राजपथ - जनपथ
आज विश्व लेपर्ड डे...
यह छत्तीसगढ़ के आकार में छोटे अभयारण्य बारनवापारा ले ली गई तस्वीर है, जहां बढ़ते-बढ़ते लेपर्ड (तेंदुआ) की संख्या 60 पहुंच चुकी है। पर्यटक यदि दो पाली की सैर करें तो एक बार तो इनके दर्शन हो ही जाते हैं। टाइगर जैसा ही दिखता है। जिन्हें टाइगर रिजर्व में टाइगर नहीं दिखते, इनको ही देखकर तसल्ली कर लेते हैं।
वन्यजीव प्रेमी, वरिष्ठ पत्रकार प्राण चड्ढा का सुझाव है कि बारनवापारा में तेंदुओं की संख्या को देखते हुए इसे तेंदुआ या लेपर्ड सेंचुरी के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। अभयारण्य का वाटर मैनेजमेंट ठीक-ठाक है। अनुभवी गाइड्स हैं, रुकने-ठहरने की व्यवस्था भी अच्छी ही है। लेपर्ड सेंचुरी के रूप में विकसित करने से देश के अभयारण्यों के मानचित्र में इसका महत्व बढ़ जाएगा और देश-विदेश से सैलानी ज्यादा संख्या में यहां पहुंचेंगे।
लामबंद हो रहे कांग्रेस जिलाध्यक्ष
प्रदेश कांग्रेस में अंदरूनी खींचतान चल रही है। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज की कार्यशैली को लेकर जिला अध्यक्षों में असंतोष अब धीरे-धीरे सतह पर आने लगा है। मौका मिला प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट के रायपुर प्रवास का, तो जिलाध्यक्षों ने बिना शोर-शराबे के अपनी नाराजगी दर्ज करा दी। सीधे विरोध से बचते हुए पहले आपस में रणनीति बनी, फिर 10 सूत्रीय प्रस्ताव के जरिए अपनी बात रख दी गई।
असल में आपत्ति नियुक्तियों को लेकर है। जिलाध्यक्षों को इस बात से खिन्न हैं कि ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति बिना उनकी राय के कर दी गई। अब मांग साफ है जिले में कोई भी नियुक्ति हो, तो जिलाध्यक्ष की सहमति जरूरी हो।
इतना ही नहीं, प्रभारी महामंत्री का पद खत्म करने के फैसले ने भी अंदरखाने हलचल बढ़ा दी है। जिलाध्यक्ष इसे वापस बहाल करने की मांग कर रहे हैं। पायलट ने भले ही ज्यादा कुछ नहीं कहा, लेकिन कार्यकारिणी विस्तार के मुद्दे पर 90 फीसदी उपस्थिति की शर्त जरूर रख दी। यानी संदेश साफ है कि पहले संगठन में सक्रियता दिखाइए, फिर विस्तार की बात कीजिए।
जांच में नरमी से आईजी खफा
अंबिकापुर की आग अब सिर्फ एक हादसा नहीं रही, बल्कि राजनीतिक गर्मी का कारण भी बन गई है। पटाखा गोदाम में लगी आग के बाद जो कुछ हुआ, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
कहा जा रहा है कि गोदाम किसी मंत्री के करीबी का था। मंत्री ने पलटकर साफ कर दिया कि कोई गोदाम था ही नहीं। इधर , पुलिस की शुरुआती नरमी ने आग में घी डालने का काम किया। मामला सोशल मीडिया से होता हुआ सीधे आईजी दीपक झा तक पहुंच गया। फिर क्या था, आईजी ने सख्त रुख दिखाया और एसएसपी राजेश अग्रवाल को नोटिस थमा दिया। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जिन धाराओं में मामला बनता था, बीएनएस की 324, 326 (छ) और विस्फोटक अधिनियम की धारा 9 (ख) उन्हें शुरुआत में जोड़ा ही नहीं गया। आईजी ने सात दिन में जवाब मांगा है। देखना है आगे क्या होता है।
