तारिक़ रहमान ने पहली बार संसदीय चुनाव में बांग्लादेश के प्रमुख राजनीतिक दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) का नेतृत्व किया. इसके अलावा उन्होंने ख़ुद भी पहली बार इस चुनाव में हिस्सा लिया.
तारिक़ के नेतृत्व में बीएनपी ऐतिहासिक जीत की ओर बढ़ती दिख रही है. इस जीत के बाद तारिक़ रहमान बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री बन सकते हैं.
हालांकि बीएनपी तब जीत की ओर बढ़ रही है, जब शेख़ हसीना की पार्टी आवामी लीग को चुनाव में हिस्सा नहीं लेने दिया गया.
चुनाव से महज़ कुछ महीने पहले ही अपनी माँ ख़ालिदा ज़िया के निधन के बाद तारिक़ ने पार्टी की कमान संभाली थी.
पार्टी के सांगठनिक कार्यक्रम और पूरा चुनाव अभियान उनकी देख-रेख में ही चला है. तारिक़ के समर्थक उनको ही बांग्लादेश का संभावित प्रधानमंत्री बता रहे हैं.
बीएनपी भी तारिक़ को पार्टी के इकलौते नेता के तौर पर पेश कर रही है. हालांकि राजनीतिक विरोधी अतीत में रहमान के ख़िलाफ़ लगे भ्रष्टाचार के आरोप और शैक्षणिक योग्यताओं पर सवाल उठा रहे हैं.
लेकिन रहमान और उनकी पार्टी बीएनपी ने भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों को ख़ारिज करते हुए इसे पहले की अवामी लीग सरकार का दुष्प्रचार बताया है.
रहमान ने क़रीब 17 साल तक लंदन में राजनीतिक शरण ले रखी थी.
पूर्व राष्ट्रपति ज़ियाउर रहमान ने बीएनपी का गठन किया था और इसका संचालन पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया ने बेहद कामयाबी से किया था.
उन्होंने पार्टी की कमान संभालने के बाद कम समय में ही सत्ता तक पहुंचाया था. अब पूरी ज़िम्मेदारी तारिक़ रहमान के कंधों पर है.
तारिक़ रहमान अवामी लीग के शासनकाल के दौरान पार्टी को एकजुट रखने में कामयाब रहे हैं.
आवामी लीग पर पाबंदी के बाद बीएनपी की मित्र रही जमात-ए-इस्लामी ही उसकी सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी के तौर पर उभरी है.
रहमान का नेतृत्व
बांग्लादेश में साल 2007 में सेना के समर्थन वाली कार्यवाहक सरकार के कार्यकाल के दौरान तारिक़ रहमान को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. क़रीब अठारह महीने जेल में रहने के बाद सितंबर, 2008 में रिहा होने पर वह सपरिवार लंदन चले गए थे.
तारिक़ वहां से क़रीब 17 साल बाद बीते साल दिसंबर में ढाका लौटे थे.
ख़ालिदा ज़िया की हालत और बिगड़ने के बाद तारिक़ रहमान 26 दिसंबर को ढाका लौटे. 18 महीने जेल और 17 साल लंदन में बिताने के बाद इसी के ज़रिए बांग्लादेश की राजनीति में तारिक रहमान की वापसी हुई.
इसके कुछ दिनों बाद ही 30 दिसंबर को ख़ालिदा जिया का निधन हो गया. उसके 10 दिनों बाद इस साल नौ जनवरी को बीएनपी की राष्ट्रीय स्थायी समिति ने औपचारिक तौर पर तारिक़ को पार्टी का अध्यक्ष चुन लिया.
हालांकि ख़ालिदा ज़िया को साल 2018 में भ्रष्टाचार के एक मामले में सज़ा होने के बाद से ही तारिक़ लंदन में रहते हुए कार्यवाहक अध्यक्ष के तौर पर अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे थे.
