विचार/लेख
-डॉ. संजय शुक्ला
किसी भी देश और समाज का सर्वांगीण विकास उसकी स्कूली शिक्षा पर निर्भर होता है, प्राथमिक शिक्षा ही उच्च शिक्षा की बुनियाद होती है। भारत की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक असमनताएं हैं, कोरोना संकट ने शिक्षा क्षेत्र में पहले से जारी असमानता की खाई को और चौड़ा कर दिया है। कोरोना ने सबसे ज्यादा नुकसान जिन क्षेत्रों का किया है उसमें शिक्षा सबसे आगे है। देश में कोरोना लॉकडाउन के बाद अनलॉक के दौर में भी जब आम जनजीवन से जुड़े सभी क्षेत्र खुल रहे हैं तब भी स्कूल और कालेज बंद हैं। फलस्वरूप शिक्षा से जुड़ी पढ़ाई, परीक्षा और मूल्यांकन जैसी सभी व्यवस्थाएं बुरी तरह से प्रभावित हो रही है। जानकारी के मुताबिक अकेले भारत में 32 करोड़ स्कूली बच्चों की शिक्षा इस दौर में प्रभावित हुई है।आलम यह है कि पूरा शैक्षणिक सत्र कोरोना संकट के भेंट चढ़ चुका है तथा इस सत्र में स्कूल-कालेज खुलने की संभावनाएं क्षीण है।बेपटरी हुई शिक्षण व्यवस्था का विपरीत असर शिक्षा की गुणवत्ता और छात्रों के अध्ययन कौशल में पड़ना अवश्यंभावी है। शिक्षा एक ऐसी व्यवस्था है जो समयबद्ध ढांचे और मानकों पर संचालित होती है लेकिन इस त्रासदी काल में यह अनिश्चितता का शिकार है। हालिया दौर में जब स्कूल खोलना जोखिम भरा है तब देश की सरकारों ने स्कूली छात्रों के लिए ऑनलाइन कक्षाएं और सिलेबस में कटौती जैसी व्यवस्थाएं लागू की हैं लेकिन इसका आशातीत परिणाम नहीं मिल रहा है। कुछ राज्यों में "मोहल्ला क्लास" जैसी ऑफलाइन कक्षाएं भी जारी है जिसका आंशिक प्रतिसाद मिला है। बहरहाल भारत जैसे बदहाल सरकारी शिक्षा व्यवस्था वाले देश में ऑनलाइन कक्षाएं शिक्षण व्यवस्था की समस्या का व्यवहारिक समाधान नहीं है और न ही विकल्प। बड़े निजी स्कूलों के बच्चे तो ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं लेकिन सरकारी व देहात के स्कूलों में यह दूर की कौड़ी है।विडंबना है कि ऑनलाइन कक्षाएं अभिजात्यवाद को बढ़ावा दे रही है तथा सामाजिक वर्गीकरण का एक नया माध्यम बन रही हैं।दरअसल ऑनलाइन कक्षाओं की अपनी चुनौतियां और सीमाएं हैं।
भारत में शिक्षा व्यवस्था सरकारी और निजी दो हिस्सों में बँटी हुई है, एक तरफ बुनियादी सुविधाओं के लिये तरसते खस्ताहाल सरकारी स्कूल हैं जिसमें ग्रामीण और कमजोर आय वर्ग के बच्चे दाखिला लेते हैं।इन स्कूलों में बिजली, इंटरनेट और सूचना तकनीक से प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता बेहद निराशाजनक है इन परिस्थितियों में ऑनलाइन कक्षाओं के हकीकत का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। दूसरी ओर अत्याधुनिक संसाधनों से लैस पांच सितारा स्कूल हैं जहाँ अभिजात्य नौनिहालों का भविष्य गढ़ा जाता है। कोरोना त्रासदी ने देश की एक बड़ी आबादी की रोजी-रोटी छिन ली है। जिस परिवार को हाथ की रोजी और पेट की रोटी की दुश्ववारियां है आखिरकार वह अपने बच्चों के लिए स्मार्टफोन और इंटरनेट डेटा का खर्च कैसे जुटा पाएगा? यह अहम सवाल है। इसके अलावा दुर्गम ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट की पहुंच और कनेक्टिविटी भी ऑनलाइन कक्षाओं की सार्थकता पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। राष्ट्रीय सैंपल सर्वेक्षण कार्यालय यानि एनएसएसओ के सर्वेक्षण के मुताबिक देश के केवल 42 फीसदी शहरी और 15 फीसदी ग्रामीण घरों में ही इंटरनेट है। एनसीआरटी के मुताबिक 27 फीसदी से ज्यादा बच्चे, टीचर और अभिभावक स्मार्ट डिवाइस की कमी से जूझ रहे हैं। डिजिटल इंडिया का हकीकत यह है कि अभी भी 55 हजार गाँव इंटरनेट की पहुंच से दूर हैं। एक अन्य शोध के अनुसार सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 15 फीसदी बच्चों के परिवारों के पास ही स्मार्टफोन है जो उनके अभिभावकों के पास रहता है। ऐसे अभिभावकों की संख्या भी काफी है जो एक से ज्यादा बच्चों के लिए यह इंतजाम करने में सक्षम नहीं हैं।यह आभाव गरीब अभिभावकों और बच्चों में सामाजिक और आर्थिक हीनता भी पैदा कर रही हैं।
गौरतलब है कि कोरोना महामारी के कारण बच्चे मानसिक तनाव और अवसाद का शिकार हो रहे हैं। प्रतिस्पर्धा के इस दौर में पढ़ाई और परीक्षा की दौड़ पिछड़ने का डर तथा डिजिटल साधनों के आभाव के चलते कई बच्चों के खुदकुशी की खबरें भी प्रकाश में आयीं हैं। ऑनलााइन कक्षाओं केे दुश्वारियों के बीच शहरों की ओर पलायन करने वाले घूमंतू परिवारों के बच्चों के पढ़ाई की हकीकत जानना जरूरी है जिनके सिर पर छत नहीं है झुग्गियां ही जिनका आशियाना है। इस दौर में आंगनबाड़ी और स्कूल बंद है तब इन बच्चों के पोषण और शिक्षण दोनों अधर में है। कोरोनाकाल में शिक्षा जगत में जारी विभेद का आलम यह भी देखा गया कि एक तरफ निजी कान्वेन्ट स्कूलों के बच्चे जहाँ ऑनलाइन कक्षाओं के जरिए अपना कल संवार रहे थे वहीं सरकारी स्कूलों के ग्रामीण और गरीब बच्चे मध्यान्ह भोजन के लिए जद्दोजहद कर रहे थे। कोरोना लॉकडाउन के दौरान जब स्कूल बंद हुए तब मिड-डे मील भी बंद हो गया था तब बच्चों की भूख भी समस्या बन चुकी थी।
बहरहाल यह गैर मुनासिब नहीं है कि कोरोनाकाल में 'शिक्षा पर अधिकार' केवल उन तबकों का रह गया है जिनके पास इंटरनेट, स्मार्टफोन,टैबलेट, लैपटॉप और डेस्कटॉप और जैसे डिवाइस हैं।यह परिस्थिति शिक्षा के क्षेत्र में पहले से ही मौजूद सरकारी-निजी, अंग्रेजी-हिंदी माध्यम और शहरी-ग्रामीण स्कूली बच्चों के भेदभाव की खाई को और चौड़ी कर रही है। शिक्षा का लक्ष्य समतामूलक विकसित समाज का निर्माण है लेकिन आर्थिक हैसियत और संसाधनों के उपलब्धता के आधार पर निर्धन छात्रों को शिक्षा अवसर मिलना तथा इस बिना पर उनके मेधा का क्षरण निश्चय ही पीड़ादायक है। आसन्न बोर्ड परीक्षाओं के सिलेबस में तीस फीसदी कटौती के फैसले के दूरगामी परिणाम पर भी विचार भी जरूरी है। भले ही सरकार ने यह निर्णय शैक्षणिक कैलेंडर बचाने व छात्रों पर पढ़ाई का तनाव कम करने के लिहाज से लिया हो लेकिन कटौती किए गए सिलेबस की पढ़ाई कैसे होगी? इसका उत्तर फिलहाल काल के गाल में है। यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि बोर्ड परीक्षाओं के बाद ली जाने वाली तमाम प्रतियोगी परीक्षाओं में यह सिलेबस तो शामिल ही रहेंगे। आर्थिक रूप से संपन्न छात्र तो इसकी पढ़ाई महंगे कोचिंग संस्थानों में कर लेंगे लेकिन गरीब छात्र इस सिलेबस के लिए अनपढ़ ही रहेंगे। इन परिस्थितियों में छात्रों का बड़ा तबका साधन संपन्न बच्चों से प्रतिस्पर्धा में पिछड़ेगा। देश में शिक्षा के क्षेत्र में जारी निजीकरण और बाजारीकरण के बीच इस आपदाकाल में डिजीटल क्लास रूम और ऑनलाइन कोचिंग के बढ़ते चलन ने शिक्षा उद्योग को बढ़ावा दिया है। निःसंदेह शिक्षा का यह नया प्लेटफार्म गरीब अभिभावकों और बच्चों के पहुंच से बाहर होगा।बहरहाल बच्चे देश का भविष्य हैं इसलिए शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं में असमानता देशहित में नहीं है। यह स्मरण में रखना होगा कि देश के बहुतेरे अग्रणी व्यक्तित्व सरकारी स्कूलों और गांवों के पगडंडियों से ही निकले हैं इसलिए गुदड़ी के लालों की चिंता सरकार और समाज को करना ही होगा। यह जरूरी है कि संसाधन विहीन बच्चों को भी शिक्षा का समान अवसर मुहैया कराने के लिए सरकार और स्वयंसेवी संगठनों को सामने आना होगा ताकि कोरोनाकाल उनके भविष्य के लिए त्रासदी न बने।
(लेखक शासकीय आयुर्वेद कालेज, रायपुर में सहायक प्राध्यापक हैं।)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
जैसी कि मुझे आशा थी, सरकार और किसानों की बाचीत थोड़ी आगे जरुर बढ़ी है। दोनों पहले से नरम तो पड़े हैं। इस आंशिक सफलता के लिए जितने किसान नेता बधाई के पात्र हैं, उतनी ही सराहना के पात्र हमारे कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और व्यापार-उद्योग मंत्री पीयूष गोयल भी हैं। पांच घंटे की बातचीत के बाद दो मुद्दों पर दोनों पक्षों की सहमति हुई।
सरकार ने माना कि उसके वायु-प्रदूषण अध्यादेश और बिजली के प्रस्तावित कानून में वह संशोधन कर लेगी! अब किसानों पर वह कानून नहीं लागू होगा, जिसके तहत पराली जलाने पर उन्हें पांच साल की सजा या एक करोड़ रु. का जुर्माना भी देना पड़ सकता था। इसी प्रकार बिजली के बिल में मिलने वाली रियायतें भी किसानों को मिलती रहेंगी। इन दोनों रियायतों से 41 किसान नेता इतने खुश थे कि उन्होंने मंत्रियों को अपना लाया हुआ भोजन करवाया और बाद में उन्होंने मंत्रियों की चाय भी स्वीकार की।
याद कीजिए कि पिछली बैठकों में किसानों ने सरकारी आतिथ्य को अस्वीकार कर दिया था। अब कृषि मंत्री का कहना है कि किसानों की 50 प्रतिशत मांगें तो स्वीकार हो गई हैं। यह आशावादी बयान कुछ किसान नेताओं को स्वीकार नहीं है। उनका मानना है कि ये तो छोटे-मोटे मसले थे। असली मामला तो यह है कि तीनों कृषि-कानून वापस हों और न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी रुप दिया जाए।
किसानों के इस आग्रह को मंत्रियों ने रद्द नहीं किया है। यह उनकी परिपच्ता का सूचक है। वे संवाद की खिड़कियां खुली रखना चाहते हैं। वे इन सुझावों पर गौर करने के लिए एक संयुक्त कमेटी बनाने को भी तैयार हैं। अब सरकार और किसान नेताओं के बीच 4 जनवरी को पुन: संवाद होगा। इस संवाद की भूमिका भी अच्छे ढंग से तैयार हो रही है। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने किसानों के घावों पर गहरा मरहम लगा दिया है। उन्होंने भारतीय किसानों को विदेशी एजेंट, आतंकवादी या खालिस्तानी कहकर बदनाम करने की कड़ी आलोचना की है।
उन्होंने सिख बहादुरों द्वारा देश की रक्षा के लिए किए जा रहे बलिदानों को भी याद किया। कोरोना के संकट-काल में कृषि-उत्पादन की श्रेष्ठता का भी बखान उन्होंने किया। लेकिन यह दुखद ही हे कि कुछ विघ्नसंतोषी किसानों ने लगभग 1600 मोबाइल टॉवर तोड़ दिए हैं। वे अंबानी को सबक सिखाना चाहते हैं। लेकिन ऐसा करके वे अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। भारतीय किसानों के अपूर्व और अहिंसक सत्याग्रह को वे कलंकित कर रहे हैं।
(नया इंडिया की अनुमति से)
पवन दीवान का जन्मदिन 1 जनवरी
-कनक तिवारी
विज्ञान महाविद्यालय रायपुर के छात्र के रूप में पवन दीवान की तरुण महत्वाकांक्षाओं से रूबरू होने का शिक्षक होने के नाते अवसर मिला। मेरे लिए पवन दीवान का निजी मूल्यांकन करना अलग तरह का रोमांचक आत्मीय अनुभव वृत्तांत है। वह मुझे पूरी कक्षा से अलग नजर आया। पूछने पर उसने बताया कि वह संस्कृत और हिन्दी विषयों की समझ तो रखता है लेकिन साथ साथ अंगरेजी भाषा और साहित्य में भी पारंगतता चाहता है। सफेद पाजामा और आधी बांह की सफेद कमीज पहने बिना चप्पलों के एक छात्र को गैलरी वाली कक्षा की सबसे अंतिम और ऊंची सीट पर बैठे मैंने पहली बार देखा। उसकी आंखों में अंगरेजी में दिए जा रहे लेक्चर और अंगरेजी साहित्य की बानगियों के अनुरूप सचेतन ढल रही भाव भंगिमाओं को बूझने की विनोदप्रिय उत्सुकता साथ साथ झांक रही थी। मुझे उस छात्र ने आकर्षित किया। मैं प्राध्यापक होने के पहले महाविद्यालय छात्रसंघ का अध्यक्ष रह चुका था। छात्रों से मेरे निजी रिश्ते का समीकरण अन्य अध्यापकों से भिन्न था। मैं चपल, नटखट, शैतान और राजनीतिप्रिय विद्यार्थियों का मार्गदर्शक ज्यादा था। इसी अनौपचारिक पृष्ठभूमि में मैंने पवन दीवान से उसकी कठिनाइयों, जिज्ञासाओं और प्रतिप्रश्नों के सिलसिले में लगातार बातचीत की।
मैंने पवन से कहा कि अनिच्छुक रास्ते पर चलकर अपना जीवन सार्थक नहीं कर सकते। तुमने कांटों भरा रास्ता चुना है। वह तुम्हारे व्यक्तित्व को फूल की पांखुड़ियों जैसा नहीं खिला सकता। एक एडवेंचर करो या नहीं। खतरा तुम्हें उठाना ही होगा। मैं तुम्हें अंगरेजी साहित्य का पाठ पढ़ा सकता हूं लेकिन जीवन का नहीं। कोई रास्ता है तो जो दिखाई तो दे रहा है। पवन दीवान ने हिम्मत की। पवन दीवान ने अपनी सुदृढ़ हनु के साथ कहा कि सर यह काम तो मैं करके रहूंगा। आप मुझे आशीर्वाद दीजिए। सांसारिक उपलब्धियों को ठुकराकर धर्म संस्कृति के रास्ते पर चलना उसे मनुष्योचित जोखिमभरा और श्रेयस्कर लगा। इस व्यक्ति ने अपने जीवन को एक दुर्लभ बीजक बनाने के बजाय खुली किताब की तरह जनमानस का पाठ्यक्रम बना दिया।
पवन दीवान को राजनीति के शोषकों ने बार बार गुमराह नहीं किया होता तो वे भी धरती पर और बड़ा काम करने ही आए थे। सत्तामूलक राजनीति मनुष्य की नैसर्गिक प्रतिभा का शोषण और क्षरण करती है। पवन दीवान भी इसी साजिश का शिकार हुए। राजनेताओं और पार्टियों ने उनका अपने कंधों के रूप में इस्तेमाल किया। कुटिलता से परिचय नहीं होने के कारण पवन दीवान सियासी षड़यंत्र के हेतु को समझ नहीं पाते थे। यह अजीब है कि दो परस्पर विरोधी पार्टियों भाजपा और कांग्रेस को उनकी बार बार जरूरत महसूस होती थी। इस लिहाज से वे एकमेव द्वितीयो नास्ति की तरह के अनिवार्य विकल्प बने रहे।
पवन दीवान की सबसे लोकप्रिय सियासी कविता में इस बात की चेतावनी बिखेरी गई है कि यदि शोषण बदस्तूर कायम रहा तो छत्तीसगढ़ तेलंगाना बन सकता है। मैंने उलाहना देकर पूछा कि राजसत्ता तो अत्याचार बन्द नहीं करेगी। पवन दीवान ने तात्कालिक उत्तर दिया सर आप देखना छत्तीसगढ़ तेलंगाना बनकर रहेगा। बस्तर में पसरे नक्सलवाद और उससे जुड़े तब के आंध्रप्रदेश (और अब तेलंगाना भी) उस विभीषिका को झेलते रहे हैं जो कवि की कविता की आशंका से बढ़कर भारत की भूगोल का सच हो गया है। कभी पवन दीवान ने जनता पार्टी की एक सभा में इन्दिरा जी को लेकर कटाक्ष किया था कि तुम दुर्गा हो तो हमको क्या मुर्गा समझती हो। मैंने कहा था कि सन्यासी होकर मुर्गा शब्द के बदले गुर्गा भी तो कह सकते थे। एक ठहाका लगाकर उन्होंने कहा। ‘सर आपने मुझे अंगरेजी साहित्य पढ़ाया। हिन्दी साहित्य पढ़ाते तो मैं शब्दों के चयन में आपसे सलाह लेता रहता।‘
अपनी ग्रामीण शैली में निखालिस छत्तीसगढ़ी बोलते पवन दीवान में धार्मिक विषयों की अद्भुत मीमांसा करने का हुनर नैसर्गिक गुण था। सामाजिक जीवन वैसे ही तरह तरह के विषाद, विद्रूप और विसंगतियों से भरा होता है। पवन दीवान की उपस्थिति में हर व्यक्ति का जीवन स्पंदनशील हो उठता था। वह स्पंदन खामोश हो गया है। दूर दूर तक कोई दूसरा पवन दीवान छत्तीसगढ़ के जीवन को उस तरह जीवंत बनाता चले। इसकी संभावना क्षीण है।
बाद के वर्षों में प्रसिद्ध संन्यासी, राजनीतिज्ञ, धार्मिक प्रवचनकर्ता और कवि साहित्यकार बनकर भी वह विनम्रता में मेरे चरण स्पर्श करता रहा। एक बार उसके चुनाव की जनसभा में मैंने भाषण दिया। तब भी उसने इसी मुद्रा में चरण स्पर्श कर मेरे गुरु होने को महत्वपूर्ण बना दिया। उनके सफल, संघर्षमय, यशस्वी और कई बार विरोधाभासी होते जीवन पर टिप्पणियां करने का आज वक्त नहीं है। मुझे भगवा वस्त्र धारण करने के पहले के पवन दीवान की कुछ कम सफेद पाजामे और आधी बांह की कमीज पहने अपने व्यक्तित्व को तराशने की जद्दोजहद का निहायत औसत छत्तीसगढ़िया युवक केवल याद भर नहीं आ रहा है। यादों में कील की तरह बिंधकर नहीं होने की टीस देता रहेगा।
विनोद कुमार शुक्ल का जन्मदिन 1 जनवरी
-कनक तिवारी
कवि और कविता का रिश्ता बेहद जटिल होता है। कविता कवि का माध्यम है या कवि कविता का-यही तिलिस्म है। कविता शब्दों में वह नहीं कहती जो कवि मूलत: शब्दहीनता में कहना चाहता है। जब कवि कविता को वह सब कहने का आयाम बनाता है, जो उसने अपने मन में लगभग कहा होगा, तब कविता कवि के जुमले को समझती हुई कविता कहलाती है। कविता बेचारगी का विषय नहीं होती। अपनी कविताओं को मुग्ध होकर देखने वाला कवि कई बार बेचारा भले हो, विद्रोही बने रहना कवि का शाश्वत लक्षण है। अपनी कविता से आंतरिक संवाद करना कवि का नैसर्गिक अधिकार भले हो, उसका अवसर मिलना कविता की नीयत पर निर्भर करता है। हर अच्छी कविता खुद की सम्भावना ही होती है क्योंकि वह सदैव कुछ कहना चाहती है।
विनोद कुमार शुक्ल कविता के शिल्प में एक पंक्ति और दूसरी पंक्ति, एक कदम और दूसरे कदम, एक क्षण और दूसरे क्षण के बीच ही कविता अनहद कहते चलते हैं। शब्द त्वचा, पोशाक या केंचुल की तरह उस अनकथ के आवरण बनते बिगड़ते रहते हैं जो कविता का दिगंबर नि:संग सच है। कुछ असंभावित और अब तक अपरिभाषित मानवीय स्थितियां हैं जो सहज संभावनाओं की तरह इस कवि के प्रयोगों में साकार हुई हैं। विनोद जी आप्त या सूत्र वाक्यों के रचयिता कतई नहीं हैं। एक गहरा सूफियाना उनकी कविता का उत्स है। शायद विनोद कुमार शुक्ल ही कह सकते हैं कि उनमें ‘अतीत का विस्तृत कबाड़ है और स्मृति में नया बहुत नया।’ विनोदकुमार शुक्ल न पहुंचने के अंत तक‘ जैसा मुहावरा गढक़र कविता के हृदय को शब्दश: से ज्यादा ध्वनिश: आत्मसात करते हैं।
बहुत कुछ है जो विनोद जी की कविताओं में सहसा समझ आनेे के लिए नहीं भी है। विनोद कुमार शुक्ल आत्मा की कसक के कवि हैं। वे उतनी ही करुणा उकेर देते हैं। एक बेहद बल्कि निहायत मामूली आदमी के लिए संवेदनाओं के संसार की सुरक्षा करना भी कवि का कर्तव्य है। विनोद कुमार शुक्ल होने की यह भी एक अन्योक्ति है, अर्थ भी। जो लोग उनकी कविताओं में शब्दों और आवाज का आर्केस्ट्रा नहीं सुन पाते, शायद उन्हीं के लिए कवि कहता है कि उसे ‘ध्वनियों के कैमूफ्लाज़ में सुनाई नहीं दिया।‘
विनोद कुमार शुक्ल गहरे आदिवास के बोधमय कवि होने के बावजूद इस पचड़े में नहीं हैं कि उनकी कुछ सामाजिक प्रतिबद्धताएं भी हैं। वे अपने सोच और संवेदना में शायद सबसे ज्यादा आदिवासी सरोकारों के कवि हैं। दलित लेखन का मुखौटा ओढ़े बिना यह कवि आदिम जीवन के बिम्बों को रेत में पड़ी सीपियों की तरह सागर के गहरे एकांत क्षणों में एकत्रित करता है। बहुत से प्रतिवेदनों और जांच दलों को अपने कथानक में उपसंहार के बतौर कविता का यह निकष जोड़ लेना चाहिए ‘कुछ ही दिनों से यह एक आदिवासी कथा है कि बहुत बरस से जंगल में बहुत से आदिवासी भूख से मर जाते हैं ‘विनोद कुमार शुक्ल की निर्दोष कविताएं कई स्थलों पर चाहें तो संतवाणी का चोला पहन सकती हैं। लेकिन वे अपनी अभिव्यक्तियों में अपना आदिवास नहीं भूलतीं। वे तकनीकी अर्थ में सभ्य और अभिजात्य कुल की कविताएं नहीं हैं, लेकिन अपनी मूल संरचना में निष्कपट सादगी, सहकार और सामूहिकता के बावजूद अकेलेपन के साथी भाव का एक बहुत महत्वपूर्णकुलीन प्रामाणिक दस्तावेज हैं।
