-इल्मा हसन
भारत के उत्तर पूर्वी राज्य मिज़ोरम में रहने वाले बेनी मनाशे समुदाय के लोग अब इसराइल में बसने की तैयारी कर रहे हैं. ये ख़ुद को यहूदी समुदाय की खोई हुई जनजातियों में से एक का वंशज मानते हैं.
साल 2025 में इसराइल सरकार ने एक योजना को मंज़ूरी दी थी. इस योजना के तहत भारत के बेनी मनाशे समुदाय के सभी लोग आने वाले सालों में इसराइल जा सकते हैं. कुछ लोग पहले भी जा चुके हैं.
अभी भारत में इनकी तादाद क़रीब पांच हज़ार आठ सौ है. इनके इसराइल जाने का सिलसिला फ़रवरी 2026 से शुरू हो सकता है.
यह समुदाय मुख्य रूप से मिज़ोरम और पड़ोसी राज्य मणिपुर में रहता है.
पिछले दो दशकों में क़रीब चार हज़ार बेनी मनाशे लोग इसराइल जा चुके हैं. जाने की यह प्रक्रिया साल 2005 में एक प्रमुख रब्बी यानी यहूदी धर्म गुरु द्वारा इस समुदाय को यहूदी धर्म की एक खोई हुई जनजाति के रूप में मान्यता दिए जाने के बाद शुरू हुई.
इस सिलसिले में मिज़ोरम में रहने वाले क़रीब छह सौ बेनी मनाशे समुदाय के लोगों ने भी इसराइल जाने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की है.
ये लोग इसराइल क्यों जाना चाहते हैं, उनसे ही यह जानने-समझने के लिए बीबीसी की टीम मिज़ोरम की राजधानी आइज़ॉल के कई इलाक़ों में गई.
'मैं भी वहीं मरना चाहता हूं'
बेनी मनाशे समुदाय के 76 साल के मुसई हनामटे मिज़ोरम के पूर्व पुलिस अफ़सर और पहलवान हैं. वह मिज़ोरम की राजधानी आइज़ॉल के बीचो-बीच बने एक बड़े घर में रहते हैं. उनके घर की दीवारों पर परिवार के साथ खिंचवाई गईं तस्वीरें लगी हैं. उनसे हमारी मुलाक़ात उनके इसी घर में हुई.
उन्होंने बीबीसी हिन्दी से कहा, "हम मिज़ोरम को याद करेंगे. यह हमारी जन्मभूमि है. लेकिन यह हमारी आख़िरी मंज़िल नहीं है. इसलिए हमें लगता है कि हमें यहां से जाना ही होगा."
मुसई हनामटे के माता और पिता क़रीब 20 साल पहले ही इसराइल चले गए थे. अब उनके परिवार के बाक़ी लोग भी वहां जाना चाहते हैं.
वह बताते हैं, "मेरे माता-पिता वहीं पर गुज़रे थे और वहां दफ़न हैं. मैं भी वहीं पर मरना चाहता हूं."
उनका कहना है कि इसराइल जाना उनके लिए सिर्फ़ बेहतर आर्थिक भविष्य से नहीं जुड़ा है. यह उनकी धार्मिक आस्था और पहचान से जुड़ा फ़ैसला है .उनके मुताबिक़, इसराइल में उन्हें सरकार पेंशन देगी. यही नहीं, वह वहां ख़ुद का कारोबार भी शुरू करना चाहते हैं.
बेनी मनाशे समुदाय मिज़ोरम के आदिवासी समुदाय का हिस्सा हैं. इस समुदाय के लोग मानते हैं कि उनके पूर्वज क़रीब 2700 साल पहले प्राचीन इसराइल से निर्वासित कर दिए गए थे. उनका दावा है कि निर्वासन के बाद उनके पूर्वज पूर्व की ओर बढ़े. चीन होते हुए ये भारत के उत्तर पूर्व भारत में आए और वहीं पहाड़ियों में बस गए. इनका यह इतिहास मौखिक परंपराओं के ज़रिए आगे बढ़ता रहा. इनका कोई लिखित इतिहास नहीं मिलता है.
जानकारों का कहना है कि लिखित सुबूत की कमी ने इन लोगों की जड़ों के बारे में नए दावों को जन्म दिया. विद्वान बताते हैं कि मिज़ो या चिन-कुकी समुदायों को प्राचीन इसराइल से जोड़ने वाला कोई दस्तावेज़ी सुबूत नहीं मिलता.