अगले चुनाव और आठवां वेतन आयोग
छत्तीसगढ़ की अगली सातवीं विधानसभा के चुनाव से पहले राज्य सरकार पर बड़ा वित्तीय दबाव रहेगा। वहीं अधिकारी कर्मचारियों की बल्ले-बल्ले होगी। अवसर होगा आठवां वेतनमान। रंजना देसाई आयोग ने इस समय इसी कवायद पर तेजी से काम शुरू कर दिया है। उस पर फरवरी 27 तक सिफारिश सौंपने का दबाव है। समय कम है। रिपोर्ट समय पर मिलने पर पहला दबाव केंद्र सरकार पर होगा। क्योंकि उसे भी 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले 2028 में होने 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में जाना होगा। ये सभी राज्य, देश की राजनीति के नजरिए से अहम हैं- छग- मप्र, राजस्थान, तेलंगाना, मिजोरम। उससे पहले ही अगले वर्ष 27 में उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं।
बहरहाल, कर्मचारी संघों के राष्ट्रीय नेतृत्व का अनुमान है कि वेतन आयोग साल 2027 की पहली छमाही में अपनी सिफारिशें सरकार को सौंप सकता है। सरकार की ओर से वेतन आयोग को 18 महीने का समय मिला है। इस अवधि में वेतन आयोग केंद्रीय कर्मचारियों की सैलरी, भत्ते के अलावा अन्य फैसिलिटी और पेंशनर्स की सुविधाओं की सिफारिश कर देगा।
चूंकि राज्यों में पृथक वेतन आयोग गठन की व्यवस्था खत्म हो गई है इसलिए यानी केंद्रीय आयोग की सिफारिशें ही राज्य भी लागू करते हैं। इस रिपोर्ट पर राज्यों खासकर भाजपा शासित का कर्मचारी हितैषी रूख सामने आ जाएगा। सभी राज्य फ्री बीज (अकेले छत्तीसगढ़ में 35 हजार करोड़ का) के चलते बड़े बजटीय दबाव से जूझ रहे हैं। अब ऐसे में नए वेतनमान का कितना लाभ सरकारें देंगी यह समय बताएगा।
जहां तक छत्तीसगढ़ की बात है तो सरकार को 28 के बजट में ही प्रावधान कर अपना रुख स्पष्ट करना होगा। भले वह भुगतान किस्तों में करे। तभी वह चुनाव में जा सकेगी। वर्ना कर्मचारी आंदोलन का झंडा बुलंद करने तैयार रहेंगे। वैसे अभी से चर्चा है कि फिटमेंट फैक्टर को लेकर मामला नई सरकारों तक खिंच सकता है।
इससे पहले छत्तीसगढ़ में 2016 का 7 वां वेतनमान 1 अप्रैल 2017 से लागू हुआ था। जनवरी 2016 से 30 जून 2017 तक के 18 महीने के बकाए का एरियर्स कुल 6 समान वार्षिक किश्तों में दिया गया था। पहली किस्त का भुगतान अगस्त-सितंबर 2018 में शुरू किया गया था। इसके तहत 3,300 करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान करीब 3.50 लाख से अधिक कर्मचारियों को किया गया।
उस वक्त फिटमेंट फैक्टर मूल वेतन का (2.57/) गुना तय किया गया था। 7 वें आयोग के कई बेनिफिट्स अब तक अनसुलझे और अप्राप्त हैं। इस बार अमला भी पिछली बार से ठीक दो गुना बढ़ गया है। व्यय भार भी 7-8 हजार करोड़ से अधिक ही पड़ेगा। उस पर दैवेभो, संविदा, अनियमित कर्मचारियों के नियमितीकरण का दबाव अलग। देखना है आगे यह बोझ कैसे हल होगा।
नक्सलवाद का सच्चा उन्मूलन कब?
