अंतरराष्ट्रीय

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24-Jun-2021 8:17 AM (28)

नई दिल्ली, 24 जून (आईएएनएस)| अमेरिकी ट्रेजरी ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (ओएफएसी) ने भारत के नागरिक मनोज सभरवाल को तस्करी नेटवर्क के सदस्यों के बीच नामित किया है, जो ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स-क्यूड्स फोर्स (आईआरजीसी-कोड्स फोर्स) और यमन में हौथियों को फंड देने में मदद करता है। ईरान स्थित हौथी फाइनेंसर सईद अल-जमाल के नेतृत्व में यह नेटवर्क ईरानी पेट्रोलियम जैसी वस्तुओं की बिक्री से यमन में हौथियों के लिए दसियों मिलियन डॉलर का राजस्व उत्पन्न करता है, जिसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा कई देशों में बिचौलियों और विनिमय घरों के एक जटिल नेटवर्क के माध्यम से निर्देशित होता है।

यूएस ट्रेजरी के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात स्थित सभरवाल एक समुद्री शिपिंग पेशेवर है जो अल-जमाल के नेटवर्क के लिए शिपिंग संचालन का प्रबंधन करता है और अल-जमाल को ईरानी तेल उत्पादों की तस्करी पर सलाह देता है।

सभरवाल अल-जमाल की भागीदारी को अस्पष्ट करते हुए पूरे मध्य-पूर्व और एशिया में ईरानी पेट्रोलियम उत्पादों और वस्तुओं के शिपमेंट के समन्वय के लिए जिम्मेदार है।

सभरवाल को अल-जमाल को या उसके समर्थन में भौतिक रूप से सहायता, प्रायोजित, या वित्तीय, सामग्री, या तकनीकी सहायता, या सामान या सेवाएं प्रदान करने के लिए नामित किया जा रहा है।

यमन में संघर्ष की शुरुआत के बाद से, हौथियों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार और सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के खिलाफ अपने अभियान को चलाने के लिए आईआरजीसी-क्यूएफ के समर्थन पर भरोसा किया है।


23-Jun-2021 10:12 PM (26)

तालिबान ने अफगानिस्तान के कई बड़े शहरों पर दोबारा कब्जा कर लिया है. पिछले कुछ दिनों में उसने बड़े सैन्य अभियान चलाए हैं और वह कई प्रांतों की राजधानियों के करीब पहुंच चुका है.

    (dw.com)

अमेरिका और नाटो सेनाओं की अफगानिस्तान से जारी वापसी के बीच तालिबान ने देश के हिस्सों को कब्जाने के लिए हमले तेज कर दिए हैं. संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि कई राज्यों की राजधानियों पर जल्दी ही तालिबान का कब्जा हो सकता है. संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि है इससे हाल के दिनों में शांति स्थापना को लेकर हुई राजनीतिक प्रगति और लोगों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है.

नाटो सेनाओं की 11 सितंबर तक अफगानिस्तान छोड़ देने की योजना है. इसका अर्थ यह होगा कि देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी स्थानीय सेना के हाथ में होगी. ऐसी खबरें आ रही हैं कि पिछले कुछ दिनों में तालिबान ने कई इलाकों में बड़े हमले किए हैं. अफगान अधिकारियों ने जानकारी दी है कि उत्तरी हिस्से में तालिबान तेजी से आगे बढ़ रहा है और अपने पारपंरिक गढ़ से काफी बाहर निकल आया है.

तालिबान लड़ाकों ने मंगलवार को शीर खान बंदर पर कब्जा कर लिया, जो ताजिकिस्तान के साथ लगती सीमा पर अफगानिस्तान का एक अहम शहर है. इससे पहले वे उत्तरी प्रांत बगलान के नाहरीन और बगलान ए मरकजी जिलों को भी कब्जा चुके हैं.

50 जिलों पर कब्जाः यूएन
अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत डेबरा ल्योन्स का कहना है कि मई से अब तक देश के 370 में से 50 जिलों पर तालिबान का कब्जा हो चुका है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को उन्होंने बताया, "जो जिले उन्होंने कब्जाए हैं वे प्रांतों की राजधानियों के इर्द गिर्द हैं. इससे संकेत मिलता है कि तालिबान रणनीतिक जगह बना रहा है और विदेशी फौजों के पूरी तरह चले जाने के बाद इन राजधानियों पर कब्जा करने की कोशिश कर सकता है.”

ल्योन्स ने कहा कि हाल ही में जो कब्जे तालिबान ने किए हैं वे लड़ाई के दम पर किए हैं और उसके इस तरह के बड़े सैन्य अभियान एक त्रासद बात होगी. उन्होंने कहा, "अफगानिस्तान में लड़ाई बढ़ने का मतलब नजदीक और दूर के बहुत से देशों की सुरक्षा को खतरा है.”

अमेरिका ने कहा है कि देश से उसकी सेनाओं के चले जाने के बाद भी वह तालिबान पर निगाह रखेगा और आतंकवाद विरोधी हमले करता रहेगा. अमेरिका अधिकारियों ने कहा कि तालिबान पर सूचनाएं जुटाना और नजदीकी देशों से इलाके पर सैन्य हमले जारी रहेंगे.

हालांकि अमेरिका के लिए इलाके में नया सैन्य ठिकाना बनाने का काम मुश्किल हो सकता है क्योंकि इससे रूस और चीन के साथ तनाव बढ़ सकता है, जो मध्य एशिया में अहम भूमिका रखते हैं. अफगानिस्तान के कुछ पड़ोसी देश, जैसे कि पाकिस्तान पहले ही अमेरिकी सेनाओं को जगह देने से इनकार कर चुके हैं.

शांति पर खतरा
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी दूत लिंडा थॉमस-ग्रीनफील्ड ने कहा कि अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता की प्रक्रिया में योगदान के लिए उनका देश आर्थिक मदद और कूटनीति का भी इस्तेमाल करेगा.

अमेरिका ने 11 सितंबर के आतंकवादी हमले के बाद 2001 में अफगानिस्तान पर हमला किया था और तालिबान को सत्ता से बाहर कर दिया था. दो दशक बाद तालिबान और अफगानिस्तान सरकार के बीच समझौते के लिए बातचीत चल रही है, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की सेनाएं वापसी की तैयारी कर रही हैं.

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा था कि वह 11 सितंबर से पहले हर हाल में अफगानिस्तान से सेनाओं की वापसी चाहते हैं. वापसी की प्रक्रिया पर चर्चा के लिए वह इसी हफ्ते अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी से मिलने वाले हैं. कई मानवाधिकार कार्यकर्ता चिंतित है कि तालिबान यदि वापस अफगानिस्तान की सत्ता हासिल कर लेता है तो क्षेत्र में महिलाओं के अधिकारों की दिशा में हुई प्रगति खतरे में पड़ सकती है.

वीके (रॉयटर्स, एएफपी, डीपीए)


23-Jun-2021 6:23 PM (44)

स्पेस न्यूज की खबर के मुताबिक चिली में अटाकामा लार्ज मिलिमीटर/सबमिलीमीटर एरे के रिसर्चर्स ने इन हवाओं की खोज की है. ये हवाएं बिग बैंग के 80 करोड़ साल बाद दिखाई दीं हैं. तूफान का आकार हमारे सूर्य के आकार से अरबों गुना अधिक है.

रिसर्चर्स की टीम का कहना है कि सूर्य से अरबों गुना बड़े ब्लैक होल से निकलने वाले इस तरह के तूफान का ये अब तक खोजा गया पहला उदाहरण है.

स्पेस न्यूज की खबर के मुताबिक, ब्लैक होल का द्रव्यमान आकाशगंगा के केंद्र का अनुपात के बराबर होता है. दोनों एक-दूसरे के विकास के लिए जिम्मेदार हैं. ऐसे में इस तरह की तूफानी हवा ऐसा ही करती है.

महाविशाल ब्लैक होल भारी मात्रा में मैटर को निगल लेता है. जब यह मैटर ब्लैक होल की ग्रैविटी के कारण तेज गति से बढ़ता है, तो इससे ऊर्जा निकलती है जिससे मैटर बाहर की ओर जा सकता है और इसी से ये हवाएं पैदा होती हैं.

सुबारू टेलिस्कोप की वाइड-फील्ड की मदद से 13 अरब साल पहले की 100 से ज्याद गैलेक्सी देखी गईं जिनमें महाविशाल ब्लैक होल थे.