इस कुलीन कवि में उच्च मध्य वर्गीय शहरी अभिजात्य की ठसक नहीं है, जो हिन्दी के कई श्रेष्ठ कवियों में ठुंसी पड़ी है। इस कवि में वह गहरा और क्षुब्ध आक्रोश भी नहीं है जैसा बहुत से निम्न मध्यम वर्गीय कवियों के आह्वान में है। उनके कवि होने को लेकर तब आलोचकीय दृष्टि भौंचक होती है जब कवि के मन पर पड़े तरह तरह के आघातों के प्रत्युत्तर में कविता की उनकी समझ तटस्थ, निस्पृह और क्षमाशील मुद्रा में खड़ी उस समूची पृष्ठभूमि से कविता के अवयव ढ़ूंढती है। यह कवि पाठकों पर अपने नुकीले अहसासों का ठीकरा नहीं फोड़ता है। विनोद कुमार शुक्ल को पढऩा कविता के टॉर्च की रोशनी में अपने घर, मन बल्कि अपनों में भी वह खो चुका ढूंढना है जिसे हम अन्यथा भी ढूंढ़ सकते थे बशर्ते वैसा ही टॉर्च हमारे पास होता। उनकी बहुत कम कविताएं हैं जिनको पढऩे पर विनोद कुमार शुक्ल को ढूंढा नहीं जा सकता। यह कवि कविता में तल्लीनता का सीधा उदाहरण है।
जो लोग इस कवि में उलटबासी या विरोधाभासों के प्रयोग ढूंढते हैं उन्हें शब्द सत्ता से परे जाकर टकटकी बांधकर जीवन के हर उस नहीं होने को देखना शुरू करना चाहिए, जिसे यह कवि शाश्वतता में देख रहा है। विनोद कुमार शुक्ल ने शब्दों में अर्थ इन्जेक्ट करने के बदले उन्हें अहसास करा दिया है कि भाषा और शब्द-सत्ता के परे कविता का ऐसा रहस्य लोक होता है जो कविता के आयाम में ही बोधगम्य होता है। तब पाठक खुद कवि हो जाता है। इस कविता के रहस्यलोक से अपनी सांसारिक दुनिया के चेतना लोक में लौटना तकलीफदेह अनुभव है।
विनोद कुमार शुक्ल इक्कीसवीं सदी के कथाकार हैं। सदी के विग्रह, संताप, विसंगतियां और निष्चेष्टताएं भी उनके लेखन की पूंजी हैं, कच्चा माल हैं। विनोदजी ने बगावत के तेवर या समाज सुधार का मुखौटा लगाने की जरूरत नहीं समझी। मध्यवर्ग के विशाद का यह अजीबो-गरीब कवि तल्खी तक का आदर करता है। बहुत सी कविताएं हैं जिनमें विनोद कुमार शुक्ल यथास्थितिवादी दिखाई देते हैं कि कहीं कुछ बदलने वाला नहीं है। आदिम और मौजूदा सच यही है कि भविष्य एक पुनरावृत्ति भर है। विनोद जी के सपनों का भविष्य वर्तमान का विस्तार ही है। इसलिए विनोद कुमार शुक्ल का ऐसी भाषा रचने का हठ-योग है जो उनके लेखन का सबसे प्राणवान तत्व है। भाषा उनके लिए साध्य या साधन होने के बदले वह बहता हुआ आयाम है जिसमें से वे अपने लिए जरूरत पडऩे पर शब्द बीनते हैं। कवि विनोद कुमार शुक्ल की दिक्कत और नीयत यही है कि उनके पाठक बनने के लिए आदिम वृत्तियों की पाठशाला के सबक को याद रखना जरूरी है। घर, कस्बा, मध्यवर्ग, आदिवासी, फिर कुछ स्थानों और व्यक्तियों के नाम उन ईंटों की तरह हैं जिनसे एक कलात्मक कविता-गृह का रच जाना सुनिश्चित हुआ है।
असल में विनोद कुमार शुक्ल की जो कमजोरी है, वही उनकी शक्ति है। उनका पूरा लेखन उनके तमाम चरित्र और खुद कवि एक साथ सजग, मितभाषी, आत्मविश्वासी लेकिन विशिष्ट होकर भी सामान्य दिखते हैं। वे हमारी सदी के कवि उपन्यासकार हैं। विनोद कुमार शुक्ल क्रियापद की यथास्थिति के बेजोड़ कवि हैं। उनमें जो घटित हो रहा है, उससे भी चकित हो उठने की एक अनोखी उत्कंठा है। वह विनोद कुमार शुक्ल को हमारे युग का पूर्वग्रह-रहित सबसे बड़ा गवाह बनाती है। विनोदजी में जबरिया सब कुछ बदल डालने का आग्रह नहीं है। कविता तो प्राणपद वायु की तरह जीवन को दुलराती रहती है। लोग ही कविता की जीवनी शक्ति से बेखबर हो उठे तो विनोद कुमार शुक्ल क्या करें।
-कनुप्रिया
इन दिनों किसानों के कई वीडियोज़ देखे, उनकी बातें सुनीं, और ये मेरे लिये अचरज भरी ख़ुशी की बात थी कि जिन किसानों के लिये हमारे मन मे छवि गऱीब, लाचार, अनपढ़ और बहकाए बरगलाए जाने लायक व्यक्ति की होती है वो न सिफऱ् अपने मुद्दे को बेहतरीन तरीके से समझते हैं बल्कि विश्व राजनीति, भारत सरकारों द्वारा किये गए समझौते, वर्तमान सरकार द्वारा की जाने वाली कारस्तानियों और अपने हक़ को भी तथाकथित पढ़े लिखे समझदार मध्यम वर्ग से बहुत बेहतर तरीके से जानते समझते हैं, उस मध्यम वर्ग से अधिक जो यह समझता है कि वह निजीकरण की आग की आँच से इसलिये बहुत दूर रहेगा क्योंकि उसके पास ठीक ठाक पूँजी है।
जबकि मीडिया राहुल गाँधी पर शोर मचा रहा है,यह मुद्दे से भटकाने भर के तत्कालीन प्रयास से अधिक कुछ साबित नही होने वाला है, बल्कि यह साबित करता है कि कॉंग्रेस और राहुल गाँधी अगर इस आंदोलन के समर्थन में खड़े हैं तो यह सराहनीय है मगर किसान उनके बल पर यह आंदोलन नही कर रहे हैं। इससे विपक्षी / कॉंग्रेसी साजि़श का आरोप भी बेकार सिद्ध होता है।
इस आंदोलन की सफलता बिल के वापस लेने में भले दिखाई देती हो मगर अपने बने रहने में यह जिस तरह के विमर्श को बनाए रख रहा है वह महत्वपूर्ण है। मीडिया के प्रचारतंत्र के बूते भटकाए जाने वाले झूठ और बहानो की उम्र ज़्यादा नही होती। राहुल भले विदेश चले गये हों मगर प्रधानमंत्री ख़ुद दिल्ली और उसके आसपास उद्घाटन करते घूम रहे हैं इस सच को मीडिया चिल्ला चिल्ला कर अगर न भी बोल रहा हो मगर दिखता तो है ही। और ऐसे कई सचो पर से जो उघडऩे के लिये पूरा वक़्त चाहते हैं आंदोलन की बढ़ती हुई उम्र लगातार सूचनाओं, चिंतन और विमर्श के जरिये भ्रम के पर्दो को हटाए जाने के लिये पर्याप्त समय देती रहेगी, यह आंदोलन की कम बड़ी सफलता नहीं।
ऊब और थकान हम मध्यम वर्ग की दुविधा हो सकती है मगर जिनके लिये सवाल जीने मरने के हों उनके पास थकने के विकल्प नही होते, 6 महीने भी डटे रहने की किसानों की बात से तो यही लगता है। इस बीच जड़त्व के शिकार लोगों के वैचारिक- व्यवहारिक बाँध भी टूटेंगे, और पैरों के बंधन भी, तब सम्भव है आंदोलन को अपेक्षित बल वहाँ से भी प्राप्त हों जहाँ से उम्मीद अभी कम है। धीरे धीरे राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के किसान भी शामिल हो ही रहे हैं।
2020 महामारी का साल है तो आंदोलनों का साल भी है, यह साल कई मायनों में मील का पत्थर है जो इससे पहले के सालों से इसके बाद के सालों को अलग करता है। इस साल की सामाजिक गतिविधियों ने हमे और जागरूक किया है, वैचारिक रूप से समृद्ध किया है। कई व्यक्तिगत दुखों, परेशानियों और अर्थ व्यवस्था को लगे बड़े धक्के के बीच 2020 अगर दुनिया के सबसे बड़े किसान आंदोलन के रूप में जाना जाएगा तो इस साल की यह कम बड़ी उपलब्धि नहीं। यह आंदोलन सफल हो अगले साल के लिए दुआ है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अब से 50-60 साल पहले तक लंदन की सडक़ों पर कुछ भारतीय जरुर दिख जाते थे। न्यूयार्क, वाशिंगटन, पेरिस, बर्लिन, रोम, तोक्यो और पेइचिंग जैसे शहरों में उन दिनों कोई भारतीय दिख जाता था तो लगता था जैसे कि लॉटरी खुल गई है। लेकिन अब सारी दुनिया के देशों में लगभग दो करोड़ भारतीय फैल गए हैं। अपने लोगों को विदेशों में खो देने वाला दुनिया का सबसे बड़ा अभागा कोई देश है तो वह भारत ही है।भारत के जो लोग विदेशों में जाकर बस जाते हैं, वे कौन लोग हैं ?
उनमें से ज्यादातर वे हैं, जो भारत के खर्चीले स्कूलों-कालेजों में पढ़े होते हैं और बचपन से ही वे इस फिराक में रहते हैं कि उन्हें अमेरिका या ब्रिटेन के किसी कालेज में प्रवेश मिले और वे छू-मंतर हो जाएं। वहां उनकी पढ़ाई की फीस लाख-डेढ़ लाख रु. महीना होती है। या तो मालदारों के बच्चे प्राय: वहां जाते हैं या नेताओं और नौकरशाहों के। इनमें से कई बच्चे काफी प्रतिभाशाली भी होते हैं।
वे प्रतिभाशाली छात्र भी विदेशों में रहना ज्यादा पसंद करते हैं, जो गरीब, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों से आते हैं। पश्चिमी समाज में उनसे कोई भेद-भाव नहीं करता है। इसीलिए इनके जाने को ‘प्रतिभा पलायन’ (ब्रेन ड्रेन) भी कहा जाता है। अभी ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के एक सर्वेक्षण से पता चला है कि इन खर्चीले स्कूलों के 70 प्रतिशत बच्चे विदेश भाग खड़े होते हैं। सर्वोच्च अंक पाने वाले छात्रों में से ज्यादातर विदेश पलायन कर जाते हैं।पिछले चार पांच वर्षों में उन पर होने वाला खर्च डेढ़ बिलियन डालर से कूदकर 5 बिलियन डालर से भी ज्यादा हो गया है। इन छात्रों पर भारत अपना पैसा, समय और परिश्रम खर्च करता है लेकिन इनका फायदा कौन उठाता है? अमेरिका और ब्रिटेन ! कितनी विडंबना है कि भारत बीज बोता है, सिंचाई करता है, पौध को पालता-पोसता है और जब उस पर फल आते हैं तो वे विदेशियों की झोली में झड़ जाते हैं।
यदि ये प्रतिभाशाली छात्र भारत में ही रहते और पढक़र वापस लौट आते तो यह असंभव नहीं कि कुछ ही वर्षों में भारत पश्चिमी देशों से अधिक समृद्ध और सुखी हो जाता। छात्रों के पलायन से भी ज्यादा चिंता की खबर यह है कि देश के अनेक बड़े उद्योगपति अब भारत छोडक़र विदेशों की नागरिकता के लिए दौड़े चले जा रहे हैं। मैं विदेशों में पढऩे, काम करने और रहने का विरोधी बिल्कुल नहीं हूं। मैं स्वयं न्यूयार्क, लंदन, मास्को और काबुल के विश्वविद्यालयों में रहकर अनुसंधान करता रहा हूं। मेरी बेटी अपर्णा भी लंदन में पढ़ी है और वाशिंगटन में पढ़ाती रही है लेकिन हमने सारे प्रलोभनों को ठुकराकर भारत में ही रहने और काम करने का प्रण ले रखा था। भारत सरकार को चाहिए कि वह उन सब कारणों को खोजे, जिनके चलते हमारी प्रतिभाएं और उद्योगपति भारत से भाग रहे हैं। उनको वापस लाने और उन्हें भारत में ही टिकाए रखने के उपायों पर तुरंत कार्रवाई की जरुरत है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-प्रकाश दुबे
कोरोना नाम की महामारी ने साल-2020 को कुतर डाला। वक्त के दीमक ने अर्थ व्यवस्था अस्त-व्यस्त की। दुनिया भर में करोड़ों प्राण निष्प्राण कर डाले। निष्प्राण इसलिए, कि समाज का लगभग पूरा हिस्सा निष्क्रिय पड़ा रहा। इस महामारी से बड़ा अदृश्य विषाणु भारतीय समाज को लम्बे समय से चाट रहा है। इसके प्रहार की तड़प का आभास होता है। कोरोना वायरस की तरह इसके स्वरूप का सही अकलन अब तक नहीं किया जा सका। अनेक ऐसे लोग भी थाह नहीं ले सके जो आयेदिन इसके विरोध में प्रवचन देने के आदी हैं। इस विषाणु का नाम है-कुनबापरस्ती। सत्ता और संपत्ति की ललक इसके तेजी से बढऩे के लिए उपयुक्त वातावरण है। इसके सारे लक्षण कोरोना महामारी से मिलले-जुलते हैं।
देश के संभवत: सबसे पुराने संगठित राजनीतिक दल कांग्रेसकी नस नस में यह रोग गहराई तक भिद चुका है। साल भर बीत जाने के बावजूद संक्रमित पार्टी स्थायी अध्यक्ष तलाश कर चैन की सांस नहीं ले सकी। घूम फिर कर बात अम्मा-भैया-दीदी पर अटक जाती है। बलगम-थूक की जांच से कोरोना संक्रमित की पहचान होती है। जब कि क्षेत्रीय राजनीतिक दल कहते ही कुनबापरस्ती का संक्रमण स्पष्ट दिखने लगता है। क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा वाले शिवसेना, द्रविड़ मुनेत्र कड़घम और इससे छिटक कर बने कई अन्य दल, दलित संगठनों समेत जातीय आधार पर उभरे दर्जनों राजनीतिक दल साक्षात् प्रमाण हैं। दरअस्ल पार्टी और पुश्तैनी कारोबार लगभग समानार्थी हो चुके हैं। शरद पवार की विचारधारा कांग्रेस से अलग नहीं है। एक परिवार की मुट्?ठी से पार्टी को मुक्त करने के लिए उन्होंने पूर्णो संगमा तथा तारिक अनवर के साथ बगावत की। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनाई। संगमा और पवार परिवार की सत्ता में सहभागिता के आधार पर आसानी से कहा जा सकता है कि मेघालय से लेकर महाराष्ट्र तक राजनीति कुनबापरस्ती संक्रमित है।
विचार की राजनीति में कुनबापरस्ती का स्थान नहीं होता। यह दावा करने वाले उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू प्रसाद के नाम पर ही न रुकें। जाति तोड़ो और पिछड़े पावैं सौ में साठ का विचार देने वाले डा राम मनोहर लोहिया के अधिकांश अनुयायी विचार की राजनीति को सौ में सात प्रतिशत से अधिक स्थान नहीं देते। इस सूची में नीतीश कुमार का नाम पहली बार नहीं जुड़ा है। सुशासन बाबू ने जार्ज फर्नांडिस की छत्रछाया में समता पार्टी से नई शुरुआत कर राजनीति के मैदान में धाक जमाई। जार्ज दुनिया से अलविदा हो गए। शरद यादव को हाशिये पर धकेलने के बाद नीतीश ने नया नेतृत्व जोड़ कर अपना आभा चक्र तैयार किया। पवन वर्मा पहले से उनके खासमखास थे। अब राम चंद्र प्रसाद सिंह पार्टी अध्यक्ष बनाए गए हैं। आरसीपी सिंह से नीतीश कुमार का दोहरा रिश्ता है। सिंह राज्यसभा में जद यू पार्टी संसदीय दल के नेता है। जय प्रकाश नारायण के संघर्ष के बाद आपात्काल के दौरान अस्तित्व में आई जनता पार्टी पंचमेल खिचड़ी थी। बार बार की टूट के बाद दावा किया गया कि जनता दल यू वैचारिक राजनीतिक दल है। जनता दल यू में संगठन की कमान संभालने वाले नए चेहरे का रहस्य जानते हैं? रेल मंत्री के निजी सचिव रहे आरसीपी सिंह बिहार के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर थे। यह भी जान लें कि सिंह नीतीश कुमार के सजातीय होने के साथ गृह जिले नालंदा के निवासी हैं। इस राजनीतिक समीकरण के आधार पर कुछ लोग इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि नालंदा में वैचारिक पोथियां ही नहीं जलाई गईं। वैचारिक राजनीति तक भस्म होती रहती है।
विचार की राजनीति करने वाले साम्यवादी दल अपने पुरखा राज्य बंगाल तक में हाशिये पर सिमट गए। केरल में धर्म आधारित दलों की कंधों का सहारा लेना पड़ा। बच रही भारतीय जनता पार्टी-जिसका औरों से अलग हटकर होने का दावा अब साक्षात् हमारे समक्ष है। भाजापा की कुनबापरस्ती सचमुच औरों से हटकर है। याद करें। भाजपा कार्यकारिणी ने लाल कृष्ण आडवाणी को अध्यक्ष पद से नहीं हटाया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक कुपु सुदर्शन ने जिन्ना की समाधि को प्रणाम करने वाले आडवाणी को रुख्सत किया। आज इस तरह क आदेश लागू करने की क्षमता के बारे में संघ के वर्तमान पदाधिकारी बेहतर बता सकते हैं। दीवार पर लिखी इबारत को राजनीतिक साक्षर बांचते होंगे। भजन लाल पूरी हरियाणा सरकार समेत 1977 में जनता पार्टीमय हुए। जनता पार्टी तथा सरकार बिखरने के बाद सरकार समेत वापस कांग्रेस में घरवापसी की। हरियाणा में स्वयंसेवक मुख्यमंत्री है। धर्म आधारित राज्य पर आस्था रखने वाला राज्यपाल। अरुणाचल से हरियाणा तक अनेक राज्यों में नई राजनीतिक संस्कृति में विचार की तलाश कर समय नष्ट न करें।बंगाल की खाड़ी में जादूगर पहुंचने लगे हैं। सत्ता की जादुई छड़ी के कमाल से अपराधी, चिटफंडिये घोटालेबाज, (यहां तक कि) रूस, चीन के दलाल कहे जाने वाले मार्क्सवादी गंगासागर में डुबकी लगाकर पवित्र होते जा रहे हैं। कुनबापरस्ती का मूलमंत्र परिवार तथा जाति के आगे क्षेत्र और व्यवसाय तक व्यापक है। सदियों पुरानी महामारी दूर नहीं होती।
महाभारत काल में भाइयों ने भाइयों को भस्म करने लाक्षागृह में आग लगाई। युवा आदिवासी घटोत्कच और अभिमन्यु ने युद्ध में प्राण दिए। असली राजा जितनी मूंगफली खाता, कुटुम्ब-कलह में उतने हजार सैनिक अगले रोज़ युद्ध में मारे जाते थे।
हर तरह की कुनबापरस्ती का असली चेहरा यही है।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
-हर्षदेव
और बात पेंट के बाद चड्डी उतरने की बेहद शर्मनाक परिस्थिति तक आ ही पहुँची। आंध्र प्रदेश हाइकोर्ट ने चीफ़ जस्टिस विद फुल पेंट पर यह सीधे टिप्पणी की है जो अभूतपूर्व है।
सुप्रीम कोर्ट कोलिजियम ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों का एक साथ तबादला करके जिस तरह मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी के लिए स्थितियाँ अनुकूल बनाई हैं, उस पर यह टिप्पणी किसी की भी गरिमा और सम्मान को तार-तार करने वाली है।
आंध्र और तेलंगाना के मुख्य न्यायाधीशों - जितेंद्र कुमार माहेश्वरी और आर.एस. चौहान को क्रमश: सिक्किम तथा उत्तराखंड हाइकोर्ट भेजे जाने पर आंध्र प्रदेश हाइकोर्ट की राकेश कुमार व डी. रमेश की बेंच ने व्यवस्था देते हुए कहा है- मुख्यमंत्री ने न केवल अपने ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार/हवाला के लगभग 30 मुक़दमों की सुनवाई प्रभावित करने की ग़ुस्ताख़ी की है वरन् यह जताने का प्रयास भी किया है कि जस्टिस माहेश्वरी का तबादला चीफ़ जस्टिस से उनकी शिकायत की वजह से ही हुआ है।
जस्टिस राकेश कुमार ने फ़ैसले में लिखा है कि ‘ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के दूसरे सबसे वरिष्ठ जज एन. वी. रमन्ना और जस्टिस माहेश्वरी तथा हाइकोर्ट के कुछ और जजों की एक अधिकारी के ज़रिए प्रेस कांफ्रेंस में कराई गई अनाप-शनाप आलोचना से जगन की हिम्मत बढ़ गई है। यह प्रेस कांफ्रेंस जगन के प्रमुख सचिव ने की थी।
आंध्र प्रदेश हाइकोर्ट ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट चीफ़ जस्टिस को लिखे शिकायती पत्र से मुख्यमंत्री को कामयाबी मिल सकेगी या नहीं, अभी कहा नहीं जा सकता लेकिन इतना ज़रूर है कि वह फ़ायदे की स्थिति में लग रहे हैं।
आम लोगों में यह धारणा बन सकती है कि मुख्यमंत्री के पत्र के कारण ही दोनों मुख्य न्यायाधीशों का तबादला हुआ है। इससे सीबीआई के विशेष जज के यहाँ चल रहे मुक़दमों में रुकावट आ सकती है और फि़लहाल स्थगित हो सकती है। इसी तरह आंध्र प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश के तबादले से राज्य सरकार को नाजायज फ़ायदा पहुँचेगा। यह सचाई जगज़ाहिर है कि प्रदेश की तीन राजधानियाँ बनाने का पैंतरा मुख्यमंत्री के ही दिमाग़ की उपज है जिसके लिए सरकारी ज़मीन की नीलामी पर हाइकोर्ट सख़्त एतराज़ जता चुका है।
जस्टिस राकेश कुमार ने लिखा है कि मैं मुख्य न्यायाधीशों के स्थानांतरण पर सवाब नहीं कर रहा हूँ लेकिन कुछ पारदर्शिता तो होनी ही चाहिए और न्यायिक प्रशासन की बेहतरी का ध्यान भी रखा जाना चाहिए। आखऱि जिनका तबादला किया गया है, वे भी संवैधानिक पदों पर कार्यरत हैं।
अदालत ने यह जि़क्र भी किया है कि सितम्बर में एक दिन में ही पुलिस ने जगन पर चल रहे आपराधिक मामलों में से 7-8 में यह कहकर फ़ाइनल रिपोर्ट लगा दी कि वे सब केस झूठे हैं।
यह ऐतिहासिक फ़ैसला है जो पेंट उतरने से भी आगे के अश्लील हो रहे हालात को उजागर करता है और जनता को सावधान करने वाला एक ख़तरनाक संदेश पहुँचाता है।
-गिरीश मालवीय
हरियाणा-पंजाब-राजस्थान के किसान दिल्ली की सीमाओं पर जिन कानूनों का विरोध कर रहे हैं उनमें तीन किसान बिलों के अलावा बिजली बिल से जुड़ा मुद्दा सबसे अहम है जिसके बारे अन्य प्रदेशों के किसानों को ठीक से जानकारी नहीं है। यदि वह सही तरीके से बिजली बिल वाला मुद्दे को समझ लेंगे तो वह भी अपने किसान भाइयों के साथ आकर खड़े हो जाएंगे!
