राजपथ - जनपथ
डॉ. पाठक और सवाल
आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य और छत्तीसगढ़ प्रभारी डॉ. संदीप पाठक ने शुक्रवार को अपने साथी राज्यसभा सदस्यों के साथ पार्टी छोडक़र भाजपा में शामिल होने का फैसला किया, तो यहां पार्टी के पदाधिकारी चौंक गए। दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में राघव चड्डा और अशोक मित्तल के पार्टी छोडऩे की चर्चा पहले से चल रही थी, लेकिन पाठक के भी साथ होने से छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक के आप नेता आश्चर्यचकित हैं। कहा जा रहा है कि डॉ. पाठक ने राघव चड्डा से दोस्ती के चलते पार्टी छोड़ी है।
दिल्ली में आम आदमी पार्टी में शुक्रवार को बड़ी टूट हुई। पार्टी के तीन राज्यसभा सदस्य राघव चड्डा, अशोक मित्तल और डॉ. संदीप पाठक ने आप से नाता तोडक़र भाजपा में शामिल हो गए। तीनों ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से मुलाकात की। चार और राज्यसभा सदस्यों के पार्टी छोडक़र भाजपा में शामिल होने की अटकलें भी लगाई जा रही हैं।
फिलहाल जिन तीन राज्यसभा सदस्यों ने पार्टी छोड़ी है, उनमें डॉ. पाठक के जाने को लेकर सबसे ज्यादा हैरानी जताई जा रही है। राघव चड्डा का नाम दिल्ली के शराब घोटाले में चर्चा में रहा है और वे पिछले दो साल से पार्टी से अलग-थलग चल रहे थे। इसी तरह लवली यूनिवर्सिटी के मालिक अशोक मित्तल के यहां इसी माह ईडी की रेड पड़ी थी।
ऐसा माना जा रहा है कि चड्डा और अशोक मित्तल ने कानूनी उलझनों से बचने के लिए पार्टी छोड़ी है, जबकि डॉ. पाठक के साथ ऐसी कोई समस्या सामने नहीं थी।
छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले के बटहा गांव के निवासी डॉ. संदीप पाठक आप के थिंक टैंक माने जाते रहे हैं। कैंब्रिज से पीएचडी करने के बाद वे दिल्ली आईआईटी में एसोसिएट प्रोफेसर रहे। अन्ना आंदोलन के दौरान उनका संपर्क अरविंद केजरीवाल से हुआ।
बताते हैं कि डॉ. पाठक को डेटा-तकनीक आधारित चुनाव प्रबंधन में महारत हासिल है, जिसे उन्होंने पंजाब में साबित भी किया। यही वजह रही कि पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजा। हालांकि अपने गृह राज्य छत्तीसगढ़ में वे कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाए। उनके प्रभारी रहते यहां पार्टी के सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी।
डॉ. पाठक पार्टी के लिए कितने अहम थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन जैसे नेता जेल में थे, तब पार्टी की गतिविधियां वे ही संभाल रहे थे। वे केजरीवाल से नियमित रूप से मिलते थे और दिल्ली व पंजाब सरकारों के बीच सेतु का काम कर रहे थे।
और अब पार्टी छोडऩे के पीछे जो बात सामने छनकर सामने आई, उसके मुताबिक राघव चड्डा ने डॉ पाठक को पार्टी छोडऩे के लिए तैयार किया। दोनों के बीच गहरी छनती है। यही वजह है कि डॉ. पाठक ने राघव चड्डा का अनुकरण किया। अब भाजपा उनका क्या उपयोग करती है, यह तय नहीं है।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस या दूसरे दल से छोडक़र भाजपा में आए हैं उनमें अकेले सौरभ सिंह, और धर्मजीत सिंह ही भाजपा के मुख्य धारा में हैं बाकी सभी हाशिए पर चले गए हैं। डॉ. पाठक वैसे भी जमीनी नहीं है, ऐसे में पार्टी उनका क्या उपयोग करती है, इस पर चर्चा हो रही है। उनके राज्यसभा का कार्यकाल खत्म होने में दो साल बाकी है। ऐसे में भाजपा से जुड़े लोगों का कहना है कि वो पंजाब में उपयोगी साबित हो सकते हैं, जहां अगले साल विधानसभा के चुनाव हैं। यहां वो माईक्रो लेवल तक बूथ प्रबंधन देखते रहे हैं। देखना है कि डॉ. पाठक का आगे क्या कुछ होता है।
रेत के धंधे में फिर खून-खराबा

रेत का कारोबार पर्यावरण को ही छलनी-छलनी नहीं कर रहा है, अब यह समाज के कानून व्यवस्था के लिए भी गंभीर संकट का मामला बनता जा रहा है। जांजगीर-चांपा जिले के करही में जिस तरह से घर के भीतर नकाबपोशों ने घर के भीतर घुसकर गोलियां बरसाई और एक रेत कारोबारी की हत्या कर दी, उसके भाई को घायल कर दिया, वह पिछले कुछ समय से हिंसक होते जा रहे इस व्यवसाय की ही अगली खतरनाक कड़ी है। इस घटना के दो दिन पहले ही इसी जिले के मरघट्टी गांव में ग्रामीणों ने अवैध रेत खनन के खिलाफ मोर्चा खोला था। उन्होंने करीब दर्जन भर गाडिय़ों को रोक लिया था। कानून-व्यवस्था बिगडऩे के डर से हड़बड़ाए प्रशासन ने वहां जाकर जब्ती की कार्रवाई की। करीब एक साल पहले मई 2025 में बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के सनावल इलाके में पड़ोसी राज्य झारखंड के रेत माफियाओं ने एक पुलिस जवान शिवबचन सिंह को घसीट-घसीट कर मार डाला था। बीते सप्ताह मुंगेली जिले के लोरमी इलाके में चार वनरक्षक मारपीट से बुरी तरह घायल हो गए। उन्होंने अफसरों को रिपोर्ट दी कि वे रेत माफियाओं को पकडऩे गए थे, तब उन पर हमला किया गया। बाद में काउंटर शिकायत हुई तब पता चला कि वनकर्मियों की शह पर ही रेत का खनन हो रहा था, लेन-देन के विवाद में उनकी धुनाई हो गई। इसी तरह प्रदेश के अलग-अलग हिस्से में गरियाबंद, धमतरी, रायगढ़, जगदलपुर की घटनाएं गिनाईं जा सकती हैं। रेत कारोबारियों के आदमियों ने न केवल प्रतिद्वन्द्वियों पर बल्कि ग्रामीणों, अफसरों यहां तक कि पत्रकारों पर भी हमले किए हैं।
रेत से मुनाफा निकालने की यह होड़ नदियों का जो हाल कर रही है वह तो अपनी जगह है, मानवीय संवेदनाओं के लिए भी जगह नहीं बची है। तीन साल पहले तीन लड़कियों की अवैध रेत खदान जो पानी आ जाने के कारण दिखाई नहीं दे रही थी, अरपा नदी में डूब जाने से मौत हो गई थी। अभी कुछ दिन पहले रतनपुर इलाके में एक नाबालिग की मौत हुई थी। ट्रैक्टर चालक ने बताया कि वह वाहन की चपेट में आ गया। पर बाद में हुई जांच से पता चला कि उनकी मौत रेत की खुदाई के दौरान दब जाने से हुई थी।
छत्तीसगढ़ सरकार ने रेत खनन को नियंत्रित करने और पारदर्शी व्यवस्था लागू करने के लिए हाल ही में एक नई नीति लागू की है। पुरानी नीति में कई बदलाव हैं। जैसे अब केंद्र और राज्य सरकार के उपक्रमों के लिए अलग से रेत खदानों को आरक्षित किया जाएगा। खदानों की नीलामी ई ऑक्शन और रिवर्स ऑक्शन पोर्टल के जरिये किया जाएगा। जुर्माना पहले 50 हजार रुपये तक था, जिसे बढ़ाकर अब 5 लाख रुपये कर दिया गया है। खदानों की जीपीएस ट्रैकिंग और अब कहीं-कहीं ड्रोन से निगरानी की बात भी कही गई है। पर ये सब तब हो जब राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण कारोबार से जुड़े लोगों को मिलना बंद हो। राजनीतिक दलों से जुड़े लोग खुद ही इस धंधे में लगा है। सत्ता के पास कुछ ज्यादा हिस्सा है, विपक्ष के पास कुछ कम। नई नीति में सरकार ने अपना राजस्व भी कई गुना बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। गौण खनिज में पिछले सालों में उसकी आय 15-20 करोड़ ही रही है। खदानों की संख्या भी 200 से बढ़ाकर 300 कर दी गई है। पर नीतियों को लागू करने वाले वही खनिज, वन विभाग के अफसर हैं, जिनको प्रभावशाली कारोबारियों के साथ मिलजुल कर रहना है। रेत के धंधे में मुनाफे की मची होड़ जिस तरह से खून-खराबे तक पहुंच रही है, वह जरूर अपने प्रदेश के लिए चिंता की बात है।
चुनाव और कैरम क्लब का रिश्ता !
वैसे तो इस समय पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव चल रहे हैं, मगर भाजपा की उत्सुकता असम और पश्चिम बंगाल को लेकर ज्यादा है। दोनों ही जगहों पर भाजपा की संभावनाएं दिख रही हैं, हालांकि पश्चिम बंगाल में कांटे की टक्कर मानी जा रही है। चुनाव प्रचार से जुड़े लोग मानते हैं कि यहां के चुनाव में कैरम क्लब अहम भूमिका निभा सकते हैं।
पश्चिम बंगाल में लगभग हर पंचायत और बड़े मोहल्लों में कैरम क्लब हैं, जहां बड़ी संख्या में युवा कैरम खेलते नजर आते हैं। इन क्लबों को टीएमसी सरकार से अनुदान भी मिलता है, और क्लब से जुड़े युवा एक तरह से टीएमसी के कार्यकर्ता बन चुके हैं। पिछले चुनाव में भी उन्होंने टीएमसी को सत्ता में लाने में अहम भूमिका निभाई थी। अब भाजपा के रणनीतिकार इन कैरम क्लबों में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ में भी भूपेश सरकार ने पंचायत स्तर पर राजीव मितान क्लब की स्थापना की थी। इन क्लबों को सालाना एक लाख रुपये का अनुदान मिलता था। सरकार को उम्मीद थी कि क्लब से जुड़े युवा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में काम करेंगे, लेकिन चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद भाजपा सरकार ने आते ही राजीव मितान क्लब को भंग कर दिया।
सरकार से हटने के बाद भूपेश बघेल ने इन क्लबों से जुड़े युवाओं को अपने साथ जोडऩे की कोशिश की। इस सिलसिले में एक बैठक भी हुई, लेकिन उन पर पार्टी के समानांतर संगठन खड़ा करने के आरोप लगे। इसके बाद से राजीव मितान क्लब की गतिविधियां लगभग ठप पड़ गई हैं।
अब पश्चिम बंगाल में कैरम क्लब क्या भूमिका निभाते हैं, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।