इससे पहले, एस्ट्रोनोमर्स ने खूबसूरत नक्शों के जरिए ब्रह्मांड की एक तारकीय नर्सरी को दिखाया, जहां सितारों का जन्म होता है. इस तस्वीर से पूरे ब्रह्मांड की विविधता का पता चलता है. एस्ट्रोनोमर्स ने ALMA ऑब्जर्वेटरी के टेलिस्कोप के जरिए पास के यूनिवर्स में मौजूद मॉलिक्यूलर क्लाउड्स की गणना की है. (news18.com)


23-Jun-2021 3:26 PM (28)

अफ़ग़ानिस्तान में शांति स्थापित करने के मुद्दे के बीच एक बार फिर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान का बयान सामने आया है.

ग़ौरतलब है कि हाल ही में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी के अफ़ग़ानिस्तान, तालिबान और अमेरिका पर दिए बयान काफ़ी चर्चा में रहे हैं.

रविवार को एचबीओ मैक्स पर प्रसारित हुए इमरान ख़ान के इंटरव्यू के बाद उनके कई बयानों पर चर्चा जारी है. यह इंटरव्यू अमेरिकी समाचार वेबसाइट AXIOS ने लिया था.

इस दौरान इंटरव्यू लेने वाले पत्रकार जोनाथन स्वैन ने इमरान ख़ान से पूछा था कि क्या अफ़ग़ानिस्तान से इस साल 11 सितंबर को अमेरिकी सेना के चले जाने के बाद पाकिस्तान उसे अपने बेस का इस्तेमाल करने देगा.

इसके जवाब में इमरान ख़ान ने कहा था कि वो इसकी इजाज़त नहीं देंगे.

इसके अलावा इमरान ख़ान ने पाकिस्तान की अफ़ग़ानिस्तान में शांति स्थापित करने की भूमिका और चरमपंथ के ख़िलाफ़ लड़ाई पर भी काफ़ी कुछ बोला था.

पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में अपनी मज़बूत पकड़ रखना चाहता है लेकिन साल 2001 में अमेरिका के अफ़ग़ानिस्तान में घुसने के बाद और तालिबान को सत्ता से हटाने के बाद उसकी पकड़ कमज़ोर हुई है.

लेकिन पाकिस्तान शांति वार्ता के ज़रिए और तालिबान-अमेरिका के बीच समझौता कराने के उद्देश्य से अफ़ग़ानिस्तान में अपनी पकड़ मज़बूत रखना चाहता है.

पाकिस्तान के शीर्ष नेता लगातार अफ़ग़ानिस्तान को लेकर बयान दे रहे हैं. इसी कड़ी में पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी और अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) हम्दुल्लाह मोहिब के बीच काफ़ी 'तू-तू मैं-मैं' भी देखी जा चुकी है.

अफ़ग़ानिस्तान के NSA कह चुके हैं कि पाकिस्तान जान-बूझकर अफ़ग़ानिस्तान के मामले में दख़ल दे रहा है. और वो पाकिस्तान पर अक्सर ही अफ़ग़ान तालिबान को समर्थन और मदद देने का आरोप लगाते रहे हैं.

हालांकि, इस बात को माना भी जाता है कि जब तक अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान प्रभावी रहा तब तक पाकिस्तान का दख़ल काफ़ी रहा लेकिन 9/11 के हमले के बाद स्थिति बदली और अफ़ग़ानिस्तान में चुनी हुई सरकार आई.

चुनी हुई सरकार आने के बाद से पाकिस्तान की स्थिति अफ़ग़ानिस्तान में कमज़ोर हुई है. अमेरिका और तालिबान के बीच शांति वार्ता में अफ़ग़ानिस्तान की सरकार शामिल नहीं रही थी और जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान भी यही चाहता था.

अफ़ग़ानिस्तान को लेकर अब इमरान ख़ान ने अमेरिकी अख़बार 'द वॉशिंगटन पोस्ट' में एक लेख लिखा है, जिसका शीर्षक है 'अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान शांति के लिए साझेदार बनने को तैयार है, लेकिन हम अमेरिकी बेस के मेज़बान नहीं होंगे.'

इससे एक बात फिर साफ़ हो गई है कि पाकिस्तान अमेरिका के अफ़ग़ानिस्तान से जाने के बाद वो अपनी ज़मीन को उसे इस्तेमाल नहीं करने देगा.

वो इसकी इजाज़त क्यों नहीं देगा इसका तर्क देते हुए इमरान ख़ान ने लिखा है, "अगर पाकिस्तान अमेरिकी बेस की मेज़बानी की अनुमति दे देता है जहां से अफ़ग़ानिस्तान पर बम गिराए जाएं तो फिर एक और अफ़ग़ान गृह युद्ध छिड़ेगा, पाकिस्तान से बदला लेने के लिए आतंकी उसे निशाना बनाएंगे. हम इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं. हम पहले ही बहुत बड़ी क़ीमत इसकी दे चुके हैं. वहीं, अगर अमेरिका इतिहास की सबसे शक्तिशाली सैन्य मशीन के साथ अफ़ग़ानिस्तान के अंदर 20 साल बाद भी युद्ध नहीं जीत सकता तो फिर वो हमारे बेस से कैसे जीत जाएगा?"

लेकिन दूसरी ओर अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में बैठे नागरिक सरकार के वरिष्ठ नेताओं के बयान अक्सर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ रहते हैं, जिससे साबित होता है कि वो पाकिस्तान को इन सबके बीच में नहीं आने देना चाहते हैं.

उनका आरोप रहा है कि पाकिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल अभी भी चरमपंथी अफ़ग़ानिस्तान में हमले के लिए कर रहे हैं. वहीं, पाकिस्तान कहता आया है कि उसने चरमपंथ की भारी क़ीमत चुकाई है.

दोनों देशों के बीच तनातनी की झलक इमरान ख़ान के लेख में भी देखने को मिली है.

इमरान ख़ान ने लिखा, "अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका और पाकिस्तान के हित एक जैसे हैं. हम बातचीत के ज़रिए शांति चाहते हैं न कि गृह युद्ध. हम स्थिरता चाहते हैं और दोनों देशों में आतंकवाद को ख़त्म करना चाहते हैं. हमने उस समझौते का समर्थन किया है जो अफ़ग़ानिस्तान में दो दशकों में हुए विकास को संरक्षित रखेगा. हम आर्थिक विकास चाहते हैं और मध्य एशिया से कनेक्टिविटी चाहते हैं ताकि व्यापार बढ़े और हमारी अर्थव्यवस्था ऊपर उठे. अगर आगे गृह युद्ध हुआ तो हम सभी बह जाएंगे."

इसके अलावा इमरान ख़ान ने अपने लेख में पाकिस्तान को तालिबान और अमेरिका को बातचीत के लिए एक टेबल पर लाने का श्रेय दिया.

उन्होंने लिखा है, "तालिबान को बातचीत की मेज़ पर लाने के लिए हमने वास्तविक कूटनीतिक कोशिशें की हैं. सबसे पहले अमेरिका के साथ और फिर अफ़ग़ान सरकार के साथ. हम जानते हैं कि अगर तालिबान सैन्य जीत घोषित करता है तो इसके कारण न समाप्त होने वाला रक्तपात शुरू होगा. हम आशा करते हैं कि अफ़ग़ान सरकार भी बातचीत में अधिक लचीलापन दिखाएगी और पाकिस्तान को दोष देना बंद करेगी. जैसा कि हम सबकुछ कर रहे हैं हम सैन्य कार्रवाई भी कम कर सकते हैं."

अफ़गानिस्तान में पाकिस्तान के अलावा रूस और चीन की भी ख़ासी रुचि है और इसका ज़िक्र इमरान ख़ान के लेख में भी मिलता है.

लेकिन उधर भारत के अफ़ग़ानिस्तान से मज़बूत रिश्ते पाकिस्तान को परेशान करते रहे हैं.

पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी के अफ़ग़ान टीवी चैनल टोलो न्यूज़ को दिए इंटरव्यू में भारत की अफ़ग़ानिस्तान में मौजूदगी पर सवाल उठाए थे.

टोलो न्यूज़ ने क़ुरैशी से पूछा कि अफ़ग़ानिस्तान में भारत के कितने काउंसलेट हैं? इस पर क़ुरैशी ने कहा, ''आधिकारिक रूप से तो चार हैं लेकिन अनाधिकारिक रूप से कितने हैं, ये आप बाताएंगे. मुझे लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान की सरहद भारत से नहीं मिलती है. ज़ाहिर है कि अफ़ग़ानिस्तान का भारत से एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में संबंध है.''

''दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध हैं. ये आपका अधिकार है कि भारत के साथ द्विपक्षीय संबंध रखें. दोनों देशों के बीच कारोबार भी है और इसमें हमें कोई दिक़्क़त नहीं है. लेकिन मुझे लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान में भारत की मौजूदगी जितनी होनी चाहिए उससे ज़्यादा है क्योंकि दोनों देशों के बीच कोई सीमा भी नहीं लगती है.''

