राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : राजनीतिक समीकरण बदलेंगे
26-Apr-2026 6:39 PM
राजपथ-जनपथ : राजनीतिक समीकरण बदलेंगे

राजनीतिक समीकरण बदलेंगे

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे 4 मई को घोषित होने हैं और इसी के साथ राजनीतिक समीकरणों का नया दौर शुरू होने की उम्मीद है। कांग्रेस को केरल के बाद असम में भी सरकार बनने की आस है। पार्टी के भीतर यह चर्चा तेज है कि यदि नतीजे अनुकूल रहे तो राष्ट्रीय संगठन से लेकर प्रदेश स्तर तक बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

कांग्रेस की सबसे ज्यादा उम्मीद केरल से जुड़ी है। छत्तीसगढ़ के प्रभारी सचिन पायलट को वहां चुनाव प्रभारी बनाया गया है। साथ ही राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का केरल से सीधा राजनीतिक जुड़ाव होने के कारण पार्टी यहां 15 साल बाद सत्ता में वापसी की उम्मीद कर रही है।

छत्तीसगढ़ में भी नतीजों के बाद संगठनात्मक बदलाव की अटकलें हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज का कार्यकाल समाप्ति की ओर है और उनके नेतृत्व को लेकर असंतोष की आवाजें भी सामने आई हैं। कुछ जिला अध्यक्ष खुलकर नाराजगी जता चुके हैं। ऐसे में चुनाव परिणाम ही तय करेंगे कि बदलाव होगा या स्थिति यथावत रहेगी।

महिला कांग्रेस की स्थिति भी लंबे समय से अनिश्चित बनी हुई है। प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष का पद पिछले छह महीनों से खाली है। जनवरी में संभावित उम्मीदवारों के इंटरव्यू होने के बावजूद अब तक नियुक्ति नहीं हो सकी है, जिससे संगठनात्मक गतिविधियां लगभग ठप पड़ी हैं।

छत्तीसगढ़ के नेता भी दांव पर

इन चुनावों के नतीजे केवल राज्यों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि छत्तीसगढ़ के कई नेताओं के राजनीतिक कद पर भी असर डाल सकते हैं।

पूर्व सीएम भूपेश बघेल को असम में चुनाव पर्यवेक्षक बनाया गया है, जबकि विकास उपाध्याय वहां प्रभारी सचिव की भूमिका निभा रहे हैं। यदि असम में कांग्रेस सरकार बनाती है, तो इन नेताओं की पार्टी में स्थिति और मजबूत हो सकती है।

वहीं भाजपा की ओर से अरुण साव, ओपी चौधरी और केंद्रीय मंत्री तोखन साहू असम में करीब 20 सीटों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। अगर भाजपा सत्ता बरकरार रखती है, तो इन नेताओं की अहमियत बढऩा तय है। इसी तरह पश्चिम बंगाल में प्रदेश महामंत्री पवन साय की अगुवाई में डिप्टी सीएम विजय शर्मा और दयालदास बघेल समेत कई नेता सक्रिय हैं और लगभग 65 सीटों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। बंगाल में भाजपा के प्रदर्शन पर इन नेताओं का राजनीतिक वजन भी निर्भर करेगा।

कुल मिलाकर 4 मई के नतीजे सिर्फ सरकारें नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में संगठन, नेतृत्व और राजनीतिक भविष्य की दिशा भी तय होगा। देखना है क्या कुछ होता है।

केरल से बड़े बस्तर में खंडपीठ की मांग

जगदलपुर में हाईकोर्ट खंडपीठ की स्थापना की मांग को लेकर बीते 25 अप्रैल को एक बड़ी बैठक रखी गई थी। यह बैठक चैम्बर ऑफ कॉमर्स तथा जिला अधिवक्ता संघ की पहल पर रखी गई। स्थानीय सांसद व विधायक जाहिर तौर पर इस मांग के समर्थन में हैं। बैठक में तय किया गया कि खंडपीठ अब केवल वकीलों की मांग नहीं, बल्कि जनता की होगी। सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, व्यापार संघों, समुदायों को साथ लिया जाएगा। बैठक में कहा गया कि बस्तर छत्तीसगढ़ का एक तिहाई हिस्सा है और आकार में केरल जैसे राज्य से भी बड़ा है। मौजूदा हाईकोर्ट बिलासपुर की दूरी भी बस्तर से बहुत अधिक है। न्याय का विकेंद्रीकरण जरूरी है, इसलिये मांग जायज है। बस्तर सांसद महेश कश्यप, जो इस बैठक में मौजूद थे, उन्होंने कहा है कि मुद्दे को वे संसद में उठाएंगे। विधायक लखेश्वर बघेल ने सामूहिक संघर्ष की जरूरत बताई। मतलब, भाजपा-कांग्रेस सभी दलों के नेताओं की खंडपीठ को लेकर एक राय है।

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो सन् 1945 तक जगदलपुर में रियासतों के लिए जगदलपुर में एक खंडपीठ संचालित होती थी। इसका नाम था- हाईकोर्ट फॉर ईस्टर्न प्रिंसली स्टेट्स। राज्य बनने के बाद सन् 2011 में बस्तर जिला अधिवक्ता संघ ने पहली बार औपचारिक रूप से खंडपीठ की मांग उठाई। उसके बाद समय-समय पर अधिवक्ता संघ, बस्तर चेम्बर ऑफ कॉमर्स और विभिन्न संगठन, प्रदर्शनों, ज्ञापनों के जरिये मांग उठाते रहे हैं। पर, इस बार 25 अप्रैल को हुई बैठक की खास बात यह है कि अब आंदोलन व्यापक स्तर पर होगा, केवल अधिवक्ताओं और व्यापारियों की मांग के रूप में पेश नहीं किया जाएगा।

