राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : जनगणना में छत्तीसगढ़ी के अस्तित्व की परीक्षा?
27-Apr-2026 5:23 PM
राजपथ-जनपथ : जनगणना में छत्तीसगढ़ी के अस्तित्व की परीक्षा?

जनगणना में छत्तीसगढ़ी के अस्तित्व की परीक्षा?

छत्तीसगढ़ में डिजिटल स्व-जनगणना अभियान 16 अप्रैल से शुरू हुआ है जो 30 अप्रैल तक चलेगा। फरवरी 2027 में मुख्य गणना होगी। इधर, राज्य में इन दिनों एक दिलचस्प लेकिन गंभीर अभियान चल रहा है जिसमें लोगों से अपील की जा रही है कि वे जनगणना के दौरान मातृभाषा के रूप में छत्तीसगढ़ी को दर्ज कराएं। छत्तीसगढिय़ा क्रांति सेना, छत्तीसगढ़ी राजभाषा मंच, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा, जोहार छत्तीसगढ़ आदि दल और संगठन इसे लेकर जागरूकता अभियान चला रहे हैं। छत्तीसगढ़ी को महत्व नहीं देने पर जनगणना का बहिष्कार करने जैसी चेतावनी भी दी गई है।

डिजिटल स्व जनगणना पोर्टल में केलव 16 भाषाओं का विकल्प दिया गया है। इनमें छत्तीसगढ़ी शामिल नहीं है। जनगणना विभाग ऐतिहासिक रूप से छत्तीसगढ़ी को हिंदी की एक उप भाषा या बोली के रूप में वर्गीकृत करता है। डेटा प्रोसेसिंग के दौरान भी इसे हिंदी में गिन लिया जाता है। छत्तीसगढ़ी को 28 नवंबर 2007 से राजभाषा का दर्जा मिला है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं है। यह क्षेत्रीय भाषाओं की सूची में शामिल नहीं है। 1.6 करोड़ से अधिक लोग छत्तीसगढ़ी बोलते हैं, पर इससे कम बोली जाने वाली भाषा आठवीं अनुसूची में जगह रखती हैं। इस सूची में शामिल करने की मांग पर विधानसभा में प्रस्ताव पारित हो चुका है, कई बार केंद्र को पत्र लिखे जा चुके हैं। इस तथ्य की ओर गौर करना चाहिए कि ग्लोबलाइजेशन के दौर में बोलियों और क्षेत्रीय भाषाओं पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। यूनेस्को के मुताबिक दुनिया की 6000 प्लस भाषाओं में से 43 प्रतिशत लुप्तप्राय की स्थिति में है। हर दो हफ्ते में दुनिया की एक भाषा दम तोड़ रही है। भारत को लेकर पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया की तरफ से जारी एक आंकड़े के अनुसार भारत ने बीते 50 वर्षों में 250 से अधिक भाषाएं खो दी हैं। 197 भाषाओं पर खतरा मंडरा रहा है। इनमें छत्तीसगढ़ की कुछ जनजाति बोलियां जैसे अबुझमाडिय़ा भी शामिल हैं।

छत्तीसगढ़ी बोली को लेकर ऐसा तत्काल कोई संकट नहीं दिखता। मगर, नई पीढ़ी की आदत बदल रही है। पिछली जनगणना और इस जनगणना के बीच बड़े बदलाव आ चुके हैं। अब के युवा ही नहीं, बल्कि हर वर्ग के लोग इंटरनेट के आदी हैं, जिनमें मु_ी भर भाषाओं का कब्जा है। हालांकि इंटरनेट पर छत्तीसगढ़ी सामग्री भी भरपूर है, पर वे मनोरंजन के लिए है, कामकाज के लिए नहीं। इस बीच रोजगार के लिए ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों में पलायन हुआ या फिर कस्बों का शहरीकरण हुआ, जहां भिन्न-भिन्न समुदायों, बोलियों के लोग हैं। उनके बीच संपर्क की भाषा हिंदी हो गई है। प्राथमिक शिक्षा में छत्तीसगढ़ी को शामिल किया गया है, नई शिक्षा नीति 2020 में भी क्षेत्रीय बोलियों को महत्व देने की बात कही गई है। यहां तक कि छत्तीसगढ़ सरकार ने पत्राचार के लिए छत्तीसगढ़ी को मान्यता दे रखी है, पर इनका व्यापक प्रभाव नहीं पड़ा है। छत्तीसगढ़ी को जनगणना में दर्ज कराने की मांग उठाने की नौबत इसलिये भी आ रही है कि बड़ी संख्या में लोगों को अपनी बोली बोलने में हीन भाव महसूस होता है। शायद, वे यह समझते हैं कि छत्तीसगढ़ी के अलावा दूसरी भाषाएं बोलने वालों ने ज्यादा तरक्की की है। ऐसे में जनगणना के बाद छत्तीसगढ़ी को लेकर भी एक तस्वीर साफ होने वाली है। छत्तीसगढ़ी कहां है, भविष्य में यह भाषा और फैलेगी या विलुप्त होगी- अनुमान लगाया जा सकेगा।