वहीं, भारत के विदेश मंत्रालय ने दो सप्ताह पहले साफ़ किया था कि वो अफ़ग़ान शांति प्रक्रिया के साझेदारों के साथ संपर्क में हैं. भारत किस-किस साझेदार के संपर्क में है यह साफ़ नहीं है लेकिन ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि भारत की तालिबान के नेताओं से भी बातचीत हुई है.

ये सब बातें पाकिस्तान के लिए ख़ास मायने रखती हैं इसीलिए वो बेहद सावधानी से इस मामले में आगे बढ़ रहा है. इमरान ख़ान ने अपने लेख में कुछ ग़लतियों को भी स्वीकार किया है.

उन्होंने लिखा है, "पहले पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में विभिन्न पक्षों को चुनने में ग़लती कर चुका है और उससे उसने सीखा. हमारा कोई चहेता नहीं है और हम किस भी सरकार के साथ काम करना चाहेंगे जिसने अफ़ग़ानी लोगों के भरोसे को जीता हो. इतिहास से साबित हो चुका है कि अफ़ग़ानिस्तान को बाहर से नियंत्रित नहीं किया जा सकता है."

इमरान ख़ान ने कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध से पाकिस्तान को काफ़ी नुक़सान उठाना पड़ा है और उसके कारण 70,000 से अधिक पाकिस्तानी मारे गए हैं. (bbc.com)


23-Jun-2021 3:19 PM (31)

 

इस्लामाबाद.  पाकिस्तान स्थित लाहौर में मोस्ट वांटेड आतंकी हाफिज सईद के घर के करीब ब्लास्ट हुआ है. समाचार लिखे जाने तक इस घटना में 15 लोग जख्मी हैं और 4 की हालत गंभीर हैं. वहीं 2 लोगों की मौत हो गई है. मिली जानकारी के अनुसार जौहर टाउन के अकबर चौक में यह धमाका हुआ. धमाका होते ही मौके पर सुरक्षा एजेंसियां पहुंच गईं. CNN-News18 संवाददाता आदित्य राज कौल के मुताबिक स्थानीय लोगों ने बताया कि जिस घर के बाहर धमाका हुआ वहां कई संदिग्ध लोग आते-जाते दिखते थे. हालांकि अभी तक इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि ब्लास्ट के वक्त हाफिज सईद घर में था या नहीं.

पाकिस्तानी समाचार चैनल ARY न्यूज के अनुसार कम से कम 4 लोग गंभीर हैं और उन्हें ICU में भर्ती कराए गए हैं. धमाके के बाद मौके पर पहुंचे पुलिस अधिकारी ने कहा कि अभी कुछ भी कहना जल्दीबाजी हो सकती है. हो सकता है कि गैस की पाइपलाइन में भी ब्लास्ट हो सकता है. अभी इसकी जांच जारी है. वहीं हाफिज सईद से जुड़े सवाल को पुलिस अधिकारी ने अनसुना करते हुए कहा कि अभी इस बाबत जांच जारी है. स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार धमाका इतना तेज था कि आसपास के घरों के शीशे टूट गए.

गैस पाइपलाइन फटी या फिर IED धमाका?
स्थानीय सुरक्षा एजेंसियों ने अधिकारी ने कहा कि जब तक कुछ स्पष्ट जानकरी नहीं मिलेगी वह मीडिया से कुछ नहीं कहेंगे. पुलिस अधिकारियों ने उन सवालों को खारिज कर दिया कि इस ब्लास्ट का निशाना कौन था. पुलिस अधिकारी ने कहा कि अभी जब यही स्पष्ट नहीं है कि आखिर यह IED ब्लास्ट या फिर गैस की पालप लाइन फटी है, तो ऐसे में हम यह ठीक-ठीक नहीं कह सकते हैं कि ब्लास्ट का निशाना कौन था.

बता दें हाफिज सईद जहां रहता है वहां की सिक्योरिटी बहुत सख्त रहती है, ऐसे में यहां ब्लास्ट होने की घटना को गंभीर माना जा रहा है. पाकिस्तान की कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि ब्लास्ट वाली जगह पर एक मोटर साइकल थी और थोड़ी देर बाद मोटर साइकल ब्लास्ट हो गया. (news18.com)


23-Jun-2021 3:11 PM (40)

 

वॉशिंगटन. ईरान के नए राष्‍ट्रपति इब्राहिम रईसी की धमकी के बाद अमेरिका ने बड़ा एक्शन लिया है. अमेरिका के न्‍याय विभाग और वाणिज्‍य विभाग ने ईरान की 36 वेबसाइटों को ब्लॉक कर दिया है. इन वेबसाइट्स पर अमेरिका में दुष्प्रचार करने का आरोप है. जिन वेबसाइट्स को ब्लॉक किया गया है, उसमें ईरान की सरकारी मीडिया प्रेस टीवी की अंग्रेजी वेबसाइट, यमन के हूती विद्रोहियों का अल मसीराह सैटलाइट न्‍यूज चैनल और ईरान का सरकारी अरबी भाषा का टीवी चैनल अल-अलम शामिल है.

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच यह एक ऐसा कदम है, जिसे ईरानी मीडिया पर एक दूरगामी कार्रवाई के रूप में देखा जा सकता है. अमेरिकी सरकार ने इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है.

वेबसाइट्स खोलने पर आ रहा ये मैसेज
न्यूयॉर्क टाइम्स की खबर के मुताबिक, इन वेबसाइट्स पर जाने पर अमेरिका सरकार की ओर से अलर्ट आ रहा है. इसमें कहा गया है कि वेबसाइट के खिलाफ एक्‍शन कानून लागू करने की कार्रवाई का हिस्‍सा है. इसके साथ ही अमेरिका सरकार ने फलस्‍तीन टीवी न्‍यूज वेबसाइट के डोमेन नाम पर भी कब्‍जा कर लिया है. यह वेबसाइट गाजा में सक्रिय हमास और इस्‍लामिक ज‍िहाद की विचारधारा को पेश करती थी. इस वेबसाइट पर भी वही नोटिस आ रहा है.

ईरान से न्यूक्लियर डील पर इजरायल ने US को चेताया-जाग जाने का आखिरी मौका
पिछले साल 100 वेबसाइट्स हो गई थी बंद
पिछले साल अमेरिका के न्‍याय विभाग ने ऐलान किया था कि उसने ईरान के शक्तिशाली रिवोल्यूशनरी गार्ड की करीब 100 वेबसाइटों को बंद कर दिया है. अमेरिका के न्‍याय विभाग के मुताबिक, ये वेबसाइट्स 'वैश्विक दुष्‍प्रचार अभियान' को चला रही थीं. इनका मकसद अमेरिका की नीतियों को प्रभावित करना और ईरानी प्रोपेगैंडा का दुनियाभर में प्रसार करना था.

परमाणु समझौता चर्चा में क्यों?
दरअसल, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित करने के उद्देश्य से 2015 में किए गए ऐतिहासिक परमाणु समझौते को दोबारा लागू करवाने की कवायद तेज हो गई है. इसे लेकर रविवार को ईरान और दुनिया के पांच शक्तिशाली देशों के राजनयिकों के बीच बातचीत हुई. इसमें अमेरिका भी शामिल है. बैठक में शामिल कई राजनयिकों ने कहा कि उन्होंने जिन मुद्दों पर बातचीत की है, उन्हें संबंधित देशों की सरकारों द्वारा मंजूरी मिलना जरूरी है. (news18.com)


23-Jun-2021 3:09 PM (52)

वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2021 में लगातार चौथी बार फिनलैंड को दुनिया के सबसे खुशहाल देश का दर्जा मिला लेकिन लगता है कि ये खुशियां ज्यादा वक्त तक नहीं टिक सकेंगी. इस नॉर्डिक देश में भरपूर पैसे हैं, राजनैतिक स्थिरता भी है और प्राकृतिक सौंदर्य भी, लेकिन यहां की अकेली समस्या बुजुर्ग होती आबादी है. उम्रदराज आबादी के मामले में जापान के बाद दूसरे नंबर पर खड़ा ये देश अब युवाओं को अपने यहां बुला रहा है.

फिनलैंड की आबादी लगभग 55 लाख है. इसमें भी काफी लोग काम की उम्र पार कर चुके हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक, काम करने वाले 100 लोगों में 39.2 लोग 65 साल या इससे भी अधिक उम्र के हैं. इससे ये आशंका बन रही है कि अगले एक दशक में ही यहां लगभग आधी आबादी बुजुर्ग होगी. इससे न केवल देश पर पेंशन और उनकी देखभाल का बोझ आएगा, बल्कि कामकाजी लोग घटने के कारण देश का विकास भी धीमा हो सकता है. 