किसान आंदोलन से जुड़े नेताओं ने मोदी सरकार से बिजली संशोधन विधेयक 2020 को खत्म करने की भी मांग की है। दरअसल, इस विधेयक में कहा गया है कि क्रॉस सब्सिडी को खत्म किया जाए और किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी का भुगतान उनके खाते में किया जाएगा। जिसका मतलब है कि किसानों को पहले पूरा बिजली बिल देना होगा, इसके बाद उनके खाते में सरकार की ओर से सब्सिडी का भुगतान किया जाएगा।
क्रॉस सबसिडी को समझना बेहद जरूरी है। ‘क्रॉस सब्सिडी का अर्थ है उन लोगों और संगठनों को ऊंची कीमत पर बिजली बेचना जिनकी हैसियत अच्छी है और यहां से हुई कमाई के जरिए उन लोगों की बिजली की दर को कम करना जिनकी हैसियत कमजोर है। जैसे औद्योगिक क्षेत्र में बिजली की दर ऊंची रखकर किसानी क्षेत्र में बिजली की दर कम करना। अगर एक बार क्रॉस सब्सिडी की व्यवस्था खत्म हुई तो किसानों के लिए बिजली के दाम महंगे होना तय है।
क्रॉस सब्सिडी की व्यवस्था अब तक यह सुनिश्चित करती हैं कि देश में किसानों को बढ़ती बिजली की लागत का अधिक प्रभाव न पड़े लेकिन इसके खत्म होते ही खेती करना बेतहाशा महंगा हो जाएगा।
सरकार कह रही है कि वह डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के जरिए किसानों के खाते में सब्सिडी पहुंचा देगी। जैसे वह रुक्कत्र में कर रही है लेकिन जरा सोचिए अगर एक किसान के पास बिजली का बिल ही दस से 12 हजार रुपये का आएगा तो बाद में मिलने वाली सब्सिडी का क्या मतलब रह जाएगा? वो पहले ये पैसा भरेगा कैसे?
वैसे भी किसान को अपनी फसल के लिए सब्सिडी वाली बिजली नहीं चाहिए, उसे सिर्फ पानी चाहिए। अगर सरकार पानी उपलब्ध करा दे तो किसान कभी भी सस्ती बिजली की मांग नहीं करेगा!
इस कृषि कानूनों ओर साथ ही ऐसे बिजली बिल में ऐसे अमेंडमेंट को पास करना सरकार की असली मंशा को दर्शाता है कि मोदी सरकार का असल मकसद किसानों को खेती से दूर करना है, ताकि कॉरपोरेट समूह ही खेती करें। और खाद्य पदार्थ महंगे से महंगे होते जाए
अच्छी बात यह है कि देश का किसान धीरे धीरे इन सब बातों को समझने लगा है। कल उत्तरप्रदेश के अवध के बाराबंकी में किसानों का दिल्ली किसान आंदोलन के पक्ष में विशाल धरना-प्रदर्शन आयोजित किया जा रहा है। ऐसे ही देश भर में किसानों का इन बिलों के विरुद्ध खड़ा होना बेहद जरूरी है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सरकार और किसान नेताओं के बीच अब जो बातचीत होने वाली है, मुझे लगता है कि यह आखिरी बातचीत होगी। या तो सारा मामला हल हो जाएगा या फिर यह दोनों तरफ से तूल पकड़ेगा। धरना देनेवाले पंजाब और हरयाणा के किसान काफी दमदार, मालदार और समझदार हैं और सरकार भी अपनी ओर से किसानों का गुस्सा मोल नहीं ले सकती है।
60-70 करोड़ लोगों को कुपित करनेवाली सरकार को दो-चार अडानी-अंबानी नहीं बचा सकते। सरकार उनसे नोट तो ले सकती है लेकिन वे इसे वोट कहां से लाकर देंगे ? इसीलिए 30 दिसंबर की इस वार्ता को सफल होना ही चाहिए। इस संबंध में मेरे कुछ सुझाव हैं। दोनों पक्ष उन पर विचार कर सकते हैं।
पहला, खेती मूलत: राज्यों का विषय है। संविधान की धारा 246 में यह स्पष्ट कहा गया है। ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार राज्यों को (पंजाब, हरियाणा आदि) छूट क्यों नहीं दे देती ? जिन राज्यों को ये तीनों कानून लागू करना हो, वे करें, जिन्हें न करना हो, वे न करें। वे खुद तय करें कि उनका फायदा किसमें हैं ?
दूसरा, देश के 94 प्रतिशत किसान एमएसपी की दया पर निर्भर नहीं हैं। केंद्र सरकार चाहे तो सिर्फ 23 चीज़ों के ही क्यों, केरल सरकार की तरह दर्जनों अनाजों, फलों और सब्जियों के भी न्यूनतम मूल्य घोषित कर सकती है। उन्हें वह खरीदे ही यह जरुरी नहीं है। इसीलिए इन कृषि-कानूनों की जरुरत ही क्या है ? तीसरा, किसान अपना माल खुले बाजार में खुद बेचते हैं। उन्हें इन सरकारी कानूनों से कोई फायदा या नुकसान नहीं है। ये किसान अपनी खेती और जमीन अभी भी ठेके पर देने के लिए मुक्त हैं। ये कानून बनाकर सरकार फिजूल का सिरदर्द क्यों मोल ले रही हैं?
चौथा, उपज के भंडारण की सीमा हटाना ठीक नहीं मालूम पड़ता है। इससे बड़े पूंजीपतियों को लूटपाट की खुली छूट देने का शक पैदा होता है। भंडारण की सीमा लगाने का अधिकार सरकार को अपने हाथ में रखना चाहिए। पांचवाँ, यदि कृषि-कानूनों को सरकार अपनी इज्जत का सवाल बनाए बैठी है तो इन छह प्रतिशत मालदार किसानों की टक्कर में वह 94 प्रतिशत छोटे किसानों के समानांतर धरने देश में जगह-जगह क्यों नहीं आयोजित कर सकती है? जरा करके दिखाए !
(नया इंडिया की अनुमति से)
कृषि कानूनों और इसके किसानों पर पडऩे वाले दुष्प्रभावों पर अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव हन्नान मोल्ला ने भारतीय मुद्राएं को एक साक्षात्कार दिया है। वे सरकार के साथ वार्ता कर रहे किसान संगठनों के प्रतिनिधिमंडल में भी शामिल हैं। इस साक्षात्कार का हिंदी भावानुवाद-
हाल ही में पारित नए विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर किसान पिछले एक माह से विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। सरकार द्वारा इस आंदोलन को खत्म करने के सभी प्रयास विफल हो गए हैं, क्योंकि आंदोलनरत किसान इन कानूनों की वापसी से कम पर मानने के लिए तैयार नहीं हैं। वास्तव में, भयंकर शीत लहर के बावजूद सीमाओं पर स्थित प्रदर्शन स्थलों पर उनकी संख्या हर रोज बढ़ रही है। 24 दिसंबर को केंद्र ने विरोध कर रहे किसानों को पत्र लिखा है और कहा है कि वह सभी मुद्दों पर बातचीत करने के लिए तैयार है। सरकार का यह जवाब किसान संगठनों द्वारा बातचीत के लिए ठोस प्रस्ताव रखे जाने की मांग करने के अगले दिन ही आ गया है।
यह गतिरोध कब खत्म होगा? इसका हल क्या है? नए कृषि कानूनों का किसानों पर पडऩे वाले प्रभावों और किसानों के विरोध को जानने-समझने के लिए इंडियन करेंट्स के लिए अनुज ग्रोवर ने अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) के महासचिव *हन्नान मोल्ला* से बात की है, जिनका कहना है कि किसानों का यह प्रतिरोध आजादी के बाद से अब तक का सबसे ज्यादा अनुशासित, लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण आंदोलन है।
उनका कहना है कि यह आंदोलन किसानों द्वारा किसानों के लिए चलाया जा रहा आंदोलन है, जिसकी एक ‘धर्मनिरपेक्ष’ पहचान है। वरिष्ठ किसान नेता ने सरकार पर अलोकतांत्रिक और फासीवादी होने का आरोप लगाया है। ‘ये कानून उनके (किसानों के) अस्तित्व के लिए चुनौती है’, यह बताते हुए मोल्ला कहते हैं कि किसानों के पास तब तक विरोध करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, जब तक कि इन कानूनों को सरकार खत्म नहीं करती।
‘किसानों ने इन कानूनों में संशोधन के केंद्र सरकार के प्रस्ताव को यह कहते हुए ठुकरा दिया है कि इससे ये कृषि कानून और मजबूत होंगे। केंद्र सरकार को किसानों ने जो जवाब दिया है, उसमें एक प्रमुख बिंदु ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का है, जो बहुत महत्वपूर्ण है।’
‘हम पिछले चार सालों से ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की मांग कर रहे हैं। वर्तमान एमएसपी एक धोखा है। वर्तमान एमएसपी के दायरे में देश के केवल 6 प्रतिशथ किसान ही आते हैं। 94 प्रतिशत किसानों को एमएसपी नहीं मिलता। अधिकांश फसलों को एमएसपी की श्रेणी में ही नहीं रखा गया है। पंजाब और हरियाणा को छोडक़र, किसानों को कहीं भी एमएसपी के अनुसार भुगतान नहीं मिलता। किसानों को अभी वास्तविक एमएसपी का केवल एक-तिहाई ही मिल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार कहा है कि एमएसपी जारी रहेगी, लेकिन कोई भी एमएसपी की वर्तमान प्रणाली नहीं चाहता।
क्या आप ज्यादा एमएसपी के अर्थ को समझा सकते हैं?
प्रख्यात कृषि विशेषज्ञ एम एस स्वामीनाथन ने सी-2 + 50 प्रतिशत फार्मूला (लागत + 50 प्रतिशत समर्थन मूल्य देने) की सिफारिश की है, जबकि वर्तमान एमएसपी ए-2+ एफएल (फैमिली लेबर : परिवार का श्रम, जिसका भुगतान नहीं किया जाता) पर आधारित है। यह फार्मूला वास्तविक खर्च और पारिवारिक श्रम के अनुमानित लागत को ही समेटता है। मनमोहन सिंह की सरकार ने ए-2 + एफएल के फार्मूले को स्वीकार किया था। मोदी सरकार इसका ही अनुसरण कर रही है। लेकिन इस फार्मूले को भी केवल पंजाब और हरियाणा में ही लागू किया जा रहा है। उन लोगों के लिए कोई सजा नहीं है, जो इस वर्तमान फार्मूले से भी कम भाव पर फसल खरीद रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस गतिरोध को तोडऩे के लिए सरकार और किसान संगठनों के प्रतिनिधियों को लेकर कोई कमेटी बनाई जा सकती है। आपके विचार?
सुप्रीम कोर्ट को सरकार से कहना चाहिए कि जब तक इस समस्या का कोई हल नहीं निकल जाता, तब तक वह इन कानूनों का क्रियान्वयन स्थगित रखें। हम किसी कमेटी गठन के पक्ष में नहीं है। स्वामीनाथन कमेटी की ओर देखिए, जिसने काफी पहले 2006 में अपनी सिफारिशें दी थी, लेकिन आज तक उसे लागू नहीं किया गया है। किसी भी कमेटी का गठन मुद्दों को अनिश्चितकाल तक लटकाए रखेगा। देश के किसान समुदाय के लिए ये तीन कृषि कानून मौत का परवाना है। ये कानून किसानों से खेती-किसानी छीन लेंगे और इसे कार्पोरेटों को सौंप देंगे।
कानूनों में संशोधन करने के सरकार के प्रस्ताव पर आपकी क्या आपत्तियां हैं?
इन कानूनों में संशोधन करने मात्र से इनके उद्देश्यों में बदलाव नहीं आएगा। इन कानूनों का उद्देश्य अडानी और अंबानी के हाथों में खेलना है, जिन्होंने पहले ही भंडारण के लिए बड़े-बड़े गोदाम बनवा लिए हैं। इन कानूनों के क्रियान्वयन के बाद वे कृषि उत्पादों की सट्टाबाजारी शुरू कर देंगे। वे भारतीय खाद्य निगम को बर्बाद कर देंगे। आम जनता जिस कीमत पर आज खरीद रही है, उससे कई गुना ज्यादा कीमत पर खरीदने के लिए बाध्य हो जाएगी।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के भारत मे अधिशासी निदेशक सुरजीत भल्ला ने एक साक्षात्कार में कहा है कि इन कानूनों से सभी किसानों को फायदा पहुंचेगा, केवल चंद किसानों को नहीं।
यह सही नहीं है। जिन बुद्धिजीवियों को कार्पोरेटों से तनख्वाह मिलती है, वे कार्पोरेटों के पक्ष में बात करेंगे, न कि गरीबों और आम जनता के पक्ष में। वे इन कानूनों के खिलाफ हमारी लड़ाई में मददगार नहीं हो सकते।
श्री भल्ला ने किसानों के आंदोलन को मात्र विवाद पैदा करने वाला बताया है और कहा है कि ये कानून 1991 के कृषि सुधारों जितना ही महत्व रखते हैं। आपकी प्रतिक्रिया?
यह मत भूलिए कि 1991 के सुधारों के कारण पांच लाख किसानों को आत्महत्या करनी पड़ी है। हर रोज औसतन 52 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। हम कॉर्पोरेट दलालों का कहा मानकर मरने के लिए तैयार नहीं है। ये कानून कृषि को बर्बाद कर देंगे।
कौशिक बसु भारत के श्रेष्ठ अर्थशास्त्रियों में से एक हैं, जिन्होंने नए कृषि कानूनों को ‘दोषपूर्ण’ और ‘किसानों के लिए नुकसानदेह’ बताते हुए आलोचना की है। ये वही बसु हैं, जो संप्रग सरकार के समय भारत के प्रमुख आर्थिक सलाहकार थे और जिन्होंने ऐसे ही सुधारों का पक्ष लिया था, हालांकि वर्तमान सुधार ठीक वैसे ही सुधार नहीं है।*
अंतत: वे इन कानूनों के दुष्परिणामों को समझ पाए हैं, भले ही इसमें उन्हें देर लगी है। जब आप किसानों के बारे में नीतियां तय करते हैं, तो आपको किसानों को केंद्र में रखना होगा। लेकिन इस सरकार ने किसानों को परिधि पर रखा है और मुनाफा, बाजार, आयात-निर्यात को केंद्र में रखा है। यह सरकार कृषि के क्षेत्र को कार्पोरेट घरानों को सौंपना चाहती हैं। बिना किसी दंडनीय कार्यवाही के सट्टेबाजी को बढ़ावा मिलेगा। जिनके पास ज्यादा भंडारण क्षमता होगी, उनका एकाधिकार स्थापित होगा।
अब आपकी मांगें क्या हैं?