उससे पहले साल 2002 में ख़ालिदा ज़िया ने उनको पार्टी का वरिष्ठ संयुक्त महासचिव मनोनीत किया था. सात साल बाद 2009 में बीएनपी के पांचवें राष्ट्रीय सम्मेलन में उनको वरिष्ठ उपाध्यक्ष मनोनीत किया गया था.
तारिक़ रहमान का व्यक्तित्व
बांग्लादेश के पहले सैन्य शासक और पूर्व राष्ट्रपति ज़ियाउर रहमान और पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया के बड़े बेटे तारिक़ का जन्म 20 नवंबर, 1965 को हुआ था.
बीएनपी की वेबसाइट पर उनकी यही जन्मतिथि दर्ज है. लेकिन चुनावी हलफ़नामे में तारीख़ यही होने के बावजूद जन्म का साल 1968 बताया गया है.
बीएनपी की वेबसाइट में कहा गया है कि ढाका के बीएएफ़ शाहीन कॉलेज में शुरुआती पढ़ाई के बाद तारिक़ ने ढाका विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग में दाखिला लिया था. लेकिन इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी कि उन्होंने वहां अपनी पढ़ाई पूरी की थी या नहीं.
दूसरी ओर, चुनाव आयोग को दिए गए हलफ़नामे में तारिक़ ने अपनी शैक्षणिक योग्यता उच्च माध्यमिक यानी 12वीं बताई है.
बीएनपी की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक़, मुक्ति युद्ध के दौरान कई अन्य सैन्य अधिकारियों के परिवारों के साथ ज़ियाउर रहमान के परिवार को भी बंदी बनाया गया था. उनके दोनों बेटे तारिक़ रहमान और अराफ़ात रहमान (स्वर्गीय) भी बंदी थे.
पार्टी की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़, तारिक़ ने सैन्य शासक हुसैन मोहम्मद इरशाद के ख़िलाफ़ आंदोलन में भी हिस्सा लिया था और साल 1988 में बगुड़ा ज़िला बीएनपी की गावतली उपजिला यूनिट के सदस्य के तौर औपचारिक रूप से पार्टी में शामिल हुए थे.
हालांकि पार्टी के कई नेता और अध्यक्ष सलाहकार परिषद के कुछ सदस्यों ने बताया है कि दलगत राजनीति में तारिक़ का सफ़र 1991 के संसदीय चुनाव से शुरू हुआ था. ख़ालिदा ने उस समय पांच सीटों पर चुनाव लड़ा था. उनकी देख-रेख की ज़िम्मेदारी तारिक़ के पास ही थी.
लेकिन साल 2001 के संसदीय चुनाव से पार्टी की राजनीति में उनकी पकड़ मज़बूत होने लगी. उस साल बीएनपी के नेतृत्व वाले चार दलों के गठबंधन को दो-तिहाई बहुमत मिला था.
बीएनपी सरकार के उसी कार्यकाल के दौरान हवा भवन के मुद्दे पर तारिक़ रहमान और उनके नज़दीकी लोगों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे जो आगे चल कर देशव्यापी बहस के मुद्दे बन गए.
राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर महबूब उल्लाह बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "साल 2001 के संसदीय चुनाव से पहले चुनाव कार्यालय के तौर पर इस्तेमाल करने और चुनावी रणनीति बनाने के लिए हवा भवन का इस्तेमाल किया गया था. इसमें तारिक़ रहमान ने अहम भूमिका निभाई थी."
उनका कहना था कि उस चुनाव में जीत कर बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार सत्ता में आई थी. लेकिन हवा भवन पर बीएनपी का क़ब्ज़ा बना रहा और इस पर विवाद पैदा हो गया.
साल 2001 के चुनाव के समय से ही पार्टी में तारिक़ रहमान की सक्रियता बढ़ती रही. साल 2002 में 22 जून को वरिष्ठ संयुक्त महासचिव का पद बना कर उनको उस पर मनोनीत किया गया.