सुनवाई पूरी होने में वक्त

केन्द्र और राज्य की एजेंसियां घपले-घोटालों की पड़ताल कर रही हैं। इनमें शराब, कोयला, डीएमएफ, महादेव ऑनलाइन सट्टा और नान प्रकरण शामिल हैं। इन प्रकरणों में फंसे ज्यादातर आरोपी जेल से रिहा हो चुके हैं, जबकि कुछ अब भी जेल में हैं।

ये सभी मामले पिछली सरकार के हैं। सभी मामलों में चालान पेश हो चुका है, लेकिन पूरक चालान भी लगातार पेश किए जा रहे हैं। अदालत में सुनवाई लंबी चलेगी और विधिक जानकारों का मानना है कि सुनवाई पूरी होने में एक दशक तक लग सकता है।

नान घोटाला रमन सिंह सरकार के समय उजागर हुआ था। 12 साल बाद भी इसकी सुनवाई पूरी नहीं हो सकी है। अब इस प्रकरण में  ईडी भी सक्रिय हो गई है। दोनों प्रमुख आरोपी, पूर्व प्रमुख सचिव डॉ. आलोक शुक्ला और अनिल टुटेजा, को कस्टडी में लिया गया था। यह मामला भी आगे और खिंचने की संभावना है।

इसी तरह शराब घोटाला केस में साढ़े 9 सौ गवाह हैं, लेकिन गवाही अभी शुरू नहीं हुई है। ऐसे में शराब घोटाला केस की सुनवाई भी लंबी चलेगी। बाकी मामलों की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है। कुल मिलाकर ढाई साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में भी ये मुद्दे प्रमुख रूप से छाए रहने की संभावना है।

अवैध प्लाटिंग पर गरमाई राजनीति

अंबिकापुर में पिछले कुछ दिनों से शहर के जागरूक लोग पर्यावरण संरक्षण के लिए मुहिम चला रहे हैं। शहर और आसपास में कई तालाबों को पाटकर प्लाटिंग कर दी गई। ऐसे ही एक तालाब को पाटकर प्लाटिंग करने के मामले की जांच भी शुरू हो गई है। मगर जांच को लेकर भाजपा के अंदरखाने में हलचल मची है।

हुआ यूं कि अंबिकापुर शहर के पुराने रिंगबांध तालाब को पिछले कुछ सालों से पाटा जा रहा है। करीब 6 एकड़ का तालाब सिमटकर आधा एकड़ रह गया। जागरूक लोगों और जनप्रतिनिधियों ने हल्ला मचाया, तो जिला प्रशासन ने कार्रवाई शुरू कर दी। फिलहाल प्लाटिंग आदि पर रोक लग गई है। लेकिन इस मामले को लेकर भाजपा में खींचतान शुरू हो गई है।

अवैध प्लाटिंग की अगुवाई करने वाले भाजपा नेता बताए जा रहे हैं, जबकि अवैध प्लाटिंग को संरक्षण देने वालों में भी भाजपा के एक प्रमुख पदाधिकारी का नाम सामने आ रहा है। मामले की जानकारी प्रदेश संगठन तक पहुंची है। फिलहाल महामंत्री (संगठन) पवन साय पश्चिम बंगाल चुनाव में व्यस्त हैं। लौटने के बाद मामले को संज्ञान में ले सकते हैं। वैसे भी पार्टी के एक प्रमुख पदाधिकारी के खिलाफ अपराधिक प्रकरण दर्ज हैं। देखना है आगे क्या कुछ होता है।


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