राजपथ - जनपथ
सांसद-विधायक कार्यकर्ताओं संग बिताएंगे रात
भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की पहली बैठक गुरुवार को प्रदेश कार्यालय कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में आयोजित हुई। बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री शिव प्रकाश विशेष रूप से मौजूद रहे। पूर्व राज्यपाल रमेश बैस भी मंच के बजाय आम सदस्यों के बीच बैठे नजर आए, जिसकी कार्यकर्ताओं के बीच काफी चर्चा रही।
कार्यसमिति में पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में पार्टी की जीत पर चर्चा हुई तथा वहां प्रचार के लिए गए नेताओं को बधाई दी गई। इस दौरान शिव प्रकाश ने संगठन पदों को लेकर कार्यकर्ताओं को नसीहत देते हुए कहा कि हर व्यक्ति को पद देना संभव नहीं है, लेकिन पार्टी के लिए निरंतर काम करते रहना चाहिए।
बैठक में जिला स्तर पर चिंतन शिविर आयोजित करने का फैसला भी लिया गया। इन शिविरों में सांसद, विधायक और संबंधित जिले के मंत्री शामिल होंगे। दो दिन तक जिला पदाधिकारी एक साथ रहकर संगठन, आगामी कार्यक्रमों, स्थानीय समस्याओं और आपसी विवादों पर मंथन करेंगे।
रायपुर जिले का चिंतन शिविर 23 और 24 मई को अग्रसेन धाम में प्रस्तावित है। इसमें सांसद, विधायक और प्रदेश अध्यक्ष भी शामिल होंगे। खास बात यह रहेगी कि सांसद-विधायकों को पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ रात्रि विश्राम करना होगा। अब नजर इस बात पर रहेगी कि इन शिविरों से संगठन को लेकर क्या नए संकेत और फैसले सामने आते हैं।
टॉपर मॉडल का भय तोडऩे वाला रिजल्ट
बुधवार को घोषित सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन यानि सीबीएसई के रिजल्ट के प्रतिशत में पूरे देश के साथ छत्तीसगढ़ में भी गिरावट देखी गई। यहां 80.88 प्रतिशत छात्र पास हुए, जो पिछली बार से 1.29 प्रतिशत कम है। इस नतीजे से जुड़ी कई बातें ध्यान खींचती हैं। कॉपियों की ऑनलाइन जांच की गई और मॉडरेशन के कड़े मानक रखे गए। इसके चलते टॉपर्स की संख्या घट गई। 99 प्रतिशत अंक हासिल करने की होड़ पर थोड़ा अंकुश लग गया और किसी को, अभी तक तो शिकायत ही नहीं कि कॉपी गलत जांची गई। डिजिटल इंडिया के दौर में कॉपियों की जांच के लिए यह तकनीक अपने स्कूल-कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज़ में भी अपनाई जा सकती है, पर ऐसा नहीं किया जाता। प्राय: कॉपियों को गलत जांचने को लेकर विवाद होता है। विश्वविद्यालयों में तो इसके लिए प्रदर्शन और हंगामे भी होते रहते हैं।
इधर, नेशनल लेवल पर दिलचस्प तथ्य यह रहा कि ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों का परिणाम शत-प्रतिशत था। जागरूक होता यह वर्ग समाज में बराबरी की जगह हासिल करने के लिए संघर्ष करता है। ऐसे परिणाम देने के बावजूद, वह जगह नहीं मिलती, जिसके वे हकदार हैं। सौ फीसदी पास ट्रांसजेंडर छात्र कह सकते हैं कि आप अवसर दें या न दें, हम किसी पहचान के मोहताज नहीं।
दूसरा तथ्य यह है कि कला के विषयों में या अतिरिक्त गतिविधियों में परीक्षा दिलाने वाले विद्यार्थियों का परिणाम भी लगभग 100 फीसदी ही रहा। पेंटिंग, संगीत, नृत्य, योग, फाइन आर्ट्स और होम साइंस जैसे विषयों में औसत से बेहतर नतीजे आए हैं। यह आम धारणा है कि फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्य ही सफलता का रास्ता है। इसी से आप मेडिकल, इंजीनियरिंग, बिजनेस या आईटी जैसे मुकाम हासिल पाएंगे। मगर, जिन छात्र-छात्राओं ने अलग हटकर विषयों को लिया, उनके बारे में नहीं कह सकते कि वे अपने करियर को लेकर लापरवाह होंगे। उन्होंने होड़ से अलग रास्ता चुना। दावा नहीं किया जा सकता लेकिन अनुमान लगा सकते हैं कि जिन बच्चों ने अलग विषय चुने वे जानते हैं कि अवसर उनके लिए भी है और उसमें प्रतिस्पर्धा शायद कम ही हो।
