा छीने जाएं तो न्यायपालिका हस्तक्षेप करेगी। सरदार को आदिवासी अधिकारों के लिए संवैधानिक ढ़ांचा रचने का समय ही नहीं मिला। संविधान सभा ने प्रारूप में पाचवां और छठवां अनुच्छेद जोड़कर उनमें आदिवासी अधिकारों को रेखांकित करने की कोशिश की। निपट ग्रामीण सादगी के सरदार पटेल की 184 फीट ऊंची मूर्ति देश से लोहा एकत्र कर प्रधानमंत्री के नेतृत्व में चीन से बनवाई गई है। सरदार भारतीय उद्योगों के समर्थक थे। सरदार की भारतीयता के आर्थिक सोच में उत्तराधिकारियों ने विदेशी दीमकें क्यों उगा दीं।
-कनक तिवारी
मेडिकल शिक्षा के जितने भी सरगना है। उन्होंने ट एम ए पाई फाउंडेशन के मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट के सामने एक मुकदमा पेश किया ।बात कुछ और थी लेकिन 11 जजों की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट में ध्यान रहे 11 जजों की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट में फैसला किया कि यदि आपको मेडिकल शिक्षा लेनी है तो फिर तो फीस भुगतनी होगी निजी सेक्टर में ।
यह कोई मासूम खबर नहीं है। यह गरीब और मध्य वर्ग के बच्चों को मेडिकल शिक्षा से हटाने की गहरी साजिश है। अच्छी तरह समझ लीजिए। इस देश में मेडिकल शिक्षा प्राइवेट सेक्टर में ही ज्यादा है। सरकारी कॉलेज तो बहुत कम हैं। वहां पर भी अपने पूरे जीवन की पूंजी लुटा कर कुछ मां-बाप बच्चों को पढ़ाते हैं। और सरकारी कॉलेजों में पढ़ कर उसके बाद यदि वे 10 साल तक सरकार की नौकरी नहीं करें। जो बहुत बदहाली में होती है। तो 10000000 रुपए जुर्माना देना पड़ेगा। इसे क्षतिपूर्ति नहीं जुर्माना कहा गया है।
यह भोलापन मुबारक हो योगीजी ! इस बात को अच्छी तरह समझ लें कि संविधान के तहत गरीब और मध्यम वर्ग के काबिल बच्चों को मेडिकल इंजीनियरिंग और सभी शिक्षा देने का उत्तरदायित्व सरकार का है। दूसरी बात इस देश में अब तक एक बहुत महत्वपूर्ण फैसले से लोग परिचित नहीं हैं। मेडिकल शिक्षा के जितने भी सरगना है उन्होंने ट एम ए पाई फाउंडेशन के मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट के सामने एक मुकदमा पेश किया ।बात कुछ और थी लेकिन 11 जजों की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट में ध्यान रहे 11 जजों की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट में फैसला किया कि यदि आपको मेडिकल शिक्षा लेनी है तो फिर तो फीस भुगतनी होगी निजी सेक्टर में ।
दूसरी बात यह है कि इस देश में उच्च शिक्षा पाने का किसी का मूल अधिकार नहीं है ।लेकिन उच्च शिक्षा का उसकी दुकानदारी और प्रबंधन का मूल अधिकार है अनुच्छेद 19 में। ये बातें तय हुईं। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के एक प्रसिद्ध मुकदमे उन्नीकृष्णन के फैसले को पलटते हुए हुआ जो 5 जजों की बेंच ने बहुत सही लिखा था। उन्नीकृष्णन का फैसला उच्च शिक्षा को पब्लिक सेक्टर में सरकारी सेक्टर में ले जाने का कहा जा सकता है। और देखिए इस फैसले में टीएमएपाई के फैसले में ऐसा कुछ लिखा गया जो सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को समझ में नहीं आया। उसके बाद एक और मुकदमा पांच जजों की बेंच का सुप्रीम कोर्ट में इस्लामिक एजुकेशन सोसाइटी का आया। उसमें कहा गया कि 11 जजों ने जो कहा है उसको देश के कई हाईकोर्ट के जज भी नहीं समझ पाए। और आपस में विरोधी फैसले हो रहे हैं। समझा दिया 5 जजों की बेंच ने। तय कर दिया कि हाईकोर्ट जज रिटायर होंगे उनकी अध्यक्षता में बच्चों से फीस वसूलने वाली कमेटी बनेगी। यहां पर भी हाईकोर्ट जजों की रिटायरमेंट के बाद अपनी हैसियत स्थापित कर ली गई। सुप्रीम कोर्ट को तसल्ली नहीं हुई फिर एक और फैसला आया 7 जजों का पी ए इनामदार के मामले में। और उसमें कहा गया कि 5 जजों की बेंच ने 11 जजों के फैसले को ठीक नहीं समझा और 11 जजों ने जो लिखा है उससे भी भ्रांति हो गई। हम समझाते हैं। यह फैसला भी मेडिकल कॉलेज के संचालकों के पक्ष में झुका हुआ आया। और इस तरह सब कुछ चल रहा है ।अब यदि अमीर आदमी का बेटा प्राइवेट कॉलेज में पढ़ कर डॉक्टर बनेगा और कहेगा मैं सरकार की नौकरी नहीं करता 10000000 रूपए रखो अपनी जेब में। योगी जी हालांकि आपके पास जेब नहीं है। जो 10 करोड़ 20 20 करोड़ ?500000000 खर्च करके बच्चों को पढ़ाते हैं विदेश में देश में और बाद में 100 200 करोड़ 500 करोड़ खर्च करके निजी अस्पताल बनाते हैं डॉक्टर बच्चों के लिए और वह दुकानदारी करते हैं। उनके लिए एक करोड़ तो कुछ भी नहीं है। लेकिन कोई गरीब का बच्चा एक करोड़ नहीं दे पाएगा योगीजी! और एक करोड रुपए क्यों लेंगे ब्लैकमेल करते हुए ?
आप बच्चों की शिक्षा पर क्या एक करोड़ खर्च करते हैं?और अगर करते हैं तो क्यों करते हैं? आप बच्चों को शिक्षा क्यों नहीं दे सकते? सरकारी कॉलेज इतनी संख्या में खोलिए कि निजी शिक्षा अपने आप गायब हो जाए। तो यह बहुत बड़ा फ्रॉड है गरीब बच्चे मध्य वर्ग के बच्चों के खिलाफ। इसे आप समझें। एक चमत्कार और है। बड़े अफसरों के और बड़े आदमियों के बच्चों की नियुक्ति सरकारी मेडिकल कॉलेजों में कर दी जाती है। अच्छे दफ्तरों में कर दी जाती है। और गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों को जंगलों देहातों में नक्सली क्षेत्रों में पदस्थापित किया जाता है। और वहां दवाओं तक की कोई सुविधाएं नहीं होतीं। तो वह अपना जीवन वैसे ही वहां काटना मुश्किल समझते हैं। दोनों तरफ से मारे जाते हैं। डॉक्टर की नियुक्ति योग्यता के आधार पर नहीं होती। तुलनात्मक योग्यता के आधार पर नहीं होती। वहां पर तो अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह चीन्ह कर देय। यह दुर्भाग्य है कि भारतीय सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में अब जनहित याचिकाओं और न्यायिक सक्रियता के मामलों में एक धूमिल चादर है जबकि उसे सूरज की रोशनी से न्याय की जगमगाना चाहिए।
राजीव गुप्ता
पाकिस्तान से 1947 के विभाजन के समय आए लोगों को भारत सरकार ने उत्तर भारत के अलग-अलग शहरों में रिफ्यूज कैम्पों में रहने और खाने की व्यवस्था की थी। बड़ी आबादी में लोग आकर वहाँ रुके भी थे। अपनी जान किसी तरह बचाकर आए इन लोगों के पास कुछ भी नहीं था, यहां तक की खाने के लिए भी की कुछ नहीं था। बहुतों ने अपने परिवार के सदस्यों को अपनी आँखों के सामने मरते देखा था। लाखों लोग बगैर हिंसा के भी मारे गए थे ।
बात सन 1951 की पहली जनगणना की है । भारत सरकार द्वारा बनाए गए सभी रिफ्यूजी कैम्पों में जनगणना की टीम पहुंची तो सारे रिफ्यूजी कैंप खाली मिले। मुख्यत: पाकिस्तान से विस्थापित अधिकतर पंजाबी समुदाय के लोग अपनी-अपनी क्षमता अनुसार काम पर लग गए थे। उन्होंने सरकार के भरोसे रहना स्वीकार नहीं किया था। इन लोगों ने दिल्ली के ऑफिसों के बाहर सामान बेचने, खाना बनाकर बेचने का काम शुरू कर दिया था। इसके गवाही उस दौर के लोग आपको देंगे। लेखक यशपाल की किताब में इसका विस्तार से जिक्र है। सिर्फ संदर्भ के लिए 1971 के पाकिस्तान युद्ध के बाद विस्थापितों के कैंप आज 50 साल तक आबाद हैं ।
विभाजन के समय पाकिस्तान से अधिकतर पंजाबी लोग भारत आए थे क्योंकि बहुत छोटा सा हिस्सा पंजाब का अभी हमारे पास है। बड़ा हिस्सा पाकिस्तान विभाजन में पाकिस्तान चला गया था। विभाजन की त्रासदी झेल चुके लोगों को सरकार की उपेक्षा डिगा पाएगी इसकी संभावना बहुत कम है । ऐसी कौम जिसने अपने खून से इस माटी को सींचा है उसके साथ सरकार का ऐसा व्यवहार अत्यंत दुखदायी है। अगर किसानों में असंतोष है तो उनकी बात जरूर सुनी जानी चाहिए। सत्रह दिनों से दिल्ली की कपकपाती ठंड में खुले आसमान में किसान सडक़ों में बैठे हंै और सरकार बातें सुनने का ढोंग कर रही है। लगभग रोज हो रही मौतों और कोरोना महामारी के बीच आंदोलनकारी विचलित नहीं हो रहे ये बड़ी बात है।
हिंदुस्तान और विश्व इतिहास में इस आंदोलन को हमेशा एक असरदार आंदोलन के रूप में याद रखा जाएगा और ये बेनतीजा भी खत्म नहीं होगा इसका मौजूदा स्वरूप ये बता रहा है।
इस आंदोलन के तरीके को देखकर अगर किसी को संतोष हो रहा होगा तो वो निसंदेह महात्मा गाँधी को हो रहा होगा।
डॉ. पुनीत बिसारिया
शंकरदास केसरलाल शैलेन्द्र, जिन्हें दुनिया फिल्मों के गीतकार शैलेन्द्र के नाम से जानती है, की आज 53वीं पुण्यतिथि है। 30 अगस्त, सन 1923 को रावलपिंडी में जन्मे शैलेन्द्र के फिल्मी गीतों में रोमानियत, आक्रोश, भक्ति, दर्शन, दर्द सब कुछ देखने को मिलता है। उनके लोकप्रिय फिल्मी गीतों में बरसात में तुमसे मिले हम (बरसात), आवारा हूँ (श्री 420), रमैया वस्तावैया (श्री 420), मुड़ मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के (श्री 420), मेरा जूता है जापानी (श्री 420), आज फिर जीने की (गाइड), गाता रहे मेरा दिल (गाइड), अजीब दास्तां है ये (दिल अपना और प्रीत पराई), ये रात भीगी भीगी(चोरी चोरी), पिया तोसे नैना लागे रे (गाइड), क्या से क्या हो गया (गाइड), हर दिल जो प्यार करेगा (संगम), दोस्त दोस्त न रहा (संगम), सब कुछ सीखा हमने (अनाड़ी), किसी की मुस्कराहटों पे (अनाड़ी), सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है (तीसरी कसम), दुनिया बनाने वाले (तीसरी कसम), तेरा मेरा प्यार अमर (असली नकली), पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई (मेरी सूरत तेरी आँखें), तू प्यार का सागर है (सीमा), खोया खोया चाँद (काला बाजार), रुक जा रात ठहर जा रे चन्दा (दिल एक मन्दिर), सुहाना सफर और ये मौसम हसीं (मधुमती), धरती कहे पुकार के बीज बिछा ले प्यार के (दो बीघा जमीन), जि़ंदगी ख्वाब है (जागते रहो), ओ सजना बरखा बहार आई (परख), छोटा सा घर होगा बादलों की छांव में (नौकरी), आ जा आई बहार (राजकुमार), ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना (बन्दिनी), चाहे कोई मुझे जंगली कहे (जंगली), सुर न सजे क्या गाऊँ मैं (बसन्त बहार), ये शाम की तन्हाइयां ऐसे में तेरा ग़म (आह), ये रातें ये मौसम नदी का किनारा (दिल्ली का ठग), अहा रिमझिम के ये प्यारे प्यारे गीत लिए (उसने कहा था) प्रमुख हैं। राज कपूर ने उन्हें ‘कविराज’ की संज्ञा दी थी।
हिन्दी की सर्वकालिक श्रेष्ठ फि़ल्म ‘तीसरी कसम’ जो फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’ पर आधारित थी, का निर्माण उन्होंने किया था और इसकी व्यावसायिक असफलता से वे अन्दर तक टूट गए थे। मात्र 43 वर्ष की अवस्था में आज ही के दिन सन 1966 में उन्होंने इस दुनिया से विदा ले ली थी। उनके गीत फि़ल्म जगत की ऐसी अमूल्य धरोहर हैं, जिन्हें आज भी बेसाख़्ता हम गुनगुनाने लगते हैं। इस महान गीतकार के साहित्य जगत के योगदान का अभी मूल्यांकन नहीं किया जा सका है। शीघ्र ही राजकपूर के प्रिय ‘कविराज’ पर मेरा एक सुविस्तीर्ण आलेख अग्रज इन्द्रजीत सिंह की शैलेन्द्र पर आधारित पुस्तक के सौजन्य से आप सबके बीच आ रहा है।
इस अनूठे गीतकार को विनम्र श्रद्धांजलि के साथ प्रस्तुत है उनका एक ग़ैर फि़ल्मी गीत ‘उस दिन’
उस दिन ही प्रिय जनम-जनम की
साध हो चुकी पूरी !
