अंतर्राष्ट्रीय

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Date : 04-Apr-2020
नई दिल्ली, 4 अप्रैल। पूरी दुनिया में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। आंकड़ों के अनुसार, दुनियाभर में कोरोना के मामले बढ़कर 11 लाख हो गए हैं। वहीं इस बीमारी से मरने वाले लोगों की संख्या 59 हजार के पार चली गई है। अमेरिका, कोरोना वायरस की चपेट में बुरी तरह से फंस चुका है। 
अमेरिका में बीते 24 घंटे के दौरान 1480 लोगों की मौत हो गई है। इसके साथ ही अमेरिका में कोरोना से मरने वाले लोगों की संख्या 7406 हो गई है। अमेरिका में कोरोना वायरस के कुल मामले बढ़कर 2 लाख 70 हजार के पार चले गए हैं। 
इटली में कोरोना से संक्रमित मरीजों की संख्या 1 लाख 19 हजार हो गई है और इटली में कोरोना से सबसे ज्यादा लोगों की मौत हुई है। इटली में कोरोना से अभी तक 14,681 लोगों की मौत हुई है। स्पेन की बात करें तो वहां संक्रमित लोगों का आंकड़ा भी एक लाख से ज्यादा है। स्पेन में कोरोना से 11 हजार से ज्यादा लोग मरे हैं। (जनसत्ता)
 

Date : 04-Apr-2020

नई दिल्ली, 4 अप्रैल। कोरोना वायरस के कारण पूरी दुनिया में हाहाकार मचा हुआ है। दुनिया के कई देश कोरोना वायरस की चपेट में है। वहीं अब कोरोना वायरस के सबसे ज्यादा संक्रमित मरीज अमेरिका में हैं। इस बीच अमेरिका में कोरोना वायरस के कारण 24 घंटे में 1400 से ज्यादा मौतें दर्ज की गई हैं।
चीन के वुहान से फैला कोरोना वायरस अब अमेरिका में तबाही मचा रहा है। अमेरिका में कोरोना वायरस के कारण संक्रमित लोगों का आंकड़ा 3 लाख के करीब पहुंच रहा है। यह आंकड़ा विश्व में अब तक सबसे ज्यादा है। वहीं कोरोना वायरस के कारण दुनिया में 24 घंटे में हुई सबसे ज्यादा मौतें अमेरिका में दर्ज की गई हैं। (आजतक)
 


Date : 04-Apr-2020

न्यूयॉर्क, 4 अप्रैल। अमरीका और रूस के आपसी संबंधों के बीच तल्खी जगजाहिर है लेकिन कोरोना वायरस के संकट के समय में रूस का नया रूप देखने को मिल रहा है। रूस न्यूयार्क में मेडिकल सामानों की आपूर्ति कर रहा है, जिसे रूस की ओर से फ्रॉम रूस विद लव अभियान का हिस्सा बताया गया है।
मार्च के अंत में ऐसा ही एक मालवाहक विमान कोरोना वायरस से सबसे ज़्यादा प्रभावित इटली पहुंचा था, मेडिकल सामानों के अलावा 100 रूसी सैन्य चिकित्सक भी इटली पहुंचे थे। रूसी मीडिया अपने सरकार की इस उदारता को प्रमुखता से बता रहा है, लेकिन इसमें कितनी सच्चाई है और कितनी मिथ्या? एक सवाल यह भी है कि क्या इस संकट का रूस फायदा उठा रहा है?
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने ट्वीट करके बताया है कि अमरीका ने रूसी आपूर्ति का भुगतान किया है, साथ में उन्होंने ये भी बताया है कि कोविड-19 को हराने के लिए हम लोग एक साथ काम कर रहे हैं। अमरीका के मुताबिक, दोनों देशों के राष्ट्रपति के बीच पिछले दिनों फोन पर हुई बातचीत के दौरान मेडिकल सामानों की आपूर्ति पर सहमति बनी थी।
अमरीका में कोरोना वायरस के मामले बढ़ रहे हैं और साथ ही बढ़ी राष्ट्रपति ट्रंप की परेशानी। वहीं, रूस के विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि आधे सामान के लिए अमरीका ने भुगतान किया है जबकि आधा सामान रूस की ओर से डोनेट किया गया है। हालांकि रूसी टीवी चैनलों पर इस आपूर्ति को मदद के तौर पर पेश किया जा रहा है और भुगतान के बारे में कोई जिक्र नहीं दिखता।
रूस की बड़े मीडिया समूहों में से एक गैजप्रोम मीडिया के एनटीवी की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि जॉन एफ कैनेडी एयरपोर्ट पर रूसी जहाज को देखकर स्टाफ उत्साहित थे, उन्होंने विमान के साथ आकर सेल्फी ली, जहाज के पायलट और रूस के राष्ट्रपति पुतिन को धन्यवाद कहा।
अमरीका में न्यूयार्क कोरोना वायरस संक्रमण का हॉटस्पॉट बनकर उभरा है। जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के मुताबिक, इस संक्रमण से अमरीका में 7000 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।
रूस ने कोरोना वायरस संक्रमण पर अंकुश लगाने के लिए अमरीका और यूरोप की तरह का लॉकडाउन घोषित किया हुआ है। बीते 24 घंटे में रूस में कोरोना वायरस संक्रमण के 771 मामले सामने आए हैं- यह अब तक एक दिन में सामने आए संक्रमण के सबसे ज़्यादा मामले हैं। रूस में अब तक संक्रमण के 4,548 मामले हो चुके हैं और तीस से अधिक लोगों की मौत हुई है।
रूस में कर्मचारियों को छुट्टियों पर भेजा जा चुका है। राष्ट्रपति पुतिन ने इस अवकाश को 30 अप्रैल तक बढ़ाने का फैसला लिया है, इस दौरान लोगों को उनका वेतन मिलता रहेगा।
रूस की ओर से मिली मदद पर इटली की सरकार ने धन्यवाद जरूर दिया है लेकिन रूस के इरादों को लेकर संदेह भी बना हुआ है।
इटली के अखबार ला स्टांपा ने स्रोतों के आधार पर लिखा है कि ये मदद बहुत उपयोगी नहीं है, क्योंकि इस आपूर्ति का 80 प्रतिशत हिस्सा बेकार है। यह केवल पुतिन के लिए अपना कद बढ़ाने की कोशिश दिख रही है।
जब इस बारे में अमरीका में रूस के राजदूत अनातोली अनातोनोव से पूछा गया तो वो भड़क गए। गुस्सा जाहिर करते हुए उन्होंने कहा, रूस की ओर से इटली को दी गई मदद की आधारहीन आलोचना और मदद पर भरोसा नहीं करना, अनैतिक और निंदनीय है, इतना ही नहीं जो लोग मौत से लड़ रहे हैं उनके लिए कू्रर भी है।
अनातोनोव ने यह भी कहा, जो लोग हमारी मदद का राजनीतिकरण कर रहे हैं, वे लोग इतिहास ठीक से नहीं जानते। उन्हें यह याद करना चाहिए कि 1908 में जब इटली भूकंप से तबाह हो गया था तब भी रूसी नाविक मदद के लिए सिसली पहुंचे थे।
रूसी मीडिया ने इटली को दी गई मदद की काफी प्रशंसा की है। रूसी मीडिया में इस मदद की ख़बर की हेडलाइन कुछ इस तरह से है- मदद का हाथ बढ़ाने के लिए धन्यवाद और अमरीका और यूरोप को सबक सीखना चाहिए। हालांकि शीत युद्ध के दिनों का तनाव, जिसकी झलक 1963 के जेम्स बॉन्ड की मूवी फ्रॉम रूस विद लव में दिखी थी, पूरी तरह से दूर नहीं हुआ है।
वैसे रूसी मदद पर आधिकारिक तौर पर इटली के रक्षा मंत्री लोर्रेंजो गुयरिनी ने आभार जताया है जबकि अनाधिकारिक तौर पर इटली के पूर्व प्रधानमंत्री सिलवियो बर्लुस्कोनी ने आभार जताया है। बर्लुस्कोनी, व्लादिमीर पुतिन के दोस्त माने जाते हैं।
इटली के एक पॉप सिंगर ने समाचार एजेंसी तास को दिए इंटरव्यू में तारीफ के कुछ शब्द कहे हैं जबकि एक दूसरे सिंगर ने फेसबुक वीडियो में रूस का एक लोकप्रिय गीत गाया है। लेकिन रूस की सरकारी मीडिया, ऐसी खबरें दे रहा है जैसे कि रूसी मदद का इटली में आम लोगों ने बड़े पैमाने पर स्वागत किया है।
रूस के सरकारी चैनल, क्रेमलिन का समर्थन करने वाली वेबसाइट्स और टेलीग्राम चैनलों की खबरों में कहा जा रहा है कि इटली के लोगों ने यूरोपियन झंडे की जगह रूसी झंडे फहराए हैं और अपनी अपनी बॉलकनी में रूसी गाने गा रहे हैं। हालांकि इसकी पुष्टि करने वाला केवल एक वीडियो और एक शख्स फेडिरिको काने मौजूद हैं।
बीबीसी रूसी सेवा ने काने से बातचीत की है। काने एक इंजीनियर हैं, उन्होंने कहा कि वो निजी तौर पर रूस और रूस के राष्ट्रपति पुतिन के मुरीद हैं।
काने ने कुछ रूसी कंपनियों के साथ कारोबार किया है और उन्होंने रूस की चिकित्सीय सहायता के लिए निजी तौर पर धन्यवाद जताने के लिए रूसी झंडा फहराया है।
रूस की सरकारी मीडिया में ये भी दावा किया जा रहा है कि इटली में व्यापक रूप में लोगों ने रूस का राष्ट्रीय गाना गाया है।
दिलचस्प यह है कि ऐसा ही दावा पहले चीनी मीडिया ने किया था कि इटली में बड़े पैमाने पर लोग चीन का राष्ट्रीय गाना गा रहे हैं। लेकिन इटली के एक मीडिया समूह ने इस दावे को झूठा साबित कर दिया था।
रूस की सरकारी मीडिया दो वीडियो की रिकॉर्डिंग दिखा रही है, हालांकि इसमें लोग रूस का राष्ट्रीय गाना गा नहीं रहे हैं, बल्कि उसकी धुनें बजाई जा रही हैं। इसमें एक का संबंध इटली के ट्रेड यूनियन यूजीएल से पाया गया है।
इस गाने की धुन रोम की नव फासीवादी संस्था कासापाउंड की हाउसिंग बिल्डिंग से आ रही है। यूजीएल ट्रेड यूनियन का कासापाउंड से ऐतिहासिक रिश्ता रहा है। इतना ही नहीं, यूजीएल के मुखिया भी कई बार रूस की यात्रा कर चुक हैं।
वहीं दूसरा वीडियो, एक फ्लैट के अंदर का है, जिसके बैकग्राउंड में रूस का राष्ट्रीय गाना सुनाई दे रहा है। इसे सबसे पहले रूसी न्यूज वेबसाइट डेली स्ट्रॉम के प्रमुख एलिना सिवकोवा ने पोस्ट किया है।
इस वीडियो का इस्तेमाल रूसी न्यूज चैनल्स और ऑनलाइन मीडिया आउटलेट काफ़ी कर रहे हैं। इनमें रेनटीवी, इजवेस्तिया, टीवी टीसेंटर और रूस-1 जैसी मीडिया प्लेटफॉर्म शामिल हैं।
बीबीसी की रूसी सेवा ने यह पाया है कि इसी वीडियो को एलिना के इटली में रहने वाले एक रिश्तेदार ने शूट किया है। इस रिश्तेदार ने एक इतालवी महिला से शादी की है और उन्होंने ही रूस के राष्ट्रीय गाने की रिकॉर्डिंग को बजाया है।
हालांकि एलिना सिवकोवा का कहना है कि यह कोई इकलौता उदाहरण नहीं है और इटली के इमोला शहर में कई इतालवी नागरिक नियमित तौर पर रूस का राष्ट्रीय गाना गाने जमा होते हैं। हालांकि उनके इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है। इस दावे पर इमोला शहर के मेयर की प्रतिक्रिया भी बीबीसी रूसी सेवा को नहीं मिल पाई है।
इल्या शेपेलिन रूस में सरकार का विरोधी माने जाने वाले टीवी रेन चैनल पर फेक न्यूज को लेकर एक प्रोजेक्ट चलाते हैं। उनके मुताबिक इस मामले में तथ्य और कल्पनाओं को जिस तरह से मिश्रित किया गया है, वह हायब्रिड फेक न्यूज का परफैक्ट उदाहरण है। इल्या बताते हैं कि जब तथ्य और कल्पनाओं का परस्पर जुड़ाव ऐसा हो तो उसे अलग अलग देख पाना संभव नहीं होता। हालांकि दिलचस्प यह है कि इन दिनों रूसी अधिकारी फेक न्यूज को लेकर लोगों को आगाह कर रहे हैं क्योंकि रूस में नए आपातकालीन नियमों के मुताबिक कोरोना वायरस संकट के समय में फेक न्यूज फैलाने का दोषी पाए जाने पर पांच साल की कैद हो सकती है। (बीबीसी)
 


