राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : मंत्रालय में चाय 25 रुपए कप ?
24-Apr-2026 5:54 PM
राजपथ-जनपथ : मंत्रालय में चाय 25 रुपए कप ?

मंत्रालय में चाय 25 रुपए कप ?

पिछले दिनों हमने इसी कालम में बताया था कि 1 मई से मंत्रालय महानदी भवन में इंडियन काफी हाउस के दोसे, सांबर बड़ा और काफी नहीं मिलेगी। मंत्रालय अधीक्षण शाखा ने देश में आईसीएच कैंटीन का अनुबंध बदलकर एक निजी होटल गु्रप को दे दिया है। देश में सहकारिता के सबसे सफल उदाहरणों में से एक, आईसीएच, नो प्राफिट नो लॉस के सिद्धांत पर रियायती दरों पर कारोबार करता है। अब निजी होटल गु्रप का ईप्सी कैटरिंग यह कैंटीन चलाएगा। रसोई संभालने से पहले ही रेट को लेकर मंत्रालय के गलियारों में जो हवा बह निकली है उसके मुताबिक तो एक आम व्यक्ति और कर्मचारी के लिए चाय पीने का आग्रह भी भारी पडऩे वाला है। अधिकारी कर्मचारियों के वाट्सएप गु्रप में इस महंगाई पर चुटकी और ठेका देने वाले अफसर पर गुस्सा पढ़ा जा सकता है। (वैसे बता दें कि जिन अफसर ने यह कांट्रेक्ट बदला उनका तबादला हो गया है)---

खबर है कि कॉफी हाउस इस महीने के अंत में बंद हो रहा है और जो नया आ रहा है, उसके रेट की चल रही चर्चा के मुताबिक, चाय 25 रुपए कप रह सकती है! इस हिसाब से साधारण कर्मचारी चाय पीने से पहले सोचेंगे। मंत्रालय के आसपास भी कोई दूसरा विकल्प नहीं है कि वहां जाकर खा-पी सकें। संघ को इस मुद्दे पर बीच में आना चाहिए। क्योंकि ये कर्मचारियों मूलभूत हित की बात है। यह रेट रेलवे स्टेशन से भी महंगा है।

कर्मचारियों का कहना है कि आईसीएच, अपने काम और नाम से जाना जाता है। इसका कांट्रेक्ट बदलने से सभी को बहुत सी समस्या होगी। क्योंकि यहां रियायती दर पर अच्छी चीज मिल जाती है। कर्मचारी संघ को हस्तक्षेप कर रोकना होगा। मंत्री, आला अधिकारियों की फ्री वाली पर्ची वाले स्टाफ को छोडक़र।

एक ने सुझाव दिया कि सिर्फ संसद भवन जैसी कैंटीन हर दस किलोमीटर पर खुलवा दीजिये, सारे लफड़े खत्म-29 रुपये में भरपेट खाना मिलेगा। 80 प्रतिशत कर्मचारियों को लोगों को घर चलाने का लफड़ा खत्म..ना सिलेंडर लाना, ना राशन,और घर वाली भी खुश, चारों तरफ खुशियाँ ही रहेगी। फिर हम कहेंगे सबका साथ सबका विकास।

इस पे गौर करें- कृपया कड़ी मेहनत से प्राप्त हुई ये जानकारी मंत्री और अधिकारियों तक पहुंचाने की कोशिश करें।  यह भी लिखा कि शान है या छलावा..,पूरे  भारत  में एक ही जगह ऐसी है जहां खाने की चीजें सबसे सस्ती है।

चाय = 1.00, सूप = 5.50, दाल= 1.50, खाना =2.00, चपाती  =1.00, चिकन= 24.50, डोसा = 4.00, बिरयानी=8.00, मच्छी= 13.00

ये सब चीजें सिर्फ माननीयों के लिए है और ये सब उपलब्ध हैं भारतीय संसद की कैंटीन में, और माननीयों की पगार है 1,50,000 रुपये  महीना वो भी बिना इनकम टैक्स के।

ई-चालान सिर्फ खजाना भरने का औजार है?

ई-चालान के नाम पर दोपहिया और चार पहिया निजी वाहन चालकों को 500 से 5000 रुपये तक के चालान आसानी से पहुंच रहे हैं। कई कामकाजी लोग, जिनके लिए दोपहिया वाहन रोजी-रोटी का साधन है, मामूली चूक पर यातायात विभाग की तीसरी नजर का शिकार हो रहे हैं। चालान सीधे मोबाइल पर आ जाता है और दबाव बढ़ाने के लिए रजिस्टर्ड डाक से अलग से नोटिस भेज दी जाती है। लेकिन आम लोगों से भी ज्यादा परेशानी व्यावसायिक वाहन चालकों और परिवहन व्यवसायियों को हो रही है। उन पर निजी वाहनों की तुलना में कई गुना अधिक चालान काटे जा रहे हैं।

छत्तीसगढ़ यातायात महासंघ ने इस एकतरफा तरीके पर सख्त आपत्ति जताई है। जिलों में क्षेत्रीय परिवहन अधिकारियों और कलेक्टरों को ज्ञापन सौंपते हुए उन्होंने कहा है कि बिना किसी सुनवाई के ऑनलाइन चालान जारी करना और भुगतान न करने पर एकतरफा दंडित करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। एक बार का चालान अब 5 से 7 हजार रुपये से कम नहीं आ रहा है। उनका कहना है कि बीमा, फिटनेस, परमिट, वर्दी और ओवरसीटिंग जैसे पुराने जुर्मानों का बोझ पहले से ही भारी था। अब कैमरों के जरिए कट रहे ई-चालान ने व्यावसायिक वाहन चालकों पर आर्थिक दबाव को और बढ़ा दिया है। महासंघ ने चेतावनी दी है कि यदि इस व्यवस्था पर तुरंत रोक नहीं लगाई गई, तो वे चक्का जाम और धरना-प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे।