ये डर अपने-आप में इतना बड़ा होगा कि फिनलैंड अब दूसरे देशों से कामगारों को अपने यहां लाने की कोशिश कर रहा है. इसकी उनके पास बड़ी वजह भी है. ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट के अनुसार इस देश में बढ़िया काम करने वाले लोगों की कमी हुई है. इसी कमी को भरने के लिए फिनलैंड की सरकार अब लोगों को आमंत्रित कर रही है. यहां हर साल 20 से लेकर 30 हजार तक कामगार जा सकते हैं. ये संख्या अब तक इसकी आधी रही है लेकिन अब प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के लिए विदेशों से युवा कामगारों को लाने पर सरकार का फोकस है. 

अब फिनलैंड तो लोगों को अपने यहां बुला रहा है लेकिन क्या लोग जाएंगे? यहां भी एक समस्या है. फिनलैंड वैसे तो सबसे खुशहाल देश है लेकिन दूसरे देशों से जाने वाले लोग वहां ज्यादा समय तक टिक नहीं पाते. इसकी कई वजहें हैं. जैसे एक तो है वहां का बेहद ठंडा मौसम, जिसके कारण खासकर एशियाई देशों के लोगों को रहने में परेशानी होती है. 

इसके अलावा भले ही फिनलैंड सरकार स्किल्ड विदेशियों को बुलाए लेकिन स्थानीय लोगों में बाहरी लोगों को लेकर खुलापन कुछ कम है. लोग वहां जल्दी से स्वीकारें नहीं जाते. यहां तक कि चुनाव के दौरान भी दशकों से काम कर रहे लोगों की सुरक्षा और सुविधा वहां बड़ा मुद्दा नहीं बन पाती. ऐसे में लोगों में बाहरी होने का भाव बना रहता है और वे देश को अपना नहीं पाते.

अक्सर टेक कंपनियां एक व्यक्ति को नौकरी पर बुलाती हैं लेकिन तनख्वाह इतनी नहीं होती कि परिवार का गुजारा हो सके. ऐसे में परिवार के दूसरे वयस्क का काम करना जरूरी हो जाता है. हालांकि फिनलैंड में काम मिलना भी आसान काम नहीं. गैर-फिनिश आवेदकों के प्रति भेदभाव वहां आम है. स्थानीय कंपनियां बाहर से आए लोगों को नौकरी पर नहीं रखना चाहतीं. ये बात खुद हेलसिंकी के मेयर जान वापावुरी ने भी हाल ही में एएफपी से अपनी बातचीत में मानी.

वहां बोली जाने वाली भाषा फिनिश मुश्किल मानी जाती है, जबकि अंग्रेजी वहां खास नहीं चलती. ऐसे में लोगों के लिए ये भाषा सीखना जरूरी हो जाता है ताकि वहां के कल्चर में रस-बस सकें. ये भी एक समस्या है. यही कारण है कि बीते दशकभर में जहां अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों में एशियाई लोगों का काम और पढ़ाई के लिए जाना बढ़ा, वहीं फिनलैंड में ये कम हो रहा है. 

सीएनबीसी की एक रिपोर्ट में उन समस्याओं का जिक्र है जो वहां जाने वाले लोगों को होती है. जैसे दफ्तरों में वेलकमिंग माहौल का न होना, देश का बेहद महंगा होना और अकेलापन. अब बढ़ती हुई बुजुर्ग आबादी और विदेशी कामगारों के फिललैंड में दिलचस्पी न लेने पर वहां की सरकार समस्या पर नए सिरे से सोच रही है. ये भी हो सकता है कि आगे चलकर वहां बाहरी लोगों को खुलकर अपनाने के लिए पॉलिसी में भी बदलाव हो सके. (news18.com)


23-Jun-2021 1:04 PM (37)

 

वॉशिंगटन. कोरोना वायरस का डेल्टा वेरिएंट ब्रिटेन के बाद अमेरिका के लिए भी खतरा बन गया है. शीर्ष संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉक्‍टर एंथनी फाउची ने चेतावनी दी है क‍ि ये वेरिएंट अमेर‍िका के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है. अन्य विशेषज्ञों का भी मानना है कि अगर कोरोना का ये रूप ऐसे ही फैलता रहा, तो साल के आखिर में एक बार‍ फिर से अमेर‍िका को महामारी के बढ़ते मामलों का सामना करना पड़ेगा. भारत में डेल्टा प्लस वेरिएंट्स के 40 से ज्यादा केस सामने आए हैं.

ब्रिटेन जैसे बन रहे हालात
व्‍हाइट हाउस में हुई प्रेस ब्रीफिंग में एंथनी फाउची ने बताया कि अमेरिका में आने वाले 20 फीसदी से अधिक नए मामलों में डेल्टा वेरिएंट की वजह से ही तेजी आई है. दो सप्‍ताह पहले तक ये करीब 10 प्रतिशत मामलों में ही सामने आ रहा था. उन्होंने कहा कि जिस तरह के हालात ब्रिटेन में हैं, वैसे ही हालात यहां भी दिखाई देने शुरू हो गए हैं. इसलिए हमें अलर्ट होने की जरूरत है.

तेजी से फैल रहा है इंफेक्शन
एंथनी फाउची ने कहा कि अगर अमेरिका के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि यहां पर डेल्‍टा वेंरिएंट का संक्रमण काफी तेजी से फैल रहा है. 8 मई के आसपास ये जहां 1.2 से 2.7 और 9.9 फीसदी था. दो दिन में ही ये बढ़कर 20.6 तक पहुंच गया. इसलिए इस वेरिएंट से अमेरिका को सावधान रहने की जरूरत है.

युवाओं के वैक्सीनेशन पर जोर
वर्चुअल प्रेस ब्रीफिंग में एंथनी फाउची ने कहा, ‘अच्‍छी खबर ये है कि अमेरिका की बनाई कोरोना वैक्‍सीन डेल्‍टा वेंरिएंट पर भी कारगर है. इसका मतलब ये है कि अमेरिका को जहां इस वेरिएंट से खतरा है, वहीं हमारे पास इसे रोकने का एक कारगर हथियार भी है.'

सबसे खतरनाक है डेल्टा वेरिएंट
भारत में मिले कोरोना वायरस के डबल म्यूटेंट स्ट्रेन B.1.617.2 को ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने डेल्टा नाम दिया है. B.1.617.2 में एक और म्यूटेशन K417N हुआ है, जो इससे पहले कोरोना वायरस के बीटा और गामा वेरिएंट्स में भी मिला था. नए म्यूटेशन के बाद बने वेरिएंट को डेल्टा+ वैरिएंट या AY.1 या B.1.617.2.1 कहा जा रहा है.

दुनिया के करीब 60 से अधिक देशों ने डेल्‍टा वेरिएंट के मामले मिलने की पुष्टि की है. विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन इस वैरिएंट को पहले ही ‘वेरिएबल ऑफ कंसर्न’ मतलब खतरनाक या घातक मान चुका है.

चार राज्यों में अलर्ट
एक्सपर्ट्स का मानना है कि डेल्‍टा प्‍लस वेंरिएंट भारत में कोरोना की तीसरी लहर का कारण बन सकता है. इसे देखते हुए सरकार ने महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु और केरल को तैयार रहने के निर्देश भी दिए हैं. (news18.com)


23-Jun-2021 1:01 PM (34)

 

आतंकवादियों को पनाह देने के मामले में अक्सर आरोपों में घिरा पाकिस्तान आतंक पर नकेल कसने वाली संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स के आगे डर जाता है. दरअसल वो संस्था की ग्रे लिस्ट से बाहर आना चाहता है ताकि इकनॉमी सुधर सके. अब पेरिस में FATF की बैठक शुरू हो चुकी है और साथ ही पाकिस्तान का फैसला भी हो जाएगा कि उसपर पाबंदियां बनी रहती हैं, या फिर और गहरी जाती हैं. ये भी हो सकता है कि टास्क फोर्स उसपर से बैन हटा ले.

क्या है एफएटीएफ
ये एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जो मनी लॉन्ड्रिंग और टैरर फंडिंग जैसे वित्तीय मामलों में दखल देते हुए तमाम देशों के लिए गाइडलाइन तय करती है और यह तय करती है कि वित्तीय अपराधों को बढ़ावा देने वाले देशों पर लगाम कसी जा सके.

एफएटीएफ में ब्लैक लिस्ट के मायने क्या हैं
पहली सूची यानी ब्लैकलिस्ट में वो देश आते हैं जो आतंकी गतिविधियों से जुड़े होते हैं या फिर उन्हें अप्रत्यक्ष तौर पर फंड करते हैं. इन देशों की अर्थव्यवस्था से आतंक को बढ़ावा न मिले, इसके लिए देशों को ब्लैक लिस्ट कर दिया जाता है. ऐसे देशों को ब्लैकलिस्ट करने का सिलसिला साल 2000 से संस्था ने शुरू किया था.