Date : 04-Apr-2020

अमरीका, 4 अप्रैल। अमेरिका में कोरोना वायरस से एक दिन में मौतों का नया रिकॉर्ड दर्ज किया गया है। खबरों के मुताबिक बीते 24 घंटे में वहां कोविड-19 से 1169 लोगों की मौत हो गई। यह किसी भी देश में कोरोना वायरस से एक दिन में हुई मौतों की सबसे बड़ी संख्या है। इससे पहले यह दुखद रिकॉर्ड इटली के नाम था जहां 27 मार्च को 969 मौतें दर्ज की गई थीं।
अमेरिका में अब तक कोरोना वायरस से 5926 लोगों की मौत हो चुकी है। इस मामले में वह तीसरे नंबर पर है। सबसे ऊपर इटली है जहां यह आंकड़ा 14 हजार को छूने वाला है। तीसरे स्थान पर स्पेन है जहां कोरोना वायरस से करीब 10 हजार लोगों की मौत हुई है।
अमेरिका में बीते 24 घंटे में कोरोना वायरस के 30 हजार से भी ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं। इसके साथ ही वहां कुल मामलों की संख्या दो लाख 43 हजार पहुंच गई है। यानी यह पूरी दुनिया में दर्ज कुल मामलों का करीब एक चौथाई है। अमेरिका में कोरोना वायरस का केंद्र न्यूयॉर्क है जहां डेढ़ हजार से भी ज्यादा मौतें हो चुकी हैं और 50 हजार से ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं। 
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि वे अब रोज एक लाख से ज्यादा कोरोना वायरस टेस्ट कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यालय के अनुमान के मुताबिक अमेरिका में कोरोना वायरस से करीब ढाई लाख तक मौतें हो सकती हैं। (सत्याग्रह)
 


Date : 02-Apr-2020

तुर्कमेनिस्तान, २ अप्रैल। इस समय दुनिया भर में लोगों को कोरोना वायरस की ज्यादा से ज्यादा जानकारी दी जा रही जिससे कि वे इस बीमारी से अपना बचाव कर सकें। लेकिन मध्य एशियाई देश तुर्कमेनिस्तान ने अपने यहां इस शब्द के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी है।
तुर्कमेनिस्तान की स्वतंत्र न्यूज़ एजेंसी 'तुर्कमेनिस्तान क्रॉनिकल’ के मुताबिक सरकार की तरफ से मीडिया, शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी कार्यालयों से कहा गया है कि कोरोना वायरस शब्द का इस्तेमाल न किया जाए। सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों में भी इस शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। बताते हैं कि 'कोरोना वायरस’ शब्द की जगह 'बीमारी’ या 'सांस की बीमारी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
यूरोपीय न्यूज एजेंसी 'रेडियो फ्री यूरोप’ के मुताबिक तुर्कमेनिस्तान की राजधानी अशगबत में जो लोग सड़कों पर कोरोना वायरस को लेकर बातें करेंगे या चेहरे पर मास्क लगाएंगे, उन्हें पुलिस गिरफ्तार कर सकती है। खबरों के मुताबिक पुलिस अधिकारी सड़कों पर सादे कपड़ों में यह देखने के लिए घूमते हैं कि कौन कोरोना वायरस को लेकर बातचीत कर रहा है।
तुर्कमेनिस्तान की सरकार ने अपने यहां कोरोना का कोई भी पीडि़त होने से इनकार किया है। सरकार इस वायरस की रोकथाम के लिए अहम कदम भी उठा रही है। रेलवे और बस स्टेशन पर तापमान जांचने से लेकर भीड़-भाड़ वाली जगहों की साफ-सफाई की जा रही है। देश में जारी नागरिक आंदोलनों पर भी रोक लगी हुई है। इसके अलावा सरकार ने अफगानिस्तान की सीमा से सटे गांवों में भी नागरिकों के जाने पर प्रतिबंध लगा दिया है।
यही नहीं, रूढि़वादी सोच वाले तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्रपति गुरबांगुली बेयरडेमुकामेडॉव ने कोरोना वायरस से बचाव के लिए एक अजीबोगरीब आदेश जारी किया है। उन्होंने देश के सभी सार्वजनिक स्थलों पर 'हरमाला’ नामक पारंपरिक पौधा लगाने के लिए कहा है। उनका मानना है कि यह पौधा बीमारियों का प्रसार रोकने में सहायक है। (सत्याग्रह)
 


Date : 01-Apr-2020

अमरीका, 1 अप्रैल । जॉन्स हॉपकिंस विश्वविद्यालय के अनुसार, अमरीका में कोरोना वायरस के कारण मरने वालों का आंकड़ा 4,000 पार कर गया है।
अमरीका में इस समय दुनिया में सबसे अधिक कोरोना वायरस से संक्रमित लोग मौजूद हैं। अमरीका में 1,88,172 लोग कोरोना से संक्रमित हैं और वहां मरने वालों का आंकड़ा चीन से भी ज़्यादा हो गया है।(बीबीसी)
 


Date : 31-Mar-2020

इस्लामाबाद, 31 मार्च । करीब 93 साल पहले इस्लाम के प्रचार के लिए भारत के देवबंद में बनाया गया तबलीगी जमात एशिया में कोरोना वायरस के प्रसार का बड़ा सबब बन गया है। दुनिया भर में करीब 15 करोड़ सदस्यों वाले तबलीगी जमात के इज्तिमा से भारत ही नहीं पूरे एशिया में हड़कंप मच गया है। आलम यह है कि इस जमात की गलती की सजा अब मलेशिया, पाकिस्?तान समेत एशिया के कई देश भुगत रहे हैं। 
दिन 12 मार्च, स्थान पाकिस्तान का लाहौर शहर। कोरोना महासंकट के बीच दुनिया के 80 देशों के ढाई लाख लोग तबलीगी जमात के आयोजन में हिस्सा लेने पहुंचे। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक आयोजन स्थल पर इतनी ज्यादा भीड़ जुटी कि लोगों को खुले में जमीन पर सोना पड़ा। इस बैठक में 10 हजार मौलाना भी हिस्सा लेने पहुंचे थे। कोरोना संकट को देखते हुए पाकिस्तानी अधिकारियों ने तबलीगी जमात के धर्मगुरुओं से यह बैठक कैंसिल करने की अपील की लेकिन जमात ने उनकी अपील नहीं मानी। 
इसका नतीजा यह हुआ कि तबलीगी जमात की यह बैठक पाकिस्तान में कोरोना वायरस के प्रसार का बहुत बड़ा जरिया बन गई। पाकिस्तान में तबलीगी जमात के 27 सदस्यों में कोरोना वायरस की पुष्टि हुई है। बताया जा रहा है कि यह संख्या और ज्यादा बढ़ सकती है। माना जा रहा है कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में कोरोना के बहुत तेजी से बढ़ते मामलों के पीछे भी यही इज्तिमा जिम्मेदार है। पाकिस्तान में कुल 1836 लोग कोरोना से प्रभावित हैं और 23 लोगों की मौत हो गई है। सबसे ज्यादा प्रभावित पंजाब प्रांत है जहां पर यह तबलीगी इज्तिमा हुआ था। पंजाब में कोरोना के 651 मामले सामने आए हैं। 
दरअसल, ऐसा संदेह था कि रायविंड रोड स्थित तबलीगी मरकज (प्रचार केंद्र) और विभिन्न मस्जिदों से कोरोना वायरस जगह-जगह फैला है। इसके बाद ही स्थानीय प्रशासन ने तबलीगी के कई प्रचारकों को हिरासत में लेकर क्वारंटीन किया था। द डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, जब क्वारंटीन सेंटर में सबका टेस्ट किया जा रहा था तो उनमें से एक प्रचारक ने पुलिस पर चाकू से हमला कर दिया और भागने की कोशिश की। पांच दिन तक चले इस सम्मेलन में 500 विदेशी भी शामिल थे। फरवरी में तबलीगी जमात ने प्रचार के लिए 11 ग्रुप गठित किए गए थे जो कि कसुर, चुनियान और पटोकी में प्रचार करने पहुंचे थे। उधर, यंग डॉक्टर्स असोसिएशन के स्थानीय प्रेजिडेंट डॉ.ताहिर शाहीन का कहना है कि प्रचारकों की क्वारंटीन सेंटर में निगरानी की जा रही है। 
मलेशिया में 620 लोग कोरोना पॉजिटिव 
तबलीगी जमात की इसी बैठक में हिस्सा लेने के लिए दो लोग फलस्तीन से लाहौर पहुंचे थे। ये दोनों लोग कोरोना से संक्रमित हो गए। जब ये लोग वापस अपने घर फलस्तीन पहुंचे तो वहां भी कोरोना वायरस पहुंच गया। इस आयोजन में हिस्सा लेने वाले किर्गिस्तान के दो लोग भी अपने देश में कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। न्यूयॉर्क टाईम्स की रिपोर्ट के मुताबिक मलेशिया में भी इसी तरह की तबलीगी जमात की एक बैठक हुई थी। अब इस आयोजन में हिस्सा लेने वाले 620 लोग कोरोना वायर से संक्रमित हो गए हैं। कोरोना पॉजिटिव पाए गए लोग दक्षिण पूर्व एशिया के 15 देशों के नागरिक हैं। (नवभारतटाईम्स)