आइज़ॉल के गवर्नमेंट टी रोमाना कॉलेज में इतिहास के प्रोफ़ेसर मलसावमलियामा बीबीसी को बताते हैं, "हमारे पास कोई लिखित प्रमाण नहीं है. यह मौखिक इतिहास है. बेनी मनाशे के दावे कुछ रिवाज़ों में समानताओं पर आधारित हैं लेकिन इनके इसराइली मूल का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है."
वहीं, मिज़ोरम यूनिवर्सिटी के एक शोध में कहा गया है कि यहूदी धर्म से समानता के तौर पर बताए जाने वाले कई रिवाज़, जैसे-पशु बलि या अनुष्ठानिक गीत, पहाड़ में रहने वाले समुदायों में व्यापक रूप से प्रचलित थे.
दूसरी ओर, बेनी मनाशे समुदाय का कहना है कि मिज़ो समुदाय में सदियों से कुछ ऐसे रिवाज़ हैं, जो यहूदी धर्म से जुड़ी प्रथाओं से मेल खाते हैं.
हालांकि, मिज़ोरम में औपचारिक रूप से यहूदी धर्म अपनाने की जानकारी 20वीं सदी के आख़िर में ही मिलती है. यह भी मिशनरियों और धार्मिक प्रचारकों असर की वजह से हुआ. यहूदी धर्मस्थल 'सिनेगॉग' बनाए गए. हिब्रू भाषा सीखी गई. यहूदी धार्मिक नियमों और परंपराओं का पालन किया जाने लगा.
मिज़ोरम में रहने वाले बेनी मनाशे समुदाय के ही जेरेमाया इस बदलाव को स्वीकार करते हैं. उनके मुताबिक़, "हमने साल 1976 में यहूदी धर्म के बारे में सीखना शुरू किया. साल 1995 के आसपास हमने यहूदी धर्म के नियमों के मुताबिक़ अपनी ज़िंदगी ढालनी शुरू की. हमने पहले ख़तना नहीं कराया था लेकिन जब हमें यहूदी क़ायदे के बारे में पता चला तो हमने कराया."
वक़्त के साथ ऐसी चीज़ें सामने आईं जिनमें मिज़ो रीति-रिवाज़ों और यहूदी परंपराओं के बीच समानताएं बताई गईं. इनमें गीत, भजन, त्योहार और धार्मिक अनुष्ठान शामिल हैं.
लेखक पीसी बियाक्सामा बीबीसी को बताते हैं, "मिज़ो समाज में ईसाई मुख्य धर्म है. इसलिए बेनी मनाशे समुदाय मुख्यधारा के समाज और मुख्यधारा के धर्म से अलग हो गए. उन्होंने कहा कि मिज़ोरम हमारा नहीं है. हमारा घर इसराइल है. यह जागरूकता 1950 के दशक में आई. तब तक मिज़ोरम में ईसाई धर्म में अच्छी तरह से स्थापित हो चुका था.''
उनके मुताबिक़, जब उन्होंने (बेनी मनाशे समुदाय) बाइबल का अध्ययन किया और इसराइलियों की संस्कृति को देखा तो कुछ वर्गों को यह अहसास हुआ कि वे यहूदी धर्म की खोई हुए जनजाति हो सकते हैं. यह अहसास लगभग 70 साल पुराना है."
यहूदी मज़हबी परंपरा में यहूदियों के इसराइल जाकर बसने को 'आलिया' कहा जाता है. 'आलिया' का मतलब सिर्फ़ देश बदलना नहीं बल्कि मज़हबी तौर पर इसराइल की ज़मीन पर रहना माना जाता है.
इसराइल में एक क़ानून है. इसे 'लॉ ऑफ़ रिटर्न' कहा जाता है. इसके तहत यहूदी माने जाने वाले लोगों को वहां जाकर नागरिकता पाने का हक़ मिलता है.
बेनी मनाशे समुदाय इसी के तहत इसराइल जा रहा है.
साल 2025 के दिसंबर में रब्बियों, यहूदी एजेंसी फ़ॉर इसराइल के सदस्यों और इसराइली दूतावास के नुमाइंदों ने बेनी मनाशे समुदाय के सदस्यों की स्क्रीनिंग यानी जांच-पड़ताल की. रिपोर्टों के मुताबिक़, इस दौरान मणिपुर से एक हज़ार से ज़्यादा और मिज़ोरम से करीब छह सौ लोगों ने इसराइल जाने के लिए अपना नाम दिया है.