जनता की संसद में हमने दो विधेयक तैयार किये हैं। ये विधेयक लोकसभा और राज्य सभा में निजी सदस्य के रूप में पेश किए गए थे। ये विधेयक थे- किसानों को ऋणग्रस्तता से मुक्त करने संबंधी विधेयक, 2018 तथा किसानों को कृषि उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य पाने का अधिकार संबंधी विधेयक, 2018। हमने सरकार से अनुरोध किया था कि वह इन पर ध्यान दें, लेकिन उसने कुछ नहीं किया। दो सालों के बाद, इस सरकार ने तीन अध्यादेश जारी किए, जो इस देश के किसानों को बर्बाद कर देंगे। भारत में कृषि जीवन जीने का तरीका है। इसलिए, ये नीतियां हमारे देश की विशेष परिस्थितियों के अनुकूल होना चाहिए। लेकिन यह सरकार आईएमएफ के निर्देशों पर चल रही है। सरकार को किसानों की भलाई के लिए सुधारों को लाना चाहिए, न कि उनके विनाश के लिए।
-डॉ. परिवेश मिश्रा
8 दिसम्बर 2020 के दिन आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में भारत बंद आयोजित था। दोपहर होते तक भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने किसानों को बातचीत का निमंत्रण भेज दिया।
लेकिन यह निमंत्रण किसी हल की तलाश की अपेक्षा ‘संदेश’ देने की नीयत से भेजा गया था यह दो बातों से स्पष्ट हुआ। एक तो पूरे किसान प्रतिनिधिमंडल को न बुलाकर चुने हुए लोगों को निमंत्रण दिया गया। संदेश था-फूट डालने के प्रयास का विकल्प हमारे पास है। लेकिन दूसरा संदेश, बहुत गूढ़ और महत्वपूर्ण, मीटिंग स्थल के नयन के साथ नत्थी होकर आया।
शुरुआत में बताया गया था बैठक शाम सात बजे गृहमंत्री के निवास में होगी। अंत समय में पता चला स्थान परिवर्तन हो गया है, किन्तु नया स्थान कौन सा है इसको लेकर स्पष्टता नहीं थी। कुछ किसान समूह विज्ञान भवन गए जहां इससे पहले तक मंत्रियों के साथ बैठकें हो रही थीं। कुछ नॉर्थ ब्लॉक स्थित गृह मंत्रालय की ओर गए तो कुछ एक और संभावित स्थल हैदराबाद हाउस की ओर। अंतत: बैठक विलंब से प्रारंभ हो सकी।
जब सारे लोगों को अमित शाह की पसंद की ‘वेन्यू’ में पहुंचाया गया। इस वेन्यू का इतिहास और जड़ कार्पोरेट (ईस्ट इंडिया कम्पनी) के हाथों भारत के किसानों के हुए शोषण और तबाही की याद दिलाता है। हमारे लिए यह इतिहास जानना ज़रूरी है। भारतीय किसान का शोषण करने की दिशा में शासन और कार्पोरेट के बीच के गठजोड़ और दोनों के बीच की जुगलबंदी का इससे बड़ा उदाहरण नहीं है।
मीटिंग जहां की गई उस स्थल का लंबा औपचारिक नाम था (है)-इंडियन काऊंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च। लेकिन आम आदमी इसे ‘पूसा इंस्टीट्यूट’ या बस ‘पूसा’ के प्रचलित नाम से जानता है। भारत में कृषि से जुड़ा आमतौर पर हर व्यक्ति पूसा से परिचित है।
मजे की बात यह है कि पूसा नाम का न तो यहां कोई गांव था न यह किसी व्यक्ति का नाम था। पूसा शब्द दरअसल एक बड़े नाम का संक्षिप्त रूप है। जैसे न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी के अंग्रेज़ी के पहले अक्षरों को मिलाकर बना शब्द ‘नॉएडा’; या नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेन्सी इलाके के लिए उपयोग किया जाने वाला शब्द ‘नेफा’। (1972 में इसका नाम अरुणाचल राज्य रखा गया और नेफा इतिहास का भाग बना)
पूसा की अंग्रेजी स्पेलिंग के चार अक्षरों को पूरा लिखा जाये तो बनेगा- फिप्स (ऑफ) यूनाइटेड स्टेट (ऑफ) अमेरिका।
आइये जानें कौन थे फिप्स और क्या थी कहानी जो पूसा को भारतीय कृषि इतिहास का अभिन्न हिस्सा बना गई।
ईस्ट इंडिया कम्पनी ने किसानों को जमीन का मालिकाना हक अवश्य दिया पर टैक्स में बेइंतिहा बढ़ोत्तरी कर दी। अधिक आमदनी के लालच (या दबाव) ने किसानों को नील, अफीम, कपास, चाय और कॉफी जैसी नगद फसल उगाने के लिए मजबूर किया। उत्पादन वृद्धि में मदद के नाम पर नहरों का जाल बिछाया गया। पर टैक्स में वृद्धि और अधिक हो गई। खेतों में उत्पादन कम हुआ और बाद में खेत की मिट्टी अनाज उत्पादन के लायक नहीं बची। उधर अनाज उत्पादन के लिए पर्याप्त खेत भी नहीं बचे थे।
अकाल पडऩा शुरू हो गए, भुखमरी के कारण बड़ी संख्या में किसान और ग्रामीण मरने लगे। किन्तु कम्पनी (और 1860 के बाद ब्रिटिश सरकार) का सारा ध्यान उत्पादन बढ़ाने की ओर था।
बिहार के दरभंगा जि़ले में एक बहुत बड़ा इलाका कम्पनी के कब्ज़े में था। शुरू में कई वर्षों तक इस स्थान का उपयोग कम्पनी की फौज के लिए उन्नत नस्ल के घोड़ों के स्टड फार्म के रूप में किया गया। स्टड फार्म चला और बंद हो गया। खाली पड़ी जमीन को 1878 में इंग्लैंड की एक कम्पनी ने तम्बाखू उत्पादन के लिए लीज़ पर लिया तब पहली बार इस एस्टेट का साईज़ रिकॉर्ड में दर्ज हुआ-1350 एकड़। तम्बाखू कारोबार जम नहीं पाया तो कम्पनी ने 1897 में यह स्थान खाली कर दिया।
दो वर्षों के बाद वर्ष वायसराय के रूप में लॉर्ड कजऱ्न ने कार्यभार संभाला। कजऱ्न ने भारतीय पुरातत्व के संरक्षण के लिए बहुत महत्वपूर्ण कार्य किए। लावारिस पड़े ताजमहल को सरकारी संरक्षण देना उनमें शामिल है। सांची, सारनाथ, तक्षशिला आदि में उत्खनन जैसे और भी काम किए। लेकिन इतिहास बहुत क्रूर होता है। शासक लाख अच्छे काम करे इतिहास उसे उसी काम के लिए याद रखता है जिसके विरोध में जनता सडक़ पर उतर आती है।
अपने शासन के छह साल पूरे होने पर आत्मविश्वास से भरे कजऱ्न ने बंगाल का विभाजन कर पूर्वी बंगाल और असम के नए प्रांत बना दिए। जनता विरोध में सडक़ों पर उतर आई। सरकार संशोधन का विकल्प सुझाती रही। जनता नहीं मानी। विरोध जारी रहा। अंतत: सरकार को झुकना पड़ा और कानून वापस हुआ। लेकिन वापस चलते हैं और कजऱ्न के काल की उस घटना की ओर जिसका संबंध इस कहानी से है।
कजऱ्न का काल वह दौर था जब अंग्रेज़ प्रशासकों पर भारत की कृषि व्यवस्था को लेकर दोतरफा दबाव था। लंदन से दबाव था कि कृषि व्यापार से प्राप्त होने वाले राजस्व में बढ़ोत्तरी की जाए। साथ ही योरप में हो रहे औद्योगिक विकास के कारण कपास जैसे ‘रॉ-मटीरियल’ की सप्लाय बढ़ाने का दबाव था। दूसरी तरफ योरप के उन व्यवसायियों (आज की भाषा में कार्पोरेट घरानों) का दबाव था जो ब्रिटिश सरकार के दिखाए सपनों पर विश्वास कर भारत के कृषि क्षेत्र में अपना निवेश बहुत बढ़ा चुके थे किन्तु अब उम्मीद के अनुपात में कम होते लाभ को लेकर आक्रोशित थे।
कृषि क्षेत्र में उत्पादन और अधिक चाहिए था, लाभ और अधिक चाहिए था और कजऱ्न के सामने यह लक्ष्य हासिल करना सबसे बड़ी चुनौती थी।
लॉर्ड कजऱ्न का विवाह जर्मन मूल की अमरीकी महिला मेरी विक्टोरिया लीटर के साथ हुआ था। मेरी विक्टोरिया, जो विवाह के बाद बैरोनेस कजऱ्न के रूप में जानी गईं, के पिता की गिनती अमेरिका के सबसे धनाढ्य व्यक्तियों में होती थी। इनके घनिष्ठ मित्र थे शिकागो के रहने वाले हेनरी फिप्स। ये दोनों अपने तीसरे मित्र ऐन्ड्रयू कार्नेगी के स्टील उद्योग में बड़े निवेशक थे ।
अमरीकी पूंजीवादी व्यवस्था में प्रचलित कानून के अनुसार यदि उद्योगपति अपने मुनाफे की राशि को घर में या बैंक में रखने की बजाए ऐसे उद्यमों या प्रयोजनों के लिये दान करता है जो आगे चलकर उद्योग को और अधिक मुनाफा दिलाने का माद्दा रखते हो तो ऐसे दान पर उसे टैक्स आदि में भारी छूट दी जाती है। इस नीति ने अमेरिका में रॉकफैलर से लेकर बिल गेट्स तक अनेक दानदाता पैदा किए हैं।
हेनरी फिप्स के मित्र की बेटी का विवाह भारत के सबसे शक्तिशाली अधिकारी के साथ हुआ तो फिप्स भी अपने लिए संभावनाओं की तलाश में भारत पहुंचे और लॉर्ड कजऱ्न के मेहमान के रूप में रुके। यहां की व्यावसायिक संभावनाओं ने फिप्स को आकर्षित किया और उन्होंने तीस हज़ार डॉलर का दान दिया। घोषणा हुई कि इसका उपयोग ब्रिटिश भारत में फसलों का उत्पादन और कृषि क्षेत्र से मुनाफा बढ़ाने के तरीके ढूंढऩे (रिसर्च) के लिए किया जाएगा। जो इसे विकास की ओर कदम न मानें उनके शब्दों में ‘निचोड़ ली गई किसानी से और अधिक रस प्राप्त करने के तरीके ढूँढे जाएंगे’।
स्थान के रूप में चयन किया गया वही दरभंगा का 1350 एकड़ का एस्टेट जो टोबैको कम्पनी के जाने के बाद से वीरान पड़ा था। इस स्थान पर 1 अप्रेल 1905 के दिन लॉर्ड कजऱ्न ने कृषि रिसर्च के लिए एक संस्थान के भवन का शिलान्यास किया। भवन के डिज़ाइन को लेकर कजऱ्न मुतमईन नहीं थे। वे चाहते थे विशेषज्ञों से सलाह मशविरा कर लिया जाए। किन्तु जल्द-से-जल्द लाभ-प्राप्ति के लिए आतुर बैठे ब्रिटिश उद्योगपतियों के दबाव में सब काम रिकॉर्ड गति से हुआ। दान की राशि का मूल्य 45 लाख रुपयों के बराबर था। शिलान्यास भी हुआ और देखते-देखते इमारत के साथ कैम्पस भी खड़ा हो गया।
अब तक चले आ रहे बेनाम एस्टेट का पहली बार नामकरण हुआ- फिप्स (क्कद्धद्बश्चश्चह्य) ऑफ यू.एस.ए. के नाम पर-पूसा। संस्था का नाम हुआ इम्पीरियल एग्रीकल्चरल रिसर्च इन्स्टीट्यूट।
15 जनवरी 1934 के दिन भूकंप आया और समूची विशाल इमारत भर-भराकर ध्वस्त हो गई। अब तलाश शुरु हुई नए स्थान की। तीन साल पहले ही भारत की राजधानी के रूप में नई दिल्ली का उद्घाटन हुआ था।
भारत की बड़ी समाचार एजेंसी ए एनआई के संस्थापक प्रेम प्रकाश की लिखी पुस्तक ‘रिपोर्टिंग इंडिया’ इसी माह प्रकाशित हुई है। सन् चालीस के दशक की दिल्ली का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं कि करोल बाग के आसपास का इलाका वीरान था, रहने योग्य नहीं था।
अपेक्षाकृत छोटे वृक्षों वाले घने जंगल थे जिन्हे आज भी ‘रिज’ के नाम से जाना जाता है।
1935 में इसी रिज का विशाल इलाका चुना गया और दरभंगा के मलबे से उठकर पूसा इंस्टीट्यूट दिल्ली पहुंचा दिया गया। आठ दिसम्बर 2020 को कृषि क्षेत्र में कॉरपोरेट घरानों की घुसपैठ कराने में सरकार की भूमिका पर संदेह करते हुए जब किसानों ने ‘भारत बंद’ का आह्वान किया तो दिल्ली में उपलब्ध सारे विकल्पों को छोडक़र गृह मंत्री ने उनसे बातचीत के लिए यही स्थान चुना।
अमित शाह का निर्णय महज़ संयोग था या प्रयोग यह बाकी लोगों के लिए अनुमान का विषय है।
-गिरीश मालवीय
ये सच है बिल गेट्स ने कोरोना वायरस नहीं फैलाया लेकिन कोरोना वायरस का भय फैलाने में बिल गेट्स की महती भूमिका है और समस्या कोरोना वायरस नहीं है उसका भय ही है। मैं अप्रैल 2020 से ही कोरोना वायरस के संदर्भ बिल गेट्स की भूमिका पर उंगली उठा रहा हूँ लेकिन जैसे इस देश में मोदी भक्त पैदा हुए हैं वैसे ही बिल गेट्स के भक्त पैदा हो गए हैं। इनमें बुद्धिजीवियों की संख्या बहुतायत में है कोरोना के संदर्भ में आप बिल गेट्स का जैसे ही नाम लो वो आप पर कॉन्सपिरेसी थ्योरिस्ट का ठप्पा ठोक देंगे, वे बिल गेट्स के खिलाफ कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं है उन्हें लगता है कि बिल गेट्स महान परोपकारी ओर विश्व का सबसे बड़ा दूरदृष्टा है
टाइम मैगजीन की इस खबर में बिल गेट्स स्वीकार कर रहे हैं कि जो तकनीक फाइजर ओर मोडर्ना अपनी वैक्सीन में इस्तेमाल कर रही हैं यानी मेसेंजर आरएनए तकनीक उसके विकास में उनके फाउंडेशन की महत्वपूर्ण भूमिका है, साथ ही वह सीरम इंस्टीट्यूट की एस्ट्राजेन्का कम्पनी द्वारा बनाई गई वैक्सीन में भी बड़े पैमाने पर धन लगा चुके हैं।
अगर आप ध्यान से देखें तो पूरे विश्व में इन्हीं तीन वैक्सीन को इमरजेंसी अप्रूवल मिला है, और इन तीनों वैक्सीन का बिल गेट्स से सीधा संबंध है। यही बात मैं शुरू से लिख रहा था कि बिल गेट्स वैक्सीन इंडस्ट्री के कोलम्बस है।
अब वह चाहते हैं कि दुनिया की 70 फीसदी आबादी को उनकी बनाई वैक्सीन ठुकवा दी जाए और जैसे नरेंद्र मोदी भारत जैसे बड़े देश में उनके परम सहयोगी बने हुए वैसे ही अन्य देशों की सरकारें में उनके पिठ्ठू बड़े पैमाने पर मौजूद हैं। जिनकी मदद से वह अपनी इस योजना को कामयाब बनाने के लिए तत्पर है
और सच तो यह है कि डब्ल्यूएचओ उनकी जेब में बैठा हुआ है क्योंकि अमेरिका यूरोप कुल मिलाकर डब्ल्यूएचओ को जितना सालाना फंड देते हैं उससे कहीं ज्यादा बिल गेट्स और उससे जुड़े हुए संगठन डब्ल्यूएचओ को फंडिंग कर रहे हैं, इसके चीफ दरअसल बिल गेट्स के पपेट की तरह व्यवहार कर रहे हैं।
बहुत से लोग पूछेंगे कि आखिर बिल गेट्स को इससे फायदा क्या हो रहा है पिछले एक साल में अगर आप ध्यान से दुनिया के 10 सबसे बड़े पूंजीपतियों की लिस्ट देखेंगे तो आप। जान जाएंगे कि आपकी ओर हमारी जेब मे आने वाला पैसा किन लोगों के पास जाकर जमा हो रहा है। ये वो लोग हैं जिन्होंने इस कोरोना काल में इंटरनेट और नई तकनीक का सबसे बेहतर ढंग से इस्तेमाल किया है। ये है अमेजन के जेफ बेजोस, फेसबुक के जुकरबर्ग गूगल के लैरी पेज जैसे लोग इन पूंजीपतियों में बिल गेट्स भी शामिल हैं। यह सब अपनी कंपनियों के माध्यम से और मीडिया में अपनी फंडिंग ओर होल्डिंग के सहारे से साल भर कोरोना के भय को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने में कामयाब रहे हैं और आज भी हो रहे हैं।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
नेपाल भारत का परम पड़ोसी है। वहां जबर्दस्त उठापटक चल रही है। प्रतिनिधि सभा (लोकसभा) भंग कर दी गई है। कम्युनिस्ट पार्टी के प्रचंड-खेमे और ओली खेमे में सत्ता की होड़ लगी हुई है लेकिन भारत ने चुप की दहाड़ लगा रखी है और चीन अपनी बीन बजाए चला जा रहा है। ऐसा नहीं है कि भारत हाथ पर हाथ धरे बैठा हुआ है। उसके सेनापति और विदेश सचिव अभी कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री के.पी. ओली से मिल आए थे।
काठमांडो में उनका स्वागत गर्मजोशी से हुआ था और ओली के भारत-विरोधी रुख में कुछ नरमी भी दिखाई पड़ी थी। हमारे राजदूत ने भी ओली से भेंट के बाद भारत आकर सरकार को सारी स्थिति से अवगत कराया था लेकिन हम जऱा देखें कि चीन की महिला राजदूत हाउ यांकी काठमांडो में कितनी अधिक सक्रिय हैं। वे प्रचंड और ओली से दर्जनों बार मिल चुकी हैं। दोनों पार्टियों के छोटे-मोटे नेता तो यांकी से मिलने के लिए चीनी दूतावास में लाइन लगाए रखते हैं।
यांकी की हजारों कोशिशों के बावजूद अब जबकि नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी में दरार पड़ गई है, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के उप-मंत्री गुओ येचाऊ अब चार दिन के लिए काठमांडो पहुंच गए हैं। उनकी कोशिश होगी कि वे दोनों खेमों में सुलह करवा दें लेकिन भंग हुई संसद को अब वे कैसे लौटा पाएंगे ? क्या नेपाल का सर्वोच्च न्यायालय उसे पुनर्जीवित कर सकेगा?
यदि संसद फिर से जीवित हो गई, तब भी दोनों खेमों के बीच झगड़ा कैसे खत्म होगा? जो भी हो, हमारी चिंता का विषय यह है कि इस मामले में भारत की भूमिका नगण्य क्यों हो गई है? यह ठीक है कि चीन नेपाल को तिब्बत से जोडऩे के लिए रेल लाइन बिछा रहा है। रेशम महापथ के लिए वह 2.5 बिलियन डालर भी दे रहा है और आठ करोड़ डालर की फौजी सहायता भी नेपाल को दी जाएगी। चीनी और नेपाली सेनाएँ पिछले दो-तीन साल से संयुक्त सैन्य-अभ्यास भी कर रही हैं।
चीन नेपाल को अपने तीन बंदरगाहों के इस्तेमाल की सुविधा भी दे रहा है ताकि भारत पर उसकी निर्भरता कम हो जाए। भारत की भाजपा सरकार बेबस मालूम पड़ रही है। उसके पास ऐसे अनुभवी लोग नहीं है, जो बिना प्रचार के नेपाली कम्युनिस्ट नेताओं से मिल सकें और भारत की भूमिका को मजबूत कर सकें। हमारी भाजपा सरकार अपने नौकरशाहों पर निर्भर है। नौकरशाहों और राजनयिकों की अपनी सीमाएँ हैं।
वे ज्यादा सक्रिय दिखेंगे तो उसे आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप माना जाएगा।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-डॉ राजू पाण्डेय
प्रधानमंत्रीजी ने स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की जयंती पर कुछ चुनिंदा राज्यों के किसानों को संबोधित किया। इस बार भी वे आंदोलनरत किसानों से प्रत्यक्ष संवाद करने का साहस नहीं जुटा पाए। जो भी हो यह संबोधन बहुप्रतीक्षित था। किसानों के राष्ट्रव्यापी जन प्रतिरोध के मद्देनजर सबको यह आशा थी कि प्रधानमंत्री किसी सकारात्मक पहल के साथ सामने आएंगे। आदरणीय मोदी जी देश के 135 करोड़ लोगों के प्रधानमंत्री हैं। देश की आबादी के 60-70 प्रतिशत हिस्से की आजीविका कृषि क्षेत्र पर निर्भर है और यह स्वाभाविक था कि कृषि सुधारों से उपजी आशंकाओं के मध्य प्रधानमंत्री जी का भाषण बहुत ध्यान से सुना गया।
आदरणीय मोदीजी बोले तो अवश्य किंतु उनके लंबे भाषण में प्रधानमंत्री को तलाश पाना कठिन था। कभी वे किसी कॉरपोरेट घराने के कठोर मालिक की तरह नजर आते जो अपने श्रमिकों की हड़ताल से नाराज है ; हड़तालों से निपटने का उसका अपना अंदाज है जिसमें लोकतंत्र का पुट बहुत कम है। वह हड़तालियों की मांगों को सिरे से खारिज कर देता है, उन पर प्रत्याक्रमण करता है और फिर बड़े गर्वीले स्वर में कहता है कि तुम मेरे सामने बैठकर मुझसे बात कर रहे हो क्या यह तुम्हारी कम बड़ी उपलब्धि है। तुम कितने किस्मत वाले हो कि मैंने अभी तक तुम्हें नुकसान नहीं पहुंचाया है, तुम पर कोई कार्रवाई नहीं की है।
कभी वे सत्ता को साधने में लगे किसी ऐसे राजनेता की भांति दिखाई देते जो हर अवसर का उपयोग चुनावी राजनीति के लिए करता है। उनके भाषण का एक बड़ा भाग बंगाल की राजनीति पर केंद्रित था और उन्होंने बंगाल के किसानों की बदहाली के जिक्र के बहाने अपने चुनावी हित साधने की पुरजोर कोशिश की। वे बंगाल के चुनावों के प्रति इतने गंभीर थे कि उन्होंने इस संबोधन की गरिमा और गंभीरता की परवाह न करते हुए चुनावी आरोप प्रत्यारोप पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया।
कभी वे उग्र दक्षिण पंथ में विश्वास करने वाले आरएसएस के प्रशिक्षित और समर्पित कार्यकर्त्ता के रूप में दिखते- वामपंथ से जिसका स्वाभाविक बैर भाव है और वामपंथ को जड़मूल से मिटा देना जिसका पुराना संकल्प।
आदरणीय मोदीजी ने बंगाल और केरल में भूतकाल और वर्तमान में शासनरत वामपंथी सरकारों पर किसानों की उपेक्षा का आरोप लगाया। उन्होंने किसान आंदोलन के लिए भी अप्रत्यक्ष रूप से वामपंथियों को ही जिम्मेदार ठहराया और उन्होंने वामपंथियों पर किसान आंदोलन को हाईजैक करने तथा किसानों को गुमराह कर उनके बहाने अपना एजेंडा चलाने के आरोप भी लगाए। पिछले कुछ दिनों से प्रधानमंत्री जी वामपंथ पर कुछ अधिक ही हमलावर हो रहे हैं। शायद वे किसानों और मजदूरों में बढ़ती जागृति से परेशान हैं और उन्हें लगता है कि आने वाले समय में कांग्रेस नहीं बल्कि वामपंथियों से उन्हें कड़ी चुनौती मिलने वाली है। शायद बिहार चुनावों में विपक्ष को एकजुट करने में वामदलों की केंद्रीय भूमिका से वे चिंतित भी हों। यह भी संभव है कि राजनीतिक शत्रु कांग्रेस को पराभूत करने के बाद अब वे अपने वैचारिक शत्रु वामदलों पर निर्णायक वार करना चाहते हों। बहरहाल प्रधानमंत्री जी ने वामपंथ को चर्चा में तो ला ही दिया है।