गाइडलाइन पर काम करने को कहा जाता है 
देशों को पहले चेतावनी दी जाती है और फिर कुछ देशों की एक कमेटी बनाकर निगरानी की जाती है कि ऐसे देश गाइडलाइन्स के मुताबिक गंभीर मामलों को काबू करने के लिए क्या और कैसे कदम उठा रहे हैं.

दूसरी है ग्रे लिस्ट
मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फंडिंग के मामलों में टैक्स चोरी का स्वर्ग न होकर ऐसे देश, जो इस स्थिति का शिकार होते लगते हैं, उन्हें इस लिस्ट में रखा जाता है. यह एक तरह से चेतावनी होती है कि समय रहते ये देश काबू करें और वित्तीय गड़बड़ियों को रोकने के कदम उठाएं. अगर ये देश ग्रे लिस्ट में आने के बाद भी सख़्त कदम नहीं उठाते हैं, तो इन पर ब्लैकलिस्ट होने का खतरा बढ़ता है.

पाकिस्तान एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में है
बता दें कि आतंकवाद की फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं करने को लेकर पाकिस्‍तान को जून 2018 में FATF की ग्रे लिस्‍ट में रखा गया था. तब से वह उस लिस्‍ट में बना हुआ है. FATF ने आतंकी फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग के केस में पाकिस्‍तान से 27 प्रमुख बिंदुओं पर काम करने के लिए कहा था, लेकिन पाकिस्तान सारे लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पा रहा है.

पत्रकार की मौत पर पाक का रवैया 
अमेरिका में 9/11 हमले के बाद पाकिस्तान में आतंकवाद की रिपोर्टिंग करने पहुंचे पत्रकार डेनियल पर्ल का सिर 2002 में आतंकियों ने काट डाला था. इस केस में प्रमुख आरोपी उमर सईद शेख था, जिसे पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने निर्दोष कह दिया. अमेरिका ने उसके इस कदम पर एतराज जताया था. माना जा रहा है कि पाक सरकार के इस फैसले का असर लंबे समय तक FATF पर रहेगा.

आतंक के विरोध पर की फ्रांसीसी राष्ट्रपति की आलोचना 
इसके अलावा बीते साल फ्रांस में आतंकी घटनाओं के बाद पाकिस्तान ने एक तरह से अप्रत्यक्ष तौर पर इस्लामिक कट्टरता का समर्थन किया था. तब से फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों पाकिस्तान से नाराज हैं. अब कयास लगाए जा रहे हैं कि चूंकि एफएटीएफ में फ्रांस का बड़ा दखल है इसलिए उनकी नाराजगी पाकिस्तान पर कहर बरपा सकती है. ऐसे में इमरान सरकार ग्रे लिस्ट में बनी रह सकती है.

ग्रे लिस्ट में नाम बना रहे तो क्या होगा 
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह से चरमरा जाएगी. बता दें कि पाकिस्तान पहले से ही कंगाल हो चुका है और फिलहाल कर्ज में डूबा हुआ है. अब कई मित्र देशों ने पाक को आर्थिक मदद देने से भी इनकार कर दिया है. ऐसे में उसके पास वर्ल्ड बैंक और एडीबी जैसी इंटरनेशनल संस्थाओं से ही कर्ज का आसरा है. अगर ग्रे लिस्ट बनी रहे तो ये संस्थाएं भी पाकिस्तान को कर्ज नहीं देंगी. साथ ही साथ ये भी हो सकता है कि ग्रे लिस्ट के चलते देश पाकिस्तान के साथ व्यापारिक संबंध रखने से इनकार कर दें.

कई दूसरे देश भी लिस्ट में शामिल 
अकेले पाकिस्तान, संस्था की ग्रे लिस्ट में नहीं, बल्कि उसका साथ कई दूसरे देश दे रहे हैं. इनमें अल्बानिया, बहामास, बोत्सवाना, कंबोडिया, घाना, आइसलैंड, जमैका, मंगोलिया, निकारागुआ, सीरिया, युगांडा, यमन और जिम्बाब्वे शामिल हैं. कई देश आतंक पर सख्ती के साथ लिस्ट से बाहर भी आ चुके, जबकि कई ग्रे से होते हुए ब्लैक लिस्ट तक पहुंच गए.

(news18.com)


23-Jun-2021 11:12 AM (27)

काठमांडू, 23 जून| नेपाली सरकार ने और अधिक विदेशी गंतव्यों के लिए अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें फिर से शुरू करने और घरेलू उड़ानों को आंशिक रूप से फिर से शुरू करने का फैसला किया है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने मंगलवार को इसकी जानकारी दी। संस्कृति, पर्यटन और नागरिक उड्डयन मंत्रालय के संयुक्त सचिव बुद्धिसागर लामिछाने ने कहा कि कैबिनेट की बैठक ने सोमवार को संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत, ओमान, मलेशिया, दक्षिण कोरिया और जापान के लिए उड़ानों की अनुमति देने का फैसला किया।

समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, यह कदम तब उठाया गया है जब घाटी में मंगलवार को एक और सप्ताह के लिए लॉकडाउन लगा दिया गया, लेकिन प्रतिबंधों में ढील दी गई है। हिमालयी देश में महामारी की दूसरी लहर के बीच नए कोविड -19 संक्रमण में हफ्तों से गिरावट आई है।

इससे पहले, नेपाल ने भारत, चीन, तुर्की और कतर के लिए उड़ानें फिर से खोल दी हैं। नए निर्णय के अनुसार तुर्की और कतर के लिए उड़ान में वृद्धि की गई है।

लामिछाने ने कहा कि उनका मंत्रालय बुधवार को तय करेगा कि नए गंतव्यों के लिए अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों की अनुमति कब दी जाएगी। उन्होंने कहा, "संभवत: नए गंतव्यों के लिए अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों को इस सप्ताह के अंत में या अगले सप्ताह की शुरूआत में अनुमति दी जाएगी।"

नेपाल के कैबिनेट के फैसले के अनुसार, सप्ताह में एक से चार उड़ानों को अलग-अलग गंतव्यों से आने-जाने की अनुमति दी गई है।

नेपाल में मई की शुरूआत से घरेलू उड़ानें बंद हैं। कैबिनेट के फैसले के तहत घरेलू उड़ानों का संचालन इस आधार पर किया जाएगा कि सामान्य दिनों में कुल घरेलू उड़ानों में से आधे से ज्यादा उड़ानें नहीं होंगी।

लामिछाने ने कहा, "अगले सप्ताह की शुरूआत से घरेलू उड़ानों को फिर से शुरू करने की अनुमति दी जा सकती है।"

चीन के मामले में, नेपाली सरकार ने क्रमश: चेंगदू और ग्वांगझू के लिए एक सप्ताह में दो उड़ानों की अनुमति देने का निर्णय लिया है। लामिछाने ने कहा कि चीनी पक्ष के साथ परामर्श के आधार पर स्थलों को बदला जा सकता है। (आईएएनएस)


23-Jun-2021 9:36 AM (29)

वाशिंगटन, 23 जून | कोरोना के वैश्विक मामलों की संख्या बढ़कर 17.9 करोड़ हो गई है और इस महामारी से कुल 38.8 लाख लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी ने यह जानकारी दी। बुधवार सुबह अपने नवीनतम अपडेट में, यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सिस्टम साइंस एंड इंजीनियरिंग (सीएसएसई) ने बताया कि वर्तमान वैश्विक कोरोना मामले और मरने वालों की संख्या क्रमश: बढ़कर 179,093,146 और 3,880,341 हो गई है।

सीएसएसई के अनुसार, दुनिया के सबसे अधिक मामलों और मौतों की संख्या क्रमश: 33,564,660 और 602,455 के साथ अमेरिका सबसे ज्यादा प्रभावित देश बना हुआ है।

संक्रमण के मामले में भारत 29,977,861 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर है।

30 लाख से अधिक मामलों वाले अन्य सबसे खराब देश ब्राजील (18,054,653), फ्रांस (5,821,788), तुर्की (5,381,736), रूस (5,288,766), यूके (4,668,019), अर्जेंटीना (4,298,782), इटली (4,254,294), कोलंबिया (3,997,021) स्पेन (3,768,691), जर्मनी (3,731,304) और ईरान (3,117,336) हैं।

मौतों के मामले में ब्राजील 504,717 मौतों के साथ दूसरे स्थान पर है।

भारत (389,302), मैक्सिको (231,244), यूके (128,272), इटली (127,322), रूस (128,180) और फ्रांस (110,991) में 100,000 से अधिक लोगों की मौत हुई है। (आईएएनएस)


