राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : कानून से भी खिलवाड़ मत करना बाबू
18-Apr-2026 6:05 PM
	 राजपथ-जनपथ : कानून से भी खिलवाड़ मत करना बाबू

कानून से भी खिलवाड़ मत करना बाबू

सोशल मीडिया पर इन दिनों कथित मीडिया इंफ्लुएंसर और कुख्यात सटोरिया बाबू खेमानी की एक रील तेजी से वायरल हो रही है। इस रील में वह कहते नजर आ रहा है कि तीन चीजों से कभी खिलवाड़ मत करना, आग, पानी, और बाबू खेमानी। वीडियो काफी चर्चा में है।

इसी बीच बाबू खेमानी को पुलिस ने मुंबई से गिरफ्तार कर ले आई है। बताते हैं कि वह पहले मोबाइल कारोबार से जुड़ा हुआ था, लेकिन बाद में ऑनलाइन सट्टेबाजी की दुनिया में सक्रिय हो गया। चर्चा है कि उसने दुबई जाकर ऑनलाइन सट्टा संचालन की ट्रेनिंग ली और इसके बाद अपना ऐप विकसित किया।

'थ्री-स्टंप' नाम से संचालित ऑनलाइन सट्टा ऐप इन दिनों आईपीएल के दौरान खासा चर्चित रहा, जिसमें हर बॉल पर रोजाना करोड़ों रुपये के दांव लगाए जा रहे थे। यह भी चर्चा है कि महाराष्ट्र में रहने वाले उसके कुछ रिश्तेदार इस पूरे नेटवर्क में सहयोग कर रहे थे।

बताते हैं कि बाबू खेमानी लंबे समय से जांच एजेंसियों को चकमा दे रहा था। एक ऐप के ट्रैक होने पर वह तुरंत नया प्लेटफॉर्म खड़ा कर लेता था। फिलहाल उसे तीन दिन की रिमांड पर लेकर पूछताछ की जा रही है और उसके दुबई कनेक्शन की भी गहन जांच चल रही है।

चर्चा है कि बाबू खेमानी के तार चर्चित महादेव सट्टा ऐप नेटवर्क से जुड़े सौरभ चंद्राकर तक पहुंच सकते हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने उसकी वायरल रील को शेयर करते हुए एक लाइन और जोड़ दी कि एक और चीज से खिलवाड़ मत करना वो है कानून।

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि पूछताछ में और क्या कुछ निकलकर सामने आता है।

संसद के बाद अब संगठन पर नजरें 

संसद के विशेष सत्र के समापन के बाद अब सबकी नजरें भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन पर टिक गई हैं। पार्टी के राष्ट्रीय स्तर पर संगठनात्मक बदलाव की अटकलों के बीच यह चर्चा तेज है कि नितिन नवीन जल्द ही अपनी नई कार्यकारिणी की घोषणा कर सकते हैं।

नई कार्यकारिणी में छत्तीसगढ़ से किन नेताओं को जगह मिलेगी, इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में कयासों का दौर जारी है। खासतौर पर बस्तर अंचल से दो प्रमुख नामों की चर्चा जोरों पर है, इनमें लता उसेंडी और महेश कश्यप हैं।

लता उसेंडी वर्तमान में पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं और ओडिशा की सह-प्रभारी की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। ऐसे में उनके दोबारा कार्यकारिणी में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है, साथ ही उन्हें किसी राज्य का प्रभारी बनाए जाने की भी चर्चा है।

चर्चा है कि राज्य से डिप्टी सीएम अरुण साव और विजय शर्मा को भी कार्यकारिणी में सदस्य के रूप में जगह मिल सकती है। सीएम और प्रदेश अध्यक्ष पहले से ही पदेन सदस्य होते हैं।

चूंकि नितिन नवीन छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी हैं, इसलिए वे यहां के छोटे-बड़े नेताओं से भली-भांति परिचित हैं। ऐसे में यह भी माना जा रहा है कि इस बार छत्तीसगढ़ को पहले की तुलना में ज्यादा प्रतिनिधित्व मिल सकता है और कई नए चेहरे राष्ट्रीय स्तर पर उभर सकते हैं।

अब सबकी नजर इस बात पर है कि अंतिम सूची में किन-किन नामों पर मुहर लगती है।

ज्योत्सना को खिलखिलाते देख लीजिए

शांत, धीर, गंभीर, विनम्र, सहज, सरल जैसे अनेक उपमानों से आप छत्तीसगढ़ की एकमात्र कांग्रेस सांसद ज्योत्सना महंत को संबोधित कर सकते हैं लेकिन कोई उन्हें खिलखलाते और जमकर ठहाके लगाते हुए देखने का दावा नहीं कर सकता। इसके जवाब में यह तस्वीर है। लोकसभा में महिला आरक्षण बिल की बहस के दौरान वे नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के ठीक पीछे बैठी थीं। अपने वक्तव्य में राहुल गांधी ने कहा- मेरी और मोदी जी में एक बात कॉमन है, हमें अपनी पत्नियों से सलाह नहीं लेनी पड़ती। किरण रिजुजू कल अपना दुख बता रहे थे कि उन्हें अपनी पत्नी से सुनना पड़ता है, मगर, मेरे और मोदी जी के साथ ऐसी कोई दिक्कत नहीं है। राहुल गांधी की इस बात पर क्या पक्ष, क्या विपक्ष- पूरा सदन खिलखिला उठा। फिर लोगों ने देखा कि राहुल गांधी के ठीक पीछे बैठी कोरबा सांसद ज्योत्सना महंत की भी हंसी फूट पड़ी। पता करना होगा कि नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत की इस मामले में क्या प्रतिक्रिया है।

