राजपथ - जनपथ
वेदांता के चेयरमैन और रेलवे के...
.वेदांता पावर प्लांट, सिंघीतराई के हादसे में अब तक दो दर्जन मजदूरों की जान जा चुकी है। सरकार ने जिन लोगों के खिलाफ एफआईआर कायम की है, उनमें कंपनी के चेयरमैन यानि मालिक अनिल अग्रवाल का नाम भी शामिल है। छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की है, और भाजपा के ही दो जाने-माने नेताओं ने एफआईआर में उनका नाम होने पर सवाल खड़ा कर दिया है। पूर्व राज्यपाल किरण बेदी ने दावा किया कि हाल ही में उन्होंने कंपनी का दौरा किया और उनकी कार्यसंस्कृति को शानदार पाया। उन्होंने कहा कि वेदांता जैसी राष्ट्रीय संपत्ति को बदनाम न किया जाए। भाजपा सांसद नवीन जिंदल एक्स पर कहते हैं कि अनिल अग्रवाल का नाम एफआईआर में डालना गलत है, पहले जांच हो। वे सेल्फ मेड मैन हैं। एक दिलचस्प सवाल भी उन्होंने उठाया कि जब पीएसयू, यानि सार्वजनिक उपक्रम में या रेलवे में हादसे होते हैं तो चेयरमैन का नाम उसमें क्यों नहीं डाला जाता?
जिंदल का यह सवाल जायज लग सकता है, पर सही नहीं है। जवाब साफ है कि रेलवे केंद्र सरकार का एक उपक्रम है, जो रेलवे फैक्ट्रीज एक्ट 1948 के दायरे में नहीं आता, जबकि वेदांता आता है। फैक्ट्रीज एक्ट की धारा 92 में स्पष्ट लिखा गया है- ऑक्यूपियर यानि मालिक और मैनेजर संयुक्त रूप से जिम्मेदार होंगे। दूसरी बात चाहे रेलवे के चेयरमैन हों, या रेल मंत्री ही क्यों न हों, वे रेलवे के मालिक नहीं हैं। वे सिर्फ अधिकारी या लोक सेवक होते हैं। मगर, किसी फैक्ट्री का चेयरमैन उसका मालिक होता है। रेलवे चेयरमैन तो एक सरकारी नौकर भी हो सकता है। कार्रवाई होती है, वहां भी बालासोर जैसी बड़ी दुर्घटना में कई शीर्ष अधिकारी निलंबित हुए। जबरन इस्तीफा ले लिया गया। रेल मंत्री से भी इस्तीफे की मांग हुई, पर यह नैतिकता का हवाला देते हुए मांगा गया, कानून का हवाला देते हुए नहीं।
अब एक दूसरे पहलू पर भी बात होनी चाहिए। वेदांता का बयान है कि हादसा सब-कांट्रेक्टर एनजीएसएल के मजदूरों के साथ हुआ। यानि वे वेदांता के मजदूर नहीं थे। वेदांता एक भारी जोखिम वाले कारखाने के संचालन का हिस्सा किसी ठेका कंपनी को दे दिया, और फिर उस कंपनी ने भी किसी को कोई हिस्सा ठेके पर दे दिया। एक तरफ फैक्ट्री मालिक कानून से सुरक्षा चाहते हैं, दूसरी तरफ अधिक मुनाफे के लिए ज्यादा प्रोडक्शन पर जोर देते हैं, दूसरी तरफ लागत कम रखने के लिए कंपनी में अपना स्थायी मजदूर नहीं रखते, काम ठेके पर किसी कंपनी को देते हैं। ठेका लेने वाली कंपनी भी इतनी बड़ी होती है कि वह और कई सब कांट्रेक्टर्स से काम कराती है। बॉयलर का नियमित इंस्पेक्शन, सेफ्टी वाल्व की चेकिंग, प्रेशर गेज की मरम्मत क्या वेदांता कंपनी के लोग खुद देख रहे थे, या फिर यह पेटी कांट्रेक्टर्स के हाथ में था? शायद जांच में यह सामने आए।
एक तरफ जिंदल और बेदी की सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश है, वहीं जांजगीर और कोरबा के सांसदों ने केंद्रीय मंत्रियों को पत्र लिखकर उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। अभी बिलासपुर के संभागायुक्त जांच कर रहे हैं।
वैसे भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 106 (लापरवाही से मौत) और 289 (मशीनरी से संबंधित लापरवाही) के तहत एफआईआर दर्ज हुई है, जिसमें अनिल अग्रवाल का नाम भी शामिल है। इनमें से पहली धारा में अधिकतम सजा पांच साल की है, दूसरी में 6 माह की। दोनों ही जमानती धाराएं हैं। इसलिए 24 मौतों के मामले में फिलहाल किसी को जेल नहीं होने वाली है।
सीडी प्रकरण में आगे क्या
चर्चित सेक्स सीडी प्रकरण में सीबीआई की विशेष अदालत में 6 मई को सुनवाई तय की गई है। इस मामले में पूर्व सीएम भूपेश बघेल को भी अदालत में पेश होना है।
प्रकरण से जुड़ा एक अहम पहलू यह है कि मुख्य आरोपी कैलाश मुरारका और विनोद वर्मा इन दिनों सक्रिय रूप से चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं। विनोद वर्मा को कांग्रेस ने असम विधानसभा चुनाव में पर्यवेक्षक की जिम्मेदारी दी थी, जहां वे कुछ समय तक सक्रिय भी रहे। जबकि कैलाश मुरारका पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशियों के समर्थन में प्रचार कर रहे हैं और भजन गायिका मैथिली ठाकुर के साथ मंच साझा करते नजर आए।