23-Jun-2021 7:59 AM (28)

अफगानिस्तान में तालिबान के आतंकियों ने मई के बाद से अबतक देश के 50 से ज्यादा जिलों पर कब्जा कर लिया है। देश से अमेरिकी सेना की वापसी कि घोषणा के बाद से तालिबान का आतंक एक बार फिर से बढ़ने लगा है।

न्यूयॉर्क, एजेंसी। अफगानिस्तान में तालिबान के आतंकियों ने मई के बाद से अबतक देश के 50 से ज्यादा जिलों पर कब्जा कर लिया है। देश से अमेरिकी सेना की वापसी कि घोषणा के बाद से तालिबान का आतंक एक बार फिर से बढ़ने लगा है। डेबोरा लियोन्स ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को बताया कि इस साल की शुरुआत में घोषणा की गई थी कि विदेशी सैनिकों को वापस बुला लिया जाएगा। इसके बाद से अफगानिस्तान में तबाही शुरू हो गई है।

सितंबर तक विदेशी सैनिक हो जाएंगे वापस

लियोन्स के मुताबिक, जिन जिलों को प्रांतीय राजधानियों से तालिबान को खदेड़ा गया था। उन्हें तालिबान फिर से वापस लेने की कोशिश कर रहा है। वो बस इस इंतजार में है कि, एक बार विदेशी सेना पूरी तरह से वापस चली जाएं। अफगानिस्तान में 20 सालों तक चले युद्ध के बाद अब अमेरिका ने अपने सैनिक वापस बुलाने शुरू कर दिए हैं, जो की 11 सितंबर तक देश से पूरी तरह से बाहर हो जाएंगे। वहीं नाटो देशों के लगभग सात हजार गैर-अमेरिकी कर्मचारी, जिनमें ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और जॉर्जिया के लोग शामिल हैं। वह भी तय तारीख तक अफगानिस्तान से बाहर जाने की योजना बना रहे हैं। इस बीव संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत लिंडा थॉमस-ग्रीनफील्ड ने कहा कि अमेरिकी सैनिकों को वापस लेने के फैसला बहुत विचार-विमर्श करने के बाद लिया गया है। उन्होंने सुरक्षा परिषद को बताया कि हम अपने पूर्ण राजनयिक और आर्थिक शक्तियों का इस्तेमाल अफगान लोगों के भविष्य को शांतिपूर्ण बनाने के लिए करेंगे। हम अफगान के सुरक्षा बलों का समर्थन करना जारी रखेंगे।

देश में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन शुक्रवार को व्हाइट हाउस में अफगानिस्तान राष्ट्रपति अशरफ गनी और अफगानिस्तान की राष्ट्रीय सुलह परिषद के अध्यक्ष अब्दुल्ला अब्दुल्ला के साथ  मुलाकात करेंगे। कतर में तालिबान और अफगान सरकार के प्रतिनिधियों के बीच राजनीतिक समझौते पर बातचीत ठप हो गई है। लियोन्स ने सुरक्षा परिषद से आग्रह किया है कि क्षेत्रीय देशों के समर्थन से दोनों देशों को बातचीत के लिए फिर से राजी किया जाए। (jagran.com)


22-Jun-2021 10:49 PM (35)

नेपाल में पिछले कई दिनों से जारी राजनीतिक संकट आज उस वक्त गहरा गया जब सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार के 20 कैबिनेट मंत्रियों की नियुक्ति रद्द कर दी.

बीबीसी नेपाली सेवा के मुताबिक़ 4 और 10 जून को प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने मंत्रिपरिषद का विस्तार किया था. सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम फैसले में उस कैबिनेट विस्तार को ही खारिज कर दिया है.

काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक़ जस्टिस चोलेंद्र शमशेर राणा और जस्टिस प्रकाश कुमार धुंगाना ने कहा कि संसद को भंग किए जाने के बाद कैबिनेट का विस्तार करना असंवैधानिक है.

इसलिए ओली सरकार के मंत्री अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं कर सकते हैं. इस फैसले के बाद ओली सरकार में प्रधानमंत्री को लेकर केवल पांच मंत्री ही रह जाएंगे.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ सात जून को दायर की गई एक याचिका पर सुनवाई करते हुए ये फैसला सुनाया. 69 वर्षीय केपी शर्मा ओली पिछले महीने संसद में विश्वास मत गंवाने के बाद से ही अल्पमत वाली सरकार की अगुवाई कर रहे हैं.

उन्होंने 4 जून और 10 जून को कैबिनेट का विस्तार करके 17 मंत्रियों को कैबिनेट में शामिल किया था जिसकी व्यापक आलोचना हुई थी. तीन राज्य मंत्री भी नियुक्त किए गए थे.

(bbc.com)


22-Jun-2021 10:45 PM (52)

 

हेलसिंकी. दुनिया के सबसे खुशहाल देश फिनलैंड अपने सबसे अच्छे जीवन स्तर, सुख-सुविधाओं और सिस्टम के लिए जाना जाता है. कहा जाता है कि इस देश में ऐसा कोई भी नहीं है जो खुश न हो, लेकिन सबसे खुशहाल वाला देश फिनलैंड एक बात को लेकर चिंतित है. वो है इस देश की बूढ़ी होती आबादी. इस वजह से यह देश कामगारों की कमी से जूझ रहा है. यहां काम करने के लिए लोग नहीं मिल रहे. ऐसे में फिनलैंड चाहता है कि दूसरे देशों के लोग यहां आकर बसे.

टैलेंटेड सॉल्यूशंस के रिक्रूटर साकू तिहवेरेन ने न्यूज एजेंसी एएफपी को बताया, 'अब यह व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है कि हमें देश में बड़ी संख्या में लोगों की जरूरत है. बूढ़ी होती आबादी को कवर करने और उन्हें रिप्लेस करने के लिए हमें युवाओं जरूरत है. हमें श्रमिकों की जरूरत है." फिनलैंड के उलट की पश्चिमी देश जनसंख्या वृद्धि से जूझ रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, प्रति 100 कामकाजी उम्र के लोगों में 39.2 फीसदी लोग 65 साल या उससे ऊपर के हैं. बूढ़ी आबादी में फिनलैंड जापान के बाद दूसरे स्थान पर है. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 2030 तक यहां वृद्धावस्था निर्भरता अनुपात बढ़कर 47.5 हो जाएगा.

सरकार ने चेतावनी दी है कि 55.2 लाख की आबादी (2019 की जनगणना के मुताबिक) वाले राष्ट्र को सार्वजनिक सेवाओं को बनाए रखने और बढ़ती पेंशन घाटे को कम करने के लिए इमिग्रेशन को हर साल 20,000-30,000 तक करने की जरूरत है.

बता दें कि 'वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट' में फिनलैंड को लगातार चौथी बार पहला स्थान प्राप्त हुआ है. वहीं संयुक्त राज्य अमेरिका जो पांच साल पहले 13वें स्थान पर था, 18वें पायदान से फिसलकर 19वें स्थान पर चला गया है. ब्रिटेन में कोरोना से सवा लाख लोगों की मौत के बावजूद लिस्ट में यह देश 17वें नंबर पर है.

एकेडमी ऑफ फिनलैंड के रिसर्च फेलो चार्ल्स मैथीज कहते हैं, 'बिजनेस और सरकार की कई वर्षों की निष्क्रियता के बाद फिनलैंड आज मुश्किल दौर से गुजर रहा है. आबादी बुजुर्ग हो रही है. हमें लोगों की जरूरत है. 2013 में आठ स्पेनिश नर्सों में पांच को पश्चिमी शहर वासा में भर्ती किया गया था. कुछ महीनों के बाद उन्होंने मंहगाई, अत्यधिक ठंडे मौसम और जटिल भाषा का हवाला देते हुए नौकरी और देश छोड़ दिया.

ओसामा बिन लादेन आतंकी था या शहीद? इमरान खान के मंत्री ने दिया ये जवाब

सिस्टम में है दिक्कत
प्रवासियों के फिनलैंड नहीं आने के पीछे कई राजनीतिक और सामाजिक दिक्कतें बताई जाती है. मसलन गैर-फिनिश आवेदकों के प्रति भेदभाव की शिकायत आती है. हेलसिंकी के मेयर जान वापावुरी ने एएफपी से कहा- 'स्टार्टअप्स ने बताया है कि वे दुनिया में किसी को भी आने और उनके लिए हेलसिंकी में काम तलाशने में मदद कर सकते हैं, लेकिन व्यक्ति को अकेले आना होगा. उनकी पत्नी या पति को नौकरी पाने में दिक्कत आती है. इस वजह से भी लोग फिनलैंड नहीं बसना चाह रहे हैं.