राजनीतिक विश्लेषक और शोधकर्ता मोहिउद्दीन अहमद बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "यही पार्टी की राजनीति में उनकी बड़ी छलांग थी. ज़िया परिवार का सदस्य होने के कारण ही उनको वह पद सौंपा गया था. बाद में उनके इर्द-गिर्द एक समानांतर नेतृत्व बन गया था."
भ्रष्टाचार के आरोप और विवाद
इस बार चुनाव में बीएनपी का मुक़ाबला अपनी पूर्व सहयोगी जमात-ए-इस्लामी से था. ऐसे में पार्टी के नीति निर्माता चाहते थे कि आम लोगों की निगाहों में रहमान की छवि 'मुक्ति युद्ध और उदार लोकतंत्र' के समर्थक एकमात्र नेता के तौर पर स्थापित हो.
इससे पहले बीएनपी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के कार्यकाल (2001-06 ) के दौरान पार्टी के अध्यक्ष का बनानी स्थित कार्यालय काफी विवादों में घिर गया था. उसे हवा भवन के नाम से भी जाना जाता है.
इस बात की चर्चा होती रही है कि 2001 में बीएनपी के सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री ख़ालिदा जिया के सत्ता में रहने के बावजूद रहमान के नेतृत्व में हवा भवन सत्ता का समानांतर केंद्र बन गया था.
रहमान और उनके नज़दीकी लोगों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे थे. हालांकि वह और उनकी पार्टी इसे राजनीतिक विरोधियों का दुष्प्रचार बताते हुए तमाम आरोपों को सिरे से ख़ारिज करते रहे.
बीएनपी सरकार के इसी कार्यकाल में साल 2004 में विपक्ष की नेता शेख़ हसीना के ढाका में हुई रैली में ग्रेनेड से हुए हमले के लिए अवामी लीग ने तारिक़ रहमान और हवा भवन को ही ज़िम्मेदार ठहराया था.
बाद में अवामी लीग के कार्यकाल के दौरान इस मामले में तारिक़ रहमान को अभियुक्त बनाया गया था और उनको आजीवन क़ैद की सज़ा सुनाई गई थी.
अवामी लीग सरकार के पतन के बाद तारिक़ को ऐसे मामलों से राहत मिल गई है. बीएनपी तो पहले से ही इन आरोपों को ख़ारिज करती रही है.
तारिक़ रहमान के चुनावी हलफ़नामे में कुल 77 मामलों की जानकारी दी गई है. अंतरिम सरकार के सत्ता में रहने के दौरान उनको अपने ख़िलाफ़ तमाम मामलों में या तो बरी कर दिया गया है या फिर वह रिहा हो गए हैं.
बांग्लादेश में बीएनपी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के कार्यकाल के अंतिम दिनों में बड़े पैमाने पर हुई राजनीतिक हिंसा और टकराव के बाद जनवरी 2007 में सेना के समर्थन वाली कार्यवाहक सरकार ने सत्ता संभाली थी.
तारिक रहमान को उसी समय भ्रष्टाचार के आरोप में 18 महीने जेल में बिताने पड़े थे. उन्हें गिरफ़्तारी के बाद बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट पहना कर ढाका की एक अदालत में पेश किया गया था. उसके बाद पूछताछ के लिए उनको रिमांड पर लिया गया.
हालांकि उसके महज छह महीने पहले तक प्रधानमंत्री के बेटे के तौर पर पार्टी और प्रशासन में उनकी बेहद इज़्ज़त और पकड़ थी.
पार्टी ने हिरासत में रहने के दौरान उन पर अत्याचार के मुद्दे को ज़ोर-शोर से उठाया था. रहमान का आरोप है कि गिरफ़्तारी के बाद उनको काफ़ी यातनाएं दी गई थीं.