Date : 31-Mar-2020

न्यूयॉर्क, 31 मार्च। न्यूयॉर्क की गवर्नर एंड्रू कूमो ने चेतावनी ही है कि कोरोना वायरस के मामले न्यूयॉर्क में जिस तेजी से सामने आ रहे हैं ये पूरे देश की स्थिति हो सकती है।
अमरीकी में न्यूयॉर्क कोरोना महामारी का केंद्र बन गया है। यहां अब तक कोरोना संक्रमण के 60,000 मामले सामने आ चुके हैं जबकि 1,200 लोगों की इस कारण मौत भी हो चुकी है।
इधर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि कोरोना से निपटने में अमरीका के लिए आने वाले 30 दिन बेहद चुनौतीपूर्ण होंगे। उन्होंने लोगों से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के लिए कहा है और कहा है कि जल्द ही अमरीका दूसरे देशों की मदद करने की स्थिति में होगा। (बीबीसी)
 


Date : 31-Mar-2020

नई दिल्ली, 31 मार्च । वल्र्ड बैंक ने चीन को चेतवानी देते हुए कहा है कि कोरोना वायरस के कारण उसकी अर्थव्यवस्था की ग्रोथ ठहर सकती है। वल्र्ड बैंक ने कहा कि पूर्वी एशिया में 1।1 करोड़ लोग गरीबी में जाल में फँस रहे हैं। वल्र्ड बैंक के अनुसार कोरोना वायरस की महामारी के वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरी चोट लगने जा रही है।
वल्र्ड बैंक प्रधान अर्थशास्त्री आदित्या मट्टू ने कहा, एशिया में गरीबी बढ़ सकती है। चीन की अर्थव्यव्स्था की वृद्धि दर 2.3 फीसदी पर आ सकती है। कुछ महीने पहले ही वल्र्ड बैंक ने कहा था कि चीन की वृद्धि दर 5.9 फीसदी रहेगी लेकिन कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण हालात और खराब हो गए हैं।(बीबीसी)
 


Date : 31-Mar-2020

पनामा, 31 मार्च। सेंट्रल अमरीका के देश पनामा ने अपने यहां जेंडर के आधार पर क्वारंटीन करने की घोषणा की है। न्यूज एजेंसी एएफपी की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कई तरह के प्रतिबंध लगाए हैं और लोगों को घरों में रहने को कहा है। लोगों से कहा गया है कि वो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें। क्वारंटीन को लेकर भी आदेश जारी किये गए हैं।

पनामा के नागरिकों के लिए जारी आदेश में महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग रखा गया है। पनामा बीते एक सप्ताह से लॉकडाउन में है लेकिन संभावना जताई जा रही है कि यह अभी आने वाले 15 दिनों तक भी जारी रहेगा।
नए आदेशों के मुताबिक, अब महिलाएं केवल सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को ही दो घंटे के लिए जरूरी सामान की खरीदारी के लिए घर से बाहर निकल सकेंगी। इसके अलावा पुरुषों को केवल मंगलवार, गुरुवार और शनिवार ही घर से बाहर निकलने की अनुमति होगी। रविवार को कोई भी घर से बाहर नहीं निकल सकेगा।
रक्षा मंत्री जुआन पिनो ने अपने एक बयान में कहा कि क्वारंटीन सिर्फ लोगों की जिंदगियां बचाने के लिए लागू किया गया है।
पनामा में कोरोना वायरस संक्रमण का पहला मामला तीन हफ्ते पहले सामने आया था। फिलहाल वहां एक हज़ार से अधिक लोगों के संक्रमित होने की पुष्टि हुई है जबकि 27 लोगों की मौत हो चुकी है। (बीबीसी)
 


Date : 29-Mar-2020

ब्रिटेन, 29 मार्च। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने देशवासियों के नाम लिखे एक पत्र में कहा है कि कोरोना वायरस का संकट ठीक होने से पहले और बुरा होगा। बोरिस जॉनसन खुद कोरोना वायरस के संक्रमण से पीडि़त हैं और वो अपने घर पर ही अलग रह रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो और कड़ी पाबंदी लगाई जा सकती है। ब्रिटेन में कोरोना वायरस के संक्रमण से अब तक 1,019 लोगों की मौत हो चुकी है। केवल शनिवार को 260 लोगों की मौत हुई। यहां कोरोना वायरस के संक्रमण के अब तक 17,089 मामले सामने आ चुके हैं। (बीबीसी)
 


