राजपथ - जनपथ
बंगाल में झालमुड़ी फैक्टर
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज है। पहले चरण की 152 सीटों पर 23 अप्रैल को मतदान होना है। इन सीटों पर छत्तीसगढ़ के बड़ी संख्या में नेता प्रचार में जुटे रहे, जिन्हें चुनाव आयोग के नियमों के तहत मतदान से 48 घंटे पहले क्षेत्र छोडऩा होगा। ऐसे में कई नेता अब आसपास के उन जिलों में शिफ्ट हो रहे हैं, जहां दूसरे चरण में मतदान होना है। इस सियासी माहौल के बीच ‘झालमुड़ी’ भी चर्चा का केंद्र बन गई है।
पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में पिछले दो महीनों से सक्रिय छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड के अध्यक्ष नीलू शर्मा का कहना है कि मतदाता खामोश है और माहौल कुछ वैसा ही नजर आ रहा है, जैसा कभी वाम मोर्चा सरकार को हराकर टीएमसी के पहली बार सत्ता में आने के दौरान था। नीलू शर्मा इस बार भाजपा के पक्ष में माहौल बनने का दावा कर रहे हैं।
इस बीच सोशल मीडिया पर एक तस्वीर और वीडियो खूब वायरल हो रहे हैं, जिसमें पीएम नरेंद्र मोदी कोलकाता के पास झाडग्राम में एक गुमटी पर रुककर झालमुड़ी खाते नजर आए। इस सहज अंदाज ने राजनीतिक चर्चाओं के साथ-साथ चुनावी माहौल में एक अलग रंग भी जोड़ दिया है।
बंगाल में प्रचार कर रहे भाजपा नेताओं का दावा है कि पीएम के झालमुड़ी खाते दिखने से आम लोगों और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच सकारात्मक संदेश गया है। पार्टी कार्यकर्ता इस वीडियो को बड़े पैमाने पर शेयर कर रहे हैं और इसे व्यापक प्रतिक्रिया मिल रही है। हालांकि ‘झालमुड़ी फैक्टर’ का वास्तविक चुनावी असर क्या होगा, यह तो नतीजों के बाद ही साफ होगा, लेकिन फिलहाल भाजपा कार्यकर्ता उम्मीद से हैं।
फिलहाल झालमुड़ी बेचने वालों की चाँदी है, लोग हँसी-मजाक में भी झालमुड़ी खा-खिला रहे हैं।
दूसरे अवसर में रूचि नहीं...
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की 10वीं बोर्ड परीक्षा में अपने प्राप्तांको से छात्र क्या संतुष्ट हैं? जबकि कुल 25 लाख में से 14 लाख विद्यार्थियों को कंपार्टमेंट (पूरक) आया है। खासकर उत्तीर्ण विद्यार्थियों ने दूसरे अवसर की परीक्षा पर ज्यादा रूचि नहीं दिखाई है। इसके लिए फार्म भरने की अवधि खत्म होने को है। इसे नया रुझान माना जा रहा है।
जो छात्र पहले मई में होने वाली दूसरी परीक्षा में बैठकर अपने अंक सुधारना चाहते थे, अब वे इससे पीछे हट रहे हैं। सीबीएसई में दूसरे अवसर की परीक्षा का पहला वर्ष है। छत्तीसगढ़ बोर्ड ने तो 24-25 में ही लागू कर दिया था।
कई स्कूलों ने विद्यार्थियों से दोबारा फीडबैक लेने के लिए नए आदेश जारी किए हैं। इसमें पूछा जा रहा है कि कितने विद्यार्थी अब भी दूसरी परीक्षा देना चाहते हैं। स्कूलों का कहना है कि बेहतर परिणाम के कारण इस बार दूसरी परीक्षा के लिए आवेदन करने वालों की संख्या कम रह सकती है।
नई व्यवस्था के तहत फरवरी-मार्च में पहली परीक्षा अनिवार्य थी, जबकि मई में दूसरी परीक्षा सुधार या कम्पार्टमेंट के लिए है। बेस्ट ऑफ टू (दो में से सर्वश्रेष्ठ) नियम के कारण विद्यार्थियों को जोखिम नहीं है, क्योंकि दोनों में से बेहतर अंक ही अंतिम परिणाम में जोड़े जाएंगे।
इसके बावजूद, जिन विद्यार्थियों के अंक पहले ही अच्छे आ चुके हैं, वे दो माह अतिरिक्त तैयारी के दबाव से बचना चाहते हैं। स्कूलों का मानना है कि गणित और विज्ञान जैसे विषयों में कुछ विद्यार्थी अब भी दूसरा मौका ले सकते हैं, लेकिन कुल संख्या सीमित रहेगी। वहीं, अधिकतर विद्यार्थी परिणाम के बाद सीधे कक्षा 11वीं में प्रवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं।
सड्डू स्थित एक निजी स्कूल के प्राचार्य ने कहा कि उनके स्कूल में परीक्षाएं शुरू होने से पहले कुल छह बच्चों ने दूसरी बोर्ड परीक्षा का फार्म भरा था, लेकिन इसमें से तीन बच्चों ने वापस ले लिया है। अन्य तीन की काउंसलिंग की गई है, उम्मीद है वो भी फार्म से अपना नाम वापस लेंगे। बच्चों ने जब इस विकल्प के संबंध में पूछताछ की तो शिक्षकों ने ही सेकंड अटेप्ट से मना किया। कहा पहली में ही मजबूत तैयारी कर लें।