जगदलपुर से बोदरी, बिलासपुर स्थित हाईकोर्ट की दूरी लगभग 425 किलोमीटर है। सुकमा और बीजापुर जिलों से तो यह 600 किलोमीटर से अधिक हो जाती है। हवाई सेवाएं बिलासपुर के लिए कभी बंद हो जाती है, कभी शुरू। वैसे भी इसका खर्च हर कोई नहीं उठा सकता। ट्रेन सेवा तो राजधानी रायपुर के लिए ही सुलभ नहीं है, तो बिलासपुर का सवाल ही नहीं उठता। बस या निजी गाडिय़ों से लंबी यात्रा कर लोग यहां पहुंच पाते हैं। गरीब आदिवासी, जिनकी बहुलता बस्तर में है, उनके लिए आने-जाने का खर्च उठाना ही मुश्किल होता है, फिर मुकदमा लडऩे के लिए कहां से ताकत जुटाएंगे। खंडपीठ खुल जाने से बस्तर के लोगों को त्वरित, सुलभ और कहीं कम खर्च में न्याय हासिल करने का मौका मिलेगा। विधि व्यवसाय से जुड़े लोगों के लिए नए अवसर पैदा होंगे।

मगर, इसके दूसरे पहलू भी हैं। छत्तीसगढ़ जब नया राज्य बन गया तो हाईकोर्ट की स्थापना तो यहां होनी ही थी, पर मध्यप्रदेश के जमाने में रायपुर में खंडपीठ खोलने की मांग विरोध किया जाता था। जगदलपुर में भी खंडपीठ की स्थापना के विचार का विरोध भी होता रहा है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट बार एसोसिएशन पूर्व में किसी भी खंडपीठ की मांग का विरोध कर चुका है। तर्क यह रहा है कि इससे हाईकोर्ट की गरिमा और प्रभाव पर असर होगा। वहीं रायपुर के अधिवक्ता चाहते हैं, खंडपीठ की स्थापना जगदलपुर के बजाय राजधानी में हो। बिलासपुर में वकीलों के विरोध का एक कारण यह भी है कि जजों का प्रभार दो स्थानों में बंट जाएगा और इसका असर उनकी प्रैक्टिस पर पड़ेगा। क्लाइंट बट जाएंगे, आमदनी घटेगी। कई वकीलों को जगदलपुर में डेरा डालना पड़ेगा, जैसा जबलपुर से कई वकील वर्षों तक बिलासपुर आते रहे। बहुत से लोग तो यहां स्थायी रूप से बस चुके हैं और महंगे वकीलों में शामिल हैं। एक बड़ा तर्क यह है कि बिलासपुर तो राजधानी का दावेदार था, उसे मुश्किल से हाईकोर्ट ही मिल पाया। खंडपीठ बन जाने से बिलासपुर का कद और कम हो जाएगा। कई बार न्यायिक अधिकारी भी नई खंडपीठ के पक्ष में नहीं होते। बिलासपुर, राजधानी से बहुत पास है, रायपुर से ही सही, हवाई सेवाएं हैं। अच्छे स्कूल, नामी अस्पताल हैं। जगदलपुर जैसी जगह में जाने का मन बनाना मुश्किल होगा। सरकारें भी प्राय: पक्ष में नहीं होती। एक खंडपीठ की स्थापना में भारी वित्तीय खर्च और बुनियादी ढांचे के निर्माण की जरूरत पड़ेगी। इमारत, जजों के आवास, कर्माचरियों की नियुक्ति..। सरकार का स्थापना व्यय भी बढ़ जाता है। इसके अलावा देशभर के मौजूदा हाईकोर्ट्स में ही जजों की भारी कमी है। छत्तीसगढ़ में ही कभी पूरे पद नहीं भरे गए। खंडपीठ के लिए नए जजों की भर्ती करनी होगी।

वैसे इस दिशा में बहुत कम विचार हो रहा है कि तकनीकी सुविधाओं का इस्तेमाल कर नई खंडपीठ की जरूरत को कम करें। कोविड महामारी के सामने ई कोर्ट की सुविधाएं शुरू की गईं, जो अब काफी कुछ चलन में आ चुका है। छत्तीसगढ़ के किसी भी कोने से बैठकर वकील जिरह करते हैं, जज मुकदमों की सुनवाई करते हैं। बस्तर जैसे दूरस्थ क्षेत्रों के लिए वीडियो कांफ्रेंसिंग को नियमित अभ्यास में शामिल कर लेना चाहिए। फिलहाल, देखना यह है कि दो दशक पुरानी खंडपीठ की मांग को नए सिरे से उठाया जा रहा है, उसमें कब सफलता मिलती है और मिल पाती है या नहीं।

गौठान ने उतारी भालू की गर्मी

छत्तीसगढ़ में इन दिनों भीषण गर्मी पड़ रही है। शहर गांव ही नहीं, जंगलों तक अपना असर दिखा रही है। इसी दौरान पानी की तलाश में भटकती एक मादा भालू अपने शावकों के साथ कांकेर जिले के ग्राम डुमाली में बने गौठान पहुंची। पानी की टंकी में उतरकर वे राहत पाने की कोशिश करती नजर आ रही हैं। यह दुर्लभ दृश्य वहां से गुजर रहे एक राहगीर ने कैमरे में कैद कर लिया, जो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस पोस्ट से यह तो पता चल रहा है कि पिछली सरकार के दौरान बनाए गए सब गौठान खंडहर नहीं हुए हैं, कहीं-कहीं पानी भी उपलब्ध है।


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