जिस दिन तुमने सरल स्नेह भर
मेरी ओर निहारा;
विहंस बहा दी तपते मरुथल में
चंचल रस धारा!
उस दिन ही प्रिय जनम-जनम की
साध हो चुकी पूरी!
जिस दिन अरुण अधरों से
तुमने हरी व्यथाएं;
कर दीं प्रीत-गीत में परिणित
मेरी करुण कथाएं!
उस दिन ही प्रिय जनम-जनम की
साध हो चुकी पूरी!
जिस दिन तुमने बाहों में भर
तन का ताप मिटाया;
प्राण कर दिए पुण्य--
सफल कर दी मिट्टी की काया!
उस दिन ही प्रिय जनम-जनम की
साध हो चुकी पूरी!
संयोजन-अनिल करमेले
-बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पश्चिम बंगाल के डायमंड हार्बर इलाके में भाजपा अध्यक्ष जगत नड्डा और भाजपा प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय के काफिले पर जो हमला हुआ, उसमें ऐसा कुछ भी हो सकता था, जिसके कारण ममता बनर्जी की सरकार को भंग करने की नौबत भी आ सकती थी। यदि नड्डा की कार सुरक्षित नहीं होती तो यह हमला जानलेवा ही सिद्ध होता। कैलाश विजयवर्गीय की कार विशेष सुरक्षित नहीं थी तो उनको काफी चोटें लगीं। क्या इस तरह की घटनाओं से ममता सरकार की इज्जत या लोकप्रियता बढ़ती है ? यह ठीक है कि भाजपा के काफिले पर यह हमला ममता ने नहीं करवाया होगा। शायद इसका उन्हें पहले से पता भी न हो लेकिन उनके कार्यकर्ताओं द्वारा यह हमला किए जाने के बाद उन्होंने न तो उसकी कड़ी भर्त्सना की और न ही अपने कार्यकर्ताओं के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई की। बंगाल की पुलिस ने जो प्रतिक्रिया ट्वीट की, वह यह थी कि घटना-स्थल पर ‘‘खास कुछ हुआ ही नहीं’’। पुलिस ने यह भी कहा कि ‘‘कुछ लोगों ने पत्थर जरुर फेंके लेकिन सभी लोग सुरक्षित हैं। सारी स्थिति शांतिपूर्ण है।’’ जरा सोचिए कि पुलिसवाले इस तरह का रवैया आखिर क्यों रख रहे हैं ? क्योंकि वे आंख मींचकर ममता सरकार के इशारों पर थिरक रहे हैं। सरकार ने उन्हें यदि यह कहने के लिए प्रेरित नहीं किया हो तो भी उनका यह रवैया सरकार की मंशा के प्रति शक पैदा करता है। यह शक इसलिए भी पैदा होता है कि ममता-राज में दर्जनों भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है और उक्त घटना के बाद कल भी एक और हत्याकांड हुआ है। प. बंगाल के चुनाव सिर पर हैं। यदि हत्या और हिंसा का यह सिलसिला नहीं रुका तो चुनाव तक अराजकता की स्थिति पैदा हो सकती है। केंद्र और राज्य में इतनी ज्यादा ठन सकती है कि ममता सरकार को भंग करने की नौबत भी आ सकती है। उसका एक संकेत तो अभी-अभी आ चुका है। पुलिस के तीन बड़े केंद्रीय अफसर, जो बंगाल में नियुक्त थे और जो नड्डा-काफिले की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार थे, उन्हें गृहमंत्री अमित शाह ने वापस दिल्ली बुला लिया है। ममता इससे सहमत नहीं है। लेकिन इस तरह के कई मामलों में अदालत ने केंद्र को सही ठहराया है। ममता को आखिरकार झुकना ही पड़ेगा। राज्यपाल जगदीप धनखड़ और ममता के बीच रस्साकशी की खबरें प्रायः आती ही रहती हैं। भाजपा की केंद्र सरकार और ममता सरकार को जरा संयम से काम लेना होगा, वरना बंगाल की राजनीति को रक्तरंजित होने से कोई रोक नहीं पाएगा।
सीएसई की पड़ताल केवल शहद या इसमें हो रही मिलावट को लेकर नहीं है; ये पड़ताल भविष्य के खाद्य पदार्थों के कारोबार की ‘प्रकृति’ को लेकर है
क्योंकि प्रकृति में मौजूद जीव हमारी खाद्य व्यवस्था की उत्पादकता के लिए बहुत जरूरी है और जो शहद ये जीव बनाते हैं, वे हमारी सेहत को सुधारते हैं। ये बातें हम जानते हैं। लेकिन, हम इस बात की अनदेखी कर रहे हैं कि प्राकृति का दिया हुआ ये उपहार हम कितनी जल्दी खो सकते हैं।
जब से हमने शहद में मिलावट को लेकर अपनी पड़ताल की रिपोर्ट सार्वजनिक की है, तब से हमें किताबी प्रतिक्रिया मिल रही है। संभवत वैसी प्रतिक्रिया जैसी दुनियाभर के बिजनेस स्कूलों में चर्चा होती है और सिखाई जाती है।
प्रतिक्रिया का पहला चरण है, इनकार करना। इस मामले में शहद का प्रसंस्करण करने वाली कंपनियां शिकायत कर रही हैं कि हम गलत हैं।
दूसरा चरण है, झूठे आरोप लगा कर हमारी साख को बदनाम करना। इसके बाद वैज्ञानिक तिकड़मों का इस्तेमाल कर उपभोक्ताओं को भ्रमित करना। इस मामले में कंपनियां गलत जांच रिपोर्ट जारी कर रही हैं और हमारी जांच रिपोर्ट को गलत बताकर कटाक्ष कर रही है।
तीसरा चरण है अपने उत्पाद को साफ और सुरक्षित बताने के लिए वैकल्पिक नैरेटिव तैयार करने में खूब वक्त बिताना और इसे जटिल बनाने के लिए ‘अच्छे विज्ञान’ का इस्तेमाल।
याद रखिये, जब सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट ने कोला सॉफ्ट ड्रिंक्स में कीटनाशक के मिलावट की पड़ताल की थी, तो दो बड़ी कंपनियों ने लेबोरेटरी कोट पहनाने के लिए बॉलीवुड के शीर्ष अभिनेताओं को भाड़े पर लिया था, ताकि हमें विश्वास दिला सकें कि सब कुछ ठीक है।
इस बार हम जानते हैं कि उनका विज्ञापन पर खर्च बढ़ गया है और उन्हें लगता है कि हमारी आवाज दब जायेगी।
चौथे चरण का हमला ज्यादा तीखा और सुक्ष्म होता है। ये कोला के साथ लड़ाई के दौरान विकसित हुआ है। अब कंपनियां हमारे खिलाफ सीधा केस नहीं करती हैं। हमें धमकाते हैं, लेकिन हमें कोर्ट नहीं ले जाते हैं। इसकी जगह हमले की जमीन तैयार करने के लिए वे उन कॉरिडोर में बाहुबल का इस्तेमाल करते हैं, जिनसे फर्क पड़ता है।
लेकिन, पूर्व में ये तरकीब काम नहीं आई है और हमें लगता है कि इस बार भी ये काम नहीं करेगी। कोला के मामले में कंपनी नहीं, बल्कि हमारी (सचेतक) जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का गठन हुआ था और समिति की जांच रिपोर्ट हमारे पक्ष में आई थी।
हमें लगता है कि इस बार सरकार व फुड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) हमारी जांच रिपोर्ट के आधार पर और इस पौष्टिक खाद्य में मिलावट रोकने के लिए कार्रवाई सुनिश्चित करेगी। यहां बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है और हम सब ये जानते हैं।
आप उपभोक्ता इस पर बोल चुके हैं। शहद किसी अन्य आहार की तरह नहीं है। इसका इस्तेमाल हेल्थ सप्लिमेंट (स्वास्थ्य पूरक) के तौर पर किया जाता है। ये औषधीय है और इसलिए इसमें चीनी मिलाने का मतलब है कि ये हमारे स्वास्थ्य के लिए सचमुच हानिकारक है। इसको लेकर कोई सवाल नहीं है। इसलिए हमें दबाव बनाये रखना चाहिए, ताकि प्रकृति के इस उपहार में मिलावट न हो।
लेकिन, चिंता का एक अलग कारण भी है और वो मधुमक्खी से जुड़ा हुआ है। मधुमक्खी हरबिंगर प्रजाति का कीट है। वे हमारी खाद्य व्यवस्था के स्वास्थ्य की तरफ संकेत देते हैं। हम जानते हैं कि बिना मधुमक्खी के किसी भी खाद्य का उत्पादन नहीं होगा।
उत्पादकता के लिए मधुमक्खियों का होना बहुत जरूरी है क्योंकि ये पौधों का परागन कराते हैं। समझा जाता है कि फूल देने वाले 90 प्रतिशत पौधों को परागन के लिए मधुमक्खियों की जरूरत पड़ती है। तिलहन सरसों से लेकर सेव और चकोतरा तथा अन्य फलियों तक ज्यादातर अन्न जो हम खाते हैं, उन्हें उपजने के लिए मधुमक्खियों की जरूरत पड़ती है।
मधुमक्खियां हमें जहरीले तत्व और कीटनाशक के अत्यधिक इस्तेमाल को लेकर भी अगाह करते रहे हैं। अब ये समझा जाता है कि मधुमक्खी कॉलोनियों के खत्म होने के पीछे नियोनिक कीटनाशक जिम्मेवार है। नियोनिक एक ऐसा जहर है, जिसे इस तरह तैयार किया गया है कि ये कीटाणुओं के तंत्रिका कोष पर हमला करता है।
यूएस कांग्रेस में मधुमक्खियों के संरक्षण के लिए सेविंग अमेरिकाज पॉलिनेटर्स नाम से कानून पेश हो चुका है। इस साल मई में अमेरिका के एनवायरमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी ने 12 तरह के नियोनिक्स उत्पाद को प्रतिबंधित कर दिया है।
लेकिन, दूसरे तरह के जहरीले तत्वों का इस्तेमाल अब भी जारी है और मधुमक्खियां इसकी संकेतक प्रजाति हैं। वे हमें बताती हैं कि हम अपने खाद्यान और पर्यावरण को किस तरह जहरीला बना रहे हैं।
फिर, खाद्यान्न उत्पादन व्यवस्था को लेकर सवाल है। हमने पड़ताल इसलिए शुरू की क्योंकि कच्चे शहद का दाम गिर गया और ऐसा तब हुआ, जब शहद की खपत में कई गुना की बढ़ोतरी हुई है।
मधुमक्खी पालक को व्यवसाय में घाटा हो रहा है और वे अपनी दुकान बंद कर रहे हैं। इसके लिए हमें चिंतित होना चाहिए क्योंकि उनकी आजीविका हमारे भोजन से जुड़ी हुई है।
लेकिन, बात इतनी ही नहीं है। सच ये है कि आधुनिक मधुमक्खी पालन एक औद्योगिक स्तर की गतिविधि है और इस पर भी विमर्श करने की जरूरत है।
पहली बात तो मधुमक्खियों में जैवविविधता भी एक मुद्दा है। दुनियाभर में जैविविधता संरक्षण का सिरमौर यूरोपीय संघ अपने यहां के शहद को एपिस मेलिफेरा उत्पादित शहद के रूप में परिभाषित करता है।
दूसरे शब्दों में यूरोपीय संघ में जो शहद बिकता है, उस शहद का उत्पादन दूसरी कोई भी मधुमक्खी नहीं कर सकती है। फिर ये मधुमक्खियों की जैवविविधता के लिए क्या करता है? भारत में अपिस सेराना (भारतीय मधुमक्खी) या अपिस डोरसाता (पहाड़ी मधुमक्खी) है।
अगर इन मधुमक्खियों के शहद को अलग नहीं किया जा सकता है, अगर मधुमक्खियों की इन प्रजातियों को बढ़ावा नहीं दिया जाता है और इनकी संख्या नहीं बढ़ती है, तो क्या होगा?