सड्डू स्थित एक अन्य बड़े निजी स्कूल के प्रिंसिपल ने कहा कि कुल चार बच्चों ने फार्म भरा था। इसमें दो टॉप स्कोरर थे। उनके 93 प्रतिशत से अधिक अंक थे, उनकी काउंसलिंग की गई, जिसके बाद उन्होंने अपना नाम दूसरी बोर्ड परीक्षा से वापस ले लिया ।
दूसरी बोर्ड परीक्षा मई में होगी लेकिन ये हर किसी के लिए जरूरी नहीं है। केवल वही विद्यार्थी बैठेंगे, जिन्हें वाकई अंक सुधारने की जरूरत है या किसी विषय में पास होना है। विद्यार्थी इसमें तीन विषयों तक अपने अंक सुधार सकते हैं। इसमें विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान और भाषा विषय शामिल है। दोनों परिणाम से सामने आए बेहतर अंक ही जोड़े जाएंगे, यानी जोखिम नहीं सिर्फ फायदा। और इसका परिणाम जून में आएगा। और तभी अंतिम मार्कशीट और पासिंग सर्टिफिकेट दूसरे चरण के बाद जारी होंगे। तब तक छात्र पहले चरण के अंकों के आधार पर भी 11वीं में दाखिला ले सकते हैं, दूसरे चरण का इंतजार जरूरी नहीं।
प्री-वेडिंग शूट, पर्यटन का नया प्रयोग
अपने यहां प्री-वेडिंग शूट शादी की रीति-रिवाजों का हिस्सा कभी नहीं रहा। मगर, पिछले दो दशकों में सिनेमा, टेलीविजन और सोशल मीडिया के असर ने इसे आधुनिक शादियों का एक जरूरी अंग बना दिया है। आज यह ट्रेंड महानगरों की चकाचौंध से निकलकर छत्तीसगढ़ के छोटे कस्बों और दूरदराज के गांवों तक पहुंच चुका है। दिलचस्प है कि जहां शादी की मुख्य रस्में आज भी पुरानी मान्यताओं के अनुसार होती हैं, वहीं परिवार के बुजुर्ग भी इस आधुनिक बदलाव के मामले में लचीला रुख रखते हैं। शादी से पहले संगीत और नाच-गाने के बीच इन वीडियो की स्क्रीनिंग अब एक अलग समारोह बन चुका है। वेडिंग इंडस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार, प्री-वेडिंग शूट देश भर में सालाना 3 से 4 लाख करोड़ रुपये का कारोबार कर रहा है।
अपने यहां इस चलन का एक दूसरा पहलू भी है। राज्य के कुछ सामाजिक संगठनों ने इसे अनुचित बताते हुए इसके खिलाफ प्रस्ताव पारित किए हैं। उनका तर्क है कि विवाह से पहले वर-वधू की ऐसी नजदीकी और उसका सार्वजनिक प्रदर्शन सामाजिक मर्यादा के अनुकूल नहीं है। हालांकि, इन पाबंदियों का खास असर नहीं दिखा है और युवाओं के बीच प्री-वेडिंग शूट की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।
शायद, इस बढ़ते क्रेज को देखते हुए ही छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड ने कोरिया, बैकुंठपुर स्थित अपने रिसॉर्ट को प्री-वेडिंग शूट के लिए खोल दिया है, जिसके लिए निर्धारित शुल्क लिया जाएगा। गोवा, राजस्थान और उत्तराखंड जैसे राज्यों में ऐसा पहले से किया जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य राजस्व में वृद्धि करना और सरकारी संपत्तियों का बेहतर उपयोग करना बताया गया है।
प्री वेडिंग शूट स्थानीय फोटोग्राफरों, इवेंट प्लानर्स, टैक्सी ऑपरेटरों और होटल व्यवसायियों के लिए भी आमदनी के नए अवसर पैदा करता है। यदि इसी पहल को चित्रकोट, तीरथगढ़, सिरपुर, मल्हार और बारनवापारा जैसे पुरातात्विक, ऐतिहासिक व प्राकृतिक स्थलों तक और विस्तार दिया जाए, तो छत्तीसगढ़ भी देश के नए वेडिंग डेस्टिनेशन के रूप में उभर सकता है। हालांकि, इस विजन को हकीकत में बदलने के लिए केवल सजाया संवारा कॉटेज काफी नहीं है। राज्य में बुनियादी ढांचे की कमी एक बड़ी बाधा है। प्रमुख पर्यटन स्थलों तक पहुंचने वाली सडक़ें बदहाल हैं और ठहरने के लिए गुणवत्तापूर्ण व किफायती विश्राम गृहों का अभाव है। अन्य राज्यों के मुकाबले हमारे यहां होम-स्टे का चलन भी अभी शुरुआती दौर में है, जबकि बस्तर में इसके सफल प्रयोग ने इसकी क्षमता को सिद्ध किया है।
यदि सरकार और पर्यटन बोर्ड राजस्व बढ़ाने के लिए प्री-वेडिंग शूट जैसे आधुनिक रुझानों को बढ़ावा दे रहा है, तो उसे इसके लिए पीडब्ल्यूडी, एवियेशन, वन विभाग और सिंचाई विभाग के साथ समन्वय करना होगा ताकि बेहतर कनेक्टिविटी और सुविधाएं सुनिश्चित हो सकें। देखना होगा यह शुरूआत कोरिया में ही ठहर जाएगी, या राज्य में पर्यटन के विकास की नई संभावना के रूप में आकार लेगी।