बता दें कि फिनलैंड भी यूरोपीय संघ का सदस्य है. फिनलैंड का क्षेत्रफल 3,38,145 वर्ग किलोमीटर है. 1917 तक ये रूस के शासन में था. 1917 में रूस में क्रांति के बाद उसने स्वयं को आजाद घोषित कर दिया. वहां 1906 में महिलाओं और पुरुष दोनों को मतदान और चुनाव लड़ने का अधिकार दे दिया गया था. फिनलैंड लैंगिक समानता अपनाने वाला दुनिया का पहला देश बना. (news18.com)


22-Jun-2021 6:49 PM (35)

 

मनीला. अपने अटपटे बयानों के लिए कुख्‍यात फ‍िलीपीन्‍स के राष्‍ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते ने कोरोना वैक्‍सीन नहीं लगवाने से मना करने वाले लोगों को जेल भेजने की धमकी दी है. दुतेर्ते ने अपने देशवासियों से कहा- वैक्सीन लगवा लो. वरना जेल भेज दूंगा और सूअर का टीका लगवाना होगा.' दुतेर्ते का यह बयान ऐसे समय पर आया है जब देश में कोरोना वायरस का डेल्‍टा वेरिएंट बहुत तेजी से फैल रहा है. फिलीपीन्‍स की कुल आबादी 11 करोड़ है और अभी सोमवार तक केवल 1.95 लोग ही पूरी तरह से कोरोना वैक्‍सीन लगवा चुके हैं.

फ‍िलीपीन्‍स ने मार्च में कोरोना वैक्‍सीन लगाने का काम शुरू किया था, लेकिन ऐसी खबरें आ रही हैं कि लोग बहुत कम संख्‍या में वैक्‍सीन लगवाने आ रहे हैं. राष्‍ट्रपति ने माना कि कोरोना 'उन मूर्खों' की वजह से उत्‍तेज‍ित हो रहा है, जो वैक्‍सीन नहीं लगवा रहे हैं. इसके बाद उन्‍होंने धमकी दी कि ऐसे लोगों को वह सूअर को लगने वाली वैक्‍सीन लगवा देंगे. दुतेर्ते ने सोमवार रात को अपने संदेश में जनता से कहा, 'आप चुन सकते हैं. आप वैक्‍सीन लगवाइये या मैं आपको जेल भेज दूंगा.'

लॉकडाउन तोड़ने पर गोली मारने का दे चुके आदेश
इससे पहले भी फ‍िलीपीन्‍स के राष्‍ट्रपति ने कोरोना वायरस लॉकडाउन का उल्‍लंघन करने वालों को गोली मार देने का ऐलान किया था. इसके बाद देश में लॉकडाउन का उल्‍लंघन करने वाले कई लोगों को गोली मार देने की कथित घटना सामने आई थी.

अमेरिका को दी थी धमकी
राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते ने अमेरिका को धमकी दी थी कि अगर कोरोना वायरस वैक्‍सीन नहीं दिया, तो वह सैन्‍य समझौता रद कर देंगे. दुतेर्ते ने कहा कि अगर अमेरिका ने नए कोरोना वायरस से निपटने के लिए वैक्‍सीन नहीं दी तो वह विजिटिंग फोर्सेस एग्रीमेंट से को रद करने की योजना पर आगे बढ़ जाएंगे.

दुनिया में कोरोना के कितने केस?
पूरे विश्व में कोरोना के मामले बढ़कर 17.86 करोड़ हो गए हैं. इस महामारी से अब तक कुल 38.7 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई हैं. कोरोना के मामले में अमेरिका सबसे ज्यादा प्रभावित देश बना हुआ है.कोरोना संक्रमण के मामले में भारत 2 करोड़ 99 लाख 35 हजार 221 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर है. (news18.com)


22-Jun-2021 6:45 PM (33)

नई दिल्लीः सिंगर बिली ने अपना एक पुराना वीडियो सामने आने पर माफी मांगी है, जिसमें वे एशियाई लोगों के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करती हुई नजर आ रही हैं. वे वीडियो में एशियाई लहजे का मजाक उड़ाती हुई लग रही हैं. पिछले हफ्ते, बिली इलिश विवाद में फंस गई थीं, जब टायलर के साथ उनकी सिंगिंग का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें वे क्रिएटर का गाना 'फिश' गा रही हैं. वीडियो में उन्हें एशियाई लोगों के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए सुना जा सकता है.

मंगलवार को बिली एक लंबा स्टेटमेंट जारी करने के लिए इंस्टाग्राम पर आईं. उन्होंने लिखा, 'मैं आप लोगों से प्यार करती हूं और आपमें से कई लोग मुझे इस पर बात करने के लिए कह रहे हैं. यह कुछ ऐसा है, जिस पर मैं अपनी बात रखना चाहती हूं, क्योंकि मुझे कुछ ऐसा कहा जा रहा है, जो मैं नहीं हूं. मेरी उम्र 13 या 14 साल रही होगी, जब मैंने एक गाने से कुछ शब्द कहे थे. मुझे नहीं पता था कि वह एक अपमानजनक शब्द है, जिसे एशियाई समुदाय के लोगों के खिलाफ इस्तेमाल किया गया था.'

वे आगे कहती हैं, 'मैं हैरान और शर्मिंदा हूं और यह कहना चाहती हूं कि मैंने कभी वह शब्द बोला था. एक गाने में पहली बार मैंने वह शब्द सुना था, क्योंकि मेरे परिवार में किसी ने भी मेरे सामने इसका इस्तेमाल नहीं किया था. उस समय मेरी नासमझी और कम उम्र के बावजूद, इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता कि यह तकलीफदेह था. इसके लिए, मैं माफी मांगती हूं.'

बिली पर वीडियो के दूसरे हिस्से में एशियाई लहजे का मजाक उड़ाने का आरोप है. इसे लेकर सिंगर ने कहा, 'दूसरे वीडियो मैं मूर्खतापूर्ण ढंग से अस्पष्ट आवाज में बोल रही हूं... कुछ ऐसा जिसे मैंने बचपन में करना शुरू किया था. अपने पालतू जानवरों, दोस्तों और परिवार से बात करते हुए, मैं इस तरह के लहजे का इस्तेमाल करती रही हूं. यह पूरी तरह से बकवास है. यह किसी भी तरह से किसी भी भाषा, उच्चारण या संस्कृति की नकल नहीं है. लोग जो मुझे जानते हैं, वे मुझे इस तरह बात करते हुए देखते रहे हैं.' (news18.com)


22-Jun-2021 5:46 PM (41)

पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की सीनेटर शेरी रहमान ने सीनेट में इमरान ख़ान की सरकार की ओसामा बिन लादेन को लेकर आलोचना की है. शेरी रहमान ने कहा कि जो व्यक्ति हज़ारों की मौत के लिए ज़िम्मेदार है, उसे शहीद कैसे घोषित किया जा सकता है.

सोमवार को सीनेट में शेरी रहमान ने कहा, ''ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादी को शहीद कैसे कहा जा सकता है. अल-क़ायदा को ख़त्म करने में हमारे लोगों ने क़ुर्बानियाँ दी हैं. इसे अमेरिका भी मानता है. जिसने हज़ारो बेगुनाहों को मारा है, उसके बारे में सुनने में आ रहा है कि वो शहीद है. इस्लाम में बच्चों और औरतों की हत्या करने वाली कौन सी शहादत होती है? ये मदीना की कौन सी रियासत है, जहाँ एक दहशतगर्द को शहीद का दर्जा दिया जा रहा है?''

शेरी रहमान ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी के अफ़गानिस्तानी न्यूज़ चैनल टोलो न्यूज़ को दिए इंटरव्यू का हवाला देते हुए संसद में उनकी आलोचना की. क़ुरैशी ने इस इटंरव्यू में ओसामा बिन लादेन को आतंकवादी कहने से परहेज किया था.

इस इंटरव्यू में टोलो न्यूज़ ने क़ुरैशी से पूछा था कि क्या वो ओसामा बिन लादेन को आतंकवादी मानते हैं? इसके जवाब में क़ुरैशी ने कहा था कि वो इस पर कुछ नहीं बोलना चाहते हैं. इससे पहले ओसामा बिन लादेन को प्रधानमंत्री इमरान ख़ान एक बार शहीद कह चुके हैं.