एक बड़ा सवाल ये भी है कि उत्पादन और प्रसंस्करण से हम क्या समझते हैं? ज्यादातर मामलों में शहद ‘प्रसंस्कृत’ होते हैं। इन्हें गर्म किया जाता है और इसकी नमी को निकाला जाता है। ये प्रक्रिया पैथोजेन हटाने और लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए अपनाई जाती है।
इस तरह के प्रसंस्कृत शहद के लिए सुरक्षा और शुद्धता के मानदंड तैयार किये जाते हैं। लेकिन क्या असल में जो शहद है, उसके लिए ये मानदंड काम करते हैं? क्या प्रकृति से शहद लाकर इसे पूरी तरह शुद्ध रूप में हम खाते हैं?
लेकिन, फिर बात आती है कि ऐसे में बड़ा उद्योग कैसे जीवित रहेगा? क्या दुनियाभर में लाखों लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए ये अपना उत्पादन बढ़ा सकते हैं? बुनियादी सवाल केवल शहद में मिलावट का नहीं है, बल्कि इससे ज्यादा है। सवाल भविष्य के खाद्य पदार्थों के कारोबार की प्रकृति का है। (downtoearth)
Lalit Maurya-
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार हृदय रोग दुनिया भर में सबसे ज्यादा लोगों की जान ले रहा है। 2019 में इसके चलते करीब 90 लाख लोगों की मौत हुई थी, जबकि 20 साल पहले यह 68 लाख मौतों के लिए जिम्मेवार था। यदि सभी कारणों से होने वाली मौतों को देखें तो उनमें से 16 फीसदी मौतों के लिए हृदय रोग जिम्मेवार हैं। यदि 2019 में हुई मौतों के 10 प्रमुख कारणों पर गौर करें तो उनमें से 7 कैंसर और मधुमेह जैसे गैर संक्रामक रोग हैं।
2019 में स्ट्रोक को दूसरा स्थान दिया है जिसके चलते करीब 62 लाख लोगों की जान गई थी। जबकि इसके बाद फेफड़े से जुड़ी बीमारी 'सीओपीडी' का नंबर आता है जिसके चलते करीब 32 लाख लोगों की मौत हुई थी। फेफड़ों के कैंसर के चलते 18 लाख लोगों की जान गई थी।
रिपोर्ट के अनुसार पहली बार अल्जाइमर और डिमेंशिया को 10 प्रमुख कारकों में शामिल किया गया है, जिनके चलते 2019 में 16 लाख लोगों की मौत हुई थी। जिसमें से 65 फीसदी महिलाएं थी। वहीं मधुमेह को 9वें स्थान पर रखा गया है जिसके चलते करीब 15 लाख और किडनी से जुडी बीमारियों (10वें स्थान) के चलते करीब 13 लाख लोगों की मौत हुई थी। रिपोर्ट के अनुसार मधुमेह से होने वाली मौतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, पिछले 20 वर्षों में इनसे होने वाली मौतों में करीब 70 फीसदी का इजाफा हुआ है।
यदि संक्रामक रोगों की बात करें तो पिछले 20 वर्षों में उनमें काफी कमी आई है। 20 वर्षों में एड्स से होने वाली मौतों में करीब 51 फीसदी की कमी आई है। जहां 2000 में 14 लाख मौतों के साथ इसे 8वें स्थान पर रखा था, वो अब 6.79 लाख मौतों के साथ 19वें स्थान पर है। इसी तरह टीबी से होने वाली मौतों में भी कमी आई है, जिसके चलते 2019 में करीब 12 लाख लोगों की जान गई थी।
संक्रामक रोगों में सांस से जुड़ा संक्रमण सबसे बड़ा हत्यारा है जिसे 2019 में चौथे स्थान पर रखा गया है। इसके चलते 2019 में 26 लाख लोगों की जान गई थी। वहीं 2000 में इसके कारण 31 लाख लोगों की मौत हुई थी। नवजातों की मौत से जुड़े कारकों को 2019 में पांचवें स्थान पर रखा गया है जिसके चलते करीब 20 लाख बच्चों की जान गई थी।
पिछले 20 वर्षों में औसत आयु में हुआ 6 वर्ष का इजाफा
पिछले 20 वर्षों में लोगों की औसत उम्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। जहां 2000 में औसत आयु 67 वर्ष थी वो 2019 में 6 वर्ष बढ़कर 73 पर पहुंच गई है। जोकि स्वास्थ्य के क्षेत्र में हो रहे विकास और संक्रामक रोगों से होने वाली मौतों में कमी के कारण संभव हो पाया है। हालांकि उम्र बढ़ने का यह मतलब नहीं है कि इससे लोगों के स्वस्थ जीवन में भी इजाफा हुआ है। गैर संक्रामक रोगों के बढ़ने के कारण लोगों के स्वास्थ्य के स्तर में भी गिरावट आई है।
गौरतलब है कि हृदय रोग, मधुमेह, स्ट्रोक, फेफड़ों के कैंसर और फेफड़े से जुड़ी बीमारियों के चलते 2000 की तुलना में 2019 में लगभग स्वस्थ जीवन के 10 करोड़ अतिरिक्त वर्षों का नुकसान हुआ है। इसके लिए लोगों की जीवनशैली में आ रहे बदलाव, प्रदूषण और पर्यावरण में हो रही गिरावट मुख्य रूप से जिम्मेवार है, जिस पर ध्यान देना जरुरी है। (downtoearth)
Shagun Kapil-
11 राज्यों के गरीब व कमजोर तबके के करीब 4000 लोगों पर किए गए सर्वे में दो तिहाई आबादी ने बताया कि वे जो भोजन कर रहे हैं, वो लॉकडाउन से पहले के मुकाबले ‘कुछ हद तक कम’ या ‘काफी कम’ है।
इनमें से 28 प्रतिशत ने कहा कि उनके भोजन की खुराक में ‘काफी हद तक कमी’ आई गई है।
सर्वे में शामिल आबादी के एक बड़े हिस्से को भूखा भी रहना पड़ा। सितंबर और अक्टूबर में जब हंगर वाच को लेकर सर्वे किया गया था, तो पता चला कि हर 20 में से एक परिवार को अक्सर रात का खाना खाए बगैर सोना पड़ा।
वहीं, 56 प्रतिशत ने कहा कि लॉकडाउन से पहले उन्हें कभी भी खाली पेट नहीं रहना पड़ा था। लेकिन, लॉकडाउन की अवधि में हर सात में से एक को या तो अक्सर या कभी-कभी भोजन किए बिना रहना पड़ा।
राइट टू फूड कैम्पेन और कुछ अन्य संगठनों ने कोविड-19 महामारी के दौरान भारत के अलग-अलग हिस्सों में असुरक्षित व हाशिये पर खड़े समुदायों में भुखमरी की स्थिति को समझने के लिए सितंबर 2020 में हंगर वाच लांच किया था।
सर्वे के आधार पर 9 दिसंबर 2020 को एक रिपोर्ट जारी की गई।
ग्रामीण व शहरी इलाकों के असुरक्षित समुदायों की पहचान स्थानीय कार्यकर्ताओं/शोधकर्ताओं ने की। सर्वे छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, झारखंड, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में किया गया।
सर्वे में शामिल आबादी में से 53 प्रतिशत ने कहा कि चावल/गेहूं (केंद्र सरकार की जनवितरण प्रणाली का मुख्य खाद्यान्न) की उनकी खुराक सितंबर-अक्टूबर में कम हो गई। इनमें से हर चार में से एक ने कहा कि उनकी खुराक में ‘काफी कमी’ आई है।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एएसएफए) के तहत जनवितरण प्रणाली के जरिये 67 प्रतिशत आबादी को हर महीने सब्सिडी पर प्रति व्यक्ति के हिसाब से 5 किलोग्राम खाद्यान्न की गारंटी देता है।
कम खुराक
रिपोर्ट के मुताबिक, 64 प्रतिशत आबादी ने बताया कि उनकी दाल की खुराक सितंबर-अक्टूबर में कम हो गई है। इनमें से 28 प्रतिशत ने कहा कि उनकी खुरात में ‘काफी कमी’ आई है। वहीं, 73 प्रतिशत आबादी ने बताया कि उनकी हरी सब्जियों की खुराक में गिरावट आई है जबकि 38 प्रतिशत ने हरी सब्जियों की खुराक में ‘काफी कमी’ की बात कही है।
भारत में कुपोषण चरम पर है और लॉकडाउन के दौरान सरकारी योजनाएं बहुत अहम थीं, लेकिन हंगर वाच के सर्वे में भुखमरी के चिंताजनक स्थिति में पहुंचना बताता है कि केंद्र सरकार की तरफ से शुरू की गई प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना नाकाफी थी।
रिपोर्ट में कहा गया है, “बहुत सारे लोगों को योजना का लाभ नहीं मिला और जिन्हें मिला भी उनकी खुराक लॉकडाउन से पहले के मुकाबले कम ही रही। इससे पता चलता है कि इन स्कीमों को मजबूत और विस्तृत किये जाने की जरूरत है।”
सर्वे करने वाले कार्यकर्ताओं व शोधकर्ताओं ने एक वेबिनार में कहा कि जिनके पास राशन कार्ड नहीं था, उन पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है। जनवितरण प्रणाली उन चंद सुरक्षात्मक स्कीमों में एक है, जो इसके अंतर्गत आने वाले लाभुकों के लिए काम करती है। शोधकर्ताओं ने जनवितरण प्रणाली को यूनिवर्सल कर हर व्यक्ति को कम से कम 6 महीने तक (जून 2021) तक 10 किलोग्राम अनाज, डेढ़ किलो दाल और 800 ग्राम तेल देने की मांग की।
रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वे में शामिल आबादी में से बहुत लोगों ने ये भी कहा कि लॉकडाउन में उनकी दिक्कतें और बढ़ गईं क्योंकि लॉकडाउन के कारण स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्र में बच्चों को मिलने वाला पौष्टिक आहार बंद हो गया।
करीब 71 प्रतिशत लोगों ने कहा कि लॉकडाउन से पहले के मुकाबले सितंबर-अक्टूबर में उनके भोजन की पौष्टिक गुणवत्ता भी खराब हो गई। इनमें से 40 प्रतिशत ने कहा कि भोजन की पौष्टिक गुणवत्ता ‘बेहद खराब’ हो गई।
कमाई में गिरावट