Date : 28-Mar-2020

लौरा बिकर
सोल, 28 मार्च । दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल के एक हॉस्पिटल के पीछे कार पार्किंग से अपनी कार को बाहर निकालते समय 45 साल की रशेल किम शीशा नीचे करती हैं और फिर अपनी जीभ को बाहर निकालती हैं। वो पिछले हफ्ते डैगु गई थीं। डैगु दक्षिण कोरिया का वो इलाका है जो कोरोना वायरस की चपेट में था।
वहाँ से लौटने के बाद से ही रशेल को खांसी आ रही है और बुखार भी है। चूंकि मौजूदा समय में दुनिया भर में कोरोना वायरस का संक्रमण फैला हुआ है तो उन्हें भी इस आशंका ने घेर लिया कि कहीं वो संक्रमित तो नहीं हो गई हैं। उन्होंने फैसला किया कि वो अपना टेस्ट करवाएंगी ताकि उनका डर स्पष्ट हो जाए। दक्षिण कोरिया में दर्जनों ऐसे केंद्र बनाए गए हैं जहां आप गाड़ी में बैठे-बैठे टेस्ट करा सकते हैं।
इन केंद्रों पर सिर से लेकर पैर तक सफेद सुरक्षात्मक कपड़े पहने खड़े रहते हैं। उनके हाथों में उम्दा दस्ताने होते हैं, आंखों पर चश्मे और मुंह पर सर्जिकल मास्क।
सेंटर पर खड़े इन दोनों में से एक शख़्स रशेल को एक स्वैब स्टिक (जांच में इस्तेमाल होने वाला उपकरण) देता है। रशेल उसे अपने मुंह में अंदर की तरफ ले जाती हैं और फिर एक टेस्ट-ट्यूब में सुरक्षित रखते हुए उसे जांच के लिए खड़े दूसरे शख्स को सौंप देती हैं।
एक दूसरा स्वैब वो नाक के अंदर ले जाती हैं। ये थोड़ा तकलीफदेह है क्योंकि उनकी आंखों में पानी आ जाता है। लेकिन ये सारी प्रक्रिया एक से डेढ़ मिनट में पूरी हो जाती है। इसके बाद वो अपनी कार का शीशा ऊपर चढ़ाती हैं और ड्राइव करते हुए पार्किंग एरिया से निकल जाती हैं। अगर उनकी जांच का नतीजा पॉज़ीटिव रहा तो उन्हें कॉल करके इसके बारे में सूचित किया जाएगा। अगर नतीजा निगेटिव रहा तो सिर्फ एक मेसेज।
दक्षिण कोरिया में हर रोज करीब 20 हजार लोगों की जांच की जा रही है। टेस्ट किए जाने का ये आँकड़ा दुनिया के किसी भी दूसरे देश से कहीं अधिक है। रशेल के पार्किंग से निकलने के कुछ वक्त बाद ही उनका सैंपल पास के लैब में भेज दिया गया। दक्षिण कोरिया में कोरोना वायरस टेस्ट के लिए बनाए गए ये लैब्स 24&7 काम कर रहे हैं।
कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए इस तरह के कई लैब तैयार किए गए हैं जो फ्रंट-लाइन पर इस महामारी को मात देने का काम कर रही हैं। दक्षिण कोरिया ने कोरोना वायरस टेस्ट के लिए 96 पब्लिक और प्राइवेट लैब का निर्माण किया है।
स्वास्थ्य अधिकारियों का मानना है कि इस तरह से लोगों की जिंदगियां बचाई जा सकती हैं। दक्षिण कोरिया में कोरोना वायरस से मौत की दर 0.7 फीसदी है। अगर वैश्विक स्तर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर जारी की गई दर की बात करें तो यह 3.4 फीसदी है। लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि स्थिति इससे कहीं अधिक खराब है क्योंकि हर केस दर्ज हो ही रहा हो, यह जरूरी नहीं।
मैंने ग्रीन क्रॉस लैब का रुख किया जो कि सोल के बाहरी हिस्सें में स्थापित की गई है। जब मैं वहां पहुंची तो सैंपल का नया स्टॉक टेस्ट होने के लिए बस आया ही था। डॉ। ओह येजिंग ने हमें पूरी लैबोरेटरी दिखाई लेकिन एक जगह जाकर वो रुक गईं। उन्होंने हमें बताया कि वहां हमारे जाने की मनाही है। उन्होंने मुझे बताया इस निगेटिव प्रेशर रूम में टेस्ट किया जाता है।
उस कमरे के भीतर दो डॉक्टर मौजूद थे। उन्होंने हल्के पीले रंग का सुरक्षा कवच पहन रखा था। वो उस कमरे में कभी एक कोने पर जाते, कभी दूसरे। वे एक मेज पर रखी टेस्ट ट्यूब्स उठाकर दूसरी मेज पर रख रहे थे।
हमें अपने आसपास दर्जनों मशीनों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। ये लगातार काम कर रही थीं और नतीजे दे रही थीं। ये पीसीआर (पॉलीमरेज चेन रिएक्शन) टेस्ट कर रही थीं। अगर एकदम साधारण शब्दों में कहें तो ये मशीनें इस बात की जांच कर रही थीं कि कौन सा सैंपल पॉजीटिव है। टेस्ट-ट्यूब में सैंपल स्टोर करने से लेकर टेस्ट का परिणाम आने तक में पाँच से छह घंटे का समय लगता है।
प्रोफेसर गे चियोल कोन लैबोरेटरी मेडिसीन फाउंडेशन के चेयरमैन हैं। वो कहते हैं कि इतनी तेजी से यह सब कुछ कर पाना दक्षिण कोरियाई जीन का हिस्सा है। इसे वो कोरियाई बाली-बाली जीन कहते हैं। बाली एक कोरियाई शब्द है, जिसका मतलब है जल्दी।
वो ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि दक्षिण कोरिया टेस्ट का तरीक़ा खोजने में कामयाब रहा और उन्होंने पूरे देश में प्रयोगशालाओं का एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया जो महज 17 दिनों के भीतर ही सक्रिय तौर पर काम करने लगा। लेकिन इन सभी त्वरित प्रक्रियाओं के पीछे एक बेहद कड़वा अनुभव है। चियोल कोन कहते हैं, हमने किसी भी नए संक्रमण के खतरे से लडऩा सीखा है। यह साल 2015 में फैले मिडिल ईस्ट रेस्पाइरेटरी सिंड्रोम (मर्स) की सीख का नतीजा है। जिस समय मर्स का प्रकोप फैला था, दक्षिण कोरिया में 36 लोगों की जान चली गई थी।
36 लोगों की मौत ने इस देश को संक्रमण से निपटने के लिए त्वरित और उपयोगी क़दम उठाने के लिए प्रेरित किया। इसके साथ ही दक्षिण कोरिया अपने दृष्टिकोण में भी बदलाव लाने को मजबूर हुआ।
दक्षिण कोरिया सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ने तो एक ऐसे विभाग की स्थापना ही कर डाली जो इस तरह की किसी भी बुरी से बुरी परिस्थिति से निपटने के लिए हमेशा तैयार रहे।
और अब जबकि कोरोना वायरस का संक्रमण दुनिया भर को परेशान कर रहा है, दक्षिण कोरिया की यही तैयारी उसे लाभ दे रही है।
प्रो कोन कहते हैं मुझे लगता है कि शुरुआती संक्रमित लोगों की पहचान करके, उनकी सही जांच और उसके बाद उन्हें आइसोलेशन में रखकर मृत्यु दर को रोका जा सकता है और वायरस के प्रसार को भी नियंत्रित किया जा सकता है। वो कहते हैं कि हर पुराने अनुभव से सीखने की जरूरत होती है और पहले से ही सिस्टम को तैयार रखने की आवश्यकता ...संभव तौर पर इस तरह के किसी भी नए प्रकोप से निपटने के लिए यही सबसे कारगर उपाय होता है।
फरवरी की शुरुआत तक ग्रीन क्रॉस की टीम के लिए सब कुछ बहुत ही सामान्य था लेकिन उसके बाद एक मरीज की पहचान हुई। जिसे दक्षिण कोरिया में अब पेशेंट-31 के नाम से भी जाना जाता है। इस महिला का कोई यात्रा का रिकॉर्ड नहीं था, ना ही वो किसी ऐसे शख्स के संपर्क में आई थीं जिन्हें कोरोना पॉजीटिव पाया गया हो।
वो शिंचेओंजी चर्च ऑफ जीसस से जुड़ी हुई थीं। इस धार्मिक समुदाय के करीब दो लाख सदस्य हैं। इस एक बात ने इस प्रकोप के मूल स्रोत को खोजने और उसके फैलने के बारे में शुरुआती जानकारी दी।
दक्षिण कोरिया में प्रयोगशालाएं टेस्ट के लिए तैयार थीं। हालांकि कर्मचारियों का लगातार काम करना और थकना एक मुद्दा जरूर था। लेकिन अब वे पालियों में काम करते हैं।
डॉ. ओह ने बताया कि अब परिस्थितियां पहले की तुलना में बेहतर हुई हैं और अब वो काम के बाद कुछ घंटों की नींद ले पा रही हैं।
दक्षिण कोरिया में टेस्टिंग किट्स की कोई कमी नहीं है। चार कंपनियों को टेस्टिंग किट बनाने के लिए अपू्रूवल दिया गया है। इसका मतलब ये हुआ कि दक्षिण कोरिया के पास पूरी क्षमता है कि वो हर सप्ताह कऱीब एक लाख चालीस हजार टेस्ट कर सके।
प्रो. कोन का मानना है कि दक्षिण कोरिया में जो टेस्ट किए जा रहे हैं उनकी प्रमाणिकता 98 फीसदी है। इतनी अधिक संख्या में लोगों को टेस्ट करने की क्षमता और योग्यता ने इस देश को दुनिया के दूसरे देशों के लिए एक रोल मॉडल के तौर पर स्थापित किया है। एक ऐसे देश के तौर पर जो कोरोना वायरस के संक्रमण से लडऩे के लिए तैयार है। लेकिन सब कुछ अच्छा ही नहीं है। कुछ गलतफहमियां भी हुई हैं।
अस्पताल का बेड मिलने का इंतजार करते-करते डैगु में दो लोगों की मौत हो गई। शुरुआत में यहां जिसे भी संक्रमित पाया जा रहा था उसे अस्पताल में ही क्वॉरन्टीन के लिए रखा जा रहा था। लेकिन अब डॉक्टरों ने यह समझ लिया है कि जिन लोगों में यह संक्रमण बेहद कम है उन्हें उनके आवास पर भी इलाज मुहैया कराया जा सकता है। ऐसे में जो लोग ख़तरनाक तौर पर संक्रमित हैं उन्हें अस्पताल का बिस्तर मिलना आसान हो गया है।
कोरिया नेशनल मेडिकल सेंटर के डॉ किम योन जे के मुताबिक, हम हर किसी को क्वॉरन्टीन नहीं कर सकते हैं और ना ही हर किसी का इलाज कर सकते हैं। जिन लोगों में संक्रमण के बेहद मामूली लक्षण हैं उन्हें घर पर रहना चाहिए और वहीं इलाज लेना चाहिए।
हमें परिणाम को देखते हुए रणनीति में बदलाव करना चाहिए ताकि मौत के आँकड़ों को बढऩे से रोका जा सके। जैसे की इटली में यह भयानक रूप ले चुका है। ऐसी स्थिति में इटली को अपनी रणनीति में बदलाव लाना चाहिए।
जिन लोगों के सैंपल जमा किए गए हैं उनकी भी जांच हो रही है और उन पर भी परीक्षण किए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों ने एक यूनिक प्रोटीन ईजाद किया है जो एंटीबॉडी का पता लगा सकता है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि भविष्य में इसका टीका तैयार कर लिया जाएगा।
ली नाम के एक शख्स (बदला हुआ नाम) हर सप्ताह खून की जांच कराने के लिए जाते हैं। वो वुहान में काम करते थे। वो दिसंबर महीने में वहीं थे, जब इस वायरस का पता चला और फिर ये पूरी दुनिया में फैल गया। उन्हें दक्षिण कोरियाई सरकार वापस लेकर आई और जब उनकी जांच हुई तो पता चला कि वो पॉजिटिव हैं। उनकी मां इस बात से काफ़ी दुखी थीं।
वो बताते हैं, मां यह जानकर सबसे अधिक परेशान हो गई थीं लेकिन उन्हें परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं थी। मैं 28 साल का हूं और मेरा केस माइल्ड लेवल का था।
अपनी तबीयत के बारे में ली कहते हैं, मैं बिलकुल ठीक महसूस कर रहा था। मुझे इसके कोई लक्षण भी नजर नहीं आ रहे थे। बस हल्का सा कफ था। अगर मैं अपने अनुभव से कहूं तो यह बहुत जरूरी है कि आप सचेत रहें और सावधान भी। लेकिन मैं यह भी कहना चाहता हूं कि ज़्यादा घबराएं नहीं। कम से कम मेरे मामले में वायरस के लक्षण बहुत तीव्र नहीं थे। लेकिन मैं ये जरूर जानता हूं कि जो लोग बुजुर्ग हैं उन्हें ज़्यादा सावधानी रखने की जरूरत है। लेकिन जो लोग युवा हैं और स्वस्थ हैं उन्हें बहुत अधिक डरने या घबराने की जरूरत नहीं। लेकिन सावधानी अपनाना जरूरी है।
दक्षिण कोरिया में अभी तक कोरोना वायरस से लडऩे के लिए जो भी उपाय अपनाए गए हैं, उनमें लॉकडाउन कहीं भी नहीं है। यानी सुरक्षा उपायों के नाम पर ना तो कहीं बंदी की गई है ना सड़कों पर प्रतिबंध लगाया गया है और ना ही लोगों के आवाजाही को रोका गया है। दक्षिण कोरिया का इस वायरस से लडऩे का सिर्फ एक मंत्र है- पहचान, परीक्षण और इलाज।
लगभग पाँच करोड़ की आबादी वाला ये देश इस वायरस से लडऩे के लिए हर छोटी से छोटी कोशिश को भी तवज्जो दे रहा है। स्कूल अब भी बंद हैं, दफ्तरों में लोगों को घर से काम करने को कह दिया गया है और लोगों से कहा गया है कि वे किसी समारोह और आयोजन का हिस्सा ना बनें।
सोल की सड़कों पर धीरे-धीरे लोगों की आवाज बढ़ रही है। ज़्यादातर लोग मास्क में दिखते हैं। हर प्रमुख इमारत के बाहर थर्मल ट्रेसिंग की व्यवस्था की गई है। हर लिफ्ट में हैंड-सेनेटाइजर की व्यवस्था की गई है। जगह-जगह लोगों को खड़ा किया है जो आते-जाते लोगों को याद दिलाते रहते हैं कि हाथ धोना है।
दक्षिण कोरिया में धीरे-धीरे ये चलन आम होता जा रहा है। लेकिन स्वास्थ्य अधिकारी अब भी मुस्तैद हैं। उनका मानना है कि अभी लापरवाही, ख़तरनाक साबित हो सकती है। अगर किसी चर्च, ऑफिस, जिम या सोसायटी में किसी एक ने भी लापरवाही की तो परिणाम भयानक हो सकते हैं। 
रशेल किम को उनके टेस्ट के अगले दिन एक मैसेज आया। उन्हें कोरोना वायरस संक्रमित नहीं पाया गया। लेकिन वो कहती हैं- टेस्ट के बाद ये पता चलना सुकून देने वाला है। यह एक बड़ी राहत इसलिए भी है क्योंकि अब मैं किसी और के लिए भी ख़तरा नहीं हूं।(बीबीसी)
 