विश्लेषक मोहिउद्दीन अहमद कहते हैं, "मुझे अपने शोध के दौरान विभिन्न पक्षों के लोगों से बातचीत के ज़रिए पता चला था कि तारिक़ रहमान को हक़ीक़त में यातनाएं दी गई थीं. उसका मक़सद उनकी मां ख़ालिदा जिया को देश छोड़ने के लिए मजबूर करना था."
तारिक़ रहमान तो 11 सितंबर, 2008 को देश छोड़ कर सपिरवार लंदन रवाना हो गए थे.
ख़ालिदा ज़िया ने तो तब देश नहीं छोड़ा था. लेकिन कहा जाता है कि सैन्य नेतृत्व के साथ एक समझौते के तहत ही रहमान की जेल से रिहाई हुई थी. तब मीडिया में इस आशय की ख़बरें छपी थीं कि रहमान ने देश छोड़ने से पहले भविष्य में राजनीति नहीं करने से संबंधित एक मुचलका भी दिया था.
मोहिउद्दीन अहमद कहते हैं, "ख़ालिदा ज़िया ने उस समय ख़ुद कहा था कि तारिक़ अब राजनीति नहीं करेंगे. वह लंदन में पढ़ाई करेंगे."
दिवंगत बीएनपी नेता मौदूद अहमद ने अपनी किताब 'कारागारे केमोन छिलाम (जेल में किस तरह था) 2007-2008' में लिखा है, "हो सकता है कि ख़ालिदा ज़िया ने सैन्य जनरलों के साथ यह समझौता किया हो कि तारिक़ अब आगे राजनीति में सक्रिय नहीं रहेंगे... शायद रहमान ने ऐसे किसी मुचलके पर हस्ताक्षर भी किए हों."
बीएनपी की ओर से लंबे समय तक कहा जाता रहा कि तारिक़ रहमान इलाज के लिए लंदन में रह रहे हैं. लेकिन साल 2018 में 24 अप्रैल को पार्टी के महासचिव मिर्ज़ा फ़ख़रुल इस्लाम आलमगीर ने पहली बार स्वीकार किया कि रहमान ने साल 2012 में ब्रिटेन में राजनीतिक शरण के लिए आवेदन किया था और एक साल के भीतर ही उनका आवेदन मंज़ूर हो गया था.
बांग्लादेश वापसी
बांग्लादेश में साल 2007 में सेना के समर्थन वाली कार्यवाहक सरकार के सत्ता में आने के बाद अवामी लीग की अध्यक्ष शेख़ हसीना के बाद बीएनपी नेता ख़ालिदा ज़िया को भी गिरफ़्तार कर लिया गया था. ख़ालिदा के साथ उनके बेटे अराफ़ात रहमान (अब दिवंगत ) को भी गिरफ़्तार किया गया था.
हालांकि बाद में एक कार्यकारी आदेश के ज़रिए अराफ़ात इलाज के लिए थाईलैंड चले गए थे. वहाँ से मलेशिया गए और वहीं जनवरी, 2015 में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था.
राजनीतिक विश्लेषक मोहिउद्दीन अहमद कहते हैं, "प्रतिकूल परिस्थितियों में भी तारिक़ रहमान पार्टी को एकजुट रखने में कामयाब रहे हैं और इतना कुछ होने के बावजूद पार्टी के नेता के तौर पर उनकी स्वदेश वापसी मेरी नज़र में 'मलबे के ढेर से दोबारा उठ खड़े होने' जैसा है."
उन्होंने बीबीसी बांग्ला से कहा, "तारिक़ ने राजनीति के अंधेरे कोनों को तो देखा ही है, उनको देश में संघर्ष और बदले की राजनीति का भी अनुभव हासिल हुआ है."
मोहम्मद मोजिबुर अहमद कहते हैं, "तारिक़ रहमान अपने दम पर बीएनपी के शीर्ष नेता के तौर पर उभरे हैं और अवामी लीग की ग़ैर-मौजूदगी के कारण उनको एक मंच मिल गया है. लेकिन अब उनके सामने जनता के बीच परीक्षा में कामयाब होने की चुनौती का सामना करना होगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.