आदरणीय प्रधानमंत्रीजी आंदोलनकारियों के प्रति आश्चर्यजनक रूप से संवेदनहीन नजर आए। उन्होंने इस आंदोलन को जनता द्वारा नकार दिए गए विरोधी दलों का पब्लिसिटी स्टंट बताया। किंतु अंतर केवल यह था कि विरोधी दलों से उनका संकेत इस बार कांग्रेस की ओर कम और वाम दलों की ओर अधिक था। अराजनीतिक होना इस किसान आंदोलन की सर्वप्रमुख विशेषता रही है। किसानों ने राजनीतिक दलों से स्पष्ट और पर्याप्त दूरी बनाई हुई है। ठंड का समय है, शीतलहर जारी है। अब तक आंदोलन के दौरान लगभग 40 किसान अपनी शहादत दे चुके हैं। लाखों किसान इस भीषण ठंड में अपने अस्तित्व की शांतिपूर्ण और अहिंसक लड़ाई लड़ रहे हैं। यदि आदरणीय प्रधानमंत्री जी इस दुःखद घटनाक्रम को एक पब्लिसिटी स्टंट के रूप में देख रहे हैं तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। जब सर्वोच्च पद पर आसीन कोई जन प्रतिनिधि जनता के असंतोष को एक षड्यंत्र की भांति देखने लगे तो चिंता उत्पन्न होना स्वाभाविक है।
प्रधानमंत्री जी ने फरवरी 2019 से प्रारंभ हुई पीएम किसान सम्मान निधि योजना की सातवीं क़िस्त जारी करने की एक सामान्य सी औपचारिक प्रक्रिया को एक मेगा इवेंट में बदल दिया। यदि इस मेगा इवेंट की तुलना भीषण ठंड में जारी किसानों के साहसिक और शांतिपूर्ण प्रदर्शन से की जाए तो यह सहज ही समझा जा सकता है कि पब्लिसिटी स्टंट की परिभाषा किस दृश्य से अधिक संगत लगती है।
आदरणीय प्रधानमंत्रीजी ने यह भी कहा कि किसानों के विषय पर हम हमारे विरोधियों से चर्चा करने को तैयार हैं बशर्ते यह चर्चा मुद्दों, तथ्यों और तर्क पर आधारित हो। किंतु दुर्भाग्य यह है कि आदरणीय प्रधानमंत्री जी का स्वयं का पूरा भाषण मुद्दों, तथ्यों और तर्क पर आधारित नहीं था। यह कोई चुनावी सभा नहीं थी बल्कि देश के आंदोलित अन्नदाताओं के लिए संबोधन था इसलिए यह अपेक्षा भी थी कि प्रधानमंत्री अधिक उत्तरदायित्व और गंभीरता का प्रदर्शन करेंगे।
आदरणीय मोदी जी को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की नितांत अपर्याप्त और असम्मानजनक राशि के लिए खेद व्यक्त करना चाहिए था और किसानों से यह निवेदन करना चाहिए था कि आप पूरे देश के अन्नदाता हैं, हम सब आपके ऋणी हैं। इसके बावजूद मैं आपके साथ न्याय नहीं कर पा रहा हूँ और बहुत संकोचपूर्वक यह छोटी सी राशि आपको भेंट कर रहा हूँ। किंतु उन्होंने अपनी इस चुनावी योजना का जमकर गुणगान किया। वे पहले भी इस योजना को किसानों के प्रति अपनी संवेदनशीलता और उदारता के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं। जबकि सच यह है कि यह देश के किसानों के हक का पैसा है जो बड़ी कृपणता से उन्हें दिया गया है। इतनी छोटी और असम्मानजनक राशि को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि का नाम देना ही किसानों के साथ क्रूर मजाक जैसा था किंतु जिस प्रकार इस योजना को किसानों के लिए अनुपम सौगात के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है वह और दुःखद है। यह किसान हमारे अन्नदाता हैं कोई भिक्षुक नहीं हैं। यदि भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन बिना आंकड़ों का स्रोत बताए यह दावा करते हैं कि 6000 रुपए वार्षिक सहायता छोटे और मध्यम किसान परिवारों की वार्षिक आय के छठवें हिस्से के बराबर है तब भी उससे इस बात की ही पुष्टि होती है कि हमने किसानों को कितनी दीन दशा में पहुँचा दिया है। एनएसएसओ के आंकड़ों के आधार पर अनेक विश्लेषक यह दावा करते हैं कि 6000 रुपए की मदद किसानों की वार्षिक आय के 5 प्रतिशत से भी कम है।
आदरणीय प्रधानमंत्रीजी ने अपने भाषण में पुनः यह दावा किया कि उन्होंने स्वामीनाथन आयोग की उन सिफारिशों को लागू किया जिन्हें पूर्ववर्ती सरकारों ने फ़ाइलों के ढेर में दबा दिया था। किंतु न सरकारी आंकड़े और न जमीनी हकीकत इस दावे की पुष्टि करते हैं। 4 अक्टूबर 2006 को स्वामीनाथन आयोग की पांचवीं और अंतिम रिपोर्ट आने के बाद 201 एक्शन पाइंट्स तय किए गए थे जिनके क्रियान्वयन के लिए एक अंतर मंत्रालयी समिति का गठन किया गया जिसकी अब तक आठ बैठकें हुई हैं जिनमें से केवल तीन मोदी सरकार के कार्यकाल में हुई हैं। भारत सरकार का यह दावा है कि इन 201 में से 200 सिफारिशें लागू हो चुकी हैं। सरकारी आंकड़े यह बताते हैं कि इनमें से 175 सिफारिशें यूपीए सरकार के कार्यकाल में लागू हुईं और केवल 25 सिफारिशें मोदी सरकार द्वारा लागू की गई हैं। यूपीए और एनडीए सरकारों के स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के इन दावों के विपरीत विगत 15 वर्षों में किसानों की हालत बिगड़ी है और आज वे अपने अस्तित्व की निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं।
स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट की मूल भावना यह थी कि किसानों को सी2 लागत पर डेढ़ गुना मूल्य प्राप्त होना चाहिए; जिसमें कृषि के सभी आयामों यथा उर्वरक, जल एवं बीज के मूल्य के अतिरिक्त परिवार के श्रम, स्वामित्व वाली जमीन का किराया मूल्य और निश्चित पूंजी पर ब्याज मूल्य को भी सम्मिलित किया जाए।
मोदी सरकार ने जो डेढ़ गुना एमएसपी घोषित की है वह ए2 एफएल लागत के आधार पर परिगणित है, जिसमें पट्टे पर ली गई भूमि का किराया मूल्य, सभी नकद लेन-देन और किसान द्वारा किए गए भुगतान समेत परिवार का श्रम मूल्य तो सम्मिलित किया जाता है, किंतु इसमें स्वामित्व वाली भूमि का किराया मूल्य और निश्चित पूंजी पर ब्याज मूल्य शामिल नहीं होता है।
स्वाभाविक है कि इस प्रकार एमएसपी की गणना करने से जो मूल्य प्राप्त होता है वह बहुत कम होता है और अनेक बार यह किसानों की उत्पादन लागत से भी कम अथवा जरा सा ही अधिक होता है। यदि हम केवल गेहूँ का उदाहरण लें तो सरकार के दावों की हकीकत सामने आ जाती है। सरकार ने वर्ष 2020 के लिए गेहूँ की एमएसपी पिछले वर्ष के न्यूनतम समर्थन मूल्य 1925 रुपए में मात्र 2.6 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी करते हुए 1975 रुपए निर्धारित की। यह वृद्धि विगत दस वर्षों में की गई न्यूनतम वृद्धि थी। उत्तरप्रदेश द्वारा कृषि लागत एवं मूल्य आयोग को प्रेषित गेहूँ की उत्पादन लागत 1559 रुपए प्रति क्विंटल, जबकि पंजाब और हरियाणा द्वारा परिगणित उत्पादन लागत क्रमशः 1864 रुपए और 1705 रुपए है। इस प्रकार केंद्र द्वारा घोषित 1975 रुपए का समर्थन मूल्य उत्तरप्रदेश, पंजाब और हरियाणा द्वारा प्रेषित उत्पादन लागत से क्रमशः 27, 6 एवं 16 प्रतिशत ही ज्यादा है। यही स्थिति चना, गेहूँ, ज्वार, बाजरा, मक्का,धान तथा तुअर, मूँग और उड़द की फसलों की है। इनमें से किसी भी फसल के लिए केंद्र सरकार द्वारा घोषित एमएसपी राज्य द्वारा गणना की गई उत्पादन लागत का डेढ़ गुना नहीं है। अनेक उदाहरण ऐसे भी हैं जब केंद्र द्वारा घोषित एमएसपी राज्य सरकार द्वारा बताई गई उत्पादन लागत से कम है। सच्चाई यह है कि केंद्र द्वारा सभी राज्यों का औसत निकालकर एक समर्थन मूल्य घोषित करना किसानों के लिए नुकसानदेह है और विभिन्न प्रदेश राज्य आधारित एमएसपी की मांग करते रहे हैं। आर्थिक सहयोग विकास संगठन और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के एक अध्ययन के अनुसार 2000 से 2017 के मध्य कृषकों को अपने उत्पाद का सही मूल्य न मिल पाने के कारण उन्हें 45 लाख करोड़ रुपए की क्षति हुई। वर्ष 2015 में भारतीय खाद्य निगम के पुनर्गठन हेतु परामर्श देने के लिए गठित शांता कुमार समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि एमएसपी का लाभ मात्र 6 प्रतिशत किसानों को ही प्राप्त हो पाता है।
प्रधानमंत्रीजी ने वाम दलों पर किसान विरोधी होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में ममता सरकार किसानों को पीएम किसान सम्मान निधि का लाभ नहीं लेने दे रही है किंतु वहाँ वाम दल इस संबंध में कोई आंदोलन नहीं करते। पुनः यहाँ आदरणीय प्रधानमंत्री जी विमर्श को बुनियादी मुद्दों से भटकाने की कोशिश करते नजर आते हैं। अपने भाषण में बार बार राजनीतिक दलों का जिक्र कर प्रधानमंत्री इस किसान आंदोलन की सच्चाई और पवित्रता पर अपने अविश्वास की अभिव्यक्ति करते हैं। वे बार बार राजनीतिक दलों पर किसानों को भ्रमित करने का आरोप लगाते हैं। अनेक बार ऐसा संदेह होता है कि वे आंदोलनरत किसानों को किसान मानने के लिए तैयार नहीं हैं। उनकी दृष्टि में ये राजनीतिक पार्टियों और विशेषकर वाम दलों के एजेंट हैं जो दिल्ली वासियों को परेशानी में डालने और देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं। प्रधानमंत्री जी पीएम किसान सम्मान निधि की तुच्छ और नाम मात्र की राशि को बार बार बहस और चर्चा का केंद्र बिंदु बनाना चाहते हैं। जबकि देश का किसान बार बार यह कह रहा है कि सरकार अपने कृषि कानून और प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि जैसी बिन मांगी सौगातें बेशक वापस ले ले किंतु वह एमएसपी को कानूनी दर्जा दे दे।
आदरणीय प्रधानमंत्री जी पश्चिम बंगाल में वाम दलों के अभ्युदय के मूल कारण- स्वर्गीय ज्योति बसु द्वारा किए गए भूमि सुधारों- को अनदेखा करते नजर आते हैं। यह ज्योति बसु ही थे जिन्होंने जमींदारों के अधिकार की और सरकारी कब्ज़े वाली भूमि का मालिक़ाना हक़ लगभग 10 लाख भूमिहीन किसानों प्रदान किया और अपनी इस क्रांतिकारी पहल से ग्रामीण इलाकों में निर्धनता उन्मूलन में सफलता हासिल की। जमीन के जो पट्टे दिए गए वह महिलाओं और पुरुषों के संयुक्त नाम से दिए गए और अकेली महिलाओं के नाम पर भी पट्टे जारी किए गए। इन भूमि सुधारों से सर्वाधिक लाभ दलितों, आदिवासियों और किसानों को मिला। यह ज्योति बाबू ही थे जिन्होंने कृषि मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित की और त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था को रूपाकार दिया।
आदरणीय प्रधानमंत्रीजी ने यह भी कहा कि केरल में एपीएमसी और मंडियां नहीं हैं वहाँ वामदल इनके लिए आंदोलन क्यों नहीं करते। पुनः वे यहाँ भौगोलिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक सत्यों की अनदेखी करते नजर आए। केरल अपने मसालों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। केरल नेचुरल रबर के उत्पादन हेतु भी जाना जाता है। केरल की फसलों की प्रकृति देश के अन्य प्रांतों से एकदम अलग है। यही कारण है कि यहाँ अलग अलग कृषि उत्पादों हेतु अलग अलग बोर्ड बनाए गए जिनमें नीलामी की प्रक्रिया अपनाकर किसानों की फसलें बेची जाती हैं। केंद्र सरकार लगातार इन बोर्ड्स को कमजोर करने में लगी है। इन्हें पर्याप्त फण्ड नहीं दिया जाता, इनमें ढेर सारे पद रिक्त हैं जिनमें से कुछ तो शीर्ष अधिकारियों के हैं। केरल की 82 फीसदी फसलें स्पाइस और प्लांटेशन क्रॉप्स हैं। इनकी कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार चढ़ाव पर निर्भर करती हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार के परिवर्तन किसानों के लिए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के कारण और घातक रूप ले लेते हैं। ऐसी दशा में यह एलडीएफ की सरकार ही है जिसने किसानों को संरक्षण दिया। प्रसंस्करण उद्योगों को बढ़ावा दिया गया, यथा परिस्थिति सहकारी समितियों के माध्यम से खरीद भी की गई। एलडीएफ सरकार ने केरल में सब्जियों हेतु भी बेस प्राइस तय की है। केरल की वाम सरकार किसानों को भारी सब्सिडी भी देती है और आसान शर्तों पर ऋण की सुविधा भी।
यदि आदरणीय प्रधानमंत्री जी तथ्यों, तर्कों और मुद्दों पर आधारित विमर्श करना चाहते हैं तो उन्हें यह बताना चाहिए था कि 28 फरवरी 2016 को वर्ष 2022 तक किसानों की आय दुगनी करने के उनके वादे का क्या हुआ? देवेंद्र शर्मा जैसे जाने माने कृषि विशेषज्ञ यह मानते हैं कि किसानों की आय इतनी कम है कि इसे दुगना करने पर भी किसानों के जीवन स्तर में बहुत सुधार नहीं होने वाला। 2016 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 17 राज्यों में किसानों की औसत वार्षिक आय 20000 रुपए है। यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि मात्र 1700-1800 रुपए मासिक आय में किसान अपना घर किस तरह चलाता होगा।
देवेंद्र शर्मा ने एक अध्ययन द्वारा यह बताया था कि 1970-2015 की अवधि में गेहूं के समर्थन मूल्य में 20 गुना वृद्धि हुई। इसी अवधि में सरकारी कर्मचारियों की आय 120-150 गुना बढ़ गई जबकि कंपनियों में कार्यरत सामान्य स्तर के कर्मचारियों की आय 3000 गुना तक बढ़ती देखी गई। बहरहाल किसानों की आय वर्ष 2022 तक दुगुनी करने हेतु 10 प्रतिशत सालाना की कृषि विकास दर चाहिए थी किंतु कृषि विकास दर 2016-17, 2017-18 और 2018-19 में 6.3%, 5.0% और 2.9% रही है जबकि 2019-20 के लिए यह 2.8 प्रतिशत है। ऐसी दशा में किसानों की आय दुगुनी करने का वादा भी एक जुमला सिद्ध होने वाला है।
आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने अपने संबोधन में इस ऐतिहासिक अराजनीतिक अहिंसक किसान आंदोलन को विरोधी दलों का षड्यंत्र सिद्ध करने की पुरजोर कोशिश की। उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि किसान विरोधी कृषि कानूनों को वापस लेने का उनका कोई इरादा नहीं है। सोशल मीडिया में मोदी जी के अंध समर्थक पहले ही आंदोलनरत किसानों को किसान मानने से इनकार करते रहे हैं और इनके लिए देशविरोधी, आतंकी एवं विभाजनकारी जैसे अनुचित संबोधनों का उपयोग भी करते रहे हैं। यह आशा थी कि प्रधानमंत्री जी अपने बेलगाम समर्थकों पर नकेल कसेंगे। इनकी निंदा करेंगे और किसानों से क्षमा याचना भी करेंगे। किंतु उन्होंने अपने भाषण में इस जहरीले दुष्प्रचार का प्रच्छन्न समर्थन ही किया। उनके भाषण के बाद सोशल मीडिया में उनके अंध समर्थकों के यह मैसेज तैरने लगे हैं कि मोदी सरकार में रिवर्स गियर के लिए कोई स्थान नहीं है, आंदोलनकारियों को भले ही अपने प्राण गंवाने पड़ें सरकार पीछे हटने वाली नहीं है। कुछ पोस्टों में यह भी लिखा गया है कि अब समान नागरिक संहिता तथा काशी-मथुरा का नंबर है। लोकतांत्रिक सरकार की गाड़ी रिवर्स गियर के बिना नहीं चल सकती और अगर कोई ऐसी कोशिश होती है तो यह देश के लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।
(रायगढ़, छत्तीसगढ़)
Ishan Kukreti-
25 दिसंबर को किसानों के साथ अपनी बातचीत और संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि खेतों को नुकसान पहुंचाने वाले जानवर हमारे लिए एक बड़ी चिंता है। लेकिन, पर्यावरणविद या पर्यावरण की वकालत करने वाले लोग ऐसे जानवरों की हत्या का विरोध करते हैं।
इस बातचीत के दौरान मध्य प्रदेश के एक किसान ने प्रधानमंत्री के समक्ष यह चिंता जताई कि ये जानवर फसलों को भारी मात्रा में नुकसान पहुंचा रहे हैं। वह चाहते थे कि मोदी इस समस्या का समाधान निकालें।
अपने जवाब में, मोदी ने कहा कि वह इस समस्या से तब से अवगत है, जब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे।
प्रधानमंत्री ने कहा,“लेकिन जो लोग आज किसानों के विरोध-प्रदर्शन का समर्थन कर रहे हैं, उन्होंने खेत को नुकसान पहुंचाने वाले जानवरों को मारने वाले किसानों का विरोध किया और उन किसानों को जेल भिजवाया।“
जंगली जानवरों से होने वाली फसल क्षति का आकलन राज्य स्तरों पर किया जाता है। कृषि, सहकारिता और किसान कल्याण विभाग इस नुकसान का आकलन नहीं करता है।
इस वजह से फसल नुकसान का सटीक आकलन मुश्किल है और इसे ले कर आने वाले आंकड़े सन्दिग्ध हैं। हालांकि, 15 सितंबर, 2020 को लोकसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए, केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने 10 राज्यों में इस कारण से हुई फसल हानि के मामलों और नुकसान के आंकड़े साझा किए थे।
आंध्र प्रदेश ने सबसे अधिक ऐसे मामलों की संख्या और फसल नुकसान दर्ज किया था। यहां 2017-18 में ऐसे मामलों की संख्या 1,051 थी, जो 2019-20 में बढ़कर 3,744 हो गए। इसी अवधि में फसल का नुकसान 582 एकड़ से बढ़कर 3,106 एकड़ हो गया। 2017-18 में मुआवजा 34,96,000 रुपये से बढ़ कर 2019-20 में 1,17,20,000 हो गया।
इसी साल 6 मार्च को राज्यसभा में उठाए गए एक अन्य सवाल के जवाब में, तोमर ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) के तहत, जंगली जानवरों द्वारा किसानों को फसल नुकसान के लिए राज्यों द्वारा दिए गए मुआवजे के आंकड़ों को सामने रखा था। 2018-19 में, यह मुआवजा 3490 लाख रुपये था। महाराष्ट्र और कर्नाटक ने सबसे अधिक राशि, क्रमश: 1410 लाख और 1028 लाख रुपये जारी किए थे।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) के अलावा, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय भी देश में वन्यजीवों और उनके निवास स्थल के प्रबन्धन के लिए केंद्र प्रायोजित योजनाओं, जैसे "इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ वाइल्ड लाइफ हैबिटाट, “प्रोजेक्ट टाइगर” और “प्रोजेक्ट एलीफैंट” के तहत राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
राज्य सरकारें समय-समय पर केंद्र से वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कुछ जंगली प्रजाति को “वर्मिन” (पौधों को नुकसान पहुंचाने वाले छोटे जंगली जीव) घोषित करने का भी अनुरोध करते हैं। अधिनियम की धारा 62 केंद्र सरकार को अधिनियम की अनुसूची I और II में उल्लिखित प्रजातियों के अलावा भी अन्य किसी प्रजाति को जंगली जानवर घोषित करने की शक्ति प्रदान करता है। जिस प्रजाति को “वर्मिन” घोषित कर दिया जाता है, उन्हें वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची V में डाल दिया जाता है।
किसी प्रजाति को वर्मिन घोषित करने का मतलब है कि इन्हें सामूहिक रूप से मारा जा सकता है और इसके लिए कानून के दंडात्मक प्रावधान भी लागू नहीं होंगे। अनुसूची V में स्थायी रूप से कुछ प्रजातियां शामिल हैं। ये प्रजातियां हैं, कौवा, फ्रूट बैट (चमगादड़) और चूहे।
इन प्रजातियों के अलावा, राज्यों ने केंद्र से कहा है कि जंगली सूअरों, नीलगाय और बंदरों को भी वर्मिन घोषित किया जाए।
4 फरवरी, 2019 को राज्यसभा में दिए जवाब में, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के राज्य मंत्री, महेश शर्मा ने संसद को बताया कि बिहार में नीलगाय और जंगली सुअर को 2015 में एक वर्ष की अवधि के लिए, राज्य के दस जिलों में वर्मिन घोषित किया गया था। जंगली सुअर को पूरे उत्तराखंड में 2016 में पहली बार एक वर्ष के लिए और फिर 2018 में एक और वर्ष के लिए “वर्मिन” घोषित किया गया था। 2016 में हिमाचल के एक जिले में छह महीने के लिए बंदरों को वर्मिन घोषित किया गया था। इस घोषणा के बाद, राज्य के 12 जिलों में से 10 में एक साल के लिए बंदरों को “वर्मिन” घोषित किया गया था।
क्रम संख्या राज्य वर्ष 2017-18 2018-19 (नुकसान लाख रुपए में)
1 आन्ध्र प्रदेश 34.96 111.34
2 अरूणाचल प्रदेश 10.17 10.14
3 असम 87.49 0.00
4 बिहार 4.07 2.37
5 झारखंड 412.01 470.77
6 केरल 29.01 69.95
7 कर्नाटक 1369.16 1028.13
8 महाराष्ट्र 1306.74 1410.17
9 मेघालय 51.85 79.95
10 मिजोरम 2.33 11
11 तमिलनाडु 186.41 215.51
12 उत्तराखंड 78.75 94.34
