ईरान में सरकार के ख़िलाफ़ जारी विरोध-प्रदर्शनों के बीच अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की बात कही जा रही है.
अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप भी ऐसा कई बार कह चुके हैं. अमेरिका के भीतर ईरान में सत्ता परिवर्तन की बात लंबे समय से उठती रही है.
अमेरिका ने ईरान में 1953 में सत्ता परिवर्तन किया भी था लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति ने अमेरिका समर्थक सरकार को अपदस्थ कर दिया था.
1953 में अमेरिका और ब्रिटेन ने ईरान में लोकतांत्रिक तरीक़े से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को अपदस्थ कर पहलवी को सत्ता सौंप दी थी.
मोहम्मद मोसादेग ने ही ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था और वह चाहते थे कि शाह की शक्ति कम हो.
किसी विदेशी नेता को शांतिकाल में अपदस्थ करने का काम अमेरिका ने पहली बार ईरान में किया था. लेकिन यह आख़िरी नहीं था.
इसके बाद अमेरिका की विदेश नीति का यह एक तरह से हिस्सा बन गया.
1953 में ईरान में अमेरिका ने जिस तरह से तख्तापलट किया उसी का नतीजा 1979 की ईरानी क्रांति थी. लेकिन कई दशकों के बाद भी ईरान और पश्चिम के बीच कड़वाहट ख़त्म नहीं हुई है.
हमले की स्थिति में रूस और चीन का रुख़ क्या रहेगा?
1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति से पहले ख़ुमैनी तुर्की, इराक़ और पेरिस में निर्वासित जीवन जी रहे थे.
ख़ुमैनी, शाह पहलवी के नेतृत्व में ईरान के पश्चिमीकरण और अमेरिका पर बढ़ती निर्भरता के लिए उन्हें निशाने पर लेते थे.
अब एक बार फिर से अमेरिका ईरान में आयतुल्लाह ख़ामेनेई के शासन को ख़त्म करने की बात कर रहा है.
ऐसे में सवाल उठता है कि अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता है तो उसके साथ कौन खड़ा रहेगा?
रूस और चीन ईरान के अहम साझेदार हैं और इनसे उम्मीद की जाती है ये अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का खुलकर विरोध करेंगे.
दोनों देश खुलकर विरोध कर भी रहे हैं लेकिन ज़ुबानी विरोध के अलावा कुछ भी नहीं है.
पिछले साल जून में जब अमेरिका ने इसराइल के समर्थन में ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला किया था तब भी रूस और चीन ने केवल ज़ुबानी विरोध किया था.
यह स्पष्ट है कि रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद से मॉस्को और ईरान के बीच सहयोग गहराया है.
ईरान ने ड्रोन और गोला-बारूद की आपूर्ति की है जबकि रूस ने आर्थिक और सैन्य संबंधों का विस्तार किया है. इससे दोनों देशों के बीच पारस्परिक निर्भरता बढ़ी है.
रूस के लिए ईरान एक अहम साझेदार है, जो पश्चिमी प्रभाव को सीमित करने में मदद करता है.
इसके बावजूद ऐसा सहयोगी नहीं है, जिसके लिए वह अमेरिका के साथ सीधे टकराव का जोखिम उठाए. रूस ने जून में भी ऐसा नहीं किया था.
13 जनवरी को रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़ाखारोवा ने कहा था, ''पश्चिमी देश की ओर से ईरान पर थोपे गए अवैध प्रतिबंधों से वहाँ आर्थिक और सामाजिक चुनौतियाँ पैदा हुई हैं. इनका सबसे अधिक असर आम ईरानी नागरिकों पर पड़ा है. बाहरी ताक़तें बढ़ते जन-असंतोष का लाभ उठाकर ईरानी राज्य को अस्थिर करने और कमज़ोर करने की कोशिश कर रही हैं. तथाकथित 'कलर रिवॉल्यूशन' की बदनाम रणनीतियों का इस्तेमाल किया जा रहा है. हम ईरान की आंतरिक राजनीतिक प्रक्रियाओं में इस तरह के विध्वंसक बाहरी हस्तक्षेप की स्पष्ट रूस से निंदा करते हैं.''
मारिया ने कहा, ''अमेरिका से इस्लामी गणराज्य ईरान के ख़िलाफ़ सैन्य हमलों की दी जा रही धमकियाँ पूरी तरह अस्वीकार्य हैं. जो जून 2025 की तरह ईरान के ख़िलाफ़ दोबारा आक्रामक कार्रवाई के बहाने खोज रहे हैं, उन्हें यह भली-भांति समझ लेना चाहिए कि ऐसे क़दमों से मध्य-पूर्व और वैश्विक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर अत्यंत गंभीर परिणाम होंगे.''
चीन क्या अमेरिका को चुनौती देगा?
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति चीन भी ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी धमकियों की निंदा कर रहा है लेकिन अमेरिका को चुनौती देगा? ऐसा नहीं है.
चीन और ईरान के बीच कथित "व्यापक रणनीतिक साझेदारी" है लेकिन चीन अपने साझेदारों के लिए युद्ध के मैदान में नहीं उलझता है. जैसे अमेरिका इसराइल समर्थन में आ जाता है.
ईरान ऐसी निर्भरता में फंसा हुआ है, जहाँ उसे आर्थिक अस्तित्व (तेल बिक्री) और सैन्य तकनीक के लिए चीन पर निर्भर रहना पड़ता है जबकि चीन यह स्पष्ट कर रहा है कि वह किसी तरह की सुरक्षा गारंटी देने को तैयार नहीं है.