Date : 28-Mar-2020

एंथनी जर्चर
अमरीका, 27 मार्च। अमरीका में अचानक बेरोजगारों की संख्या बढ़ गई है। यहां 30 लाख से ज़्यादा लोगों ने ख़ुद को बेरोजगार के तौर पर पंजीकृत करवाया है। अचानक आई ये रिकॉर्ड बेरोजगारी दिखाती है कि अमरीका की अर्थव्यवस्था रातोरात गहरे संकट में आ गई है।
सरकार के शटडाउन के आदेश से ना सिर्फ कारोबार अस्थायी तौर पर बंद हो गए हैं बल्कि इससे लाखों अमरीकियों की नौकरियां भी चली गई हैं। इनमें से कई वो लोग हैं जो घंटों के हिसाब से काम करते हैं और हर महीने मिलने वाले पे-चेक पर निर्भर रहते हैं। इनके पास कोई बचत नहीं होती।
शेयर मार्केट तेजी से गिरे और छँटनी की शुरुआती ख़बरों ने गुरुवार को बड़ा रूप ले लिया। इसे देखते हुए अमरीकी संसद ने देश के इतिहास के सबसे बड़े आर्थिक सहायता पैकेज की घोषणा की। अब देखना ये है कि क्या मल्टी-ट्रिलियन-डॉलर की राहत इन स्थितियों को संभालने के लिए काफी होगी।
फिलहाल एक बात तो साफ है कि कोरोना वायरस की बीमारी ने हजारों अमरीकियों को अपनी चपेट में ले लिया है और मामले बढऩे के साथ ही अर्थव्यवस्था भी बीमार होती जा रही है। इससे लाखों लोगों का जीवन प्रभावित होगा।
अमरीकी संसद की तरह वाइट हाउस ने भी आने वाली आर्थिक सुनामी को देखा है। इस हफ्ते की शुरुआत में अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा कि वो कारोबारों को फिर से खोलने के लिए उत्सुक हैं। ये बयान उनके पहले वाले बयान से उलट है, जिसमें उन्होंने कहा था कि वायरस के प्रसार को रोकने के लिए हर संभव कोशिश की जाएगी।
दरअसल, ट्रंप के लिए राजनीतिक वास्तविकता ये है कि मौत के आँकड़े बढ़ते रहने के साथ-साथ ही अगर अमरीकी अर्थव्यवस्था भी गहरी मंदी की ओर जाती है तो दोनों ही वजहें आगामी राष्ट्रपति चुनाव में उनके लिए मुसीबत बन सकती हैं।
वैसे तो ये अनसुलझा क्षेत्र है, लेकिन चुनाव वाले साल के शुरू में ही अमरीका का आर्थिक संकट में जाना राष्ट्रपति की राजनीतिक उम्मीदों के लिए गंभीर खतरा है। जब समय खराब होता है तो आर्थिक मुश्किलें दूसरी चिंताओं से ध्यान हटा देती हैं।
राष्ट्रपति के लिए लोगों का कुछ समर्थन भी बढ़ा है। वो शायद इसलिए क्योंकि किसी बाहरी खतरे से निपटने के लिए अमरीकी लोग मुश्किलों का सामना करने को तैयार हैं। हालांकि 1990 के खाड़ी युद्ध और 9/11 हमलों जैसे पिछले संकटों में अमरीका के राष्ट्रपति का इसके मुकाबले कहीं ज़्यादा समर्थन मिला था। ये बात और है कि लंबे वक्त तक चली मुश्कलों की वजह से या अर्थव्यवस्था के लुढ़कने की वजह से दोनों ही मामलों में बाद में वो समर्थन कम हो गया।
वल्र्ड ट्रेड सेंटर और इराक़ युद्ध के वक्त जॉर्ज डब्ल्यू बुश को मिला लोगों का समर्थन चुनाव तक बना रहा और उन्हें फिर से चुनाव जिता गया। वहीं उनके पिता जॉर्ज एचडब्ल्यू बुश इस मामले में इतने किस्मत वाले नहीं रहे, क्योंकि खाड़ी युद्ध के बाद मिला लोगों का समर्थन जल्द ही कम हो गया।
ट्रंप के देश से वापस काम पर लौटने के आह्वान को अन्य कंज़र्वेटिव्स ने भी दोहराया है। ये और ज़्यादा खुले तौर पर बोल रहे हैं कि लोगों की जिंदगियां बचाने के लिए इतने कड़े कदम उठाना ठीक नहीं है क्योंकि इससे आम लोगों की ही आर्थिक मुश्किलें बढ़ रही हैं।
राष्ट्रपति की ये बातें आने वाले दिनों में उन कई गवर्नरों, रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स के साथ मतभेद की वजह बन सकती है, जिनके हाथ में राज्यों की कमान है और वो अपने लोगों से प्रतिबंध कम करने के पक्ष में नहीं होगें। हालांकि इस तरह ट्रंप को आर्थिक संकट की कुछ जिम्मेदारी राज्यों के इन नेताओं पर डालने का मौका मिल जाएगा।
मेरे तरीके से आपको तकलीफ हुई, लेकिन ये जरूरी था कहने के बजाय राजनीतिक तौर उनके लिए ये कहना सही होगा कि आपको ये मेरे तरीके से करना चाहिए था।
ये भी संभावना है कि ट्रंप का समर्थन करने वाले कुछ गवर्नर राष्ट्रपति की बातों को मान लें, जिससे देश में एक तरह का विभाजन हो जाएगा। एक तरफ वो राज्य होंगे जिन्होंने अपने यहां लॉकडाउन जारी रखा और दूसरी तरफ वो राज्य होंगे जिन्होंने अपने यहां प्रतिबंधों में ढील दी।
जैसे हाल में मिसिसिपी के गवर्नर ने घोषणा की है कि मिसिसिपी में ज़्यादातर बिजनेस जरूरी हैं, इसलिए उन्हें सोशल डिस्टेंसिंग के मानकों से छूट दी जाएगी। बुधवार रात राष्ट्रपति ट्रंप ने एक ट्वीट कर अमरीकी प्रेस पर हमला बोला और कहा कि मीडिया कारोबारों को बंद करने का दबाव बना रहा है। उन्होंने लिखा, असली लोग जल्द से जल्द कामों पर लौटना चाहते हैं।
ये इस बात का संकेत है कि आगामी आम चुनाव का अभियान राष्ट्रपति के दिमाग में तेज़ी से घूम रहा है। राष्ट्रपति के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों ने पहले ही वायरस को हैंडल करने के ट्रंप के तरीके पर हमले तेज कर दिए हैं।
प्रायॉरिटी यूएसए एक्शन नाम का एक लिबरल समूह एक विज्ञापन चलवा रहा है, जिसमें अमरीका में बढ़ रहे कोरोना के मामलों का चार्ट दिखता है, जिसके साथ ट्रंप का वो ऑडियो चलता है जिसमें वो शुरू में इस खतरे को खारिज कर रहे थे।
ट्रंप के चुनाव अभियान की टीम ने इस विज्ञापन को रुकवाने के लिए नोटिस दिया है। उनका कहना है कि इसमें ट्रंप के बयान को ग़लत संदर्भ में दिखाया गया है। हालांकि इसके कई सबूत मिलते हैं कि राष्ट्रपति ने शुरुआती दिनों में वायरस के खतरे को हल्के में लिया।
राष्ट्रपति अब मौजूदा विज्ञापन को हटवा पाएं या ना हटवा पाएं, लेकिन अगर मेडिकल और आर्थिक मुश्किलें ऐसे बढ़ती रहीं तो आने वाले दिनों में ऐसे और भी विज्ञापन दिए जाएंगे।
30 लाख अमरीकी बेरोजग़ार हैं, तीस लाख अमरीकी मुश्किल दौर से गुजऱ रहे हैं। ये सब सत्ता की कुर्सी को हिला देने की ताक़त रखता है।
संसद का सहायता पैकेज लोगों की आर्थिक मुश्किलों को कम करने के मक़सद से दिया गया है लेकिन अगर गुरुवार को आए बेरोजग़ारी के आँकड़े आर्थिक संकट की सिफऱ् शुरुआत है तो ऐसे में इसे दूर करने के लिए ये पैकेज नाकाफ़ी होगा। अभी लगता है कि राष्ट्रपति इस बात को समझ गए हैं। (बीबीसी)
 


Date : 28-Mar-2020

इटली, 27 मार्च। कोरोना वायरस से हर दिन इटली में सैकड़ों मौतें हो रही हैं। इटली में कोरोना वायरस के संक्रमण फैलने के बाद से शुक्रवार को एक दिन में मरने वालों की संख्या सबसे ज़्यादा रही। शुक्रवार को पिछले 24 घंटे में इटली में 919 लोगों की जान गई।