बता दें, इसके बाद राहुल गांधी ने और क्या कहा। उन्होंने कहा- जो मैं 20 साल के भाषणों में नहीं कर पाया, वह मेरी बहन प्रियंका ने कर दिखाया। उसने अमित शाह को हंसने पर मजबूर कर दिया। मैं आज तक उनको नहीं हंसा पाया।

झुलस रही लोकतंत्र की नर्सरी

कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई ने राजधानी की सडक़ों पर छात्रसंघ चुनाव कराने की मांग को लेकर एक प्रदर्शन किया। यह आंदोलन छात्र राजनीति में लंबे समय से आए ठहराव के खिलाफ है। छत्तीसगढ़ की राजनीति की जड़ें छात्र आंदोलनों और छात्र नेतृत्वों में गहराई से जुड़ी रही है। दुर्गा कॉलेज, कल्याण कॉलेज और रविशंकर विश्वविद्यालय ने एक से बढक़र एक नेता दिए। रायपुर के वर्तमान सांसद, अजेय बृजमोहन अग्रवाल दुर्गा कॉलेज की छात्र राजनीति की ही देन हैं। स्वर्गीय अरुण जेटली दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट रहे। अजय माकन भी दिल्ली यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष थे। अभी जो दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता हैं, वे भी सन् 2006 में दिल्ली यूनिवर्सिटी की अध्यक्ष थीं। अलका लांबा भी दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रेसीडेंट थीं।

अमित शाह, ममता बेनर्जी, अशोक गहलोत, नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, देवेंद्र फडऩवीस, धर्मेंद्र प्रधान और तो और योगी आदित्यनाथ,  सबकी पृष्ठभूमि कॉलेजों के इलेक्शन में जीतने और अपना लोहा मनवाने से जुड़ी है। और भी नाम याद करें तो लालू प्रसाद यादव, नीतिश कुमार को जेपी आंदोलन में बड़ी जगह इसलिए मिली कि वे छात्र नेता हुआ करते थे। कम्युनिस्ट विचारधाराओं में देखें तो प्रकाश करात, वृंदा करात, सीताराम येचुरी..ये सब छात्र आंदोलनों और छात्रसंघ चुनावों की देन हैं। छात्रों के बीच चुनाव कराने का एक मकसद सदा यह रहा है कि मताधिकार के काबिल होते युवाओं को लोकंत्रात्रिक मूल्यों की समझ हो जाए। संगठन का महत्व समझें, बहस और जिम्मेदारी का एहसास हो। एनएसयूआई का प्रदर्शन ठीक है, विपक्ष का धर्म है, पर यह हिप्पोक्रेसी है। सन् 2018 से 2023 तक कांग्रेस की सरकार थी। कितने चुनाव हुए, कितने आंदोलन हुए चुनाव के लिए?

उससे बड़ा सवाल है कि राजनीतिक दल खासकर सत्ता पक्ष छात्रसंघ चुनावों से डरता क्यों है? बताते चलें कि एक लिंगदोह कमेटी बनी थी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनी इस समिति ने सिफारिश की थी कि छात्रसंघ चुनाव शांतिपूर्ण होना चाहिए। निष्पक्ष हो और अनाप-शनाप खर्चों पर लगाम रखने के लिए प्रशासन निगरानी करे। इस हिसाब से चुनाव तो होते रहने चाहिए। मगर जो भी सरकार आती है हिंसा और अनाप-शनाप खर्चे का हवाला देकर इस चुनाव को ठंडे बस्ते में डाल देती है। कॉलेज प्रेसिडेंट अपने इलाके में बड़ा पॉवरफुल हुआ करता था, यूनिवर्सिटी प्रेसिडेंट तो और भी ज्यादा। रायपुर और बिलासपुर के विकास के लिए हुए आंदोलनों का इतिहास देखेंगे तो इन यूनियनों के प्रेसिडेंट और सेक्रेटरीज ने ही कमान संभाली। हक की लड़ाई लड़ी और मकसद पूरा हुआ। चुनाव नहीं कराने के पीछे की असलियत यह है कि जनप्रतिनिधि स्वतंत्र आवाजों से डरते हैं। कई बार छात्र नेता अपने इलाके के विधायकों और मंत्रियों से भी अधिक वजनदार साबित होते हैं। उनको यह रास नहीं आता। ज्यादातर बार वे बिना किसी राजनीतिक दल के समर्थन के जीत लेते हैं, पर जीतने के बाद उनको हड़पने की कोशिश होती है। कई बार विफलता हाथ लगती है। तो...छात्रसंघ चुनावों से बचने का किस्सा यही है।


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