सर्वे में हिस्सा लेने वाले लोगों ने ये भी कहा कि लॉकडाउन के बाद उनकी कमाई रुक गई या फिर बिल्कुल कम हो गई। इनमें से 56 प्रतिशत आबादी को अप्रैल-मई में किसी तरह की कमाई नहीं हुई थी और सितंबर-अक्टूबर में भी यही क्रम जारी रहा।
करीब 62 प्रतिशत आबादी ने बताया कि अप्रैल-मई (लॉकडाउन से पहले) के मुकाबले सितंबर-अक्टूबर में उनकी कमाई में गिरावट आई। केवल तीन प्रतिशत ने कहा कि उन्हें सितंबर-अक्टूबर में भी अप्रैल-मई जितनी कमाई हुई।
सर्वे रिपोर्ट में हाशिये पर जीने वाले समुदाय की स्थिति पर भी चर्चा की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वे में शामिल असुरक्षित जनजातीय परिवारों में से 77 प्रतिशत ने कहा कि उनके भोजन की खुराक लॉकडाउन से पहले के मुकाबले सितंबर-अक्टूबर में कम हो गई। दलितों की 74 प्रतिशत आबादी में खुराक होने की बात कही, वहीं इनमें से 36 प्रतिशत ने बताया कि उनकी खुराक ‘काफी कम’ हो गई।
करीब 54 प्रतिशत आदिवासियों ने भोजन की खुराक कम मिलने की बात कही।
रिपोर्ट में इस बात को भी रेखांकित किया गया है कि पिछले कुछ महीनों में लाये गये लेबर कोड व कृषि कानून जैसे नीति व विधेयकों के चलते इन तबकों की हालत और नाजुक हो सकती है।
रिपोर्ट कहती है, “चार लेबर कोड असंगठित क्षेत्र के कामगारों को अशक्त करते हैं और काम के बदले मजदूरी के भुगतान को लेकर अनिश्चितता बढ़ाते हैं, जो अंततः भोजन खरीदने की उनकी क्षमता को प्रभावित करेगा। तीन कृषि कानूनों को लेकर किसान आंदोलन कर रहे हैं और तर्क दिया जा रहा है कि ये कानून खाद्यान्न अधिप्राप्ति तंत्र के लिए खतरनाक है, जो आखिरकार जनवितरण प्रणाली के लिए भी खतरा हो सकता है।”
रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि कोविड-19 राहत के तहत अतिरिक्त खाद्यान्न दिया जा रहा है, लेकिन इसके बावजूद पूरक बजट में फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) के लिए केवल 10,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बजट प्रावधान किया गया।
रिपोर्ट में कहा गया है, “एफसीआई की अंडरफंडिंग का मतलब किसानों को मिलने वाले समर्थन मूल्य को कमजोर करना व उन्हें और कर्ज में धकेलना है। केंद्र सरकार को एफसीआई को मजूत करने के लिए अतिरिक्त फंड देना चाहिए।” (downtoearth)
-बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
देश के डॉक्टरों ने हड़ताल कर दी है। किसान आंदोलन के बाद अब यह डॉक्टर आंदोलन शुरु हो गया है। इन दोनों आंदोलनों का आधार गलत-फहमी है। इस गलतफहमी का कारण किसान और डॉक्टर नहीं है। उसका कारण हमारी सरकार है। उसका अहंकार है। वह जो कुछ कर रही है, वह देश के भले के लिए कर रही है। लेकिन इसके पहले कि वह कोई क्रांतिकारी कदम उठाए, वह उससे प्रभावित होनेवाले लोगों से बात करना जरुरी नहीं समझती। जो उसे ठीक लगता है या अफसर जो चाबी घुमाते हैं, सरकार आनन-फानन उसकी घोषणा कर देती है। अब उसने घोषणा कर दी है कि आयुर्वेदिक अस्पतालों में भी शल्य-चिकित्सा होगी।
यह ठीक है कि ऐसी दर्जनों छोटी-मोटी शल्य-क्रियाएं हमारे वैद्यगण सदियों से करते चले आए हैं। उन्हें अभी सिर्फ नाक, कान, आंख, गले आदि की ही सर्जरी की अनुमति दी गई है। मष्तिष्क और दिल आदि की नहीं लेकिन हमारे डॉक्टर इस पर बहुत खफा हो गए हैं।
उनकी हड़ताल का कारण मुझे समझ में नहीं आ रहा है। वे कह रहे हैं कि इस अनुमति से मरीज़ों की जान को खतरा हो जाएगा। उन्हें मरीजों की जान का खतरा है या उनका धंधा चौपट होने का खतरा है ? एलोपेथी की सर्जरी काफी सुरक्षित होती है लेकिन वह इतनी खर्चीली है कि देश का आम आदमी उसकी राशि सुनकर ही कांप उठता है। अब डॉक्टर इसलिए कांप रहे हैं कि यदि वही काम वैद्य करने लगेंगे तो उनका पाखंड खत्म हो जाएगा। देश के गरीब, ग्रामीण और पिछड़े लोगों को भी शल्य-चिकित्सा का लाभ मिलने लगेगा। आयुर्वेद में शल्य-चिकित्सा सदियों से चली आ रही है जबकि एलोपेथी को तो सवा सौ साल पहले तक मरीज को बेहोश करना भी नहीं आता था। डॉक्टरों को सबसे बड़ा धक्का इस बात से लगा है कि अब ये वैद्य उनके बराबर हो जाएंगे। पश्चिमी एलोपेथी और अंग्रेजी माध्यम की श्रेष्ठता ग्रंथि ने उन्हें जकड़ रखा है। इस दिमागी गुलामी से उबरने की बजाय वे इस नई पद्धति को ‘मिलावटीपैथी’ कह रहे हैं। मैं तो चाहता हूं कि भारत में इलाज की सभी पैथियों को मिलाकर, सबका लाभ उठाकर, डॉक्टरी का एक नया पाठ्यक्रम बनाया जाए, जिसका अनुकरण सारी दुनिया करेगी। लेकिन वैद्यों और हकीमों को शल्य-चिकित्सा का अधिकार देने के पहले सरकार को चाहिए कि वह उन्हें मेडिकल सर्जनों से भी अधिक कठोर प्रशिक्षण दे। हड़बड़ी में कोई फैसला न करे।
(नया इंडिया की अनुमति से)
भारत से अधिक संवेदनशील पत्रकारिता पड़ोसी देश अफगानिस्तान में की जा रही है, जहां पिछले 10 वर्षों के दौरान 100 से अधिक पत्रकार मारे जा चुके हैं। पर, हर ऐसी हत्या के बाद निष्पक्ष पत्रकार झुकते नहीं, बल्कि उनकी एक नई पौध सामने आ जाती है।
-महेन्द्र पांडे
इस वर्ष भारत में अपने काम के दौरान तीन पत्रकारों की हत्या कर दी गई, जबकि आतंक के साए से जूझ रहे अफगानिस्तान, इराक और नाइजीरिया में भी इतने ही पत्रकार मारे गए। पूरी दुनिया में इस वर्ष अपने काम के दौरान कुल 42 पत्रकार मारे गए, जिसमें सर्वाधिक संख्या मेक्सिको के पत्रकारों की है, जहां अब तक 13 पत्रकार मारे जा चुके हैं। इसके बाद पाकिस्तान का स्थान है, जहां 5 पत्रकार मारे गए। इसके बाद भारत का स्थान है। इन आंकड़ों को इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स ने अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस यानि 10 अक्टूबर को जारी किया है। इसी दिन डच सरकार और यूनेस्को ने संयुक्त तौर पर पत्रकारों पर बढ़ते खतरे के संबंध में एक ऑनलाइन वैश्विक कांफ्रेंस भी आयोजित किया।
इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स पिछले तीस वर्षों से पत्रकारों की स्थिति पर वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करता रहा है। इस फेडरेशन के 6 लाख सदस्य हैं, जो लगभग 150 देशों में फैले हैं। पिछले तीस वर्षों के दौरान कुल 2658 पत्रकारों की ह्त्या उनके काम के दौरान की जा चुकी है। पिछले 5 वर्षों के दौरान 4 वर्षों में मेक्सिको पहले स्थान पर रहा है। मेक्सिको की सरकारें बदलती हैं, पर पत्रकारों की हालत नहीं बदलती। इस फेडरेशन के जनरल सेक्रेटरी ऐन्थोनी बेल्लान्गेर के अनुसार पिछले कुछ वर्षों के दौरान पत्रकारों की ह्त्या के आंकड़े कम होते जा रहे हैं, पर इसका कारण इनकी स्थिति में सुधार नहीं बल्कि सरकारों द्वारा ऐसी खबरों को दबाना है।
फेडरेशन के प्रेसिडेंट यूनेस जाहेद के अनुसार अधिकतर देशों ने पत्रकारों की हत्या के बदले बिना किसी आरोप के ही उन्हें जेलों में बंद करना शुरू कर दिया है। इस वर्ष दुनिया में लगभग 235 पत्रकारों को बिना किसी आरोप के ही जेल में डाला गया है। जेल में बंद करने पर ज्यादा हंगामा भी नहीं होता और पत्रकार को शांत कराने का काम भी हो जाता है।
10 दिसंबर को ही सर्वोच्च न्यायालय की तमाम तल्ख़ टिप्पणियों के बाद भी नए संसद भवन का भूमि पूजन आयोजित किया गया। दरअसल मोदी सरकार की अनेक कामों में जल्दबाजी ही संशय को जन्म देती है और नए संसद भवन के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। इतनी जल्दबाजी और तमाम कटु टिप्पणियों के बाद भी नए संसद भवन के काम को आगे बढाते रहने का संबंध कम से कम लोकतंत्र से तो कतई नहीं हो सकता।
दरअसल यह कवायद उन सम्राटों के समकक्ष खड़ा होने की है, जिन्होंने आलीशान किले, दुर्ग या दूसरी इमारतें बनवाईं। प्रधानमंत्री मोदी भी विराट संसद भवन और ऊंची मूर्तियों के बल पर उनके बराबर पहुंचना चाहते हैं, भले ही इसके लिए लोकतंत्र का गला घोटना पड़े। मोदी सरकार में मीडिया ही सबसे अधिक गिरा हुआ स्तंभ है। जाहिर है चाटुकारों से भरी मीडिया से इस तानाशाही को लोकतंत्र की खाल में लपेटना सरकार के लिए आसान है। निष्पक्ष मीडिया के नाम पर थोड़ी सी जान सोशल मीडिया या फिर स्थानीय समाचार पत्रों या वेब न्यूज पोर्टल के कारण है और इसी से जुड़े पत्रकार मारे जाते हैं या फिर जेल में डाले जाते हैं।