इसके साथ ही कोरोना वायरस के संक्रमण से मरने वालों की कुल संख्या 9,134 हो गई है। यूरोप में इटली कोरोना वायरस की चपेट में सबसे बुरी तरह से है। पूरे इटली में सब कुछ बंद हैं और लोग अपने-अपने घरों में कैद हैं। शुक्रवार को प्रशासन ने कहा कि देश भर में लगी पाबंदिया तीन अप्रैल तक आगे बढ़ सकती हैं।
इटली का उत्तरी इलाका लोम्बार्डी कोरोना वायरस से सबसे ज़्यादा प्रभावित है। इटली में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की कुल संख्या 86,500 हो गई है। डर है कि इटली का दक्षिणी इलाका भी कोरोना की चपेट में लोम्बार्डी की तरह ही न आ जाए। बीबीसी के रोम संवाददाता मार्क लोवेन के अनुसार इटली में कोरना वायरस की त्रासदी लगतार विकराल रूप धारण करती जा रही है। देश की ग्रामीण आबादी हर दिन कम हो रही है।
केवल लोम्बार्डी में ही पिछले 24 घंटों में कुल 541 लोगों की मौत हुई है। यूरोप में इटली के बाद स्पेन कोरोना वायरस के संक्रमण की त्रासदी से सबसे बुरी तरह से प्रभावित है। हर दिन मरने वालों की संख्या बढ़ रही है। हालांकि संक्रमण फैलने के मामले में कमी आई है। स्पेन में कोरोना से संक्रमण के कुल 64,059 मामले सामने आ चुके हैं।
यहां पिछले 24 घंटों में 769 लोगों की मौत हुई है और कोरोना वायरस से मरने वालों की कुल संख्या 4,858 पहुंच गई है। स्पेन की सरकार ने देश में आपाकाल को बढ़ाकर 12 अप्रैल तक कर दिया है।
शुक्रवार को फ्रांस में भी कोरोना वायरस से 299 लोगों की जान गई। फ्रांस में कोरोना के संक्रमण से मरने वालों की कुल संख्या 1,995 हो गई है। यहां कोरोना से संक्रमण के कुल 33,000 मामले सामने आ चुके हैं। फ्रांस के प्रधानमंत्री ने लोगों से 15 अप्रैल तक घरों में ही रहने के लिए कहा है। (बीबीसी)
 


Date : 28-Mar-2020

नई दिल्ली, 27 मार्च। यह स्पष्ट है कि हम मंदी की दौर में प्रवेश कर चुके हैं और ये दौर साल 2009 की मंदी से भी बुरा होगा। ये बातें अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की प्रमुख क्रिस्टलिना गोर्गिवा ने शुक्रवार को एक ऑनलाइन प्रेस वार्ता में कहीं। क्रिस्टलीना ने कोरोना वायरस महामारी को इसकी बड़ी वजह बताया है।
उन्होंने कहा, वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय बड़े संकट के दौर से गुजर रही है और अभी जो नुकसान हुआ है, उससे निपटने के के लिए देशों (खासकर विकासशील देशों) को बहुत ज़्यादा फंडिंग की जरूरत होगी। दुनिया के 80 देश पहले ही आईएमएफ से मदद की गुहार लगा चुके हैं।
क्रिस्टलिना ने कहा किृ दुनिया भर में आर्थिक गतिविधियां अचानक से ठप होने के साथ उभरते बाजारों को कम से कम 2,500 अरब डॉलर की जरूरत होगी।
कोरोना वायरस संक्रमण और लॉकडाउन से जूझते कई देशों की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है और बेरोजगारी का संकट भी अचानक बेतहाशा बढ़ा है। इस खबर को अंग्रेजी अखबार टाईम्स ऑफ इंडिया ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है। (बीबीसी)
 


Date : 28-Mar-2020

काबुल, 27 मार्च । काबुल के गुरुद्वारे में बुधवार को हुए हमले में शामिल इस्लामिक स्टेट का एक आत्मघाती हमलावर भारत के केरल राज्य से था।
इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय खुफिया एजेंसियों ने हमलावर के परिवार से मिली मदद के बाद इसकी पहचान मोहम्मद मोहसिन के तौर पर की है।
अखबार सूत्रों के हवाले से लिखता है कि मोहसिन का परिवार अब कन्नूर में रहता है। इस्लामिक स्टेट की पत्रिका अल नबा में शुक्रवार को आत्मघाती हमलावरों की तस्वीरें छपी थीं। इनमें से एक तस्वीर मोहसिन की भी थी जिसे पत्रिका में अबू खालिद अल-हिंदी बताया गया था।
मोहिसन के माता-पिता ने इसकी पहचान करके कहा है कि वो उनके बेटे की तस्वीर है। मोहसिन की मां ने ये दावा भी किया है कि शुक्रवार को इस्लामिक स्टेट के एक सहयोगी ने उन्हें टेलीग्राम पर एक मेसेज भेजकर बताया था कि उनका बेटा काबुल हमले में शहीद हो गया है।
केंद्रीय खुफिया एजेंसी के एक अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि मोहसिन की मां से जब वो मेसेज दिखाने को कहा गया तो उन्होंने डर के मारे वो मेसेज डिलीट करने की बात कही। बताया जा रहा है कि मोहसिन साल 2018 में केरल छोड़कर अफगानिस्तान चला गया था। बुधवार को अफगानिस्तान में हुए इस हमले में 25 लोगों की मौत हो गई थी।(बीबीसी)
 


Date : 28-Mar-2020

कोलंबों, 28 मार्च । श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने साल 2000 में गृहयुद्ध के दौरान देश के तमिल बहुल उत्तरी प्रांत में एक बच्चे सहित आठ लोगों की हत्या के दोषी श्रीलंकाई सैनिक की मौत की सजा माफ कर दी है।
सेना के स्टाफ सार्जेंट सुनील रत्नायके को जून 2015 में उच्च न्यायालय ने दोषी ठहराया था और उनकी अपील को उच्चतम न्यायालय ने 2019 में खारिज कर दिया था।
रत्नायके पर वर्ष 2000 में उत्तरी प्रांत में तैनाती के दौरान एक बच्चे समेत आठ नागरिकों की हत्या का आरोप लगा था। इस क्षेत्र में सेना और लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) के बीच संघर्ष चल रहा था।
तमिल राजनेताओं और मानवाधिकार समूहों के दबाव के बाद रत्नायके और 13 अन्य सैनिकों पर तत्कालीन सरकार ने आरोप तय किए थे। बाद में उनमें से नौ को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया, जबकि रत्नायके को 15 मामलों में दोषी ठहराया गया था। उसके चार सहयोगियों को कोई सबूत नहीं मिलने पर बरी कर दिया गया था।
राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने पिछले साल नवंबर में अपने चुनाव अभियान में सिरीसेना सरकार के दौरान दोषी पाए गए सैनिकों को छोडऩे का वादा किया था। सिरीसेना सरकार ने कुछ सैनिकों के खिलाफ अधिकारों के कथित दुरुपयोग के लिए जांच शुरू करने का आदेश दिया था।
लिट्टे श्रीलंका के उत्तरी और पूर्वी प्रांतों में अलग तमिल राज्य बनाने के उद्देश्य से संघर्ष कर रहा था। श्रीलंका में इसे लेकर चल रहे गृहयुद्ध के दौरान गोटाबाया शीर्ष रक्षा अधिकारी थे और विद्रोही तमिल टाइगर समूह को हराने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 25 साल बाद साल 2009 में लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण के मारे जाने के बाद यह गृह युद्ध खत्म हुआ था।
द न्यूयार्क टाईम्स के मुताबिक, श्रीलंका के प्रमुख सिंहली राष्ट्रवादियों ने मौत की सजा का विरोध किया था। इसे 26 साल के अलगाववादी गृहयुद्ध में अल्पसंख्यक तमिल विद्रोहियों के खिलाफ लडऩे वाले सैनिकों के साथ विश्वासघात करार दिया था।
श्रीलंका में पिछले 44 सालों से मृत्युदंड पर रोक लगी हुई है, दोषी को मौत की सजा के बदले आजीवन कारावास हो जाता है।
मालूम हो कि इससे पहले श्रीलंका ने इस साल फरवरी में हुए अपने स्वतंत्रता दिवस समारोह में राष्ट्रीय गान के तमिल संस्करण के प्रस्तुतीकरण को हटा दिया था। साल 2016 के बाद पहली बार ऐसा हुआ था।
वर्ष 2015 में तत्कालीन श्रीलंका सरकार ने तमिल अल्पसंख्यक समुदाय से सामंजस्य स्थापित करने के लिए स्वतंत्रता दिवस समारोह में तमिल में भी राष्ट्रगान को शामिल किया था।(भाषा)