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अब मध्यप्रदेश ने भी उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड की तरह ‘लव जिहाद’ के खिलाफ जिहाद बोल दिया है। मप्र सरकार का यह कानून पिछले कानूनों के मुकाबले अधिक कठोर जरुर है लेकिन यह कानून उनसे बेहतर है। मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान का यह कथन भी गौर करने लायक है कि यदि कोई स्वेच्छा से अपना धर्म-परिवर्तन करना चाहे तो करे लेकिन वह लालच, डर और धोखेबाजी के कारण वैसा करता है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। उस पर 10 साल की सजा और एक लाख रु. तक जुर्माना ठोका जा सकता है। यह तो ठीक है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि लोग किसी धर्म को क्यों मानने लगते हैं या वे एक धर्म को छोडक़र दूसरे धर्म में क्यों चले जाते हैं ? मुझे पिछले 70-75 साल में सारी दुनिया में ऐसे लोग शायद दर्जन भर भी नहीं मिले, जो वेद-उपनिषद् पढक़र हिंदू बने हों, बाइबिल पढक़र यहूदी और ईसाई बने हों या कुरान-शरीफ़ पढक़र मुसलमान बने हों।
लगभग हर मनुष्य इसीलिए किसी धर्म (याने संस्कृत का ‘धर्म’ नहीं) बल्कि रिलीजन या मजहब या पंथ या संप्रदाय का अनुयायी होता है कि उसके माँ-बाप उसे मानते रहे हैं। लेकिन जो लोग अपना ‘धर्म-परिवर्तन’ करते हैं, वे क्यों करते हैं ? वे क्या उस ‘धर्म’ की सभी बारीकियों को समझकर वैसा करते हैं ? हाँ, करते हैं लेकिन उनकी संख्या लाखों में एक-दो होती है। ज्यादातर ‘धर्म-परिवर्तन’ थोक में होते हैं, जैसे कि ईसाइयत और इस्लाम में हुए हैं। ये काम तलवार, पैसे, ओहदे, वासना और डर के कारण होते हैं। यूरोप और एशिया का इतिहास आप ध्यान से पढ़ें तो आपको मेरी बात समझ में आ जाएगी। जब ये मजहब शुरु हुए तो इनकी भूमिका क्रांतिकारी रही और हजारों-लाखों लोगों ने स्वेच्छा से इन्हें स्वीकार किया। लेकिन बाद में ये सत्ता और वासना की सीढिय़ां बन गए। मजहब तो राजनीति से भी ज्यादा खतरनाक और खूनी बन गया। मजहब के नाम पर एक मुल्क ही खड़ा कर दिया गया।
मजहब ने राजनीति को अपना हथियार बना लिया और राजनीति ने मजहब को! अब हमारे देश में ‘लव जिहाद’ की राजनीति चल पड़ी है। असली प्रश्न यह है कि आप लव के लिए जिहाद कर रहे हैं या जिहाद के लिए लव कर रहे हैं ? यदि किन्हीं दो विधर्मी औरत-मर्द में ‘लव’ हो जाता है और वे अपने मजहब को नीचे और प्यार को ऊपर करके शादी कर लेते हैं तो उसका तो स्वागत होना चाहिए। उनसे बड़ा मानव-धर्म को मानने वाला कौन होगा ? लेकिन जो लोग जिहाद के खातिर लव करते हैं याने किसी लडक़े या लडक़ी को प्यार का झांसा देकर मुसलमान, ईसाई या हिंदू बनने के लिए मजबूर करते हैं, उनको जितनी भी सजा दी जाए, कम है। हालांकि इस मजबूरी को अदालत में सिद्ध करना बड़ा मुश्किल है। (नया इंडिया की अनुमति से)
किसानों की ऐतिहासिक लड़ाई अब जमीन से उड़कर अक्कास यानी साइबर स्पेस में जा पहुंची है। फौरी वजह यह कि किसान संगठनों ने ‘किसान एकता मोर्चा’ नामक अपना एक नया पन्ना फेसबुक पर खोल कर गोदी मीडिया के निरंतर दुष्प्रचार की काट करना चालू कर दिया है।
साल 2020 अपनी स्याह परछाइयां लिए-दिए हमसे विदा हो रहा है। इस साल जितना कुछ, जिस तरह घटा, वह हमारे जीवन में कई युगांतरकारी बदलावों का आगाज कर रहा है। पर ऐसी घटनाएं शून्य से नहीं प्रकटतीं। उनके बीज काफी पहले ही बोये जा चुके होते हैं। युगों पहले महिषासुर नाम का एक किरदार प्रकटा था। उसके सामने कहते हैं बड़े-बड़े देवताओं ने अपने हथियार डाल दिए। फिर हारे-थके देवता एकजुट हुए। अपनी संगठित ताकतों से दुर्गा को गढ़ कर उन्होंने उनसे विनती की, मां अब तुम ही रक्षा करो। अजेय होने के घमंड में चूर महिषासुर ने देवी को अपमानजनक तरीके से चुनौती दी- चल सुंदरी, मुझसे जल, थल और आकाश में युद्ध कर दिखा, कौन कितने पानी में है। युद्ध लड़ा गया साहब और उसका खूनी अंत हम सब जानते हैं।
आज वही युगों पुरानी कथा, बाहरी मेगा कंपनियों की हमारे देश की किसानी में घुसपैठ के खिलाफ लामबंद किसानों की लड़ाई देखकर फिर याद आ गई। लड़ाई जो अब तक लोकतंत्र के तीन अखाड़ों- संसद, सड़क और साइबर स्पेस में एक साथ चुनौती दे रहे तत्वों से एक साथ लड़ी जा रही है।
एक महीने से लाखों किसान भारत सरकार के मुखर मुखिया और महामहिम भाग्य विधाता से इन कॉरपोरेट ताकतों की घुसपैठ की राह प्रशस्त कर रहे तीन नए किसानी कानूनों की बाबत उनसे सीधे बात करने और जनहित में उनको वापिस लेकर संसद से संशोधित कराने को आतुर सड़कों पर हैं। लेकिन आकाशवाणी पर हर सप्ताह मन की बात प्रसारित करने वाले, देश के तमाम मठों, मंदिरों, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय समारोहों, गुरुद्वारों और विश्वविद्यालयीन गोष्ठियों में अपनी मुखर उपस्थिति दर्ज कराते रहे माननीय प्रधानमंत्री ने जनता के 60 प्रतिशत भाग- इन किसानों से एक बार भी आमने-सामने बैठकर दुतरफा बातचीत नहीं की है।
यह ऐतिहासिक लड़ाई अब जमीन से उड़कर अक्कास यानी साइबर स्पेस में जा पहुंची है। फौरी वजह यह कि किसान संगठनों ने ‘किसान एकता मोर्चा’ नामक अपना एक नया पन्ना फेसबुक पर खोल कर गोदी मीडिया के निरंतर दुष्प्रचार की काट करना चालू किया। साथ ही उन्होंने यह भी घोषणा की कि उनकी राय में रिलायंस की ‘जियो’ कंपनी चूंकि छोटे-मंझोले किसानों और मंडियों को घातक धक्का देने वाली परदेसी मेगा कंपनियों को नई खरीद- फरोख्त और कॉरपोरेट खेती को जमवाने के लिए साइबर दुनिया में एक ठोस मंच प्रदान कर रही है, किसान उसका भी हुक्का- पानी बंद करें। इसी के साथ फेसबुक पर अचानक नए दांव-पेच दिखे। किसानी पन्ना बंद कर दिया गया। किसानों ने उस पन्ने को ‘यू ट्यूब’ चैनल पर खोल लिया, पर फेसबुक की काफी आलोचना हुई। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक फेसबुक ने बंद किसानी पन्ने को बहाल तो कर दिया है लेकिन नए मीडिया और नए बाजार की ताकतों के गठजोड़ पर बात निकली है तो दूर यानी जल, थल और नभ तलक जाएगी।
हिंदी के नामचीन समालोचक नामवर सिंह ने अपनी मृत्यु से कुछ ही पहले हमको इस चरण के प्रति आगाह किया था जो सांस्कृतिक मुहावरों की ओट लेकर छल से बाजारू कॉरपोरेट हितों को बढ़ाता है: “आज का हिंदू फासीवाद एक प्रकार का सांस्कृतिक छल है। बाजार के कारोबार में भूमंडलीकरण, लेकिन संस्कृति के मामले में स्वदेशी... आज विश्व बाजार का है, हिंदू संस्कृति सिर्फ वाणी का विलास है... अगर इंटरनेट वेबसाइट अपनी तिजोरी भरती जाती है तो हिंदू संस्कृति का गुन गाते रहने में उसकी अपनी गांठ का क्या जाता है?... निराला ने (राम की शक्ति पूजा में) कहा भी है, ‘अन्याय जिधर है, उधर शक्ति,’ यानी न्यायकारी ताकतें बिखरी हुई हैं...।’’ यह बात आज जितनी सच है, पहले नहीं थी।
साल के अंत में इकत्तीस किसान संगठनों के मोर्चे ने दिल्ली की सीमा पर अपना जो दुर्गावतारी (दुर्गेण जायते इतिदुर्गा- जिसे बमुश्किल जीता जा सके) मोर्चा खोल दिया है। मीडिया इसको भरपूर कवर नहीं दे रहा पर फिर भी साफ दिखता है कि विभिन्न मीडिया कंपनियों की समवेत मालिकी पर रोक लगाने का कानून नहीं होने से अधिकतर बड़ी मीडिया कंपनियां अब मेगा औद्योगिक घरानों के पास हैं। और उनके अपने रिटेल हित सीधे ग्लोबल कंपनियों से जुड़ते हैं। लिहाजा किसानों पर कम, कंगना रनौत पर अधिक बात करो! इस बीच मीडिया गली की मार्फत कई बड़े देसी-परदेसी उपक्रमी सीधे हर किसम की जिनिस बेचने वाले विशाल भारतीय बाजार में घुसते जा रहे हैं। मीडिया में उनका भरपूर प्रचार खुदरा व्यापारियों और किसानों के लिए खतरे की घंटी है।
यह कोई संयोग नहीं कि फेसबुक से लेकर ट्विटर तक सबने जियो का मेगा प्लेटफॉर्म शुरू होते ही उसमें भारी निवेश किया। इनमें सबसे पहले निवेशक ट्विटर और फेसबुक थे जिनको एलेक्सा ने अपनी सर्वमान्य रेटिंग की फेहरिस्त में दुनिया की 10 शीर्ष कंपनियों और तीन शीर्ष मीडिया वेबसाइट्स में गिना है। 2020 की शुरुआत में कोविड की आमद ने लोगों को घरों में रोक कर बाजारों, छापाखानों को बंद करवा दिया। अगले दसेक माह आम जनता तथा किसानों का बाजार से सीधा पुराना रिश्ता खत्म होता गया। अखबारों से लेकर किराना या कपड़ों तक की खरीद-बिक्री और वितरण के पुराने तरीके बदले। और मीडिया बड़े रिटेलरों के लिए रचे नए तरीकों से घरेलू बाजार को बहुत तेजी से बड़े डिजिटल माध्यमों की तरफ ले जाने लगा।
प्रमाण यह कि अमेजन-जैसी कंपनियों के रजिस्टर्ड गाहकों की तादाद 60 फीसदी बढ़ी है जबकि पुराने खुदरा बाजार में माल तथा गाहक- दोनों की आवक तेजी से गिरी है। इसी नाजुक समय में संसद के सीमित सत्र में अपने बाहुबल से तीन विवादास्पद कानून बिना किसानों को भरोसे में लिए पारित करवा कर सरकार ने भिड़ का दूसरा छत्ता छेड़ दिया। सरकार की मदद को जतन से पालित गोदी मीडिया सामने आया। उसने सीधे-सीधे धरनाकारियों को आतंकी गुट समर्थित, पाकिस्तान समर्थक और विपक्ष द्वारा बरगलाया गया कहना शुरू कर दिया। धरने पर बैठे किसानों ने अब हुड़क कर मीडिया के प्रतिनिधियों को गोदी मीडिया और सरकारी भौंपू कहते हुए दूर भगाकर खुद अपनी उपस्थिति बरास्ते फेसबुक दर्ज कराई और देखते-देखते सात लाख फॉलोअर्स जुटा लिए।
अब बाजार की ताकतों का सकपकाना सहज बनता था। नामचीन अखबार ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ से कांग्रेस के सांसद ने कहा कि उनकी राय में फेसबुक की बहुप्रचारित नैतिकता की पॉलिसियों की तहत फेसबुक द्वारा बजरंग दल जैसी संस्था से जुड़े फेसबुक पन्नों पर किसी तरह का प्रहार न करना कतई गलत था। इस पर भारतीय चीफ साहिब का संसदीय समिति को भेजा बयान आया कि कंपनी बजरंग दल समर्थक पन्नों को देश की सुरक्षा या अपने नैतिक मानदंडों की तहत आपत्तिजनक नहीं मानती। लिहाजा उनकी निरंतर उपस्थिति फेसबुक पर बनी रहेगी। जबकि कुछ ही समय पहले फेसबुक की एक और भारतीय शीर्ष अधिकारी ने खुद को भाजपा समर्थक स्वीकार करते हुए कुछ कार्यकर्ताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई न करने के आरोपों के मद्देनजर पद से इस्तीफा दिया था।
यह ठीक है कि दुनिया के कई और विकासशील देशों की तरह भारत भी अपना पिछड़ापन दूर करने को विदेशी पूंजी निवेश को न्योते और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारतीय सरजमीं पर उत्पाद बनाने के लिए तवज्जो देते हुए नए रोजगार पैदा करे। फिर भी हमसे लगातार लोकल पर वोकल होने को कहने वाले प्रधानमंत्री भी इतना तो मानेंगे ही कि उनके अबाध प्रवेश पर अंकुश लगाकर यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि हमारे घरेलू हित महफूज रहें।
सोशल मीडिया पर नए सरकारी कानून लागू कराके उसकी मुश्कें कसने की खबरों के बीच किसानों के सोशल मीडिया प्रयासों की रोकथामक से एक धारणा सही हो कि गलत, बलवती ही होती रहेगी कि सोशल मीडिया पर जनसाधारण को सरकार समर्थक मीडिया की तुलना में हासिल अभिव्यक्ति की लोकतांत्रिक आजादी सीमित है। और जो है, वह भी जल्द ही सरकार की कॉरपोरेट तबके के प्रति सदयता और तमाम तरह की छूटों से लाभान्वित न्यस्त स्वार्थी ग्लोबल कंपनियों की चली तो वह और भी सिमटती चली जाएगी।
अगर पांच लाख गांवों के इस देश में लोकतंत्र रखना है तो सरकार को इकतरफा बातचीत और प्रश्नाकुल जनता का दमन नहीं, प्यार से समय रहते उसकी भी सुनना उससे सीखना होगा। हमारा समाज संस्कृति, पर्यावरण, विकास, शिक्षा इन पर टुकड़ा-टुकड़ा सोचने या उबाऊ लेक्चरों का आदी नहीं है। किसानी मुहावरे में सोचें तो दिसंबर, 2020 तक पुरानी फसल कट चुकी है। अब नई खेती का समय आ रहा है जिसका अपना अलिखित और कालातीत कुदरती संविधान है। नई प्रौद्योगिकी, नए ऑनलाइन विपणन के तरीके जरूर अपनाओ, लेकिन धरती के सनातन नियमों- कायदों और किसानी की चुनाव क्षमता को भी निरंतर बनाए रखो। वरना जैसे नलकूपों ने भूजल को खत्म कर दिया, और रासायनिक उर्वरकों ने नदियों को मार डाला, यह नया साइबर बाजार भी पुराने को मटियामेट करने के बाद हाथ झाड़ कहीं और चल देगा। (navjivanindia.com)
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लाल राम कुमार सिंह जी चले गए! आकाशवाणी के लोकप्रिय उद्घोषक लाल राम कुमार सिंह जी 84 वर्ष के थे, अस्वस्थ भी थे। वे खैरागढ़ राजपरिवार से ताल्लुक रखते थे।
उनके निधन की खबर से मन विचलित है।
आकाशवाणी रायपुर में वो उस दौर में थे जब उद्घोषकों की आवाज़,अंदाज़ उन्हें लोकप्रिय बनाती थी। मिर्ज़ा मसूद साहब उस खनक के साथ आज भी हम सब के बीच हैं। हसन खान सर उस आकाशवाणी के प्रतिनिधि के तौर पर हैं ।
लाल राम कुमार सिंह जी अनाऊंसर्स की उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जो अपने अपने इलाकों में या यूं कहें कि अपने रेडियो स्टेशन की पहुंच के दायरे में हीरो की तरह होते थे। छत्तीसगढ़ में उस ज़माने के लोग बरसाती भईया को कैसे भूल सकते हैं !
आकाशवाणी पर लिखना या उस आकाशवाणी की बात करना बेशकीमती यादों के पिटारे को खोलने जैसा है। तब का कोई पत्रकार, कोई लेखक, कोई कवि, कोई भी संस्कृति कर्मी शायद ही ऐसा होगा जिसका आकाशवाणी से रिश्ता ना हो, यादें ना जुड़ी हों।
यह फिर कभी...।
लालराम कुमार सिंहजी का जाना व्यक्तिगत क्षति है और यह क्षति ना जाने कितने लोगों के लिए इतनी ही व्यक्तिगत होगी!
इसकी वजह है कि लालराम कुमार सिंह जी जैसे उद्घोषकों की तब आकाशवाणी को लोक से जोड़े रखने में बड़ी भूमिका होती थी। माइक पर भी और माइक के बाहर भी ।
लाल राम कुमार सिंह जी अंतिम दिनों में भी उसी शहर से उसी पुराने रिश्ते को जीते रहे।
वो पीढ़ियों के बीच मौजूद अंतर को जोड़ने वाली कड़ी थे।
सार्वजनिक कार्यक्रमों से ले कर आइसक्रीम की दुकान तक एक चिरपरिचित मुस्कुराता चेहरा ऐसा था कि लगता था समाज ऐसा ही क्यों नहीं होता - लाल राम कुमार सिंहजी जैसा दोस्त, सड़क पर मिलें तो उन सा अभिभावक, मिल जाएं तो तनाव मुक्त और बहुत स्नेह से भरे थोड़े से पल भी हमेशा याद रहें - तेजिंदर गगनजी जैसे !
मुझे अपने समय के, अपने आसपास के जो नायक हमेशा याद रहेंगे उनमें लाल राम कुमार सिंह जी भी होंगे - सबको याद रखने वाले,मित्रता पसंद, एक बेहतरीन इंसान की तरह ।
वो किसी सड़क पर, किसी समारोह में, कभी कॉफी हाउस या किसी ऐसी जगह पर मिल जाएं तो डर लगता था। डर इस बात का कि जितना स्नेह वो देंगे उतना सम्मान मैं उन्हें लौटा पाऊंगा कि नहीं !
सादर श्रद्धांजलि !
चार्ली ने अपनी नृत्यांगना बेटी को एक मशहूर खत लिखा। कहा- मैं सत्ता के खिलाफ विदूषक रहा, तुम भी गरीबी जानो, मुफलिसी का कारण ढूंढो, इंसान बनो, इंसानों को समझो, जीवन में इंसानियत के लिए कुछ कर जाओ, खिलौने बनना मुझे पसंद नहीं बेटी। मैं सबको हंसा कर रोया हूं, तुम बस हंसते रहना। बूढ़े पिता ने प्रिय बेटी को और भी बहुत कुछ ऐसा लिखा। (फेसबुक से)
मेरी प्यारी बेटी,
रात का समय है। क्रिसमस की रात। मेरे इस छोटे से घर की सभी निहत्थी लड़ाईयां सो चुकी हैं। तुम्हारे भाई-बहन भी नींद की गोद में हैं। तुम्हारी मां भी सो चुकी है। मैं अधजगा हूं, कमरे में धीमी सी रौशनी है। तुम मुझसे कितनी दूर हो पर यकीन मानो तुम्हारा चेहरा यदि किसी दिन मेरी आंखों के सामने न रहे, उस दिन मैं चाहूंगा कि मैं अंधा हो जाऊं। तुम्हारी फोटो वहां उस मेज पर है और यहां मेरे दिल में भी, पर तुम कहां हो? वहां सपने जैसे भव्य शहर पेरिस में! चैम्प्स एलिसस के शानदार मंच पर नृत्य कर रही हो। इस रात के सन्नाटे में मैं तुम्हारे कदमों की आहट सुन सकता हूं। शरद ऋतु के आकाश में टिमटिमाते तारों की चमक मैं तुम्हारी आंखों में देख सकता हूं। ऐसा लावण्य और इतना सुन्दर नृत्य। सितारा बनो और चमकती रहो। परन्तु यदि दर्शकों का उत्साह और उनकी प्रशंसा तुम्हें मदहोश करती है या उनसे उपहार में मिले फूलों की सुगंध तुम्हारे सिर चढ़ती है तो चुपके से एक कोने में बैठकर मेरा खत पढ़ते हुए अपने दिल की आवाज सुनना।
...मैं तुम्हारा पिता, जिरलडाइन! मैं चार्ली, चार्ली चेपलिन! क्या तुम जानती हो जब तुम नन्हीं बच्ची थी तो रात-रात भर मैं तुम्हारे सिरहाने बैठकर तुम्हें स्लीपिंग ब्यूटी की कहानी सुनाया करता था। मैं तुम्हारे सपनों का साक्षी हूं। मैंने तुम्हारा भविष्य देखा है, मंच पर नाचती एक लडक़ी मानो आसमान में उड़ती परी। लोगों की करतल ध्वनि के बीच उनकी प्रशंसा के ये शब्द सुने हैं, इस लडक़ी को देखो! वह एक बूढ़े विदूषक की बेटी है, याद है उसका नाम चार्ली था।
...हां! मैं चार्ली हूं! बूढ़ा विदूषक! अब तुम्हारी बारी है! मैं फटी पेंट में नाचा करता था और मेरी राजकुमारी! तुम रेशम की खूबसूरत ड्रेस में नाचती हो। ये नृत्य और ये शाबाशी तुम्हें सातवें आसमान पर ले जाने के लिए सक्षम है। उड़ो और उड़ो, पर ध्यान रखना कि तुम्हारे पांव सदा धरती पर टिके रहें। तुम्हें लोगों की जिंदगी को करीब से देखना चाहिए। गलियों-बाजारों में नाच दिखाते नर्तकों को देखो जो कडक़ड़ाती सर्दी और भूख से तड़प रहे हैं। मैं भी उन जैसा था, जिरल्डाइन! उन जादुई रातों में जब मैं तुम्हें लोरी गा-गाकर सुलाया करता था और तुम नीद में डूब जाती थी, उस वक्त मैं जागता रहता था। मैं तुम्हारे चेहरे को निहारता, तुम्हारे हृदय की धडक़नों को सुनता और सोचता, चार्ली! क्या यह बच्ची तुम्हें कभी जान सकेगी? तुम मुझे नहीं जानती, जिरल्डाइन! मैंने तुम्हें अनगिनत कहानियां सुनाई हैं पर, उसकी कहानी कभी नहीं सुनाई। वह कहानी भी रोचक है। यह उस भूखे विदूषक की कहानी है, जो लंदन की गंदी बस्तियों में नाच-गाकर अपनी रोजी कमाता था। यह मेरी कहानी है। मैं जानता हूं पेट की भूख किसे कहते हैं! मैं जानता हूं कि सिर पर छत न होने का क्या दंश होता है। मैंने देखा है, मदद के लिए उछाले गये सिक्कों से उसके आत्म सम्मान को छलनी होते हुए पर फिर भी मैं जिंदा हूं, इसीलिए फिलहाल इस बात को यही छोड़ते हैं।
...तुम्हारे बारे में ही बात करना उचित होगा जिरल्डाइन! तुम्हारे नाम के बाद मेरा नाम आता है चेपलिन! इस नाम के साथ मैने 40 वर्षों से भी अधिक समय तक लोगों का मनोरंजन किया पर हंसने से अधिक मैं रोया हूं। जिस दुनिया में तुम रहती हो वहां नाच-गाने के अतिरिक्त कुछ नहीं है। आधी रात के बाद जब तुम थियेटर से बाहर आओगी तो तुम अपने समृद्ध और सम्पन्न चाहने वालों को तो भूल सकती हो, पर जिस टैक्सी में बैठकर तुम अपने घर तक आओ, उस टैक्सी ड्राइवर से यह पूछना मत भूलना कि उसकी पत्नी कैसी है? यदि वह उम्मीद से है तो क्या अजन्मे बच्चे के नन्हे कपड़ों के लिए उसके पास पैसे हैं? उसकी जेब में कुछ पैसे डालना न भूलना। मैंने तुम्हारे खर्च के लिए पैसे बैंक में जमा करवा दिए हैं, सोच समझकर खर्च करना।
...कभी-कभार बसों में जाना, सब-वे से गुजरना, कभी पैदल चलकर शहर में घूमना। लोगों को ध्यान से देखना, विधवाओं और अनाथों को दया-दृष्टि से देखना। कम से कम दिन में एक बार खुद से यह अवश्य कहना कि, मैं भी उन जैसी हूं। हां! तुम उनमें से ही एक हो बेटी!