नई शिक्षा नीति में बहु विषयक पढ़ाई और कौशल आधारित पाठ्यक्रम पर जोर तो दिया गया है पर अभिभावकों और छात्रों के बीच रूझान की दिक्कत बनी हुई है। अपने छत्तीसगढ़ की बात करें तो अधिकांश स्कूलों में इन विषयों के शिक्षक भी नहीं मिलेंगे। शिक्षा विभाग के पास तनाव यही होता है कि वे कैसे भौतिक, रसायन, गणित के टीचर्स की व्यवस्था करें। स्कूलों में डिमांड भी इसी की होती है। शायद ही कहीं सुनने को मिले कि संगीत, होम साइंस, पेंटिंग, योगा के टीचर्स दो। यह सोचना सही नहीं होगा कि ऐसे अलग विषयों को चुनने वाले विद्यार्थी वैज्ञानिक सोच नहीं रखते। पर, उन्हें अभिभावक और शिक्षक प्रोत्साहित नहीं करते।
दो बातें अब नई नहीं रह गई है। स्टेट एजुकेशन बोर्ड में भी और सेंट्रल में भी। एक, लगातार बीते कुछ वर्षों से बड़े शहरों के मुकाबले गांव देहात के बच्चे ज्यादा अच्छा रिजल्ट दे रहे हैं। शायद इसका कारण यह हो कि हमारी इंटरनेट कनेक्टिविटी दूर-दराज तक पहुंच चुकी है और शहरों में, ये कनेक्टिविटी पहले से तो थी, पर अब बच्चों के मन भटकाने के लिए बहुत से क्लब, कैफे, खुल चुके हैं। दूसरा, लड़कियां, छोरों से कम नहीं हैं। उनका रिजल्ट एसबीएसई में भी वैसा ही है जैसा अपने यहां माशिमं के रिजल्ट में था। बिहार के शिक्षा मंत्री के कान में यह बात पहुंची होगी तो शायद वे मानसिकता बदलेंगे, जो कहते हैं कि लड़कियों को पढऩे की क्या जरूरत, घर संभालने का प्रशिक्षण लें। उनको छोडिय़े, रिजल्ट की समीक्षा केंद्र और राज्यों के मंत्रालयों के अफसरों को करनी चाहिए। यह देखना जरूरी है कि किन विषयों में बच्चे बेहतर कर रहे हैं, किन क्षेत्रों में उनकी रुचि बढ़ रही है और कैसी शिक्षा उनमें अधिक आत्मविश्वास भर सकती है।बुधवार को घोषित सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन यानि सीबीएसई के रिजल्ट के प्रतिशत में पूरे देश के साथ छत्तीसगढ़ में भी गिरावट देखी गई। यहां 80.88 प्रतिशत छात्र पास हुए, जो पिछली बार से 1.29 प्रतिशत कम है। इस नतीजे से जुड़ी कई बातें ध्यान खींचती हैं। कॉपियों की ऑनलाइन जांच की गई और मॉडरेशन के कड़े मानक रखे गए। इसके चलते टॉपर्स की संख्या घट गई। 99 प्रतिशत अंक हासिल करने की होड़ पर थोड़ा अंकुश लग गया और किसी को, अभी तक तो शिकायत ही नहीं कि कॉपी गलत जांची गई। डिजिटल इंडिया के दौर में कॉपियों की जांच के लिए यह तकनीक अपने स्कूल-कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज़ में भी अपनाई जा सकती है, पर ऐसा नहीं किया जाता। प्राय: कॉपियों को गलत जांचने को लेकर विवाद होता है। विश्वविद्यालयों में तो इसके लिए प्रदर्शन और हंगामे भी होते रहते हैं।
इधर, नेशनल लेवल पर दिलचस्प तथ्य यह रहा कि ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों का परिणाम शत-प्रतिशत था। जागरूक होता यह वर्ग समाज में बराबरी की जगह हासिल करने के लिए संघर्ष करता है। ऐसे परिणाम देने के बावजूद, वह जगह नहीं मिलती, जिसके वे हकदार हैं। सौ फीसदी पास ट्रांसजेंडर छात्र कह सकते हैं कि आप अवसर दें या न दें, हम किसी पहचान के मोहताज नहीं।
दूसरा तथ्य यह है कि कला के विषयों में या अतिरिक्त गतिविधियों में परीक्षा दिलाने वाले विद्यार्थियों का परिणाम भी लगभग 100 फीसदी ही रहा। पेंटिंग, संगीत, नृत्य, योग, फाइन आर्ट्स और होम साइंस जैसे विषयों में औसत से बेहतर नतीजे आए हैं। यह आम धारणा है कि फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्य ही सफलता का रास्ता है। इसी से आप मेडिकल, इंजीनियरिंग, बिजनेस या आईटी जैसे मुकाम हासिल पाएंगे। मगर, जिन छात्र-छात्राओं ने अलग हटकर विषयों को लिया, उनके बारे में नहीं कह सकते कि वे अपने करियर को लेकर लापरवाह होंगे। उन्होंने होड़ से अलग रास्ता चुना। दावा नहीं किया जा सकता लेकिन अनुमान लगा सकते हैं कि जिन बच्चों ने अलग विषय चुने वे जानते हैं कि अवसर उनके लिए भी है और उसमें प्रतिस्पर्धा शायद कम ही हो।