एक तरफ जहां सरकार दुनिया भर में कोविड 19 पर नियंत्रण और इससे संबंधित इंतजामों का दुनिया भर में डंका पीट रही है, वहीं स्वतंत्र पत्रकार इन दावों की पोल खोलते रहे। जाहिर है हमारी सरकार अपना विरोध किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकती और यही हुआ भी। देश के अलग-अलग हिस्सों से 50 से अधिक स्वतंत्र पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया है या उन पर डंडे बरसाए गए या फिर पुलिस ने शिकायत दर्ज की है। इनमें से किसी ने क्वारेंटाइन सेंटर की बदहाली बताई, तो किसी ने प्रवासी मजदूरों की व्यथा का बयान किया या किसी ने अस्पतालों की बदहाली की तस्वीर उजागर की या किसी ने राज्यों की सीमा पर अघोषित बंदिशों को उजागर किया।
ऐसे कई पत्रकारों पर गलत सूचना देने, सरकारी आदेशों की अवहेलना और कोविड 19 से सम्बंधित गलत खबरें फैलाने के आरोप लगाए गए हैं। इनमें से कुछ मामलों में कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट ने दखल दिया है, पर अधिकतर मामलों में सुनने वाला कोई नहीं है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि कुल 180 देशों में हमारा देश प्रेस की आजादी के सन्दर्भ में 142वें स्थान पर है।
कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स नामक संस्था 2008 से लगातार हरेक वर्ष ग्लोबल इम्प्युनिटी इंडेक्स प्रकाशित करती है। इसमें पत्रकारों की हत्या या फिर हिंसा से जुड़े मामलों पर कार्यवाही के अनुसार देशों को क्रमवार रखती है। इस इंडेक्स में जो देश पहले स्थान पर रहता है, वह अपने यहां पत्रकारों की ह्त्या के बाद हत्यारों पर कोई कार्यवाही नहीं करता। ग्लोबल इम्प्युनिटी इंडेक्स में भारत का स्थान 12वां था, जबकि 2019 में 13वां और 2018 में 14वां था। इसका सीधा सा मतलब है कि हमारे देश में पत्रकारों की हत्या या उन पर हिंसा के बाद हत्यारों पर सरकार या पुलिस की तरफ से कोई कार्यवाही नहीं की जाती।
इन आंकड़ों से यह समझना आसान है कि देश में सरकार और पुलिस की मिलीभगत से पत्रकारों की ह्त्या की जाती है। इस इंडेक्स में सोमालिया, सीरिया और इराक सबसे अग्रणी देश हैं। पाकिस्तान 9वें स्थान पर और बांग्लादेश 10वें स्थान पर है। दुनिया के केवल 7 देश ऐसे हैं जो वर्ष 2008 से लगातार इस इंडेक्स में शामिल किये जा रहे हैं और हमारा देश इसमें एक है। जाहिर है, वर्ष 2008 के बाद से देश में पत्रकारों की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है।
भारत से अधिक संवेदनशील पत्रकारिता पड़ोसी देश अफगानिस्तान में की जा रही है, जहां पिछले 10 वर्षों के दौरान 100 से अधिक पत्रकार मारे जा चुके हैं। पर, हर ऐसी ह्त्या के बाद निष्पक्ष पत्रकार झुकते नहीं, बल्कि उनकी एक नई पौध सामने आ जाती है। तालिबान की तमाम धमकियों के बाद भी बड़ी संख्या में महिलाएं भी निष्पक्ष पत्रकारिता कर रही हैं। अनेक महिला पत्रकारों की हत्या भी की गई है। 9 दिसंबर को ही जलालाबाद में मलालाई मैवंद नामक एक महिला टीवी रिपोर्टर और महिला अधिकार कार्यकर्ता की गोली मार कर हत्या की गई है। (navjivanindia.com)
शिव विश्वनाथन
समाजशास्त्री
समाज का ग़ैर-सरकारी और अराजनीतिक नेतृत्व जिसे लोग सिविल सोसाइटी भी कहते हैं, उसका बीच में ग़ायब हो जाना और दोबारा उभरकर सामने आना एक दिलचस्प बात है.
इस समय देश में जो कुछ चल रहा है उसमें सिविल सोसाइटी का उभार ऐसी बात है जो मोदी सरकार को ज़रूर चिंता में डाल रहा होगा. जब पहली बार दिल्ली की सत्ता पर मोदी सरकार बैठी थी तो इसका राजनीतिक संदेश साफ़ था. सरकार का लक्ष्य स्पष्ट था कि क्या करना है और क्या नहीं. इस शासन का दावा था कि जो देश की बड़ी आबादी के हित की बात होगी, वो उसी को आगे बढ़ाएँगे. इस तरह सरकार ने ऐसा नागरिक समाज गढ़ लिया, जो सत्ता का ही एक्सटेंशन काउंटर था. यह एक ऐसी मशीन थी, जो 'देशभक्ति' जैसी आम सहमति वाली अवधारणाओं को मज़बूत करने में लगी थी.
'एंटी नेशनल' शब्द का लगातार इस्तेमाल इतना बढ़ा कि लोगों के विचारों की निगरानी जैसा माहौल बन गया, एक ऐसा माहौल जो सत्ता से मिलती-जुलती सोच कायम करने का दबाव बनाने लगा. इस शासन के पहले कुछ सालों में सिविल सोसाइटी की पारंपरिक विविधता तो मानो ग़ायब होती दिख रही थी. वर्चस्ववाद की यह कोशिश दो क़दमों से मज़बूत हुई. पहला, सभी ग़ैर-सरकारी संगठनों यानी एनजीओ को नौकरशाही की सख़्त निगरानी के दायरे में ले आया गया.
दूसरा क़दम यह था कि अगर कोई शासन से असहमत है तो वह देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के लिहाज से एक अवांछित तत्व है. वरवर राव, सुधा भारद्वाज और स्टेन स्वामी जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को अर्बन नक्सल के जिन आरोपों के तहत गिरफ़्तार किया गया है और जिस तरह से इन मामलों की सुनवाई चल रही है, उस पर भी सवाल उठे हैं. हुकूमत की यह जकड़बंदी बहुसंख्यकवाद के तौर पर सामने आई. यह बहुसंख्यक वर्चस्ववाद और उसके शीर्ष नेता के मज़बूत होने का संकेत था. इसने यह भी संकेत दिया कि सरकार पर किसी तरह की प्रतिकूल टिप्पणी कर सकने वाले संस्थान मोटे तौर पर या तो सत्ता के सामने झुक जाएंगे या फिर महत्वहीन बना दिए जाएंगे. ऐसा माहौल तैयार हुआ कि देश की सुरक्षा को भारी ख़तरा है और देश को बचाना सबसे पहली प्राथमिकता है. कोरोना वायरस संक्रमण ने इस तरह की हुकूमत को और हवा दी. दरअसल, सिविल सोसाइटी के दोबारा उठ खड़े होने को पिछले कुछ समय में उभरे नीतिगत मुद्दों से जुड़ी घटनाओं की कड़ी के ज़रिये आंका जा सकता है. इनमें से हरेक घटना ने सिविल सोसाइटी के भविष्य और भाग्य पर अहम सवाल उठाए.
पहली घटना थी असम में नेशनल रजिस्टर पॉलिसी लागू करने की कोशिश. भारतीय समाज की बाड़ाबंदी की गई और नागरिकता हासिल करना एक ऐसा संदिग्ध काम बन गया जो फ़र्ज़ी सर्टिफिकेट के सहारे पूरा हो सकता था. यह काम होना या न होना किसी क्लर्क की सनक पर टिका था. एनआरसी के ख़िलाफ़ जो विरोध उठ खड़ा हुआ वो निश्चित तौर पर बीजेपी के बहुसंख्यकवाद के विस्तार का विरोध था. हालांकि सिविल सोसाइटी ने वह रास्ता खोज लिया था, जिसके सहारे वह असहमति ज़ाहिर करने में सक्षम होने लगा था.

शाहीन बाग़ और सिविल सोसाइटी का उभार
दिल्ली के जामिया मिलिया इलाक़े में मुस्लिम गृहिणियों के एक छोटा-सा विरोध प्रदर्शन एक बड़ी घटना बन गया. इस प्रदर्शन में युगांतकारी घटनाओं के तत्व थे. सत्ता की ताक़त के ख़िलाफ़ किए गए नानियों-दादियों के इस प्रदर्शन ने दुनिया भर का ध्यान खींचा. इस विरोध में एक सौम्यता थी और सादगी भी. उन गृहिणियों ने दिखाया कि वे संविधान की भावना को समझती हैं. उनमें एक समुदाय के तौर पर नागरिकता की समझ साफ़ दिख रही थी. उन महिलाओं ने जो संदेश दिया और गांधी से लेकर भगत सिंह और आंबेडकर तक जिन विभूतियों की तस्वीरें उन्होंने उठा रखी थी, उसने देश के सामने लोकतंत्र का एक उत्सव ला दिया.
इससे भी ज़्यादा इसने यह दिखाया कि कैसे नागरिक समाज बगैर किसी राजनीतिक पार्टी और ट्रेड यूनियन के उभर आया है. एक कम्युनिटी नेटवर्क, एक राजनीतिक कल्पना- सिविल सोसाइटी की कल्पना को खिलने के लिए इसी बीज की तो ज़रूरत थी. शाहीन बाग़ अपने मूल में एक सत्याग्रही आंदोलन था. एक राजनैतिक इनोवेशन था. दरअसल, लोकतंत्र पर न तो राजनीतिक कार्यकर्ताओं का पेटेंट है और न कॉपीराइट. सड़कें ही डेमोक्रेसी का असल रंगमंच हैं और मानव शरीर ही विरोध का औजार.
वास्तव में उन महिलाओं ने ही अपने जवाब में यह ज़ाहिर कर दिया कि सिविल सोसाइटी को संविधान के आदर्शों पर सत्ता से अधिक भरोसा है. इसने यह भी बताया कि लोकतंत्र कोई चुनावी परिघटना नहीं है. अगर इसे जीवंत बनाए रखना है तो प्रयोगों और सिविल सोसाइटी के रस्मों-रिवाज को बरकरार रखना होगा. सिविल सोसाइटी एक थियेटर की तरह लोकतंत्र की कल्पना को ज़िंदा रखती है. हालांकि यहां कुछ एहतियात की ज़रूरत है. कोविड की वजह से एक विरोध स्थल के तौर पर शाहीन बाग़ का डेरा अब उठाया जा चुका है. यह पहले से ही एक तरह का मिथक बन चुका था.