...कला किसी कलाकार को पंख देने से पहले उसके पांवों को लहूलुहान जरूर करती है। यदि किसी दिन तुम्हें लगने लगे कि तुम अपने दर्शकों से बड़ी हो तो उसी दिन मंच छोडक़र भाग जाना, टैक्सी पकडऩा और पेरिस के किसी भी कोने में चली जाना। मैं जानता हूं कि वहां तुम्हें अपने जैसी कितनी नृत्यागनाएं मिलेंगी। तुमसे भी अधिक सुन्दर और प्रतिभावान फर्क सिर्फ इतना है कि उनके पास थियेटर की चकाचौंध और चमकीली रोशनी नहीं। उनकी सर्चलाईट चन्द्रमा है! अगर तुम्हें लगे कि इनमें से कोई तुमसे अच्छा नृत्य करती है तो तुम नृत्य छोड़ देना। हमेशा कोई न कोई बेहतर होता है, इसे स्वीकार करना। आगे बढ़ते रहना और निरंतर सीखते रहना ही तो कला है।
...मैं मर जाऊंगा, तुम जीवित रहोगी। मैं चाहता हूं तुम्हें कभी गरीबी का एहसास न हो। इस खत के साथ मैं तुम्हें चेकबुक भी भेज रहा हूं ताकि तुम अपनी मर्जी से खर्च कर सको। पर दो सिक्के खर्च करने के बाद सोचना कि तुम्हारे हाथ में पकड़ा तीसरा सिक्का तुम्हारा नहीं है, यह उस अज्ञात व्यक्ति का है जिसे इसकी बेहद जरूरत है। ऐसे इंसान को तुम आसानी से ढूंढ सकती हो, बस पहचानने के लिए एक नजर की जरूरत है। मैं पैसे की इसलिए बात कर रहा हूं क्योंकि मैं इस राक्षस की ताकत को जानता हूं।
...हो सकता है किसी रोज कोई राजकुमार तुम्हारा दीवाना हो जाए। अपने खूबसूरत दिल का सौदा सिर्फ बाहरी चमक-दमक पर न कर बैठना। याद रखना कि सबसे बड़ा हीरा तो सूरज है जो सबके लिए चमकता है। हां! जब ऐसा समय आये कि तुम किसी से प्यार करने लगो तो उसे अपने पूरे दिल से प्यार करना। मैंने तुम्हारी मां को इस विषय में तुम्हें लिखने को कहा था। वह प्यार के सम्बन्ध में मुझसे अधिक जानती है।
...मैं जानता हूं कि तुम्हारा काम कठिन है। तुम्हारा बदन रेशमी कपड़ों से ढका है पर कला खुलने के बाद ही सामने आती है। मैं बूढ़ा हो गया हूं। हो सकता है मेरे शब्द तुम्हें हास्यास्पद जान पड़ें पर मेरे विचार में तुम्हारे अनावृत शरीर का अधिकारी वही हो सकता है जो तुम्हारी अनावृत आत्मा की सच्चाई का सम्मान करने का सामथ्र्य रखता हो।
...मैं ये भी जानता हूं कि एक पिता और उसकी सन्तान के बीच सदैव अंतहीन तनाव बना रहता है पर विश्वास करना मुझे अत्यधिक आज्ञाकारी बच्चे पसंद नहीं। मैं सचमुच चाहता हूं कि इस क्रिसमस की रात कोई करिश्मा हो ताकि जो मैं कहना चाहता हूं वह सब तुम अच्छी तरह समझ जाओ।
...चार्ली अब बूढ़ा हो चुका है, जिरल्डाइन! देर सबेर मातम के काले कपड़ों में तुम्हें मेरी कब्र पर आना ही पड़ेगा। मैं तुम्हें विचलित नहीं करना चाहता पर समय-समय पर खुद को आईने में देखना उसमें तुम्हें मेरा ही अक्स नजर आयेगा। तुम्हारी धमनियों में मेरा रक्त प्रवाहित है। जब मेरी धमनियों में बहने वाला रक्त जम जाएगा तब तुम्हारी धमनियों में बहने वाला रक्त तुम्हें मेरी याद कराएगा। याद रखना, तुम्हारा पिता कोई फरिश्ता नहीं, कोई जीनियस नहीं, वह तो जिंदगी भर एक इंसान बनने की ही कोशिश करता रहा। तुम भी यही कोशिश करना।
ढेर सारे प्यार के साथ
चार्ली क्रिसमस 1965
आज 27 दिसंबर को मिर्जा गालिब की जयंती पर
-ध्रुव गुप्त
भारतीय साहित्य के हजारों साल के इतिहास में कुछ ही लोग हैं जो अपने विद्रोही स्वर, अनुभूतियों की अतल गहराईयों और सोच की असीम ऊंचाईयों के साथ भीड़ से अलग दिखते हैं। मिजऱ्ा ग़ालिब उनमें से एक हैं। मनुष्यता की तलाश, शाश्वत तृष्णा, मासूम गुस्ताखियों और विलक्षण अनुभूतियों के इस अनोखे शायर के अनुभव और सौंदर्यबोध से गुजरना एक दुर्लभ अनुभव है। लफ्जों में अनुभूतियों की परतें इतनी कि जितनी बार पढ़ो, उनके नए-नए अर्थ खुलते जाते हैं।
वैसे तो हर शायर की कृतियां अपने समय का दस्तावेज होती हैं, लेकिन अपने दौर की पीडाओं की नक्काशी का गालिब का अंदाज भी अलग था और तेवर भी जुदा। यहां कोई रूढ़ जीवन-मूल्य अथवा जीवन-दर्शन नहीं है। रूढिय़ों का अतिक्रमण ही यहां जीवन-मूल्य है,आवारगी जीवन-शैली और अंतर्विरोध जीवन-दर्शन। मनुष्य के मन की जटिलताओं, अपने वक्त के साथ अंतर्संघर्ष और स्थापित मान्यताओं के विरुद्ध जैसा विद्रोह गालिब की शायरी में मिलता है, वह उर्दू ही नहीं
विश्व की किसी भी भाषा के लिए गर्व का विषय हो सकता है।
गालिब को महसूस करना हो तो कभी पुरानी दिल्ली के गली कासिम जान में उनकी हवेली हो आईए! यह छोटी सी हवेली भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे बड़े शायर का स्मारक है जहां उस दौर की तहजीब सांस लेती है। इसकी चहारदीवारी के भीतर वह एक शख्स मौजूद रहा था जिसने जिंदगी की तमाम दुश्वारियों और भावनाओं की जटिलताओं से टकराते हुए देश ही नहीं, दुनिया को वह सब दिया जिसपर आने वाली सदियां गर्व करेंगी। हवेली के दरोदीवार तो अब खंडहर हो चुके हैं, लेकिन उनमें देखे गए ख्वाबों की सीली-सीली खुशबू यहां महसूस होगी। यहां अकेले बैठिए तो उन हजारों ख्वाहिशों की दबी-दबी चीखें महसूस होती हैं जिनके पीछे गालिब उम्र भर भागते रहे। यहां के किसी कोने में बैठकर ‘दीवान-ए-गालिब’ को पढऩा एक अलग अहसास है। ऐसा लगेगा कि आप ग़ालिब के लफ्जों को नहीं, उनके अंतर्संघर्षों, उनके फक्कड़पन और उनकी पीड़ा को भी शिद्दत से महसूस कर पा रहे हैं।
गालिब को महसूस करने की दूसरी जगह है दिल्ली के निजामुद्दीन में मौजूद उनकी मजार। यह मजार संगमरमर के पत्थरों का बना एक छोटा-सा घेरा नहीं, भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे बड़े शायर का स्मारक है। एक ऐसा स्मारक जिसकी चहारदीवारी के भीतर वह एक शख्स मौजूद है जिसने जिंदगी की तमाम दुश्वारियों और भावनाओं की जटिलताओं से टकराते हुए देश ही नहीं, दुनिया को वह सब दिया जिसपर आने वाली सदियां गर्व करेंगी। गालिब की मज़ार को निजामुद्दीन के बेहद भीड़भाड़ वाले इलाके का एक एकांत कोना कहा जा सकता है। निजामुद्दीन के चौसठ खंभा के उत्तरी हिस्से में लगभग साढ़े तीन हजार वर्गफीट का यह परिसर लाल पत्थरों की दीवारों से घिरा हुआ क्षेत्र है जिसमें सफेद संगमरमर से बनी गालिब की एक छोटी-सी मजार है। पहले यहां सिर्फ उनकी कब्र हुआ करती थी। मजार और उसके आसपास की संरचना बाद में की गई थी। उनकी मजार के पीछे उनकी बेगम उमराव बेगम की कब्र है जिनकी मृत्यु गालिब की मृत्यु के एक साल बाद हुई थी। गालिब की मज़ार में उनका यह शेर दजऱ् है- ‘न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता/डुबोया मुझको होने ने न होता मैं तो क्या होता!’ मिर्जा गालिब से अकेले में मिलना हो तो दिल्ली में इससे बेहतर जगह और कोई नहीं।
गालिब की मजार दिल्ली में मेरी सबसे पसंदीदा जगह रही है और ‘दीवान-ए-गालिब’ मेरी सबसे पसंदीदा किताब। गालिब की मजार पर, उनकी सोहबत में उनका दीवान पढऩा मेरे लिए एक अतीन्द्रिय अनुभव है। वहां देर तक बैठने के बाद गालिब से जो कुछ भी हासिल होता है उसे एक शब्द में कहा जाय तो वह है एक अजीब तरह की बेचैनी। रवायतों को तोडक़र आगे निकलने की बेचैनी। जीवन और मृत्यु के उलझे रिश्ते को सुलझाने की बेचैनी। दुनियादारी और आवारगी के बीच तालमेल बिठाने की बेचैनी। अपनी तनहाई को लफ्जों से भर देने की बेचैनी। इश्क़ के उलझे धागों को खोलने और उसके सुलझे सिरों को फिर से उलझाने की बेचैनी। उन तमाम बेचैनियों को निकट से महसूस करने का ही असर होता है कि सामने बैठे-बैठे कब्र के नीचे उनका कफन भी मुझे कभी-कभी हिलता हुआ महसूस होता है। भ्र्म ही सही, लेकिन बहुत खूबसूरत भ्रम- ‘अल्लाह रे जौक-ए-दश्त-नवर्दी कि बाद-ए-मर्ग /हिलते हैं ख़ुद-ब-ख़ुद मिरे अंदर कफन के पांव !
गालिब अपने मजार में बिल्कुल अकेले नजऱ आते हैं। अपनी जिंदगी में भी ग़ालिब को अकेलापन ही पसंद रहा था। जीते जी उनकी ख्वाहिश यही तो थी- ‘पडि़ए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार और अगर मर जाईए तो नौहा-खवाँ कोई न हो! उनके इस अकेलेपन में गालिब से मेरा घंटों-घंटों संवाद चलता रहता है। अकेलेपन की अकेलेपन से बातचीत ! उनसे कुछ सवाल करता हूं तो जवाब भी मिल जाता है। शायद वर्षों तक साथ रहते-रहते कोई टेलीपैथी काम करने लगी है हमारे बीच। पिछली सर्दियों में एक दिन देर तक उनके मज़ार पर उन्हें पढऩे-समझने के बाद मैं मजार के सामने की एक बेंच पर लेट गया था। मुझे लगा कि अपनी कब्र से गालिब मुझे एकटक देखे जा रहे हैं। उनसे कुछ कहने की तलब हुई तो बेसाख़्ता मुंह से यह शेर निकल गया- ‘कुछ तो पढि़ए कि लोग कहते हैं/कब से ‘गालिब’ गजल-सरा न हुआ’! पता नहीं क्या था कि हवा के एक तेज झोंके ने मेरे बगल में पड़े दीवान-ए-गालिब के पन्ने पलट दिए। सामने जो गजल थी, उसके जिस शेर पर पहली निगाह पड़ी, वह यह था- ‘क्यूं न फिरदौस में दोजख को मिला लें यारब/सैर के वास्ते थोड़ी सी जगह और सही।
(साभार ‘सुबह सवेरे’, भोपाल)
-राजीव गुप्ता
बात सन् 1924 की केरल में हुए वैकोम सत्याग्रह की। स्वर्ण हिंदुओं ने वैकोम मंदिर के आसपास की सडक़ दलित हिंदुओं के लिए बंद कर रखी थी (यह सडक़ क्रिश्चियन एवं मुस्लिम लोगों के लिए खुली थी) इसके विरोध में केरल में सत्याग्रह हुआ और सफल हुआ। यह सत्याग्रह वैकोम सत्याग्रह के नाम से जाना गया। यह कई मायनों में इतिहास के पन्नों पर अपनी अमिट छाप छोड़े हुए हैं। इस सत्याग्रह पर गांधीजी का बहुत प्रभाव था।
यह सत्याग्रह धार्मिक सौहार्द और स्वर्णो की बदलती मानसिकता के लिए भी जाना जाता है। यह देश का पहला जातिवाद विरोधी सत्याग्रह भी है। इसमें एक खास बात यह भी थी सिखों ने वहाँ भी सत्याग्रहियों के लिए लंगर लगाने की पेशकश की थी जिसे गांधीजी ने इंकार कर दिया था। गांधीजी का मानना था कि जिसकी यह लड़ाई है वह लड़ाई उसे खुद लडऩी होगी। यह बहुत हद तक एक सफल सत्याग्रह था जिसने आगे आने वाली आजादी की लड़ाई और छुआछूत मिटाने को लेकर देश को एक दिशा दी थी।
अब बात दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन की, देश ने इन सौ सालों में कई गांधीवादी आन्दोलन देखे हैं लेकिन ऐसी दृढ़ता और मजबूत इच्छाशक्ति वाला देशव्यापी आन्दोलन जिसमें सामने अपनी ही चुनी हुई सरकार हो ऐसे कम उदाहरण है। इस आंदोलन में जो बहुत कुछ बाहर नहीं आ रहा यह कि पूरे देश का आंदोलन है जिसे दिखाया नहीं जा रहा या हम तक नहीं पहुंच रहा है। पंजाब के किसान इस आंदोलन का चेहरा जरूर है लेकिन बाकी राज्यों के किसान भी बराबर इसमें कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रहें है। देश के अलग-अलग हिस्सों से किसानों के आन्दोलन में पहुंचने की खबरें हैं।
सरकार और उसके तमाम प्रचार तंत्र किसान आंदोलन में या उसके तरीके में कोई कमी नहीं निकाल पा रहें है। किसान जिन बिलों को लेकर आंदोलनरत है उस पर बहस हो सकती है लेकिन एक बात तो मानने लायक है कि इस आंदोलन के तरीके ने पुराने हिंदुस्तान को जीवित कर दिया है। महिलाओं की मौजूदगी और इसका अहिंसक होना यह दो मुख्य बातें हैं इस आंदोलन को बाकी आंदोलन से अलग करती है।
धार्मिक सौहार्द्र का ऐसा माहौल आप बताइए इससे पहले आपने कब देखा था ।देश की आत्मा को जिंदा रखने के लिए ऐसे ही आंदोलन की जरूरत है। जरूरत है जो देश को सही और गलत में फर्क करना सिखा सके।
नफरती लोग एक दिन मर खप जाएंगे लेकिन आपको, आपके परिवार को आपके बच्चों को इसी देश में रहना है। आपके पास तो यह विकल्प भी नहीं है कि आप भगोड़े धार्मिक गुरु के समान एक कैलाशा जैसा नया देश बसायें और रहने चले जाएं। हमारा अमन और भाईचारा बहुत जरूरी है देश के लिए, दुनिया के लिए।
वर्तमान किसान आंदोलन आने वाले समय में नजीर की तरह पेश किया जायेगा कि कैसे अहिंसात्मक तरीके से सत्ता द्वारा थोपे गए गलत कानून को बदला जा सकता है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत के किसानों ने विपक्षी दलों पर जबर्दस्त मेहरबानी कर दी है। छह साल हो गए और वे हवा में मुक्के चलाते रहे। अब किसानों की कृपा से उनके हाथ में एक बोथरा चाकू आ गया है, उसे वे जितना मोदी सरकार के खिलाफ चलाते हैं, वह उतना ही उनके खिलाफ चलता जाता है। अब विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी किसानों की बजाय भारत के राष्ट्रपति के पास पहुंच गए।
कहते हैं कि किसान-आंदोलन के पक्ष में उन्होंने दो करोड़ हस्ताक्षर वाला ज्ञापन राष्ट्रपति को दिया है। दो करोड़ तो बहुत कम हैं। उसे 100 करोड़ भी कहा जा सकता था। यदि दो करोड़ लोगों ने उस पर सचमुच दस्तखत किए हैं तो राहुलजी उनमें से कम से कम दो लाख लोगों को तो दिल्ली ले आते। उनकी बहन प्रियंका को पुलिस ने पकड़ लिया। उस पर उनकी आपत्ति ठीक हो सकती है लेकिन इसीलिए आप यह कह दें कि भारत का लोकतंत्र फर्जी है, बनावटी है, काल्पनिक है, बिल्कुल बेजा बात है।
भारत का लोकतंत्र, अपनी सब कमियों के बावजूद, आज भी दुनिया का सबसे बड़ा और बहुत हद तक अच्छा लोकतंत्र है। राहुल का यह कहना हास्यास्पद है कि मोदी का जो भी विरोध करे, उसे आतंकवादी घोषित कर दिया जाता है। वैसे सिर्फ कहलवाना ही है तो विदूषक कहलवाने से बेहतर है आतंकवादी कहलवाना लेकिन भारत में आज किसकी आजादी में क्या कमी है? जो भी जो चाहता है, वह बोलता और लिखता है। उसे रोकने वाला कौन है ?