नई शिक्षा नीति में बहु विषयक पढ़ाई और कौशल आधारित पाठ्यक्रम पर जोर तो दिया गया है पर अभिभावकों और छात्रों के बीच रूझान की दिक्कत बनी हुई है। अपने छत्तीसगढ़ की बात करें तो अधिकांश स्कूलों में इन विषयों के शिक्षक भी नहीं मिलेंगे। शिक्षा विभाग के पास तनाव यही होता है कि वे कैसे भौतिक, रसायन, गणित के टीचर्स की व्यवस्था करें। स्कूलों में डिमांड भी इसी की होती है। शायद ही कहीं सुनने को मिले कि संगीत, होम साइंस, पेंटिंग, योगा के टीचर्स दो। यह सोचना सही नहीं होगा कि ऐसे अलग विषयों को चुनने वाले विद्यार्थी वैज्ञानिक सोच नहीं रखते। पर, उन्हें अभिभावक और शिक्षक प्रोत्साहित नहीं करते।
दो बातें अब नई नहीं रह गई है। स्टेट एजुकेशन बोर्ड में भी और सेंट्रल में भी। एक, लगातार बीते कुछ वर्षों से बड़े शहरों के मुकाबले गांव देहात के बच्चे ज्यादा अच्छा रिजल्ट दे रहे हैं। शायद इसका कारण यह हो कि हमारी इंटरनेट कनेक्टिविटी दूर-दराज तक पहुंच चुकी है और शहरों में, ये कनेक्टिविटी पहले से तो थी, पर अब बच्चों के मन भटकाने के लिए बहुत से क्लब, कैफे, खुल चुके हैं। दूसरा, लड़कियां, छोरों से कम नहीं हैं। उनका रिजल्ट एसबीएसई में भी वैसा ही है जैसा अपने यहां माशिमं के रिजल्ट में था। बिहार के शिक्षा मंत्री के कान में यह बात पहुंची होगी तो शायद वे मानसिकता बदलेंगे, जो कहते हैं कि लड़कियों को पढऩे की क्या जरूरत, घर संभालने का प्रशिक्षण लें। उनको छोडिय़े, रिजल्ट की समीक्षा केंद्र और राज्यों के मंत्रालयों के अफसरों को करनी चाहिए। यह देखना जरूरी है कि किन विषयों में बच्चे बेहतर कर रहे हैं, किन क्षेत्रों में उनकी रुचि बढ़ रही है और कैसी शिक्षा उनमें अधिक आत्मविश्वास भर सकती है।
श्रीनगर स्टेशन पर रुकी एक उम्र की यात्रा
पिछली बार आया था तो श्रीनगर तक रेल नहीं आई थी। इस बार श्रीनगर रेलवे स्टेशन को अपने कैमरे में सहेज कर साथ लेता आयाज् साथ में उसकी अनुभूति भी।
तस्वीर में बिलासपुर के वरिष्ठ साहित्यकार, 80 वर्षीय सतीश जायसवाल श्रीनगर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं। सामने हिमालय की पहाडिय़ां हैं, ऊपर खुला आसमान और बीच में चमचमाती रेल पटरियां। सतीश के शब्द उस पीढ़ी की स्मृति है जिसने कश्मीर को कभी दूर, कठिन और लगभग दुरूह यात्रा की तरह देखा था। अभी इसी महीने कश्मीर रेल के जरिए देश के कोने-कोने से जुड़ रहा है। बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग या छत्तीसगढ़ के किसी छोटे शहर में बैठा एक साधारण यात्री अब यह सोच सकता है कि वह भी कुछ ही घंटों में श्रीनगर की वादियों तक पहुंच सकता है।
लगे हाथ इस नई सुविधा के बारे में आपको बताते चलें। जम्मू-श्रीनगर वंदे भारत एक्सप्रेस शुरू हो चुकी है, दो ट्रेनें हैं। एक सुबह छूटती है दूसरी दोपहर में। शुरुआती दस दिनों में लगभग 45 हजार यात्रियों ने सफर किया। भीड़ इतनी है कि 20 कोच वाली दोनों ट्रेनें भी लगभग पूरी क्षमता से चल रही हैं।
इस ट्रेन से सफर करके लौटे एक पर्यटक का कहना है कि लंबी जोखिम सडक़ यात्रा भी नहीं करनी है, महंगी हवाई उड़ानों पर निर्भरता भी नहीं रही। जम्मूतवी से वंदे भारत ट्रेन लगभग पांच घंटे में यात्रियों को घाटी तक पहुंचा रही है। रास्ते में चेनाब और अंजी जैसे अद्भुत पुल मिलेंगे। लंबी सुरंगें और पहाड़ों के बीच रेल गुजरती है। मान लो कि यह यात्रा ही रोमांचक पर्यटन है।
कश्मीर हमेशा सुंदर था, लेकिन अब वहां तक पहुंचना भी सुंदर हो गया है।