Date : 27-Mar-2020

सोफिया बेट्टिजा
इटली, 27 मार्च। जब कोई ऐसे व्यक्ति की मौत हो जाती है, जिसे आप प्यार करते हैं तो उसे आखिरी बार देखना और उसे पूरे सम्मान के साथ विदा करना आपके लिए सबसे जरूरी हो जाता है। लेकिन कोरोना वायरस की महामारी के कारण अपने प्रियजन को अंतिम विदाई देने का मौक़ा भी इटली के लोगों पास से छिन गया है। ये एक तरह से मृतक को दिए जाने वाला सम्मान छीनने और परिवार के लोगों का दुख बढ़ाने जैसा है।
एंड्रीया सेराटो मिलान में एक फ्यूनरल होम में अंडरटेकर का काम करते हैं। वो कहते हैं, महामारी आपको एक बार नहीं दो बार मारती है। पहले ये बीमारी मरने से ठीक पहले आपको अपने सभी प्रियजनों से अलग-थलग करती है। फिर ये किसी को आपके पास आने नहीं देती। परिवारों के लिए ये बेहद मुश्किल समय होता है और उनके लिए ये स्वीकार करना दुखदायक होता है।
इटली में कोविड 19 के कारण मरने वाले कई लोगों के पास आखऱिी वक्त में उनके परिवार का कोई सदस्य या कोई मित्र नहीं था। उनसे किसी दूसरे को संक्रमण न फैले इसलिए अस्पताल में लोगों के उनसे मिलने आने पर भी पाबंदी लगाई गई थी। हालांकि स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि शव में वायरस का संक्रमण नहीं होता, लेकिन फिर भी ये वायरस मरने वाले व्यक्ति के कपड़ों पर कुछ घंटों के लिए जीवित रह सकता है। इसका मतलब ये है कि शव को तुरंत सील किया जाना जरूरी है।
क्रेमोना में अंडरटेकर के तौर पर काम करने वाले (शव को अंतिम संस्कार के लिए तैयार करने का काम करने वाले) मसिमो मनकैस्ट्रोपा कहते हैं, कई परिवार हमसे पूछते हैं कि क्या वे एक आखिरी बार अपने प्रियजन को देख सकते हैं। लेकिन इन्हें इसकी इजाजत नहीं मिलती क्योंकि इस पर पाबंदी है।
अक्सर शव को परिजन उस व्यक्ति के पसंदीदा कपड़े पहनाते हैं, उसे सजाते हैं और फिर उसका अंतिम संस्कार करते हैं। लेकिन इटली में अभी कोरोना से मरने वालों का अंतिम संस्कार उनके पसंदीदा कपड़ों में नहीं किया जा सकता। उन्हें अस्पताल के ही गाउन में चुपचाप दफनाया जा रहा है। लेकिन मनकैस्ट्रोपा कहते हैं कि ऐसे मुश्किल दौर में जो उनसे बन पड़ रहा है कर रहे हैं।
वो कहते हैं, हम शव के ऊपर वो कपड़े डाल देते हैं जो परिवार वाले हमें देते हैं, ताकि ऐसा लगे कि मरने वाले ने कपड़े पहने हुए हैं। जैसे हम उन पर शर्ट और स्कर्ट डाल देते हैं।
इटली में महामारी के दौर में अंडरटेकर ख़ुद को एक नई भूमिका में देख रहे हैं। वो मृतक के परिजन की तरह, उनके मित्र की तरह काम कर रहे हैं। वो एक पादरी की तरह मृतक के लिए जन्नत की प्रार्थना कर रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि कोरोना से मरने वाले अधिकर मामलों में उनके परिवार के सदस्य क्वारंटीन में होते हैं। एंड्रीया सेराटो कहते हैं, परिवार के लिए इस वक्त में उनकी सारी जिम्मेदारी हम ही निभाते हैं।
कोरोना वायरस के कारण इटली में अब तक छह हजार से अधिक मौतें हो चुकी हैं और करीब 60 हजार लोग इससे संक्रमित हैं। सेराटो कहते हैं, हम परिवार वालों के पास ताबूत की एक तस्वीर भेजते हैं और इसके बाद अस्पताल से शव को लेकर दफना देते हैं। परिवार वालों के पास हम पर यकीन करने के सिवा कोई रास्ता नहीं है। सेराटो कहते हैं कि उनके लिए सबसे मुश्किल काम ये है कि वो परिवार का दुख कम करने के लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं। मृतक के परिवार को ये बताने की बजाय कि वो उनके लिए क्या कर सकते हैं वो फिलहाल ये लिस्ट बनाने में व्यस्त हैं कि वो क्या-क्या नहीं कर सकते।
वो कहते हैं, हम उन्हें कपड़े नहीं पहना सकते। हम उनके बालों में कंघी नहीं कर सकते। हम उन्हें सजा नहीं सकते। हम उनका मेकअप नहीं कर सकते ताकि वो अच्छा दिखें। ये सब दुखी करने वाला है। सेराटो बीते 30 सालों से अंडरटेकर का काम कर रहे हैं। उनसे पहले उनके पिता भी यही काम करते थे।
वो मानते हैं कि मरने वाले के परिवार के लिए छोटी-छोटी बातें भी मायने रखती हैं। वो कहते हैं, आखिरी बार उनके गालों को सहलाना, उनका हाथ पकडऩा, और उन्हें ख़ूबसूरत दखना। ऐसा नहीं कर पाना अपने आप में दर्दनाक है। लेकिन महामारी के इस दौर में सेराटो जैसे कई लोग परिवारों से दूरी बना कर ही मुलाकात करने के लिए बाध्य हैं।
मृतक के रिश्तेदारों की ये कोशिश रहती है कि वो मृतक के लिखे नोट्स, परिवार की निशानी, चित्र और कविताएं शव के पास रखें, ताकि ये उनके साथ ही दफनाए जा सकें। लेकिन मौजूदा वक्त में इनमें से एक भी चीज ताबूत के भीतर नहीं रखी जा रही।
इस तस्वीर में बर्गेमो के एक कब्रिस्तान में खास कपड़े पहने अंडरटेकर ताबूत निकाल कर रहे हैं। सेफ्टी गीयर न होने की सूरत में उनके संक्रमित होने का भी खतरा है। फिलहाल निजी वस्तुओं को दफनाना अब अवैध बना दिया गया है। हालांकि ये एक कठोर कदम है लेकिन कोरोना के बढ़ते संक्रमण को रोकने के लिए ये फैसला किया गया है।
अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु घर पर हो जाती है, तो अंडरटेकर को घर के भीतर जाने की अनुमति होती है - लेकिन उन्हें पूरी तरह से सेफ्टी गियर पहनकर आना होत है, जैसे - चश्मा, मास्क, दस्ताने और कोट।
किसी भी इंसान के लिए अपने प्रियजन को मरते देखना बहुत दुखदायी होता है। लेकिन महामारी के बीच इटली में कई अंडरटेकर ख़ुद क्वारंटीन में चले गए हैं। कुछ को तो अपना व्यवसाय बंद करना पड़ा है। चिंता का एक बड़ा विषय ये भी है कि शवों के साथ करीब से काम करने वालों के पार्याप्त मास्क या दस्ताने नहीं हैं।
सेराटो कहते हैं, हमारे पास एक और सप्ताह तक काम चलाने के लिए पर्याप्त सेफ्टी गियर है। लेकिन जब ये खत्म हो जाएगा तो हम आगे काम नहीं कर पाएंगे। मैं ये कल्पना भी नहीं कर सकता कि बाकी लोग इस स्थति से कैसे मुकाबला कर रहे हैं।
वायरस को फैलने से रोकने के लिए इटली ने एक आपातकालीन राष्ट्रीय कानून लागू किया है जिसके तहत जनाज़ा निकालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। रोमन कैथोलिक मूल्यों को मामने वाले किसी देश के लिए ये अभूतपूर्व है। दिन में कम से कम एक बार ऐसा होता है जब सेराटो किसी शव को दफनाते हैं और कोई परिजन आसपास नहीं दिखता, क्योंकि हर कोई क्वारंटीन में है।
मसिमो मनकैस्ट्रोपा कहते हैं, शव दफन करते समय एक या दो परिजनों को पास खड़े रहने की इजाजत होती है लेकिन ये काफी नहीं है। उनमें से कोई एक भी शब्द कहने की स्थिति में नहीं होता, सब खामोश होते हैं।
मसिमो कहते हैं कि वो जितना संभव हो सके इस तरह की स्थिति से बचने की कोशिश करते हैं। वो अपनी कार में ताबूत लेकर चर्च पहुंचते हैं और कार के पीछे का दरवाजा खोल कर पादरी से गुजारिश करते हैं कि वो वहीं पर मृतक के लिए प्रार्थन करें। इसके बाद कुछ ही सेकंड में वो शव को कब्रिस्तान या शवदाह गृह ले जाते हैं और फिर इसके बाद वो अगला शव लेने के लिए निकल पड़ते हैं।
इटली में स्थिति फिलहाल ऐसी है जहां मुर्दाघर शवों से भर गए हैं और मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।
यहां 23 मार्च के बाद से अब तक कोरोना वायरस के कारण छह हजार लोगों की मौत हो चुकी है जो किसी भी देश से अधिक है। सेराटो कहते हैं, क्रेमोना में हमारे फ्यूनरल होम के बाहर लोगों की कतार है। ये कुछ-कुछ सुपरमार्केट की तरह है।
उत्तरी इटली में अस्पतालों के मुर्दाघर शवों से भर गए हैं। मसिमो मनकैस्ट्रोपा कहते हैं, क्रेमोना में अस्पताल के पास मौजूद चर्च किसी गोदाम की तरह दिखने लगे हैं।
एक के बाद एक ताबूत चर्च में आ रहे हैं। इटली में सबसे अधिक मामले बर्गेमो में दर्ज किए गए हैं जहां मदद के लिए सेना को बुलाना पड़ा है। यहां शहर से सभी कब्रिस्तानों में जगह कम पड़ रही है।
पिछले सप्ताह एक रात सेना के ट्रकों में 70 से अधिक ताबूतों को शहर की गलियों से होते निकाला गया। स्थानीय लोगों ने चुपचाप ये नजारा देखा। इनमें से हर ताबूत में किसी के मित्र या रिश्तेदार का शव था जो नजदीकी शहर में दफनाने के लिए ले जाया जा रहा था। इस मुश्किल परिस्थिति में इटली में डॉक्टरों और नर्सों को तो जान बचाने वाले हीरो की तरह देखा जा रहा है। लेकिन शव को दफनाने का काम करने वालों को भी उनके काम के लिए प्रशंसा मिल रही है। मसिमो कहते हैं, लोग हमें केवल शव ले जाने वाला नहीं समझ रहे। वो कहते हैं कि इटली के लोग हमें चेरॉन की तरह देख रहे हैं। यूनानी मिथकों में चेरॉन वो नाविक होता है जो मरने वाले की आत्मा को जन्नत तक पहुंचाता है। वो कहते हैं कि पहले इस काम के प्रति लोगों का सम्मान कम था लेकिन अब लोगों की नजरों में इस काम की अहमियत बढ़ गई है।
मसिमो कहते हैं, मैं आपको इस बात का भरोसा दिल सकता हूं कि हम चाहते हैं कि मरने वाले को जितना हो सके सम्मान दिया जाए।
जब से इटली में कोरोना वायरस का प्रकोप शुरू हुआ है तब से वहां सोशल मीडिया में (हैशटैग जल्द ही स्थिति बेहतर हो जाएगी) ट्रेंड कर रहा है। इसके साथ लोग इंद्रधनुष के इमोजी शेयर कर कर रहे हैं।
फिलहाल यहां उम्मीद की किरण नहीं दिखती। सभी की प्रार्थना यही है कि ये दौर जल्द गुजर जाए और सब कुछ पहले की तरह सामान्य हो जाए, लेकिन ऐसा कब तक हो पाएगा ये किसी को नहीं पता। (बीबीसी)