शेरी रहमान ने कहा, ''क़ुरैशी का मैं सम्मान करती हूँ, लेकिन उन्होंने इंटरव्यू में इस बात से इनकार नहीं किया वो ओसामा बिन लादेन को शहीद नहीं मानते हैं. आप उस व्यक्ति को दहशतगर्द क्यों नहीं कह सकते, जिसने हमारे मुल्क को इतनी मुश्किल में डाला रहा. इस वक़्त पाकिस्तान की विदेश नीति के लिए सबसे जटिल वक़्त है, तब आप ऐसी ग़लतियाँ कर रहे हैं. अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना चार जुलाई तक चली जाएगी और आप फिर से 30साल पुरानी समस्या में फँस जाएंगे. जो बम बरसाता है उसे आप शहीद कहते हैं.'' (bbc.com)


22-Jun-2021 5:44 PM (41)

 

इसराइल के नए विदेश मंत्री येर लेपिड अगले हफ़्ते पहला विदेशी दौरा एक इस्लामिक देश संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का करने जा रहे हैं.

येर लेपिड इसराइली प्रधानमंत्री बेनेट नेफ़्टाली की गठबंधन सरकार में सबसे बड़े दल के नेता हैं. येर लेपिड इस सराकार में उप-प्रधानमंत्री भी हैं और दो साल बाद वो समझौते के मुताबिक़ प्रधानमंत्री बनेंगे.

नई सरकार बनने के बाद इसराइल का यह सबसे उच्चस्तरीय दौरा है और इस दौरे के लिए यूएई को चुना है.

इसराइली विदेश मंत्रालय ने सोमवार को कहा कि येर लेपिड 29 और 30 जून को यूएई के दौरे पर होंगे. वे इस दौरे में अबू धाबी में इसराइली दूतावास और दुबई में एक वाणिज्य दूतावास का उद्घाटन करेंगे.

पिछले साल ही यूएई ने इसराइल से रिश्ते सामान्य किए थे और राजनयिक संबंध कायम करने का फ़ैसला किया था. इसमें अमेरिका के तत्कालीन ट्रंप प्रशासन की अहम भूमिका थी.

पू्र्व प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू यूएई के चार दिवसीय दौरे पर जाने की योजना बना रहे थे लेकिन यह कई वजहों से संभव नहीं हो पाया था. नेतन्याहू की सरकार में ही पिछले साल यूएई, सूडान और मोरक्को ने इसराइल को मान्यता देते हुए रिश्ते सामान्य करने की घोषणा की थी.

नेतन्याहू ने यूएई जाने की हालिया कोशिश इसी साल मार्च में महीने में की थी. इसराइली मीडिया के अनुसार तब जॉर्डन नेतन्याहू को अपने हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी थी. इस बीच उनकी सरकार भी चली गई.

येर लेपिड के इस दौरे से साफ़ है कि अरब के देशों में वो अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने को लेकर बहुत सक्रिय है. हालांकि अरब के कई देश अब भी इसराइल से रिश्ते सामान्य करने को तैयार नहीं है. (bbc.com)


22-Jun-2021 5:43 PM (29)

1988 में ईरान-इराक़ युद्ध के बाद राजनीतिक क़ैदियों को सामूहिक फांसी देनेसे जुड़े मामले को लेकर ईरान के नए राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की आलोचना होती रही है. इस बार मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर उन्होंने पहली बार टिप्पणी की है.

शुक्रवार को चुनाव में अपनी जीत के बाद सोमवार को रईसी ने पहली बार प्रेस कॉन्फ़्रेंस की. इस दौरान उन्होंने परमाणु समझौतों से लेकर ईरान-अमेरिकी रिश्तों पर भी बात की.

लेकिन एक पत्रकार ने उनसे उनके मानवाधिकार रिकॉर्डों के बारे में पूछ लिया तो इस पर रईसी ने कहा, “मुझे गर्व है कि मैंने हर स्थिति में अब तक मानवाधिकारों का बचाव किया है.”

उन्होंने चरमपंथी समूह आईएस के संदर्भ में कहा कि वो ‘उन लोगों से भी निपटा हूं जिन्होंने लोगों के अधिकारों को बाधित किया है और दाएशी और सुरक्षा विरोधी कामों में शामिल रहे हैं.’

“अगर एक क़ानून विशेषज्ञ, एक जज या एक प्रोसिक्यूटर लोगों के अधिकारों की और समाज की सुरक्षा की रक्षा करता है तो उसकी लोगों की सुरक्षा करने के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए और प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.”

क्या हैं आरोप

इब्राहिम रईसी पर बार-बार मानवाधिकारों का उल्लंघन के आरोप लगाए जा रहे हैं क्योंकि 1988 में जब तक़रीबन 5,000 राजनीतिक क़ैदियों को सामूहिक फांसी की सज़ा दी गई तब वो ईरान के डिप्टी प्रोसिक्यूटर थे.

इन राजनीतिक क़ैदियों में से ज़्यादातर लोग ईरान में वामपंथी और विपक्षी समूह मुजाहिदीन-ए-ख़ल्क़ा या पीपल्स मुजाहिदीन ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ ईरान के सदस्य थे.

इसके कारण अमेरिका उन पर प्रतिबंध भी लगा चुका है.

इसराइल के नए प्रधानमंत्री नेफ़्टाली बेनेट ने रविवार को अपनी कैबिनेट की पहली बैठक के दौरान रईसी पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि वह ‘क्रूर जल्लादों के शासन’ का हिस्सा थे.

बेनेट ने दुनिया की शीर्ष ताक़तों को आगाह किया है कि ईरान के साथ परमाणु समझौते में लौटने से पहले यह अंतिम बार ‘जाग जागने’ वाली कॉल है.

कट्टरपंथी नेता रईसी शनिवार को 62% मतों के साथ ईरान के नए राष्ट्रपति चुने गए थे. इस चुनाव के दौरान ऐतिहासिक रूप से ईरान में सबसे कम मतदान हुआ था. (bbc.com)


22-Jun-2021 3:08 PM (39)

मिस्र की एक अदालत ने दो टिक टॉकर महिलाओं को छह से 10 साल की सजा मानव तस्करी के आरोप में सुनाई है. अदालत ने 23 वर्षीय मवादा अल अधम को छह साल की जेल और 20 वर्षीय हनीन होसाम को 10 साल की कैद का फैसला सुनाया. प्रत्येक महिलाओं पर 200,000 मिस्री पाउंड का जुर्माना भी लगाया गया.

लड़कियों को 'ऐय्याशी' पर उभारने का आरोप

अधम की पैरवी करनेवाले वकील साबेर सोक्कार ने बताया कि अन्य आरोपों में 'पारिवारिक मूल्यों को खराब करना', 'अय्याशी के लिए उकसाना' और 'युवा महिलाओं को यौन संबंध के लिए उभारना' शामिल है. स्थानीय मीडिया के मुताबिक, अभियोजन ने आरोप लगाया कि टिक टॉकर ने आर्थिक रूप से वंचित लोगों को पैसे का लालच देकर शोषण किया और उनका संबंध आपराधिक समूह से है. उन्होंने दलील दी कि इस तरह के आरोप मानव तस्करी की श्रेणी में आते हैं.

टिक टॉकर महिला को 10 साल कैद की सजा 

वकील ने बताया कि सुनवाई के लिए अधम अदालत में पेश हुई थी, जबकि होसाम की अनुपस्थिति में फैसला सुनाया गया. उन्होंने कहा कि होसाम को पूर्व की अदालती कार्यवाही में शामिल नहीं रहने के कारण अधिक सजा मिली. हालांकि, दोनों महिलाएं अदालत के फैसले के खिलाफ अपील कर सकती हैं. पिछले साल भी दोनों को गिरफ्तार किया गया था और टिक टॉक पर पोस्ट वीडियो में 'पारिवारिक मूल्यों' और 'मान्यताओं' को चोट पहुंचाने के मामले में दो साल कैद की सजा सुनाई गई थी.

1.3 मिलियन सब्सक्राइबर रखने वाले एक वीडियो में होसाम ने लड़कियों को खुद के पैसे के लिए काम करने को कहा था, जिसके लिए उस पर 'अय्याशी' और मानव तस्करी' का आरोप भी लगाया गया. लेकिन जनवरी में अदालत ने दोनों को रिहा कर दिया. टिक टॉक पर अधम के तीन मिलियन फॉलोवर्स है. आरोप है कि उन्होंने प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल खुद के डांस का वीडियो शेयर करने के लिए किया. वहीं, होसाम टिक टॉक वीडियो के जरिए दूसरों को पैसा कमाने के लिए एप इस्तेमाल करने का फुटेज अपलोड करती हैं.

फैसले के खिलाफ लोगों ने जताया विरोध

अदालत के फैसले से बड़े पैमाने पर आक्रोश फैल गया है. कार्यकर्ताओं की दलील है कि मिस्र के साइबर अपराध कानून का इस्तेमाल कामकाजी महिलाओं को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है. मशहूर एक्टर और कार्यकर्ता समेत कई यूजर ने ट्विटर पर फैसले का विरोध किया है.  (abplive.com)


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