जेरेमाया बताते हैं, "स्क्रीनिंग में यह जाना जाता है कि हम यहूदी धर्म में अपने विश्वास को लेकर पूरी तरह से पक्के हैं या नहीं. हमारा ईसाई धर्म से कोई संबंध तो नहीं है. पहली प्रक्रिया यह होती है कि यहूदी धर्म से जुड़े सवालों के जवाब दिए जाएं. इसके बाद हमारा पासपोर्ट बनाया जाएगा. हमारे नाम यहूदी एजेंसी के ज़रिये इसराइली सरकार को भेजे जाएंगे. उसके बाद यह तय किया जाएगा कि हम कहां रहेंगे."
जेरेमाया भी इसराइल जाने के लिए इंटरव्यू दे चुके हैं. समुदाय की ओर से वह 'आलिया' प्रक्रिया के प्रमुख समन्वयकों में से एक हैं. मिज़ोरम में वह एक प्रिंटिंग शॉप चलाते थे. जेरेमाया कहते हैं कि इसराइल जाने की तैयारी में उन्होंने अपना सारा सामान और संपत्ति पहले ही बेच दी है.
दूसरी ओर, ऐसी भी ख़बरें हैं कि इसराइल जाने वाले बेनी मनाशे समुदाय के लिए वहां की ज़िंदगी हमेशा आसान नहीं रही है. वहां के समाज में घुलने-मिलने की प्रक्रिया उनके लिए बड़ी चुनौती रही है. इसराइली मीडिया की रिपोर्टों में भारतीय यहूदी प्रवासियों के खिलाफ भेदभाव के मामलों का ज़िक्र भी आया है.
इसराइल की मंज़ूरी और योजना
एक ख़बर के मुताबिक़ बेनी मनाशे समुदाय के इसराइल जाने की प्रक्रिया चरणों में पूरी की जाएगी. पहले चरण में क़रीब तीन सौ लोग इसराइल जाएंगे.
साल 2026 के आख़िर तक लगभग 12 सौ लोगों के इसराइल जाने की उम्मीद है. इसराइल की सरकार के मुताबिक़ साल 2030 तक लगभग सभी पांच हज़ार आठ सौ लोग वहां चले जाएंगे.
इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने भी इस क़दम को 'एक अहम फ़ैसला' बताया है. इसराइली सरकार भारत से जाने वाले बेनी मनाशे समुदाय के लोगों के बसने में मदद के लिए शुरुआती आर्थिक मदद देगी. इसके साथ ही हिब्रू ज़बान की तालीम, रोज़गार से जुड़ी मदद, अस्थाई घर और सामाजिक कल्याण की योजनाओं का फ़ायदा भी देगी.
इसराइली सरकार के बयान के मुताबिक़, इन नए प्रवासियों को नोफ़ हागलील और उत्तर के अन्य शहरों में बसाया जाएगा. इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का कहना है कि इससे उत्तर और गलील क्षेत्र मज़बूत होंगे. यही वे इलाक़े हैं जहां इसराइली सरकार यहूदी आबादी फिर से बसाना चाहती है.
ये इलाक़े कम विकसित और कम आबादी वाले हैं. ये क्षेत्र हिंसा प्रभावित रहे हैं. रिपोर्टों के मुताबिक़, ये इलाक़े लेबनान के हिज़्बुल्लाह के साथ संघर्ष से काफ़ी प्रभावित रहे हैं और हाल के सालों में यहां से काफ़ी लोग पलायन कर चुके हैं.
पिछले दिनों ग़ज़ा में भी इसराइली हमले हुए थे. इसमें हज़ारों लोगों की जान गई है.
साल 2024 में वेस्ट बैंक में भारतीय मूल के एक इसराइली सैनिक के मारे जाने की खबरों के बाद बेनी मनाशे समुदाय फ़िक्रमंद है.
इन सबके बावजूद बेनी मनाशे समुदाय का इसराइल जाने का इरादा अटल है.
मिज़ोरम की ही 31 साल की या-एल वहां जाने की तैयारी में जुटी हैं. या-एल कहती हैं, "इसराइल ईश्वर की भूमि है. इसलिए वहां जाने की बहुत ख़्वाहिश है. मैंने अभी से तैयारियां शुरू कर दी हैं. जैसे, घर के सामान को समेटना और जो सामान यहीं छोड़ना है, उसे अलग करना."