Date : 27-Mar-2020

यूरोप, 27 मार्च। बीते कुछ दिनों से यूरोप कोरोना वायरस महामारी का केंद्र बना हुआ है। कई देशों में सरकारें लोगों से घरों में बंद रहने के लिए कह रही हैं और वायरस को फैलने से रोकने के लिए पाबंदियां लगा रही हैं। लेकिन यूरोप में एक देश ऐसा भी है जहां अधिकारी इस वायरस के बढ़ते कदमों को रोकने के लिए आम जनजीवन पर पाबंदियां नहीं लगा रहे।
कोरोना महामारी से निपटने के लिए बेलारूस अपने निकट पड़ोसी यूरोपीय देश, यूक्रेन और रूस की तरह कड़े कदम नहीं उठा रहा।
यूक्रेन जल्द ही कोरोना को रोकने के लिए आपातकाल का ऐलान कर सकता है। रूस ने सभी स्कूलों को बंद कर दिया है, सार्वजनिक कार्यक्रमों पर पाबंदी लगाई है और देश से आने जाने वाली सभी उड़ानों को भी रद्द किया है। लेकिन बेलारूस में कामकाज आम दिनों की तरह ही चल रहा है। देश की सीमाएं पहले की तरह खुली है, लोग काम पर जा रहे हैं और लोग जरूरी सामान खरीदने के लिए दुकानों में तरफ नहीं भाग रहे। बेलारूस में आम दिनों फुटबॉल के मैच जारी हैं और लोग मैच देखने स्टेडियम आ रहे हैं।
बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लूकाशेन्को कहते हैं कि फिलहाल देश में कोरोना को पैर पसारने से रोकने के लिए ऐहतियातन कदम उठाने की जरूरत नहीं है।
मंगलवार को मिंस्क में चीन के राजदूत से मुलाकात के बाद उन्होंने कहा, घटनाएं तो होती रहती हैं। जरूरी है कि उन्हें लेकर लोगों में दहशत न फैले।
बेलारूस में न तो सिनेमाघर और थिएटर बंद किए गए हैं और न ही यहां सार्वजनिक कार्यक्रम करने पर किसी तरह को पाबंदी लगाई गई है।
बेलारूस दुनिया के उन चंद देशों में से है जिसने यहां होने वाली फुटबॉल चैंपियनशिप कैंसिल नहीं की है। यहां हो रहे फुटबॉल मैच सामान्य दिन की तरह कराए जा रहे हैं और पड़ोसी रूस के फुटबॉल प्रेमियों के लिए टेलीविजन पर भी मैचों का सीधा प्रसारण भी किया जा रहा है।
राष्ट्रपति लूकाशेन्को ने हाल में कहा था कि कोरोना वायरस को एक ट्रैक्टर रोकेगा। उनका ये बयान बेलारूस के सोशल मीडिया पर सुर्खियों में रहा और लोगों ने इस पर चर्चा की, कइयों ने इस बयान का मज़ाक भी बनाया। हालांकि राष्ट्रपति का बयान खेतों में मेहनत करने को लेकर था। उन्होंने ये भी कहा था कि वो खुद शराब नहीं पीते हैं लेकिन कोरोना को रोकने के लिए पीना पड़ा तो वो एक घूंट वोदका तो पी ही सकते हैं। हालांकि बेलारूस के आम नागरिक पूरी दुनिया में हो रहे कोरोना के कहर से खबरों से वाकिफ हैं और वो इस वायरस के बढ़ते कदमों को लेकर चिंता में हैं।
मिंस्क में कई युवा और स्कूली छात्र बीमारी का बहाना बना तक छात्रों से भरी क्लास में जाने से बच रहे हैं। छात्रों की परेशानी कम करने के लिए कॉलेज और युनिवर्सिटीज ने अपने क्लासेस का वक्त कुछ घंटे पहले कर दिया है, ताकि छात्र सार्वजनिक परिवहन में होने वाली भीड़ से बच सकें।
मिंस्क की सड़कों पर लोग कम ही दिख रहे हैं और लोगों का कहना है कि उन्हें पता है कि बूढ़े लोगों को इस वायरस से अधिक खतरा है। लेकिन कोरोना को लेकर इस तरह का कोई जागरूकता अभियान अधिकारियों की तरफ से नहीं कराया जा रहा।
राष्ट्रपति लूकाशेन्को ने कहा है कि इस कारण चिंता करने की कोई बात नहीं है क्योंकि विदेशों से बेलारूस आने वाले सभी लोगों के कोरोना वायरस टेस्ट कराए जा रहे हैं।
वो दावा करते हैं कि, एक दिन में दो या तीन लोगों के टेस्ट के नतीजे पॉजिटिव आ रहे हैं। ऐसे मामलों में उन्हें क्वारंटीन में भेजा जा रहा है और फिर उन्हें डेढ़ सप्ताह या दो सप्ताह बाद छोड़ा जा रहा है।
लूकाशेन्को कहते हैं कि चिंता करना और मानसिक तनाव लेना बेहद खतरनाक है, शायद ये वायरस से भी अधिक घातक है। उन्होंने देश की खुफिया एजेंसी बेलारूसी केजीबी को, आम लोगों के बीच अफ़वाह फैलाने और दहशत फैलाने वालों को पकडऩे का आदेश दिया है।
अब तक देश में कोरोना वायरस के कुल 86 मामले सामने आए हैं और यहां इस कारण मात्र दो मौतें हुई हैं। बेलारूस ने आधिकारिक तौर पर इस बात की पुष्टि नहीं की है कि मौतों का कारण कोरोना है लेकिन माना जा रहा है कि इन मौतें का कारण वायरस ही है।
बेलारूस कई अर्थों में यूरोप के दूसरे देशों से अलग है। ये यूरोप का आखिरी ऐसा देश है जहां अब भी मौत की सजा का प्रावधान है।
देश की विपक्षी एक्टिविस्ट एंड्रे किम सरकार के कड़े आलोचक रहे हैं, लेकिन इस मामले में वो राष्ट्रपति की बात से इत्तेफाक़ रखते हैं।
किम ने अपने फेसबुक पन्ने पर लिखा कि लूकाशेन्को बिल्कुल सही हैं क्योंकि अगर वो पूरे देश के लोगों पर बाहर निकलने से जुड़े प्रतिबंध लगाते हैं तो बेलारूस की अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी। यहां चीज़ें अलग हैं और बेलारुस फिलहाल दुनिया का ऐसा एक मात्र देश है जहां सरकार लोगों का भला सोच कर काम करती है न कि जनकल्याणकारी योजनाओं पर निर्भर करती है।
मैं मानता हूं कि ये कहने पर मुझे कड़ी आलोचना झेलनी पड़ेगी लेकिन जब हर तरफ पागलपन हो तो आप चुप नहीं रह सकते। वो कहते हैं पागलपन से मेरा मतलब कोरोना वायरस को लेकर दुनिया भर में जिस तरीके के कदम उठाए जा रहे हैं उनसे है। वो कहते हैं कि कुछ न कर के वो बेलारूस को दहशत से दूर रख रहे हैं। (बीबीसी)


Date : 26-Mar-2020

नई दिल्ली, 26 मार्च। न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च शहर में एक साल पहले दो मस्जिदों में हुए हमले के मामले में 29 साल के ऑस्ट्रेलियाई नागरिक ब्रेंटन टैरेंट ने 51 लोगों की हत्या का गुनाह कबूल लिया है।
ब्रेंटन ने अन्य 40 लोगों की हत्या की कोशिश और चरमपंथ के एक और मामले को भी स्वीकार कर लिया है। इससे पहले ब्रेंटन ने सभी आरोपों को नकार दिया था इसलिए अदालती सुनवाई चल रही थी।
दो मस्जिदों पर हुए इस हमले से दुनिया भर में शोक की लहर दौड़ गई थी। इस हमले के बाद न्यूजीलैंड में बंदूक रखने के कानून को बेहद कड़ा बना दिया गया था। न्यूज़ीलैंड में भी कोरोना वायरस को लेकर लॉकडाउन चल रहा है इसलिए गुरुवार को क्राइस्टचर्च हाई कोर्ट में हुई सुनवाई को बहुत सीमित रखा गया।
लोगों को इस सुनवाई में नहीं आने दिया गया था। ब्रेंटन और उसके वकील को भी वीडियो लिंक के जरिए सुनवाई में शामिल किया गया। दोनों मस्जिदों के प्रतिनिधि इस सुनवाई में पीडि़त परिवारों की ओर से शामिल हुए। जज जस्टिस मैंडर ने कहा, कोरोना वायरस के कारण कई तरह की पाबंदियां हैं इसलिए पीडि़त परिवार कोर्टरूम में नहीं हैं। अभी सजा नहीं सुनाई गई है।
फरीद अहमद की पत्नी हुस्ना की अल नूर मस्जिद पर हुए हमले में मौत हो गई थी। ब्रेंटन के गुनाह कबूलने पर उन्होंने टीवीएनज़ेड से कहा, कई लोगों को राहत मिली होगी कि उन्हें अब अदालती सुनवाई से छुट्टी मिल गई। लेकिन जिन्होंने अपनों को खोया है उसका गम अब भी है।
बंदूकधारी ब्रेंटन को लेकर उन्होंने कहा, मैं उनके लिए दुआ कर रहा हूं। वो अब सही दिशा में हैं। इस बात का संतोष है कि उन्हें लग रहा है कि गुनाह किया था। यह अच्छी शुरुआत है। पिछले साल नूर-अल मस्जिद के बाहर शुक्रवार के अजान के लिए पहुंची थीं न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न।
हमले को अंजाम कैसे दिया?
15 मार्च 2019 को बंदूकधारी ब्रेंटन टैरेंट ने क्राइस्टचर्च की अल नूर मस्जिद में अंधाधुंध गोलीबारी की थी। तीस सेकंड के भीतर ही उसने बाहर आकर अपनी कार से दूसरी बंदूक निकाली और मस्जिद में फिर से लोगों को गोली मारना शुरू कर दिया था।
इस हमले का ब्रेंटन ने हेडकैम के जरिए फेसबुक लाइव भी किया था। इसके बाद लेनवड मस्जिद में जाकर हमला बोल दिया था। यहां मस्जिद के बाहर दो लोगों को गोली मारी थी और फिर खिडक़ी से गोलीबारी शुरू कर दी थी। मस्जिद के भीतर से एक व्यक्ति बाहर आया था और उसी ने हमलावर का पीछा किया। बाद में पुलिस वाले आए और गिरफ्तार कर लिया गया था।
दोनों मस्जिदों में हुए हमले की पहली बरसी पर न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न ने कहा था कि इस हमले के कारण न्यूजीलैंड बुनियादी रूप से बदल गया है। प्रधानमंत्री ने कहा था कि कट्टरता रोकने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है।
जैसिंडा अर्डर्न ने कहा था, हमारे लिए यह चुनौती है कि हम दादागिरी, उत्पीडऩ, नस्लवाद और भेदभाव को कैसे खत्म करें। हम हर दिन इसे ख़त्म करने के लिए हर मौके का इस्तेमाल करेंगे। इसमें हर व्यक्ति को अपनी भूमिका निभानी होगी ताकि न्यूजीलैंड अच्छाई के लिए बुनियादी रूप से बदले। (बीबीसी)
 


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