आंकड़े बोल रहे हैं कि ई चालान की स्थिति देश में क्या है। वर्ष 2019 से 2024 तक देशभर में ई-चालान के जरिए 64 हजार करोड़ रुपये से अधिक के चालान जारी किए गए। इनमें से मात्र 12 हजार 632 करोड़ रुपये ही वसूल हो पाए। केवल वर्ष 2025 में 5.16 हजार करोड़ रुपये के चालान जारी हुए, जिनमें से 64 प्रतिशत से अधिक राशि अब तक वसूल नहीं हो सकी है।

इसका सीधा मतलब है कि चालान काटने का काम तो कैमरों को सौंप दिया गया, लेकिन वसूली के लिए न स्टाफ है, न पर्याप्त संसाधन। नोटिस में लिखा जाता है कि समय पर भुगतान न करने पर मामला कोर्ट भेज दिया जाएगा, लेकिन वहां तो लाखों मुकदमे पहले से पड़े हैं। इस तरह अदालतों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ाने के अलावा कुछ नहीं हो रहा है।

सच्चाई यह है कि ये कैमरे सिर्फ शहरों के प्रमुख चौक-चौराहों, टोल प्लाजा और हाईवे की कुछ टर्निंग्स पर ही लगे हैं। उसके बाद सैकड़ों किलोमीटर लंबी सडक़ों पर न कैमरे हैं, न पर्याप्त पेट्रोलिंग। रात के समय तो स्थिति और भी बदतर है। गलत पार्किंग, ओवरस्पीडिंग, रॉंग साइड ड्राइविंग और मालवाहक वाहनों में सवारियां ढोने जैसे गंभीर उल्लंघन इन पैट्रोलिंग-रहित इलाकों में हो रहे हैं, जिसके कारण छत्तीसगढ़ में ही बड़ी-बड़ी सडक़ दुर्घटनाएं हो चुकी हैं।

चालान काटने के लिए कैमरे और फोर्स तो सिर्फ सुविधाजनक जगहों पर तैनात किए जा रहे हैं। अगर हर साल पचासों हजार करोड़ रुपये के चालान काटे जा रहे हैं, तो कम से कम इन पैसों का कुछ हिस्सा यातायात सुरक्षा पर खर्च करके सडक़ों पर सही तैनाती की जानी चाहिए। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईवे के किनारे भारी वाहनों की अनियंत्रित पार्किंग पर सख्त टिप्पणी की है और राज्यों को निर्देश दिए हैं कि इस पर तुरंत कार्रवाई हो। अदालत ने पाया कि इसी वजह से भीषण दुर्घटनाएं हो रही हैं। दुर्भाग्य से ई-चालान की मौजूदा व्यवस्था सिर्फ सरकारी खजाना भरने का जरिया बनकर रह गई है। इससे जो राशि इक_ा हो रही है, वह सडक़ सुरक्षा, बेहतर यातायात प्रबंधन या दुर्घटना रोकथाम पर खर्च नहीं हो रही है। यातायात महासंघ ने आवाज उठाकर एक शुरुआत की है। लोगों को लगना चाहिए कि जब वे भारी भरकम चालान पटा रहे हैं तो उनकी बात सुनी जाए, चालान की राशि न्याय संगत होनी चाहिए, सिर्फ कमाई का जरिया नहीं बनाया जाए।

टीएमसी के निशाने पर सौरभ सिंह

पश्चिम बंगाल में गुरुवार को पहले चरण के मतदान के बीच टीएमसी  की तेज तर्रार नेत्री, और सांसद महुआ मोइत्रा के ट्वीट की राजनीतिक हलकों में काफी चर्चा रही। महुआ ने छत्तीसगढ़ के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त खनिज निगम के अध्यक्ष सौरभ सिंह की कुछ लोगों के साथ बतियाते तस्वीर साझा की। यह तस्वीर कोलकाता के एक होटल की बताई जा रही है, और महुआ का आरोप है कि सौरभ ‘वितरण’ कार्य कर रहे हैं। वो क्या वितरण कर रहे थे, यह तो टीएमसी सांसद ने स्पष्ट नहीं किया है, लेकिन पैसों के वितरण का हल्ला उड़ रहा है।

महुआ ने सौरभ सिंह को लेकर लिखा कि यह बंगाल है, और नितिन नबीन भी आपको नहीं बचा पाएंगे। उन्होंने यह भी कहा बंगाल में चुनाव के बाद धांधली करने वालों के खिलाफ कार्रवाई तय है।

चर्चा है कि महुआ के ट्वीट के बाद छत्तीसगढ़ के कई भाजपा नेताओं ने सौरभ सिंह से बात भी की है। सौरभ सिंह, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के करीबी माने जाते हैं, और वो बंगाल में पार्टी का चुनाव प्रबंधन संभाल रहे हैं। यही वजह है कि वो विरोधी दल टीएमसी के आंखों की किरकिरी बने हुए हैं। यद्यपि सौरभ सिंह के खिलाफ पैसों के वितरण की बात सामने नहीं आई है। मगर वो महुआ जैसे कई नेताओं के निशाने पर हैं। इससे सौरभ बेपरवाह है, और वो अपना काम बेहतर ढंग से करने में जुटे हुए हैं।

चर्चा है कि पश्चिम बंगाल के नतीजे चाहे जो भी हो, लेकिन इतना तय है कि इस पूरे घटनाक्रम में सौरभ सिंह को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में जरूर ला दिया है। ऐसे में सौरभ को देर सबेर राष्ट्रीय स्तर का कोई दायित्व मिल जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।


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