उनके एक बेटा और एक बेटी हैं. इनके बेटे की उम्र आठ और बेटी की उम्र छह साल है. या-एल अपने पति और बेटे-बेटी के साथ एक बेडरूम के घर में रहती हैं. उनकी ज़िंदगी का पूरा वक़्त घर-परिवार को सम्हालने में जाता है. यह परिवार यहां ठीक-ठाक ज़िंदगी बसर कर रहा है. दीवारों पर बेटे-बेटी की तस्वीरों वाले पोस्टर लगे हैं. इनमें उन्हें जन्मदिन की मुबारकबाद दी गई हैं. पूरे घर में इनके खिलौने फैले हुए हैं. घर के हर कोने में बसे-बसाए परिवार की झलक दिखती है.
वह बताती हैं कि उनके बेटे-बेटी को इस फ़ैसले के बारे में पता है. ख़ासकर बेटे ने कहा है कि वह अब यहां स्कूल नहीं जाएगा. या-एल कहती हैं, "उसने कहा कि अब उसे वहां जाने की तैयारी करनी है. स्कूल तो वह इसराइल में ही जाएगा."
जब उनसे उस इलाक़े में चल रहे संघर्ष और डर के बारे में हमने पूछा तो उनका कहना था कि परिवार को सुरक्षा के बारे में कोई डर नहीं है.
वह कहती हैं, "हमें कोई डर नहीं है. मेरे पति ने कहा है कि ज़रूरत पड़ी तो वह ग़ज़ा में चल रहे संघर्ष का हिस्सा बनने के लिए भी तैयार हैं."
41 साल की रूथ उनकी पड़ोसी और दोस्त हैं. उनकी पांच बेटियां हैं. रूथ के माता-पिता और सबसे बड़ी बेटी पहले से इसराइल में हैं. अब वह अपनी बाक़ी चार बेटियों के साथ इसराइल जाना चाहती हैं. इसलिए रूथ की 18 और 19 साल की बेटियों ने भी इसराइल जाने के लिए इंटरव्यू दिया है.
रूथ कहना है, "बाइबल में भी लिखा है कि इसराइल को जंग का सामना करना पड़ेगा. इसलिए इस मामले में हमारे मन में कोई झिझक या डर नहीं है. ऐसा नहीं है कि हमें बिल्कुल डर नहीं लगता. अगर तेज़ आवाज़ें हों और हम कुछ सुनें तो हमें डर लग सकता है. लेकिन इस समय हमें कोई डर नहीं है. वैसे भी हम सबको एक दिन मरना ही है. अगर यही हमारी मौत का कारण बनता है तो मैं वहां मरना चुनूंगी. चाहे वह जंग की वजह से हो या किसी और वजह से."
हमारा 'घर' इसराइल है
आइज़ॉल में बसे लगभग 400 बेनी मनाशे समुदाय के लोग ख़ुशनुमा ज़िंदगी जी रहे हैं फिर भी इसराइल जाना उनके लिए बहुत मायने रखता है. उसके लिए वह अपना घर, अपना देश, और अपनी जानी-पहचानी ज़िंदगी भी छोड़ने को तैयार हैं. बीबीसी से बातचीत में इस समुदाय के कई लोग कहते हैं कि इसराइल में जाकर यहूदी धर्म का पालन करना उनके लिए ख़ास मायने रखता है.
इनका यह 'आलिया' ऐसे वक़्त पर हो रहा है, जब इसराइल जंग, राजनीतिक तनाव और सामाजिक विभाजन के दौर से गुज़र रहा है. इसके बावजूद, समुदाय के लोग कहते हैं कि उनके लिए मज़हबी आस्था और यहूदी पहचान ही सबसे अहम है.
रूथ कहती हैं, "हमने कभी कहीं यात्रा नहीं की है. हम सिलचर से आगे भी नहीं गए हैं. हालांकि, मुझे नहीं पता कि आगे हमारा भविष्य क्या होगा. हमें वहां जाकर अकेलापन महसूस हो सकता है. लेकिन हमें उम्मीद है कि दूसरों की मदद से सब ठीक होगा."
वहीं, या-एल कहती हैं, "हम क्या सब छोड़ कर जा रहे हैं? वहां क्या होगा, ये ख़्याल कभी मन में आए ही नहीं. न तो उदासी महसूस हुई. न ही यह सोचा कि हम अकेले पड़ जाएंगे. कई सालों से हमें वहां जाने की ख़्वाहिश रही है और उसी की तैयारी करते आ रहे हैं." (bbc.com/hindi)