चीन के विदेश मंत्रालय ने बुधवार को ईरान में अमेरिका के संभावित सैन्य कार्रवाई पर कहा, ''ईरान की स्थिति को लेकर हम अपना रुख़ एक से अधिक बार स्पष्ट कर चुके हैं. हमें उम्मीद है कि ईरान की सरकार और जनता मौजूदा कठिनाइयों पर काबू पाएंगे और देश में स्थिरता बनाए रखेंगे. हम अन्य देशों के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप का विरोध करते हैं. अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बल प्रयोग या उसकी धमकी पर आपत्ति जताते हैं और आशा करते हैं कि सभी पक्ष ऐसे क़दम उठाएं जो मध्य पूर्व में शांति और स्थिरता के अनुकूल हों.''
ईरान के मामले में चीन की भाषा अमेरिका के ख़िलाफ़ बहुत आक्रामक नहीं है. अमेरिका चीन का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है. अमेरिका से तमाम दुश्मनी के बावजूद चीन व्यापारिक संबंध कायम रखना चाहता है.
जी-7 देशों का क्या रुख़ है?
जी-7 देशों ने भी ईरान को लेकर बयान जारी किया है और यह वहाँ की मौजूदा सरकार के ख़िलाफ़ ही है.
जी-7 देशों के विदेश मंत्रियों ने अपने बयान में कहा है, ''हम कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका के विदेश मंत्री के साथ ईयू के प्रतिनिधि ईरान में जारी विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े घटनाक्रमों को लेकर गहरी चिंता व्यक्त करते हैं.''
''हम ईरानी जनता के ख़िलाफ़ ईरानी अधिकारियों द्वारा की जा रही क्रूर दमनात्मक कार्रवाइयों में तेज़ी का कड़ा विरोध करते हैं. दिसंबर 2025 के अंत से ईरानी लोग बेहतर जीवन, गरिमा और स्वतंत्रता की वैध आकांक्षाओं को साहसपूर्वक व्यक्त कर रहे हैं.''
जी-7 ने अपने बयान में कहा, ''ईरान में हुई मौतों और घायलों की बढ़ती संख्या से हम चिंतित हैं. हम प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ जानबूझकर हिंसा के इस्तेमाल, उनकी हत्याओं, मनमानी हिरासत और सुरक्षा बलों द्वारा अपनाई जा रही डराने-धमकाने की रणनीतियों की निंदा करते हैं.''
''हम ईरानी अधिकारियों से पूर्ण संयम बरतने, हिंसा से दूर रहने और ईरान के नागरिकों के मानवाधिकारों के साथ मौलिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करने का आग्रह करते हैं. जी-7 के सदस्य इस बात के लिए तैयार हैं कि अगर ईरान अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हुए विरोध-प्रदर्शनों और असहमति पर दमन जारी रखता है, तो अतिरिक्त प्रतिबंधात्मक उपाय लगाए जाएँगे.''
इस्लामिक देश क्या कह रहे हैं?
रूस के राजनीतिक विश्लेषक एलेक्जेंडर दुगिन ने एक्स पर लिखा है, ''इस्लामी दुनिया पहले से कहीं ज़्यादा बँटी हुई है. न कोई साझा विचार है, न कोई साझी रणनीति, न ही फ़ैसला लेने के लिए कोई साझी व्यवस्था. यह अभिजात वर्ग की ग़द्दारी को दर्शाता है. ट्रंप की दुनिया में जहाँ साम्राज्यवाद की एक नई लहर उभर रही है, इसका अर्थ यही निकलता है कि इस्लामी देश उपनिवेशीकरण के आगे समर्पण कर रहे हैं. न एकता है, न संप्रभुता.''
ईरान में जो कुछ भी हो रहा है, उसे लेकर अब देशों की प्रतिक्रिया बहुत ही सुस्त है.
तुर्की खुलकर बोल रहा है लेकिन इसराइल के ख़िलाफ़. जब अमेरिका की बात आती है तो तुर्की की भाषा भी बदल जाती है.
13 जनवरी को तुर्की की सरकार के प्रवक्ता ओमर चेलिक ने दुनिया को चेतावनी दी कि ईरान के आंतरिक हालात में दखल न दिया जाए, क्योंकि इन समस्याओं को कैसे सुलझाया जाए, यह फ़ैसला केवल ईरानी जनता को ही करना चाहिए.
उन्होंने विशेष रूप से इसराइल की आलोचना करते हुए उस पर आरोप लगाया कि वह विरोध प्रदर्शनों का इस्तेमाल अपने हितों के लिए कर रहा है और चेतावनी दी कि किसी भी तरह का विदेशी हस्तक्षेप "और भी बुरे नतीजों" की ओर ले जाएगा.
उन्होंने कहा, "हम अपने पड़ोसी ईरान में किसी भी तरह की अराजकता नहीं देखना चाहते. इन समस्याओं का समाधान ईरान की अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं और राष्ट्रीय इच्छा के माध्यम से ही होना चाहिए. इसराइली अधिकारी एक ग़ैर-ज़िम्मेदाराना रुख़ अपनाने की कोशिश कर रहे हैं, जो पूरे क्षेत्र में और बड़ी समस्याएं पैदा करेगा. यह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है."
अक्तूबर 2023 के हमलों के बाद इसराइल ने ईरान के प्रॉक्सी नेटवर्क को तहस-नहस कर दिया. लेबनान में उसका कभी ताक़तवर सहयोगी हिज़्बुल्लाह कमज़ोर हो चुका है. सीरिया से बशर अल असद विदा हो चुके हैं. ख़ुद ईरान पिछले साल जून में 12 दिनों तक इसराइली और ईरानी बमबारी का सामना किया था. इन सारी घटनाओं से इस इलाक़े में ईरान की कमज़ोरी स्पष्ट रूप से नज़र आई.