कंपनियों के लिए निगरानी बड़ी सम्मोहक चीज़ होती है. सीएए ने जो डिज़िटल स्ट्रैटिजी पेश की थी वह कोविड संकट से और मज़बूत ही हुई है. सुरक्षा को सर्वोच्च रणनीति के तौर पर इस तरह पेश किया गया ताकि निगरानी लोगों को प्यार की तरह लगे. सिविल सोसाइटी को ऐसी निगरानियों के प्रति सचेत रहना होगा. जीवन में लगातार बढ़ रही निगरानी टेक्नोलॉजी का प्रतिकार करने का ढंग खोजना होगा. असहमत पेशेवरों की भूमिका अब काफ़ी अहम हो गई है. भारत के पास विरोध करने वालों का शाहीन बाग़ है लेकिन इसे असहमति की आवाज़ वाले पेशेवरों की भी ज़रूरत है. हमें एडवर्ड स्नोडन और जूलियन असांज जैसे लोगों की ज़रूरत है. वरना डिज़िटल महत्वाकांक्षाओं से भरे मध्यवर्ग को शायद यह अहसास ही न हो कि हमारे इर्द-गिर्द एक पूरा निगरानी तंत्र खड़ा हो गया है.
अगर सीएए से यह ज़ाहिर हुआ कि नागरिकता की परिभाषा का विचार संदिग्ध था तो कोविड और किसानों के विरोध प्रदर्शनों से यह साफ़ हुआ कि सुरक्षा और विकास के नाम पर उठाए गए क़दमों ने लोगों की आजीविका को ख़तरे में डाल दिया है. किसानों के संघर्ष पर शुरुआती प्रतिक्रियाएं घिसीपिटी थीं. इन प्रदर्शनों को राष्ट्र विरोधी और नक्सलियों का आंदोलन कहा गया. एक बार फिर सिविल सोसाइटी ने किसानों के संघर्ष पर ध्यान दिया और इसे अपने फोकस में रखा. लोगों ने महसूस किया कि मीडिया, ख़ास कर टीवी मीडिया किसानों के आंदोलन को नज़रअंदाज़ करने और उसकी छवि ख़राब करने मे लगा है. कई टीवी चैनलों ने इसे मोदी के ख़िलाफ़ बग़ावत के तौर पर देखा है. इस सचाई को समझने की कोशिश नहीं की जा रही थी कि सरकार के सामने लोग अपनी रोज़ी रोटी के सवाल उठा रहे हैं.
असहमत नागरिक समाज ने इन ख़तरों से टकराना शुरू कर दिया है. हैदराबाद के नज़दीक चिराला बुनकरों का आंदोलन विकेंद्रित नेटवर्कों की मांग कर रहा है. लेकिन सिविल सोसाइटी को सिर्फ़ अधिकारों के प्रति ही नहीं, समाज के प्रति भी संवेदनशील होना होगा. किसानों का आंदोलन सिर्फ़ बड़े किसानों की आवाज़ बन कर सीमित नहीं रह सकता. इसे सीमांत किसानों और भूमिहीन मज़दूरों की आवाज़ भी बनना होगा. सिविल सोसाइटी को इनके बीच बोलना होता है और अलग-अलग आवाज़ों को सुन कर निर्णय भी करना होता है. इसे यह भी दिखाना है कि सत्ता के बड़े फ़ैसलों पर कैसे बहस चलानी है. इस अर्थ में सिविल सोसाइटी को नई नॉलेज सोसाइटी बनना होगा और इसे भारतीय विविधता का ट्रस्टी भी होना होगा.

इन रुझानों को देखते हुए अब यह साफ़ हो गया है कि लोकतंत्र अब सिर्फ़ चुनावी परिघटना नहीं रह गया है और न ही अब यह पार्टियों तक सीमित है.
विपक्षी पार्टियां अब गूंगी या असरहीन दिखने लगी हैं, ऐसे में सिविल सोसाइटी को लोकतंत्र में नए प्रयोग करने होंगे. इसे अपना यह प्रयोग जड़ नहीं बल्कि अपने चेतन बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर करना चाहिए.
सिविल सोसाइटी की गतिशीलता के विपरीत ज़्यादातर विपक्षी पार्टियां अब लड़खड़ाती दिखती हैं. कांग्रेस लगातार घिसती हुई दिख रही है और वामपंथी एक क्लब या किसी एलीट सोसाइटी की तरह लगते हैं. सिविल सोसाइटी को पार्टियों की स्थानीयता के अलावा देशीय और वैश्विक मुद्दों के इर्द-गिर्द नए सिरे से एकजुट होना होगा.
सुरक्षा के ढाल से लैस सत्ता, उसके निगरानी तंत्र और कॉर्पोरेट बाज़ारवाद से लड़ना अब आसान काम नहीं रह गया है.
(लेखक जाने माने समाजशास्त्री हैं और इन दिनों ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी, सोनीपत के सेंटर फॉर नॉलेज सिस्टम के डायरेक्टर हैं. आलेख में उनके निजी विचार हैं) ) (bbc.com/hindi)
Lalit Maurya-
हाल ही में काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीइइडब्लू) द्वारा किए शोध से पता चला है कि देश में 75 फीसदी से ज्यादा जिलों पर जलवायु परिवर्तन का खतरा मंडरा रहा है। इन जिलों में देश के करीब 63.8 करोड़ लोग बसते हैं। यह अध्ययन पिछले 50 सालों (1970-2019) के दौरान भारत में आई बाढ़, सूखा, तूफान जैसी मौसम सम्बन्धी आपदाओं के विश्लेषण पर आधारित है। इसमें आपदाओं के आने के पैटर्न के साथ-साथ कितनी बार यह आपदाएं आई है और उनके प्रभावों का भी अध्ययन किया गया है। साथ ही इन घटनाओं में किस तरह बदलाव आ रहा है उसको भी समझने का प्रयास किया गया है। विश्लेषण से पता चला है कि इन जिलों पर बाढ़, सूखा, चक्रवात, ग्रीष्म एवं शीत लहर जैसी चरम मौसमी घटनाओं का खतरा अन्य जिलों की तुलना में कहीं ज्यादा है।
रिपोर्ट के अनुसार 1970 से 2005 के बीच जहां 250 चरम मौसमी घटनाएं रिकॉर्ड की गई थी, वहीं 2005 से 19 के बीच उनमें बड़ी तेजी से वृद्धि हुई है। इस अवधि में 310 चरम मौसमी घटनाएं रिकॉर्ड की गई हैं। 2005 के बाद से 55 से भी ज्यादा जिलों में बाढ़ की विभीषिका देखी गई है, जिसका असर आज हर साल करीब 9.75 करोड़ लोगों के जीवन पर पड़ रहा है। यदि 2010 से 19 के दौरान भारत के आठ सर्वाधिक बाढ़ ग्रस्त जिलों को देखें तो उनमें से 6 (बारपेटा, दर्रांग, धेमजी, गोलपारा, गोलाघाट और शिवसागर) असम में हैं। जहां 2005 में 69 जिलों में बाढ़ का कहर देखा गया था वो 2019 में बढ़कर 151 जिलों में फ़ैल चुका है। इसके साथ ही भूस्खलन, भारी बारिश, ओला वृष्टि और बादल फटने जैसी घटनाओं में भी 1970 के बाद से करीब 12 गुनी वृद्धि हुई है।
सूखे की जद में है देश का 68 फीसदी हिस्सा
इसी तरह पिछले 15 सालों में चरम सूखे की स्थिति में भी वृद्धि हुई है। इससे अब तक करीब 79 जिले प्रभावित हो चुके हैं। इसके चलते हर साल करीब 14 करोड़ लोग प्रभावित हो रहे हैं। इस अवधि में सूखा प्रभावित जिलों का वार्षिक औसत 13 गुना बढ़ गया है। एनडीएमए के अनुसार देश का करीब 12 फीसदी हिस्सा बाढ़ और 68 फीसदी हिस्सा सूखे की जद में है। इसी तरह देश की करीब 80 फीसदी तटरेखा पर चक्रवात और सुनामी का खतरा है।
इसी तरह 2005 के बाद से हर साल 24 जिलों पर चक्रवातों की मार पड़ रही है। इन वर्षों में करीब 4.25 करोड़ लोग तूफान और चक्रवातों से प्रभावित हुए हैं। यदि पिछले एक दशक को देखें तो इनका असर अब तक करीब 258 जिलों पर पड़ चुका है। देश में पूरी तटरेखा के आसपास पुरी, चेन्नई, नेल्लोर, उत्तर 24 परगना, गंजम, कटक, पूर्वी गोदावरी और श्रीकाकुलम पर इन चक्रवातों का सबसे ज्यादा असर पड़ा है। जिसके लिए जलवायु परिवर्तन, भूमि उपयोग में आ रहा बदलाव और वनों का विनाश मुख्य रूप से जिम्मेवार है। यदि 1970 से 2019 के बीच चक्रवात की घटनाओं पर गौर करें तो इन वर्षों में यह घटनाएं 12 गुना बढ़ गई हैं।
इस रिपोर्ट में एक हैरान कर देने वाली बात यह सामने आई है कि पहली जिन जिलों में बाढ़ आती थी अब वहां सूखा पड़ रहा है। इसी तरह जो जिले पहले सूखा ग्रस्त थे अब वो बाढ़ की समस्या से त्रस्त हैं। आपदाओं की प्रवृति में हो रहा यह बदलाव 40 फीसदी जिलों में अनुभव किया गया है। यदि इसकी प्रवृति की बात करें तो जो जिले बाढ़ से सूखाग्रस्त बन रहे हैं उनकी संख्या सूखे से बाढ़ग्रस्त बनने वाले जिलों से कहीं ज्यादा है जो दिखाता है कि देश में सूखे का कहर बढ़ रहा है। रिपोर्ट में इसके लिए देश में क्षेत्रीय स्तर पर हो रहे जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ भूमि उपयोग में किए जा रहे बदलावों, वनों के विनाश, मैन्ग्रोव और वेटलैंड पर हो रहे अतिक्रमण को जिम्मेवार माना है। (downtoearth)
Lalit Maurya-
जलवायु परिवर्तन एक ऐसी सच्चाई है जिसे चाह कर भी झुठलाया नहीं जा सकता। यह किसी न किसी रूप में दुनिया के हर हिस्से को प्रभावित कर रही है। कहीं बाढ़, तो कहीं सूखा, कहीं तूफान और कहीं नष्ट होती फसलें। यह एक ऐसी त्रासदी है जिसकी कीमत हर किसी को किसी न किसी रूप में भरनी पड़ रही है। यदि हम पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल कर लेते तो काफी हद तक इन आपदाओं को टाला जा सकता था। लेकिन इस बात की उम्मीद बहुत कम है कि दुनिया पैरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल कर पायेगी। ऐसे में हमें इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ सकती है, इसका आंकलन वैज्ञानिकों ने किया है।
इससे जुड़ा एक अध्ययन हाल ही में जर्नल नेचर कम्युनिकेशन में छपा है। जिसके अनुसार यदि हम पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाए तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को करीब 6,00,000 अरब डॉलर (4,59,30,300 अरब रुपए) का नुकसान उठाना पड़ेगा। जोकि विश्व के वर्त्तमान जीडीपी से करीब 7।5 गुना ज्यादा है। यह शोध जलवायु विशेषज्ञों की अंतरराष्ट्रीय टीम द्वारा किया गया है। जिसमें उन्होंने अनेकों परिदृश्यों के आधार पर आर्थिक हानि का अनुमान लगाया है। जिसके सदी के अंत तक 150 से 790 ट्रिलियन डॉलर के बीच रहने की आशंका है।
आईपीसीसी ने सम्भावना व्यक्त की है कि 2030 से 2050 के बीच वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाएगी। ऐसे में उसके विनाशकारी परिणाम सामने आएंगे। जबकि शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इस सदी के अंत तक तापमान में 3 से 4 डिग्री की वृद्धि हो जाएगी।
हर साल उत्सर्जन में जरुरी है 7 फीसदी की कटौती
गौरतलब है कि 2015 पेरिस समझौते का लक्ष्य वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि को 2 डिग्री से नीचे रखना है। इस समझौते के तहत दुनिया भर के देशों ने अपने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी करने की बात स्वीकार की थी। संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि अब से लेकर 2030 तक यदि हम हर साल वैश्विक उत्सर्जन में 7 फीसदी की कटौती करेंगे। तब जाकर कहीं 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को हासिल कर पाएंगे।