जो अखबार, पत्रकार और टीवी चैनल खुशामदी हैं, डरपोक हैं, कायर हैं, लालची हैं— वे अपना ईमान बेच रहे हैं। वे खुद दब रहे हैं। उन्हें दबाए जाने की जरुरत नहीं है। उन्हें दबाया गया था, आपातकाल में, राहुल की दादी के द्वारा। पांच-सात साल के राहुल को क्या पता चला होगा कि काल्पनिक लोकतंत्र कैसा होता है ? जहां तक पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र का सवाल है, युवराज की हिम्मत नहीं कि इस सवाल को वह कभी छू भी ले।
नरसिंहराव-काल को छोड़ दें तो पिछले 50 साल में कांग्रेस तो एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनकर रह गई है। उसमें अब भी बड़े योग्य और प्रतिभाशाली नेता हैं लेकिन उनकी हैसियत क्या है ? यही कांग्रेसी-कोरोना देश के सभी दलों में फैल गया है। पार्टियों के आतंरिक लोकतंत्र का खात्मा ही बाह्य लोकतंत्र के खात्मे का कारण बनता है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
शेष नारायण सिंह
वरिष्ठ पत्रकार
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपराधियों, करीबी लोगों और रिश्तेदारों को माफी देकर व्हाइट हाउस को अलविदा कहने की तैयारी कर रहे हैं। ट्रंप ने अपने समधी चाल्र्स कुशनर को बुधवार को माफ कर दिया है। चाल्र्स कुशनर, ट्रंप के दामाद जेड कुशनर के पिता हैं। इस बार माफी देने की अपनी नई खेप में उन्होंने 26 लोगों को शामिल किया है।
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने माफी देने का सिलसिला शुरू कर दिया है। उन्होंने अपने समधी चाल्र्स कुशनर को बुधवार को माफ कर दिया है। इस बार माफी देने की अपनी नई खेप में उन्होंने 26 लोगों को शामिल किया है। चाल्र्स कुशनर, ट्रंप के दामाद जेड कुशनर के पिता हैं। उनपर बहुत ही गंभीर आरोप थे। उन्होंने 2004 के चुनाव में साठ लाख डालर का चुनावी चंदा डेमोक्रेटिक पार्टी को दिया था। यहांं तक तो ठीक था क्योंकि अमरीका में किसी राजनीतिक पार्टी को चंदा देने की रक़म की कोई सीमा नहीं है।
हालांकि किसी व्यक्ति को दो हजार डालर से ज़्यादा चुनावी चंदा नहीं दिया जा सकता। चंदा देने के बाद समधी साहब ने जो आपराधिक कृत्य किया वह यह था कि उन्होंने इस साठ लाख डालर को अपने खाते में व्यापार पर किया गया खर्च दिखा दिया। यह गलत है और आपराधिक कृत्य है। उनके ऊपर मुकदमा चला और उनको दो साल की सजा हो गई। इसके अलावा उन्होंने किसी वेश्या को व्यापारिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया था।
इस तरह की हरकत भी कानूनन जुर्म
व्यापारिक लाभ के लिए इस तरह की हरकत भी कानूनन जुर्म है। इस मामले में भी कानूनी कारवाई हुई। इन दो मामलों में बीस जनवरी 2021 तक विराजने वाले चाल्र्स कुशनर के समधी डोनाल्ड ट्रंप ने उनको माफी दे दी। इस माफी के पहले उन्होंने उन लोगों माफी दी जो उनके उलटे सीधे काम में उनके साथी रहे हैं। नई माफी की लिस्ट में रोजर स्टोन और पॉल मनाफोर्ट भी शामिल हैं। यह दोनों कई अपराधों में दोषी पाए जा चुके हैं। मनाफोर्ट तो नजरबंदी की सजा भी भोग रहे हैं।
इन माफीनामों का मुख्य संदेश यह है कि ट्रंप अब चुनाव में हार को स्वीकार करने मन बना चुके हैं। अभी उनको उम्मीद थी कि न्यायपालिका की मदद से वे हारा हुआ चुनाव पलट देंगे लेकिन अब ऐसा होता नहीं दिख रहा है। उन्होंने अमरीका के पांच बैटिलग्राउंड राज्यों पेंसिलवानिया, एरिजोना, विस्कासिन, जार्जिया और मिशिगन में चुनावी धांधली के मुकदमे दायर करवाए थे। हर जगह से उनके खिलाफ फैसले आते रहे। एक विस्कासिन बचा था। विस्कसिन राज्य का फैसला आज ही आया है। न्यायपालिका से बहुत उम्मीद थी क्योंकि उन्होंने फेडरल सुप्रीम कोर्ट में एक जज हड़बड़ी में इसी योजना के तहत भर्ती किया था कि जरूरत पडऩे पर उनके पक्ष में फैसला आ जाएगा लेकिन उन्हें वहां भी हार ही मिली। अमरीका में सभी राज्यों के अलग अलग चुनावी कानून होते हैं और अलग तरह की न्याय प्रणाली होती है।
37 राज्यों में जज भी चुनाव लडक़र होते हैं पदासीन
मसलन अमरीका के पचास राज्यों में से 37 राज्यों में जज भी चुनाव लडक़र पदासीन होते हैं। वे बाकायदा पार्टी के टिकट पर चुनकर आते हैं। ट्रंप की नवीनतम कानूनी हार विस्कासिन राज्य में हुई है। वहां के जिस जज ने उनके खिलाफ फैसला दिया है वह ट्रंप की पार्टी, िरपब्लिकन पार्टी के टिकट पर चुनकर आया था। जब उसने कानून के हिसाब से सही फैसला दे दिया तो ट्रम्प महोदय उसको भी गाली देने लगे। उसके खिलाफ ट्वीट किया और उनके समर्थकों ने उसके खिलाफ सोशल मीडिया पर अभियान शुरू कर दिया। अब लगता है कि वे अपनी हार को न्यायपालिका की मदद से जीत में बदलवाने की उम्मीद छोड़ चुके हैं। जब ज़्यादातर अमरीकियों ने यह मान लिया है कि डोनाल्ड ट्रंप चुनाव हार चुके हैं। न्यायपालिका ने उनको साफ बता दिया है कि उनकी सनक के आधार पर फैसला नहीं दिया जा सकता, कानून ही किसी भी फैसले की बुनियाद होता है।
डोनाल्ड ट्रंप जिस तरह से लोगों को माफी दे रहे हैं उससे संकेत आने लगे हैं अब हठधर्मी का उनका हौसला पस्त हो चुका है।और अब वे राष्ट्रपति पद छोडऩे के बारे में विचार कर रहे हैं। अमरीकी संविधान के संस्थापकों, खासकर अलेक्जेंडर हैमिल्टन ने यह नियम बनाया था कि अगर राष्ट्रपति को लगता है कि न्यायपालिका में किसी के साथ अन्याय हो गया है या किसी को उसके अपराध के अनुपात से ज्यादा सजा हो गई है तो अमरीकी राष्ट्रपति उसको माफी दे सकता है।
अपने संस्थापकों के इसी प्रावधान को इस्तेमाल करके डोनाल्ड ट्रंप लगातार अपने करीबी लोगों को माफी दे रहे हैं। राष्ट्रपति हैमिल्टन के समय से ही यह रिवाज है कि राष्ट्रपति अपराधियों को माफी दे देता है। जिसको माफी मिल जाती है उसके ऊपर उसी केस में दोबारा मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। लेकिन बाद के कुछ राष्ट्रपतियों ने जघन्य अपराधियों को भी माफी दी। इस सिलसिले में रिचर्ड निक्सन का नाम लिया जाता है। वे सत्तर के दशक में अमरीका के राष्ट्रपति थे। उन्होंने तरह तरह के अपराध किये थे। उनके ऊपर वाटरगेट स्कैंडल के कारण महाभियोग की तैयारी हो चुकी थी। लेकिन उन्होंने अपने
उपराष्ट्रपति जेराल्ड फोर्ड से सौदा किया
उपराष्ट्रपति जेराल्ड फोर्ड से सौदा किया कि वे इस्तीफ़ा दे देंगें और अमरीका के संविधान के अनुसार फोर्ड बिना कोई चुनाव लडे राष्ट्रपति बन जायेगें। उसके बदले में उनको राष्ट्रपति के रूप में रिचर्ड निक्सन के अपराधों के लिए माफी देनी पड़ेगी। ऐसा ही हुआ और फोर्ड अगस्त 1974 से जनवरी 1977 तक राष्ट्रपति रहे।
निक्सन की तरह ही ट्रंप भी अपराधी प्रवृत्ति के राष्ट्रपति हैं लेकिन जसी तरह से उन्होंने अपने खास लोगों को माफी देने का सिलसिला शुरू कर दिया है, उससे लगता है कि वे निक्सन का भी रिकार्ड तोड़ेंगे। अंधाधुंध माफी देने के चक्कर में वे ऐसे अपराधियों को भी माफी दे रहे हैं जिनके अपराध जघन्य हैं और कुछ मामलों में तो अपराधी ने अपने जुर्म को कोर्ट के सामने कबूल भी कर लिया है।
क्या राष्ट्रपति अपने आपको माफ कर सकते हैं?
इन माफियों के सिलसिले में सबसे जरूरी बिंदु है कि क्या राष्ट्रपति ऐसे अपराधों के लिए भी माफी दे सकते हैं जो अपराध हुए ही न हों। जानकर बताते हैं कि ट्रंप और उनके कऱीबी लोगों ने इतने अपराध किए हैं कि उनके ऊपर मुक़दमा चलना तो तय है। इमकान है कि कानून अपना काम करेगा और अगर कानून इमानदारी से काम करता है तो ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप, दामाद और उनके सबसे करीबी वकील रूडी जुलियानी पर मुकदमा जरूर चलेगा। अभी इन लोगों पर मुकदमा दायर नहीं हुआ है। बहस इसी विषय पर हो रही है कि क्या राष्ट्रपति एडवांस में किसी को माफी दे सकते हैं। एक कानूनी चर्चा और भी हो रही है कि क्या राष्ट्रपति अपने आपको माफ कर सकते हैं। उनके ऊपर तो कई केस दर्ज भी हैं।
रिचर्ड निक्सन ने तो अपने आप को माफ नहीं किया था क्योंकि माफी लेने के लिए उन्होंने अपने उपराष्ट्रपति को राष्ट्रपति बनाकर माफी हासिल की थी। बहरहाल राष्ट्रपति ट्रंप की माफी देने की कारस्तानी के बाद लोगों को लग रहा है कि लगता है कि ट्रंप को भी इस बात का एहसास हो चुका है कि उनको अब तो जाना ही पडेगा और पद से हटने के बाद उनको मुकदमों का सामना भी करना पड़ेगा। अगर उनकी खुद को दी गई माफी को जायज भी मान लिया जाएगा तो भी राष्ट्रपति की माफी केवल उन्हीं मामलों के लिए होती है जो फेडरल न्याय क्षेत्र में होते हों। राज्यों के मामलों के लिए राष्ट्रपति किसी को माफी नहीं दे सकते। डोनाल्ड ट्रंप के ऊपर न्यूयॉर्क राज्य में टैक्स चोरी के कुछ मामले दर्ज हैं। उनमें किसी माफी का प्रावधान नहीं है। (न्यूज 1)
(डिसक्लेमर- यह लेखक के निजी विचार हैं।)
डॉ. वेंकटेश दत्ता-
जलीय पारिस्थितिक तंत्र और मानव आजीविका को बनाए रखने के लिए प्रकृति और समाज भूजल पर निर्भर करता है। लेकिन जहां जल निष्कर्षण, जलीय पुनर्भरण से अधिक है, वहां स्थानीय और क्षेत्रीय भूजल आपूर्ति घट रही है। दुनिया भर में, 90% पानी का उपयोग सिंचाई में होता है और वैश्विक भूजल स्रोतों से 545 किमी3 वार्षिक पानी की पंपिंग होती है। दुनिया के कुछ महत्वपूर्ण जलक्षेत्रों में भूजल पम्पिंग वांछनीय स्तर से अधिक है।इसका एक सीधा प्रभाव नदी के प्रवाह में तेजी से गिरावट है।
पानी की बढ़ती मांग के कारण उत्तरी भारत में भूजल निष्कर्षण हाल ही में पुन: प्रयोज्य भूजल (फिर से भरने योग्य भूजल) से अधिक हो गया है, जिससे जल स्तर में लगातार कमी आ रही है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) और अन्य देशों के भूजल विभाग 1990 के दशक के दौरान गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु बेसिन के अंदर भारत, नेपाल और बांग्लादेश में भूजल निष्कर्षण की कुल दर का अनुमान ∼172 किमी 3 लगाते हैं। इसके अलावा, पिछले कुछ वर्षों में निष्कर्षण दरों में नाटकीय रूप से वृद्धि हुई है और यह संभावना है कि हाल की दरें बहुत अधिक हैं। सीजीडब्ल्यूबी का अनुमान है कि गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु बेसिन के जलग्रहण क्षेत्र में अधिकतम संभावित भूजल पुनर्भरण 246 किमी3/वर्ष है; मानसून के मौसम में इससे नीचे की निकासी दर को रिचार्ज द्वारा ऑफसेट किया जाता है। ग्रेस (GRACE) ‐ माइनस मॉडल इंगित करता है कि भूजल निकासी की वर्तमान दर अधिकतम संभावित भूजल पुनर्भरण से अधिक है। कृषि विकास और औद्योगिकीकरण बढ़ने के साथ आने वाले वर्षों में भूजल की मांग कई गुना बढ़ जाएगी।
यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि सभी नदियों के आधार प्रवाह को बनाए रखने में भूजल का महत्वपूर्ण योगदान है। भूजल की क्रमिक कमी निश्चित रूप से गंगा में पानी की मात्रा और प्रवाह कम करने में योगदान दे रही है। गंगा में बेस फ्लो की मात्रा 1970 के दशक की सिंचाई पंपिंग की शुरुआत से लगभग 60 प्रतिशत कम हो गई है। गंगा के जलभृत से सटे भूजल भंडारण में भी प्रति वर्ष लगभग 30 से 40 सेमी की कमी आई है। नदी के प्रवाह पर भूजल स्तर में गिरावट का प्रभाव गंगा की कई अन्य सहायक नदियों पर देखा जा सकता है, जिन्हें बर्फ के पिघलने से कोई पानी नहीं मिल रहा है। यह नदी के पानी पर भूजल की कमी के प्रभाव को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है।
गंगा, दुनिया की सबसे बड़ी नदियों में से एक है, जिसके विस्तृत मैदानों ने पिछले तीन हजार वर्षों से अधिक समय तक भारतीय सभ्यता और संस्कृति को बनाए रखा है। भारत में गंगा बेसिन का क्षेत्र ~ 8.6 × 105 किमी2 है और वर्तमान में सबसे बड़ी और घनी वैश्विक आबादी (वैश्विक जनसंख्या का 10%) को समायोजित किया है। भूजल की अवैज्ञानिक निकासी से वैश्विक खाद्य उत्पादन को खतरा हो सकता है। जल-स्तर की गिरावट के प्रभावों को व्यापक रूप से सूचित किया गया है। यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि भूजल में गिरावट सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय परिणामों की एक विस्तृत श्रृंखला को जन्म दे सकता है, जिसमें शामिल हैं: निकटवर्ती एक्वीफर सिस्टम से भूजल प्रवाह के पैटर्न में महत्वपूर्ण परिवर्तन; पारिस्थितिक तंत्रों और डाउनस्ट्रीम उपयोगकर्ताओं को परिणामी क्षति के साथ स्ट्रीम बेस फ्लो, वेटलैंड्स आदि में गिरावट; पम्पिंग लागत और ऊर्जा उपयोग में वृद्धि; भूमि अवसंरचना और सतह के बुनियादी ढांचे को नुकसान; पीने, सिंचाई और अन्य उपयोगों के लिए विशेष रूप से गरीबों के लिए पानी की कमी।
गंगा नदी को विशेष रूप से गैर-मानसून, शुष्क अवधि के दौरान भूजल निर्वहन (बेसफ्लो के रूप में) निरंतर बहने वाली बारहमासी नदी के रूप में वर्णित किया गया है। मॉनसून सीज़न के 4 महीनों (जून-सितंबर) में ओवरलैंड फ्लो अधिकतम प्रवाह के साथ >70% वर्षा से होता है। गंगा नदी का बहाव भूजल आधार से संबंधित है, जो आस-पास के गंगा जलभृतों में चल रहे भूजल संग्रहण के कारण होता है। हिमालय में देवप्रयाग के आसपास गंगा में भूजल के आधार पर औसत वार्षिक प्रवाह 48-56% होने का अनुमान लगाया गया है।
हाल के वर्षों की गर्मियों (प्री-मानसून) में, पिछले कुछ दशकों के दौरान गंगा (या गंगा की सहायक नदियाँ) में निम्न जल स्तर, भूजल स्तर में कमी दर के साथ देखा जा रहा है। 1970 के दशक की सिंचाई-पंपिंग क्रांति की शुरुआत से, बेसफ्लो मध्य और निचले गंगा बेसिन में लगभग 60% कम हो गया है। यह एक अच्छा संकेत नहीं है, क्योंकि बारहमासी नदियों में प्रवाह भूजल प्रणालियों पर बहुत अधिक निर्भर करता है। भूजल से जुड़े नदी के पानी की कमी, यह सरल तथ्य हमारे इंजीनियरों द्वारा नहीं समझा गया है, जो नदी से पानी लेने के विज्ञान को जानते हैं, लेकिन नदी में वापस पानी लाने का कोई ज्ञान नहीं है। हम वास्तव में शोषक विज्ञान में अच्छे हैं, लेकिन पारिस्थितिक संरक्षण में हमारा ज्ञान बहुत निराशाजनक है।
गंगा नदी के पानी में कमी से घरेलू और सिंचाई पानी की आपूर्ति, नदी परिवहन, आदि को उत्तरी भारतीय मैदानों में घनी आबादी वाले को खतरे में डाल सकती है। गंगा नदी की घटती सतह जल सिंचाई के लिए उपलब्ध भूजल को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी, जिससे खाद्य उत्पादन में संभावित गिरावट होगी। नदी के पानी की कमी का सीधा असर क्षेत्रीय जल सुरक्षा और खाद्य उत्पादन पर पड़ता है, जो इस क्षेत्र में रहने वाली 100 मिलियन से अधिक आबादी को संकट में डाल सकता है। गंगा बेसिन में नदी जल की मात्रा में कमी से भविष्य की खाद्य सुरक्षा पर भी गहरा असर पड़ेगा, जिसे आमतौर पर "दक्षिण एशिया की ब्रेड-बास्केट" के रूप में जाना जाता है। घनी आबादी वाले क्षेत्रों में नदी के पानी की उपलब्धता को निर्धारित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।
विश्व की शहरी जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है, 1950 में दुनिया की आबादी का 30% शहरों में रहा करते थे जो 2018 में बढ़कर 55% हो गए हैं। शहरी जनसंख्या में लगातार वृद्धि से कई पर्यावरणीय समस्याओं का जन्म हुआ है, जिनमें से सबसे आम है भूजल स्तर में गिरावट और पानी की गुणवत्ता में कमी। भारत में 1950 से शहरी आबादी में तीन गुना वृद्धि हुई है और बीसवीं सदी की शुरुआत से आठ गुना वृद्धि हुई है। भारत के शहरी क्षेत्रों में रहने वाली जनसंख्या 1951 में 17.3% से बढ़कर 1991 में 25.7% हो गई है। इसके अलावा, शहरी जनसंख्या में वृद्धि की दर (3.1% प्रति वर्ष) भी समग्र जनसंख्या वृद्धि दर (2%) से अधिक है। जलवायु परिवर्तन और भू-उपयोग परिवर्तन जनसंख्या वृद्धि के परिणामस्वरूप स्थिति को और अधिक बढ़ा देते हैं। देश में कई शहर हैं जहां पीने के पानी की जरूरत का 80-100% हिस्सा खोदे गए कुओं, स्प्रिंग्स, नलकूपों और हैंड पंपों से मिलता है। भूजल स्तर कई राज्यों में तेजी से घट रहा है। हाल के भूजल कमी क्षेत्रों का विकास पूर्वोत्तर राज्यों, और पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र घाटियों में गैर-समेकित तलछटों (अनकंसॉलिडेटेड सेडीमेंट्स) में केंद्रित है। भूजल की कमी की दर असम में सबसे अधिक पाई गई, उसके बाद पश्चिम बंगाल और बिहार में कमी की दर सबसे अधिक है।
सामान्य तौर पर, नदी भूजल से बेसफ्लो के साथ-साथ बेसिन हिंटरलैंड में वर्षा, हिमालयन हिमनद पिघल (~1500 मिमी / वर्ष) से प्रवाहित होती है।नदी के पानी और भूजल के बीच का संबंध भूजल स्तर और नदी के स्तर के सापेक्ष अंतर से निर्धारित होता है। एक नदी को " गेनिंग" के रूप में परिभाषित किया जाता है जब इसे भूजल सीपेज (बेसफ्लो) द्वारा बनाए रखा जाता है। इसे " लूज़िंग" प्रकार के रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है यदि नदी का पानी आसन्न जलभृत में बह जाता है, या दो तरफा विनिमय नदियों को मौसमी जल स्तरों द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
यह एक विडंबना है कि उच्चतम भूजल की कमी वाले भारतीय राज्य जल-गहन फसल (वाटर इंटेंसिव क्रॉपिंग) प्रथाओं के अधीन हैं। आस-पास के एक्वीफरों में वितरित और अंधाधुंध पम्पिंग द्वारा भूजल निकासी बेसफ्लो में कमी या स्ट्रीमफ्लो कैप्चर में वृद्धि से नदी के प्रवाह को बाधित कर सकती है। पंपिंग की शुरुआत में, मुख्य रूप से भूजल भंडारण से अमूर्त पानी को बहाया जाता है, जो जलभृत की भौतिक विशेषताओं के आधार पर, धारा और जलभृत के बीच हाइड्रोलिक संबंध, नलकूपों के स्थान और दशकों तक पंपिंग के साथ, आसन्न जल को बदल सकता है। गंगा बेसिन में प्री-मॉनसून सीजन के दौरान कम प्रवाह वाले मौसमों के दौरान तीव्र भूजल पंपिंग के कारण इस तरह के प्रवाह में कमी बेहद चिंताजनक है।
औसतन, गंगा बेसिन के प्रत्येक वर्ग किमी में वर्षा से एक मिलियन क्यूबिक मीटर (एमसीएम) पानी प्राप्त होता है। इसका 30 प्रतिशत वाष्पीकरण के रूप में खो जाता है, 20 प्रतिशत एक्वीफर में रिसता है और शेष 50 प्रतिशत सतह अपवाह (सरफेस रनॉफ़) के रूप में उपलब्ध होता है। उच्च बैंकों द्वारा बंधी गंगा नदी का गहरा चैनल बेस फ्लो के रूप में आस-पास के जलभृतों में चल रहे भूजल संग्रहण प्रदान करता है। वार्षिक बाढ़ गंगा बेसिन की सभी नदियों की विशेषता है।
मानसून के दौरान गंगा उठती है लेकिन उच्च बैंक बाढ़ के पानी को फैलने से रोकते हैं। बाढ़ का मैदान आमतौर पर 0.5 से 2 किमी चौड़ा होता है। इस सक्रिय बाढ़ के मैदान में हर साल बाढ़ आती है। इसके अतिरिक्त गंगा बेसिन पर विद्यमान संरचनाएं भी इसके निर्वहन को प्रभावित करती हैं। प्रवाह की निरंतरता बनाए रखने के लिए गंगा नदी में पानी के मुख्य स्रोत हैं की वर्षा, उपसतह का प्रवाह और हिमनद । गंगा के सतही जल संसाधनों का आकलन 525 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) किया गया है। इसकी 17 मुख्य सहायक नदियों में से यमुना, सोन, घाघरा और कोसी गंगा की वार्षिक जल के आधे हिस्से में योगदान करती हैं। यमुना इलाहाबाद में गंगा से मिलती हैं और आगे की ओर बहती हैं। हरिद्वार- इलाहाबाद खंड के बीच नदी में प्रवाह की समस्या है। दिसंबर से मई तक गंगा के प्रवाह में कमी देखा जा सकता है।
भूजल की कमी से, पर्यावरणीय प्रवाह और मछलियों जैसे जलीय प्रजातियों के पारिस्थितिक परिणामों की शायद ही कभी जांच की जाती है। हमने देखा है कि भूजल हमारी नदियों में पर्यावरणीय प्रवाह का एक प्रमुख स्रोत है। जल स्तर में गिरावट के साथ, बारहमासी नदियाँ मौसमी होती जा रही हैं। गंगा की कई सहायक नदियाँ हैं जिनमें पिछले पचास वर्षों में प्रवाह में 30 से 60 प्रतिशत की गिरावट आई है। प्रमुख कारणों में से एक भूजल स्तर में गिरावट और आधार प्रवाह में वियोग है। कृषि के लिए भूजल पंपिंग एक प्रमुख कारक है, जो वैश्विक मीठे पानी के पारिस्थितिक तंत्र की गिरावट का कारण बनता है। पानी की स्थायी उपलब्धता और पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण के लिए सतही जल के उपयुक्त प्रबंधन के साथ साथ एक्वीफर्स को रिचार्ज करना बहुत आवश्यक है। (downtoearth)