इस सेक्स सीडी प्रकरण को करीब 9 वर्ष बीत चुके हैं। आरोपियों की राजनीतिक सक्रियता जारी है, जबकि जिस पूर्व मंत्री राजेश मूणत का फर्जी वीडियो वायरल किया गया था, उन्हें अब तक न्याय नहीं मिल पाया है। ऐसे में यह देखना होगा कि यह मामला आखिर कब तक अपने निष्कर्ष तक पहुंचता है।
पेट्रोल-डीजल को लेकर दावे

पश्चिम एशिया में जारी तनाव केबीच छत्तीसगढ़ में पेट्रोल-डीजल की उपलब्धता को लेकर राहत भरे दावे किए जा रहे हैं। सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों के अधिकारियों का कहना है कि प्रदेश में न तो ईंधन की कमी है और न ही रसोई गैस की। रोजाना करीब 72 हजार एलपीजी सिलेंडर वितरित किए जा रहे हैं।
हालांकि जमीनी स्थिति इन दावों से अलग नजर आ रही है। आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी के संकेत मिल रहे हैं। होटल और रेस्टोरेंट सेक्टर को कमर्शियल सिलेंडर की आपूर्ति लगभग ठप हो गई है। कुल खपत का अधिकतम 20 प्रतिशत ही कमर्शियल सिलेंडर उपलब्ध कराने के निर्देश जारी किए गए हैं।
प्रदेश में पेट्रोल के दाम पहले ही एक रुपये प्रति लीटर बढ़ चुके हैं। अब कयास लगाए जा रहे हैं कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद, मई महीने में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में और वृद्धि हो सकती है।
ग्रामीण इलाकों में आपूर्ति पर अनौपचारिक पाबंदियां भी सामने आ रही हैं। पेट्रोल पंपों को एक व्यक्ति को अधिकतम 400 लीटर डीजल और 50 लीटर पेट्रोल ही देने के निर्देश दिए गए हैं। पहले किसान कृषि कार्यों के लिए ड्रम और जरीकेन में डीजल ले जाते थे, लेकिन अब इस पर रोक लग गई है। सरगुजा संभाग में पहले उपभोक्ता पंप उत्तर प्रदेश से डीजल मंगवाते थे, जहां वैट कम होने के कारण यह करीब 10 रुपये सस्ता पड़ता था। लेकिन अब वहां वैट बढऩे से यह विकल्प भी बंद हो गया है।
कुल मिलाकर संकेत यही हैं कि भले ही पश्चिम एशिया का संकट जल्द सुलझ जाए, सप्लाई चेन को पूरी तरह सामान्य होने में करीब छह महीने का समय लग सकता है। फिलहाल बाजार में इस बात को लेकर चर्चा तेज है कि पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतों में कितनी बढ़ोतरी होगी। यह भी माना जा रहा है कि 4 मई को मतगणना से पहले ही कीमतों में इजाफा देखने को मिल सकता है।
अंग्रेजों का शिकारगाह..

इस समय छत्तीसगढ़ के अधिकांश शहरों में भीषण गर्मी का कहर जारी है। राजनांदगांव, बिलासपुर और रायपुर में लू चल रही है, तापमान 42 से 45 डिग्री सेल्सियस पहुंच चुका हो और सूरज की तपिश हर किसी को झुलसा रही हो, तब सूपखार बंगले की यह तस्वीर भी आंखों को ठंडक और मन को सुकून दे सकती है।
कान्हा टाइगर रिजर्व के सूपखार रेंज का यह बंगला भारत के सबसे अनोखे और विरासती फॉरेस्ट रेस्ट हाउसों में से एक है। 1910 में बना यह बंगला ब्रिटिश भारत के वायसराय का शिकारगाह हुआ करता था। इसकी सबसे बड़ी खासियत है उसका ऊंचा पिरामिड आकार का छप्पर। यह मोटी घास से बना है। पूरी छत हर तीन साल में बदल दी जाती है। आजादी के बाद भी यह अनोखा डिजाइन बरकरार रखा गया है। भारत में शायद ही कोई दूसरा फॉरेस्ट बंगला आज भी इस तरह के ऊंचे घास के छप्पर के साथ मौजूद हो।
बंगले की मोटी घास की छत और चूना-सुरखी की मोटी दीवारें गर्मियों में अंदर का तापमान बाहर की तुलना में काफी कम कर देती हैं। बाहर सूरज सब कुछ झुलसा रहा होता है, अंदर ठंडक बनी रहती है। वहीं सर्दियों में जब कान्हा में ठंड जोरों पर होती है, तब यह बंगला गर्म और आरामदायक आश्रय बन जाता है। बंगले में अभी भी ब्रिटिश काल के विशाल रस्सी से खींचे जाने वाले पुराने एंटीक पंखे काम की हालत में मौजूद हैं। एक कमरे में दो पंखे समानांतर भी लगे हैं।
सूपखार बंगला चीड़ और साल के घने जंगल के किनारे, विशाल सूपखार घास का मैदान के निकट है। इस मैदान पर जंगली हिरण, बारहसिंघा और अन्य वन्यजीव चरते दिख जाते हैं। बाघ और तेंदुए अक्सर इन जानवरों का पीछा करते हुए बंगले के आसपास घूमते रहते हैं।
केंद्रीय और पूर्व-मध्य भारत के अधिकांश पुराने फॉरेस्ट रेस्ट हाउसों के आसपास एक समय चीड़ के पेड़ लगाए जाते थे। हालांकि इन क्षेत्रों में पाइन के पेड़ अच्छी तरह फलते-फूलते नहीं हैं, वे बमुश्किल जीवित रहते हैं। कई पाइन सूख जाते हैं, लेकिन जो बच जाते हैं, वे बंगले को एक अनोखा और शांत वातावरण देते हैं।