कांकेर-नारायणपुर के बीच आईईडी ब्लास्ट में डीआरजी के एक इंस्पेक्टर सहित 4 जवान शहीद हो गए। खबर में बताया गया है कि यह पुराने छिपे विस्फोटकों की तलाशी के दौरान हुआ। सैकड़ों ऐसे आईईडी अब भी जमीन पर दबे हो सकते हैं। नक्सल उन्मूलन के लिए सरकार की कामयाबी को नकारा नहीं जा सकता। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री विष्णे देव साय की इस मामले में जो दृढ़ इच्छाशक्ति रही और कोशिश ईमानदार रही, उसका नतीजा ही है कि बस्तर अब खुली हवा में सांस लेने लगा है। नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या लगभग शून्य हो चुकी है।
शायद विस्फोटक दबाए जाने की सटीक जगह का जवानों को पता होता तो यह हादसा नहीं होता। बस्तर में जब सैकड़ों नक्सलियों ने सरेंडर किया तो उनसे भी जानकारी ली गई होगी कि कहां-कहां जमीन के नीचे उन्होंने मौत का सामान छिपा रखा है, फिर भी यह घटना हो गई। यह ब्लास्ट आगाह करता है कि उग्रवादियों का केवल सरेंडर होना या मारा जाना काफी नहीं है। बीते चार दशकों में उन्होंने बस्तर में जो जड़ें जमाई है, उनका उन्मूलन भी जरूरी है। सरेंडर करने वाले नक्सलियों ने हथियार, भारी मात्रा में कैश और विस्फोटकों की जानकारी सुरक्षा बलों को दी है, सैकड़ों आईईडी उनकी ही सूचना पर रिकवर हुए हैं। बावजूद नारायणपुर-कांकेर की यह घटना बताती है कि पुराने प्लांटेड विस्फोटक अब भी खतरा बने हुए हैं। सवाल खड़ा होता है कि क्या सुरक्षा बलों को सरेंडर करने वाले नक्सली अधूरी जानकारी दे रहे हैं, कुछ छिपा रहे हैं? उनकी रणनीति का यह कोई हिस्सा तो नहीं?
इस घटना को अपवाद ही मानकर चलना चाहिए और उम्मीद करनी चाहिए कि यह दोहराया नहीं जाएगा। मगर, यह तय है कि उन्मूलन का मतलब केवल सरेंडर कराना, मार गिराना, बंदूक और विस्फोटक बरामद करना काफी नहीं है। आंध्रप्रदेश में ग्रेहाउंड फोर्स ने सशस्त्र प्रतिक्रिया के जरिये नक्सलियों की नोक नीचे की। मगर असल सफलता तब मिली जब भूमि सुधार हुआ, ग्रामीणों को पट्टे दिए गए, उनके नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किए गए। शिक्षा और स्वास्थ्य की पहुंच बनी, इंफ्रास्ट्रक्चर दुरुस्त किए गए। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में भी यही मॉडल अपनाया जा रहा है। दुनिया के देशों की बात करें तो कोलंबिया में फार्स (एफएआरसी) के खिलाफ उरिबे की रणनीति में सैन्य दबाव तो शामिल ही था, साथ में विकास कार्यक्रम और पुनर्वास योजनाएं लागू कीं। पेरू में शाइनिंग पाथ की सैन्य शक्ति का पराभव हुआ, मगर वहां ग्रामीण विकास ने स्थायी शांति दी। श्रीलंका में लिट्टे का सैन्य बल से उन्मूलन तो हुआ पर उस विद्रोह को उभरने से रोकने के लिए प्रभावित वर्ग की राजनीतिक भूमिका बढ़ाई गई और पुनर्वास कार्यक्रम चलाए गए। कहने का मतलब यह है कि बस्तर से नक्सलवाद उन्मूलन भी बहुआयामी होना चाहिए। सरेंडर, हथियारों की जब्ती, मारा जाना एक चरण है। अगला चरण थोड़ा कठिन है, जिसमें प्रभावितों के बीच व्यवस्था के प्रति भरोसा पैदा करना होगा।