क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2020 के अनुसार पर्यावरण में आ रहे बदलाव का बुरा असर भारत पर भी पड़ रहा है। इस इंडेक्स के अनुसार भारत पांचवे स्थान पर था। जबकि यदि जान माल के नुकसान की बात करें तो भारत दूसरे स्थान पर रहा था। जो स्पष्ट तौर पर देश में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे की ओर इशारा है|
शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि दुनिया उत्सर्जन को रोकने के लिए अभी से ठोस कदम उठाएगी तो आने वाले वक्त में वो इस भारी आर्थिक हानि से बच जाएगी। बीजिंग इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में प्रोफेसर और इस अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता बायिंग यू ने बताया कि “यदि उत्सर्जन रोकने पर अभी से निवेश नहीं किया गया तो इस रोकना मुश्किल हो जायेगा। जिससे हमें जलवायु परिवर्तन के और भयंकर परिणाम झेलने होंगे। जिसके चलते जन-धन की अपार क्षति होगी।“
शोधकर्ताओं के अनुसार दुनिया भर में कार्बन उत्सर्जन को ख़त्म करने के लिए करीब 18,00,000 से 1,13,00,000 करोड़ डॉलर (13,77,01,800 से 86,44,61,300 करोड़ रूपए) की जरुरत पड़ेगी। जिसमें से 90 फीसदी धनराशि जी-20 देशों द्वारा खर्च की जानी चाहिए। उनका मानना है कि विशेष रूप से रिन्यूएबल एनर्जी, इलेक्ट्रिक वाहनों और अन्य पर्यावरण अनुकूल तकनीकों के लिए भारी भरकम धनराशि खर्च करनी होगी।
हमें समझना होगा कि पूर्व औद्योगिक काल की तुलना में अब धरती का तापमान करीब 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। जिसके कारण बाढ़, सूखा, तूफान, हीटवेव जैसी आपदाओं की संख्या और तीव्रता में वृद्धि हो गयी है। ऐसे में जब सदी के अंत तक तापमान 3 से 4 डिग्री सेल्सियस अधिक होगा तो सोंचिये उसके कितने विनाशकारी परिणाम होंगे। सिर्फ प्राकृतिक आपदाएं ही नहीं, महामारी, फसलों को नष्ट होना, कीटों का हमला जैसी न जाने कितनी समस्याएं क्लाइमेट चेंज की वजह से सामने आ रही हैं। यदि हमने समय रहते जरुरी कदम न उठाये तो न जाने कितनी नयी समस्याएं और आएंगी जिनका हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते। अब हम इसे और नजरअंदाज नहीं कर सकते। यदि हम आज नहीं संभले तो इसकी कीमत न केवल हमें बल्कि हमारे आने वाली पीढ़ियों को भी चुकानी होगी। यह हमारी धरती है, हमारा अपना घर, इसे बचाने के लिए हमें खुद ही आगे आना होगा। (downtoearth)
Anil Ashwani Sharma-
अमेरिका ने चार साल पहले पेरिस जलवायु समझौते को छोड़ दिया था लेकिन इसके बाद से उसके मित्र राष्ट्र और प्रतिद्वंद्वी इस मामले में अब काफी आगे बढ़ चुके हैं। अमेरिकी चुनाव ने एक बार फिर से पेरिस समझौते से बाहर हुए अमेरिका की चर्चा को एक गति प्रदान की है औ इस समय पूरी दुनिया में इसकी चर्चा हो रही है। इस बात के कायास लगाए जा रहे हैं कि क्या बाइडन के जीतते ही अमेरिका इस समझौते में अपनी वापसी करेगा या कुछ नहीं करेगा। हालांकि बाइडन की चुनावी रैलियों में दिए गए बयानों और भाषणों पर गौर करें तो इस बात के पुख्ता संकेत मिलते हैं कि अमेरिका इस समझौते से पुन: जुड़ेगा। हां यहां एक सबसे बड़ा सवाल ये है कि बाइडन के जीतने के बाद भी अमेरिकी कांग्रेस में बाइडन की पार्टी के कमजोर होने से उनका इस समझौते में वापसी आसान नहीं होगी।
अमेरिका ने चार साल पहले अपने को परिस समझौते से अलग कर लिया था। उसके बाद से जलवायु आपदाओं की लागत में वृद्धि हुई है। बैंकों और निवेशकों ने जीवाश्म ईंधन से अपने को दूर कर लिया है क्योंकि अक्षय ऊर्जा की कीमत में तेजी से गिरावट आई है। यही नहीं अमेरिका के सहयोगी अपने जलवायु कार्रवाई के लक्ष्यों को पूरा करने से दूर हो गए। ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, जापान और दक्षिण कोरिया सभी ने कहा है कि वे 2050 तक अपने उत्सर्जन को बेअसर करने का लक्ष्य रखेंगे। हालांकि इसके उलट दुनिया के बाकी देशों ने इस बात की पुष्टि की है कि यह जलवायु परिवर्तन पर कार्रवाई को नहीं रोकेंगे।
बाइडन के जीतने पर इस समय दुनिया के कई देशों ने यह उम्मीद जताई है कि अमेरिका हर हाल में पेरिस समझौते में वापसी करेगा। इस संबंध में संयुक्त राष्ट्र में बेलीज की राजदूत लोइस एम यंग ने कहा कि दुनिया के बाकी लोगों ने पुष्टि की है कि यह जलवायु परिवर्तन पर कार्रवाई को नहीं रोकेगा। यंग ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि अमेरिका उनके जैसे सबसे खराब जलवायु जोखिम वाले देशों की स्थिति को देखते हुए पेरिस समझौते को फिर से स्वीकार करेगा। क्योंकि उस देश ने जलवायु परिवर्तन में सबसे अधिक योगदान दिया है जो अब औपचारिक रूप से पेरिस समझौते से बाहर है और कम से कम अगले चार वर्षों तक ऐसा रह सकता है। वह कहती हैं कि वास्तव में यह एक भयावह विचार है।
सवाल किया जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन पर अमेरिका की भूमिका क्या होगी? इसका भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि यदि राष्ट्रपति ट्रप जीत जाते हैं तो अमेरिका निश्चित रूप से कम से कम अगले चार वर्षों के लिए समझौते से बाहर रहेगा। वहीं दूसरी ओर यदि अगर पूर्व उप राष्ट्रपति जोसेफ आर बाइडन जूनियर जीत जाते हैं तो वे फरवरी 2021 की शुरुआत में अमेरिका को वापसी संभव होगी। जैसा कि बाइडन ने एक ट्विटर संदेश में कहा, है कि ठीक 77 दिनों में हम इस समझौते में वापसी करेंगे। यह सही है कि पेरिस समझौते से जुड़ना अमेरिका के लिए आसान होगा। अमेरिका यह जानता है कि उत्सर्जन को कम करने और अपने अंतर्राष्ट्रीय सहयोगियों के साथ अपनी विश्वसनीयता को पुन:बहाल करने लिए इसमें वापसी जरूरी है। स्पेन के पर्यावरण मंत्री टेरेसा रिबेरा ने कहा कि चुनाव परिणाम यह प्रदर्शित करेंगे कि अमेरिका जलवायु परिवर्तन पर एक टकराव की शक्ति पैदा करेगा या रचनात्मक शक्ति बनेगा। रिबेरा ने कहा कि कई देश पेरिस समझौते में अमेरिका को फिर से शामिल करने के लिए उत्सुक हैं। लेकिन वे वाशिंगटन के वादों के बारे में भी सावधान हैं। यह ध्यान देने वाली बात है कि साख अर्जित करना बहुत मुश्किल है और हारना बहुत आसान। अमेरिका को पुन: विश्व की विश्वसनीयता को कायम करने में कुछ समय लग सकता है।
पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के नेतृत्व में जलवायु परिवर्तन दूत के रूप में कार्य कर चुके टॉड स्टर्न ने कहा कि चार साल बाद एक अमेरिकी राष्ट्रपति ने पेरिस समझौते की निंदा की और जलवायु विज्ञान का मजाक उड़ाया, उन्होंने कह कि मुझे लगता है कि अमेरिका के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात घरेलू पक्ष पर बहुत मजबूती और निर्णायक रूप से सामने आना है। स्टर्न ने कहा कि हमें यह दिखाना होगा कि वास्तव में एक बहुत ही उच्च प्राथमिकता वाला विषय है और नए राष्ट्रपति पूरी गति से से इसे आगे बढ़ाएंगे। स्टर्न ने कहा कि वापसी के समय अमेरिका को आक्रामक जलवायु कार्रवाई की आवश्यकता होगी। ऐसा करने की अमेरिकी क्षमता न केवल इस बात पर निर्भर करती है कि अगला राष्ट्रपति कौन है, बल्कि सीनेट की संरचना पर भी निर्भर करता है, जहां संतुलन की स्थिति अभी नहीं है।
बाइडन ने कहा है कि वह कोयला, तेल और गैस से दूर जाने के लिए चार वर्षों में 2 ट्रिलियन डॉलर खर्च करेंगे और 2035 तक बिजली उत्पादन से जीवाश्म ईंधन उत्सर्जन को खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है। बाइडन ने कसम खाई है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था कार्बन तटस्थ होगी। बाइडन ने पेरिस समझौते के बारे में कोई विशेष वादे नहीं किए हैं। उन्होंने कहा है कि वह हर प्रमुख देश को अपने घरेलू जलवायु लक्ष्य की महत्वाकांक्षा को पूरा करने का प्रयास करेंगे।
भारत अपने हिस्से के लिए कोयले के उपयोग को कम करने की संभावना नहीं है, हालांकि बाइडन प्रशासन अक्षय ऊर्जा के अपने विस्तार में तेजी लाने के लिए भारत पर दबाव बना सकता है। एक दशक तक अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ता में भाग लेने वाले बांग्लादेश में संसद के सदस्य कृपाण चौधरी ने कहा कि उन्होंने अमेरिका की जलवायु कार्रवाई के लिए नए सिरे से प्रतिबद्धता व्यक्त की है, जो गरीब देशों के लिए अधिक वित्तपोषण है। ओबामा ने गरीब देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करने के लिए डिजाइन किए गए ग्रीन क्लाइमेट फंड में 3 डॉलर बिलियन का वादा किया था। राष्ट्रपति ट्रप द्वारा भुगतान रोकने से पहले वादा किए गए धन का 1 बिलियन डॉलर दिया गया था। (downtoearth)
Sunita Narain-
पांच साल पहले जब भौतिक रूप से मुलाकात संभव थी, तब सर्दी से ठिठुरते पेरिस में जलवायु परिवर्तन के समझौते पर हस्ताक्षर के लिए दुनिया भर के लोग जुटे थे। आज, जब दुनिया एक उग्र वायरस महामारी के कारण बंद है, तो इस बात का जायजा लेने का समय है कि उस समय किन बातों पर सहमति बनी थी और अब क्या किया जाना चाहिए।
पिछले पांच वर्षों में एक बात तो स्पष्ट है कि दुनिया के हर हिस्से में प्रलयंकारी मौसम की घटनाएं बढ़ी हैं। इसलिए, भले ही कोविड-19 से हम उभर जाएं, लेकिन भविष्य की अनिश्चितता हमारे दिमाग पर हावी रहनी चाहिए। चाहे, वो युवा हो या बूढ़ा, या अमीर-गरीब। जलवायु परिवर्तन एक हकीकत है और हमें अब इसका विनाशकारी प्रभाव दिखने लगा है। वैश्विक तापमान में वृद्धि इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। 1880 में जब से मौसम का रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था हुई, तब से अब तक औसत वैश्विक तापमान में 1.2 डिग्री सेल्सियस वृद्धि हो चुकी है। और अब पेरिस समझौता हो या ना हो, अनुमान है कि सदी के अंत तक औसत तापमान में 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है।
आइए, समीक्षा करें कि हम कहां हैं? पेरिस 2015 समझौते ने बुनियादी तौर पर जलवायु कार्रवाई पर समझौते की शर्तों को बदल दिया। इससे पहले दुनिया ने वातावरण में उत्सर्जन के स्टॉक के लिए देशों की जिम्मेदारी के आधार पर ग्रीनहाउस गैसों (जीएचजी) की कटौती के लक्ष्य निर्धारित किए थे। इस समझौते में कार्रवाई के लिए एक रूपरेखा तैयार की गई और सहकारी समझौते की नींव रखी गई। लेकिन अमेरिका जैसे देश, जो उत्सर्जन में सबसे अधिक योगदान देते रहे हैं, वे इस समझौते को नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने इसे (समझौते को) कमतर करने की कोशिश की। वे अतीत की पुरानी बातों को नकारते हुए वही करना चाहते थे, जो वे कर सकते थे। पेरिस समझौते ने इस विचार के आगे घुटने टेक दिए।
इस तरह सभी देशों ने अपने लक्ष्य तय किये और प्रतिस्पर्धा में कूद गये, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) कहा जाता है। इसके बाद पेरिस समझौते के लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश हुई, लेकिन अगर इन एनडीसी के कुल योग को भी मान लिया जाए, तब भी इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होना लगभग तय है।
हालांकि उम्मीदें अधिक थीं। एक बार के लिए इस समझौते से अमेरिका को हटा भी दिया जाए, तब भी पेरिस समझौते में कहा गया कि इस समझौते से 1880 के पूर्व-औद्योगिक युग से दुनिया का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस तक नीचे चला जाएगा, बल्कि तापमान के 2 डिग्री सेल्सियस तक नीचे पहुंचने का अनुमान लगाया गया था।
ऐसा करने के लिए तीन चीजें सामने रखी गई थीं। पहला था-एनडीसी का कड़ाई से पालन। ऐसा इसलिए किया गया कि देश कठोर कार्रवाई की जरूरत समझेंगे क्योंकि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव उन पर पड़ता है। दूसरा था साल 2023 में कार्बन के वैश्विक स्टाॅक की जांच और इसमें कमी लाने के लक्ष्य तक पहुंचने में उठाये गये कदमों के प्रभाव की जांच के वास्ते हर पांच साल के अंतराल पर इसका दोहराव। और तीसरा था बाजार आधारित उपकरणों को विकसित करना, ताकि भविष्य में कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए विभिन्न देश इनकी खरीद कर सकें।
अब, पांच साल बाद जलवायु परिवर्तन के नीति निर्धारक अंग (काॅन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज) के बीच भौतिक मुलाकात नहीं होगी और ये अच्छी खबर नहीं है। इस मुद्दे को हमें भटकने नहीं देना चाहिए। कोविड-19 के चलते पिछले वर्ष वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन में कुछ हद तक गिरावट आई है, लेकिन ये तात्कालिक है। यूएनईपी की एमिशन गैप रिपोर्ट 2020 में बताया गया है कि पिछले तीन वर्षों में वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस ऊत्सर्जन में बढ़ोतरी हुई है। साल 2019 में इसमें रिकार्ड स्तर पर इजाफा हुआ था। ये भी जगजाहिर है कि अमेरिका जैसे देश पेरिस समझौते के तहत तय किये अपने स्वैच्छिक लक्ष्य के एक बहुत छोटे हिस्से तक भी नहीं पहुंच पायेंगे। अमेरिका में साल 2019 में 2016 के मुकाबले ज्यादा कार्बन उत्सर्जन हुआ था और ऐसा तब हुआ जब इसने पिछले दशक में अमेरिका ने ऊर्जा संबंधित उत्सर्जन 30 प्रतिशत कम किया था।
ये भी साफ हो गया है कि मौजूदा कार्बन उत्सर्जन के स्तर को देखते हुए 1.5 डिग्री के लक्ष्य को पूरा करने में साल 2030 तक दुनियाभर का कार्बन बजट खत्म हो जायेगा। ये तब होगा जब भारत समेत दुनिया के बड़े हिस्सों को सबसे सस्ता ईंधन कोल और प्राकृतिक गैस के इस्तेमाल के अधिकार की जरूरत होगी। इसका मतलब है कि इससे कार्बन उत्सर्जन और बढ़ेगा। ये स्पष्ट है कि अक्षय ऊर्जा आधारित ऊर्जा की नई व्यवस्था में प्रवेश करने में अभी वक्त है।
यद्यपि यूरोपीय यूनियन जैसे कम कार्बन उत्सर्जन करने वाले अधिकांश क्षेत्रों में ऊर्जा व्यवस्था में कोयले की बड़ी हिस्सेदारी है। ठीक वैसे ही जैसे नई अक्षय ऊर्जा तकनीक में हवा या सौर की हिस्सेदारी है। इसलिए ये बहुत जरूरी है कि उभरती दुनिया में हम इस बदलाव की तरफ आगे बढ़ें, लेकिन स्थिति बहुत अनुकूल नहीं है कि ये हो जाये। बात करना आसान है, लेकिन तब्दीली आसान नहीं।
लेकिन, लक्ष्य को स्थानांतरित किया जा रहा है। नया चर्चित शब्द है ‘नेट-जीरो’। विश्व के कई देशों ने साल 2050 के लिए नेट-जीरो लक्ष्य की घोषणा कर दी है। चीन ने कहा है कि वह 2060 तक नेट-जीरो का लक्ष्य हासिल कर लेगा। अब दबाव भारत समेत अन्य देशों की सरकारों पर है कि वे नेट-जीरो का लक्ष्य तय करें।
समस्या नेट-जीरो करने की महात्वाकांक्षा या इरादे को लेकर नहीं है। समस्या ये है कि ज्यादातर मामलों में इन बड़ी घोषणाओं का कोई भौतिक आधार नहीं है। तय लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कोई योजना नहीं है या ऐसा रास्ता नहीं है जिससे ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन कम हो जाए। बहुत कम देश इस दशक के लिए 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में कटौती का कठिन लक्ष्य लेकर आए हैं। ज्यादातर मामलों में उत्सर्जन में तत्काल बड़ी गिरावट कैसे आएगी, इसको लेकर कुछ स्पष्ट नहीं है, लेकिन एक लक्ष्य तय कर दिया गया है।
इसलिए हमें जलवायु परिवर्तन के नैरेटिव में वास्तविकता की ज्यादा जांच की जरूरत है। प्रभाव पड़ना निश्चित है, लेकिन अभी तक कार्रवाई को लेकर संकल्प की कमी है। हम बेहतर परिणाम के अधिकारी हैं। अतः पेरिस समझौते की पांचवीं वर्षगांठ पर, आइए, हम तय करते हैं कि केवल अच्छी-अच्छी बातें नहीं होने दें, बल्कि कार्रवाई की मांग करें। कठोर, असरदार व असली कार्रवाई होनी चाहिए और अभी होनी चाहिए। (downtoearth)
-नवयुग गिल
भारत में हज़ारों किसान 26 नवम्बर को पैदल और ट्रैक्टर-ट्राली पर पंजाब और हरियाणा से नई दिल्ली की ओर रवाना हो गए और सारी रुकावटों से गुज़रते हुए नई दिल्ली पहुंच गए और राजधानी का घेराव कर लिया। अब इस प्रदर्शन में बहुत सारे सेक्टर शामिल हो गए हैं। 31 से अधिक ट्रेड यूनियनों ने प्रदर्शनों का समर्थन किया है।
यह प्रदर्शन महीनों पहले शुरू हुए मगर सरकार की ओर से लगातार नज़रअंदाज़ किए जाने के बाद अधिक व्यापक होते गए और फिर किसान राष्ट्रीय राजधानी की सीमा पर जा धमके। इसके बाद सरकार हरकत में आई तो मीडिया भी पूरी तरह सक्रिय हो गया। सरकार ने किसानों से कई दौर की बेनतीजा वार्ता की तो भारत में गोदी मीडिया कहे जाने वाले चैनलों ने प्रदर्शनों को दाग़दार बनाने की कोशिश की।
भाजपा समर्थकों का तर्क यह है कि तीनों किसान क़ानून बहुमत से चुनी हुई सरकार ने बनाए हैं और इसके लिए सारी औपचारिकताएं पूरी की गई हैं इसलिए विरोध का कोई तुक नहीं बनता। भाजपा को चूंकि लोक सभा चुनावों में 543 में से 303 सीटें मिली थीं इसलिए उसकी सोच है कि उसके द्वारा बनाए जा रहे क़ानून सबको मानने चाहिए। भाजपा की इसी सोच के नतीजे में नोटबंदी की गई, जम्मू व कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किया गया, इसी तरह विवादित नागरिकता क़ानून सीएए पास किया गया। स्पष्ट बहुमत की मज़बूत सरकारों के यहां एक समस्या यह हमेशा रहती है।
पंजाब और हरियाणा में संसद की 13 और 10 सीटें हैं इसलिए चुनावी गणित के हिसाब से शायद इन राज्यों का इतना ज़्यादा महत्व नहीं है। दोनों राज्यों की आबादी कुल मिलाकर पांच करोड़ तीस लाख से कुछ ज़्यादा है। भारत की आबादी के हिसाब से तो यह ज़्यादा नहीं है लेकिन दूसरी ओर अगर स्पेन, कोलम्बिया या दक्षिणी कोरिया से तुलना की जाए तो यह आबादी उनसे ज़्यादा है।
फ़ूड सेक्युरिटी के लेहाज़ से इन दोनों राज्यों का महत्व बहुत है। पिछले पांच दशकों तक लगातार अकेले पंजाब ने देश की ज़रूरत का दो तिहाई गेहूं और चावल पैदा किया और भारत चावल और गेहूं की पैदावार में आत्म निर्भर हो गया। तो क्या अन्य राज्यों द्वारा जिनकी आबादी ज़्यादा है चुने गए सांसद इस राज्य की भी क़िस्मत का फ़ैसला करेंगे? क्या लोकतंत्र का मतलब गिनती की तुलना भर है?
भाजपा और उसके समर्थक जो चीज़ समझ नहीं पा रहे हैं वह यह है कि उनकी उपेक्षा का बहुत बुरा असर पड़ेगा। इस समय स्थिति यह है कि भारतीय किसानों का प्रदर्शन अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनता जा रहा है। दुनिया के कई देशों में भारतीय किसानों के समर्थन में प्रदर्शन हुए हैं। अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा, आस्ट्रेलिया और यूएन में किसानों के लिए प्रदर्शन हुए हैं।
बहुमत मिल जाने का यह मतलब नहीं है कि सरकार को बहुलतावादी समाज पर अपनी मर्ज़ी थोपने का सर्टीफ़िकेट मिल गया है। यह दुनिया के उन नेताओं के लिए भी सबक़ है जो मेजारिटैरियन वर्चस्व की नीति पर चलते हैं।
(लेखक अमरीका की विलियम पैटरसन युनिवर्सिटी में हिस्ट्री डिपार्टमेंट के एसिस्टैंट प्रोफ़ेसर)


